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पप्पू यादव  के ‘जख़्मों’ पर ‘बायोपिक’ का मरहम वाया ‘अमेरिका’

मधेपुरा के सांसद पप्पू यादव पर भारतीय मूल के अमेरिकी निर्देशक परम गिल बायोपिक फिल्म बनाएंगे। हाल के विधानसभा चुनाव में उन्हें मिले जख़्मों पर ये ख़बर मरहम का काम करेगी। चुनाव से पहले उन्होंने लालू यादव से ‘उत्तराधिकार’ मांगा और इस बेतुकी मांग के बदले राजद से निकाले गए। फिर उन्होंने ‘जन अधिकार पार्टी’ बनाई लेकिन उनकी पार्टी के ‘जन’ को जनता से भी कोई ‘अधिकार’ नहीं मिला। इसके बाद ख़बरों से नदारद थे पप्पू यादव। हाँ, बीच में उन्होंने अपने उस बड़बोले दावे पर माफी जरूर मांगी थी जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर लालूजी के दोनों बेटे चुनाव जीत जाते हैं तो वे राजनीति छोड़ देंगे। बहरहाल, लम्बे अन्तराल के बाद उनकी कोई ख़बर आई है। ख़बर… ‘गैर’राजनीतिक … और वो भी ‘अमेरिकी कनेक्शन’ के साथ।

पप्पू यादव पर बनने वाली फिल्म की कहानी बिहार (Bihar) के अमरनाथ झा की किताब पर आधारित है। उन्होंने ही इसका स्क्रीनप्ले भी लिखा है। पप्पू यादव की आत्मकथा ‘द्रोहकाल का पथिक’ में उन्हें ‘फिल्मी’ मैटेरियल दिखा था। किताब में एक ओर पप्पू यादव की ‘हीरो’ जैसी ज़िन्दगी थी तो दूसरी ओर एक खूबसूरत लव स्टोरी जिसमें रॉबिनहुड की छवि वाले राजनेता को एक सिख लड़की से प्यार हो जाता है। वो इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने किताब के राइट्स खरीद लिए।

प्रस्तावित फिल्म में पप्पू के जीवन के हर पहलू को दिखाने की कोशिश होगी। फिल्म के निर्देशक परम गिल का मानना है कि पप्पू यादव ने अपनी ज़िन्दगी में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। उन्होंने पिछड़ी जातियों के अधिकार के लिए संघर्ष किया है जिसे दुनिया के सामने आना चाहिए। गिल के अनुसार उनकी कहानी काफी ‘दिलचस्प’ है जिसे पर्दे पर उतारना ‘व्यावसायिक’ तौर पर भी ‘फायदेमंद’ होगा। फिलहाल वो फिल्म के लिए कलाकारों के चयन में जुटे हैं। बता दें कि परम गिल अपनी हॉलीवुड फिल्म ‘गोइंग टू अमेरिका’ के लिए जाने जाते हैं।

बिहार (Bihar) के कोसी और सीमांचल के इलाके में पप्पू यादव की अच्छी पैठ है पर विधानसभा चुनाव में वो सीधे “मैं बदलूँगा बिहार” के नारे के साथ उतर गए। एक तो उन्होंने एकदम से अपना ‘कैनवास’ बहुत बड़ा कर लिया, दूसरा उनके नारे का ‘मैं’ ज्यादातर लोगों के गले नहीं उतरा और तीसरा बीजेपी से उनकी ‘सांठगांठ’ छिपी ना रह सकी। सीधे मुकाबले में तो पप्पू वैसे भी नहीं थे पर वो ‘असर’ छोड़ेंगे ये उम्मीद जरूर थी। चुनाव के नतीजे आने पर इसके उलट पप्पू खासे ‘बेअसर’ साबित हुए। वो जान गए कि अपने लिए वोट मांगना और अपने नाम पर औरों के लिए वोट जुटाना दो अलग बातें हैं। यहाँ तक कि जिस इलाके पर वो अपनी ‘मुहर’ लगाकर चल रहे थे वहाँ से भी उन्हें यही सबक मिला। जाहिर है कि इतना सब कुछ होने के बाद पप्पू के लिए स्थितियां सहज नहीं रहीं और उन्होंने सुर्खियों से दूर रहना ही ठीक समझा। अब जबकि उनके ऊपर फिल्म बनने की ख़बर सामने आई है, पप्पू को नए सिरे से लोगों का सामना करने में ‘सहूलियत’ होगी।

राजनेताओं के सार्वजनिक जीवन को लेकर इससे पहले भी कई फिल्में बनी हैं। इससे नाम और चर्चा जो मिले लेकिन ये नहीँ भूलना चाहिए कि बायोपिक बनाना लोगों को किसी के निजी जीवन में झाँकने के लिए खुला आमंत्रण देना है। बशर्ते कि वो ईमानदारी से बने। जीवन को ज्यों का त्यों दिखा देना बहुत साहस और जोखिम का काम होता है। ये देखने की बात होगी कि पप्पू यादव इस पैमाने पर कितना खरा उतरते हैं। अभी उन्हें एक लम्बा राजनीतिक जीवन जीना है। ऐसे में वो निर्देशक को किस हद तक ‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ देते हैं, इस पर आलोचकों की निगाह होगी। उनके साथ ‘बाहुबली’ का टैग क्यों जुड़ा, फिल्म इस पर क्या और कैसे कहती है, यह देखना दिलचस्प होगा और सांसद पत्नी रंजीत रंजन के संग उनके प्रेम-प्रसंगों को लेकर भी उत्सुकता रहेगी। सम्भवत: उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलू भी दुनिया के सामने आएं।

पप्पू यादव की आत्मकथा ‘द्रोहकाल का पथिक’ पहले ही प्रकाशित हो चुकी है और अब उनके जीवन पर फिल्म बनने जा रही है। उनसे बड़ी विनम्रता के साथ एक सवाल करने को जी चाहता है कि क्या उन्हें स्वयं को थोड़ा और वक्त नहीं देना चाहिए था..? तब शायद उनके जीवन में बताने और साझा करने लायक कुछ और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ जाते..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सरकार के बाद संगठन की बारी, मीसा को पार्टी सौंपने की तैयारी

आरजेडी में आजकल ‘आवाज़’ खूब उठ रही है और लालूजी बड़ी तन्मयता से उन आवाजों को सुन भी रहे हैं। कार्यकर्ताओं की ‘आवाज़’ इतने दिल से निकलती है कि कई बार तो लालूजी तक बिना बोले ही पहुँच जाती है। पहले उनकी पार्टी में ‘आवाज़’ उठी कि दोनों ‘तेज’ को राजनीति में लाओ, लालूजी ले आए। फिर ‘आवाज़’ उठी कि दोनों को सरकार में लाओ और तेजस्वी को डिप्टी सीएम बनाओ, लालूजी ने बहुत ध्यान से सुना और बिल्कुल ऐसा ही किया। ‘आवाज़’ आने का सिलसिला और तेज हुआ। इस बार ‘आवाज़’ उठी कि तेजस्वी को विधायक दल का नेता भी बना दो और साथ में माँ राबड़ी को विधान मंडल दल की कमान सौंप दो, लालूजी ने दरियादिली दिखाते हुए ये दोनों काम भी कर दिया। पर ‘आवाज़’ है कि रुकती ही नहीं। लालूजी करें तो क्या करें..? अब फिर ‘आवाज़’ उठने लगी है कि बेटी मीसा के हाथ में पार्टी की बागडोर दे दो। लगता है लालूजी को इस बार भी ‘आवाज़’ सुननी ही पड़ेगी।

वैसे राजनीति में इस तरह की ‘आवाज़’ उठना कोई नई बात नहीं। नेहरू-गाँधी परिवार को तो ऐसी आवाज़ सुनने में महारत हासिल है। कई पीढ़ियों से वो ऐसी ‘आवाज़’ सुनता आ रहा है। देखा जाय तो आज़ादी से लेकर अब तक इस तरह की ‘आवाज़’ सुनने वालों की लम्बी फेहरिस्त है। जो अब नहीं हैं उनकी बात ना भी करें, तो भी सूची छोटी होने से रही। जो ‘आवाज़’ लालूजी सुन रहे हैं, ठीक वैसी ही ‘आवाज़’ मुलायम सिंह यादव, प्रकाश सिंह बादल, ओमप्रकाश चौटाला, वसुंधरा राजे सिंधिया, करुणानिधि, फारूख अब्दुल्ला, मुफ्ती मोहम्मद सईद, शिबू सोरेन, रामविलास पासवान, यशवंत सिन्हा  जैसे कितने ही नेताओं ने सुनी हैं। ना तो कोई दल अपवाद है, ना कोई राज्य।

बहरहाल, सूत्रों की मानें तो लालू प्रसाद यादव अपनी बड़ी बेटी मीसा भारती को बिहार आरजेडी का अध्यक्ष बनाने जा रहे हैं। पार्टी के अन्दर ये मांग ‘जोरशोर’ से उठने लगी है कि उन्हें ‘बड़ी’ भूमिका में लाया जाय। लालू के खासमखास रहे इलियास हुसैन ने बाकायदा आरजेडी सुप्रीमो से मांग की है कि मीसा को प्रदेश का नेतृत्व सौंपा जाय। युवाओं को जिम्मेदारी देने का अभी ‘सही’ वक्त है। यही नहीं, मीसा को जिम्मेदारी देने से पार्टी ‘सही’ दिशा में काम करेगी। गौरतलब है कि इलियास हुसैन आरजेडी सरकार में पहले मंत्री रह चुके हैं। वर्तमान में वे विधायक हैं और साथ में पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी।

मीसा भारती पिछले लोकसभा चुनाव में पाटलिपुत्र से रामकृपाल यादव (बीजेपी) के हाथों चुनाव हार गई थीं। इसके बावजूद पार्टी के तमाम कार्यक्रमों में वो लगातार सक्रिय रहीं। इस बार के विधानसभा चुनाव में तो वो ‘स्टार प्रचारक’ थीं। सोशल मीडिया पर भी उनकी भरपूर मौजूदगी देखी जा सकती है। अभी बीते चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें ‘बेचारी’ क्या कह दिया था, मीसा ने विरोध में पूरा अभियान छेड़ दिया।

वैसे एक सम्भावना ऐसी भी है कि मीसा को आरजेडी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाय। ऐसा करने से ना केवल उनकी भूमिका और बड़ी हो जाएगी, बल्कि प्रदेश स्तर पर किसी को ‘एडजस्ट’ भी किया जा सकेगा। लालू ने अपने दोनों ‘लाल’ को बिहार ‘सम्भालने’ के लिए तैनात कर ही दिया है। अब बच जाता है केन्द्र। तो उसके लिए मीसा ‘पापा’ की पहली पसंद होंगी। राजनीति के जानकार निकट भविष्य में मीसा का राज्यसभा जाना तय मान रहे हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मिले बिल गेट्स और नीतीश कुमार, खुलेंगे नई संभावनाओं के द्वार

माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स आज मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उनके पटना स्थित आवास पर मिले। 7, सर्कुलर रोड पर हुई दो दिग्गजों की ये मुलाकात बेहद खास रही। मिलते ही नीतीश ने गेट्स को ‘वेलकम’ कहा और गेट्स ने कहा ‘कांग्रेचुलेशन मिस्टर कुमार’। बिहार चुनाव में मिली बड़ी जीत और नई सरकार के गठन के बाद गेट्स और नीतीश की यह पहली मुलाकात थी। इस मुलाकात के बाद नीतीश सरकार और ‘बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन’ के बीच शीघ्र ही नए समझौते होने के आसार हैं।

गर्मजोशी और आत्मीयता भरे माहौल में दोनों शख्सियतों ने स्वास्थ्य सहित कई क्षेत्रों में नई संभावनाओं पर चर्चा की। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिल गेट्स को बिहार में चल रही स्वास्थ्य, शिक्षा और मानव-विकास से जुड़ी विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी। राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही इन योजनाओं से गेट्स काफी प्रभावित दिखे। उन्होंने इन योजनाओं की तारीफ ही नहीं की बल्कि हर संभव सहयोग की बात भी कही। नीतीश ने इस अवसर पर गेट्स को भगवान बुद्ध का स्मृति-चिह्न और सुप्रसिद्ध मिथिला पेंटिंग की कढ़ाई वाली शॉल भेंट की।

बिहार में सामाजिक और महिला सुधार के क्षेत्र में ‘बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन’ की कई योजनाएं पहले से ही चल रही हैं। यह फाउंडेशन विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के स्वास्थ्य और प्रसव के साथ-साथ नवजात बच्चों के स्वास्थ्य के लिए उल्लेखनीय काम करता आ रहा है। यही नहीं, गेट्स का फाउंडेशन महिलाओं को परिवार नियोजन को लेकर जागरुक करने का कार्य भी करता है। नीतीश और गेट्स की ये मुलाकात इन तमाम योजनाओं के लिहाज से अहम मानी जा रही हैं।

बिहार की जनता ने ढेर सारी अपेक्षाओं के साथ नीतीश को पाँचवीं बार राज्य की बागडोर सौंपी है। नीतीश अच्छी तरह जानते हैं कि इस बार उनके सामने पहले से अधिक और पहले से अलग चुनौतियां हैं। वे विभिन्न मंचों पर बड़े आत्मविश्वास के साथ बिहार के विकास मॉडल की वकालत करते रहे हैं। अपने नए कार्यकाल में उन्हें इस मॉडल पर पूरे देश की मुहर लगवानी है। जाहिर है कि इसके लिए आज जैसी मुलाकात और बिल गेट्स जैसे सहयोगी बहुत अहम साबित होंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नंदकिशोर यादव की जगह प्रेम कुमार को नेता प्रतिपक्ष बनाने का अर्थ

करारी शिकस्त के बाद खुद को सम्भालने में लगी बिहार भाजपा ने एक बड़ा कदम उठाते हुए प्रेम कुमार को विधायक दल की कमान सौंप दी। प्रेम कुमार अब नेता प्रतिपक्ष होंगे और उन्हें कैबिनेट मंत्री स्तर की सारी सुविधाएं मिलेंगी। उनके नाम का प्रस्ताव नंदकिशोर यादव ने किया जिसे भाजपा के 53 विधायकों ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया। बिहार चुनाव में हार का ठीकरा किसी व्यक्तिविशेष के सिर पर नहीं फोड़ा गया था और माना जा रहा था कि नंदकिशोर यादव फिर से विधायक दल के नेता चुन लिए जाएंगे। लेकिन भाजपा आलाकमान ने 2019 के लोकसभा चुनाव को देखते हुए ‘अतिपिछड़ा’ चन्द्रवंशी समाज से आने वाले प्रेम कुमार को आगे करना ठीक समझा। पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी भाजपा विधानमंडल दल के नेता बने रहेंगे।

प्रेम कुमार गया से सातवीं बार विधायक बने हैं। वे 1990 से लगातार चुनाव जीतते रहे हैं। 2005 में नीतीश कुमार के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनने के बाद वे पथ निर्माण, पीएचईडी और नगर विकास जैसे महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री रहे। 2013 में भाजपा के सरकार से अलग होने पर वे विपक्ष के नेता पद के सशक्त दावेदार थे और इस बार के विधान सभा चुनाव में मुख्यमंत्री पद के लिए भाजपा के सम्भावित उम्मीदवारों में भी वे प्रमुखता से शामिल थे। शाहनवाज हुसैन ने तो गया की चुनावी सभा में बाकायदा इसकी घोषणा भी कर दी थी।

भाजपा आलाकमान ने मध्य बिहार के चन्द्रवंशी समाज से आने वाले प्रेम कुमार की ताजपोशी नेता प्रतिपक्ष के रूप में यूँ ही नहीं की है। सच तो ये है कि भाजपा अभी से 2019 के लोकसभा चुनाव की तैयारी में जुट गई है। बता दें कि पिछले लोकसभा चुनाव में 35 प्रतिशत से अधिक आबादी वाली अत्यंत पिछड़ी जातियों की भाजपा के पक्ष में गोलबंदी के कारण ही एनडीए ने 40 में से 31 सीटों पर कामयाबी हासिल की थी और इस बार के चुनाव में उसके मुँह के बल गिरने के पीछे एक बड़ा कारण इस वोट बैंक का उसके हाथ से खिसक जाना रहा था।

जो भी हो, भाजपा ने इस बड़े फेरबदल से अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं। अब देखना ये है कि संगठन मे वो क्या बदलाव करती है..? प्रदेश अध्यक्ष के तौर पर मंगल पांडेय को जीवनदान मिलता है या किसी नए चेहरे को आगे किया जाता है..? नंदकिशोर यादव की नई भूमिका अब क्या होगी..?  और सुशील कुमार मोदी का विकल्प पार्टी ढूंढ़ पाती है या नहीं..? उन्हें भाजपा विधानमंडल दल का नेता बनाए रखने से ये तो स्पष्ट हो ही गया है कि बिहार भाजपा में ‘फिलहाल’ उनका कोई विकल्प नहीं।

और अंत में, ऊपर के आखिरी सवाल से जुड़ा एक बड़ा सवाल या संभावना ये भी है कि क्या प्रेम कुमार की भूमिका अगले विधान सभा चुनाव तक और बड़ी होगी..? क्या आने वाले समय में प्रेम कुमार बिहार भाजपा के ‘चेहरा’ होंगे और उन्हें नेता प्रतिपक्ष बनाना उसी का संकेत है..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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कलबुर्गी, असहिष्णुता, पुरस्कारवापसी, आमिर खान और संसद में चर्चा

आज संसद में ‘असहिष्णुता’ का मुद्दा गूंजेगा। माकपा सांसद पी करुणाकरण और कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने ‘असहिष्णुता’ के मुद्दे पर लोकसभा में चर्चा के लिए नोटिस दिया था जिसे लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने स्वीकार कर लिया। ये विषय आज की सूची में है। बता दें कि दोनों विपक्षी सांसदों ने नियम 193 के तहत नोटिस दिया था। इस नियम के तहत वोटिंग का प्रावधान नहीं होता।

कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या के बाद से ‘असहिष्णुता’ का मुद्दा प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में छाया हुआ है। आशंका जताई गई कि उनकी हत्या के पीछे स्थानीय दक्षिणपंथी समूहों का हाथ है क्योंकि वे कलबुर्गी के मूर्तिपूजा और ‘अंधविश्वास’ विरोधी रुख से भड़के हुए थे। इस ‘असहिष्णुता’ के खिलाफ दर्जनों साहित्यकारों, कलाकारों और फिल्मकारों ने अपने पुरस्कार लौटा दिए। पुरस्कार वापसी का जैसे दौर ही चल पड़ा। इन बुद्धिजीवियों का कहना था कि देश का माहौल बिगड़ रहा है पर सरकार ने ‘चुप्पी’ साध रखी है। उनके हिसाब से देश की ‘नई’ सरकार ‘असहिष्णुता’ को मौन समर्थन दे रही है। ऐसे में सरकार के दिए पुरस्कार को रखना उन्हें सरकार से सहमति जताना प्रतीत हुआ और उसे लौटा देने में विरोध का नया रास्ता दिखा।

बुद्धिजीवियों का एक खेमा पुरस्कार वापस कर सुर्खियां बटोर रहा था तो दूसरा खेमा पुरस्कारवापसी के विरोध में सामने आया। इस खेमे ने पुरस्कारवापसी को ‘छद्म’ विरोध कहा और तर्क दिया कि देश इससे पहले भी और अभी से कहीं ज्यादा बुरे दौर से गुजरा है, तब ये विरोध करने वाले कहाँ थे? 1977 के आपातकाल और 1984 के सिख विरोधी दंगे के समय उन्हें ‘असहिष्णुता’ क्यों नहीं दिखी? इस खेमे का एक तर्क ये भी है कि जो पुरस्कार लौटाए जा रहे हैं वो किसी सरकारविशेष से नहीं बल्कि देश से मिला ‘सम्मान’ है जो उन्हें उनकी ‘प्रतिभा’ और ‘योगदान’ के कारण मिला है। किसी पुरस्कार का ‘प्रशस्ति-पत्र’ लौटाया जा सकता है लेकिन उससे जुड़ी ‘पहचान’ और ‘प्रसिद्धि’ भी क्या लौटायी जा सकती है?

प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को इस ‘असहिष्णुता’ में ‘मसला’ और ‘मसाला’ दोनों दिखा। अखबार, पत्रिकाएं और चैनल इससे जुड़ी खबरों से पट गए। राजनीतिक मंचों पर भी इस मुद्दे ने बड़ी तेजी से अपनी जगह बनाई। ‘दल’ और ‘नेता’ इससे जुड़े तो माहौल और भी तल्ख हो चला। इन्हीं सब के बीच 24 नवम्बर को बॉलीवुड के बड़े स्टार आमिर खान का देश छोड़ने वाला बयान आया और ‘असहिष्णुता’ के मुद्दे ने नए सिरे से तूल पकड़ लिया। आमिर के बयान की आलोचना, निंदा और समर्थन की बाढ़ आ गई। गृहमंत्री राजनाथ सिंह को भी संसद में इसका जिक्र (बिना आमिर का नाम लिए) छेड़ना पड़ा। जाहिर है कि उनकी या केन्द्र सरकार की सहमति आमिर से या इस ‘असिहष्णुता’ से नहीं हो सकती।

आमिर ने कहा था कि “पिछले छह से आठ महीने में असुरक्षा और भय की भावना बढ़ी है। कई घटनाओं ने उन्हें चिन्तित किया है। यहाँ तक कि उनकी पत्नी किरण राव को प्रतिदिन समाचारपत्र खोलने से डर लगता है और वो कहती हैं कि क्या हमें भारत से बाहर चले जाना चाहिए? उन्हें अपने बच्चे की चिन्ता है।” इस बयान पर शत्रुघन सिन्हा ने बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि अगर भारत में ‘असहिष्णुता’ होती तो आमिर की ‘पीके’ जैसी फिल्म इतनी बड़ी हिट नहीं होती। खैर, आमिर के इस बयान का असर 25 नवम्बर को हुई संसद की सर्वदलीय बैठक में भी दिखा। विपक्षी दलों ने कहा कि इस मुद्दे पर जल्द से जल्द चर्चा होनी चाहिए। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कहा था कि उनकी पार्टी देश में बढ़ रही ‘असहिष्णुता’ का मुद्दा उठाएगी। उनका कहना था कि देश में होने वाली घटनाएं शांति खत्म कर रही हैं लेकिन प्रधानमंत्री मोदी फिर भी चुप हैं।

‘असहिष्णुता’ पर आज बस बयानबाजी और खेमेबाजी हो रही है। हर कोई अपने-अपने ‘पैमाने’ से इसे मापने में लगा हुआ है और विडंबना ये है कि कोई भी ‘पैमाना’ सौ फीसदी भरोसे के लायक नहीं है। साहित्यकार, कलाकार, फिल्मकार से लेकर सरकार तक अपने-अपने ‘समय’ और ‘संस्कार’ को बस जाया कर रहे हैं। देश की बेहतरी के लिए ऐसे हजार मुद्दे पड़े हैं जिन पर चर्चा और बहस होनी चाहिए लेकिन हो नहीं रही। सच तो ये है कि इस ‘असहिष्णुता’ पर अपनी ‘रोटी’ सेकना ही सबसे बड़ी ‘असहिष्णुता’ है।

महात्मा गांधी ने सफाई को परिभाषित करते हुए कहा था कि सभी चीजों का अपनी-अपनी जगह पर रहना ही सफाई है। ठीक इसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि देशहित में सभी का अपने-अपने काम में लगे रहना ही ‘सहिष्णुता’ है। अगर सभी ‘ईमानदारी’ से अपना काम कर रहे हों तो कभी किसी ‘कलबुर्गी’ को अमानवीयता का शिकार नहीं होना पड़ेगा और ना ही किसी ‘असहिष्णुता’ का प्रश्न उठेगा। जब तक हम स्वार्थ और संकीर्णता से जकड़े रहेंगे, तब तक ‘असहिष्णुता’ जैसा कोई मुद्दा संसद में आता रहेगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे’ या सचमुच बिहार में होंगे मध्यावधि चुनाव..?

बिहार विधान सभा चुनाव में एनडीए को ‘अप्रत्याशित’ पटखनी मिली। इसके बाद राजनीतिक शिष्टाचार के तहत भाजपा और उसके तमाम सहयोगी दलों ने ‘जनादेश’ का सम्मान करने की औपचारिकता तो निभा दी लेकिन अखबारों में और चैनलों पर उन दलों की ओर से एकदम ‘सन्नाटा’ छा गया। जाहिर है ‘सदमे’ से उबरने और ‘धूल झाड़ने’ के लिए उन्हें थोड़ा वक्त चाहिए था। पर राजनीति में ज्यादा वक्त तक चुप रहना ‘सेहत’ के लिए ठीक नहीं माना जाता। लिहाजा अब ये दल अपनी चुप्पी तोड़ रहे हैं और शुरुआत की है लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने।

आज लोजपा की स्थापना के सोलह साल पूरे हुए। पार्टी की स्थापना दिवस के मौके पर पार्टी प्रमुख व केन्द्रीय खाद्य मंत्री रामविलास पासवान अपने तीन सांसदों, एक नवनिर्वाचित विधायक, सभी जिलाध्यक्षों समेत प्रदेश के तमाम पदाधिकारियों के साथ तुरत मिली जबरदस्त हार की समीक्षा में जुटे थे। समीक्षा होनी भी चाहिए। पर बात केवल समीक्षा तक नहीं रही। इस मौके पर लालू के ‘मौसम वैज्ञानिक’ ने एक भविष्यवाणी भी कर डाली कि नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली महागठबंधन सरकार डेढ़-दो साल से अधिक नहीं चलने वाली है। उनके अनुसार बिहार में मध्यावधि चुनाव तय है क्योंकि बिहार की इस नई सरकार में जिस तरह विभागों का बंटवारा हुआ है उससे स्पष्ट है कि ‘ताज’ किसी और के सिर पर है और ‘राज’ किसी और के हाथ में। सारे बड़े और ‘मलाईदार’ विभाग राजद ने ले लिए हैं।

जहाँ तक एनडीए की करारी हार का प्रश्न है तो बकौल पासवान ऐसा महागठबंधन के ‘जातीय कार्ड’ के कारण हुआ। नीतीश सरकार द्वारा छोटी-छोटी जातियों को अतिपिछड़े वर्ग से निकालकर दलित वर्ग में डालने की अनुशंसा और पिछड़ी जातियों को अतिपिछड़े में शामिल करने के कारण जातीय गोलबंदी महागठबंधन के पक्ष में हो गई। लेकिन ये ‘कास्ट गिमिक्स’ बिहार में नहीं चलेगा। पासवान के अनुसार जब इन जातियों की अपेक्षाएं टूटेंगी तब यह समीकरण बिखर जाएगा।

लोजपा अध्यक्ष ने मुख्यमंत्री द्वारा शराबबंदी की घोषणा का स्वागत किया लेकिन साथ ही इसके प्रभावी होने पर संदेह भी जताया। उन्होंने कहा कि पहले कदम-कदम पर शराब की दुकानें खुलवाई गईं, दस वर्षों में लोगों को शराब की लत लग गई और अब अचानक शराबबंदी का ऐलान हो रहा है। अब क्या होगा उन दुकानों का और क्या होगा उन लोगों का, ये भी सरकार को बताना चाहिए।

बहरहाल, अब तो ये ‘परिपाटी’ बन चुकी है कि राज्य या केन्द्र की सरकार चाहे अच्छे से अच्छा निर्णय क्यों ना ले, विरोधी दल उसकी आलोचना ही करेंगे। इस पर कोई टिप्पणी ही बेकार है। जहाँ तक मध्यावधि चुनाव को लेकर पासवान की भविष्यवाणी है उस पर चर्चा होनी तय है। एनडीए अगर सचमुच अपनी हार के कारणों को ईमानदारी से तलाशना चाहता है तो उसे ये समझना होगा कि इसके पीछे उनके बड़े नेताओं के ‘बड़बोलेपन’ ने कितनी बड़ी भूमिका निभाई है। चाहे प्रधानमंत्री मोदी का ‘डीएनए’ वाला बयान हो, चाहे अमित शाह का ‘पाकिस्तान में पटाखे फूटने’ का या फिर मोहन भागवत का ‘आरक्षण की समीक्षा’ वाला बयान। इन सबके उलट नीतीश को अपनी ‘शालीनता’ से लोकप्रियता भी मिली और वोट भी। आश्चर्य है कि रामविलास पासवान इन गलतियों से सबक लेने की बजाय नए सिरे और नए तरीके से वैसी ही गलती दुहराने जा रहे हैं।

अभी बिहार की नई सरकार ने काम करना शुरू ही किया है। महागठबंधन के दलों ने अभी ऐसी कोई ‘गलती’ नहीं की है कि एनडीए के नेता मध्यावधि चुनाव की भविष्यवाणी करने लग जाएं। पासवान ना केवल बिहार के बल्कि देश स्तर के नेता हैं और केन्द्र में वरिष्ठ मंत्री भी हैं। इतने जिम्मेदार पद पर बैठे व्यक्ति से एक अलग तरह की मर्यादा अपेक्षित होती है। इस तरह के बयानों से सिवाय राजनीतिक ‘अस्थिरता’ के कुछ भी हासिल नहीं होगा। इस ‘प्रवृत्ति’ से ना तो राज्य का भला हो सकता है, ना ही देश का। जहाँ तक जनता की बात है, वो भी खूब समझती है कि ‘खिसियानी बिल्ली’ कब और कैसे खंभा नोचती है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश ने सबको किया लाजवाब, बिहार में बंद होगी शराब

अभी तुरत बीते चुनाव में भाजपा समेत एनडीए में शामिल तमाम दलों ने नीतीश कुमार को जिन मुद्दों पर घेरने की जी तोड़ कोशिश की उनमें शराब बहुत अहम मुद्दा था। उन पर आरोप लागाए गए कि उन्होंने गांव-गांव, गली-गली में शराब के ठेके खुलवा दिए। सरकार की नीयत पर संदेह करें या ना करें, ये स्वीकार तो करना ही पड़ेगा कि नीतीश की पिछली सरकार में शराब की दुकानें बहुतायत से खुलीं और शराब की इन दुकानों से सरकार के राजस्व में जो भी वृद्धि हुई हो इसके दुष्प्रभाव भी सामने आए। समाज के बड़े तबके में विरोध के स्वर उठने लगे। इस बार के चुनाव में खासकर महिलाओं को लेकर ये बात कही जा रही थी कि मतदान के लिए उनकी लम्बी कतारें शराब के विरोध में तो नहीं थीं..! खैर, चुनाव परिणाम ने इन संदेहों को निर्मूल साबित किया। जनता ने अपने ‘सुशासन बाबू’ पर भरोसा दिखाया था और नीतीश ने उस भरोसे की लाज रखते हुए आज एक बड़ा निर्णय लिया। जी हाँ, मुख्यमंत्री ने अगले साल यानि 2016 की पहली अप्रैल से बिहार में शराबबंदी की घोषणा की।

बता दें कि आज मद्य निषेध दिवस है। पटना के सचिवालय परिसर स्थित अधिवेशन भवन में निबंधन, उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग ने मद्य निषेध दिवस समारोह का आयोजन किया था। कौन जानता था कि ये समारोह महज ‘रस्म अदायगी’ के लिए नहीं है, बल्कि नीतीश इसमें बहुत बड़ा ‘संकल्प’ लेकर शिरकत कर रहे हैं। शराबबंदी की घोषणा के साथ आज का ये समारोह इतिहास में दर्ज हो गया। बड़े ‘निश्चय’ के साथ समारोह को संबोधित करते हुए नीतीश ने कहा कि उत्पाद से मिलने वाले राजस्व में कमी हो जाने से कुछ चीजों के लिए इंतजार कर लिया जाएगा लेकिन शराबबंदी हर हाल में लागू होगी।

मुख्यमंत्री ने इस संबंध में उत्पाद एवं मद्य निषेध विभाग को विस्तृत कार्ययोजना बनाने का निर्देश दिया। शराबबंदी से संबंधित नई नीति पहली अप्रैल, 2016 से लागू कर दी जाएगी। यही नहीं नशा के खिलाफ अभियान चलाने वाले और गांव में शराब की बिक्री बंद कराने वाले स्वयं सहायता समूहों को पुरस्कृत भी किया जाएगा।

शराबबंदी के इस ऐतिहासिक निर्णय के पीछे की कहानी बड़ी दिलचस्प है। कुछ महीने पहले पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में स्वयं सहायता समूह के एक कार्यक्रम में महिलाओं ने नीतीश कुमार से गांवों में शराब बंद कराने का अनुरोध किया था। उस वक्त नीतीश अपना संबोधन खत्म कर चुके थे लेकिन उन महिलाओं की अपील उनके दिल को इस कदर छू गई कि वे दुबारा माइक पर गए और कहा कि अगर उन्होंने सत्ता में वापसी की तो शराबबंदी जरूर लागू करेंगे। महिलाओं, खासकर गरीब परिवार की महिलाओं पर शराब के जहरीले प्रभाव का उन्हें एहसास था। तभी उन्होंने कहा था कि अपनी कही बात से वे पीछे नहीं हटेंगे।

चुनाव के मौसम में कई बातें कही जाती हैं। कहकर भूल जाना या ये कहना कि मेरे कहने का मतलब ‘ये’ था ‘वो’ नहीं इतना आम हो चुका है कि अब इस पर बहस भी नहीं होती। ऐसे में नीतीश का अपना वादा निभाना, और वो भी शपथ लेने के महज कुछ दिनों के भीतर, सुखद आश्चर्य से भर दे रहा है। उन्होंने अपने तमाम विरोधियों और आलोचकों के मुँह पर अचानक बहुत बड़ा ताला जड़ दिया। इसमें कोई दो राय नहीं कि नीतीश के इस निर्णय की गूंज दूर तलक जाने वाली है।

बिना विलंब इस बड़ी घोषणा से यह स्पष्ट हो गया कि नीतीश की ये नई पारी बेहद खास होगी। उन्हें इस बात का भली भाँति एहसास है कि बिहार की जनता ने किस उम्मीद और विश्वास से उन्हें अपार बहुमत के साथ सत्ता सौंपी है। ‘मधेपुरा अबतक’ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को उनके इस साहसिक निर्णय के लिए बधाई देता है और आने वाले दिनों में बिहार के हित में ऐसे और निर्णयों की अपेक्षा करता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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इस जीत ने नीतीश को बनाया मोदी-भाजपा-एनडीए विरोधी राजनीति का ‘सर्वमान्य’ प्रतीक

न्यूटन की गति का तीसरा नियम कहता है कि हर क्रिया की बराबर और विपरीत प्रतिक्रिया होती है। बिहार चुनाव में नरेन्द्र मोदी, भारतीय जनता पार्टी और एनडीए की जैसी ‘क्रिया’ थी, 20 नवंबर को पटना के ऐतिहासिक गांधी मैदान में नीतीश का शपथ ग्रहण समारोह उसकी ठीक बराबर और विपरीत ‘प्रतिक्रिया’ है। बिहार चुनाव का परिणाम 8 नवंबर को आया लेकिन नीतीश ने शपथ ली 12 दिनों के बाद। यह विलंब अकारण नहीं था। नीतीश अपनी शपथ को मोदी-भाजपा-एनडीए विरोधी राजनीति की ‘महाशपथ’ बनाना चाहते थे और कश्मीर से कन्याकुमारी तथा महाराष्ट्र से अरुणाचल प्रदेश तक के नेताओं को जुटाकर उन्होंने यही किया।

किसी एक राज्य की सरकार के शपथ ग्रहण के लिए आयोजित समारोह में ‘अति विशिष्टों’ की ऐसी भीड़ आज तक नहीं जुटी थी। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री व जेडीएस अध्यक्ष एचडी देवगौड़ा, लोकसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खड़गे, पूर्व लोकसभा अध्यक्ष मीरा कुमार, सीपीआईएम के महासचिव सीताराम येचुरी, सीपीआई के नेता डी राजा, एनसीपी प्रमुख शरद पवार और प्रफुल्ल पटेल, नेशनल कांफ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला, डीएमके प्रमुख करुणानिधि के बेटे एमके स्टालिन और टीआर बालू, असम गण परिषद के प्रफुल्ल कुमार महंत, राष्ट्रीय लोकदल प्रमुख अजित सिंह और उनके बेटे जयंत सिंह और इंडियन नेशनल लोकदल के अभय चौटाला एक मंच पर थे। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनकी पत्नी व बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी तथा जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और राष्ट्रीय महासचिव केसी त्यागी को तो खैर होना ही था।

नीतीश की ‘महाशपथ’ के साक्षी नौ राज्यों के मुख्यमंत्री भी बने। वे हैं ममता बनर्जी (पश्चिम बंगाल), अरविन्द केजरीवाल (दिल्ली), वीरभद्र सिंह (हिमाचल प्रदेश), सिद्धारमैया (कर्नाटक), ओमान चांडी (केरल), तरुण गोगोई (असम), पीके चामलिंग (सिक्किम), इबोबी सिंह (मणिपुर) और नबाम टुकी (अरुणाचल प्रदेश)। इनके अतिरिक्त दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित, हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा, छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबूलाल मरांडी (झाविमो) व हेमंत सोरेन (झामुमो) ने भी अपनी मौजूदगी दर्ज कराई।

प्रधानमंत्री मोदी का प्रतिनिधित्व केन्द्रीय मंत्री वैंकेया नायडू और राजीव प्रताप रूडी ने किया और बिहार भाजपा की ओर से राजनीतिक शिष्टाचार निभाया पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी और वरिष्ठ नेता नंदकिशोर यादव ने। पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल (अकाली दल), महाराष्ट्र के मंत्री रामदास कदम व सुभाष देसाई (दोनों शिवसेना) और झारखंड के मंत्री सरयू राय (भाजपा) भी अपनी-अपनी सरकार की ओर से सम्मिलित हुए। अकाली दल और शिवसेना भाजपा के सहयोगी जरूर हैं लेकिन उनके अलग ‘अस्तित्व’ से इंकार नहीं किया जा सकता।

नाम पढ़ते-पढ़ते शायद आप थक गए होंगे पर सूची यहीं खत्म नहीं होती। देश भर से आए 15 से ज्यादा दलों के नेता के साथ-साथ प्रसिद्ध वकील रामजेठ मलानी, वरिष्ठ पत्रकार एचके दुआ और अंबेडकर के पौत्र प्रकाश अंबेडकर जैसे नाम भी समारोह में शामिल होनेवालों में हैं। कई महत्वपूर्ण नाम अभी भी छूट रहे हैं लेकिन जिस बिन्दु पर हमें बात करनी है उसके लिए ऊपर के सारे नाम काफी हैं। हालांकि उनमें जो नाम कांग्रेस के हैं उनके लिए कहा जा सकता है कि वे शिष्टाचार के साथ-साथ महागठबंधन में शामिल अपनी पार्टी की हौसला आफजाई के लिए थे। भाजपा के लोग तो खैर विशुद्ध रूप से शिष्टाचारवश ही थे लेकिन ‘थे’ ये बात गौर करने की है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि नीतीश कुमार के लिए इस चुनाव का ‘हासिल’ पाँचवीं बार बिहार का मुख्यमंत्री होने से कहीं ज्यादा है। इस चुनाव के बाद उनका कद पूर्ण रूप से ‘राष्ट्रीय’ हो चुका है और उनकी ‘स्वीकार्यता’ बेहिसाब बढ़ी है। इसकी पुष्टि इस बात से भी होती है कि नीतीश के लिए सात राज्यों के धुर विरोधी भी एक मंच पर थे। दिल्ली से केजरीवाल-शीला दीक्षित, कर्नाटक से देवगौड़ा-सिद्धारमैया, हरियाणा से हुड्डा-अभय चौटाला, झारखंड से हेमंत सोरेन-बाबूलाल मरांडी, असम से तरुण गोगोई-प्रफुल्ल कुमार महंत, महाराष्ट्र से शरद पवार-रामदास कदम और पश्चिम बंगाल से ममता-येचुरी की एक साथ मौजूदगी बड़ी बात है। अब नीतीश मोदी-भाजपा-एनडीए विरोधी राजनीति के ‘सर्वमान्य’ प्रतीक हैं। आज नरेन्द्र मोदी बिहार की हार से जितने दुखी होंगे उससे कहीं अधिक ये बात उन्हें सालती होगी कि बिहार चुनाव को ‘पर्सनलाइज’ करने और “केन्द्र बनाम बिहार” का रूप देने से उनका कद जितना घटा उसी अनुपात में नीतीश का कद बढ़ गया है इस चुनाव के बाद।

नीतीश के शपथ-ग्रहण समारोह में ना केवल एक नए ‘ध्रुवीकरण’ या यूँ कहें कि ‘महागठबंधन’ के राष्ट्रीय स्वरूप का शंखनाद हुआ बल्कि फारूक अब्दुल्ला ने यह कहकर कि “नीतीश को अब देश की कमान संभालनी चाहिए”, एक कदम आगे का संकेत भी दे दिया। अब यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि गांधी मैदान से जो बात निकली है वो बहुत दूर तक जाने वाली है।

अगर नीतीश केन्द्र की ओर रुख करते हैं तो एक बड़ा सवाल लालू प्रसाद यादव को लेकर उठेगा कि वैसी स्थिति में उनकी क्या भूमिका होगी..? इसमें कोई दो राय नहीं कि लालू ने लम्बे समय के बाद ‘किंगमेकर’ के रूप में वापसी की है और केन्द्र की राजनीति में भी उनकी बड़ी भूमिका से इंकार नहीं किया जा सकता। लेकिन उसका स्वरूप कमोबेश वही होगा जो अभी है। यानि चुनावी राजनीति से दूर रहने की विवशता के कारण लालू के पास केन्द्र की राजनीति में भी ‘बड़े भाई’ की भूमिका निभाने के अलावा दूसरा विकल्प नहीं है।

केन्द्र में लालू के लिए एक विकल्प कांग्रेस हो सकती थी लेकिन अब की परिस्थिति में नहीं। इसके तीन स्पष्ट कारण हैं। पहला, बिहार के शासन में बने रहने के लिए लालू के लिए नीतीश जरूरी होंगे, कांग्रेस नहीं। दूसरा, लालू और कांग्रेस के रिश्तों में अब पहले जैसी गरमाहट नहीं रह गई है क्योंकि महागठबंधन बनने से पूर्व राहुल की नजदीकियाँ नीतीश से बढ़ने लगी थीं। और तीसरा ये कि लालू मुख्यमंत्री पद के लिए नीतीश के नाम पर तैयार हुए थे, जेडीयू के नाम पर नहीं। अगर नीतीश केन्द्र की राजनीति में जाते हैं तो स्वाभाविक रूप से राजद के महागठबंधन की सबसे बड़ी पार्टी होने के कारण मुख्यमंत्री की कुर्सी पर तेजस्वी ही बैठेंगे। तब उनके लिए ना तो कोई चुनौती होगी, ना लालू होने देंगे। इस तरह हर लिहाज से लालू नीतीश के लिए केन्द्र में भी ‘कृष्ण’ ही बने रहेंगे ताकि बिहार में उनके दोनों ‘तेज’ अभी से कहीं अधिक ‘चैन की बंसी’ बजा सकें।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश की ‘छाया’, लालू की ‘माया’ : बिहार की नई सरकार की दस अहम बातें

  1. बिहार की सबसे ‘युवा’ सरकार

शुक्रवार, 20 नवम्बर को नीतीश कुमार ने रिकॉर्ड पाँचवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। उनके साथ जेडीयू, राजद और कांग्रेस के 28 मंत्रियों ने भी शपथ ली। इन 28 मंत्रियों में जेडीयू-राजद के 12-12 और कांग्रस के 4 मंत्री हैं। मंत्रीमंडल में शामिल मंत्रियों की औसत उम्र मात्र 43 वर्ष है और इस तरह ये बिहार की अब तक की सबसे ‘युवा’ सरकार है। वैसे पाँच विधायक पर एक मंत्री के तय फार्मूला के अनुसार राजद के चार, जेडीयू के दो और कांग्रेस के एक मंत्री का कोटा अभी शेष है।

  1. लालू की जबरदस्त ‘मौजूदगी’

इस सरकार में 64 वर्षीय नीतीश के बाद नंबर दो पर 26 वर्षीय तेजस्वी होंगे। तीन महत्वपूर्ण विभागों के साथ उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाया गया है। तीन अन्य बड़े विभागों के साथ नंबर तीन पर तेजप्रताप को रखा गया है। यानि कैबिनेट में नंबर दो और तीन पर क्रमश: लालू के छोटे और बड़े बेटे होंगे। चौथा पायदान भी लालू के ही खाते में गया है। दोनों ‘तेज’ के बाद शपथ लेने वाले राजद के अब्दुल बारी सिद्दीकी उपमुख्यमंत्री तो नहीं बन पाए लेकिन वित्त मंत्री का ओहदा उन्हें जरूर मिला है। ना रहकर भी ‘मौजूद’ रहना कोई लालू से सीखे।

  1. पुराने सिर्फ चार

ज्यादातर नए चेहरों वाली नीतीश की नई सरकार में उनकी पिछली सरकार के केवल चार मंत्री ही जगह बना पाए। वे चार हैं बिजेन्द्र प्रसाद यादव, ललन सिंह, श्रवण कुमार और जयकुमार सिंह। नीतीश के करीबी और पिछली सरकार के कद्दावर मंत्री विजय कुमार चौधरी को विधान सभा अध्यक्ष बनाने की तैयारी है।

  1. उपमुख्यमंत्री तेजस्वी का ‘अर्थ’

नई सरकार को लेकर सबसे अधिक उत्सुकता इस बात की थी कि उपमुख्यमंत्री कौन होगा। तेजस्वी को इस पद पर बिठाकर लालू ने स्पष्ट कर दिया कि वे अपनी पार्टी में किसी ‘जीतनराम मांझी’ को पैदा नहीं करना चाहते। इसका एक और अर्थ ये है कि परिणाम आने के बाद दलों का जो ‘समीकरण’ बना है उसे देखते हुए निश्चित रूप से नीतीश भी ज्यादा ‘सलाह’ देने की ‘स्थिति’ में नहीं थे। अपने कोटे से अपने परिवार में किसको क्या देना है ये सिर्फ लालू को तय करना था और उन्होंने किया भी।

  1. मंत्रियों के चयन में ‘तालमेल’

जहाँ तक शेष मंत्रियों की बात है उनके चयन में लालू-नीतीश ने वैसा ही ‘तालमेल’ दिखाया जैसा टिकट बंटवारे में दिखाया था। सारी आशंकाओं को किनारे कर इन दोनों ने मंत्रीमंडल में किसी ‘दागी’ या ‘बागी’ को जगह नहीं दी। यही कारण है कि लालू के बेहद करीबी रहे और उनकी पूर्व की सरकारों में अनिवार्य जगह रखने वाले इलियास हुसैन इस सरकार में नहीं हैं। लालू को छोड़कर अपनी प्रतिबद्धता बदलने वाले और नीतीश के पिछले मंत्रीमंडल का महत्वपूर्ण चेहरा रहे श्याम रजक भी अपनी जगह नहीं बना पाए। बता दें कि श्याम रजक ने लालू को ‘पागल’ बता उन्हें ‘पागलखाना’ भेजने की बात कही थी जिसे लालू के लिए भूलना मुश्किल था। कैबिनेट में पीके शाही का ना रहना भी अकारण नहीं है। चारा घोटाले से जुड़े मामले में लालू के लिए मुश्किलें खड़ी करने में शाही की ‘भूमिका’ की बात कही जाती है। एकमात्र अपवाद ललन सिंह रहे। लालू की आपत्ति उन पर भी थी लेकिन नीतीश किसी तरह लालू को मना ले गए। राजद से जदयू में जाकर मंत्री बने रामलषण राम रमण भी कैबिनेट से बाहर हैं। रविदास कोटे में उनकी जगह राजद के शिवचंद्र राम मंत्री बनाए गए।

  1. शरद यादव के लिए ‘इशारा’

जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव के बेहद करीबी नरेन्द्र नारायण यादव का मंत्री ना होना भी चौंकाता है। लेकिन आप पड़ताल करें तो पाएंगे कि लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार के बाद नीतीश द्वारा मुख्यमंत्री पद छोड़ने पर जिन ‘संभावितों’ के नाम विकल्प के तौर पर मीडिया में ‘उछले’ थे या ‘उछाले’ गए थे उनमें एक नाम उनका भी था। शायद उन्हें इसी की ‘सजा’ मिली हो। वैसे यह बात भी गौर करने की है कि शरद यादव के ‘क्षेत्र’ मधेपुरा के चार विधायकों में तीन जेडीयू के हैं लेकिन मंत्री बनाए गए राजद के चन्द्रशेखर। राजनीति के जानकार इसमें शरद यादव के लिए आगे का ‘इशारा’ होने से भी इनकार नहीं कर रहे।

  1. सोशल इंजीनियरिंग

संख्याबल और आशा के अनुरूप नई सरकार पर ‘माय’ समीकरण हावी है। 28 मंत्रियों में 7 यादव और 4 मुस्लिम मंत्री हैं। दलित मंत्रियों की संख्या 5 है। यानि रामविलास और मांझी की राजनीति पर सावधानी से नज़र रखी गई है। शेष मंत्रियों में 3 कुशवाहा और एक कुर्मी जाति से हैं। इनके अतिरिक्त 4 अति पिछड़े और 4 अगड़े मंत्री हैं। अगड़ों में 2 राजपूत और 1-1 ब्राह्मण और भूमिहार हैं। महिला मंत्रियों की संख्या 2 है। ये हैं जेडीयू की कुमारी मंजु वर्मा और राजद की अनिता देवी।

  1. किस जिले से कितने

जिलों को मिले प्रतिनिधित्व की बात करें तो वैशाली और दरभंगा से सबसे ज्यादा 3-3 मंत्री बने हैं। नालंदा, सारण, समस्तीपुर और रोहतास के हिस्से 2-2 मंत्री आए हैं। मुजफ्फरपुर, मधुबनी, गया, जहानाबाद, बक्सर, पश्चिम चम्पारण, शेखपुरा, जमुई, मुंगेर, बेगूसराय, पूर्णिया, सुपौल, सहरसा और मधेपुरा से 1-1 मंत्री हैं। पटना समेत 18 जिले प्रतिनिधित्व से वंचित रह गए।

  1. पाँच सौभाग्यशाली

ये जानना भी दिलचस्प होगा कि 28 मंत्रियों में 18 पहली बार मंत्री बने हैं और इन 18 में भी 5 ऐसे हैं जो पहली बार विधायक बनने के साथ मंत्री बने हैं। वे सौभाग्यशाली पाँच विधायक हैं तेजस्वी, तेजप्रताप, आलोक मेहता, विजय प्रकाश और अनिता देवी। पाँचों राजद के हैं।

  1. वाया विधान परिषद

मुख्यमंत्री के अतिरिक्त जेडीयू के ललन सिंह तथा कांग्रेस के कोटे से मंत्री बने अशोक चौधरी और मदन मोहन झा विधान परिषद के सदस्य हैं।

अंत में एक नज़र मंत्रियों की पूरी सूची और उनके विभाग पर :

नीतीश कुमार, जेडीयू : मुख्यमंत्री (सामान्य प्रशासन, गृह, निगरानी आदि), तेजस्वी प्रसाद यादव, राजद : उपमुख्यमंत्री (पथ-निर्माण, भवन-निर्माण, पिछड़ा-अतिपिछड़ा विभाग), तेजप्रताप यादव, राजद (स्वास्थ्य, लघु सिंचाई और पर्यावरण), अब्दुल बारी सिद्दीकी, राजद (वित्त), बिजेन्द्र प्रसाद यादव, जेडीयू (ऊर्जा), राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, जेडीयू (जल संसाधन एवं योजना विकास), अशोक चौधरी, कांग्रेस (शिक्षा एवं आईटी), श्रवण कुमार, जेडीयू (ग्रामीण विकास एवं संसदीय कार्य), जय कुमार सिंह, जेडीयू (उद्योग एवं विज्ञान प्रौद्योगिकी), आलोक कुमार मेहता, राजद (सहकारिता), चंद्रिका राय, राजद (परिवहन), अवधेश कुमार सिंह, कांग्रेस (पशुपालन), कृष्णनंदन प्रसाद वर्मा, जेडीयू (पीएचईडी एवं विधि), महेश्वर हजारी, जेडीयू (नगर विकास), अब्दुल जलील मस्तान, कांग्रेस (उत्पाद, मद्यनिषेध और निबंधन), रामविचार राय, राजद (कृषि), शिवचंद्र राम, राजद (कला-संस्कृति), मदन मोहन झा, कांग्रेस (राजस्व एवं भूमि सुधार), शैलेश कुमार, जेडीयू (ग्रामीण कार्य विभाग), कुमारी मंजू वर्मा, जेडीयू (समाज-कल्याण), संतोष कुमार निराला, जेडीयू (एस-एसटी क्ल्याण), अब्दुल गफूर, राजद (अल्पसंख्यक कल्याण), चन्द्रशेखर, राजद (आपदा प्रबंधन), खुर्शीद उर्फ फिरोज अहमद, जेडीयू (गन्ना उद्योग), मुनेश्वर चौधरी, राजद (खान एवं भूतत्व), मदन सहनी, जेडीयू (खाद्य एवं उपभोक्ता संरक्षण), कपिलदेव कामत, जेडीयू (पंचायती राज), अनिता देवी, राजद (पर्यटन) एवं विजय प्रकाश, राजद (श्रम-संसाधन)।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या है इस्लामिक स्टेट (आईएस) और कौन है अबू बकर अल बगदादी ?

‘फैशन’ और ‘फैंटेसी’ का पर्याय फ्रांस आज लहूलुहान है। मुंबई के 26/11 हमलों की तर्ज पर बीते शुक्रवार को पेरिस में सात अलग-अलग स्थानों पर हुए सिलसिलेवार हमले के बाद पूरे देश में आपातकाल लागू है। इन हमलों में 158 लोग मारे गए और 300 से ज्यादा घायल हुए जिनमें 100 की हालत अत्यंत गंभीर बताई जाती है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद फ्रांस पर ये सबसे बड़ा हमला है। 1940 के बाद पहली बार ‘फैशन की राजधानी’ कर्फ्यू में कराह रही है। इस नृशंस घटना को ‘आईएस’ के आत्मघाती हमलावरों ने अंजाम दिया।

आतंक का पर्याय बन चुका ‘आईएस’ यानि ‘इस्लामिक स्टेट’ आज की तारीख में दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी संगठन है। इस चरमपंथी इस्लामिक संगठन को इससे पूर्व ‘आईएसआईएस’ यानि ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया’ के नाम से जाना जाता था। अरबी भाषा में इस संगठन का नाम है “अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम”। हिन्दी में इसका अर्थ होगा – “इराक एवं शाम का इस्लामी गणराज्य”। शाम सीरिया का प्राचीन नाम है।

आईएसआईएस ने सबसे पहले 2014 में इराक के मोसूल और तिकरीत शहरों समेत बड़े हिस्से पर कब्जा कर दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा था। इराक और सीरिया में सक्रिय इस जेहादी समूह का गठन अप्रैल 2013 में हुआ। इस संगठन की अगुआई अबू बकर अल बगदादी कर रहा है। 29 जून 2014 को उसने खुद को समूचे इस्लामिक जगत का ‘खलीफा’ घोषित किया और मुस्लिम आबादी वाले विश्व के ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों को सीधे अपने राजनीतिक नियंत्रण में लेना उसके संगठन का लक्ष्य बन गया। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए बगदादी ने सबसे पहले ‘लेवेन्त’ कहे जाने वाले इलाके को अपने अधिकार में लेने का अभियान चलाया जिसके तहत जॉर्डन, इजरायल, फिलिस्तीन, लेबनान, कुवैत, साइप्रस और दक्षिणी तुर्की का कुछ भाग आता है।

माना जाता है कि बगदादी का जन्म उत्तरी बगदाद के समारा में 1971 में हुआ। 2003 में अमेरिका की अगुआई में हुए आक्रमण के बाद इराक में भड़के विद्रोह में वह शामिल हुआ और 2010 में इराकी अल कायदा के नेता के तौर पर उभरा। बगदादी युद्ध का अत्यंत कुशल रणनीतिकार और जेहादियों को अपने व्यक्तित्व से प्रभावित करने वाला कमांडर माना जाता है। प्रारम्भ में इस्लामिक स्टेट अल कायदा का ही एक घटक था लेकिन बगदादी के कारण धीरे-धीरे वह उससे ज्यादा आकर्षक, उससे ज्यादा प्रभावी और उससे ज्यादा खतरनाक हो गया। आज बगदादी के इशारे पर काम करने वाले लड़ाकों की संख्या दस हजार से ज्यादा है।

आईएस की गुरिल्ला फौज में इराक और अरब जगत के इस्लामिक कट्टरपंथियों के अलावे चेचेन्या, पाकिस्तान और यूरोपीय देशों ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी आदि के इस्लामिक कट्टरपंथी लड़ाके हैं। भारत के कुछ मुस्लिम युवाओं के भी आईएस में शामिल होने की खबरें आई हैं। इराक में इतनी तेजी से आईएस का प्रभुत्व बढ़ने के पीछे एक बड़ा कारण अमेरिकी आक्रमण के बाद इराकी सेना की ताकत और उसके मनोबल में भारी गिरावट भी रहा। वहाँ की सेना की कमर इस कदर टूट चुकी थी कि आईएस के लड़ाकों के सामने वो बेबस नजर आई। आईएस ने बड़ी आसानी से इराकी शहरों पर कब्जा किया, इराकी सेना के हथियारों से अपनी ताकत बढ़ाई और लूटपाट से अकूत दौलत भी अर्जित की। वहाँ के तेल के कुओं पर कब्जा करने से उसकी आर्थिक ताकत में बेहिसाब इजाफा हुआ। आज यह दुनिया का सबसे अमीर आतंकी संगठन है और एक अनुमान के मुताबिक इसका बजट दो अरब डॉलर का है।

फ्रांस की इस घटना से पहले भी आईएस के आतंक और उसकी बर्बरता के कई दृश्य दुनिया के सामने आ चुके हैं। आज दुनिया के ज्यादातर देश आईएस और उसके जैसे अन्य आतंकी संगठनों की जद में हैं। लेकिन ये सिक्के का केवल एक पहलू है। इस सिक्के का दूसरा पहलू अमेरिका जैसे पूंजीवादी देशों की दोहरी नीतियां हैं। आप इतिहास पलट कर देखें तो पाएंगे कि अपने आर्थिक साम्राज्य के विस्तार के लिए अमेरिका जैसे देशों ने ऐसे आतंकी संगठनों को कई बार शह दी है। जब तक उनका स्वार्थ सधता रहा तब तक आईएस जैसे संगठन और अबू बकर अल बगदादी जैसे नेता उनके लिए ‘अच्छे’ जेहादी रहे और जब ऐसे संगठनों की मह्त्वाकांक्षा उनके रास्ते आ गई तो वे ‘बुरे’ हो गए।  अभी हाल तक इस्लामिक स्टेट के जेहादी लड़ाके अमेरिकी, ब्रिटिश, फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों और अरब देशों में सउदी अरब और कुवैत जैसे उनके टट्टुओं की शह पर सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद का तख्तापलट करने की खातिर वहाँ जारी गृहयुद्ध में भाग ले रहे थे। आज अगर आईएस इतना ‘खराब’ है तो कल तक उसमें ये देश कौन सी ‘खूबी’ देख रहे थे..?

पूंजी का आतंक हथियार के आतंक से हरगिज कम नहीं। आज दुनिया इन दोनों आतंकों के बीच पिस रही है। ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत में पहले पहल हथियार लेकर नहीं आई थी। उसका उद्देश्य शुरू में केवल व्यापार था। ज्यों-ज्यों उसका स्वार्थ बढ़ता गया, व्यापार के साथ हथियार जुड़ता गया। आईएस जैसे संगठनों को हम जरूर जड़ से खत्म करें लेकिन दुनिया भर में अलग-अलग चेहरों के साथ और पहले से ज्यादा फैल चुकी ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ को ढूँढ़कर उनकी नापाक नीतियों का भी हिसाब करें। तभी ये दुनिया रहने लायक बन सकेगी और बनी रहेगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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