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वृद्धाश्रम में रहने को विवश हैं गांधीजी के सबसे प्रिय पोते..!

कहने को हमारा देश महात्मा गांधी के दिखाए रास्ते पर चल रहा है पर उनके परिवार को देखने की फुरसत आज किसी को नहीं है। सुनकर शायद हैरानी हो आपको पर राष्ट्रपिता के सबसे प्रिय पोते वृद्धाश्रम में रहने को विवश हैं। जी हाँ, कभी महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी की गोद में खेले कनु रामदास गांधी पिछले एक सप्ताह से अपनी पत्नी सहित दिल्ली-फरीदाबाद बॉर्डर स्थित गुरु विश्राम वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। पर उनका हालचाल पूछने ना राज्य सरकार की ओर से कोई गया है, ना केन्द्र सरकार की ओर से और ना ही पिछली तीन पीढ़ियों से ‘गांधी’ उपनाम इस्तेमाल करने वाले परिवार और उनकी पार्टी की ओर से।

एमआईटी से शिक्षा प्राप्त कर नासा में काम कर चुके कनु गांधी इसके लिए किसी को दोषी नहीं ठहराते और ना ही गुजरात छोड़कर यहाँ आने का कारण खुलकर बताते हैं। लेकिन यह जरूर कहते हैं कि वो किसी के आगे मदद के लिए हाथ नहीं फैला सकते। सरल स्वभाव के वयोवृद्ध कनु कहते हैं कि “मेरी गलती है कि मैं भीख मांगने से शर्माता हूँ। प्रधानमंत्री वर्धा के सेवाश्रम गए थे, मैंने उन्हें घूम-घूम कर वहाँ के हालात दिखाए थे, उन्होंने मुझसे कहा था कि आप जब चाहें मेरे पास आ सकते हैं, आपके लिए कुछ करूँगा, लेकिन मैं नहीं गया, क्योंकि मुझे हाथ फैलाना पसंद नहीं।”

महात्मा गांधी के बेटे रामदास के बेटे कनु 20 साल की उम्र में गांधीजी की मदद करने सेवाग्राम चले गए थे। बाद के दिनों में वो नासा गए। 40 साल अमेरिका में रहकर भारत लौटे कनु आज अपने नासा में बीते दिनों को याद कर वो भावुक हो उठते हैं। वो कहते हैं कि “मैं याद करता हूँ कि मैंने कैसे काम किया था और आज यह क्या हो गया। मैं अपनी पत्नी की हालत देखता हूँ तो रो पड़ता हूँ।”

कनु गांधी के वृद्धाश्रम आने के बाद से यहाँ ‘आम’ लोगों का आना बढ़ गया है लेकिन किसी ‘खास’ के पैर यहाँ नहीं पड़े। वृद्धाश्रम के मालिक विश्राम मानव बिल्कुल सही कहते हैं कि “यह पूरे देश के लिए शर्म की बात है कि गांधीजी के पोते इस हाल में हैं। मुझे लगता है कि नेताओं से ज्यादा आम लोगों को उनकी कद्र है और वह उनसे मिलने आते हैं।“ ऐसे में कनु गांधी की पत्नी अपना दर्द भला कैसे छिपाएं..? वो यह कहने से खुद को नहीं रोक पातीं कि जिस देश की कल्पना लेकर वापस आए थे, देश वैसा नहीं है।

बहरहाल देखते हैं कि महात्मा गांधी के नाम के बिना जिन नेताओं के भाषण पूरे नहीं होते वे कनु गांधी के लिए कब और क्या करते हैं..! कनु गांधी, जिन्हें हाथ फैलाना पसंद नहीं पर चाहते हैं कि लोग उनकी इस प्रकार से मदद करें कि (उम्र के इस पड़ाव पर भी) उनकी ‘मजबूती’ का इस्तेमाल हो।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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तस्लीमुद्दीन ने कहा ‘दारू की बोतल’ से बाहर निकलें नीतीश..!

राजद सांसद और पूर्व केन्द्रीय मंत्री मोहम्मद तस्लीमुद्दीन ने बिहार में बढ़ती आपराधिक घटनाओं को लेकर आज कुछ ऐसा कह दिया जिसकी उम्मीद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने हरगिज ना की होगी। खासकर तब जब कि राजद स्वयं उसी सरकार का हिस्सा है और उपमुख्यमंत्री स्वयं राजद सुप्रीमो के सुपुत्र हैं। बहरहाल, संदर्भ सीवान में दैनिक हिन्दुस्तान के ब्यूरो चीफ राजदेव रंजन की हत्या का था। तस्लीमुद्दीन ने इस बाबत सीधा नीतीश पर हमला बोल दिया। उन्होंने कहा कि बिहार में ‘जंगलराज’ कायम हो गया है। यहाँ पत्रकार भी सुरक्षित नहीं हैं। अगर राज्य में अपराध रोकना है तो नीतीश को दारू (शराब) की बोतल (शराबबंदी) से बाहर निकलना होगा।

तस्लीमुद्दीन ने कथित जंगलराज के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को जिम्मेदार बताते हुए कहा कि “सुशासन बाबू की सरकार में रोज सरेआम हत्याएं हो रही हैं। राज्य में अपराधियों का बोलबाला है और सरकार का अपराध पर कोई लगाम नहीं है।” राजद के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने भी तस्लीमुद्दीन के ही सुर में सुर मिलाया। उन्होंने कहा कि “बिहार की स्टेयरिंग नीतीश कुमार के हाथ में है, उन्हें अपराध पर लगाम लगाना चाहिए। राज्य में हत्या और अपराध की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं।”

जब साथी के बोल ऐसे हों तो भला विपक्ष चुप कैसे रहे..? बिहार भाजपा के अध्यक्ष मंगल पांडेय ने कहा कि विपक्ष होने के नाते भाजपा चुप नहीं बैठेगी। अब पार्टी सड़क पर उतरकर अपना विरोध जताएगी। उधर ‘हम’ के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ने नीतीश सरकार को हर मोर्चे पर विफल बताते हुए यहाँ तक कह डाला कि बिहार में ‘जंगलराज’ नहीं, ‘महाजंगलराज’ की शुरुआत हो चुकी है।

बहरहाल, विपक्ष की आलोचना तो समझ में आती है लेकिन राजद नेताओं के बदले सुर समझ से परे हैं। दिलचस्प पहलू यह भी है कि ये नेता उसी राजद के हैं जिसको लेकर विपक्ष ‘जंगलराज’ की बात करता है और जिससे गठबंधन के बाद से नीतीश लगातार निशाने पर हैं..!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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सिविल सेवा में कोसी और मैथिली का परचम

संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा में इस साल कोसी और मैथिली ने अपना परचम लहराया है। सिविल सेवा हेतु चुने गए अभ्यर्थियों में ऋषभ कुमार झा (सहरसा), गोविन्द झा (सहरसा), संतोष कुमार (सुपौल) और आदित्य आनंद (मधेपुरा) ने क्रमश: 162वां, 236वां, 692वां और 863वां स्थान हासिल किया है। वहीं मैथिली विषय से सफल अभ्यर्थियों की बात करें तो इस विषय से कुल 18 अभ्यर्थी सफल हुए हैं।

162वें स्थान पर चुने गए सहरसा के ऋषभ कुमार झा स्थानीय कायस्थ टोला वार्ड नं. 29 निवासी और राजेन्द्र मिश्र महाविद्यालय के प्राध्यापक डॉ. किशोर नाथ झा एवं किरण झा के छोटे पुत्र हैं। ऐच्छिक विषय के रूप में मैथिली को चुनने वाले ऋषभ ने अपने पहले प्रयास में ही ये सफलता हासिल की है। सहरसा से ही सफल होने वाले और 236वें स्थान पर चुने गए गोविन्द झा का वैकल्पिक विषय मानवशास्त्र था। उनके पिता महेश झा मधेपुरा के मुरहो हाईस्कूल से सेवानिवृत्त हैं। वहीं 692वां स्थान पाने वाले सुपौल के होनहार छात्र संतोष कुमार के पिता किसान हैं।

863वें स्थान के लिए चुने गए मधेपुरा के आदित्य कुमार आनंद ने यह सफलता अपने पाँचवें प्रयास में पाई है। उल्लेखनीय है कि उन्होंने पिछले साल यूपीएससी में 980वां स्थान हासिल किया था। आदित्य फिलहाल रेलवे विभाग में ट्रेनिंग ले रहे हैं। 863वें रैंक के साथ इस बार उन्हें कस्टम विभाग मिलने की उम्मीद है।

ये तो हुई कोसी के सपूतों की बात। अब बात करें मैथिली विषय से सफल अभ्यर्थियों की। इस विषय से इस साल 18 अभ्यर्थी सफल हुए हैं। इन अभ्यर्थियों में सहरसा के ऋषभ (162वां स्थान), सुपौल के संतोष (692वां स्थान) और मधेपुरा के आदित्य (863वां स्थान) के अतिरिक्त अंजनी कुमार झा (165वां स्थान), रौशन कुमार (352वां स्थान), सोनम कुमार (626वां स्थान), कुमार गौरव (831वां स्थान) तथा पहली बार चुनी गई महिला अभ्यर्थी रजनी झा (591वां स्थान) शामिल हैं। उत्तर प्रदेश के अमित कुमार आनंद ने भी मैथिली को विषय बनाया था। उन्हें 763वां स्थान मिला है।

इस बार के परिणाम से कोसी के होनहारों ने अपनी मिट्टी का मान बढ़ाने के साथ-साथ मैथिली के लिए भी उम्मीद जगा दी। ऋषभ, संतोष और आदित्य ने कोसी के साथ-साथ मैथिली का झंडा भी बुलंद किया। मैथिली से 18 अभ्यर्थियों का सफल होना इस विषय के सुखद भविष्य का संकेत है।

चलते-चलते ये भी बता दें कि यूपीएससी की परीक्षा में इस साल बिहार से 77 अभ्यर्थी सफल हुए हैं जबकि पिछले साल यहाँ से 88 अभ्यर्थी सफल हुए थे। पर बिहार के लिए अच्छी ख़बर ये रही कि टॉप टेन में इस बार यहाँ के दो अभ्यर्थी हैं। पिछली बार केवल एक अभ्यर्थी ने टॉप टेन में जगह बनाई थी।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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केजरीवालजी, आप ही क्यों नहीं खोल देते कांग्रेस-मोदी रिश्ते का ‘राज’?

दिल्ली के मुख्यमंत्री आदत से मजबूर हैं या सुर्खियों में बने रहने के लिए ऐसा करते हैं पर कई बार वो कुछ ऐसा बोल जाते हैं जिसके निहित अर्थ और गंभीरता को वो या तो समझते ही नहीं या फिर तब समझते हैं जब देर हो चुकी होती है। अगस्ता वेस्टलैंड मुद्दे पर अरविन्द केजरीवाल का आज का ट्वीट कुछ ऐसा ही है जिसमें उन्होंने कहा है कि “गांधी परिवार के पास मोदीजी के कुछ राज हैं। इसलिए मोदीजी कभी गांधी परिवार के खिलाफ कदम नहीं उठाते।”

इससे पहले अरविन्द केजरीवाल अगस्ता वेस्टलैंड वीवीआईपी हेलीकॉप्टर सौदे को लेकर कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के बीच सांठगांठ का आरोप लगाते हुए सोनिया को गिरफ्तार करने की चुनौती प्रधानमंत्री मोदी को दे चुके हैं। उनकी पार्टी (आप) ने बीते शनिवार को सोनिया गांधी की गिरफ्तारी की मांग करते हुए प्रदर्शन किया था।

बता दें कि अगस्ता वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) के शासनकाल में खरीदे गए थे और पिछले महीने इस सौदे पर इटली की एक अदालत के फैसले में सोनिया गांधी का नाम आया था। जिसके बाद से वो निशाने पर हैं। हालांकि संसद में इस हेलीकॉप्टर घोटाले पर कांग्रेस ने कहा है कि टेंडर के मापदंड में जो बदलाव किए गए थे वो भाजपा की अटल बिहारी सरकार के समय हुए थे।

गौरतलब है कि अगस्ता वेस्टलैंड से वर्ष 1999 में 12 हेलीकॉप्टर खरीदने की बात शुरू हुई थी और विभिन्न चरणों से गुजरने के बाद 2005 में ये सौदा हुआ था। लेकिन 2012 में जब इस सौदे में रिश्वत दिए जाने की ख़बर आई तो तत्कालीन रक्षामंत्री एके एंटनी ने माना कि ऐसा हुआ है और इसकी जांच सीबीआई और ईडी को सौंप दी।

बहरहाल, समय के साथ सत्य सामने आ ही जाएगा। लेकिन क्या केजरीवाल ये बताने का कष्ट करेंगे कि मोदीजी के तथाकथित ‘राज’ के बारे में ऐसी कौन सी ‘आकाशवाणी’ हुई जो पूरे देश में केवल उन्होंने सुनी और अब उसे ‘नि:शुल्क’ प्रसारित कर रहे हैं..? एक संवैधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का बिना किसी ‘तथ्य’ के इस तरह की बात करना अत्यन्त आपत्तिजनक और निन्दायोग्य है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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ये क्या, उपमुख्यमंत्री के सरकारी विज्ञापन से मुख्यमंत्री ही गायब..!

केन्द्र के किसी भी विभाग का विज्ञापन हो और उसमें विभागीय मंत्री के साथ प्रधानमंत्री की तस्वीर ना हो। या फिर किसी भी राज्य का विभागीय विज्ञापन हो और उसमें मुख्यमंत्री मौजूद ना हों ऐसा अमूमन नहीं होता। परम्परा के साथ-साथ शिष्टाचार का तकाजा भी यही है कि ऐसे विज्ञापनों में प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री की मौजूदगी हो। सच यही है कि काम चाहे किसी भी विभाग का क्यों ना हो उस विभाग के मंत्री प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री के प्रतिनिधि के तौर पर वो काम कर रहे होते हैं। ऐसे में ये मर्यादा से कहीं आगे लगभग बाध्यता है या होनी चाहिए कि उस विभाग के विज्ञापन या प्रचार-प्रसार में सरकार के मुखिया की तस्वीर हो। पर बिहार में ऐसा नहीं हो रहा।

जी हाँ, बिहार में एक सड़क परियोजना के लोकार्पण से संबंधित सरकारी विज्ञापन में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की तस्वीर ही गायब है। सरैया-मोतीपुर सड़क परियोजना के लोकार्पण से संबंधित पूरे पेज वाले इस विज्ञापन में तेजस्वी की बड़ी तस्वीर छपी है जबकि नीतीश इससे नदारद है। बता दें कि इस विभाग के मंत्री लालू के सुपुत्र और बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव हैं।

बहरहाल, तेजस्वी के इस विज्ञापन ने विपक्ष को महागठबंधन सरकार पर तंज कसने का एक बड़ा मौका दे दिया है। भाजपा के वरिष्ठ नेता और पूर्व में इसी विभाग के मंत्री रहे नंद किशोर यादव बिना देर किए पूछ बैठे कि क्या सरकार ने नई विज्ञापन नीति अपना ली है?  उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री को वस्तुस्थिति स्पष्ट करना चाहिए।

बहरहाल, राजनीति से अलग हटकर बात करें तो भी जो हुआ उसे हजम करना मुश्किल है। ये ऐसी भूल है जो किसी भी सूरत में नहीं होनी चाहिए थी। बात विभागीय या सरकारी मर्यादा की हो, पद और अनुभव की वरिष्ठता की हो या फिर गठबंधन धर्म की तेजस्वी को ऐसा नहीं करना चाहिए था। और चाहे जिस भी कारण से ऐसा हुआ हो अनुभवी लालू को स्वयं पहल कर तेजस्वी से भूल-सुधार करने को कहना चाहिए। देखा जाय तो लालू ना केवल तेजस्वी बल्कि वर्तमान सरकार के भी ‘अभिवावक’ हैं। उन्हें ये समझना और समझाना ही होगा कि बिहार और सरकार की स्थिरता के लिए ‘महत्वाकांक्षा’ के असमय, अभद्र और अस्वस्थ प्रदर्शन पर रोक लगाना जरूरी है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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अब लालू को ‘क्रीम’ क्यों लगा रहे बाबा रामदेव..?

समय और सत्ता की महिमा अपरम्पार है। ‘रा’ज-योग’ सचमुच भारी है हर ‘योग’ पर। तभी तो एक-दूसरे के विरोधी रहे योगगुरु बाबा रामदेव और बिहार की सत्ता में भागीदार आरजेडी के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव एक-दूसरे के करीब आ गए हैं। अब ना केवल दोनों गले मिल रहे हैं बल्कि बाबा रामदेव को लालू में अपना ‘ब्रांड एम्बेसेडर’ भी दिखने लगा है।

जी हाँ, चौंकिए नहीं। बीते बुधवार की बात है कि बाबा रामदेव दिल्ली में अचानक और वो भी सुबह-सुबह लालू के मौजूदा आवास (शकुंतला फार्महाउस) पर ‘प्रकट’ हुए, उनसे अकेले में बातचीत की और यहाँ तक कि सबके बीच उनके चेहरे पर क्रीम भी लगा डाली। बातचीत का विषय क्या था इस पर दोनों भले ही मौन रहें लेकिन इसके ‘राजनीतिक’ और ‘व्यावसायिक’ दोनों मायने निकाले जा रहे हैं। चलिए बताते हैं कैसे।

बाबा रामदेव के हृदय में ये लालू-प्रेम यूँ ही नहीं उमड़ पड़ा। इसका पहला और स्पष्ट कारण तो ये है कि लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप बिहार के स्वास्थ्य मंत्री हैं। जाहिर है कि बाबा रामदेव के ब्रांड ‘पतंजलि’ के लिए संभावनाओं के कई द्वार वो खोल सकते हैं। बता दें कि पिछले दिनों बाबा रामदेव मुलायम के छोटे भाई और यूपी की अखिलेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री शिवपाल यादव के साथ भी एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे।

बहरहाल, अब दूसरे कारण पर गौर करें। दरअसल कुछ दिनों पहले दिल्ली में हुए श्री श्री रविशंकर के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी मौजूद थे और उनकी ये मौजूदगी योगगुरु को नागवार गुजरी। कारण ये कि दो साल पहले मोदी के चुनाव जीतने और प्रधानमंत्री बनने पर बाबा रामदेव ने दिल्ली में एक कार्यक्रम रखा था और मोदी को खास तौर पर आमंत्रित किया था लेकिन मोदी उस कार्यक्रम में नहीं गए थे।

रामदेव-लालू की मुलाकात पर भाजपा का कहना है कि बाबा रामदेव ना तो भाजपा के सदस्य हैं और ना ही सहयोगी। वो किसी से भी मिल सकते हैं। पर सच यह है कि इस मुलाकात ने योगगुरु और भाजपा के संबंधों में आई खटास को उजागर करने का काम तो किया ही है। जहाँ तक पूरी सच्चाई का प्रश्न है तो इसके बारे में अपने-अपने फन में माहिर दोनों धुरंधर – बाबा रामदेव और लालू – ही कुछ बोल सकते हैं। बाबा रामदेव का लालू के चेहरे पर ‘क्रीम’ लगाना अकारण तो खैर हरगिज नहीं हो सकता।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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नहीं रहे जनसंघ और एबीवीपी के संस्थापक प्रोफेसर बलराज मधोक

डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी के साथ जनसंघ की नींव रखने वाले और अखिल भारतीय छात्र संघ (एबीवीपी) के संस्थापक प्रोफेसर बलराज मधोक नहीं रहे। प्रोफेसर मधोक कुछ समय से बीमार चल रहे थे और पिछले एक महीने से एम्स में भर्ती थे जहाँ आज सुबह नौ बजे उनका निधन हो गया। वक्त की विडंबना देखिए कि अटल बिहारी वाजपेयी और लालकृष्ण आडवाणी के राजनीति में सक्रिय होने से पहले दक्षिणपंथ के सबसे बड़े नेता रहे प्रोफेसर मधोक की मृत्यु की जानकारी मीडिया को केन्द्रीय मंत्री डॉ. हर्षवर्धन के ट्वीट से मिली..! प्रोफेसर बलराज मधोक के कद का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि उनके जनसंघ के अध्यक्ष रहते हुए ही पं. दीनदयाल उपाध्याय पार्टी के राष्ट्रीय महामंत्री रहे थे और 1967 में प्रोफेसर मधोक के निवर्तमान होने पर राष्ट्रीय अध्यक्ष बने थे। ये और बात है कि आज की तारीख में ये बात गिनती के लोगों को पता होगी।

25 फरवरी 1920 को जम्मू-कश्मीर के स्कार्दू इलाके में जन्मे प्रोफेसर बलराज मधोक अपने समय के बड़े शिक्षाविद, विचारक, इतिहासवेत्ता, लेखक और राजनीतिक विश्लेषक थे। 1961 और 1967 में क्रमश: नई दिल्ली और दक्षिण दिल्ली से लोकसभा के सदस्य रहे प्रोफेसर मधोक एबीवीपी के संस्थापक सचिव थे। 1951 में वे भारतीय जनसंघ के प्रथम समन्वयक बने और उन्हें राष्ट्रीय सचिव बनाया गया। 1966 में वे भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष बने। प्रोफेसर मधोक नई दिल्ली के पीजीडीएवी कॉलेज में इतिहास विभाग के प्राध्यापक थे। आरएसएस के लम्बे समय तक प्रचारक रहे प्रो. मधोक ने एक दर्जन से ज्यादा किताबें लिखी थीं और 1947-48 में ‘ऑर्गेनाइजर’ तथा 1948 में ‘वीर अर्जुन’ का सम्पादन भी किया था।

ये जानना दिलचस्प होगा कि प्रोफेसर मधोक के जनसंघ के अध्यक्ष रहते पार्टी अपनी कामयाबी के शीर्ष पर थी। उस समय लोकसभा में जनसंघ के गठबंधन के पास 50 से ज्यादा सीटें थीं। यही नहीं पंजाब में जनसंघ की संयुक्त सरकार बनी थी और उत्तर प्रदेश, राजस्थान सहित देश के आठ प्रमुख राज्यों में जनसंघ मुख्य विपक्षी दल बनने में कामयाब हुआ था।

ये प्रोफेसर मधोक ही थे जिन्होंने सदन में पं. जवाहरलाल नेहरू के सामने बिना किसी लाग-लपेट के पुर्तगालियों से गोवा को आजाद कराने और श्रीराम जन्मभूमि, काशी विश्वनाथ और मथुरा के श्रीकृष्ण मन्दिर को हिन्दुओं को सौंपने जैसे मुद्दों को उठाया था। उस दौर की राजनीति में प्रो. मधोक सम्भवत: एकमात्र ऐसी शख्सियत थे जो पं. नेहरू को राष्ट्रवाद और हिन्दुत्व जैसे विषय पर अपनी बात सुनने को बाध्य कर देते थे। लोकसभा के अस्थायी अध्यक्ष के तौर पर उन्होंने कई बार यादगार भूमिका निभाई थी और देश की सुरक्षा सलाहकार समिति के वे सदस्य भी रहे थे।

आज भाजपा प्रशस्त राजपथ पर खड़ी है पर पार्टी की मौजूदा पीढ़ी लगभग भूल चुकी है कि इस राजपथ का रास्ता जनसंघ की पगडंडियों से निकला है। डालियाँ और शाखाएं लाख इतरा लें पर उनका अस्तित्व तभी तक है जब तक वो अपनी जड़ से जुड़ी हैं। आज जिस ‘वटवृक्ष’ का नाम भाजपा है उसकी जड़ में प्रोफेसर मधोक के जीवन के कई बहुमूल्य वर्ष भी हैं, इसे हरगिज भुलाया नहीं जा सकता।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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रियल एस्टेट कानून आज से लागू, अब बिल्डर नहीं कर पाएंगे मनमानी

केन्द्र सरकार  ने मई दिवस के दिन आमलोगों को एक बड़ा तोहफा दिया। अगर आपने हाल-फिलहाल घर लिया है या लेने की योजना बना रहे हैं तो आपको जानकर विशेष खुशी होगी कि आम उपभोक्ताओं के हितों को संरक्षित करने और बिल्डरों की जवाबदेही बढ़ाने के लिए रियल एस्टेट कानून आज से लागू हो गया। इसके लागू होने के साथ ही बिल्डरों पर नकेल कस जाएगी और ग्राहक ठगे जाने से बच जाएंगे।

इस बहुप्रतीक्षित कानून के तहत बिल्डरों को तय समय के भीतर ग्राहकों को उनका आशियाना देना होगा। अब प्रमोटर और बिल्डर की मनमानी किसी सूरत में नहीं चल पाएगी। इस कानून के तहत सभी आवासीय और कॉमर्शियल प्रोजेक्ट के लिए रियल एस्टेट रेगुलेटर के पास रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य कर दिया गया है और यह नियम ना केवल नई बल्कि चालू परियोजनाओं पर भी लागू होगा।

रियल एस्टेट कानून के तहत एक महत्वपूर्ण प्रावधान ये है कि अब डेवलपर बिना ग्राहक की सहमति के प्रोजेक्ट में कोई बदलाव नहीं कर पाएगा। ग्राहकों की गाढ़ी कमाई के पैसे को सुरक्षित करने के लिए एक अन्य प्रावधान यह जोड़ा गया है कि बिल्डरों को खरीदारों से लिए पैसे का 70% संबंधित प्रोजेक्ट के अकाउंट में ही रखना होगा।

बता दें कि अब सभी राज्यों में रियल एस्टेट अथॉरिटी होगी जहाँ ना केवल बिल्डर बल्कि रियल एस्टेट एजेंट को भी रजिस्ट्रेशन कराना होगा। यही नहीं, कानून के प्रावधानों के अन्तर्गत केन्द्र और राज्य सरकारों को छह महीने के भीतर नियम बनाने होंगे। प्रोजेक्ट के तहत फ्लैटों की समय से डिलीवरी सुरक्षित कराने के लिए प्रस्तावित रियल एस्टेट रेगुलेटर और अपीलीय ट्रिब्यूनल भी एक साल में बन जाएंगे। बता दें कि नियमों का उल्लंघन करने वाले बिल्डरों के लिए भारी जुर्माने के साथ ही तीन साल की सजा का भी प्रावधान है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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अब टिकते नहीं बिहार में नीतीश के पैर..!

इधर लोग नीतीश कुमार के पीएम मैटेरियल होने ना होने पर बहस ही कर रहे हैं और उधर नीतीश बड़ी खामोशी से एक के बाद एक कदम रखते जा रहे हैं। जी हाँ, जेडीयू की कमान विधिवत सम्भालने के बाद वे मिशन 2019 को भी विधिवत शुरू करने जा रहे हैं। शुरुआत आगामी 7 मई को केरल से होगी जहाँ वो जनसभा को संबोधित करेंगे।

केरल के बाद नीतीश झारखंड का रुख करेंगे। वहाँ 10 मई को धनबाद में वो शराबबंदी अभियान के एक कार्यक्रम में शामिल होंगे। बता दें कि बिहार की तर्ज पर वहाँ भी महिलाओं ने उन्हें शराबबंदी के कार्यक्रम को संबोधित करने के लिए बुलाया है।

झारखंड के बाद नीतीश अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र यूपी में दस्तक देंगे। 12 मई को बनारस तो 15 मई को वो लखनऊ में होंगे। इस दौरे में नीतीश यूपी को लेकर अपनी रणनीति को ठोस रूप देने की कोशिश करेंगे।

बता दें कि अभी हाल ही में एनसीपी के नेता शरद पवार ने नीतीश कुमार को पीएम मैटेरियल बताया था। इधर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनके उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी ने भी उन्हें इस मुद्दे पर ‘नैतिक’ समर्थन दिया है। कहने की जरूरत नहीं कि अपनी बढ़ती स्वीकार्यता से 2019 को लेकर नीतीश के हौसले इधर और बुलंद हुए हैं। अब हाल ये है कि उनके पैर बिहार में टिक ही नहीं रहे। भाजपा और मोदी के विकल्प के तौर पर खुद को देश भर में पेश करने की खातिर उन्होंने पूरी ताकत झोंक देने की ठान ली है। नीतीश के ‘भारत-दौरे’ पर किसी ने कमाल की चुटकी ली कि मोदी (अपने विदेश-दौरों के कारण) भारत में नहीं दिखते और अब नीतीश बिहार में नहीं दिखेंगे..!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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मिशन 2019 में अभी से क्यों जुटे नीतीश..?

लोकसभा चुनाव में अभी तीन साल बाकी हैं लेकिन जेडीयू ने नीतीश कुमार को अभी से मैदान में उतार दिया है। पटना में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में एक ओर अध्यक्ष के तौर पर नीतीश की ताजपोशी की गई तो दूसरी ओर गैरभाजपा दलों का एका करने संबंधी प्रस्ताव पारित किया गया। संदेश स्पष्ट है कि नीतीश अब औपचारिक रूप से राहुल गांधी, मुलायम सिंह यादव, ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल जैसे प्रधानमंत्री पद के दावेदार नेताओं के क्लब में शामिल हो गए।

ये स्पष्ट है कि बिहार की महागठबंधन सरकार में शामिल कांग्रेस गैरभाजपा विकल्प के तौर पर कभी नीतीश के नाम पर सहमत नहीं हो सकती और ना ही राजद समेत अन्य दलों ने अभी इस संबंध में अपनी राय खुलकर जाहिर की है। (हाँ, नीतीश को ‘पीएम मैटेरियल’ बताना अलग बात है।) लेकिन नीतीश और उनकी टीम जल्दी में दिख रही है। इस जल्दबाजी से उन्हें दो कारण दिख रहे हैं। पहला यह कि राष्ट्रीय स्तर पर अभी जैसा ‘मोदीमय’ माहौल है उसमें उनके विकल्प के तौर पर आक्रामक होकर आने का साहस और तैयारी किसी के पास नहीं दिख रही और इसका फायदा नीतीश और उनकी टीम उठाना चाहती है। दूसरा ये कि बिहार चुनाव के परिणाम के बाद नीतीश की जैसी करिश्माई छवि बनी है उस पर वक्त की धूल-मिट्टी पड़ने से पहले ही उसे भुना लेने की कोशिश की जा रही है।

नीतीश कुमार मंझे हुए नेता हैं और राजनीति की बिसात पर गोटियां बिठाना उन्हें खूब आता है। उन्हें पता है कि बड़े लक्ष्य के लिए केवल नारेबाजी से काम नहीं चलता, धरातल पर भी बहुत कुछ कर के दिखाना होता है। यही कारण है कि एक ओर वो संघमुक्त भारत का नारा दे रहे होते हैं तो दूसरी ओर शराबबंदी को राष्ट्रीय अभियान बनाने की बात करते हैं। महिला आरक्षण और स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड जैसे फैसलों को नीतीश अब राष्ट्रीय फलक पर अपने विकास मॉडल के तौर पर पेश करना चाहते हैं।

यूपी चुनाव से पहले अजित सिंह के रालोद और बाबूलाल मरांडी के जेवीएम को मिलाकर अपना ‘कैनवास’ बड़ा करने की कोशिश नीतीश के मिशन 2019 का ही हिस्सा है। यूपी में उनकी सफलता या असफलता से भारत की भावी राजनीति की तस्वीर बहुत हद तक साफ हो जाएगी, इसमें कोई दो राय नहीं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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