All posts by Dr. A Deep

अमेरिका में दिख रहे नए और परिपक्व राहुल

चाहे राजनीतिक दलों के रणनीतिकार हों, डिप्लौमैट हों या पॉलिसी मेकर्स – अपनी अमेरिका यात्रा से राहुल गांधी ने सबका ध्यान खींचा है। कांग्रेस उपाध्यक्ष को हल्के में लेने वाले भी अब उन्हें गंभीरता से लेने को बाध्य दिखने लगे हैं। अपने ऊपर बने चुटकुलों में अक्सर ‘पप्पू’ कहे जाने वाले इस शख्स से देश की सत्ता पर निहायत मजबूती से काबिज भारतीय जनता पार्टी भी इधर परेशान दिख रही है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि जब आप अपनी कमियां भी बेबाकी से स्वीकार कर रहे हों तब सामने वाले के लिए कही गई बात को भी नज़रअंदाज करना मुश्किल होता है। भाजपा को ठीक यही बात परेशान कर रही है क्योंकि राहुल ने कांग्रेस की कमियों की बात करते हुए भाजपा की दुखती रगों पर भी ऊंगली रखी है, और खास बात यह कि बड़ी संजीदगी से रखी है।

अमेरिका के प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में छात्रों के साथ संवाद करते हुए राहुल ने कहा कि केन्द्र की सरकार नौकरियां पैदा नहीं कर पा रही हैं, लिहाजा धीरे-धीरे लोगों के बीच सरकार के खिलाफ गुस्सा पैदा हो रहा है। उन्होंने कहा कि हर दिन रोजगार बाजार में 30,000 नए युवा शामिल हो रहे हैं और इसके बावजूद सरकार प्रतिदिन केवल 500 नौकरियां पैदा कर रही है। वर्तमान सरकार की आलोचना करते हुए राहुल ने पूर्व की कांग्रेस सरकार को भी कटघरे में खड़ा किया और कहा, सच कहा जाए तो कांग्रेस पार्टी भी इस मोर्चे पर फेल रही थी, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी भी यहां फेल हो रहे हैं। यह एक ऐसी समस्या है जिसकी जड़ें गहरी हैं। इसके समाधान के लिए पहले हमें स्वीकार करना होगा कि यह एक समस्या है लेकिन इस समय कोई यह स्वीकार ही नहीं कर रहा।

राहुल के मुताबिक मोदी के उभार और ट्रंप के सत्ता में आने की वजह भारत और अमेरिका में रोजगार का प्रश्न होना है। उन्होंने कहा, हमारी बड़ी आबादी के पास कोई नौकरी नहीं है, वे अपना भविष्य नहीं देख सकते और इसलिए परेशान हैं। इन्हीं लोगों ने इस तरह के नेताओं का समर्थन किया। उन्होंने आगे कहा, मैं ट्रंप को नहीं जानता, मैं उस बारे में ज्यादा बात नहीं करुंगा। लेकिन, निश्चित ही हमारे प्रधानमंत्री रोजगार सृजन के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठा रहे हैं। ऐसे में वही लोग जो एक दिन में 30,000 नौकरियां पैदा नहीं कर पाने से हमसे नाराज थे, वे मोदी से भी नाराज होंगे।

मोदी सरकार के ‘मेक इन इंडिया’ प्रोग्राम पर बात करते हुए राहुल गाधी ने कहा कि उनकी तमन्ना थी कि ऐसे प्रोग्राम को कांग्रेस अपने कार्यकाल में लॉन्च की होती। हालांकि राहुल इसमें थोड़े बदलाव के हिमायती हैं। उन्होंने कहा, मुझे मेक इन इंडिया का कॉन्सेप्ट पसंद है, लेकिन ये प्रोग्राम जिन लक्ष्यों को लेकर चलना चाहिए उसे लेकर नहीं चल रहा है। अगर कांग्रेस इस प्रोग्राम को लागू करती तो उनका फोकस कुछ अलग होता। बकौल राहुल, प्रधानमंत्री मोदी इस प्रोग्राम के तहत बड़े कारखाने और फैक्ट्रियों को टारगेट कर रहे हैं, जबकि हमारा फोकस मध्यम और छोटे उद्योगों पर होना चाहिए। ये वो क्षेत्र हैं, जहां से नौकरियां आने वाली हैं।

राहुल ने छात्रों से बात करते हुए स्वीकार किया कि मोदी उनसे ‘बहुत अच्छे’ वक्ता हैं और वे समझते हैं कि एक भीड़ में अलग-अलग लोगों के समूहों से कैसे संवाद स्थापित करना है। छात्रों से उनके संवाद की बड़ी बात यह रही कि उन्होंने छात्रों के किसी प्रश्न का ‘टालू’ और ‘चालू’ जवाब नहीं दिया। अपने दो सप्ताह के अमेरिका प्रवास पर वो जहां भी जा रहे हैं, इसी तरह खुलकर और बेबाकी से बात कर रहे हैं और उनकी तटस्थता लोगों को भा रही है। कुल मिलाकर यह कि आगे की लड़ाई के लिए राहुल अमेरिका से तैयार होकर लौट रहे हैं, ऐसी उम्मीद की जानी चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

सम्बंधित खबरें


खलता है तस्लीमुद्दीन का इस तरह चला जाना

अपने कद्दावर व्यक्तित्व, निर्भीक अंदाज और बेबाक बयानों से बिहार, खासकर सीमांचल की राजनीति को लगभग पांच दशकों तक प्रभावित करने वाले मोहम्मद तस्लीमुद्दीन नहीं रहे। रविवार को चेन्नई के अपोलो अस्पताल में उन्होंने अंतिम सांस ली। आरजेडी के वरिष्ठ नेता तस्लीमुद्दीन का विवादों से भले ही चोली-दामन का रिश्ता रहा हो, बिहार में अल्पसंख्यकों के वे बड़ा चेहरा थे, इसमें कोई दो राय नहीं। जब तक आम जनता में पैठ न हो तब तक छह बार विधायक और पांच बार सांसद होना मुमकिन नहीं। तस्लीमुद्दीन अभी भी अररिया से सांसद थे। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, आरजेडी अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव, लोजपा प्रमुख रामविलास पासवान समेत सभी दलों के नेताओं ने उनके निधन पर शोक जताया है।

मधेपुरा के पूर्व सांसद एवं दो बार राज्यसभा के सदस्य रहे डॉ. आरके यादव रवि ने उन्हें भावुक होकर याद किया और कहा कि तस्लीमुद्दीन के रूप में मैंने अपना एक प्रिय मित्र खो दिया। सीमांचल के इस लोकप्रिय व जूझारू चेहरे के यूं अचानक चले जाने से बिहार की राजनीति में एक शून्यता-सी आ गई है। डॉ. रवि ने 1981 से लेकर 1989 तक बिहार विधानसभा के सदस्य के रूप में और 1989 के बाद लोकसभा व राज्यसभा के सदस्य के रूप में तस्लीमुद्दीन के साथ बिताए पलों को याद करते हुए ‘मधेपुरा अबतक’ के माध्यम से उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की।

बता दें कि तस्लीमुद्दीन सरकारी आश्वासन समिति के टूर पर चेन्नई गए थे, जहां उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई। उन्हें सांस लेने में तकलीफ और खांसी में खून आने की शिकायत थी। उन्हें वेंटिलेटर पर रखा गया और बचाने की हर संभव कोशिश की गई, पर उनकी हालत लगातार बिगड़ती चली गई और रविवार दोपहर बाद उनका निधन हो गया। उनका अंतिम संस्कार मंगलवार को दो बजे दिन में अररिया के जोकीहाट में राजकीय सम्मान के साथ किया जाएगा।

4 जनवरी 1943 को जन्मे तस्लीमुद्दीन छात्रजीवन में ही राजनीति में आ गए थे। 1969 में वे पहली बार जोकीहाट से कांग्रेस के विधायक बने। 1972 में उन्होंने यह सीट निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर और 1977 में जनता पार्टी के उम्मीदवार के तौर पर जीती। 1980 और 1985 में वे अररिया से विधायक चुने गए। 1995 में फिर से वे जोकीहाट से विधायक बने। लेकिन इस बीच 1989 में वे जनता दल उम्मीदवार के तौर पर पूर्णिया से सांसद भी रहे। 1996 में वे किशनगंज से सांसद चुने गए और देवगौड़ा सरकार में गृह राज्यमंत्री रहे। 1998 में यहां से उन्होंने फिर जीत दर्ज की पर 1999 में शाहनवाज हुसैन के हाथों यह सीट उन्हें गंवानी पड़ी। लेकिन 2004 में उन्होंने एक बार फिर यह सीट जीत ली। इसके बाद 2014 में वे अररिया से सांसद चुने गए। गौरतलब है कि केन्द्र में मंत्री रहने के अलावा तस्लीमुद्दीन बिहार सरकार में भी कई विभागों के मंत्री रहे थे। अपने जीवन का अधिकांश सार्वजनिक जीवन को देने वाले और कभी हार न मानने वाले तस्लीमुद्दीन का जिन्दगी की जंग इस तरह हार कर चला जाना सचमुच खलता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


क्या आपने प्रधानमंत्री मोदी को जन्मदिन की शुभकामना दी ?

आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का 67वां जन्मदिन है। अगर आप उनके आलोचक हैं तब भी इतना तो जरूर मानेंगे कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के इस प्रधानमंत्री ने बहुत कम समय में अपनी वैश्विक पहचान बनाई है और उनकी लोकप्रियता देश और दल की सीमा को लांघ चुकी है। बात जहां तक भारतीय जनता पार्टी की है, तो उसके लिए ये दिन किसी उत्सव से कम नहीं। लेकिन प्रधानमंत्री किसी दल का नहीं, पूरे देश का होता है और लीक से अलग हटकर काम करने की धुन में लगे इस शख्स पर 125 करोड़ भारतवासियों की अपेक्षाओं का भार है, इसलिए उन्हें हम सबकी ओर से जन्मदिवस की शुभकामना तो जरूर मिलनी चाहिए।

बहरहाल, फेसबुक और ट्विटर पर उनके लिए बधाईयों का अंबार लगा है। देश-विदेश की तमाम बड़ी हस्तियां उन्हें जन्मदिन की शुभकामनाएं दे रही हैं। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ट्वीट कर उन्हें जन्मदिन की बधाई देते हुए उनके स्वस्थ जीवन और दीर्घ आयु की कामना की। केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने कहा कि मां भारती की सेवा के लिए प्रभु आपको निरोग और दीर्घायु प्रदान करें। वहीं बिहार के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने उन्हें ‘नये भारत का विश्वकर्मा’ कहते हुए अपनी शुभकामनाएं दीं।

प्रधानमंत्री के जन्मदिन को भाजपा के नेतृत्व वाली सरकारें सेवा दिवस के तौर पर मना रही हैं और श्रमदान के साथ-साथ शौचालय निर्माण व स्वच्छता अभियान चलाए जा रहे हैं। बिहार में भी भाजपा कार्यकर्ता स्वच्छता अभियान चला रहे हैं। कार्यकर्ताओं के साथ सड़क पर झाड़ू लगाने उतरे अश्विनी कुमार चौबे , जिन्हें हाल ही में मोदी कैबिनेट में जगह मिली है, ने कहा कि महात्मा गांधी के बाद नरेन्द्र मोदी पहले ऐसे शख्स हैं जिन्होंने स्वच्छता के प्रति जन-जन को जागरुक करने का काम किया है।

बता दें कि अपने जन्मदिन पर अपने गृहराज्य पहुंच कर प्रधानमंत्री मोदी ने जहां अपनी मां का आशीर्वाद लिया, वहीं देश को एक बड़ा तोहफा भी दिया। आज उन्होंने नर्मदा नदी पर बना सरदार सरोवर बांध देश को समर्पित किया। यह दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा और भारत का सबसे बड़ा व ऊंचा बांध है, जिससे गुजरात, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और राजस्थान को लाभ होगा। गौरतलब है कि 65 हजार करोड़ रुपये की लागत से बने इस बांध को बनने में 56 साल लगे हैं। 5 अप्रैल 1961 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने इसका शिलान्यास किया था।

चलते-चलते

हमें नहीं भूलना चाहिए कि आज ही के दिन मधेपुरा को अपनी सेवा और संस्कार से सींचने वाले डॉ. (मेजर) उपेन्द्र नारायण मंडल की 92वीं जयंती भी है। पेशे से चिकित्सक, व्यक्तित्व से मेजर, व्यवहार से समाजसेवी और संस्कार से संत ‘मेजर साहब’ को मधेपुरा अबतक का शत्-शत् नमन!!

और अंत में आप सभी को विश्वकर्मा पूजा की ढेरों शुभकामनाएं!!!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप           

सम्बंधित खबरें


बिहार था हिन्दी को आधिकारिक भाषा चुनने वाला पहला राज्य

हिन्दी हमारी राष्ट्रभाषा है, हिन्दी हमारी राजभाषा है, हिन्दी में हिन्दुस्तान की आत्मा बसती है, हिन्दी ही पहचान है हमारी और फिर भी विडंबना देखिए कि कुछ संस्थाओं द्वारा रस्मअदायगी करने और कुछ सरकारी आयोजनों के अलावा हिन्दी दिवस पर उतनी भी चहल-पहल और रौनक नहीं जितनी ‘वेलेंटाइन डे’ तक पर देखने को मिल जाती है। आखिर हम जा कहां रहे हैं? क्या पश्चिम से आयातित तौर-तरीकों में अपनी शान समझने वाले हम भारतवासी (माफ कीजिए, ‘इंडियन’) बहुत तेजी से सांस्कृतिक गुलामी की तरफ नहीं बढ़ रहे? और क्या ये गुलामी सदियों की उस गुलामी से अधिक भयावह नहीं जिससे हम 15 अगस्त 1947 को मुक्त हुए थे?

जरा सोचकर देखिए, आज 14 सितंबर यानि हिन्दी दिवस है, क्या आप बता सकते हैं कि आज हम हिन्दी दिवस क्यों मनाते हैं? और अगर आप जानते हैं तो क्या विश्वास के साथ यह कह पाने की स्थिति में हैं कि आपने अपने बच्चों को भी इस दिन और इसके महत्व से अवगत कराया है? अगर पहले सवाल का जवाब आप ‘हां’ में दे भी दें तो दूसरे सवाल का जवाब (जैसा कि स्कूलों के सर्वे से पता चलता है) सौ में सत्तर फीसदी लोगों का ‘ना’ में होगा।

बहरहाल, 14 सितंबर के ही दिन 1949 में हिन्दी को राजभाषा का दर्जा मिला था। संविधान के अनुच्छेद 343 में यह प्रावधान किया गया है कि देवनागरी लिपि के साथ हिन्दी भारत की राजभाषा होगी। हिन्दी को लेकर एक गौरवशाली तथ्य बिहार से जुड़ा है। जी हां, बिहारवासियों को इस बात का गर्व होना चाहिए कि 1881 में बिहार ही वो पहला राज्य था, जिसने हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में चुना था।

आज की पीढ़ी को ये जरूर जानना चाहिए कि ‘हिन्दी’ शब्द फारसी शब्द ‘हिन्द’ से बना है, जिसका अर्थ ‘सिंधु नदी की भूमि’ है। 11वीं सदी में जब तुर्कों ने पंजाब और गंगा के मैदानों पर हमला किया, तब हिन्द शब्द का इस्तेमाल यहां रहने वाले लोगों के लिए किया गया था। हमें यह भी पता होना चाहिए कि दुनिया भर में 64 करोड़ लोगों की मातृभाषा हिन्दी है। 2015 के आंकड़ो के मुताबिक हिन्दी दुनिया में सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषा बन चुकी है। यही नहीं, एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी है कि जहां 70 प्रतिशत चीनी ही मंदारिन बोलते हैं, वहां भारत के 77 प्रतिशत लोग हिन्दी बोलते हैं।

इंटरनेट की दीवाने युवाओं को यह जानकर खुशी होगी कि दुनिया में हर पांच में से एक व्यक्ति हिन्दी में इंटरनेट का उपयोग करता है। यही नहीं, हिन्दी भारत की उन सात भाषाओं में एक है, जिसका इस्तेमाल वेब एड्रेस बनाने में भी किया जाता है। हिन्दी की एक और खूबी जिससे आपको वाकिफ होना चाहिए, वो यह कि सीखने के लिहाज से यह विश्व की अन्य भाषाओं की तुलना में अधिक आसान है। इसमें शब्दों का वही उच्चारण होता है, जो लिखा जाता है।

चलते-चलते यह भी जानें कि विश्व हिन्दी दिवस 10 जनवरी को मनाया जाता है। इसकी शुरुआत महाराष्ट्र के नागपुर से 1975 में हुई थी और 2006 में इस दिन को आधिकारिक दर्जा के साथ वैश्विक पहचान मिली।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

 

 

सम्बंधित खबरें


सुनिए, चोट खाए शरद ने क्या कहा ?

अब जबकि चुनाव आयोग ने साफ कर दिया कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला दल ही असली जेडीयू है और उनकी राज्यसभा सदस्यता जाने में औपचारिकता भर शेष है, फिर भी शरद यादव यह मानने को तैयार नहीं कि पार्टी के भीतर की लड़ाई वे हार चुके हैं। हां, उन्होंने इतना जरूर कहा कि हम पहाड़ से लड़ रहे हैं तो यह सोच कर ही लड़ रहे हैं कि चोट लगेगी ही।

दरअसल, जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष पार्टी और राज्यसभा की सदस्यता पर मंडराते संकट पर अपना पक्ष रख रहे थे। कल चुनाव आयोग द्वारा पार्टी पर शरद गुट के दावे पर संज्ञान नहीं लेने और राज्यसभा का नोटिस मिलने के बाद अपना पक्ष रखते हुए उन्होंने कहा कि इन पहलुओं को उनके वकील देख रहे हैं। उन्होंने कहा कि वे देश की साझी विरासत पर आधारित संविधान की लड़ाई बचाने की बड़ी लड़ाई के लिए निकल पड़े हैं। बकौल शरद राज्यसभा की सदस्यता बचाना छोटी बात है, उनकी लड़ाई साझी विरासत बचाने की है। सिद्धांत के लिए वे पहले भी संसद की सदस्यता से दो बार इस्तीफा दे चुके हैं।

भविष्य की रणनीति के बारे में शरद ने कहा कि 17 सितंबर को पार्टी कार्यकारिणी और 8 अक्टूबर को राष्ट्रीय परिषद की बैठक के बाद जेडीयू बड़े रूप में सामने आएगी। हालांकि कैसे आएगी, इस पर फिलहाल वे कुछ बताने की स्थिति में नहीं। आगे नीतीश पर तंज कसते हुए उन्होंने कहा कि हमारे मुख्यमंत्री मित्र ने खुद राजद प्रमुख लालू प्रसाद से जब महागठबंधन बनाने की पहल की थी, तब भी वह भ्रष्टाचार के आरोपों से बाहर नहीं थे। जबकि महागठबंधन की सरकार बनने के बाद अचानक शुचिता के नाम पर गठजोड़ तोड़ दिया। यह बिहार के 11 करोड़ मतदाताओं के साथ धोखा है। हमने सिद्धांत के आधार पर ही इसका विरोध किया।

समाजवाद के इस पुराने नेता ने आगे की लड़ाई साझी विरासत के मंच से लड़ने की बात कही। वे लड़ेंगे भी, क्योंकि वे शुरू से धूल झाड़कर फिर से खड़े होने वालों में रहे हैं। लेकिन क्या तमाम आरोपों और मुकदमों से घिरे लालू और उनके परिवार की ‘बैसाखी’ से उनके ‘सिद्धांत’ को कोई गुरेज नहीं है? क्या वे प्रकारान्तर से यह कहना चाहते हैं कि लालू पुत्रों का ‘मॉल’ और मीसा का ‘फॉर्म हाउस’ गरीबों को ‘सामाजिक न्याय’ दिलाने के लिए है? या फिर यह मान लिया जाए कि भारतीय राजनीति में अब भ्रष्टाचार कोई मुद्दा ही नहीं?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


जेडीयू पर शरद का दावा खारिज, अब राज्यसभा की बारी

चुनाव आयोग ने जेडीयू विवाद पर अपना निर्णय दे दिया। आयोग ने बिना किसी द्वंद्व के बड़े स्पष्ट शब्दों में पार्टी और उसके सिंबल पर शरद यादव की दावेदारी को खारिज कर दिया। इसके साथ ही ‘असली-नकली’ की जबरदस्ती लड़ी जा रही लड़ाई खत्म हुई और पार्टी विधिवत नीतीश कुमार की हो गई। हालांकि, शरद खेमे के अली अनवर ने आयोग के फैसले पर असंतोष जताते हुए कानूनी राय लेने और जरूरत पड़ने पर कोर्ट जाने की बात कही, लेकिन वे इस बात से अच्छी तरह वाकिफ होंगे की आगे की लड़ाई कितनी मुश्किल हो गई है।

गौरतलब है कि शरद खेमे ने बीते 25 अगस्त को पार्टी सिंबल पर अपना अधिकार जताया था, लेकिन शरद यादव अपने दावे के पक्ष में अपेक्षित कागजात जमा करने में विफल रहे। जबकि दूसरी ओर शुक्रवार को सांसद आरसीपी सिंह के नेतृत्व में चुनाव आयोग से मिलने गया जेडीयू का प्रतिनिधिमंडल सांसदों, विधायकों और 145 राष्ट्रीय परिषद सदस्यों के समर्थन की सूची से लैस था। ऐसे में आयोग को एक आसान फैसला लेना था, जो उसने ले लिया।

चुनाव आयोग ने स्पष्ट तौर पर कहा कि शरद खेमे के दावे के साथ पर्याप्त समर्थन का दस्तावेज नहीं है। ऐसे में इस आवेदन पर कोई विचार ही नहीं किया जा सकता है। जबकि दूसरी ओर नीतीश खेमे के पास पर्याप्त से भी अधिक समर्थन है। हालांकि शरद यादव के पास फिर से आवेदन देने का अधिकार है, लेकिन यह जानते हुए कि जरूरी समर्थन और उसके लिए हस्ताक्षर जुटाना लगभग नामुमकिन है, शायद वो अपनी और किरकिरी न कराना चाहें।

उधर आयोग के इस फैसले के बाद जेडीयू महासचिव संजय झा ने कहा कि अब आयोग के फैसले की यह प्रति राज्यसभा में दी जाएगी ताकि इस आलोक में शरद यादव और अली अनवर की राज्यसभा सदस्यता को लेकर भी आसानी से फैसला लिया जा सके। बता दें कि पार्टी लाईन से अलग चल रहे शरद यादव की राज्यसभा सदस्यता समाप्त करने के लिए भी जेडीयू ने राज्यसभा के सभापति से आग्रह किया है और इसके बाद राज्यसभा सचिवालय ने नोटिस भेजकर शरद से स्पष्टीकरण भी मांगा है। हालांकि चुनाव आयोग के फैसले के बाद अब राज्यसभा के सभापति को निर्णय लेने में कोई दुविधा होगी, इसका कोई आधार नहीं दिखता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

सम्बंधित खबरें


ब्रिक्स: धाक और धमक दोनों बढ़ी भारत की

चीन के शियामेन में हुए ब्रिक्स देशों के सम्मेलन में आतंकवाद के खिलाफ भारत के अभियान को बड़ी सफलता मिली। ब्रिक्स देशों ने अपने घोषणापत्र में इस बार लश्कर-ए-तैयबा (एलईटी) और जैश-ए-मोहम्मद (जेईएम) जैसे पाकिस्तान स्थित आतंकवादी संगठनों का नाम शामिल किया और इनसे तथा इनके जैसे तमाम आतंकवादी संगठनों से निपटने के लिए व्यापक दृष्टिकोण अपनाने का आह्वान किया। इस सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेद्र मोदी, चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन, ब्राजील के राष्ट्रपति मिशेल टेमर और दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति जैकब जुमा ने शिरकत की।

शियामेन घोषणापत्र में कहा गया कि “हम क्षेत्र में सुरक्षा स्थिति पर और तालिबान, इस्लामिक स्टेट (आईएस), अलकायदा और इससे संबद्ध संगठन ईस्टर्न तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट, इस्लामिक मूवमेंट ऑफ उज्बेकिस्तान, हक्कानी नेटवर्क, लश्कर-ए-तैयबा, जैश-ए-मोहम्मद, टीटीपी और हिज्बुल-तहरीर द्वारा की गई हिंसा पर चिंता व्यक्त करते हैं।” घोषणापत्र के इस अंश का महत्व इस बात से समझा जा सकता है कि भारत ने अजहर को अंतर्राष्ट्रीय आतंकी घोषित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र का रुख किया था लेकिन चीन ने बार-बार इस प्रस्ताव की राह में रोड़ा अटकाया। गोवा में बीते साल हुए आठवें ब्रिक्स सम्मेलन में भी चीन ने घोषणापत्र में पाकिस्तान समर्थित आतंकवादी संगठनों को शामिल करने का विरोध किया था। पर इस बार उसकी नहीं चली। इससे भारत की धाक और धमक दोनों बढ़ी है।

गौरतलब है कि शियामेन घोषणापत्र में ब्रिक्स देशों सहित दुनियाभर में हुए सभी आतंकवादी हमलों की निंदा की गई है। घोषणापत्र में कहा गया, “आतंकवाद की सभी रूपों में निंदा की जाती है। आतंकवाद के किसी भी कृत्य का कोई औचित्य नहीं है।” पाकिस्तान का नाम लिए बगैर घोषणापत्र में कहा गया , “हम इस मत की पुष्टि करते हैं कि जो कोई भी आतंकी कृत्य करता है या उसका समर्थन करता है या इसमें मददगार होता है, उसे इसके लिए जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए।” घोषणापत्र में आतकंवाद को रोकने और इससे निपटने के लिए देशों की प्राथमिक भूमिका और जिम्मेदारी को रेखांकित करते हुए जोर दिया गया कि देशों की संप्रभुता और उनके आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करने का सम्मान करते हुए आतंक के खिलाफ अंतर्राष्ट्रीय सहयोग बढ़ाने की जरूरत है।

ब्रिक्स देशों ने अपने घोषणापत्र में अंतर्राष्ट्रीय समुदाय से व्यापक अंतर्राष्ट्रीय आतंकवाद रोधी गठबंधन की स्थापना करने और इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र की समन्वयक की भूमिका के लिए समर्थन जताने का आह्वान किया। उन्होंने अपने घोषणापत्र में कहा, “हम जोर देकर कहते हैं कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई अंतर्राष्ट्रीय कानून के अनुसार होनी चाहिए। इसमें संयुक्त राष्ट्र का घोषणापत्र, अंतर्राष्ट्रीय शरणार्थी और मानवीय कानून, मानवाधिकार और मौलिक स्वतंत्रता भी शामिल हैं।”

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


शरद की राज्यसभा सदस्यता की उल्टी गिनती शुरू !

जेडीयू से अलग राह पर निकल चुके पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और अली अनवर की राज्यसभा सदस्यता खत्म कराने की कवायद पार्टी ने शुरू कर दी। राज्यसभा में जेडीयू के नेता आरसीपी सिंह और पार्टी के राष्ट्रीय सचिव संजय झा ने उपराष्ट्रपति वैंकेया नायडू से भेंटकर उन्हें जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष व बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का पत्र सौंपा। पत्र में शरद और अनवर की राज्यसभा सदस्यता खत्म करने की बात कही गई है।

गौरतलब है कि ये दोनों नेता पार्टी लाईन से अलग जाकर 27 अगस्त को पटना में आयोजित आरजेडी की भाजपा भगाओ देश बचाओ रैली में शामिल हुए थे। इनके रैली की ‘लक्ष्मण रेखा’ पार करते ही जेडीयू ने स्पष्ट कर दिया था कि अब इन दोनों नेताओं की राज्यसभा सदस्यता खत्म कराने के लिए जल्द ही जरूरी कदम उठाए जाएंगे।

जेडीयू के राष्ट्रीय महासचिव संजय झा का कहना है कि शरद यादव और अली अनवर ने पार्टी के निर्देश का उल्लंघन कर आरजेडी के साथ मंच साझा किया। यह संविधान के दसवें अनुच्छेद के तहत स्वत: दल त्याग का मामला है। पूर्व में ऐसे मामलों में सदस्यता खत्म होने के दृष्टांत हैं। आगे उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार के मसले पर आरजेडी से गठबंधन तोड़ने का निर्णय जेडीयू विधानमंडल दल की बैठक में और एनडीए में शामिल होने का फैसला पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी और राष्ट्रीय कार्यसमिति की बैठक में लिया गया था। यह कोई व्यक्तिगत निर्णय नहीं। शरद यादव जब पार्टी के निर्णय के खिलाफ हैं तो यह साफ है कि वह पार्टी में नहीं रहना चाहते। वह अकेले पार्टी नहीं हो सकते।

उधर शरद यादव ने अपनी राज्यसभा सदस्यता खत्म करने को लेकर जेडीयू की कोशिशों का विरोध किया है। और तो और, उन्होंने तो नीतीश कुमार के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने रहने को ही चुनौती दे दी है। उनका कहना है कि नीतीश ने खुद ही भाजपा के साथ सरकार बनाकर पार्टी के चुनाव घोषणापत्र और बुनियादी सिद्धांतों को त्यागकर स्वेच्छा से पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है।

यह भी बता दें कि शरद यादव ने चुनाव आयोग के आदेश 1968 के पैरा 15 के तहत आयोग से कहा है कि पार्टी का बहुमत उनके साथ है इसलिए पार्टी का चुनाव चिह्न उन्हें दे दिया जाए। हालांकि वे अपने बहुमत को न तो दिखा पा रहे हैं, न ही समझा पा रहे हैं। बहरहाल, जेडीयू को लेकर इस ‘रस्साकसी’ का परिणाम भले ही नीतीश के पक्ष में तयप्राय है, पर ये है बड़ा दिलचस्प, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


मोदी कैबिनेट का विस्तार: कुछ अहम पहलू

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने रविवार को कैबिनेट का तीसरा विस्तार किया। इस विस्तार में कुल 13 मंत्रियों ने शपथ ली, जिनमें 9 नए हैं, जबकि 4 मंत्रियों को कैबिनेट मंत्री के रूप में प्रमोशन दिया गया। इस विस्तार में बिहार को आरके सिंह (ऊर्जा और नवीन तथा नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय में स्वतंत्र प्रभार के राज्य मंत्री) और अश्विनी कुमार चौबे (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय में राज्य मंत्री) के रूप में दो नए मंत्री मिले। लेकिन देखा जाय तो इस विस्तार में बिहार की किरकिरी भी कम नहीं हुई। पहली किरकिरी तो यह कि बिहार के सारण से सांसद राजीव प्रताप रूढ़ी इकलौते ऐसे मंत्री रहे जिनके लिए कहा जा रहा है कि उनका प्रदर्शन संतोषजनक न होने के कारण उन्हें कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाया गया। वैसे तर्क उन्हें संगठन में लाए जाने का दिया जा रहा है। और दूसरी किरकिरी यह कि मीडिया में तमाम चर्चा के बावजूद जेडीयू को इस विस्तार में शामिल नहीं किया गया।

बहरहाल, अब उन चार मंत्रियों पर एक नजर जिन्हें प्रमोशन मिला। ये चार मंत्री हैं – निर्मला सीतारमण, धर्मेन्द्र प्रधान, पीयूष गोयल और मुख्तार अब्बास नकवी। सबसे अहम बात यह कि निर्मला सीतारमण को रक्षा मंत्रालय का भार सौंपा गया। मोदी ने एक बार फिर साबित किया कि जो उनके भरोसे पर खरा उतर रहा हो, उसको लेकर वो चौंकाने वाला फैसला कर सकते हैं। जेएनयू की छात्रा रहीं सीतारमण ने वाणिज्य  मंत्री के तौर पर उन्हें प्रभावित किया और परिणाम सामने है। गौरतलब है कि महिलाओं में निर्मला से पहले केवल इंदिरा गांधी ने रक्षा मंत्रालय संभाला है और वो भी तब, जब वो प्रधानमंत्री थीं। निर्मला के बाद मोदी ने पीयूष गोयल और धर्मेन्द्र प्रधान पर भरोसा जताया है। गोयल को रेल मंत्रालय सौंपा गया, जबकि कोयला मंत्रालय उनके पास पूर्ववत रहेगा ही। वहीं प्रधान को कौशल विकास एवं उद्यमिता मंत्रालय का जिम्मा दिया गया है और इसके साथ पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय भी उन्हीं के पास रहेगा। बचे नकवी, अब वो अल्पसंख्यक मामलों के कैबिनेट मंत्री होंगे।

इस विस्तार की एक खास बात यह भी रही कि प्रधानमंत्री ने अपने मंत्रिमंडल में जिन नौ नए मंत्रियों को शामिल किया है, उनमें चार पूर्व नौकरशाह हैं। ये हैं – पूर्व गृह सचिव आरके सिंह, पूर्व मुंबई पुलिस कमिश्नर सतपाल सिंह, सेवानिवृत्त डिप्लोमैट हरदीप सिंह पुरी और सेवानिवृत्त आईएएस केजे अल्फोंस। इनमें से पुरी और अल्फोंस तो सांसद भी नहीं हैं। यहां तक कि अल्फोंस का रुझान वामपंथी राजनीति की तरफ रहा है। दूसरी ओर आरके सिंह इस बार के बिहार विधानसभा चुनाव में भाजपा पर अपराधियों से पैसे लेकर उन्हें टिकट बेचने का आरोप लगा चुके हैं। तो क्या मान लिया जाय कि भाजपा के पास योग्य और अनुभवी सांसदों की इतनी कमी है कि वो समझौता करने और यहां तक कि आयातित करने तक को तैयार हैं? वैसे ‘आयातित’ करने की बात चली ही तो बता दें कि रेल मंत्री के रूप में इस्तीफे की पेशकश करने वाले सुरेश प्रभु अब वाणिज्य मंत्रालय देखेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


क्यों टूट रही है बिहार कांग्रेस ?

कुछ अपनी कमजोरी, कुछ क्षेत्रीय दलों का उभार, कुछ परिस्थितियों का दोष और बाकी अच्छे दिन का नारा देकर बहुत अच्छे दौर से गुजर रही भाजपा की बेजोड़ रणनीति – कुल मिलाकर कांग्रेस पस्तहाल है। केन्द्र में उसकी स्थिति सबको पता है। वहां तो मोदीयुग चल ही रहा है। हां, बिहार में महागठबंधन बनने के बाद जब उसे 27 सीटें मिलीं, तब जरूर लगा था कि मुरझाती कांग्रेस में फिर हरियाली आ जाएगी। थोड़ी आई भी। पर नीतीश ने महागठबंधन क्या छोड़ा, कांग्रेस की वो हरियाली अब जाने को है। जी हां, सूत्रों की मानें तो कांग्रेस के 27 विधायकों में से 14 विधायकों ने अलग औपचारिक समूह बना लिया है और कहा जा रहा है कि अगले कुछ दिनों में वे जेडीयू में शामिल हो जाएंगे। इस समूह को बस इंतजार है पार्टी के चार और विधायकों के अपने गुट में आने का, ताकि टूट के लिए जरूरी दो तिहाई आंकड़े का इंतजाम हो जाए और पार्टी से अलग होकर भी उनकी सदस्यता बची रहे।

गौरतलब है कि पार्टी में टूट की आशंका के मद्देनज़र कांग्रेस आलाकमान ने बिहार कांग्रेस अध्यक्ष अशोक चौधरी और कांग्रेस विधायक दल के नेता सदानंद सिंह को गुरुवार को दिल्ली बुलाया था। बताया जाता है कि इन दोनों नेताओं ने पार्टी में पक रही बगावती खिचड़ी से खुद को अनजान बताया, जिस पर नाराजगी जाहिर करते हुए कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने उन्हें हर हाल में यह टूट रोकने को कहा।

बिहार कांग्रेस के भीतर चल रहा असंतोष अब भले ही सतह पर आ गया हो, इसकी शुरुआत उसी दिन हो गई थी जब पार्टी के 27 विधायकों व छह विधानपार्षदों में से केवल चार को ही सत्ता का सुख मिला। महागठबंधन सरकार में दो एमएलसी अशोक चौधरी एवं मदन मोहन झा और दो एमएलए अब्दुल जलील मस्तान एवं अवधेश कुमार को जगह मिली, जबकि बाकी लोग ‘उपेक्षा’ और ‘प्रतीक्षा’ के बीच भटकते रहे। कुछ लोगों को आस थी कि उन्हें बोर्ड और निगम में तो जगह मिल ही जाएगी, लेकिन जेडीयू के एनडीए से जुड़ जाने के बाद उनकी वो उम्मीद भी जाती रही।

वैसे यह कहना भी गलत होगा कि ये विधायक केवल पद की लालसा में परेशान हैं। इनकी परेशानी की एक बड़ी वजह लालू प्रसाद यादव हैं। नीतीश की अनुपस्थिति में अब लालू कांग्रेस के लिए एकमात्र विकल्प हैं और यह बात उन विधायकों को आशंकित कर रही है, जिन्हें अपनी जीत के लिए अगड़ों के वोट की सख्त जरूरत है। जब तक नीतीश साथ थे उनकी ‘छवि’ अगड़ों के लालू विरोध को ‘बैलेंस’ कर देती थी, लेकिन अब वो सहारा भी जाता रहा। ऐसे में ये विधायक करें तो क्या करें।

बहरहाल, कांग्रेस नेता अभी यह कहने में जुटे हैं कि पार्टी में टूट की कोई आशंका नहीं, लेकिन राजनीति के गलियारे में यह चर्चा आम है कि इसमें अब केवल औपचारिकता ही शेष है। हालांकि पार्टी में टूट की आशंका के मद्देनज़र कांग्रेस ने ‘डैमेज कंट्रोल’ 11 अगस्त को ही शुरू कर दिया था, जब ज्योतिरादित्य सिंधिया विधायकों की नाराजगी दूर करने पटना पहुंचे थे। पर अब ‘डैमेज’ ‘कंट्रोल’ से बाहर जा चुका है। बात जहां तक नीतीश कुमार की है, कांग्रेस के टूटने पर पर उनके ‘बेस’ और मनोबल दोनों में इजाफा होगा, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप      

सम्बंधित खबरें