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क्यों हैं सलमान बॉलीवुड के ‘सुल्तान’?

‘मैंने प्यार किया’ का शर्मीला-सा प्रेम आज बॉलीवुड का ‘सुल्तान’ है। वो एक बार पूछ ले ‘हम आपके हैं कौन’ तो हिन्दी फिल्मों की सफलता के मापदंड बदल जाते हैं। जी हाँ, कोई ‘दबंगई’ करके भी आपका प्यार पा ले तो वो सलमान ही हो सकते हैं। बॉलीवुड की खान तिकड़ी के इस खान में ना आमिर वाली संजीदगी है, ना शाहरुख वाला जुनून, फिर ऐसा क्या है उसमें कि हर अगली फिल्म के साथ उसकी ‘सल्तनत’ और बड़ी हो जाती है? इस सवाल का जवाब अगर पाना हो तो आपको ‘सुल्तान’ देखनी चाहिए जिसने रिलीज के महज तीसरे दिन 100 करोड़ से ज्यादा की कमाई कर इतिहास रच दिया है।

आज के दर्शक जो पहले से ज्यादा व्यस्त और चतुर हैं और जिनके पास मनोरंजन के लिए सैकड़ों चैनल और हजारों साइट्स हैं, उन्हें सिनेमा हॉल तक खींच लाना और उनके पॉकेट से पैसे निकलवा लेना कतई साधारण बात नहीं। ऐसे में सुल्तान ‘सलमान’ की दसवीं फिल्म है जिसने 100 करोड़ का आंकड़ा पार किया है। 100 करोड़ के क्लब में शामिल उनकी इससे पहले की नौ फिल्में हैं – दबंग (2010), रेडी (2011), बॉडीगार्ड (2011), एक था टाइगर (2012), दबंग-2 (2012), जय हो (2014), किक (2014), बजरंगी भाईजान (2015) और प्रेम रतन धन पायो (2016)।

हिन्दी फिल्मों में 100 करोड़ क्लब को सलमान क्लब कह दें तो कोई बड़ी बात नहीं होगी और इसकी वजह बेहद साफ है। सलमान ने जहाँ ये कमाल दस बार दिखाया है वहीं शाहरुख छह, अक्षय कुमार और अजय देवगन पाँच-पाँच, आमिर खान चार और रितिक रोशन केवल तीन ही बार ऐसा कर पाए हैं।

बहरहाल, सलमान की फिल्म ‘सुल्तान’ ने भारत में तीन दिनों में कुल 105 करोड़ की कमाई की है। इसने पहले दिन 36.54 करोड़, दूसरे दिन 37.50 करोड़ और तीसरे दिन 31.50 करोड़ कमाए और इसके साथ ही कई रिकॉर्ड ध्वस्त कर डाले। ये फिल्म सलमान की ऐसी पहली बड़ी फिल्म बन गई है जिसने तीन दिनों में 105 करोड़ की कमाई की। इससे पहले ‘बजरंगी भाईजान’ ने तीन दिनों में 102 करोड़ और प्रेम रतन धन पायो ने तीन दिनों में 101 करोड़ की कमाई की थी। 2016 की बात करें तो सुल्तान से पहले ‘एयरलिफ्ट’ के नाम तीन दिनों में सबसे ज्यादा कमाई का रिकार्ड था। ‘एयरलिफ्ट’ ने तीन दिन में 83.50 करोड़ कमाए थे।

स्पोर्ट्स पर बनने वाली फिल्मों की बात करें तो उस लिस्ट में भी ‘सुल्तान’ सबसे ऊपर दर्ज हो गई है। फरहान अख्तर की ‘भाग मिल्खा भाग’ ने पहले तीन दिन में 52.44 करोड़ की कमाई की थी और प्रियंका चोपड़ा की ‘मैरी कॉम’ की पहले तीन दिन की कमाई 12.7 करोड़ थी।

सबसे खास बात ये कि इस फिल्म को केवल सलमान के प्रशंसक ही नहीं आम दर्शक और फिल्म समीक्षकों ने भी अच्छा बताया है। ऐसे लोगों की भी कमी नहीं जो इसे सलमान खान के कैरियर की सबसे बेहतरीन फिल्म मान रहे हैं। इसमें बहुत मेहनत से बनाई गई सलमान की बॉडी है, थिरकने को मजबूर कर दने वाले गाने हैं, आकर्षक अनुष्का हैं, रणदीप हुड्डा की ट्रेनिंग है, सांस रोक देने वाले फाइट सीन्स हैं, पर बॉलीवुड के सारे मसालों के बीच भी जो चीज आपको सबसे ज्यादा छूती है वो है सलमान का अभिनय। ‘बजरंगी भाईजान’ से सलमान ने जो सफर शुरू किया वो ‘सुल्तान’ से आगे बढ़ा है। इस फिल्म ने तीन दिन में कितने कमाए उससे अधिक महत्व सलमान के प्रशंसकों के लिए इस बात का है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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“मुझसे बड़ा एक्टर और कौन है”: लालू प्रसाद यादव

मौजूदा दौर के मंझे हुए अभिनेता इरफान खान कल ईद के दिन अपनी फिल्म ‘मदारी’ के प्रमोशन के लिए पटना में थे। इस दौरान उन्होंने आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से मुलाकात की। अपने खास अंदाज के लिए मशहूर लालू ने इस मौके पर इरफान को ईद की बधाई देने के साथ-साथ उन्हें फिल्म हिट करने के ‘टिप्स’ भी दिए और आखिर में अपने इस दावे से इरफान को लाजवाब कर दिया कि मुझसे बड़ा एक्टर और कौन है?

बहरहाल, फिल्म में अपने किरदार को ध्यान में रख इरफान लालू से मिलने डमरू के साथ आए थे। मजे की बात यह कि लालू ने उस डमरू को बजाया भी। एक तो ईद का माहौल और उस पर मस्तमौला लालू। उन्होंने ये भी कह ही डाला कि मुझ पर अगर फिल्म बनी तो मैं ही मेन रोल में रहूँगा। मुझसे अच्छी एक्टिंग कोई नहीं कर सकता। हाँ, अभिनेत्री कौन रहेगी, इसका फैसला इरफान कर सकते हैं।

लालू ने इरफान को ‘टिप्स’ देने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने इरफान को सलाह देते हुए कहा कि आम आदमी को फोकस करती हुई फिल्मों में काम करिए, फिल्म सुपर हिट हो जाएगी। देश में आम आदमी सबसे ज्यादा परेशान है। इतने कानून बने, लेकिन आम आदमी को न्याय नहीं मिला। केन्द्र सरकार ने भी उनकी उपेक्षा की है। जातीय जनगणना रिपोर्ट में हर तरह से ‘पिछड़े’ आम आदमी का खुलासा नहीं किया गया है, जबकि गाय-भैंस-बकरी सबकी संख्या बता दी गई है।

बता दें कि इरफान की फिल्म ‘मदारी’ 22 जुलाई को रिलीज होने वाली है। इरफान ने बताया कि इस फिल्म में एक व्यक्ति के ‘जमूरा’ से ‘मदारी’ बनने की कहानी दिखाई गई है, जिसमें एक आम आदमी के संघर्ष की झलक देखी जा सकती है। इसमें किसी राज्यविशेष पर फोकस नहीं है बल्कि यह फिल्म सिस्टम की खामियों को दिखाती है।

चलते-चलते:

अब ये लालूजी से कौन पूछे कि जब अपने ऊपर बनने वाली फिल्म में हीरो वो खुद रहेंगे तो अभिनेत्री का फैसला उन्होंने इरफान पर क्यों छोड़ा? राबड़ीजी राज्य चला सकती हैं तो क्या उनकी सरपरस्ती में अभिनेत्री का किरदार नहीं निभा सकतीं?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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मोदी मंत्रिमंडल में फेरबदल: किसका बढ़ा कद, किससे छिना पद

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कल अपने मंत्रिमंडल में बहुप्रतीक्षित फेरबदल करते हुए कैबिनेट में 19 नए मंत्रियों को शामिल किया। इसके साथ ही कई मंत्रियों के विभागों में भी बड़ा फेरबदल किया गया। स्मृति ईरानी से मानव संसाधन विकास मंत्रालय का कार्यभार लेकर उन्हें कम महत्व वाले कपड़ा मंत्रालय की जिम्मेदारी दे दी गई वहीं अब तक पर्यावरण मंत्रालय में स्वतंत्र प्रभार के राज्य मंत्री प्रकाश जावड़ेकर का कद बढ़ाते हुए उन्हें यह अहम मंत्रालय सौंपा गया।
कैबिनेट में उठापटक के बाद संचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री रविशंकर प्रसाद भी ताकतवर बनकर उभरे हैं। सदानंद गौड़ा से लेकर उन्हें कानून मंत्रालय की अतिरिक्त जिम्मेदारी दी गई है। गौड़ा अब सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय का काम देखेंगे। वहीं शहरी विकास मंत्री एम वैंकेया नायडू को सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया है। हालांकि उनसे संसदीय कार्य मंत्रालय की जिम्मेदारी वापस ले ली गई है। यह जिम्मेदारी अब रसायन एवं उर्वरक मंत्री अनंत कुमार संभालेंगे।
एक अन्य बदलाव के तहत नरेन्द्र सिंह तोमर को ग्रामीण विकास मंत्री बनाया गया है। इस विभाग को अब तक हरियाणा के जाट नेता चौधरी बीरेन्द्र सिंह देख रहे थे। अब बीरेन्द्र सिंह इस्पात मंत्रालय देखेंगे। पहले यह मंत्रालय तोमर के पास था। वहीं भाजपा के वरिष्ठ नेता यशवंत सिन्हा के पुत्र जयंत सिन्हा को वित्त मंत्रालय से हटाकर नागरिक उड्डयन राज्य मंत्री बनाया गया है। इस पद पर अब तक महेश शर्मा थे। शर्मा अब सिर्फ संस्कृति एवं पर्यटन मंत्रालय की जिम्मेदारी संभालेंगे।
मंत्रिमंडल में शामिल किए गए नए चेहरों में विजय गोयल, एमजे अकबर, एसएस अहलूवालिया, अनुप्रिया पटेल (अपना दल) और रामदास अठावले (आरपीआई) के नाम महत्वपूर्ण हैं। विजय गोयल को युवा मामलों एवं खेल मंत्रालय में स्वतंत्र प्रभार का राज्य मंत्री बनाया गया है। असम का ‘सिंहासन’ मिलने से पहले इस मंत्रालय को सर्वानंद सोनोवाल सम्भाल रहे थे। एमजे अकबर को विदेश राज्य मंत्री बनाया गया है। बता दें कि विदेश मंत्रालय में वीके सिंह एक अन्य राज्य मंत्री हैं।
मंत्रिमंडल विस्तार में प्रधानमंत्री मोदी ने दलित चेहरों को खास तवज्जो दी है। आरपीआई के अठावले (महाराष्ट्र) के अतिरिक्त कल शामिल किए गए मंत्रियों में अजय टम्टा (उत्तराखंड), अर्जुन राम मेघवाल (राजस्थान), कृष्णा राज (उत्तर प्रदेश) और रमेश सी जीगाजिनगी (कर्नाटक) भी दलित समुदाय से आते हैं। वैसे इस विस्तार में मोदी की नज़र उन राज्यों पर भी रही है जहाँ आगे चुनाव होने हैं। यही कारण है कि उत्तर प्रदेश, गुजरात और मध्य प्रदेश से जहाँ तीन-तीन वहीं राजस्थान से चार मंत्री कैबिनेट में शामिल किए गए हैं।
कल के फेरबदल में पाँच मंत्रियों को बाहर का रास्ता भी देखना पड़ा है। कैबिनेट से बाहर किए गए पाँच मंत्री हैँ – रसायन और उर्वरक मंत्री निहाल चंद, मानव संसाधन राज्य मंत्री रामशंकर कठेरिया, आदिवासी कल्याण राज्य मंत्री मनसुख भाई वसावा और जल संसाधन राज्य मंत्री सांवर लाल जाट। वहीं हटाए जाने की तमाम अटकलों के बावजूद नजमा हेपतुल्ला, कलराज मिश्र और गिरिराज सिंह अपना मंत्रीपद बचाने में सफल रहे।
अन्त में एक बार फिर बात स्मृति ईरानी की। ‘महत्वहीन’ कपड़ा मंत्रालय दिए जाने के बाद जहाँ ये माना जा रहा है कि उनका कद घटा दिया गया है, वहीं ये कयास लगाने वालों की भी कमी नहीं है कि स्मृति को 2017 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधान सभा चुनाव में भाजपा के प्रचार का चेहरा बनाया जा रहा है और इसी कारण उन्हें यह ‘महत्वहीन’ मंत्रालय दिया गया है ताकि वो प्रचार के लिए ज्यादा वक्त निकाल सकें।
मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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ढाका के हमलावरों को ‘इस्लामी आतंकी’ कहें : तस्लीमा नसरीन

अपने निर्भीक लेखन के लिए दुनिया भर में खास पहचान रखने वाली बांग्लादेश की निर्वासित लेखिका तस्लीमा नसरीन ने ट्विटर के माध्यम से ढाका हमले को लेकर कई अहम सवाल उठाए हैं। ढाका के हमलावरों को लेकर उन्होंने सीधा सवाल किया कि मीडिया उन्हें ‘गनमैन’ क्यों लिख रहा है? उन्हें ‘इस्लामी आतंकी’ क्यों नहीं कहा जा रहा? उन्होंने लोगों को मारने और उनमें दहशत फैलाने से पहले ‘अल्लाहू अकबर’ का नारा लगाया था। क्या उन्हें ‘इस्लामी आतंकी’ नहीं कहा जाना चाहिए था?

तस्लीमा ने इस तर्क को भी खारिज किया कि गरीबी किसी को आतंकवादी बना देती है। तस्लीमा ने अपने ट्वीट में लिखा कि ढाका हमले का आतंकी निब्रस इस्लाम तुर्की होप्स स्कूल, नार्थ साउथ और मोनाश यूनिवर्सिटी में पढ़ा था। उसका ब्रेन वॉश इस्लाम के नाम पर किया गया और वह आतंकी बन गया। ढाका हमले के सभी आतंकी अमीर परिवार से थे और सभी ने अच्छे स्कूलों में पढ़ाई की थी। कृपया यह मत कहिए कि गरीबी और निरक्षरता लोगों को इस्लामिक आतंकवादी बनाती है – “All Dhaka terrorists were from rich families, studied in elite schools. Please do not say poverty & illiteracy make people Islamic terrorists.”

तस्लीमा ने आगे बड़ी बेबाकी से कहा कि इस्लामिक आतंकवादी बनने के लिए गरीबी, निरक्षरता, तनाव, अमेरिकी विदेश नीति और इस्राइल की साजिश की जरूरत नहीं है। आपको इस्लाम की जरूरत है। ढाका की नृशंस घटना से आहत तस्लीमा ने यहाँ तक कहा कि इस्लाम को शांति का धर्म कहना बंद करें – “For humanity’s sake please do not say Islam is a religion of peace. Not anymore.”

बता दें कि बीते शुक्रवार को आतंकियों ने ढाका के एक रेस्टोरेन्ट में हमला कर 20 विदेशी नागरिकों की हत्या गला रेतकर कर दी थी जिनमें भारत की बेटी तारिषी जैन भी शामिल थी। गौरतलब है कि इन हमलों की जिम्मेदारी इस्लामिक स्टेट (आइएस) और अलकायदा ने ली है और इस लोमहर्षक घटना के पीछे जिन दो स्थानीय आतंकी संगठनों का हाथ होने की बात कही जा रही है उनमें से एक ‘अंसार-अल-सलाम’ को अलकायदा का समर्थन प्राप्त है और दूसरा ‘जमात-उल-मुजाहिद्दीन’ आइएस से जुड़ा हुआ है। वैसे  बांग्लादेश के अनुसार इस नृशंस घटना को अंजाम देने में पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई भी शामिल है।

यह भी जानें कि पिछले कुछ समय से बांग्लादेश में धार्मिक चरमपंथियों की संख्या में जबरदस्त इजाफा हुआ है। लेखकों, प्रकाशकों, धार्मिक अल्पसंख्यकों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और वहाँ काम कर रहे विदेशी मूल के लोगों पर लगातार हमले हो रहे हैं। बीते दो दिनों में ही दो हिन्दू पुजारियों पर भी हमला हुआ और एक पुजारी की हत्या भी कर दी गई। दुख और हैरत की बात तो यह है कि ये सब कुछ ‘इस्लाम’ के नाम पर हो रहा है। क्या ‘इस्लाम’ की इससे बड़ी तौहीन भी कुछ हो सकती है?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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नीतीश और मांझी को क्यों करीब ला रहे लालू..?

राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने कल अपने बड़े बेटे और स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप के आवास पर इफ्तार पार्टी दी जिसमें भाजपा को छोड़ बिहार की तमाम पार्टियों के दिग्गज शामिल हुए। वैसे तो इस पार्टी में हाई प्रोफाइल लोगों की कोई कमी ना थी लेकिन सबकी निगाह लगी थी एकदम पास-पास बैठे मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी पर। इसमें भी खास बात यह कि इन दोनों दिग्गजों को एक साथ बिठाकर इनके रिश्तों पर जमी बर्फ को हटाने का काम स्वयं लालू ने किया। जाहिर है कि यह हल्के में लेने की बात नहीं हो सकती।

बता दें कि नीतीश और मांझी की केवल कुर्सियां ही साथ-साथ नहीं थीं बल्कि दोनों बातचीत करते भी दिखे। यही नहीं इस मौके पर मांझी ने नीतीश की तारीफ भी कि और यहाँ तक कहा कि आज मैं जो कुछ भी हूँ वो उन्हीं की वजह से हूँ। हालांकि बाद में उन्होंने यह कहकर बचने की कोशिश की कि राजनीति अपनी जगह है और शिष्टाचार अपनी जगह। इसका कोई और मतलब ना निकाला जाए। नीतीश ने भी कहा कि ऐसे आयोजनों में लोग एक-दूसरे से मिलते रहते हैं और बातें भी होती हैं। बात-मुलाकात पर किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए।

एक तरफ नीतीश और मांझी थोड़ा बच-बचाकर बोल रहे थे, जो स्वाभाविक भी था, तो उधर लालू अपने अंदाज मे बोल रहे थे कि जीतनराम मेरे पुराने सहयोगी और भाई हैं। हमलोग खुद इनकी इफ्तार पार्टी में गए थे और इन्हें आमंत्रित किया था। गौरतलब है कि मांझी ने रविवार को इफ्तार पार्टी दी थी जिसमें लालू अपने उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी के साथ पहुँचे थे। यहाँ याद दिला देना जरूरी है कि विधान सभा चुनाव के समय भी लालू मांझी को साथ लेना चाहते थे लेकिन नीतीश के ऐतराज के कारण ये सम्भव नहीं हो सका था।

कहने की जरूरत नहीं कि राजनीति में कोई स्थायी दोस्त या दुश्मन नहीं होता। स्वयं लालू और नीतीश की दोस्ती इसका एक बड़ा उदाहरण है। आज अगर लालू मांझी और नीतीश को करीब ला रहे हैं तो ये अकारण हरगिज नहीं। फिलहाल इसके तीन कारण तो स्पष्ट दिख रहे हैं। पहला यह कि मांझी को महागठबंधन का हिस्सा बनाकर लालू भाजपाविरोधी राजनीति में अपनी ‘प्रासंगिकता’ बनाए चाहते हैं। दूसरा, इससे महादलितों के बीच उनकी पैठ बढ़ेगी और तीसरा कि नीतीश से रिश्ता बिगाड़े बिना वे महागठबंधन के भीतर की राजनीति में खुद को और मजबूत कर सकेंगे। बहरहाल, सुलझे-अनसुलझे रिश्तों का ये ताना-बाना आगे क्या शक्ल अख्तियार करता है, ये देखना सचमुच दिलचस्प होगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप    

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मानसून को किसकी नज़र लगी बिहार में ?

बिहार में मानसून समय से तो आया लेकिन जाने क्यों रूठ गया! आलम यह है कि बादल आते तो हैं लेकिन बिना बरसे चले जाते हैं! मानसून को जैसे किसी की नज़र लग गई। मायूस किसान की नज़रें आसमान को ताक-ताक कर निराश हो चली हैं। उनकी चिन्ता है कि बरही में मानसून की वर्षा नहीं होने के कारण वे खेती शुरू नहीं कर पा रहे हैं। बारिश के अभाव में खेतों में नमी नहीं है और ऐसे में जुताई टेढ़ी खीर है उनके लिए।

बता दें कि बिहार में अब तक एक चौथाई से भी कम बारिश हुई है। राज्य के 24 जिलों में अब तक इतनी बारिश भी नहीं हुई है कि धान के बीज डाले जाएं। एक आँकड़े के मुताबिक बिहार में अब तक 168.8 मिलीलीटर बारिश होनी चाहिए थी लेकिन हुई है मात्र 128.8 मिलीलीटर। गौरतलब है कि पिछले साल इस दौरान दो लाख तेरह हजार हेक्टेयर में धान की बुआई हो चुकी थी, जबकि इस साल अभी तक दो लाख दस हजार हेक्टेयर में ही धान की बुआई हो सकी है, जो कि लक्ष्य से 38 प्रतिशत कम है।

कहा जाता है कि आर्द्रा नक्षत्र में झमाझम बारिश होने के बाद ही धान की उपज अच्छी होती है लेकिन राज्य में अभी तक इस नक्षत्र में कहीं भी ऐसी बारिश नहीं हुई। कुल 27 नक्षत्रों में 9 नक्षत्र वर्षा ऋतु के होते हैं और इनमें से तीन गुजर चुके हैं लेकिन किसानों की मायूसी है कि दूर ही नहीं हो रही। हाँ, मक्के की खेती कमोबेश ठीक कही जा सकती है।

पटना मौसम विज्ञान केन्द्र के अनुसार राज्य के भोजपुर, रोहतास, कैमूर, भागलपुर, पूर्वी चम्पारण, लखीसराय सहित कई ऐसे जिले हैं जिनमें इस साल आवश्यकता से कम बारिश हुई है। दूसरी ओर मधुबनी, सुपौल, औंरंगाबाद, बक्सर और अररिया जैसे कुछ जिलों में औसत से कुछ ज्यादा बारिश हुई है। मानसून की यही अनियमितता हर साल बिहार की कमर तोड़ देती है और उसे बाढ़ और सुखाड़ का सामना एक साथ करना पड़ जाता है।

बहरहाल, राज्य सरकार ने मानसून का रुख देखते हुए सभी जिलाधिकारियों को बाढ़-सुखाड़ के खतरे को लेकर अलर्ट कर रखा है। किसानों को डीजल सब्सिडी जारी रखी गई है। आपदा प्रबंधन एवं कृषि विभाग के साथ-साथ मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी स्थिति पर नज़र रख रहे हैं। वैसे मानसून के लिहाज से अगले कुछ दिन बड़े महत्वपूर्ण हैं। क्या पता मानसून की नाराज़गी दूर ही हो जाय!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

 

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सातवें वेतन आयोग की सौगातें, जानिए खास बातें

केन्द्रीय कैबिनेट ने सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों को मंजूरी दे दी है। इन सिफारिशों के तहत केन्द्रीय कर्मचारियों के वेतन और भत्तों में 23.5 प्रतिशत तक की बढ़ोतरी की जाएगी। इसमें बेसिक सैलरी में 14.27 प्रतिशत और भत्तों में 67 प्रतिशत का इजाफा शामिल है। जबकि पेंशनधारकों को 24 प्रतिशत की बढ़ोतरी दी जाएगी। खास बात यह कि इन सिफारिशों में वेतन में 3 प्रतिशत सालाना बढ़ोतरी को भी बरकरार रखा गया है।

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें 1 जनवरी 2016 से लागू होंगी। इसका अर्थ यह है कि कर्मचारियों का बढ़ा हुआ वेतन 1 जनवरी से जोड़ा जाएगा और उसका भुगतान एरियर के रूप में होगा। इन सिफारिशों के लागू होने से 50 लाख कर्मचारी और 58 लाख पेंशनधारी सीधे तौर पर लाभान्वित होंगे।

वेतन आयोग की इन सिफारिशों से सरकार के खजाने पर करीब 1.02 लाख करोड़ रुपए का सालाना बोझ बढ़ेगा, जबकि वित्त मंत्री अरुण जेटली ने 2016-17 के आम बजट में पे-कमीशन लागू करने के लिए 70,000 करोड़ रुपए का प्रावधान ही किया था। यह भी जानें कि इस 1 लाख करोड़ रुपए के बोझ में से 28,450 करोड़ रुपए से अधिक का बोझ रेलवे बजट और शेष 73,450 करोड़ रुपए का बोझ आम बजट पर आएगा।

बता दें कि वेतन आयोग ने कर्मचारियों के लिए न्यूनतम 18,000 रुपए प्रतिमाह और अधिकतम (कैबिनेट सचिव और इस स्तर के अधिकारी के लिए) 2,25,000 रुपए की सिफारिश की थी। इसके अनुसार अब तक 90,000 रुपए प्रति माह कमाने वाले अधिकारी को अब ढाई गुना से ज्यादा वेतन मिलेगा। पर सचिवों की अधिकार प्राप्त समिति इससे भी संतुष्ट नहीं है। समिति ने 18,000 रुपए के स्थान पर करीब 23,500 रुपए और 2,25,000 रुपए के स्थान पर 3,25,000 रुपए करने की सिफारिश की है।

सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों का एक दिलचस्प तथ्य यह है कि इसमें बेसिक पे मामले में पिछले सात दशक में सबसे कम वृद्धि की सिफारिश की गई है। इसके बावजूद यह भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 0.7 प्रतिशत है।

 ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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अपनी शर्म छिपाने को रूबी का चेहरा ढंक रहा सिस्टम

कल गिरफ्तार की गई रूबी राय को आज एडीजे निगरानी की अदालत में पेश किया गया। एडीजे ने उम्मीद के विपरीत उसे जमानत देने की बजाय 14 दिनों के लिए जेल भेज दिया। अब रूबी को 8 जुलाई तक न्यायिक हिरासत में बेउर जेल में रहना होगा। बिहार विद्यालय परीक्षा समिति ने इंटर आर्ट्स टॉपर रूबी राय का रिजल्ट कल ही रद्द कर दिया था।

बता दें कि कल बोर्ड कार्यालय में रूबी को विशेषज्ञों के सामने साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था। मीडिया समेत सारे लोग मानकर चल रहे थे कि 3 और 11 जून की तरह 25 जून को भी वह ‘सच का सामना’ करने नहीं आएगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सबको चौंकाते हुए रूबी ना केवल बोर्ड कार्यालय पहुँची बल्कि लगभग दो घंटे तक तमाम सवालों का सामना भी किया। ये अलग बात है कि वह एक भी सवाल का संतोषजनक जवाब नहीं दे पाई और तुलसीदास पर निबंध लिखने को कहे जाने पर केवल ‘तुलसीदास प्रणाम’ लिख पाई। बहरहाल, साक्षात्कार के दौरान ही बोर्ड ने पुलिस को सूचना दे दी थी। अंदर साक्षात्कार चल रहा था और बाहर पुलिस रूबी का इंतजार कर रही थी। कार्यालय से बाहर निकलते ही उसे गिरफ्तार कर लिया गया।

इस पूरे प्रकरण में एक बड़ा सवाल यह उठता है कि रूबी को गिरफ्तार करने का ‘हासिल’ क्या है? यह तो वही बात हुई कि ‘ब़ाजार’ को पहले खिलौनों से भर दो, ‘खिलौने’ के ‘व्यापारियों’ को सरकारी प्रश्रय दो और फिर उन’ खिलौनों’ से खेलने वाले ‘बच्चों’ को जेल भेज दो। आज रूबी को जेल भेजकर पुलिस, प्रशासन और न्यायपालिका अपनी पीठ ऐसे ठोक रहे हैं जैसे उन्होंने सबसे बड़े गुनाहगार को उसके अंजाम तक पहुँचा दिया हो। जबकि सच यह है कि इस पूरे प्रकरण में सबसे अधिक नुकसान किसी का हुआ है तो वह रूबी राय ही है। जैसी सामाजिक अवमानना और मानसिक यंत्रणा वो इस वक्त झेल रही होगी वो शब्दों से परे है। और उसके कैरियर की ‘बलि’ तो पहले चढ़ ही चुकी है।

हैरत की बात तो यह कि इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी हमारे पॉलिटिशियन अपनी ‘जात’ नहीं छोड़ रहे। भाजपा ये बताने में लगी है कि लालकेश्वर और उनकी पत्नी उषा सिन्हा जेडीयू से जुड़े रहे हैं तो उपमुख्यमंत्री तेजस्वी सोशल मीडिया पर ये साबित करने में लगे हैं कि बच्चा राय के गहरे ताल्लुकात भाजपा के केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह से हैं। यहाँ सभी नेताओं से एक सीधा-सा सवाल यह है कि क्या लालकेश्वर, उषा सिन्हा और बच्चा राय जैसों का ‘जुर्म’ किसी पार्टी या नेता से जुड़े होने के कारण कम या ज्यादा हो जाएगा? और रही बात नेताओं की तो ऐसे भ्रष्टाचारी समाज में पनपेंगे ही नहीं अगर उनका हाथ ऐसे लोगों के सिर पर ना हो। मजे की बात तो यह है कि हमाम में सब नंगे हैं ये सबको पता है पर मीडिया को ‘बाइट’ देने में कोई किसी से पीछे नहीं रहना चाहता।

यहाँ एक और दिलचस्प वाकये से आपको वाकिफ कराना जरूरी है और वो यह कि रूबी को ले जाते वक्त पुलिस ने मीडिया की मौजूदगी को देखते हुए उसे ‘गमछा’ ओढ़ने को कहा पर रूबी ने इनकार कर दिया। उसने बड़े साहस के साथ कहा कि “अगर गमछा ही लगाना होता तो आज बोर्ड ऑफिस नहीं आती। मैं बच्चा राय थोड़े ही हूँ कि गमछा ओढ़ाए जा रहे हैं। मैं ऐसे ही मीडिया के सामने जाउँगी।” इसके बावजूद पुलिस ने उसे डांटकर गमछा ओढ़ा दिया। क्या आपको नहीं लगता कि अपनी शर्म छिपाने को रूबी का चेहरा ढंक रहा है सिस्टम?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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भारत को नहीं मिली एनएसजी की सदस्यता

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के अथक प्रयास और अमेरिका समेत ज्यादातर देशों के समर्थन के बावजूद एनएसजी (परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह) में भारत की एंट्री नहीं हो पाई। भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप को कहना ही पड़ा कि ‘एक देश के अड़ियल रवैये’ की वजह से भारत की कोशिश नाकाम हो गई। कहने की जरूरत नहीं कि वो ‘अड़ियल देश’ हमारा पड़ोसी चीन है। बहरहाल, आज सियोल में एनएसजी की दो दिवसीय वार्षिक बैठक के बाद यह स्पष्ट हो गया कि भारत की सदस्यता के लिए नियमों में छूट नहीं दी जाएगी।

एनएसजी ने आज के अपने बयान में साफ तौर पर कहा कि एनपीटी (परमाणु अप्रसार संधि) अन्तर्राष्ट्रीय अप्रसार व्यवस्था की धुरी है और वह इसके पूर्ण और प्रभावी क्रियान्वयन का समर्थन करता है। हाँ, इस बैठक में इस बात पर सहमति जरूर बनी कि एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं करने वाले देशों को इस समूह में शामिल करने के मुद्दे पर बातचीत जारी रहेगी। बता दें कि भारत अपने राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखते हुए एनपीटी पर हस्ताक्षर किए बिना एनएसजी की सदस्यता चाहता है।

बहरहाल, चीन ने एनएसजी में भारत का रास्ता रोकने में केन्द्रीय भूमिका निभाई। भारतीय उपमहाद्वीप में अपना वर्चस्व बनाने के लिए चीन की हर संभव कोशिश रही है कि भारत को एनएसजी की सदस्यता नहीं मिले। इस संदर्भ में अपने भारतविरोधी अभियान के तहत निर्लज्ज चीन यहाँ तक कहता रहा है कि अगर भारत को एनएसजी की सदस्यता दी जाती है तो पाकिस्तान को भी सदस्यता मिले। जी हाँ, चीन ने उस पाकिस्तान की वकालत की जिसकी पहचान आतंकवाद को प्रश्रय और आतंकियों को आश्रय देने वाले देश के रूप में जगजाहिर हो चुकी है। हालांकि ये अलग बात है कि एनएसजी में पाकिस्तान की एंट्री को लेकर कोई चर्चा ही नहीं हुई।

भारत को एनएसजी की सदस्यता ना मिलना नि:संदेह निराशाजनक है लेकिन सम्भावनाओं के सारे द्वार बंद हो गए हों, ऐसा नहीं है। चीन, ब्राजील, ऑस्ट्रिया, न्यूजीलैंड, आयरलैंड और तुर्की जैसे कुछ देशों को छोड़ दें तो शेष देश आज कमोबेश भारत के पक्ष में खड़े दिख रहे हैं जिनमें अमेरिका, फ्रांस, जापान और मैक्सिको जैसे देश शामिल हैं। निश्चित रूप से इसे भारत की कूटनीतिक सफलता के रूप में देखा जाना चाहिए। हाल के वर्षों में भारत ने अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर अपनी जैसी हैसियत बनाई है और एनएसजी की आज की बैठक के बाद जो माहौल बना है उसे देखते हुए भारत का रास्ता अधिक समय तक रोके रखना चीन के बूते में नहीं दिखता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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फादर्स डे पर इससे बड़ी खुशी क्या होगी एक पिता के लिए..!

मोहना सिंह, अवनी चतुर्वेदी और भावना कंठ – ये तीनों देश की पहली तीन बेटियां हैं जिन्हें भारतीय वायुसेना में फाइटर पायलट के रूप में शामिल किया गया। बता दें कि भारतीय वायुसेना सेना का पहला अंग है जिसने महिलाओं को बराबरी का दर्जा देते हुए इन तीन महिला अधिकारियों को लड़ाकू विमान उड़ाने वाले दस्ते में शामिल किया। इसके साथ ही भारत दुनिया का 21वां देश हो गया जिसके फाइटर पायलट की टुकड़ी में महिलाएं शामिल हैं।

देश को गौरव से भर देने वाली इन तीन बहादुर बेटियों में मोहना राजस्थान के झुनझुन की, अवनी मध्य प्रदेश के सतना की और भावना बिहार के दरभंगा की रहने वाली हैं। गौरतलब है कि रक्षा मंत्रालय ने महिला पायलटों को लड़ाकू विमान उड़ाने के दस्ते में शामिल करने की मंजूरी पिछले वर्ष दी थी। इसके बाद इन तीन कैडेटों ने लड़ाकू पायलट का प्रशिक्षण लेने की सहमति प्रकट की थी। इन तीनों को पहले चरण में डेढ़ सौ घंटे से भी अधिक समय तक विमान उड़ाने का प्रशिक्षण दिया गया है। अब अगले छह महीनों में इन्हें उन्नत लड़ाकू विमान हॉक पर गहन प्रशिक्षण दिया जाएगा।

बहरहाल, अब बात बिहार की बेटी भावना की जिसने टॉपर घोटाले का दंश और अपमान झेल रहे इस राज्य को एक बार फिर सिर उठाने का स्वर्णिम मौका दिया। ऐसे में उस पिता की खुशी का अंदाजा लगाइए जिसकी बेटी को सिर्फ बिहार ही नहीं पूरा देश पलकों पर बिठा रहा हो। और उस पर भी जब दिन आज का यानि फादर्स डे का हो तो सोचिए कि वो खुशी कितनी बड़ी हो जाएगी। खास तौर पर उस पिता के लिए जो कभी स्वयं वायुसेना में जाना चाहता हो और आज उसकी बेटी वहाँ पहुँच जाए और वो भी देश की पहली महिला फाइटर पायलट बनकर। क्या किसी पिता के लिए आज के दिन इससे बड़ा उपहार हो सकता है?

भावना का जन्म 1 दिसंबर 1992 को दरभंगा के बाउर गांव में हुआ था। उनके पिता तेज नारायण कंठ इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन में अधिकारी हैं। उन्होंने 1986 में अपनी नौकरी की शुरुआत बरौनी रिफाइनरी से की थी। माँ राधा कंठ घरेलू महिला हैं।

बहुमुखी प्रतिभा की धनी भावना ने 10वीं की परीक्षा बरौनी रिफाइनरी टाउनशिप से पास करने के बाद 12वीं करने कोटा का रुख किया और वहाँ इंजीनियरिंग की तैयारी की। 2014 में उन्होंने इलेक्ट्रॉनिक्स में इंजीनियरिंग किया और टाटा कंसलटेंसी में उनका कैंपस प्लेसमेंट भी हो गया पर नियति ने भावना के लिए कुछ और तय कर रखा था। उनका इंतजार तो भारतीय वायुसेना को था। तभी तो भावना वायुसेना के शॉर्ट सर्विस कमीशन यानि एसएससी के लिए चुन ली गईं और फ्लाइंग ऑफिसर बन गईं। उसके बाद की कहानी तो खैर अब भारतीय वायुसेना के इतिहास में नया अध्याय जोड़ चुकी है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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