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वैंकेया नायडू होंगे देश के नए उपराष्ट्रपति

भाजपा के वरिष्ठ नेता और एनडीए उम्मीदवार वैंकेया नायडू भारत के नए उपराष्ट्रपति होंगे। उपराष्ट्रपति पद के लिए शनिवार को हुए चुनाव में उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के पोते और 18 विपक्षी दलों के संयुक्त उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी को 272 वोटों से हराया। उन्हें कुल 516 वोट मिले, जबकि गोपाल कृष्ण गांधी 244 वोट ही हासिल कर पाए। इसके साथ ही देश के तीनों बड़े संवैधानिक पदों – राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति और प्रधानमंत्री – पर भाजपा काबिज हो गई। महज 37 साल पहले 1980 में अस्तित्व में आने वाली भाजपा के लिए ये सचमुच बड़ी उपलब्धि है।

बता दें कि उपराष्ट्रपति चुनाव में कुल 785 सांसदों को वोट डालना था, लेकिन अलग-अलग कारणों से 14 सांसदों ने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं किया और 771 सांसदों ने ही वोट डाला। वोटिंग सुबह 10 बजे शुरू हुई और शाम 5 बजे तक चली। वोटों की गिनती शाम 6 बजे शुरू हुई और 7 बजते-बजते घोषणा हो गई कि देश के दूसरे सर्वोच्च पद पर पहुंचने वाले 13वें शख्स वैंकेया नायडू हैं।

घोषणा के साथ ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समेत तमाम बड़े नेताओं ने वैंकेया को बधाई दी। पराजित उम्मीदवार गोपाल कृष्ण गांधी ने भी विजयी उम्मीदवार को शुभकामनाएं दीं और अपने प्रदर्शन पर ‘संतोष’ जताते हुए सभी वोट देने वालों को धन्यवाद दिया। गौरतलब है कि वैंकेया नायडू उपराष्ट्रपति बनने वाले आरएसएस पृष्ठभूमि के दूसरे नेता हैं। इससे पहले भाजपा के भैरों सिंह शेखावत 2002 में इस पद के लिए चुने गए थे।

नवनिर्वाचित उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू ने परिणाम घोषित होने के बाद कहा कि मैं कृतार्थ हूं। मैं प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सभी पार्टी नेताओं का समर्थन देने के लिए आभारी हूं। उन्होंने आगे कहा कि मैं उपराष्ट्रपति संस्था का उपयोग राष्ट्रपति के हाथ मजबूत बनाने के लिए करूंगा और ऊपरी सदन की मर्यादा को कायम रखूंगा। साधारण किसान पृष्ठभूमि से आने वाले वैंकेया नायडू ने यह भी कहा कि मैंने इसकी कल्पना नहीं की थी कि मैं यहां पहुंच सकूंगा।

चलते-चलते बता दें कि 68 वर्षीय वैंकेया के पास संसद में 25 वर्षों का अनुभव है, जबकि उनका पूरा राजनीतिक अनुभव लगभग 45 वर्षों का है। ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से उन्हें हार्दिक मंगलकामनाएं!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या है शरद का सस्पेंस ?

शरद यादव का अगला कदम क्या होगा? वे अंतत: नीतीश के निर्णय का समर्थन करेंगे या अपनी अलग राह चुनेंगे? अलग राह चुनने की स्थिति में वे अपनी नई पार्टी बनाएंगे या किसी और पार्टी का दामन थाम लेंगे? देश और विशेषकर बिहार की राजनीति में उनके साथ या बगावत का क्या और कितना असर होगा? ऐसे जाने कितने ही सवाल हवा में हैं जिनका फिलहाल एक निश्चित जवाब नहीं दिया जा सकता।

बिहार का सत्ता समीकरण बदलने के बाद 2-3 दिनों तक शरद यादव ने चुप्पी साधे रखी। इस दौरान कभी राहुल गांधी तो कभी अरुण जेटली, कभी सीताराम येचुरी तो कभी डी राजा, कभी लालू प्रसाद यादव तो कभी अली अनवर से उनकी बात या मुलाकात की ख़बरें आती रहीं। इधर दो दिनों से वे मीडिया से मुखातिब हो रहे हैं। तेवर हालांकि बगावती हैं, लेकिन अभी बोल रहे हैं संभलकर। संसद में फसल बीमा योजना को लेकर तो ट्वीटर पर कालाधन के मुद्दे पर उन्होंने केन्द्र सरकार की खिंचाई भी की लेकिन मर्यादित तरीके से।

आखिर शरद चाह क्या रहे हैं? मीडिया और उनसे जुड़े लोग उन्हें ‘दुखी’, ‘नाराज’, ‘आश्चर्यचकित’ बता रहे हैं, लेकिन उनका कोई स्पष्ट निर्णय या बयान सामने नहीं आ रहा। मधेपुरा, जहां पिछले 26 सालों से वे संसदीय राजनीति कर रहे हैं, में उनके करीबी विजय कुमार वर्मा, पूर्व विधानपार्षद बयान देते हैं कि शरद यादव महागठबंधन में रहकर उसे मजबूत करेंगे, तो दिल्ली में उनके अत्यंत करीबी केसी त्यागी, जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव 19 अगस्त को पटना में होने वाली राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उनके शामिल होने की बात कह रहे हैं।

इधर मीडिया के कुछ लोग उनमें यूपीए की अगुआई करने और भाजपाविरोधी खेमे की ‘धुरी’ बनने की संभावना  देखने लगे हैं। लेकिन क्या ऐसा संभव है? दूसरी ओर बदले हालात में क्या नीतीश, जेडीयू और एनडीए के लिए उनकी इतनी ‘प्रासंगिकता’ बची है कि उन्हें केन्द्र में मंत्रीपद देकर ‘संतुष्ट’ किया जा सके? यहां उल्लेखनीय है कि 2019 को लेकर नीतीश ने कल कहा था कि मोदी के मुकाबले कोई है ही नहीं। अगले लोकसभा चुनाव में मोदी ही प्रधानमंत्री बनेंगे। इस पर शरद यादव ने आज यह तो कहा कि 2019 में किसी के हारने-जीतने का सवाल अभी दूर है, लेकिन नीतीश या मोदी को ‘आंख’ नही दिखाई।

सौ बात की एक बात यह कि राजनीति ‘गिव एंड टेक’ का खेल है। शरद यादव के अनुभव, वरिष्ठता और उनकी राष्ट्रीय पहचान पर उनके विरोधी को भी संदेह नहीं हो सकता लेकिन इससे भी कोई इनकार नहीं कर सकता कि इतने लंबे राजनीतिक करियर में उनकी अपनी कोई ‘राजनीतिक जमीन’ नहीं बन पाई। मूल जनता दल से लेकर अब तक अलग-अलग समय पर और अलग-अलग पार्टियों में उनका ‘सांकेतिक’ महत्व जो भी रहा हो, उनमें वोट ट्रांसफर करने की क्षमता कतई नहीं। हां, ‘टेबल पॉलिटिक्स’ के महारथी वे जरूर हैं और मुद्दों की भी अच्छी समझ रखते हैं। अपनी इन खूबियों के बल पर अगले कुछ दिनों में वे क्या निर्णय लेते हैं, इस पर सबकी निगाहें लगी रहेंगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश: नई टीम, नई चुनौतियां

नीतीश की नई टीम के शपथ-ग्रहण के साथ बिहार में चल रही राजनीतिक अनिश्चितता और नाटकीय घटना-क्रम का पहला दौर पूरा हो गया दिखता है। पॉलिटिकल ड्रामा के दूसरे चरण की बात करें तो वह ‘विश्वासघात’ का आरोप लगा रही आरजेडी की रणनीति, मंत्रिमंडल में हम और रालोसपा को जगह न मिल पाने के कारण जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा की नाराजगी और नीतीश द्वारा ‘विश्वास’ में न लिए जाने के कारण शरद यादव की चुप्पी पर निर्भर कर रहा है।

बहरहाल, नीतीश की नई टीम में उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी के अतिरिक्त कुल 27 मंत्रियों को जगह मिली है, जिनमें कोशी कमिश्नरी के तीन चेहरे – बिजेन्द्र प्रसाद यादव (सुपौल), दिनेश चन्द्र यादव (सिमरी बख्तियारपुर) और रमेश ऋषिदेव (सिंहेश्वर) – शामिल हैं। ये तीनों मंत्री जेडीयू कोटे से हैं, जबकि इस इलाके से भाजपा के एकमात्र विधायक नीरज कुमार बबलू (छातापुर) की दावेदारी को नज़रअंदाज कर दिया गया। कल शपथ लेने वाले 27 मंत्रियों में 14 जेडीयू के, 12 भाजपा के और 1 लोजपा के हैं। गौरतलब है कि लोजपा से शपथ लेने वाले पशुपति कुमार पारस फिलहाल विधायक नहीं हैं, लेकिन रामविलास पासवान उनके लिए जगह बनवाने में सफल रहे, जबकि मांझी और कुशवाहा की अपनी-अपनी पार्टी के लिए यह इच्छा पूरी नहीं हो पाई।

बता दें कि मधेपुरा जिला से नीतीश मंत्रिमंडल में जगह पाने वाले रमेश ऋषिदेव पहली बार मंत्री बने हैं। जेडीयू से लगातार तीसरी बार विधायक ऋषिदेव वर्तमान में विधानसभा की अनुसूचित जाति-जनजाति समिति के सभापति थे। अब वे इसी विभाग के मंत्री होंगे। मंत्रिमंडल में सहरसा का प्रतिनिधित्व करने वाले दिनेश चन्द्र यादव दूसरी बार मंत्री बने हैं। इससे पूर्व वे 2005-2010 के बीच नीतीश मंत्रिमंडल के ही सदस्य रहे थे। उन्हें लघु सिंचाई एवं आपदा प्रबंधन की जिम्मेदारी मिली है। महागठबंधन सरकार में मधेपुरा के प्रो. चन्द्रशेखर (आरजेडी) आपदा प्रबंधन मंत्री थे। लगातार 27 वर्षों से सुपौल से चुनाव जीत रहे और तब से लगभग हर सरकार में मंत्री रहे बिजेन्द्र प्रसाद यादव को मुख्यमंत्री व उपमुख्यमंत्री के बाद मंत्रिमंडल के वरीयता क्रम में तीसरी जगह मिली है। उन्हें पूर्व की तरह ऊर्जा के साथ-साथ उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग की जिम्मेदारी मिली है।

चलिए एक नज़र डालते हैं सारे मंत्रियों और उनके विभागों पर –  1. नीतीश कुमार – गृह, सामान्य प्रशासन, निगरानी, 2. सुशील कुमार मोदी – वित्त, वाणिज्य कर, वन एवं पर्यावरण, आईटी, 3. बिजेन्द्र प्रसाद यादव – ऊर्जा, उत्पाद व मध्य निषेध, 4. प्रेम कुमार- कृषि, 5. नंदकिशोर यादव – पथ निर्माण, 6. राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह – जल संसाधन,  योजना विकास, 7. श्रवण कुमार – ग्रामीण विकास, संसदीय कार्य, 8. राम नारायण मंडल – राजस्व व भूमि सुधार, 9. जय कुमार सिंह – उद्योग व विज्ञान प्रौद्योगिकी, 10. मंगल पांडेय – स्वास्थ्य, 11. प्रमोद कुमार – पर्यटन, 12. कृष्ण नंदन वर्मा – शिक्षा, 13. महेश्वर हजारी – भवन निर्माण,  14. विनोद नारायण झा – पीएचईडी, 15. शैलेश कुमार – ग्रामीण कार्य, 16. सुरेश शर्मा – नगर विकास एवं आवास, 17. मंजू वर्मा – समाज कल्याण, 18. विजय कुमार सिन्हा – श्रम संसाधन, 19. संतोष कुमार निराला – परिवहन,  20. राणा रंधीर सिंह – सहकारिता, 21. खुर्शीद आलम उर्फ फिरोज अहमद – अल्पसंख्यक कल्याण व गन्ना उद्योग, 22. विनोद कुमार सिंह – खान व भूतत्व, 23. मदन सहनी – खाद्य एवं उपभोक्ता मामले, 24. कपिल देव कामत – पंचायती राज, 25. दिनेश चन्द्र यादव – लघु सिंचाई, आपदा प्रबंधन, 26. रमेश ऋषिदेव – अनुसूचित जाति एवं जनजाति विभाग, 27. पशुपति कुमार पारस – पशु एवं मत्स्य पालन विभाग,  28. कृष्ण कुमार ऋषि – कला-संस्कृति,  29. ब्रिजकिशोर बिंद – पिछड़ा एवं अतिपिछड़ा विभाग।

सभी मंत्रियों को ‘मधेपुरा अबतक’ की शुभकामनाएं। हमें उम्मीद है कि नीतीश कुमार अपनी नई टीम के साथ सात निश्चय समेत अपने सभी निश्चयों को पूरा करेंगे, जिनमें बिहार को विशेष राज्य का दर्जा दिलाना भी शामिल है। अब जबकि राज्य और केन्द्र का ‘दिल-दिमाग’ एक है, इसमें किसी व्यवधान या विलम्ब का प्रश्न नहीं उठना चाहिए।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में हुई साकार नीतीश-‘मोदी’ सरकार

अभी चौबीस घंटे भी नहीं हुए और बिहार की सियासत ने नई करवट ले ली। कल सुबह 10 बजे नीतीश कुमार महागठबंधन सरकार के मुख्यमंत्री थे, शाम 5 बजे अपनी पार्टी की बैठक करते हुए भी वे महागठबंधन सरकार का प्रतिनिधित्व कर रहे थे, पर अभी घंटा भी नहीं बीता कि आबोहवा बदलनी शुरू हो गई और शाम के 7 बजते-बजते वे राज्यपाल को बतौर मुख्यमंत्री अपना इस्तीफा सौंप कर मीडिया के सामने मुखातिब थे और आज सुबह 10 बजे वे एनडीए विधायक दल के नेता के तौर पर छठी बार बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे और उसके कुछ ही मिनटों बाद उनकी बगल की कुर्सी पर बतौर उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी बैठे थे। जी हां, तेजस्वी-प्रकरण का पटाक्षेप चार साल बाद जेडीयू-भाजपा के दुबारा हाथ मिलाने और सत्ता में साथ वापस आने से हुआ।

बता दें कि आरजेडी के साथ चल रही तनातनी में अपनी ‘नाक’ झुकाने से इनकार करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बुधवार शाम जेडीयू की बैठक के बाद अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। गौरतलब है कि जेडीयू उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव पर सीबीआई के एफआईआर मामले में लगातार ‘बिन्दुवार स्पष्टीकरण’ और प्रकारांतर से इस्तीफे की बात कह रही थी, लेकिन आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने न केवल इस्तीफे से साफ इंकार किया बल्कि पूरे मामले पर न तो उन्होंने और न ही तेजस्वी ने ‘स्पष्टीकरण’ ही दिया। बकौल नीतीश कुमार ऐसी परिस्थिति में उनके लिए महागठबंधन सरकार को चलाना संभव नहीं रह गया था।

बहरहाल, नीतीश कुमार के इस्तीफे के तुरंत बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने ट्वीट कर उन्हें ‘भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई में जुड़ने के लिए’ बधाई दी। इसके बाद लालू और उनकी पार्टी अभी ‘विश्वासघात’ का आरोप लगाते हुए अपनी भड़ास ही निकाल रहे थे कि घटनाक्रम तेजी से बदला और भाजपा ने बिना देर किए नीतीश को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। फिर ये ख़बर भी आते देर न लगी कि 1 अणे मार्ग पर भाजपा और जेडीयू विधायकों की संयुक्त बैठक हो रही है और नीतीश कुमार को एनडीए का नेता चुन लिया गया है। महज चंद घंटों में बिहार की सियासत की तस्वीर पूरी तरह बदल गई और ये स्पष्ट हो गया कि मानसून सत्र से पहले नीतीश सरकार अपने नए अवतार में होगी।

नीतीश कुमार ने ये साबित किया कि अगर आपके पास अपनी ‘छवि’ की पूंजी हो और आप धुन के पक्के हों तो सितारे भी आपके मुताबिक चलने लगते हैं और आप एक ही दिन में मुख्यमंत्री का पद छोड़कर फिर से मुख्यमंत्री बन सकते हैं। जहां तक लालू की बात है, उन्होंने जरा भी राजनीतिक परिपक्वता नहीं दिखाई। अगर उन्होंने समय रहते तेजस्वी से इस्तीफा दिलवा दिया होता तो न केवल उनका और तेजस्वी का कद बढ़ता और जनता की सहानुभूति उन्हें मिलती, बल्कि उनकी पार्टी सरकार में भी बनी रहती और महागठबंधन भी अटूट रहता। एक बात और, ऐसी स्थिति में वे वित्त मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी को उपमुख्यमंत्री बनवा कर अपने ‘माय’ समीकरण को भी मजबूत कर सकते थे। दूसरी ओर नीतीश कुमार हैं, उन्होंने समय की नब्ज को समझा और नैतिकता के साथ अपनी सरकार भी बचा ली। रही बात बेचारी कांग्रेस की, बिहार के इन दो बड़े दलों के बीच वो पिस कर रह गई है। जेडीयू-भाजपा के साथ आने के बाद अब उसके पास अधिक विकल्प ही नहीं हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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प्रणब दा ने दिलाई सहिष्णुता, बहुलतावाद और अहिंसा की याद

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बतौर राष्ट्रपति आज देश को आखिरी बार संबोधित किया। विचार, विद्वता और विनम्रता से ओतप्रोत इस संबोधन में उन्होंने कहा कि पिछले पचास वर्षों के सार्वजनिक जीवन के दौरान, भारत का संविधान मेरा पवित्र ग्रंथ रहा है, भारत की संसद मेरा मंदिर रही है और भारत की जनता की सेवा मेरी अभिलाषा रही है। उन्होंने कहा, जैसे-जैसे व्यक्ति की आयु बढ़ती है, उसकी उपदेश देने की प्रवृत्ति बढ़ जाती है, परंतु मेरे पास देने के लिए कोई उपदेश नहीं है। मैंने देश को जितना दिया, उससे कहीं अधिक पाया है। इसके लिए, मैं भारत के लोगों के प्रति सदैव ऋणी रहूंगा।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने अपने विदाई भाषण में देश की सहिष्णुता, बहुलतावाद और अहिंसा की शक्ति को खास तौर पर रेखांकित किया। उन्होंने कहा, हम एक-दूसरे से तर्क-वितर्क कर सकते हैं, सहमत-असहमत हो सकते हैं, लेकिन विविध विचारों की मौजूदगी को हम नकार नहीं सकते हैं। अनेकता में एकता को देश की पहचान बताते हुए उन्होंने कहा कि विभिन्न विचारों को ग्रहण करके हमारे समाज में बहुलतावाद का निर्माण हुआ है। हमें सहिष्णुता से शक्ति प्राप्त होती है। प्रतिदिन हम आसपास बढ़ती हुई हिंसा को देखते हैं तो दुख होता है। हमें इसकी निंदा करनी चाहिए। हमें अहिंसा की शक्ति को जगाना होगा। महात्मा गांधी भारत को एक ऐसे राष्ट्र के रूप में देखते थे जहां समावेशी माहौल हो। हमें ऐसा ही राष्ट्र बनाना होगा।

देश के 13वें राष्ट्रपति ने अपने अंतिम संबोधन में जलवायु परिवर्तन पर भी चिन्ता जताई। उन्होंने कहा, पर्यावरण में बदलाव के कारण कृषि पर असर पड़ा है। इसके लिए हमलोगों को मिलकर काम करना होगा। तरक्की हासिल करने के लिए महामहिम मुखर्जी ने शिक्षा और शिक्षण-संस्थानों को विश्वस्तर बनाने की बात कही। बकौल मुखर्जी हमारे विश्वविद्यालय केवल नोट्स बनाने के केन्द्र नहीं बनने चाहिएं, बल्कि यहां रचनात्मकता और शोध को जगह मिलनी चाहिए।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा, मैंने पिछले पांच वर्षों में अच्छा माहौल बनाने की कोशिश की। अब मैं विदा हो रहा हूं। कल मैं जब आपसे बात कर रहा होऊंगा तो मैं भारत का राष्ट्रपति नहीं बल्कि एक आम नागरिक रहूंगा। उन्होंने जोर देकर कहा कि लोकतंत्र का सबसे बड़ा सम्मान मातृभूमि का नागरिक होने में है। हम सभी भारत मां के बच्चे हैं। हमें जो भी जिम्मेदारी मिले, हम सब उसको पूरी निष्ठा से निभाएं। देश की उन्नति ही हमारा ध्येय होना चाहिए।

गौरतलब है कि 81 वर्षीय प्रणब मुखर्जी अब 340 कमरों वाला राष्ट्रपति भवन छोड़कर 10 राजाजी मार्ग पर रहेंगे। इस दोमंजिला बंगले में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम भी अपनी सेवानिवृत्ति के बाद से निधन होने तक रहे थे। देश के 14वें राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद मंगलवार को दोपहर 12 बजे शपथ लेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

 

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कर्नाटक को अलग झंडा क्यों चाहिए ?

वोट की राजनीति के लिए दलों और नेताओं ने देश को धर्म, सम्प्रदाय, वर्ण, नस्ल, जाति, उपजाति, भाषा, बोली, क्षेत्र जैसी न जाने कितनी ही चीजों में बांट दिया। बंटने और बांटने की ये प्रक्रिया इतिहास के हर दौर में चली है, लेकिन अब इस प्रक्रिया ने वीभत्स रूप ले लिया है। अलगाववादी मानसिकता का इसे चरम ही कहा जाएगा कि अब भारत के किसी राज्य में अलग झंडे की मांग उठी है। हद तो इस बात की है कि यह मांग वहां के मुख्यमंत्री ने उठाई और इसके लिए बकायदा कमिटी बनाकर केन्द्र सरकार को प्रस्ताव भेजा। आजादी के बाद से अब तक एक कश्मीर के अलग झंडे की कितनी कीमत हमें चुकानी पड़ी है, यह किसी से छिपा नहीं, ऐसे में कर्नाटक से उठी ये आवाज कितनी खतरनाक हो सकती है, यह बताने की जरूरत नहीं।

बहरहाल, कर्नाटक के अपने अलग झंडे के प्रस्ताव को वहां की मौजूदा कांग्रेस सरकार के मुखिया सिद्धारमैया की अगले साल विधानसभा चुनावों की जमीन तैयार करने की कोशिश के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि यह प्रस्ताव फिलहाल शुरुआती स्तर पर ही है।

गौरतलब है कि याचिकाकर्ताओं के एक समूह के सवालों के जवाब में राज्य सरकार ने राज्य के लिए “कानूनी तौर पर मान्य झंडे का डियाइन” तैयार करने के लिए अधिकारियों की एक समिति तैयार की थी। दिलचस्प बात यह है कि याचिका 2008-09 के बीच उस वक्त तैयार की गई थी जब कर्नाटक में भाजपा की सरकार थी। उस वक्त भाजपा सरकार ने कर्नाटक हाईकोर्ट को बताया था कि राज्य का अलग झंडा होना देश की एकता और अखंडता के खिलाफ है।

अब जबकि कर्नाटक में 2018 में विधानसभा चुनाव होने हैं, कर्नाटक कांग्रेस की कोशिश है कि झंडे के बहाने ‘कन्नड़ अस्मिता’ को हवा दी जाए। वर्तमान मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने इस मामले को उस समय तूल दे दिया जब उन्होंने राज्य के अलग झंडे की मांग का विरोध करने वाली भाजपा की आलोचना की और सवाल उठाया कि क्या संविधान में कोई ऐसा प्रावधान है जो राज्य को अलग झंडे को अपनाने से रोकता है? हालांकि बता दें कि कर्नाटक सरकार की इस मांग को केन्द्रीय गृह मंत्रालय ठुकरा चुका है। कांग्रेस हाईकमान भी इससे पल्ला झाड़ चुका है। यहां तक कि कांग्रेस आलाकमान ने बकायदा कर्नाटक कांग्रेस को इसके लिए फटकार भी लगाई है।

इस मामले के चर्चा में आने के बाद स्वाभाविक तौर पर नेताओं और दलों की प्रतिक्रियाओं का दौर भी शुरू हो गया है। अपने नेतृत्व की राय से अलग कांग्रेस नेता शशि थरूर ने कहा कि “राज्य के लिए अलग झंडे का कदम एक अच्छी पहल होगी।” वैसे उन्होंने आगे यह जरूर कहा कि “बशर्ते यह देश में अलगाव का प्रतीक न बने।” बकौल थरूर अगर राज्य का झंडा राज्य से जुड़ाव का प्रतीक है तो देश के सभी राज्यों के पास अपना झंडा होना चाहिए।

उधर शिवसेना ने अपने मुखपत्र ‘सामना’ में कर्नाटक सरकार के राज्य के लिए अलग झंडे की मांग की तीखी आलोचना करते हुए कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को बर्खास्त कर देना चाहिए क्योंकि यह कदम इतिहास और पार्टी के आदर्शों के उलट है। शिवसेना ने इसे ‘राजद्रोह’ की संज्ञा देते हुए केन्द्र से कर्नाटक सरकार को भंग करने या राज्य को मिलने वाली सभी सहायताओं को तत्काल बंद करने की भी मांग की।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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दिल्ली दौरे पर नीतीश

बीते मंगलवार को कैबिनेट की बैठक के बाद उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने जिस तरह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मुलाकात की और तथाकथित तौर पर अपनी बातें रखीं, उसके बाद लगा कि बिहार की राजनीतिक अनिश्चितता खत्म हो गई है। लेकिन एक बार फिर जेडीयू द्वारा तेजस्वी से ‘बिन्दुवार स्पष्टीकरण’ देने की बात कहने और इसी दौरान जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार के चार दिनों की यात्रा पर दिल्ली जाने से माहौल एक बार फिर गर्म होता दिख रहा है। मजे की बात यह कि इस दौरान उनकी मुलाकात कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी दोनों के साथ होनी है।

ख़बरों के मुताबिक शनिवार शाम नीतीश टी पार्टी पर राहुल गांधी से मिलेंगे और फिर हैदराबाद हाउस में प्रधानमंत्री द्वारा राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के सम्मान में आयोजित डिनर पार्टी में शिरकत करेंगे। इसके बाद 25 जुलाई को वे नव निर्वाचित राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होंगे। स्वाभाविक तौर पर कोविंद ने उन्हें खास तौर पर न्योता भेजा है।

बहरहाल, सियासी तौर पर नीतीश के इस दिल्ली दौरे को बेहद अहम माना जा रहा है। खास तौर पर राहुल से उनकी मुलाकात में कुछ नए समीकरण के सामने आने की संभावना है, क्योंकि नीतीश के सामने एक ओर भ्रष्टाचार को लेकर उनकी जीरो टॉलरेंस की नीति है तो दूसरी ओर 2019 की संभावनाओं के मद्देनज़र महागठबंधन को बचाने की चुनौती। ऐसे में कांग्रेस का रुख महत्वपूर्ण हो जाता है। गौरतलब है कि तेजस्वी प्रकरण पर मचे घमासान में कांग्रेस मध्यस्थ की भूमिका निभा रही है।

बता दें कि उधर तेजस्वी भी इन दिनों दिल्ली में हैं और 28 जुलाई से बिहार विधानमंडल का मानसून सत्र शुरू होने से पहले अपने ‘बचाव’ की तैयारी में जोरशोर से लगे हैं। बताया जाता है कि इस दौरान वकीलों से राय लेने के साथ-साथ मौजूदा स्थिति पर वे राहुल गांधी से भी ‘सलाह’ लेंगे।

कुल मिलाकर, बिहार की राजनीति के लिए अगले कुछ दिन बेहद अहम हैं। देखें सियासत कब कौन सी करवट लेती है!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘इंसान के खाने लायक नहीं भारतीय रेलवे का खाना’: सीएजी

एक आम भारतीय की ज़िन्दगी का अभिन्न हिस्सा है भारतीय रेलवे। रेल न हो तो ज़िन्दगी रुक सी जाएगी हमारी। 2015-16 के एक आंकड़े के अनुसार हमारे देश में हर दिन 13,313 पैंसेजर ट्रेन लगभग 7000 स्टेशनों के बीच पटरी पर दौड़ती है, जिनमें लगभग दो करोड़ बीस लाख लोग सफर करते हैं। हमें इस बात का गौरव हासिल है कि भारतीय रेलवे दुनिया में चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। ऐसे में अगर आपके सामने भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (सीएजी – Comptroller & Auditor General of India) की यह रिपोर्ट आए कि भारतीय रेलवे के खाने का स्तर लगातार गिर रहा है और इस हद तक कि कहीं-कहीं यह इंसान के खाने लायक नहीं है, तो आप भीतर से हिल से जाते हैं।

जी हां, देश के 74 रेलवे स्टेशनों और 80 ट्रेनों की जांच के बाद संसद में पेश अपनी रिपोर्ट में सीएजी ने कहा है कि ट्रेनों और रेलवे स्टेशनों पर यात्रियों को परोसी जा रही चीजें खाने लायक नहीं हैं। रिपोर्ट के मुताबिक एक ओर ट्रेन के भीतर और स्टेशनों पर परोसी जा रही चीजें प्रदूषित हैं तो दूसरी ओर डिब्बाबंद और बोतलबंद वस्तुएं एक्सपायरी डेट के बाद भी बेची जा रही हैं।

रिपोर्ट में साफ तौर पर कहा गया है कि ट्रेनों और स्टेशनों पर साफ-सफाई का बिल्कुल भी ख्याल नहीं रखा जाता है। कूड़ेदानों को न तो ढक कर रखा जाता है और न ही इनकी नियमित सफाई होती है। रिपोर्ट के मुताबिक पेय पदार्थों में साफ पानी का इस्तेमाल नहीं किया जा रहा है और खाने-पीने की चीजों को धूल-मक्खी से बचाने के लिए ढकने की व्यवस्था नहीं है। साथ ही रिपोर्ट के अनुसार ट्रेनों के अंदर चूहे और तेलचट्टों का पाया जाना भी एकदम आम बात है।

इसके अलावा रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि रेलवे लंबी दूरी की कई ट्रेनों में पैंट्री कार उपलब्ध कराने में नाकाम रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक जिन ट्रेनों में पैंट्री कार उपलब्ध हैं उनमें जहां एक ओर बेची जा रही चीजों का रेट कार्ड उपलब्ध नहीं है, वहीं दूसरी ओर चीजें ऊंची कीमतों पर बेची जा रही हैं।

2014 में रेलवे जैसा बड़ा मंत्रालय मिलने के बाद सुरेश प्रभु ने जोरशोर के साथ अपना काम शुरू किया था। ट्विटर के जरिए उन्होंने ‘चमत्कृत’ करने वाले कई कार्य किए। रेलवे के कामकाज के तरीकों में वे जिस तरह सुधार का प्रयास करते दिखे, उसे देखकर लगा कि प्रधानमंत्री मोदी ने उन पर सही ही भरोसा जताया है। लेकिन सीएजी की इस रिपोर्ट ने उनकी तमाम कोशिशों को नाकाफी साबित कर दिया। खासकर ट्रेनों में कैटरिंग की व्यवस्था में सुधार होने के उनके दावों की पोल बुरी तरह खुल गई है। अब सीएजी के सवालों से मोदी सरकार कैसे निबटती है, यह देखने की बात होगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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रामनाथ कोविंद होंगे भारत के अगले राष्ट्रपति

रामनाथ कोविंद देश के 14वें राष्ट्रपति होंगे। एनडीए उम्मीदवार कोविंद ने विपक्ष की मीरा कुमार को बड़े अंतर से हराकर रायसीना हिल्स की रेस जीती। कोविंद को जहां 66.65 प्रतिशत वोट मिले वहीं मीरा का अभियान 34.35 प्रतिशत मतों पर ही रुक गया। सोमवार को हुए मतदान में रामनाथ कोविंद को कुल 7,02,044 वोट मिले, जबकि मीरा कुमार को 3,67,314 वोटों पर ही संतोष करना पड़ा। बता दें कि नए राष्ट्रपति का शपथग्रहण 25 जुलाई को होना है।

राष्ट्रपति निर्वाचित होने के बाद कोविंद ने कहा कि वे सर्वे भवन्तु सुखिन: की भावना से काम करेंगे और पद की मर्यादा को बनाए रखेंगे। अपने संक्षिप्त और भावुक संबोधन में उन्होंने कहा, “जिस पद का गौरव डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, सर्वपल्ली राधाकृष्णन, एपीजे अब्दुल कलाम और प्रणब मुखर्जी जैसे विद्वानों ने बढ़ाया उस पद पर रहना मेरे लिए गौरव की बात है और यह मुझे जिम्मेदारी का अहसास करा रहा है।”

अपने जीवन के बेहद खास मौके पर गरीबी में बिताए अपने बचपन को याद करते हुए आगे उन्होंने कहा, “आज दिल्ली में सुबह से बारिश हो रही है। बारिश का मौसम मुझे बचपन की याद दिलाता है। हमारा घर कच्चा था। मिट्टी की दीवारें थीं। बारिश के समय फूस की छत पानी को रोक नहीं पाती थी। हम सब भाई-बहन कमरे की दीवार से लग कर बारिश रुकने का इंतजार करते थे। आज पता नहीं कितने ही रामनाथ कोविंद बारिश में भींग रहे होंगे। खेत में काम कर रहे होंगे और शाम के भोजन के लिए प्रबंध कर रहे होंगे। मैं उन सभी से कहना चाहता हूं कि परौख गांव का यह रामनाथ कोविंद राष्ट्रपति भवन में उनका प्रतिनिधि बनकर जा रहा है।”

अपनी जीत की औपचारिक घोषणा के बाद कोविंद ने अपनी प्रतिद्वंद्वि मीरा कुमार को भविष्य के लिए शुभकामनाएं दीं। वहीं मीरा ने भी उन्हें बधाई दी और कहा कि उनके ऊपर संविधान की रक्षा का दायित्व आया है। उधर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी समेत देश भर के नेताओं ने कोविंद को बधाई और शुभकामनाएं दीं। ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से भी उन्हें हार्दिक बधाई और मंगलकामनाएं। एक बात और, बिहार का राज्यपाल रहते हुए उन्हें देश का प्रथम नागरिक बनने का अवसर मिला, इसलिए हम अपेक्षा करते हैं कि उनके मन और मस्तिष्क में बिहार के लिए खास जगह रहेगी और सम्पूर्ण देश के लिए अपना दायित्व निभाते हुए भी करोड़ों बिहारवासियों के ‘विशेष’ अपनत्व व अधिकाबोध का मान वे रख पाएंगे!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

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मायवती का राज्यसभा से इस्तीफा: राजनीतिक स्टंट या मास्टरस्ट्रोक

विधानसभा चुनाव में मुंह के बल गिरने के बाद मायावती फिर से उठने और अपनी खोई जमीन पाने की कोशिश में बड़ी शिद्दत से लग गई हैं। कहने की जरूरत नहीं कि बसपा का आधार वोट दलित हैं और उनकी बड़ी आबादी को पार्टी से जोड़े रखना आसान नहीं। इसके लिए फिलहाल दो चीजें चाहिएं। पहली चीज है एक अदद मुद्दा जिसे वो भुना सकें और दूसरी चीज है पर्याप्त समय जो उस मुद्दे को भुनाने में लगा सकें। अपने एक ‘मास्टरस्ट्रोक’ से उन्होंने ये दोनों चीजें एक साथ पाने की कोशिश की है। सहारनपुर हिंसा पर सदन में न बोल पाने से ‘क्षुब्ध’ मायावती ने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया है। हालांकि मंगलवार को दिया उनका इस्तीफा अभी तक स्वीकार नहीं किया गया है।

बहरहाल, मायावती इस बात से नाराज थीं कि शून्यकाल के दौरान उत्तर प्रदेश के सहारनपुर जिले में दलितों पर हुए अत्याचार पर चर्चा के लिए स्थगन प्रस्ताव पेश करने के बाद उन्हें बोलने के लिए सिर्फ तीन मिनट का समय दिया गया। उन्होंने इस पर कहा, “लानत है। अगर मैं कमजोर वर्ग की बात सदन में नहीं रख सकती तो मुझे सदन में रहने का अधिकार नहीं है।” इसके बाद शाम होते-होते उन्होंने राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। ये अलग बात है कि उनके विरोधी इसे उनका राजनीतिक ‘स्टंट’ बताते हैं और इस बात का हवाला देते हैं कि उनका कार्यकाल वैसे भी आठ महीने के बाद खत्म होने वाला था।

एक और अहम बात यह कि वर्तमान में बसपा के पास केवल 18 विधायक हैं, ऐसे में अगली बार उनका अपने बूते राज्यसभा में आना तक संभव नहीं। इसके लिए उन्हें बिहार की तरह उत्तर प्रदेश में महागबंधन-प्रयोग की आवश्यकता होगी। कहने की जरूरत नहीं कि मायावती अब अपने राजनीतिक अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही हैं, जो एसी कमरे में बैठकर कतई नहीं लड़ी जा सकती। राजनीति के जानकार मानते हैं कि जिस दिन भाजपा ने रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया था, उसी दिन साफ हो गया था कि मायावती जल्द ही जवाबी कदम उठाएंगी क्योंकि यह उनके वोटबैंक में सेंध लगाने की भाजपा की बड़ी कोशिश थी। बस मायावती को सही वक्त और माकूल मुद्दे की तलाश थी, जो शायद उन्हें मिल गया है।

वैसे मायावती के इस्तीफे को नैतिक समर्थन देने वाले भी कम नहीं। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने तो तत्काल यहां तक कहा कि मायवती चाहेंगी तो हम बिहार से उन्हें दोबारा राज्यसभा भेजेंगे। उनके इस प्रस्ताव में भावी राजनीति के बीज आसानी से देखे जा सकते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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