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और अब पाकिस्तान ने दी एटमी हमले की धमकी

बेशर्मी की पराकाष्ठा देखिए, इधर उड़ी पर आतंकी हमले के बाद मिले सबूत चीख-चीख कर बोल रहे हैं कि इसमें पाकिस्तान की संलिप्तता थी और उधर उसके विदेश विभाग के प्रवक्ता इस हमले की निन्दा कर रहे हैं। हमले के बाद जारी बयान में पाकिस्तानी प्रवक्ता नफीस जकारिया ने कहा कि भारत ने हमले के तुरंत बाद इसके लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहरा दिया, जबकि इसकी कोई जांच भी नहीं की गई। हम इस दावे को खारिज करते हैं। साथ ही पाकिस्तान इस तरह को हमलों की निन्दा करता है।

खैर, ये पाकिस्तान का पुराना राग है, जो वो अपनी हर कायराना हरकत के बाद अलापता है। लेकिन दोमुंहेपन की हद ये है कि उसके प्रवक्ता जहाँ इन हमलों की ‘निन्दा’ कर रहे हैं, वहीं उसके विदेश मंत्री भारत पर एटमी हमले की धमकी दे रहे हैं। जी हाँ, पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक साक्षात्कार में कहा है कि भारत द्वारा हमला किए जाने की स्थिति में हम अपने रणनीतिक हथियार परमाणु बम के इस्तेमाल से भी नहीं चूकेंगे। गौरतलब है कि यह साक्षात्कार शनिवार रात को उड़ी हमले से ठीक पहले रिकार्ड किया गया था।

इस साक्षात्कार में पाकिस्तान के रक्षामंत्री से भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्तों के मद्देनज़र निकट भविष्य में युद्ध की आशंका पर सवाल पूछा गया था जिस पर उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि तुरंत हमले की आशंका है। हालांकि, अल्लाह ने कुरान में कहा है कि अपने घोड़े हमेशा तैयार रखो। इसलिए हम हर समय बाहरी शक्तियों से अपनी आज़ादी के खतरे के प्रति हमेशा तैयार रहते हैं। इसके आगे उन्होंने जोड़ा कि दुनिया परमाणु ताकत में पाकिस्तान की ‘बादशाहत’ को स्वीकार करती है और साथ ही बड़ी निर्लज्जता से ये भी कह डाला कि हमारे पास ‘जरूरत से ज्यादा’ परमाणु हथियार हैं।

बहरहाल, उड़ी पर हुए घिनौने हमले की निन्दा दुनिया भर में हो रही है। अमेरिका, ब्रिटेन समेत तमाम देशों ने बड़े कड़े शब्दों में इस हमले की निन्दा की और भरोसा दिलाया कि आतंकवाद के खिलाफ जंग में वे हर कदम पर नई दिल्ली का साथ देंगे। परीक्षा की इस घड़ी में आपसी मतभेदों को भूल हमारे देश के तमाम राजनीतिक दल भी एकजुट हैं। सवा सौ करोड़ भारतीय बड़ी अपेक्षा से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर देख रहे हैं। सच यह है कि आतंक के खिलाफ जंग आखिरी दौर में है और अब बात ‘ट्वीट’ से नहीं पाकिस्तान को ‘दो टूक’ जवाब देने से बनेगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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उड़ी की शहादत में सबसे आगे थे बिहार के बेटे

आज सुबह जम्मू-कश्मीर के उड़ी में सेना मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले में सेना के 17 जवान शहीद हो गए। प्राप्त जानकारी के मुताबिक शहीद जवानों में 15 बिहार रेजिमेंट और 2 डोगरा रेजिमेंट के हैं। बिहार रेजिमेंट के शहीद 15 जवानों में से 6 बिहार के सपूत हैं। इन शहीदों को लेकर जहाँ बिहार सहित पूरे देश में गर्वमिश्रित शोक की लहर है, वहीं लोग इनके बारे में जानने को भी आतुर हो रहे हैं। इनके नामों की सूची अभी जारी नहीं की गई है। ‘पाकिस्तान-प्रायोजित’ इस घटना को चार आतंकियों ने अंजाम दिया था जिन्हें हमारे जांबाज जवानों ने मार गिराया।

इस घटना में मारे गए आतंकवादियों के पास से कई ऐसी चीजें मिली हैं जिन पर पाकिस्तान की मार्किंग है यानि वे चीजें पाकिस्तान में बनी हैं। सबूतों के आधार पर माना जा रहा है कि इन आतंकियों का संबंध ‘जैश-ए-मोहम्मद’ से है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस नाजुक मौके पर ट्वीट कर देश को भरोसा दिलाया है कि इस घिनौने हमले के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

बता दें कि पिछले 26 सालों में यह आर्मी बेस पर हुआ सबसे बड़ा हमला है। इस घटना से आहत देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आज स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा कि पाकिस्तान एक आतंकी देश है और उसकी पहचान करके उसे अलग-थलग कर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं बेहद निराश हूँ कि पाकिस्तान आतंकवाद और आतंकी संगठनों को लगातार मदद दे रहा है।

इस घटना के बाद जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी पाकिस्तान पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि इस तरह के वाकयों से राज्य में युद्ध जैसे हालात बनाने की कोशिश की जा रही है। वहाँ के उपमुख्यमंत्री निर्मल सिंह का भी कहना है कि हमारे इलाकों में तनाव पैदा करने के लिए अलगाववादी, आतंकी और पाकिस्तान मिलकर भारत के खिलाफ साजिश कर रहे हैं।

बहरहाल, इस हमले के बाद बिहार के सभी आर्मी कैंप की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि आतंकी हमले के खिलाफ केन्द्र सरकार कड़ी कार्रवाई करे, मैं आतंक के खिलाफ केन्द्र सरकार के समर्थन में खड़ा हूँ। वहीं, आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव आतंकियों के इस कायराना हमले के बाद केन्द्र सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए प्रधानमंत्री मोदी के ‘56 इंच के सीने’ को ‘खोजते’ दिखे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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एक पैर से दुनिया जीतने वाले के लिए कोई जश्न नहीं?

रियो ओलंपिक में साक्षी के कांस्य और सिंधु के रजत पर आप जरूर खुशी से झूम गए होंगे। झूमना भी चाहिए। इन दोनों बेटियों की सफलता पर पूरा देश जश्न मना रहा था। मनाना भी चाहिए। पर क्या हमने रियो में ही स्वर्ण जीतने वाले मरियप्पन थंगावेलू के लिए भी वैसा ही जश्न मनाया? नहीं ना? बता सकते हैं क्यों? क्या इसलिए कि हमारे देश के किसी भी टीवी चैनल ने पैरालंपिक का सीधा प्रसारण नहीं दिखाया? या फिर इसलिए कि पैरालंपिक का आयोजन केवल विकलांग खिलाड़ियों के लिए होता है? अगर ऐसा है तो हमें जरूर जानना चाहिए कि ‘पैरालंपिक’ का ‘ओलंपिक’ से केवल शाब्दिक साम्य ही नहीं है, बल्कि भव्यता और व्यापकता की दृष्टि से भी ये उससे कमतर नहीं। इसे शारीरिक रूप से नि:शक्त खिलाड़ियों का ओलंपिक कहें तो गलत नहीं होगा। आप इसके ‘कैनवास’ का अंदाजा इस बात से लगायें कि इस साल के रियो पैरालंपिक में 176 देशों ने भाग लिया था।

जहाँ तक पैरालंपिक की शुरुआत की बात है, तो आपको बता दें कि 1960 में रोम ओलंपिक खेलों के खत्म होने के एक हफ्ते के बाद अंतर्राष्ट्रीय पैरालंपिक खेलों का आयोजन पहली बार किया गया था। लेकिन 1968 में मेक्सिको ने ओलंपिक के बाद पैरालंपिक खेलों का आयोजन करने से इनकार कर दिया था। आगे चलकर 2001 में इसे नियमित कर दिया गया। अब ओलंपिक की मेजबानी करने वाले देश को पैरालंपिक खेलों के लिए भी दावेदारी करनी पड़ती है। हालांकि ये स्पष्ट कर दें कि ओलंपिक और पैरालंपिक का आयोजन बिल्कुल अलग-अलग संस्थाओं के हाथ में है। इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी और इंटरनेशनल पैरालंपिक कमेटी दोनों अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती हैं।

बहरहाल, अनगिनत मुश्किलों और चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए भारत के मरियप्पन थंगावेलू ने रियो पैरालंपिक 2016 में भारत को पुरुषों की टी-42 हाई जंप में गोल्ड मेडल दिलाया। 21 वर्षीय मरियप्पन ने 1.89 मीटर की छलांग लगाकर भारत को ये ऐतिहासिक सफलता दिलाई। भारत के ही वरुण सिंह भाटी ने 1.86 मीटर की छलांग लगाकर इस इवेंट का कांस्य अपने नाम किया। बता दें कि टी-42 वर्ग में वैसे पैरा एथलीट आते हैं जिनके हाथ या पैर के साइज या मांसपेशियों में अन्तर होता है।

मरियप्पन को हाई जंप का गोल्ड मेडल ऐसे ही नहीं मिल गया। उसके पीछे की वजह है कड़ा संघर्ष। मरियप्पन का जन्म तमिलनाडु के सालेम से 50 किलोमीटर दूर पेरिवादमगट्टी गांव में हुआ था। उनकी माँ गांव में ही सब्जियां बेचकर गुजारा करतीं। पर घोर अभाव के बाद भी नियति को शायद मरियप्पन की और परीक्षा लेनी थी। जब वे पाँच साल के थे तब स्कूल जाते वक्त उनके पैर पर बस चढ़ गई। चोट इतनी गंभीर थी कि उनका दायां पैर पूरी तरह से खराब हो गया।

एक पैर खराब होने पर भी मरियप्पन की स्कूल के दिनों में खेलकूद में काफी रुचि थी और वे खासकर वॉलीबॉल खेला करते। इसी दौरान स्कूल के कोच की नज़र उन पर पड़ी। उन्होंने मरियप्पन को वॉलीबॉल छोड़ हाईजंप ज्वाइन करने की सलाह दी और ट्रेंड किया। जब मरियप्पन 14 साल के हुए तब उन्होंने पहली बार एक स्पोर्ट्स इवेंट में हिस्सा लिया और दूसरे नंबर पर रहे। महत्वपूर्ण बात ये कि इस प्रतियोगिता में उन्होंने नॉर्मल एथलीट्स को कम्पीट किया था।

मरियप्पन को नेशनल लेवल पर सफलता दिलाने का श्रेय कोच सत्यनारायण को जाता है। 18 साल की उम्र में वे ही मरियप्पन को नेशनल पैरा-एथेलेटिक्स चैम्पियनशिप में लेकर आए और इसके बाद की कहानी इतिहास है। आपको बता दें कि 1 नवंबर 2015 को मरियप्पन दुनिया के नंबर वन पैरा हाई जंपर बने और रियो पैरालंपिक में गोल्ड जीतने से पहले भी वे आईपीसी ट्यूनीशिया ग्रैंड प्रिक्स में 1.78 मीटर की स्वर्णिम छलांग लगा चुके हैं।

चलते-चलते:

पैरालंपिक के इतिहास में ये भारत का तीसरा गोल्ड मेडल है। मरियप्पन से पहले मुरलीकांत पेटकर (स्विमिंग) 1972 में और देवेन्द्र झाझरिया (जैवलिन थ्रो) 2004 में भारत के लिए स्वर्ण जीत चुके हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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तीन सर्वे में हिलेरी, एक में ट्रंप आगे

8 नवंबर को अमेरिका के राष्ट्रपति पद के लिए होने वाला चुनाव खासा दिलचस्प हो गया है। अब तक हिलेरी के पक्ष में एकतरफा-सा दिखने वाला मुकाबला अब कड़ा होता जा रहा है। ना केवल अलग-अलग सर्वे में अपने प्रतिदंवंद्वी ट्रंप के ऊपर दिखने वाली हिलेरी की बढ़त कम हो गई है बल्कि एक सर्वे के अनुसार तो ट्रंप हिलेरी से आगे तक निकलने में कामयाब हो गए हैं। जी हाँ, लॉस एंजिलिस टाइम्स/ यूनिवर्सिटी ऑफ साउथ कैरोलिना के ताजा सर्वे में उन्हें हिलेरी पर तीन प्रतिशत की बढ़त मिली है। हालांकि तीन अन्य राष्ट्रीय सर्वेक्षणों में अभी भी हिलेरी आगे चल रही हैं।

डेमोक्रेटिक उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन को पीपीपी (डी) के सर्वे में पाँच, एनबीसी न्यूज सर्वे में छह और मानमाउथ यूनिवर्सिटी के सर्वे में सात प्रतिशत की बढ़त बताई गई है। सभी सर्वेक्षणों पर नजर रखने वाली रियल क्लियर पॉलिटिक्स ने उनकी औसत बढ़त नौ प्रतिशत बताई है। लेकिन ये सभी सर्वेक्षण हिलेरी की लोकप्रियता में गिरावट का भी संकेत दे रहे हैं। गौरतलब है कि इस महीने की शुरुआत में ट्रंप पर उन्हें 13 प्रतिशत की बढ़त मिली थी।

इसके बावजूद हिलेरी की जीत की संभावना प्रबल है। इसका कारण पेंसिल्वेनिया, फ्लोरिडा, ओहायो, आयोवा, नेवादा, न्यू हेम्पशायर, मिशिगन, वर्जीनिया, जॉर्जिया और नार्थ कैरोलिना जैसे मह्तवपूर्ण राज्यों में उनकी बढ़त बरकरार रहना है। इन राज्यों में उन्हें अपने प्रतिद्वंद्वी पर औसत दस प्रतिशत की बढ़त प्राप्त है। वैसे तमाम ‘विरोधों’ और ‘विरोधाभासों’ के बावजूद रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी हासिल करने से लेकर अब तक ट्रंप ने दुनिया के सबसे शक्तिशाली मुल्क की राजनीति में जिस तरह अपनी जगह बनाई है और देश-विदेश में जितनी चर्चा पाई है उससे उनके कटु आलोचक भी हतप्रभ हैं और ये कतई छोटी बात नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘मदर’ ने पूरा किया ‘सिस्टर’ से ‘संत’ का सफर

आज सारी दुनिया एक ऐतिहासिक पल की गवाह बनी। गरीबों और बेसहारा लोगों के लिए जीवन समर्पित करने वाली ‘भारतरत्न’ मदर टेरेसा को वेटिकन सिटी में संत की उपाधि दी गई। ईसाइयों के धर्मगुरु पोप फ्रांसिस ने लगभग एक लाख श्रद्धालुओं की मौजूदगी में उन्हें ‘संत’ की उपाधि से नवाजा। इस दौरान पीटर्स बेसीलिका पर मदर टेरेसा की एक बड़ी तस्वीर लगाई गई थी, जिसमें वह नीचे लोगों की ओर मुस्कराती प्रतीत हो रही थीं। गौरतलब है कि मदर टेरेसा को ‘संत’ की उपाधि उनकी 19वीं पुण्यतिथि से एक दिन पहले दी गई है। अब वो ‘संत मदर टेरेसा ऑफ कोलकाता’ के नाम से जानी जाएंगी।

मदर टेरेसा ने सिस्टर से संत बनने का सफर भारत में पूरा किया था। यहीं से उनकी ममता और करुणा की ज्योति पूरे संसार में फैली। स्वाभाविक है कि इस बेहद खास मौके पर वहाँ भारत का प्रतिनिधित्व हो। लिहाजा भारत की महानतम शख्सियतों में शुमार ‘मदर’ को संत की उपाधि दिए जाने के समय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 12 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ वेटिकन सिटी में मौजूद थीं। केन्द्रीय प्रतिनिधिमंडल के अलावा दिल्ली और पश्चिम बंगाल से दो राज्यस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी रोम में थे, जिनका नेतृत्व क्रमश: अरविन्द केजरीवाल और ममता बनर्जी ने किया। मिशनरीज ऑफ चैरिटीज की सुपीरियर जनरल सिस्टर मेरी प्रभा के नेतृत्व में देश के विभिन्न हिस्सों से आईं लगभग 50 ननों का एक समूह भी इस समारोह के दौरान मौजूद रहा।

मेसेडोनिया की राजधानी स्कोप्ये में कोसोवर अल्बेनियाई माता-पिता के घर जन्मी मदर टेरेसा का मूल नाम गोंक्जा एग्नेस था। 1928 में महज 18 साल की उम्र में नन बनने की खातिर उन्होंने अपना घर छोड़ दिया था। घर छोड़ने के बाद वो आयरलैंड स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ ब्लेस्ड वर्जिन मेरी (सिस्टर्स ऑफ लोरेटो) के साथ जुड़ गईं। यहाँ उन्हें नया नाम मिला – सिस्टर मेरी और वो कोलकाता के लिए निकल पड़ीं। वर्ष 1931 में वो कोलकाता की लोरेटो एन्टाली कम्यूनिटी से जुड़ीं और लड़कियों के सेंट मेरी स्कूल में पढ़ाने लगीं। बाद में वो प्रिंसिपल बनीं। 1937 के बाद से उन्हें मदर टेरेसा के नाम से पुकारा जाने लगा। कहा जाता है कि 1941 में एक ट्रेन यात्रा के दौरान ईश्वर ने उन्हें गरीबों के लिए काम करने को प्रेरित किया। इसके बाद वो लोरेटो से इजाजत लेकर 1948 में मेडिकल ट्रेनिंग के लिए पटना आईं।

ये कम लोगों को पता है कि मदर टेरेसा ने पटना सिटी में होली फैमिली अस्पताल में मेडिकल ट्रेनिंग ली थी। पटना में ये अस्पताल पादरी की हवेली (सेंट मेरी चर्च) से सटा है। तीन महीनों की ट्रेनिंग के दौरान मदर इस हवेली के एक छोटे से कमरे में रहती थीं। उनकी याद में इस कमरे को अब तक सहेज कर रखा गया है। कहने की जरूरत है कि मदर को संत घोषित किए जाने के बाद ये जगह किसी तीर्थ से कम नहीं होगी। बहरहाल, 1948 के बाद ही मदर टेरेसा ने मिशनरीज ऑफ चैरिटीज की स्थापना की और उसके बाद की कहानी से पूरी दुनिया वाकिफ है। 1979 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था और 1980 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से नवाजा गया था।

मदर टेरेसा को संत की उपाधि दिए जाने के लिए जरूरी था कि वैटिकन मदर टेरेसा से मदद के लिए की गई प्रार्थनाओं के परिणामस्वरूप हुए दो चमत्कारों को मान्यता दे। इस संबंध में स्मरणीय है कि 2002 में पोप ने एक बंगाली आदिवासी मोनिका बेसरा के ट्यूमर ठीक होने को मदर का पहला चमत्कार माना था। इसके बाद 2015 में ब्रेन ट्यूमर से ग्रस्त एक ब्राजीलियन पुरुष के ठीक होने को उनका दूसरा चमत्कार माना गया। दूसरे चमत्कार को मान्यता मिलने के साथ ही उन्हें ‘संत’ घोषित करने का रास्ता साफ हो गया था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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दाना के कंधों पर पत्नी की लाश नहीं, समाज है हमारा

पिछले दिनों भारतीय अखबारों और टेलीविजन चैनलों ने ओडिशा के एक गरीब आदिवासी दाना मांझी की एक ऐसी तस्वीर से हमें रू-ब-रू कराया जो लम्बे समय तक मन और विवेक को सालती रहेगी। वो तस्वीर थी एक विवश और लाचार पति की जिसके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि अपनी पत्नी का मृत शरीर ढोने के लिए किसी गाड़ी या ठेले तक की व्यवस्था कर सके और अस्पताल इतना संवेदनशून्य कि उसने एंबुलेंस मुहैया कराना अपना धर्म नहीं समझा। दाना मांझी के पास कोई विकल्प नहीं था सिवाय इसके कि अपनी पत्नी की लाश अपने कंधे पर उठाए लगभग बारह किलोमीटर की दूरी पैदल तय करे।

टीवी चैनलों पर दाना मांझी को एक चादर में लिपटी हुई लाश को अपने कंधे पर लेकर चलते हुए दिखाए जाने का दृश्य बेहद दर्दनाक था। पत्नी की लाश कंधे पर और साथ में चलती रोती-बिलखती बेटी… फट क्यों नहीं जाता हमारा हृदय! देश की राजधानी दिल्ली में सड़क के किनारे गैंगरेप के बाद लहूलुहान और निर्वस्त्र फेंक दी गई निर्भया हो या दाना के कंधे पर हमेशा के लिए सोई उसकी पत्नी… हमारी आत्मा मर चुकी है, क्या इसमें कोई संशय रह जाता है?

दाना की पत्नी का देहांत टीबी से हुआ था। हम अच्छी तरह जानते हैं कि टीबी आज की तारीख में असाध्य नहीं है और बहुत कम खर्च में इसका इलाज संभव है। अब जरा सोचिए भारत की उस एक तिहाई आबादी के बारे में जो गरीबी रेखा से नीचे है, समय पर टीबी का इलाज तक कराने में असमर्थ है और जिसके पास पत्नी या परिजन की लाश ढोने के लिए अपने कंधे के सिवाय कुछ भी नहीं है। गौर करने की बात यह कि इन अभागों में अधिकांश आबादी दलित और आदिवासियों की है जो देश की आबादी का एक चौथाई हिस्सा हैं।

भारत की सामाजिक व्यवस्था का सबसे मजबूत पहलू यह है कि यह एक लोकतंत्र है और इसका सबसे कमजोर पहलू यह है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी देश की राजनीति और संसाधन एक विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग की गिरफ्त में है। इस वर्ग ने एक ऐसा समाज बनाया है जिसमें गरीब और कमजोर के लिए सोचने की जगह सीमित होती जा रही है। इस स्वकेन्द्रित समाज में इंसानी रिश्तों का निर्धारण बस आपसी हित, जाति और धर्म के आधार पर होता है।

इस समाज की एक बड़ी खासियत है कि यहाँ संवेदना भी ‘फैशन’ की तरह दिखाई जाती है। इस समाज में दशरथ मांझी पर फिल्म बनाई जा सकती है लेकिन फिर किसी मांझी को किसी निर्मम ‘पहाड़’ से आजीवन लड़ना ना पड़े यह सोचने की फुरसत किसी को नहीं। दशरथ की पत्नी के जीवन के रास्ते में जो ‘पहाड़’ आया था उस पहाड़ का सीना चीरने में उसने पूरी ज़िन्दगी लगा दी और ‘रास्ता’ बना दिया। पर वो रास्ता खुला भी नहीं कि बन्द हो गया। कल दशरथ था, आज दाना आ गया। पर ‘मांझी’ की कहानी वहीं की वहीं है।

दाना मांझी की पत्नी को चंद रुपयों में बचाया जा सकता था, पर समाज ने जीवन से ही नहीं, इस गरीब को मौत के बाद भी इज्जत से महरूम रखा। यह तस्वीर बहुत लम्बे समय तक मानवता की आत्मा को झकझोरती रहेगी क्योंकि दाना अपनी पत्नी की लाश नहीं भारतीय लोकतंत्र और समाज की जड़ हो चुकी संवेदना का बोझ अपने कमजोर कंधों पर उठाए हुए थे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नालंदा विश्वविद्यालय : पूरा हुआ कलाम का सपना

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना का जो सपना पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने देखा था, वह पूरा हुआ। नालंदा अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह के साथ करीब आठ सदी के बाद नालंदा के गौरवशाली इतिहास ने एक बार फिर करवट लिया। काश कि ‘मिसाईलमैन’ जीवित होते और इस ऐतिहासिक समारोह की शोभा बढ़ाते! खैर, वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बीते शनिवार को आयोजित भव्य दीक्षांत समारोह में 12 छात्रों को सम्मानित किया और इसके साथ ही युगपुरुष डॉ. कलाम की परिकल्पना हकीकत में तब्दील हो गई।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दीक्षांत समारोह में इस विश्वविद्यालय के निमित्त डॉ. कलाम के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि आज भले ही नालंदा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह का आयोजन हो रहा हो परन्तु इसको पुनर्जीवित करने की परिकल्पना का श्रेय कलाम साहब को जाता है। बता दें कि 28 मार्च 2006 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने अपने बिहार दौरे के क्रम में इस प्राचीन विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने की सलाह दी थी। यह विचार उन्होंने बिहार विधानमंडल के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए रखा था।

गौरतलब है कि पाँचवीं सदी में बने नालंदा विश्वविद्यालय में करीब दस हजार छात्र पढ़ते थे, जिनके लिए 1500 अध्यापक हुआ करते थे। छात्रों में अधिकांश एशियाई देशों चीन, कोरिया, जापान से आने वाले बौद्ध भिक्षु होते थे। इतिहासकारों के मुताबिक चीनी भिक्षु ह्वेनसांग ने भी सातवीं सदी में नालंदा में शिक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने अपनी पुस्तक में नालंदा विश्वविद्यालय की भव्यता का उल्लेख किया है।

एक समय नालंदा विश्वविद्यालय बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा शिक्षण-केन्द्र था, परन्तु 1200 ई. में बख्तियारपुर खिलजी के आक्रमण के दौरान यह विश्वविद्यालय पूर्णत: धरती के गर्भ में समा गया। हाल ही में यूनेस्को ने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर को विश्व धरोहर (वर्ल्ड हेरिटेज साइट) में शामिल किया है। 446 एकड़ में बनने जा रहे वर्तमान विश्वविद्यालय का निर्माण-स्थल प्राचीन विश्वविद्यालय के इस खंडहर से करीब 10 किलामीटर दूर राजगीर में है। दीक्षांत समारोह में भाग लेने आए राष्ट्रपति ने राजगीर के पिल्खी गांव में विश्वविद्यालय के स्थायी परिसर की आधारशिला भी रखी। अभी यह विश्वविद्यालय एक सरकारी भवन में चलाया जा रहा है।

विश्वविद्यालय की कुलपति गोपा सबरवाल ने जानकारी दी कि विश्वविद्यालय के पहले सत्र में दो विषयों में तीन देशों के 12 छात्र थे, जबकि वर्तमान सत्र में तीन विषयों में 13 से अधिक देशों के 130 छात्र-छात्राएं हैं। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में यहाँ आठ से ज्यादा विषयों की पढ़ाई होगी और 1600 छात्र नामांकित होंगे। दीक्षांत समारोह के मौके पर बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति जॉर्ज यीओ, पूर्व कुलाधिपति अमर्त्य सेन एवं सदस्य लॉर्ड मेघनाद देसाई समेत कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे ।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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मोदीविरोध के ‘तवे’ पर पाकिस्तान की ‘रोटी’

सच से पुराना बैर है पाकिस्तान का। भारत के खिलाफ अपनी भोली जनता की भावनाएं भड़का कर ‘रोटी’ सेकना कोई उससे सीखे। हालांकि पाकिस्तान के लिए ये कोई नई बात नहीं, पर ताजा मामले में तो ‘मर्यादा’ की हर सीमा ही लांघ दी उसने। जी हाँ, पाकिस्तान की पंजाब असेंबली ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया है। चौंक गए ना? अब जरा कारण भी जान लें। शायद आपको स्मरण हो कि प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण के दौरान बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि वहाँ और पीओके के लोगों ने उनकी समस्या उठाने के लिए उनको धन्यवाद ज्ञापित किया है। बस यही बात पाकिस्तान को चुभ गई। वहाँ की पंजाब असेंबली को ये बात इतनी नागवार गुजरी कि उसने पाकिस्तान की संघीय सरकार से इस मामले को संयुक्त राष्ट्र समेत तमाम अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने की अपील की है।

गौरतलब है कि पंजाब प्रांत की असेंबली में वहाँ के कानून मंत्री राणा सनाउल्लाह ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया और यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास भी हो गया। प्रस्ताव में कहा गया कि सदन बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान पर मोदी के बयानों की कड़ाई से निन्दा करता है। सदन ने कहा कि पाकिस्तान की संघीय सरकार को चाहिए कि इस मामले को संयुक्त राष्ट्र समेत दूसरे अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाए। विश्व को यह बताने की जरूरत है कि मोदी सरकार पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही है।

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के विधायक खुर्रम वाट्टू ने तो दो कदम आगे बढ़कर सदन से यहाँ तक कहा कि भारत से व्यापारिक संबंध तोड़ने के लिए संघीय सरकार से गुजारिश की जाए। वहीं पंजाब असेंबली में विपक्ष के नेता राशिद ने आरोप लगाया कि मोदी का बयान उनकी असहिष्णुता की नीति और दूसरे राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप को दर्शाता है।

यहाँ गौर करने की बात ये है कि भारत-विरोध के नाम पर पाकिस्तान की तमाम पार्टियां कुल मिलाकर एक ही राग अलापती हैं। राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह विफल हो चुके पाक के जिस्म पर ना जाने कितने ‘पैबंद’ लगे हैं, जिन्हें जनता की नज़रों में जाने से रोकने के लिए पाक का राजनीतिक और सैनिक नेतृत्व प्रारम्भ से बस भारत-विरोध का झंडा उठाता आया है। वैसे सच कहा जाय तो जहाँ ‘हाफिज सईद’ जैसों को पलकों पर रखा जाता हो वहाँ नरेन्द्र मोदी के खिलाफ प्रस्ताव पारित होने पर हमें आश्चर्य होना ही नहीं चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप    

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आप ‘कृष्ण’ को कितना जानते हैं?

कृष्ण को सभी जानते हैं, पर महत्वपूर्ण यह है कि कितना जानते हैं। आप ही बताएं कि क्या हैं कृष्ण? देवकीसुत, यशोदानंदन या राधाकांत? सुदामा के सखा, अर्जुन के सारथि या द्वारका के अधिपति? महाभारत की धुरी, गीता के उपदेशक या विष्णु के अवतार? कृष्ण के अनंत रूप हैं और हर रूप की अनगिनत छवियां हैं। हम अपने मिथक से लेकर इतिहास तक खंगाल लें, कृष्ण से अधिक पूर्ण, कृष्ण से अधिक जीवंत, कृष्ण से अधिक विराट व्यक्तित्व ना तो हुआ है, ना होगा।

कृष्ण को जानने के लिए हमें श्रीमद्भागवत का ये प्रसंग जरूर जानना चाहिए। कृष्ण की इच्छा थी कि उनके देह-विसर्जन के पश्चात् द्वारकावासी अर्जुन की सुरक्षा में हस्तिनापुर चले जाएं। सो अर्जुन अन्त:पुर की स्त्रियों और प्रजा को लेकर जा रहे थे। रास्ते में डाकुओं ने लूटमार शुरू कर दी। यह देख अर्जुन ने तत्काल गाण्डीव के लिए हाथ बढ़ाया। पर यह क्या! गाण्डीव तो इतना भारी हो गया था कि प्रत्यंचा खींचना तो दूर, धनुष को उठाना तक संभव नहीं हो पा रहा था। महाभारत के विजेता, सर्वश्रेष्ठ धनुर्धारी विवश होकर अपनी आँखों के सामने अपना काफिला लुटता देख रहे थे। विश्वास कर पाना मुश्किल था कि ये वही अर्जुन हैं जिन्होंने अजेय योद्धाओं को मार गिराया था। अर्जुन अचरज में डूबे थे कि तभी कृष्ण के शब्द बिजली की कौंध की तरह उनके कानों में गूंजे – “तुम तो निमित्त मात्र हो पार्थ।”

श्रीमद्भागवत का ये प्रसंग अकारण नहीं है। यहाँ अर्जुन को माध्यम बना हमें इस अखंड सत्य से अवगत कराया गया है कि जीवन में जब-जब ‘कृष्ण तत्व’ अनुपस्थित होता है, तब-तब मनुष्य इसी तरह ऊर्जारहित हो जाता है। कृष्ण के ना रहने का अर्थ है – जीवन में शाश्वत मूल्यों का ह्रास। प्राणी हो या प्रकृति, ‘प्राणवायु’ कृष्ण ही थे, कृष्ण ही हैं, कृष्ण ही रहेंगे।

कृष्ण का अवतरण मानवता के लिए एक क्रान्तिकारी घटना थी। वे हुए तो अतीत में लेकिन हैं भविष्य के। इतना अनूठा था उनका व्यक्तित्व कि हम आज भी उनके समसामयिक नहीं बन सके हैं। मनुष्य अभी भी इस योग्य नहीं कि उसकी सोच और समझ में कृष्ण अंट जाएं। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि कृष्ण अकेले ऐसे व्यक्ति हैं जो धर्म की परम गहराइयों और ऊंचाइयों पर होकर भी गंभीर नहीं हैं। किसी भी बिन्दु पर रत्ती भर भी और पल भर के लिए भी उदास नहीं होते कृष्ण। उन्हें आप हमेशा हंसते हुए, नाचते हुए, जीवन का गीत गाते हुए पाएंगे। कृष्ण को छोड़ दें तो अतीत का सारा धर्म दुखवादी था। उदास और आँसुओं से भरा था। हंसता हुआ धर्म, जीवन को समग्र रूप से स्वीकार करने वाला धर्म अभी पैदा होने को है। जाहिर है कि वैसा जीवंत धर्म कृष्ण-तत्व से ही संभव है।

कृष्ण अकेले हैं जो समग्र जीवन को पूरा ही स्वीकार कर लेते हैं। जीवन की समग्रता की स्वीकृति उन्हीं के व्यक्तित्व में फलित हुई है। इसीलिए इस देश ने सभी अवतारों को आंशिक अवतार कहा है और कृष्ण को पूर्ण अवतार। राम भी अंश ही हैं परमात्मा के लेकिन कृष्ण पूरे ही परमात्मा हैं। पुरानी मनुष्य-जाति के इतिहास में वे अकेले हैं जो दमनवादी नहीं हैं। उन्होंने जीवन के सब रंगों को स्वीकार कर लिया है। वे प्रेम से भागते नहीं। वे पुरुष होकर स्त्री से पलायन नहीं करते। वे करुणा और प्रेम से भरे होकर भी युद्ध में लड़ने की सामर्थ्य रखते हैं। अमृत की स्वीकृति है उन्हें लेकिन विष से कोई भय भी नहीं है।

हम जब-जब ‘पूर्णता’ की बात करेंगे, हमारे सामने ‘कृष्ण’ ही होंगे, क्योंकि पूर्णता के पूर्ण प्रतिमान केवल वही हैं, और जिसे हम ‘जन्माष्टमी’ कहते हैं, वो वास्तव में उसी पूर्णता का प्रतीक पर्व है। वर्ष में एक बार ये दिन आता है तो हमें ये एहसास दिलाने कि ‘अधूरेपन’ से लड़ने की ताकत हममें से हर किसी में है और जब तक कृष्ण हैं ‘पूर्णता’ की हर संभावना शेष है। मजे की बात तो यह कि पूर्णता की ये यात्रा ‘कृष्ण’ के साथ है और ‘कृष्ण’ तक ही पहुँचने के लिए है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘आपदा’ में ‘एक’ हुए दो दिग्गज

बिहार के 38 में से 20 जिले बाढ़ से बेहाल हैं। पिछले तीन दिनों में 19 लोगों की मौत हो चुकी है और 5 लाख से ज्यादा लोग विस्थापित हो चुके हैं। दिन-ब-दिन बिगड़ती स्थिति के मद्देनज़र मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आज राजधानी दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मिले। उन्होंने प्रधानमंत्री को हालात से अवगत कराया और प्रधानमंत्री ने उन्हें हरसंभव मदद का आश्वासन दिया।

मुलाकात के दौरान नीतीश कुमार ने फरक्का बांध का मुद्दा भी उठाया। उन्होंने कहा कि बाढ़ की यह स्थिति फरक्का बांध बनने के बाद गंगा में जमा हो रहे गाद के कारण बनी है। बिहार में गंगा की स्थिति पर उन्हें ‘रोने’ का मन करता है। हर साल बाढ़ से बचने का एकमात्र समाधान गंगा के तलछट की सफाई करना है। उन्होंने मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी नमामि गंगे परियोजना को बिहार में तलछट प्रबंधन से जोड़ते हुए कहा कि अगर स्थिति पर ध्यान नहीं दिया गया तो इस परियोजना की सफलता पर भी प्रश्नचिह्न लगेगा। नीतीश ने बताया कि प्रधानमंत्री ने उन्हें आश्वासन देते हुए कहा कि उनकी मांगों पर तुरंत और सकारात्मक कार्रवाई की जाएगी जिसमें राष्ट्रीय तलछट प्रबंधन नीति बनाना शामिल है।

गौरतलब है कि बिहार में अभी तक 14 प्रतिशत कम बारिश हुई है। इसके बावजूद राज्य में बाढ़ की भयावह स्थिति है। दरअसल दूसरे राज्यों में बारिश के कारण बिहार को बाढ़ की विभीषिका झेलना पड़ रहा है। नेपाल और झारखंड के बाद अब मध्य प्रदेश में बारिश से बिहार में बाढ़ के हालात बने हुए हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने इस ओर भी प्रधानमंत्री का ध्यान आकृष्ट किया।

बता दें कि केन्द्र सरकार ने बिहार और उत्तर प्रदेश के बाढ़ प्रभावित इलाकों में राहत और बचाव कार्य में मदद करने के लिए एनडीआरएफ की 10 टीमें सोमवार को भेजी थीं। बाढ़ और भारी बारिश से प्रभावित राज्यों में एनडीआरएफ की कुल 56 टीमें राहत और बचाव कार्य में जुटी हैं। साथ ही बिहार और उत्तर प्रदेश की स्थिति पर नज़र रखने के लिए दो डिप्टी इंस्पेक्टर जनरल रैंक के अधिकारियों को लगाया गया है। इस मानसून सीजन में एनडीआरएफ की टीमें पूरे देश में 26,400 लोगों को बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों से निकाल चुकी हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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