पृष्ठ : बिहार अबतक

मनोज वाजपेयी ने जीता एशिया पेसिफिक स्क्रीन अवार्ड

अपने संजीदा अभिनय से बॉलीवुड में बिहार को गौरवान्वित करने वाले अभिनेता मनोज वाजपेयी ने ‘एशिया पेसिफिक स्क्रीन अवार्ड्स’ (आप्सा) में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार हासिल किया। नवाजुद्दीन सिद्दीकी को इसी कैटेगरी में स्पेशल अवार्ड से सम्मानित किया गया। फिल्म उद्योग में सर्वोच्च सम्मान के तौर पर पहचाने जाने वाले इस पुरस्कार की घोषणा शुक्रवार रात ब्रिस्बेन में हुए एक समारोह के दौरान की गई। इस समारोह को ऑस्ट्रेलियाई अभिनेता डेविड वेल्हम ने होस्ट किया।

बता दें कि इस साल आप्सा का 10वां सीजन था। आप्सा सिनेमा के लिए सजग विश्व के 70 देशों का साझा मंच है और यह पुरस्कार इन देशों में सिनेमा की उत्कृष्टता और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रदान किया जाता है। इसके आयोजन में इन सभी देशों की झलक एक साथ देखने को मिलती है। कहने की जरूरत नहीं कि इतने बड़े और विशिष्ट मंच पर ‘सर्वश्रेष्ठ’ कहलाना कितनी बड़ी उपलब्धि है।

मनोज वाजपेयी को यह पुरस्कार हंसल मेहता की फिल्म ‘अलीगढ़’ में निभाई उनकी प्रोफेसर सिरास की अविस्मरणीय भूमिका के लिए मिला। आप्सा में यह उनका दूसरा नॉमिनेशन था। इससे पहले 2012 में अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के लिए उन्हें नॉमिनेशन मिला था। नवाजुद्दीन को इस साल अनुराग कश्यप की ही फिल्म ‘रमन राघव 2.0’ के लिए स्पेशल अवार्ड मिला।

फिल्म अलीगढ़ में मनोज ने प्रोफेसर सिरास की भूमिका को इतना जीवंत कर दिया है कि दर्शक न केवल उनके किरदार से बंध जाता है बल्कि उसे जीने लग जाता है। आप्सा इंटरनेशनल के जूरी सदस्य जेन चैपमैन ने उनकी भूमिका के लिए कहा कि “यह बेहतरीन और दमदार अभिनय है। इसके मानवीय पक्ष और गहराई ने मुझे प्रभावित किया।” जूरी के एक अन्य सदस्य श्याम बेनेगल के शब्दों में “उन्होंने असाधारण और बेहतरीन अभिनय किया। हर छोटी बात को विस्तार और गहराई से दर्शाया गया है, जो अभिनय में नज़र आता है।”

गौरतलब है कि अप्रैल में मनोज को अलीगढ़ के लिए ही दादा साहब फाल्के पुरस्कार (क्रिटिक्स च्वाइस) के लिए चुना गया। यहाँ भी उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार अपने नाम किया। बिहार के इस लाल को ‘मधेपुरा अबतक’ की बधाई।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

सम्बंधित खबरें


नीतीश फिर भाजपा के करीब !

मीडिया में आ रही ख़बरों के मुताबिक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों भाजपा के संपर्क में हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा के एक बड़े नेता से उनकी बात हुई है और बहुत संभव है कि आने दिनों में जेडीयू और भाजपा फिर एक साथ दिखाई दें। दरअसल इस तरह की सुगबुगाहट तभी शुरू हो गई थी जब यूपी चुनाव को लेकर जेडीयू और आरजेडी ने अपनी राहें अलग कर लीं। पर पिछले दिनों नीतीश ने लालू और कांग्रेस के स्टैंड से एकदम उलट जिस तरह केन्द्र सरकार के नोटबंदी के फैसले की तारीफ की, उसके बाद इस चर्चा ने खासा जोर पकड़ लिया है।

टीवी रिपोर्ट्स के मुताबिक नीतीश ने भाजपा के एक बड़े नेता से बात की और नोटबंदी की तारीफ की। गौर करने की बात है कि यह ‘तारीफ’ उन तारीफों के अतिरिक्त है जो वे सार्वजनिक मंचों से कर रहे हैं। वैसे इन तारीफों के अलग मायने इसलिए भी लगाए जा रहे हैं क्योंकि हाल के दिनों में जेडीयू और आरजेडी के बीच तल्खियां आम हो चली हैं। उदाहरण के तौर पर नीतीश की निश्चय यात्रा का संदर्भ ही लें। आरजेडी के वरिष्ठ नेता और उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने इस यात्रा को ‘बेकार’ करार दिया। उन्होंने यहाँ तक कहा कि यात्रा के दौरान केवल बातें की जा रही हैं, धरातल पर काम नहीं दिख रहा। यह केवल जेडीयू की यात्रा बनकर रह गई है।

नोटबंदी जैसे बड़े मुद्दे पर लालू-नीतीश की बिखरती जुगलबंदी और खुलकर सामने आई। एक ओर लालू प्रसाद यादव अपने एक के बाद एक आक्रामक ट्वीट और बयानों में इसे ‘फर्जिकल स्ट्राइक’ करार दे रहे हैं तो दूसरी ओर नीतीश इस फैसले को ‘साहसिक’ बताते हुए इसका स्वागत कर रहे हैं। उनके बेहद करीबी और हाल में राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए हरिवंश भी नोटबंदी के पक्ष में लेख लिख रहे हैं। हाँ, पार्टी के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव जरूर इसके विरोध में खड़े दिख रहे हैं, पर जेडीयू की अंदरूनी राजनीति से वाकिफ लोग बखूबी जानते हैं कि पार्टी में उनका ‘स्थान’ और ‘सम्मान’ केवल सांकेतिक है।

अंदरखाने इस बात की भी चर्चा है कि लालू को राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश की बढ़ती दिलचस्पी रास नहीं आ रही। चाहे यूपी चुनाव में गठबंधन की कवायद हो या शराबबंदी को देशव्यापी अभियान बनाने की कोशिश, लालू अच्छी तरह समझ रहे हैं कि नीतीश दिन-रात एक कर 2019 में खुद को मोदी के बरक्स लाने में जुटे हैं। नीतीश की इस तरह की कोशिशों को लालू के करीबी ‘वादाखिलाफी’ करार देते हैं। कारण यह कि जब महागठबंधन की नींव रखी जा रही थी, तब तथाकथित तौर पर तय यह हुआ था कि नीतीश बिहार संभालेंगे और लालू देश भर में घूम-घूमकर महागठबंधन की राजनीति को विस्तार देंगे।

बहरहाल, कारणों को न खंगालें तो भी इतना तो तय है कि महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। नहीं तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी को न तो यह कहने की जरूरत पड़ती कि “महागठबंधन एकजुट है” और न यह दावा करने की कि “महागठबंधन में दरार पैदा करने की कोशिशें नाकाम साबित होंगी।”

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


नोटबंदी पर सरकार के नए निर्देश

सरकार ने आज नोटबंदी से जुड़े कई अहम निर्देश जारी किए। 500 और 1000 रुपये के पुराने नोटों को अब 24 नवंबर की आधी रात के बाद बैंक काउंटरों से एक्सचेंज नहीं कराया जा सकेगा। इसका मतलब यह कि शुक्रवार से इन नोटों को अब सिर्फ बैंक में जमा कराया जा सकेगा। ऐसे नोटों को जमा कराने की अवधि 30 दिसंबर तक है।

बता दें कि आज जारी निर्देशों में सरकार ने 1000 रुपये के पुराने नोटों को पूरी तरह बैन कर दिया है, पर राहत की बात यह कि कई जरूरी सेवाओं में 500 रुपये के पुराने नोटों के उपयोग की अवधि 15 दिसंबर तक के लिए बढ़ा दी गई है। इन नोटों के जरिए वर्तमान और बकाया बिजली और पानी के बिल भरे जा सकेंगे। साथ ही इनका इस्तेमाल पेट्रोल पम्पों, दवा दुकानों, अस्पतालों, रेलवे स्टेशनों एवं हवाई अड्डों पर किया जा सकेगा। 500 के पुराने नोटों से 3 दिसंबर से 15 दिसंबर तक टोल टैक्स भी दिया जा सकेगा। 3 दिसंबर से इसलिए क्योंकि सरकार ने 2 दिसंबर तक टोल टैक्स फ्री कर दिया है।

वित्त मंत्रालय द्वारा जारी निर्देशों के मुताबिक केन्द्र और राज्य सरकार के स्कूलों व म्युनिसिपैलिटी और स्थानीय निकाय के स्कूलों में भी प्रति छात्र 2000 तक की फीस 500 के पुराने नोटों के जरिए अदा की जा सकेगी। केन्द्र एवं राज्य सरकार के कॉलेजों की फीस भी इन नोटों से दी जा सकेगी। यही नहीं, उपभोक्ता सहकारी दुकानों से एक बार में अधिकतम 5000 की खरीद और 500 रुपये मूल्य तक के प्रीपेड मोबाइल फोन टॉप-अप में भी 15 दिसंबर तक 500 के पुराने नोट चलेंगे।

 

सम्बंधित खबरें


शराबबंदी कानून में ‘जरूरी’ संशोधन को नीतीश तैयार

संसद से सड़क तक नोटबंदी पर हो रहे हो-हंगामे के बीच बिहार में शराबबंदी कानून पर सर्वसम्मति बनाने के उद्देश्य से बिहार सरकार ने सार्थक पहल की है। बिहार विधानसभा पुस्तकालय में शराबबंदी कानून पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत सभी दलों की राय जानने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि इस बैठक और लोकसंवाद में मिले सुझावों पर कानूनविदों की राय लेंगे और जो प्रस्ताव होगा उसे सदन में लेकर आएंगे। इस बैठक के बाद यह साफ हो गया कि शराबबंदी कानून में ‘जरूरी’ संशोधन के लिए सरकार मन बना चुकी है।

गौरतलब है कि इससे पूर्व 14 नवंबर को मुख्यमंत्री ने लोगों से सीधा संवाद कर उनके सुझाव सुने थे। इन दोनों ही बैठकों में सबने शराबबंदी का खुले दिल से समर्थन किया, लेकिन इसके लिए बने कानून के कुछ प्रावधानों पर सवाल भी उठाए। सर्वदलीय बैठक में नीतीश ने कहा कि सबलोग एकजुट रहेंगे तो शराबबंदी अभियान में मजबूती आएगी। अलग-अलग विचार होने से गलत करने वालों का हौसला बढ़ता है। अगर कोई कानून अतिवादी है तो उसके बदले क्या होना चाहिए, इस पर बात हो। हम सदन के अंदर और बाहर कहते रहे हैं कि ठोस सुझाव दिए जाएं।

सर्वदलीय बैठक के बाद अब इस बात की पूरी संभावना है कि 25 नवंबर से शुरू हो रहे शीतकालीन सत्र में इस बाबत संशोधन विधेयक लाया जाए। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार घर में शराब मिलने पर सभी वयस्कों को सजा का प्रावधान तर्कसंगत नहीं माना जा रहा है। महिलाओं और बुजुर्गों को इससे बाहर रखने पर विचार चल रहा है। इसी तरह शराब मिलने पर उस मकान या परिसर की जब्ती, कारोबार होने पर पूरे गांव पर सामूहिक जुर्माना या जिलाबदर करने जैसे प्रावधान को भी कठोर माना जा रहा है।

प्रसन्नता की बात है कि ऐसे तमाम ‘जरूरी’ संशोधनों पर सरकार पूरी गंभीरता से मंथन में जुट गई है। हालांकि संशोधन में इसका पूरा ख्याल रखा जाएगा कि वे शराबबंदी के मूल उद्देश्य से अलग न हों। शराबबंदी पर सरकार की स्पष्ट राय है कि लोगों की असुविधा कम हो पर अवैध तरीके से कारोबार करने वालों पर शिकंजा बरकरार रहे।

चलते-चलते

क्या हमारे प्रधानमंत्री कुछ ऐसा ही कदम नोटबंदी को लेकर नहीं उठा सकते? ताकि कालेधन पर रोक तो लगे पर निरीह जनता की परेशानी न बढ़े!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


लालू ने कहा, नोटबंदी आम जनता का ‘फेक एनकाउंटर’ है !

नोटबंदी के बाद एक ओर देश भर में अफरातफरी मची है, बैंक और एटीएम में लोगों की कतार छोटी होने का नाम नहीं ले रही, तमाम विपक्षी दल संसद में सरकार को घेरने की रणनीति बना रहे हैं तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी कालेधन के खिलाफ जारी अपनी जंग को आगे भी जारी रखने की बात कह  रहे हैं और बेनामी सम्पत्ति उनका अगला निशाना होगी। नोटबंदी के बाद चाहे आमलोगों की परेशानी हो या फिर सियासी तकरार, बिहार में भी चरम पर है। सोमवार को इसको लेकर भाकपा, माले, आइसा और इनौस कार्यकर्ताओं ने राज्यव्यापी विरोध दिवस मनाया। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी महासचिव और सांसद तारिक अनवर ने भी विमुद्रीकरण को बिना सोचे समझे जल्दबाजी में उठाया कदम करार दिया। सत्तारूढ़ महागठबंधन भी अपने तरीके से राज्य से लेकर केन्द्र तक इस मुद्दे को उठाने में जुटा हुआ है।

इन सारी गहमागहमी के बीच आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने एक के बाद एक कई ट्वीट कर माहौल को और गरमा दिया है। उन्होंने 500 और 1000 बड़े नोट बंद करने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बड़े तल्ख अंदाज में पूछा है कि किसानों को किन पापों की सजा और पूंजीपति मित्रों को किन कर्मों का पुण्य दे रहे हैं? अपने ट्विटर हैंडल पर एक के बाद एक कई पोस्ट कर उन्होंने प्रधानमंत्री पर जमकर निशाना साधा और कहा कि गांवों में बैंक नहीं हैं और हैं भी तो उनमें पैसे नहीं हैं। किसानों की खरीफ पैदावार पड़ी है। कोई खरीदने वाला नहीं है। रबी की बुआई के लिए पैसा नहीं है। एसी कमरों में नीति बनाने वालों को किसानी का ‘क’ भी नहीं पता है। किसान मर रहे हैं। इन हालात में जनता को भाषण नहीं राशन चाहिए।

नोटबंदी को लेकर लालू पहले भी मोदी पर भड़ास निकाल चुके हैं। अपने एक बयान में उन्होंने नोटबंदी को मोदी का फर्जिकल स्ट्राइक बताया है। उन्होंने कहा कि इतनी परेशानी के बाद भी अगर जनता के खातों में 15-15 लाख नहीं आए तो इसका मतलब साफ होगा कि नरेन्द्र मोदी का यह फर्जिकल स्ट्राइक था। इसी के साथ आम जनता का फेक एनकाउंटर भी। लालू का कहना है कि वह खुद कालाधन के खिलाफ हैं, लकिन प्रधानमंत्री के काम में दूरदर्शिता का पूरा अभाव दिख रहा है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि अगर मोदी कालाधन को समाप्त करना चाहते हैं तो फिर दो हजार का नोट क्यों ला रहे हैं?

बिहार के उपमुख्यमंत्री और लालू के छोटे बेटे तेजस्वी भी ट्वीट-युद्ध और मोदी पर तंज कसने में अपने पिता से पीछे नहीं। उन्होंने ट्वीट कर प्रधानमंत्री से कहा है कि जनता की परेशानी पर अगर दिल पसीज जाए तो थोड़ी रहम कर देंगे। बैंक में पैसा रहते पति का इलाज पैसे के अभाव में नहीं करा सकने के एक महिला के ट्वीट को रिट्वीट कर तेजस्वी ने कहा कि कहीं इससे पीएम का दिल पसीज जाए। इसी तरह इलाज न कराने का दर्द बयां करते एक विडियो भी उन्होंने ट्वीट किया और कहा कि पीएम इन पीड़ितों के लिए कुछ करें।

बहरहाल, अभी न तो बैंक और एटीएम की कतार छोटी हो रही, न ही नेताओं के बयान की तल्खियां। लेकिन प्रधानमंत्री ने जिस विश्वास और संकल्प के साथ नोटबंदी का इतना बड़ा कदम उठाया, अगर वो सच साबित हो जाए तो स्थिति एकदम भिन्न होगी। तब शायद अभी की परेशानियां याद न रहें – आमलोगों के साथ-साथ नेताओं को भी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


काले धन पर मोदी की चोट, 500 और 1000 के नोट आज से बंद

आज मध्य रात्रि से 500 और 1000 रुपये के नोट आधिकारिक तौर पर बंद हो जाएंगे। अगर आपके पास ईमानदारी से कमाए पैसे हैं तो आप उन्हें 30 दिसंबर तक बेहिचक बैंक या डाकघर में जमा करा सकते हैं लेकिन अगर आपने धन अनैतिक तरीके से कमाया है और वो 500 या 1000 रुपये के नोटों की शक्ल में है तो आज रात 12 बजे के बाद वो रद्दी में तब्दील हो जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज देर शाम स्वयं यह ऐतिहासिक घोषणा की। काले धन के काले इस्तेमाल पर रोक लगाने की खातिर ऐसा साहसिक निर्णय आज तक संसार के किसी देश ने नहीं लिया था। भारत में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए नकली नोटों का इस्तेमाल जिस तरह बढ़ रहा था, उसे देखते हुए भी केन्द्र से एक बड़े निर्णय की अपेक्षा थी। लेकिन वो निर्णय इतना बड़ा और इतने बड़े पैमाने पर होगा, इसकी हवा प्रधानमंत्री ने अपने निकटतम लोगों को भी लगने नहीं दी थी।

बहरहाल, इस बड़ी ख़बर से जुड़ी पाँच बड़ी बातों पर निगाह डालना बेहद जरूरी है। पहली बात, 11 नवंबर की रात 12 बजे तक पेट्रोल पंप, सीएनजी स्टेशन, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, हवाई अड्डे, अस्पताल और दवा की दूकान पर 500 और 1000 रुपये के नोट स्वीकार किए जाएंगे। दूसरी बात, 9 नवंबर को सारे बैंक और एटीएम बंद रहेंगे। कुछ एटीएम 10 नवंबर को भी बंद रहेंगे। तीसरी बात, समुचित व्यवस्था होने तक जरूरी खर्चों के लिए शुरू में कुछ दिनों तक 2000 और उसके बाद 4000 तक के नोट आप बैंकों से बदल सकते हैं। चौथी बात, 10 नवंबर से 30 दिसंबर तक आप अपने पास रखे 500 और 1000 रुपये के नोट बैंक या डाकघर में जमा करा सकते हैं। और पाँचवीं बात, कल के बाद 500 के नए नोट तो आप देखेंगे, लेकिन 1000 के नोट अब इतिहास की चीज हो जाएंगे। इनकी जगह सरकार ने 2000 के नोट जारी करने का निर्णय लिया है।

याद रखें, आप इतिहास को बनते हुए रख रहे हैं। सरकार के इस बड़े निर्णय के बाद आपकी दिनचर्या से लेकर देश की अर्थव्यवस्था तक कई परिवर्तन आपको देखने को मिलेंगे, लेकिन आपकी धनराशि हर हाल में आपकी ही रहेगी। आपको चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है। शर्त बस इतनी कि आपने वो धनराशि घोषित स्रोतों से और ईमानदारी से कमाई हो।

हमारे देश में भ्रष्टाचार और कालाधन जैसी बीमारियों ने जड़ जमा लिया था। देश से गरीबी हटाने की राह में सबसे बड़ी बाधा यही थी। इसकी वजह से आतंकी भी आसानी से भारत में पैर जमा लेते थे। हवाला के जरिए हथियारों की खरीद कोई छिपी हुई बात नहीं। चुनावों में काले धन के इस्तेमाल से भला कौन वाकिफ नहीं! देश आखिर पनपता तो कैसे?

करोड़ों भारतवासी जिनकी रगों में अब भी ईमानदारी दौड़ा करती है, बड़ी शिद्दत से भ्रष्टाचार, काले धन और आतंक के खिलाफ निर्णायक लड़ाई की प्रतीक्षा कर रहे थे। मोदी सरकार के इस शक्तिशाली और अभूतपूर्व कदम के बाद उनकी उम्मीदों को कितने पंख लग गए, उन्हें नंगी आंखों से शायद हम देख भी ना पाएं। प्रधानमंत्री को इस निर्णायक निर्णय के लिए बारंबार बधाई और साधुवाद!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

सम्बंधित खबरें


संसार के हर त्योहार से विलक्षण है छठ

समय के साथ सब कुछ बदलता है। आपके तौर-तरीके ही नहीं, त्योहार तक बदल जाते हैं। तकनीक ने हमें बाहर जितना विस्तार दिया, भीतर उसी अनुपात में सिमटते गए हम और इस ‘संकुचन’ को बड़ी बेशर्मी से ‘आधुनिकता’ का नाम दिया हमने। आयातित बोली, आयातित शिक्षा, आयातित परिधान, आयातित संगीत, आयातित नृत्य, आयातित साहित्य, आयातित सिनेमा, आयातित उपकरण… इस आधुनिकता में सब कुछ आयातित था। आयात-आधारित इस आधुनिकता में हम विचारधारा भी आयात करने लगे और अब तो त्योहार आयात करने में भी हमें संकोच नहीं होता हमें। इसे हम समय के साथ बदलना कहने लगे हैं।

इस ‘आधुनिकता’ की होड़ में गांव बड़ी तेजी से शहरों में खोते जा रहे हैं। डिब्बाबंद दूध, ‘डेलिवर’ किए गए फास्ट फूड और बोतलबंद पानी पर बड़ी हुई पीढ़ी ‘ईएमआई’ चुकाना भले सीख ले, मिट्टी का ‘कर्ज’ चुकाने के संस्कार से वो कोसों दूर रहेगी। हम गौर से देखें, जड़ तक जाकर पड़ताल करें तो पाएंगे कि हमारे सारे व्रत और त्योहार हमारी मिट्टी से जुड़े हैं। हम आजीवन अपनी मिट्टी से जो लेते हैं दरअसल व्रत रखकर और त्योहार मनाकर उसी का आभार जताते हैं हम। पर लानत है हम पर कि अब हम अपनी मिट्टी तक में ‘मिलावट’ करने लगे हैं। इसी का परिणाम है कि होली, दीपावाली जैसे त्योहारों का बड़ी तेजी से ‘शहरीकरण’ होने लगा है। या यूँ कहें कि अब इन त्योहारों को हम ‘आधुनिक’ तरीके से मनाने लगे हैं।

आधुनिकता की इस चकाचौंध में भी अगर हमारी आँखें पूरी तरह चुंधिया नहीं गई हैं तो इसका बहुत बड़ा श्रेय छठ को जाता है। अपनी जड़ों से कटकर महानगरों के आसमान में उड़ना सीख गए बच्चे होली-दीपावली चाहे जहाँ मना लें पर छठ के लिए वे अपने ‘घोंसले’ को लौट आते हैं। उन बच्चों के बच्चे जान पाते हैं कि ‘टू बेडरूम फ्लैट’ से बाहर की दुनिया कितनी बड़ी होती है और दो इकाईयों के साथ रहने से बने परिवार और कई परिवारों के जुड़ने से बने परिवार में क्या फर्क होता है। वे समझ पाते हैं कि ‘डिस्कवरी’ पर नदियों को देखना और उसे छूकर महसूसना कितना अलग होता है। वे जान पाते हैं कि क्या होता है सूप, कैसा होता है दौउरा, कौन बनाते हैं इन चीजों को और समाज के कितने अभिन्न अंग हैं वे। छठ ही बताता है उन्हें डाभ, चकोतरा (टाब नींबू), सिंघाड़ा, अल्हुआ और सुथनी जैसे फलों का अस्तित्व।

छठ धर्म से ज्यादा समाज का, सामूहिकता का और समानता का त्योहार है। समाजवाद का सबसे जीवंत दृश्य आपको छठ घाट पर दिखेगा। मालिक और मजदूर दोनों एक समान सिर पर प्रसाद का दौउरा ढोते मिलेंगे आपको। सबके सूप का मोल-महत्व एक समान होगा। कोई आडम्बर नहीं। किसी को भी पुरोहित की ‘मध्यस्थता’ नहीं चाहिए होती। बस आस्था होनी चाहिए, आपकी पूजा सीधे छठी मईया तक पहुँच जाती है। हिन्दू-मुसलमान के बीच खड़ी ‘दीवार’ भी इस आस्था के आगे सिर झुकाती है। ऐसा कोई बाज़ार नहीं जिसमें छठ की पूजन सामग्री बेचने वालों में मुस्लिम समाज के लोग ना हों। उनकी श्रद्धा और उत्साह में रत्ती भर भी कमी निकाल कर दिखा दें आप। और तो और आप शिद्दत से ढूँढेंगे तो कुछ घाट ऐसे भी होंगे जहाँ अर्ध्य देतीं मुस्लिम माताएं और बहनें भी दिख जाएंगी आपको।

अगर छठ ना हो तो आज के युग में ‘डूबते सूरज’ को प्रणाम करना हम सीख ही नहीं पाएंगे। बेटियों को कोख में ही मार देने वाले कभी नहीं जान पाएंगे कि किसी पर्व में बेटियों की भी मन्नत मांगी जाती है। हिन्दू समाज का ये सम्भवत: एकमात्र पर्व है जिसमें अराधना के लिए किसी ‘मूर्ति’ की जरूरत नहीं पड़ती। व्रत करने वाली हर नारी छठी मईया का रूप होती है और उम्र में आपसे छोटी ही क्यों ना हों उनके पैर छूकर ही प्रसाद ग्रहण करना होता है आपको। नारी-सशक्तिकरण के किसी नारे में इतनी ताकत हो तो बताएं।

संसार का कोई त्योहार, कोई पर्व एक साथ इतनी विलक्षण खूबियों को अपने में नहीं समा सकता, इसीलिए छठ ‘महापर्व’ है। हमारी आस्था का, हमारे संस्कार का, हमारी पवित्रता का, हमारे विस्तार का ‘महापर्व’। मिट्टी के सोंधेपन से सने छठ के गीत सुनकर जब तक आपके रोम-रोम झंकृत होते रहेंगे तब तक समझिए अपनी जड़ से जुड़े हैं आप और तथाकथित ‘आधुनिकता’ की कैसी भी आंधी क्यों ना हो बहुत मजबूती से टिके हैं आप।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

सम्बंधित खबरें


पटना या दिल्ली में नहीं लगता नीतीश का मन

विकास यात्रा, न्याय यात्रा, प्रवास यात्रा, धन्यवाद यात्रा जैसी कई यात्राओं के बाद बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अब ‘निश्चय यात्रा’ पर निकलेंगे। छठ पूजा के बाद 9 नवंबर को निश्चय यात्रा पर निकलने की घोषणा करते हुए नीतीश ने कहा कि “पटना या दिल्ली में मेरा मन नहीं लगता, मुझे ग्रामीण क्षेत्रों से ज्यादा लगाव है।”  निश्चय यात्रा के दौरान नीतीश जिला स्तर पर पूर्ण शराबबंदी के प्रभाव और सरकार के सात निश्चयों के तहत हो रहे विकास कार्यों की प्रगति की समीक्षा करेंगे।

बिहार के मुख्यमंत्री ने शुक्रवार को पटना में सात निश्चयों में शामिल ‘घर तक पक्की गली-नलियां’ का शुभारम्भ करते हुए कहा कि “विधानसभा चुनाव के दौरान किए गए वादों को एक-एक कर कार्यान्वित किया जा रहा है। इसकी समीक्षा के लिए 9 नवंबर से मैं निश्चय यात्रा पर निकलूंगा। इस दौरान लोगों से मिलकर इन विकास कार्यों के विषय में जानकारी लूंगा।” बता दें कि इससे पहले नीतीश प्रमंडल स्तर पर शराबबंदी और सात निश्चयों के तहत हो रहे विकास कार्यों की समीक्षा कर चुके हैं।

गौरतलब है कि विधानसभा चुनाव से पहले महागठबंधन ने लोगों से सात निश्चयों के तहत कई वादे किए थे। इसके तहत ‘हर घर, नल का जल’, ‘शौचालय निर्माण – घर का सम्मान’ सहित कई विकास योजनाएं शामिल हैं। बकौल नीतीश ये सारी योजनाएं ग्रामीणों से बातचीत और उनके अनुभव के आधार पर ही बनाई गई हैं।

बहरहाल, नीतीश को उनकी नई यात्रा के लिए शुभकामनाएं। ये अच्छी बात है कि नीतीश ‘मन लगाने’ को गांवों-कस्बों और जिलों की ओर रुख कर रहे हैं। उन्हें पता है कि वे देश-दुनिया में चाहे जितना घूम-टहल लें, उनके हर पथ का ‘पाथेय’ बिहार में ही है। जड़ को मजबूत रखे बिना शाखाएं और टहनियां सुरक्षित नहीं रह सकतीं, इसका भान उन्हें जब तक रहेगा, तब तक वे बिहार और देश की राजनीति में प्रासंगिक बने रहेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

सम्बंधित खबरें


हमारी दीपावली से अब सारा संसार जगमगाता है

दीपों का उत्सव, प्रकाश का पर्व, तमाम आसुरी वृत्तियों पर विजय का उद्घोष – दीपावली। ब्रह्मपुराण के अनुसार कार्तिक अमावस्या की इस अधेरी रात्रि में महालक्ष्मी स्वयं भूलोक पर आती हैं और प्रत्येक सद्गृहस्थ के घर में विचरण करती हैं। जो घर हर प्रकार से स्वच्छ, शुद्ध, सुसज्जित और प्रकाशयुक्त होता है, वहां लक्ष्मी अंश रूप में ठहर जाती हैं। पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ दीपावली पर उनका आह्वान करें तो प्रसन्न होकर सद्गृहस्थों के घर वो स्थायी रूप से निवास करती हैं। लक्ष्मी की विशेष कृपा पाने के लिए ही व्यापारियों में आज ही के दिन बही-खाता बदलने की परंपरा है।

धर्मग्रंथों के अनुसार कार्तिक अमावस्या को भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास काटकर तथा रावण का संहार कर अयोध्या लौटे थे। तब अयोध्यावासियों ने राम के आगमन और उनके राज्यारोहण पर दीपमालाओं का महोत्सव मनाया था। अद्भुत संयोग है कि आगे चलकर इसी दिन सम्राट् विक्रमादित्य का राजतिलक हुआ। बता दें कि विक्रम संवत् का आरम्भ भी इसी दिन माना जाता है। यह भी मान्यता है कि दीपावली की अमावस्या से ही पितरों की रात्रि प्रारम्भ होती है। कहीं वे मार्ग भटक न जाएं, इसलिए भी सर्वत्र दीप व आतिशबाजी के माध्यम से प्रकाश की व्यवस्था की जाती है। इस तरह कहा जा सकता है कि अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ प्रकाश-पथ पर अग्रसर करने का पुनीत पर्व है दीपावली।

हमारे वेदों-उपनिषदों ने हमें ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का जो पाठ पढ़ाया उसे भारत समेत दुनिया भर में फैलाने का श्रेय दीपावली को ही जाता है। आज दीपावली केवल भारत तक सीमित नहीं रह गई है। इसे संसार के हर कोने में मनाया जाता है। सच तो यह है कि क्रिसमस और ईद की तरह आलोक का यह पर्व भी अब विश्वपर्व कहलाने का अधिकारी है।

दरअसल भारत से दशकों पहले (1834 से 1884 के बीच) सात समंदर पार चले गए भारतीय अपने तीज-त्योहारों को आज तक नहीं भूले। उदाहरण के तौर पर त्रिनिदाद और टोबैगो की ही बात करें। यहाँ भारतवंशियों की पहली टुकड़ी पहुँची थी। आज यहाँ की एक चौथाई आबादी हिन्दू है। दीपावली के पर्व पर यहाँ राष्ट्रीय अवकाश होता है। भारत में हमलोग भले ही मोमबत्ती को दीये के विकल्प के तौर पर अपनाने लगे हों, लेकिन इस दिन यहाँ हर घर को आप मिट्टी के दीये से ही सजा पाएंगे। इस कैरिबियाई टापू देश के पास स्थित देश गुयाना में भी आलोक के इस पर्व को बहुत भव्य तरीके से मनाया जाता है।

त्रिनिदाद और टोबैगो तथा गुयाना की तरह ही फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम, सिंगापुर, श्रीलंका, नेपाल, बर्मा, बंगलादेश, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, केन्या, तंजानिया, दक्षिण अफ्रीका, नीदरलैंड्स, कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और यहाँ तक कि पाकिस्तान में भी दीपावली की छटा देखी जा सकती है।

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नेरन्द्र मोदी को फोन कर दीपावली की बधाई दी थी। उसके बाद हमारे प्रधानमंत्री ने कहा था कि यह जानकर अच्छा लगा कि व्हाइट हाउस में भी दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। बता दें कि वर्ष 2009 में पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर ओबामा ने व्हाइट हाउस के ईस्ट रूम में दीपोत्सव का परंपरागत दीया जलाया था। अब तो आलम यह है कि अमेरिका में चल रहे वर्तमान राष्ट्पति चुनाव के दोनों उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप दीपावली के पहले से ही भारतवंशियों के बीच जाकर दीये जला रहे हैं।

आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में दीपावली के दिन सरकारी छुट्टी होती है, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन टूडो दीपावली पर आयोजित कार्यक्रम में कुर्ता-पायजामा पहनकर पंजाबी गाने पर डांस करते हैं और हिन्दुओं को दोयम दर्जा देने वाले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ तक इस दिन हिन्दुओं को संबोधित करते हैं। दक्षिण अफ्रीका के जोहांबर्ग के निकट लेनासिया और चैट्सवर्थ और डरबन के फोनेक्स में तो दीपावली बहुत ही भव्य तरीके से मनाई जाती है। इतना ही नहीं, पड़ोसी देश नेपाल में दीपावली का पर्व पांच दिनों तक मनाया जाता है और लक्ष्मीपूजा के दिन से ही नेपाल संवत् शुरू होता है।

सच तो यह है कि दीपावली का यह प्रसार अकारण नहीं है। दीपावली में छिपा संदेश है ही इतना व्यापक कि इसमें समूचे संसार की संवेदना समा जाय। तो आईये, इस बार हम बाकी दीयों के साथ-साथ एक दीया विश्वपर्व दीपावली के निमित्त अपने गौरव के लिए भी जलाएं। और हां, हर दीये से पहले एक दीया हमारे लिए शहीद हुए उड़ी के वीर जवानों के लिए जलाएं। ये जवान न हों तो कैसी होली, कैसी ईद, कैसी बैसाखी, कैसा क्रिसमस और कैसी दीपावली? शुभ दीपावली!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


दीपावली नहीं, धनतेरस है धन का पर्व

आज धनतेरस है – एक अनोखा पर्व जो न केवल दीपावली आने की पूर्व सूचना देता है बल्कि समृद्दि के लिए स्वास्थ्य का महत्व भी रेखांकित करता है। आम धारणा के अनुसार धन का पर्व दीपावली है, जो सही नहीं है। दीपावली तो धन के साथ-साथ अन्य सिद्धियों का दिन भी है। धन का दिन तो असल में धनतेरस है। साथ ही यह दिन औषधि और स्वास्थ्य के स्वामी धन्वंतरि का भी दिन है, जो इस बात का संदेश देता है कि धन का भोग करने के लिए लक्ष्मी की कृपा जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरत उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की होती है। बता दें कि आर्युवेद, जिसकी रचना ब्रह्मा ने की थी, को प्रकाश में लाने का श्रेय धन्वंतरि को ही जाता है और इसी पृष्ठभूमि में धनतेरस को ‘आर्युवेद दिवस’ मनाने का निर्णय केन्द्र की वर्तमान सरकार ने लिया है।

धनतेरस का पर्व हर वर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। दीपावली की महानिशा से दो दिन पहले इसी खास दिन यक्ष-यक्षिणियों का जागरण होता है। यक्ष-यक्षिणी इस स्थूल जगत के उन सभी चमकीले तत्वों के नियंता कहे जाते हैं, जिन्हें दुनिया ‘दौलत’, ‘सम्पत्ति’, ‘वैभव’, ‘ऐश्वर्य’ जैसे नामों से जानती है। जानना दिलचस्प होगा कि कुबेर को यक्ष और लक्ष्मी को यक्षिणी का रूप माना जाता है। कुबेर और लक्ष्मी यक्ष-यक्षिणी के रूप में हमारे जीवन की उस ऊर्जा को नियंत्रित करते हैं, जिससे हमारी जीवन-शैली निर्धारित और नियंत्रित होती है।

‘धनतेरस’ में ‘धन’ शब्द को धन-संपत्ति और धन्वंतरि दोनों से ही जोड़कर देखा जाता है। भगवान धन्वंतरि को हिन्दू धर्म में देव वैद्य का पद हासिल है। कुछ ग्रंथों में इन्हें विष्णु का अवतार भी माना गया है। मान्यता है कि समुद्र-मंथन के दौरान धन्वंतरि चांदी के कलश और शंख के साथ प्रकट हुए थे। इसी कारण धनतेरस के दिन शंख और चांदी का कोई पात्र, बर्तन या सिक्का खरीदना शुभ माना जाता है। सामर्थ्य के अनुसार कुछ लोग चांदी की जगह सोना तो कुछ लोग पीतल या स्टील की चीज खरीदते हैं, लेकिन ये रस्म लोग निभाते जरूर हैं। दीपावली के लिए इसी दिन लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा और पूजन सामग्री खरीदना भी शुभ माना गया है।

तंत्र शास्त्र में इस दिन लक्ष्मी, गणपति, विष्णु और धन्वंतरि के साथ कुबेर की साधना की जाती है। धनतेरस की रात्रि में कुबेर यंत्र, कनकधारा यंत्र, श्री यंत्र तथा लक्ष्मी स्वरूप श्री दक्षिणावर्ती शंख के पूजन को अचूक माना गया है। इस दिन अपने मस्तिष्क को स्वर्ण समझकर ध्यानस्थ होने से धन अर्जित करने की आन्तरिक क्षमता सक्रिय होती है, जो सही मायने में समृद्धि का कारक बनती है।

एक बात और, ‘धनतेरस’ में ‘धन’ से जुड़े ‘तेरस’ शब्द को लेकर एक बड़ी महत्वपूर्ण मान्यता यह है कि इस दिन खरीदे गए धन, विशेषकर सोना या चांदी, में तेरह गुना वृद्धि हो जाती है। ईश्वर करे आपके धन में भी तेरह गुना की वृद्धि हो और हर धनतेरस को हो। ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से इस दिन की ढेर सारी शुभकामनाएं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें