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अलग होकर जेडीयू और भाजपा ने क्या खोया, क्या पाया… तय करेगा चौथा चरण

बिहार चुनाव का चौथा चरण भी पूरा हुआ। इस चरण में सात जिलों की 55 सीटें दांव पर थीं। ये सात जिले हैं मुजफ्फरपुर, पूर्वी चम्पारण, पश्चिमी चरण, सीतामढ़ी, शिवहर, गोपालगंज और सीवान। इन 55 सीटों के साथ ही कुल 186 सीटों के लिए मतदान हो चुका है। पाँचवें चरण में बाकी बची 57 सीटों के लिए मतदान होना है।

चौथे चरण में मतदान का प्रतिशत 58.3 रहा। पश्चिमी चम्पारण जिले में सर्वाधिक 60.56 प्रतिशत तो सीवान में सबसे कम 54 प्रतिशत मतदान हुआ। 55 सीटों के लिए उम्मीदवारों की कुल संख्या 776 थी, जिनमें 57 महिलाएं हैं। मतदाताओं की कुल संख्या थी 1,46,93,294 और उनके लिए कुल 14,139 मतदान केन्द्र बनाए गए थे। पिछले तीन चरणों की तरह इस चरण में भी महिला मतदाताओं की लम्बी कतारें देखी गईं।

इस चरण की सबसे खास बात ये है कि 2010 में इन 55 सीटों में 50 सीटें जेडीयू-भाजपा गठबंधन के हिस्से में गई थीं। जेडीयू ने 24 और भाजपा ने 26 सीटें जीती थीं। शेष 5 सीटों में 2 राजद और 3 निर्दलीय के खाते में गई थीं। इस बार परिदृश्य एकदम बदल गया है। पिछली बार साथ रहकर जबरदस्त सफलता हासिल करने वाली जेडीयू और भाजपा इस चुनाव में आमने-सामने है।

इस बार इन 55 सीटों पर महागठबंधन की ओर से जेडीयू के 21, राजद के 26 और कांग्रेस के 8 उम्मीदवार मैदान में हैं। एनडीए की ओर से भाजपा ने 42, लोजपा ने 5 और ‘हम’ व रोलोसपा ने 4-4 उम्मीदवार उतारे हैं। इस चरण के प्रमुख उम्मीदवारों में वरिष्ठ मंत्री रमई राम (बोचहां), राजद के प्रदेश अध्यक्ष रामचंद्र पूर्वे (परिहार), भाजपा नेता सुनील पिन्टू (सीतामढ़ी) तथा ‘हम’ के महाचन्द्र प्रसाद सिंह (हथुआ) और लवली आनंद (शिवहर) शामिल हैं।

भाजपा के लिहाज से यह चरण सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। अगर वो इस चरण की सीटों पर 2010 जैसा प्रदर्शन दोहराने में सफल रही तो महागठबंधन के लिए ये खतरे की घंटी हो सकती है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भी भाजपा और एनडीए ने इन सीटों पर अच्छा प्रदर्शन किया था। गौर करने की बात है कि चौथे चरण में पिछले तीन चरणों की तुलना में 4.04 प्रतिशत मत ज्यादा पड़े। पिछले चुनावों के प्रदर्शन के आधार पर इस इजाफे को भाजपा और एनडीए अगर अपने पक्ष में कह रहे हैं तो कम से कम परिणाम आने तक इसे झुठलाना सम्भव नहीं। इतना तय है कि अलग होकर जेडीयू और भाजपा ने क्या खोया, क्या पाया… कौन कितने फायदे में रहा और किसने नुकसान उठाया… चौथा चरण इस बात की सबसे बड़ी गवाही देगा।

पुनश्च:

लोकतंत्र के प्रति आस्था और कर्तव्यबोध का अद्भुत उदाहरण देखने को मिला इस चौथे चरण में। बैकुंठपुर विधान सभा क्षेत्र के महम्मदपुर थाने के हकाम गांव में रहने वाले गफार मियां ने अपने 40 वर्षीय बेटे मोहम्मद हजरत के शव को दफनाने से पहले परिवार सहित जाकर मतदान किया। मोहम्मद हजरत की मृत्यु एक संक्रामक बीमारी से शनिवार रात को ही हो गई थी। रविवार की सुबह पड़ोसी और गांव वाले हजरत के शव को दफनाने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन मृतक के पिता ने कहा कि सभी चलकर पहले मतदान करें, उसके बाद कब्रिस्तान चलने की तैयारी करें। सबने ऐसा ही किया और मतदान के बाद मिट्टी देने की रस्म शुरू की गई। मधेपुरा ( Madhepura ) अबतक श्रद्धा और प्रेरणा से भर देने वाले गफार मियां के इस जज्बे को सलाम करता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘मंडल’ के मधेपुरा में ‘मोदी’ का मतलब

भारतीय राजनीति के ‘मंडल युग’ का जनक मधेपुरा… महागठबंधन का ‘गढ़’ माना जाने वाला मधेपुराआज साक्षी बना मोदी की झलक पाने को बेताब अपार जनसमूह का। जी हाँ, आज प्रधानमंत्री मोदी ने मधेपुरा में एक बड़ी रैली की। उनके साथ थे पूर्व केन्द्रीय मंत्री एवं भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता शाहनवाज हुसैन तथा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व ‘हम’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी। रैली भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के नए परिसर में थी जहाँ प्रधानमंत्री दिन के 1.30 बजे आए। पूरा मधेपुरा  आज मोदीमय दिखा। ये सही है कि भीड़ से वोट को नहीं आंका जा सकता लेकिन जनमानस पर उनका क्या असर है, ये बताने के लिए मधेपुरा की आज की आबोहवा काफी थी।

गुजरात का ‘शेर’ आज नीतीश-लालू-शरद के ‘गढ़’ में गरज रहा था। उन्होंने कहा कि 25 साल से यहाँ बड़े भाई और छोटे भाई की सरकार थी लेकिन वे बिहार से पलायन को नहीं रोक सके। जनता इस बार इसका हिसाब ले। मोदी ने कहा कि जब बिहार में भाजपा सरकार में साथ थी तब राज्य में 17 हजार 500 करोड़ का निवेश हुआ लेकिन भाजपा के हटते ही यह घटकर महज छह हजार करोड़ रह गया।

प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्री नीतीश को निशाने पर लेते हुए कहा कि पिछली बार उन्होंने कहा था कि अगर बिजली नहीं पहुँचाऊंगा तो वोट मांगने नहीं आऊँगा लेकिन अपना वादा पूरा किए बिना वो वोट मांगने आ गए। उन्होंने कहा कि इस बार अगर बिहार में एनडीए की सरकार आई तो उन चार हजार गाँवों में बिजली पहुँचाने का काम पूरा किया जाएगा जहाँ नीतीश सरकार बिजली नहीं पहुँचा सकी।

नरेन्द्र मोदी ने इस इलाके की समस्या को ‘पानी’ और ‘जवानी’ से जोड़ा। उन्होंने कहा कि यहाँ ‘पानी’ और ‘जवानी’ दोनों को बर्बाद किया जा रहा है। मोदी ने कहा कि बिहार में कोशी के पानी का उपयोग मछलीपालन के लिए किया जाय तो मछली का आयात कम होगा और लोगों को बड़े पैमाने पर रोजगार भी मिलेगा। बिहार में संसाधन होते हुए भी उसका उपयोग नहीं किया जा रहा है।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने खास अंदाज में “पढ़ाई, कमाई और दवाई” के लिए अपनी प्रतिबद्धता जताई और लोगों से बढ़-चढ़कर चुनाव में हिस्सा लेने को कहा। उन्होंने यह भी कहा कि बिहार के लोग 8 नवंबर को दिवाली मनाएंगे और पूरा देश 11 नवंबर को दिवाली मनाएगा।

स्पष्ट है कि 8 नवंबर को दिवाली मनाने से मोदी का मतलब एनडीए की सरकार बनने से है। मोदी के मन से बिहार में दिवाली मनती है या नहीं, ये तो आने वाला समय बताएगा लेकिन जो धरती ‘स्वभाव’ और ‘संस्कार’ से समाजवादियों की रही है, जिस इलाके में कल तक भाजपा की कोई पैठ नहीं थी, जहाँ जातिगत समीकरण भी एनडीए के लिए बहुत अनुकूल नहीं वहाँ मोदी का आना और लोगों का उनके लिए उमड़ जाना बड़ी बात है। आज की रैली से मोदी नीतीश-लालू-शरद की त्रिमूर्ति के लिए एक बड़ी चुनौती छोड़ गए हैं। ये चुनौती मधेपुरा ( Madhepura ) की चार या कोशी की तेरह सीटों से ज्यादा इस बात की है कि अब ‘मंडल’ के इलाके में भी ‘कमंडल’ अपनी मौजूदगी का एहसास कराने लगा है।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बताइए अमित शाह..! बिहार में बीजेपी हारी तो पाकिस्तान में पटाखे क्यों जलेंगे..?

क्या बीजेपी ने बिहार में हार मान ली है और वो भी दो चरण शेष रहते..? पहले एक राज्य के चुनाव के लिए मोदी के कद के प्रधानमंत्री को तमाम जिलों और केन्द्र के दर्जनों मंत्रियों को गली-मुहल्लों तक उतार देना, दूसरे इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट मीडिया का ‘अति’ आक्रामक उपयोग और तीसरे लालू और नीतीश पर जाति की राजनीति का आरोप लगाते-लगाते स्वयं उससे भी आगे निकल धर्म के नाम पर वोटों के ध्रुवीकरण की कोशिश कुछ ऐसा ही बयां करती है।

भाजपा की ‘हिन्दूवादी’ छवि कोई छिपी हुई या छिपाई जाने वाली चीज नहीं। अब तक अपनी इस छवि को ‘भुनाने’ का शायद ही कोई मौका पार्टी ने छोड़ा हो। लेकिन सभाओं और बयानों में ‘राजनीतिक समझदारी’ और ‘सामाजिक जिम्मेदारी’ बरतने में कोई कोताही नहीं बरती जाती थी। भाजपा के ‘मोदीयुग’ में भी वाजपेयी का ‘संस्कार’ बहुत हद तक बचा था। पर अब उस ‘धरोहर’ की धज्जियां उड़ रही हैं। ये काम कोई भी करे, निन्दनीय होगा लेकिन जब ये काम पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष करें तो बात निन्दा से आगे की हो जाएगी।

चौथे और पाँचवें चरण के प्रचार के क्रम में भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह कल 29 अक्टूबर को बिहार के बेतिया में थे। यहाँ एक चुनावी जनसभा को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि अगर बिहार में बीजेपी हारती है तो पटाखे पाकिस्तान में जलेंगे। शाह का कहना था कि बीजेपी के हारने पर सबसे ज्यादा खुश जेल में बंद शहाबुद्दीन होगा। चलिए मान लेते हैं कि आपराधिक छवि वाले बाहुबली नेता शहाबुद्दीन लालू की पार्टी से सांसद रह चुके हैं और इस कारण यहाँ तक जबरन उनकी बात का तुक निकाल लें तो भी इस बात का तुक भला कौन निकालेगा कि 8 नवंबर को परिणाम भले ही पटना में निकलेंगे लेकिन पटाखे पाकिस्तान में जलाए जाएंगे..?

क्या ‘पाकिस्तान’ से शाह का मतलब ‘मुसलमान’ से है..? अगर हाँ, तो क्या भाजपा के अध्यक्ष मान चुके हैं कि उनकी पार्टी को मुस्लिम मत बिल्कुल नहीं मिल रहे..? क्या ये हताशा नहीं है भाजपा की..? हाँ, इसे हताशा ही कहेंगे क्योंकि शाह का बयान जुबान फिसलने की सीमा से बहुत आगे की बात है।

सार्वजनिक मंच की एक अलग ‘गरिमा’ और ‘सीमा’ होती है और जब आप एक बड़े दल के बड़े नेता हों तो आपसे इन बातों की अतिरिक्त अपेक्षा होती है। अगर गरिमा और सीमा किसी कारण आप भूल भी रहे हों तब भी मूलभूत ‘समझदारी’ और ‘सभ्यता’ की उम्मीद तो आपसे की ही जाती है। पर ना जाने अमित शाह कैसे इस तरह की भूल कर बैठे..?

शाह उत्तर प्रदेश को दुहराने की प्रत्याशा में लम्बे समय से बिहार में कैम्प कर रहे हैं। पर अब लगता है कि उन्हें ‘दिल्ली’ की आशंका सताने लगी है। पिछले तीन चरणों में मतदान का जो प्रतिशत रहा है तथा जातियों की जिस तरह की गोलबंदी देखने को मिली है उससे भाजपा कुछ ज्यादा ही सशंकित हो गई है। भाजपा का खेल बिहार में अगर बिगड़ता है तो वो स्थानीय कारणों से कम और मोहन भागवत के आरक्षण पर दिए बयान और अब शाह के पाकिस्तान में पटाखे छूटने वाले बयान से ज्यादा बिगड़ेगा। अमित शाह इस तरह के बयानों से गुजरात के अपने ‘दागदार अतीत’ की याद बिहार को ना दिलाएं तो ही बेहतर होगा उनके लिए और उनकी पार्टी के लिए भी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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तीसरे चरण में नज़रें भाजपा के ‘हाल’ और लालू के दोनों ‘लाल’ पर

बिहार चुनाव के पाँच चरणों में सर्वाधिक ‘महत्वपूर्ण’ (और कदाचित् निर्णायक भी) तीसरा चरण कल सम्पन्न हुआ। मतदान का प्रतिशत 53.32 रहा जिससे कोई स्पष्ट संकेत या रुझान नहीं मिलता और इस तरह 8 नवंबर का ‘रहस्य’ और गहरा गया है। बहरहाल, इस चरण के ‘महत्व’ पर बात करने से पहले कुछ तथ्यों पर निगाह डाल लें।

तीसरे चरण में छह जिलों की 50 सीटों के लिए वोट डाले गए। इन छह जिलों में राजधानी पटना भी शामिल है। पटना के अलावे शेष पाँच जिले भोजपुर, बक्सर, नालंदा, सारण और वैशाली हैं। 2010 के चुनाव में इन छह जिलों में मतदान का प्रतिशत 50.08 था। पिछले दो चरणों की तरह इस चरण में भी बाजी महिला मतदाताओं के नाम रही। 52.05 प्रतिशत पुरुषों के मुकाबले लगभग 54 प्रतिशत महिलाओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इन छह जिलों में 53.62 प्रतिशत मतदान के साथ बक्सर सबसे आगे रहा, जबकि 51.82 प्रतिशत मतदान के साथ पटना सबसे पीछे।

तीसरे चरण में उम्मीदवारों की कुल संख्या 808 थी जिनमें 737 पुरुष और 71 महिला उम्मीदवार शामिल हैं। मतदाताओं की कुल संख्या एक करोड़ 45 लाख 18 हजार सात सौ पाँच और मतदान केन्द्रों की संख्या 13,648 थी। जिन 50 सीटों पर कल मतदान हुआ उनमें से 2010 में 23 सीटें जेडीयू, 19 सीटें भाजपा और 8 सीटें राजद ने जीती थीं। इस बार महागठबंधन की ओर से राजद 25, जेडीयू 18 और कांग्रेस सात सीटों पर चुनाव लड़ रही है, जबकि एनडीए की तरफ से भाजपा के 34, लोजपा के 10, हम के चार और रोसोसपा के दो उम्मीदवार मैदान में हैं।

अब बात इस पर करें कि ये चरण महत्वपूर्ण और बहुत हद तक ‘निर्णायक’ भी क्यों है। इसके कई कारण स्पष्ट तौर पर दिखते हैं। राजनीतिक विश्लेषकों व समीक्षकों की मानें तो पहले दो चरणों में एनडीए का प्रदर्शन उम्मीद के अनुरूप नहीं रहा है। अगर इस चरण में भी मतदान उसके पक्ष में नहीं हुआ तो आगे के दो चरणों में उसकी राह और कठिन हो जाएगी। खास कर पाँचवें चरण में जिसमें सीमांचल का इलाका है और मुस्लिम मतदाता बड़ी संख्या में हैं। कहने की जरूरत नहीं कि मुस्लिम मतदाताओं का स्पष्ट झुकाव महागठबंधन की ओर है।

इस चरण के महत्वपूर्ण होने का दूसरा बड़ा कारण लालू के दोनों ‘लाल’ का चुनाव मैदान में होना है। तेजप्रताप महुआ से और तेजस्वी राघोपुर से भाग्य आजमा रहे हैं। तेजप्रताप का मुकाबला हम के रवीन्द्र राय से है तो तेजस्वी के सामने पिछले चुनाव में उनकी माँ राबड़ी को हराने वाले सतीश कुमार हैं। सतीश तब जेडीयू के उम्मीदवार थे और इस बार भाजपा की ओर से चुनाव लड़ रहे हैं। ये दोनों सीटें ना केवल लालू बल्कि उनकी पार्टी के लिए भी प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है।

भाजपा के दिग्गज नेता और विधान सभा में नेता प्रतिपक्ष नंदकिशोर यादव (पटना साहिब), विधान सभा उपाध्यक्ष अमरेन्द्र प्रताप सिंह (आरा), विधान सभा में भाजपा के मुख्य सचेतक अरुण कुमार सिन्हा (कुम्हरार), भाजपा के वरिष्ठ नेता सीपी ठाकुर के सुपुत्र विवेक ठाकुर (ब्रह्मपुर) और नीतीश कुमार के मुखर समर्थक से मुखर विरोधी बने ज्ञानेन्द्र सिंह ज्ञानू (बाढ़) के भाग्य का फैसला भी इसी चरण में होना है। जेडीयू के मंत्रियों श्याम रजक (फुलवारीशरीफ) और श्रवण कुमार (नालंदा) और जेल में बंद पूर्व जदयू विधायक और इस बार निर्दलीय प्रत्याशी बाहुबली अनंत सिंह (मोकामा) का चुनाव भी इसी चरण में है।

तीसरे चरण की राजनीतिक अहमियत इस कारण भी है कि नालंदा नीतीश कुमार का गृहक्षेत्र है, सारण लालू प्रसाद यादव का और हाजीपुर रामविलास पासवान का। इस तरह इन तीनों कद्दावर नेताओं का कद भी अन्य चरणों की तुलना में इस चरण में कहीं ना कहीं दांव पर अधिक लगा हुआ है।

कल सम्पन्न हुए तीसरे चरण के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि बिहार की जनता सारे दलों को ‘भरमा’ कर रखने में पूरी तरह सफल रही है। पहले जनता नहीं जान पाती थी कि चुनाव के बाद नेता क्या करेंगे और आज कोई भी नेता यह कहने की स्थिति में नहीं है कि जनता क्या करने जा रही है। यह अपने आप में एक बड़ा परिवर्तन है। इस चरण के मतदान में 2010 की तुलना में तीन प्रतिशत का इजाफा जरूर हुआ है और इस इजाफे पर महागठबंधन और एनडीए दोनों अपनी-अपनी मुहर भी लगा रहे हैं पर सच यही है कि ‘जश्न’ मनाने की स्थिति में कोई खेमा नहीं है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू ‘शैतान’, शाह ‘नरभक्षी’, मोदी ‘ब्रह्मपिशाच’… ये किस ‘नरक’ में आ गए हम..?

बिहार चुनाव की ताजा ख़बर। प्रधानमंत्री मोदी ‘ब्रह्मपिशाच’ तो थे ही अब ‘गली के गुंडे’ भी हो गए हैं और इस उपाधि से उन्हें नवाजा ‘शैतान’ लालू की ‘बेचारी’ बेटी मीसा ने जिसे बकौल मोदी उसके पिता पिछले चुनाव में ‘सेट’ नहीं कर पाए थे। कैसा लगा पढ़कर..? हंसी आई, क्रोध हुआ, शर्मिंदगी महसूस की आपने या फिर गालियां निकलीं आपके श्रीमुख से..? चाहे जैसा लगा हो आपको, यही ‘सच’ और यही ‘हासिल’ है बिहार चुनाव का। सिर्फ बिहार को ही बदनाम क्यों करें, कमोबेश हर राज्य का और इस तरह पूरे देश का यही हाल है। ‘अपशब्दों’ के लिए ‘प्राथमिकियां’ दर्ज होना और चुनाव आयोग का ‘संज्ञान’ लेना अब आम बात हो चली है।

लालू ‘चाराचोर’, नीतीश ‘अहंकारी’, अमित शाह ‘मोटे’ और नरेन्द्र मोदी ‘जुमलेबाज’ तो थे ही लेकिन ज्यों-ज्यों चुनाव आगे बढ़ा लालू ‘शैतान’, नीतीश ‘खराब डीएनए वाले’, अमित शाह ‘नरभक्षी’ और नरेन्द्र मोदी ‘ब्रह्मपिशाच’ हो गए। हाय री राजनीति..! गिरावट की भी कोई हद होती है कि नहीं..? राजनीति में आलोचना की जगह है, व्यंग्य की जगह है, कटाक्ष की जगह है लेकिन क्या अब इन शब्दों के लिए भी जगह बनानी होगी..? स्वस्थ लोकतंत्र में विरोध तो होना ही चाहिए, थोड़ी-बहुत तल्खियां भी बर्दाश्त की जा सकती हैं लेकिन क्या इन अपशब्दों की वकालत किसी तरह भी की जा सकती है..?

यहाँ चार नेताओं को मिली ‘उपाधियों’ की ही चर्चा की गई है। इनमें दो महागठबंधन के तो शेष दो एनडीए के सबसे बड़े चेहरे हैं। इसका ये मतलब कतई नहीं कि बाकी बचे ‘बेदाग’ हैं। सच तो यह है कि हमाम में सब नंगे हैं और इस कदर नंगे हैं कि उनका बस चले तो एक-दूसरे की चमड़ियां उतारकर ओढ़ लेने से भी परहेज ना करें। बहरहाल, बिहार चुनाव में ऐसे शब्दों और उपाधियों का पूरा ‘कोश’ तैयार हो रहा है और इसमें नई इंट्री हुई है ‘गली के गुंडे’ की जिसका प्रयोग किसी और के लिए नहीं प्रधानमंत्री मोदी के लिए किया गया है और वो भी लालू की बड़ी बेटी मीसा के द्वारा।

पूरा वाक्या कुछ यों है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपनी एक चुनावी रैली में कह दिया कि लालू प्रसाद ने पिछली बार ‘बेचारी’ बेटी को ‘सेट’ करने की कोशिश की थी और अब अपने बेटों को ‘सेट’ करने की कोशिश में पूरे बिहार को ‘अपसेट’ कर रहे हैं। इस पर मीसा ने अपने फेसबुक पेज पर पूछा कि यह ‘सेट’ करने की कोशिश क्या है..? क्या एक बाप अपनी बेटी को ‘सेट’ करने की कोशिश करता है..? मीसा ने लिखा कि किस तरह की बाजारू भाषा है ये..? वह भी एक महिला के लिए..?  देश का प्रधानमंत्री होकर एक सार्वजनिक मंच से एक महिला को ‘बेचारी’ कहने पर मीसा ने सख्त आपत्ति की और कहा कि एक तरफ आप ‘बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ’ का नारा देकर स्वांग रचते हैं और दूसरी तरफ महिलाओं के लिए सरेआम अशोभनीय भाषा का इस्तेमाल करते हैं। और इस तरह मोदी को ‘गली का गुंडा’ करार देते हुए मीसा कहती हैं कि जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल प्रधानमंत्री अपने भाषणों में करते हैं वैसा कोई सभ्य व्यक्ति नहीं कर सकता।

खैर ये तो मोदी के घोर समर्थक भी मानेंगे कि चुनावी रैलियों में उनकी भाषा और शैली वो नहीं रहती जो ‘लालकिले’ या ‘सिलिकॉन वैली’ में रहती है। मीसा के लिए कहे गए शब्द भी प्रधानमंत्री की गरिमा के अनुरूप नहीं थे। दुनिया भर में उन्होंने अपनी जो छवि बनाई उसे वो बिहार में दांव पर क्यों लगा रहे हैं, ये भी समझ से परे है। पर मीसा अपने पिता द्वारा प्रधानमंत्री को ‘ब्रह्मपिशाच’ कहे जाने पर क्या बोलेंगी..? और जब उनके पिता ‘करिया कबूतर’ और ‘एक बोतल दारू’ से ‘मोदी के भूत’ को ‘झाड़’ रहे होते हैं और ‘भूत’ फिर भी ना भागे तो ‘करिया हड़िया’ में ‘सरसों’ और ‘लाल मिर्च’ जला रहे होते हैं, तब वो चुप क्यों रहती हैं..?

बिहार में चुनाव अपने चरम पर है। दो चरण हो चुके हैं और तीसरे चरण का मतदान आज हो रहा है। चौथा और पाँचवां चरण भी आ ही जाएगा… 8 नवंबर को मतगणना होगी… और फिर अगले कुछ दिनों में चाहे जिसकी भी हो, सरकार का गठन भी हो जाएगा। जीतने वाले सीना तानकर चलेंगे और हारने वाले गरदन झुकाकर। चुनाव है तो जीत-हार भी होनी ही है, सो हो जाएगी। लेकिन क्या सारी कहानी इसी जीत-हार पर आकर खत्म हो जाती है..? नहीं… बिल्कुल नहीं। सच तो ये है कि चुनाव चाहे जो जीते, ‘मनुष्यता’ की लड़ाई दोनों ही पक्ष – महागठबंधन और एनडीए (शेष दल भी अपवाद नहीं हैं) – हार चुके हैं। मनुष्यता की लड़ाई मर्यादा और संस्कार के ‘शस्त्रों’ से लड़ी जाती है पर बिहार चुनाव में सभी दलों के नेता इन शस्त्रों का ‘संधान’ भूल चुके हैं। वे सचमुच भूल बैठे हैं कि मर्यादा खोकर, संस्कार लुटाकर आपने ‘सिंहासन’ क्या पूरा संसार भी पा लिया तो भी ‘कंगाल’ ही कहलाएंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अब ‘ज्ञान’ मिला नागमणि को कि भाजपा के ‘एजेंट’ हैं मुलायम-पप्पू..!

राजनीति में और वो भी आज की राजनीति में पाला बदलना कोई आश्चर्य की बात नहीं। ‘मौसम’ और ‘अवसर’ के हिसाब से प्रतिबद्धता ‘बदल लेना’ और यहाँ तक कि ‘बदलते ही रहना’ भी किसी को अब चौंकाता नहीं। लेकिन पाँच में से दो चरणों के चुनाव के बाद अगर आपको ये ‘ज्ञान’ मिले कि कल तक आप जिनके साथ खड़े थे उनके कारण सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता ‘खतरे’ में थी और जिन्हें आप कोसते नहीं थक रहे थे दरअसल वही सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता नाम की दोनों ‘चिड़िया’ को तथाकथित ‘खतरे’ से बाहर निकाल सकते हैं, तो इसे क्या कहेंगे आप..? जाहिर तौर पर राजनीतिक अवसरवादिता की ये पराकाष्ठा है और पूर्व केन्द्रीय मंत्री तथा वर्तमान में समरस समाज पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष नागमणि बिहार में सम्भवत: इसके सबसे बड़े उदाहरण हैं। लालू प्रसाद यादव से ‘मौसम वैज्ञानिक’ का खिताब पा चुके रामविलास पासवान से भी बड़े। अब तक कोई ऐसी पार्टी नहीं है जिसमें नागमणि जाकर ना हो आए हों।

नागमणि ने कल 24 अक्टूबर को प्रेस कांफ्रेंस कर बिहार चुनाव के अगले तीन चरणों में जदयू-राजद-कांग्रेस के महागठबंधन को समर्थन देने की घोषणा की। उन्होंने ‘संकेत’ में कुछ कहने की जगह सीधे तौर पर आरोप लगाया कि सपा अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव और जन अधिकार पार्टी (लोकतांत्रिक) के संरक्षक पप्पू यादव भाजपा के ‘एजेंट’ हैं। उन्होंने कहा कि दोनों दल भाजपा के पक्ष में चुनाव प्रचार कर रहे हैं। दोनों दलों ने ज्यादातर टिकट यादव और मुसलमानों को दिया है ताकि उनके मतों का बिखराव हो और भाजपा को इसका लाभ मिले। बकौल नागमणि भाजपा के कारण बिहार में सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता खतरे में पड़ गई है, ऐसे में उन्होंने महागठबंधन का साथ देने का निर्णय लिया है।

नागमणि ने यह भी कहा कि पिछड़ा, अतिपिछड़ा, दलित एवं अल्पसंख्यकों के हक-हुकूक के लिए नीतीश कुमार और लालू प्रसाद की जोड़ी ने शहीद जगदेव की नीति और सिद्धांतों पर चलने का वादा किया है। लेकिन नागमणि ये नहीं कह पाए कि ये ‘वादा’ वो नीतीश-लालू से चुनाव शुरू होने के पूर्व क्यों नहीं ले पाए। खैर, जो ‘डील’ तब नहीं हुई, वो अब हो गई। वैसे बता दें कि नागमणि शहीद जगदेव के पुत्र हैं और अब तक के राजनीतिक करियर में उन्होंने जो भी हासिल किया है वो इसी कारण। 2005 में नीतीश कुमार की पहली सरकार में इनकी पत्नी मंत्री भी रह चुकी हैं।

गौरतलब है कि नागमणि से पहले एनसीपी के महासचिव तारिक अनवर ने तीसरे मोर्चे से अलग होने की घोषणा की थी। तारिक अनवर तीसरे मोर्चे की ओर से मुख्यमंत्री पद का चेहरा थे लेकिन मुलायम ने बिहार आकर भाजपा के पक्ष में लहर होने की बात कह दी और ऐसे में तारिक के लिए मोर्चे से अलग होने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचा था।

पहले तारिक अनवर (एनसीपी) और अब नागमणि (समरस समाज पार्टी) के अलग होने के बाद जो चार पार्टियां तीसरे मोर्चे में रह गई हैं, वो हैं मुलायम की समाजवादी पार्टी, पप्पू यादव की जनअधिकार पार्टी, देवेन्द्र यादव की समाजवादी जनता पार्टी और पीए संगमा की नेशनल पीपुल्स पार्टी। इसमें कोई दो राय नहीं कि मुलायम की अगुआई वाले इस तीसरे मोर्चे में शामिल पार्टियों की ‘तैयारी’ और ‘तालमेल’ की बात अब हास्यास्पद हो चली है।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘शत्रु’ का कहा ‘सच’ है या ‘शत्रुता’..?

बिहार में दो चरण के मतदान के बाद क्या सचमुच भाजपा नेताओं के चेहरे पर हवाईयां उड़ रही हैं..? पहले और दूसरे चरण की वोटिंग के बाद कोई ‘स्पष्ट रुझान’ ना देख क्या भाजपा के तमाम रणनीतिकारों को ‘दिल्ली’ जैसी कोई सम्भावना दिखने लगी है..? क्या उम्मीद के विपरीत परिणाम की आशंका से प्रधानमंत्री मोदी की बिहार की कई प्रस्तावित रैलियां रद्द की गई हैं..? इन सारे सवालों के जवाब तो खैर समय आने पर मिलेंगे लेकिन भाजपा के अपने ही ‘घर’ के भीतर से जो बयान सामने आया है वो ‘समय’ से पहले ‘समय’ को आमंत्रित करने जैसा है।

भाजपा के घर के भीतर से ये बयान बीच चुनाव में ‘शत्रु’ के अलावे कौन दे सकता है भला। जी हाँ, ‘शत्रु’ यानि शत्रुघन सिन्हा। बीते 17 अक्टूबर को चैनल न्यूज़ 18 के कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि “बिहार में पहले दो चरण के मतदान के बाद प्रदेश बीजेपी नेताओं के चेहरे की हवाईयां उड़ी हुई हैं।” उन्होंने सवाल उठाया कि अन्तिम समय में प्रधानमंत्री की जनसभाओं की संख्या कम करने से क्या नकारात्मक संदेश नहीं जा रहा है..? ‘शत्रु’ ने बिना रुके यह भी कहा कि भाजपा के नेता “हम तो डूबे सनम, तुमको भी ले डूबेंगे” वाली कहावत चरितार्थ कर रहे हैं।

पहले सिनेमा, फिर राजनीति में अलग पहचान रखने वाले और अब अलग-थलग पड़ गए भाजपा सांसद शत्रुघन सिन्हा की नाराज़गी कोई नई बात नहीं। अपनी पार्टी के निर्णयों और नेताओं को लेकर आए दिन अपने बयानों से वो पार्टी को असहज स्थितियों में डालते रहे हैं। लेकिन इस बार उन्होंने जो कहा है और वो भी बिहार के बीच चुनाव में, भाजपा को उससे बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है।

बहरहाल, शत्रुघन सिन्हा ने क्या कहा उसे भूल भी जाएं तो भी इस ‘थ्योरी’ को सिरे से नकारना मुश्किल है कि अगर ‘धुआँ’ है तो कम या ज्यादा कहीं ‘आग’ भी होगी ही। और फिर ‘शत्रु’ की बात की पुष्टि करते दिख रहे कुछ घटनाक्रम भी हैं जिन पर निगाह डालनी होगी। सबसे पहले तो ये कि ‘द वीक’ की ख़बर के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बिहार में प्रस्तावित रैलियों मे से छह रैलियाँ रद्द कर दी गई हैं। यही नहीं, प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के बिहार में लगे बड़े-बड़े पोस्टरों को उतारा जा रहा है। माना जा रहा है कि ऐसा उम्मीद के विपरीत नतीजे आने की स्थिति में बड़े नेताओं को ‘बचाने’ के लिए किया जा रहा है। मोदी और शाह की जगह सुशील कुमार मोदी, नंदकिशोर यादव, मंगल पांडेय, सीपी ठाकुर, हुकुमदेव नारायण यादव, अश्विनी चौबे जैसे स्थानीय नेताओं के पोस्टर लगाए जा रहे हैं। और तो और पार्टी ने अपना चुनावी नारा तक बदल दिया है। पहसे नारा था “अबकी बार, मोदी सरकार”, फिर इसे बदलकर किया गया “बदलिए सरकार, बदलिए बिहार” और अब कहा जा रहा है “विकास की होगी तेज रफ्तार, जब केन्द्र-राज्य में एक सरकार।”

हालांकि चुनावी मामलों के कई जानकार इसे भाजपा की सोची-समझी रणनीति बता रहे हैं। दूसरे चरण के मतदान के ठीक पहले भाजपा ने एक नए तरीके का विज्ञापन दिया जिसमें किसी नेता का फोटो नहीं, सिर्फ 11 वादे थे और शीर्षक था “भाजपा का साथ, सबका विकास।”  इसके अलावे एक और पोस्टर है जिस पर एक ओर रामविलास-मांझी-कुशवाहा और दूसरी ओर सुशील कुमार मोदी-नंदकिशोर यादव-मंगल पांडेय की तस्वीरें हैं। कहा जा सकता है कि भाजपा प्रचार में अपने केन्द्रीय और स्थानीय नेताओं के बीच ‘संतुलन’ बनाए रखने के लिए ऐसा कर रही है। जहाँ तक रैलियों की बात है, तो कुछ रैलियां अगर रद्द भी कर दी गई हों, फिर भी अभी प्रधानमंत्री की लगभग 40 सभाएं होनी हैं।

राजनीति का तकाजा है कि शत्रुघन के बयान की व्याख्या भाजपा के विरोधी अपनी तरह से करेंगे और भाजपा उसका जवाब अपने तरीके से देगी। लेकिन ‘शत्रु’ ने जो कहा वो ‘सच’ था या ‘शत्रुता’ थी उनकी, ये देखने की बात होगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार चुनाव का दूसरा चरण : भय पर उत्साह की जीत

55 प्रतिशत मतदान के साथ बिहार चुनाव का दूसरा चरण भी पूरा हुआ। छह जिलों – रोहतास, जहानाबाद, कैमूर, अरवल, औरंगाबाद और गया – की जिन 32 सीटों के लिए कल मतदान हुआ उनमें 23 सीटें नक्सल प्रभावित थीं। इसके बावजूद मतदाताओं के उत्साह में कोई कमी नहीं दिखी। लोकतंत्र के पर्व पर कहीं भी भय हावी नहीं हुआ। महिला मतदाताओं ने इस चरण में भी बढ़-चढ़कर अपनी उपस्थिति दर्ज कराई। 2010 में इन्हीं सीटों पर 52 प्रतिशत मतदान हुआ था। इस बार इसमें 3 प्रतिशत की बढ़ोतरी स्वागत योग्य है।

वोटों के प्रतिशत की बात करें तो कैमूर में सबसे ज्यादा 57.86 प्रतिशत और अरवल में सबसे कम 52 प्रतिशत मत पड़े। वहीं रोहतास में 54.66 प्रतिशत, जहानाबाद में 56.49 प्रतिशत, औरंगाबाद में 52.50 प्रतिशत और गया में 55.54 प्रतिशत मतदान दर्ज किया गया।

दूसरे चरण में कुल 456 उम्मीदवार चुनाव मैदान में थे। इनमें 32 महिलाएं शामिल हैं। इस चरण में 86,13,870 मतदाताओं के लिए 9,119 मतदान केन्द्र बनाए गए थे और सुरक्षा की जबरदस्त व्यवस्था की गई थी। शान्तिपूर्ण मतदान सुनिश्चित करने के लिए अर्द्धसैनिक बलों और राज्य पुलिस की कुल 993 कम्पनियां तैनात थीं।

इस चरण के प्रमुख उम्मीदवारों में पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी (इमामगंज और मखदुमपुर), विधान सभा अध्यक्ष उदय नारायण चौधरी (इमामगंज) और भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद के तीन सम्भावित उम्मीदवार – पूर्व मंत्री और छह बार विधायक रहे प्रेम कुमार (गया), पूर्व राष्ट्रीय सचिव रामेश्वर चौरसिया (नोखा) और हाल ही में चर्चा में आए और झारखंड में संघ का चेहरा रहे राजेन्द्र सिंह (दिनारा) – शामिल हैं। भाजपा की राज्य इकाई के पूर्व प्रमुख गोपाल नारायण सिंह (नवीनगर), नीतीश सरकार के सहकारिता मंत्री जय कुमार सिंह (दिनारा), पंचायती राज मंत्री विनोद यादव (शेरघाटी) और मांझी के बेटे संतोष कुमार सुमन (कुटुम्बा) के भविष्य का फैसला भी इसी चरण में होना है। नीतीश सरकार में स्वास्थ्य मंत्री रहे रामधनी सिंह (करगहर) भी इसी चरण में चुनाव मैदान में हैं। बता दें कि जेडीयू से टिकट कटने पर इस बार वो सपा की ओर से चुनाव लड़ रहे हैं।

हालांकि सभी 32 सीटों पर कांटे का मुकाबला देखने को मिल रहा है लेकिन जिस सीट पर सबसे ज्यादा निगाहें लगी हैं वो है ‘सुरक्षित’ सीट इमामगंज। यहाँ दो दिग्गज आमने-सामने हैं। इस सीट के लिए हम के नेता जीतन राम मांझी का मुकाबला जेडीयू के वरिष्ठ नेता उदय नारायण चौधरी से है। चौधरी इस सीट को पाँच बार जीत चुके हैं। दोनों उम्मीदवारों के कद और ‘सांकेतिक महत्व’ को देखते हुए एनडीए और महागठबंधन दोनों के लिए ये सीट प्रतिष्ठा का प्रश्न बन गई है। हालांकि मांझी जहानाबाद की मखदुमपुर सीट से भी अपनी किस्मत आजमा रहे हैं।

महागठबंधन के लिए इस चरण में बहुत कुछ दांव पर लगा है क्योंकि पिछले चुनाव में 32 में से 19 सीटें जेडीयू ने जीती थीं। तब उसकी सहयोगी रही भाजपा के खाते में 10 सीटें गई थीं, जबकि दो सीटें राजद और एक सीट निर्दलीय के हिस्से में गई थी। इस बार महागठबंधन की ओर से जेडीयू और राजद ने 13-13 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं। शेष 6 सीटों पर कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। वहीं एनडीए की ओर से भाजपा के 16, हम के 7, रालोसपा के 6 और लोजपा के तीन उम्मीदवार चुनाव मैदान में हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार चुनाव के पहले चरण में 57 प्रतिशत मतदान : कौन खुश, कौन परेशान..?

बिहार में पहले चरण का चुनाव सम्पन्न हुआ। 10 जिलों की 49 सीटों पर कल हुए मतदान में 57 प्रतिशत वोट डाले गए। 2010 की तुलना में ये 6 प्रतिशत ज्यादा है। सबसे ज्यादा मतदान खगड़िया में 61 प्रतिशत और सबसे कम नवादा में 53 प्रतिशत रहा। वोट के मामले में महिलाएं पुरुषों से आगे रहीं। पुरुषों के 54.5 प्रतिशत मतदान के मुकाबले महिलाओं के मतदान का प्रतिशत 59.5 रहा।

सभी 49 सीटों पर महागठबंधन और एनडीए के बीच सीधा मुकाबला है। महागठबंधन की बात करें तो इनमें से जेडीयू 24, राजद 17 और कांग्रेस 8 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। एनडीए की ओर से भाजपा के 27, लोजपा के 13, रालोसपा के 6 और हम के 3 उम्मीदवार मैदान में हैं।

पिछले चुनाव की तुलना में मतदान में हुए 6 प्रतिशत इजाफे को एनडीए ‘परिवर्तन की बयार’ कह रहा है तो महागठबंधन इसे नीतीश का ‘मेहनताना’ बता रहा है। दोनों दावों में कौन सही है, ये तो खैर आने वाला वक्त बताएगा लेकिन वोटों में ऐसा इजाफा भी नहीं हुआ कि उसे ‘एंटी इन्कम्बेंसी’ कह दिया जाय। खास तौर पर तब जबकि मुकाबला सीधा हो और थोड़ा भी ‘त्रिकोण’ बनने की स्थिति में पलड़ा किसी भी तरफ झुक जाने की गुंजाइश बन रही हो। हाँ, अगले चरणों में मतदान प्रतिशत और बढ़ता है तो उसे महागठबंधन के लिए खतरे की घंटी जरूर मान सकते हैं क्योंकि वर्तमान ‘समीकरण’ को देखते हुए ऐसा होना ‘एंटी इन्कम्बेंसी’ या ‘मोदी फैक्टर’ का असर माना जाएगा। कुल मिलाकर कल के आंकड़ों से ना तो एनडीए पूरी तरह ‘आश्वस्त’ हो सकता है, ना ही महागठबंधन के लिए ‘हताश’ हो जाने की स्थिति है।

बहरहाल, कल जिन 10 जिलों में चुनाव हुए, वे हैं समस्तीपुर, बेगुसराय, खगड़िया, भागलपुर, बांका, मुंगेर, लखीसराय, शेखपुरा, नवादा और जमुई। इन 10 जिलों की 49 सीटों के लिए कुल 583 उम्मीदवार मैदान में थे जिनमें 54 महिला उम्मीदवार भी शामिल हैं। इस चरण में मतदान केन्द्रों की कुल संख्या 13 हजार 212 और मतदाताओं की कुल संख्या एक करोड़ 35 लाख 72 हजार 339 थी।

पहले दौर में जिन उम्मीदवारों की किस्मत का फैसला होना है उनमें समस्तीपुर जिले की सरायरंजन सीट से चुनाव लड़ रहे जेडीयू विधायक दल के नेता और जल संसाधन मंत्री विजय चौधरी प्रमुख हैं। उनका मुकाबला भाजपा के रंजीत निर्गुणी से है। जहाँ विजय चौधरी की गिनती राज्य के बड़े नेताओं में होती है वहीं निर्गुणी अभी जिला परिषद् के सदस्य हैं केवल। इस दौर के एक अन्य प्रमुख उम्मीदवार हम के प्रदेश अध्यक्ष शकुनी चौधरी हैं जो तारापुर से चुनाव लड़ रहे हैं। शकुनी का मुकाबला जेडीयू के मेवालाल चौधरी से है जो कि बिहार कृषि विश्वविद्यालय के वीसी रह चुके हैं।

कहलगांव से कांग्रेस विधायक दल के नेता सदानंद सिंह और अलौली से लोजपा के प्रदेश अध्यक्ष पशुपति कुमार पारस भी इसी चरण में चुनाव मैदान में हैं। सदानंद सिंह का मुकाबला लोजपा के नीरज मंडल से है और पारस का मुकाबला राजद के चंदन राम से। ये दोनों अपनी-अपनी पार्टी के कद्दावर नेता हैं और इनकी जीत-हार से क्रमश: कांग्रेस और लोजपा की साख पर असर पड़ना तय है।

पहले दौर के अन्य महत्वपूर्ण उम्मीदवारों में नीतीश सरकार में मंत्री रहीं और इस बार भाजपा से किस्मत आजमा रहीं रेणु कुशवाहा (समस्तीपुर), जेडीयू सरकार के मंत्री दामोदर राउत (झाझा), युवा राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष आलोक मेहता (उजियारपुर) और राजद सांसद जय प्रकाश यादव के भाई विजय प्रकाश (जमुई) शामिल हैं।

राज्य के तीन नेताओं की अगली पीढ़ी की किस्मत भी कल इवीएम में बंद हो गई। भागलपुर से सांसद अश्विनी चौबे के बेटे अर्जित शाश्वत (भाजपा), जेडीयू के पूर्व मंत्री और वर्तमान में हम के नेता नरेन्द्र सिंह के बेटे अजय प्रताप (भाजपा) और कल्याणपुर से लोजपा सांसद रामचन्द्र पासवान के बेटे प्रिंस राज (लोजपा) चुनाव मैदान में हैं। अब इन पिता-पुत्रों की धड़कनें 8 नवंबर तक तेज रहेंगी।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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राजनीति का ‘मुखौटा युग’ और बिहार चुनाव

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी / जिसको भी देखना हो कई बार देखना – निदा फ़ाज़ली ने ये पंक्तियां आज के आदमी के लिए कही हैं पर ये आज के समाज और पूरे समय के लिए भी उतनी ही मौजू हैं और सबसे अधिक मौजू हैं आज की राजनीति के लिए। आज राजनीति ऐसी हो चुकी है कि आप जो चेहरा लेकर सुबह निकलते हैं, शाम उसी चेहरे के साथ वापस नहीं आते। आपके कितने चेहरे हैं और कितने हो सकते हैं ये स्वयं आप भी नहीं जान रहे होते। ये स्थिति सचमुच बहुत खतरनाक है। आज हम मुखौटों के युग में रह रहे हैं और मुखौटे ही हमारा चेहरा हैं। बस जरूरत के अनुसार आप अपना मुखौटा बदलते रहिए, गिनने की क्या जरूरत है कि आपके भीतर आदमी दस-बीस हैं या उससे भी ज्यादा।

बहरहाल, मुद्दे पर आते हैं और बिहार चलते हैं जहाँ ‘मुखौटों’ के लिए सबसे माकूल मौसम चल रहा है अभी। कहने की जरूरत नहीं कि मुखौटों की फसल चुनाव के मौसम में लहलहाने लगती है। क्या पार्टी, क्या नेता, क्या कार्यकर्ता सभी ताबड़तोड़ मुखौटा उपजाते दिख जाएंगे आपको। पर मजे की बात तो ये है कि मुखौटों की भीड़ में सबसे बड़ा मुखौटा ये होता है कि मैं तो बिना मुखौटे के खड़ा हूँ, आप तो बस सामनेवाले को पकड़िए जिसने फलां मुखौटा पहना हुआ है।

अगर कहा जाय कि बिहार में असली लड़ाई ‘मुखौटे’ को लेकर है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इधर महागठबंधन शोर मचा रहा है कि भाजपा पार्टी नहीं, आरएसएस का मुखौटा है केवल तो उधर एनडीए चिल्ला-चिल्ला कर बोल रहा है कि नीतीश तो मुखौटा हैं केवल, पीछे लालू का जंगलराज पार्ट-2 है। अब ये जनता पर है कि वो किसके मुखौटे को उतारेगी। जिसका मुखौटा उतरेगा वो मैदान से बाहर।

लालू लम्बे समय से भाजपा पर संघ का मुखौटा होने का आरोप लगाते रहे हैं। और अब भाजपा से रिश्ता टूटने के बाद नीतीश भी उनके सुर में सुर मिलाने लगे हैं। संघप्रमुख मोहन भागवत ने बीच चुनाव में आरक्षण की ‘समीक्षा’ की बात कहकर इन दोनों को और ताल ठोकने का मौका दे दिया। अब दोनों ललकार कर कह रहे हैं कि हिम्मत है तो आरक्षण खत्म करके दिखाएं। वे लोगों को समझा रहे हैं कि भाजपा आरएसएस का राजनीतिक संगठन है, जो आरएसएस का विचार है वही भाजपा का विचार है। भाजपा अगर बिहार में सत्ता में आई तो आरक्षण खत्म कर देगी। शुरू में भाजपा इस मुद्दे पर बैकफुट पर जाते दिखी लेकिन जल्द ही उसके सारे नेता ये विश्वास दिलाने में जुट गए कि भाजपा भी आरक्षण का समर्थन करती है और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा। भाजपा ने एक तरफ ‘डैमेज कंट्रोल’ तो दूसरी तरफ हमला तेज करने की नीति बनाई। अमित शाह गरजकर कहने लगे कि नीतीश के मुखौटे के पीछे लालू का ‘जंगलराज’ खड़ा है। नीतीश विकास की बात कर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। बोलते-बोलते वो यहाँ तक बोल गए कि अब नीतीश के लिए बिहार में कोई जगह नहीं है। साथ में ये भी कि 8 नवंबर यानि मतगणना के दिन वो अपना इस्तीफा तैयार रखें। अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के नक्शेकदम पर सुशील मोदी समेत बिहार के बाकी नेता भी अपने-अपने तरीके से मुखौटे की बात दोहराते हैं। और इस तरह, ‘मंच’ हो कोई भी, दोनों गठबंधन बस ‘मुखौटे’ का गीत गाते हैं।

कहने की जरूरत नहीं कि मुखौटे की माया बहुत बड़ी है। इस माया से सर्वथा मुक्त होना सम्भव भी नहीं। चुनाव में चाहे जो जीते, राज तो कोई ‘मुखौटा’ ही करेगा। मुखौटे का ही ‘राज’ और मुखौटे का ही ‘धर्म’। (पत्रकार से पॉलिटिशियन बने आशुतोष ने अपनी किताब का नाम ‘मुखौटे का राजधर्म’ बहुत सोचकर रखा होगा..!) लेकिन अपने-अपने मुखौटे पर इतराते नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकबारगी ये भी सोच लेना चाहिए कि जिस जनता के बीच वो मुखौटा पहने घूम रहे हैं वो भी मुखौटे में हो सकती है और जिस दिन जनता मुखौटा पहन लेगी वो कहीं के नहीं रहेंगे। फिर तो करोड़ों मुखौटे मिलकर उनके चेहरे पर एक पर एक चढ़े मुखौटों को उतारेंगे जैसे प्याज को उघेरते हैं परत-दर-परत।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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