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भारत में एड्स के पसरते पाँव, सरकार के आँकड़े और हम

केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कल लोकसभा में जानकारी दी कि भारत में 21 लाख 70 हजार लोग एचआईवी संक्रमित हैं। एचआईवी संक्रमित लोगों की ये आबादी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आबादी है। नड्डा द्वारा पेश किए गए आंकड़े के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका में 68 लाख और नाईजीरिया में 34 लाख लोग इसके शिकार हैं। इन दो देशों के बाद भारत का नंबर आता है।

स्वास्थ्य मंत्री ने लोकसभा में दिए गए अपने एक लिखित जवाब में बताया कि भारत में एचआईवी से पीड़ित मरीज एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) के सहारे जी रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि मौजूदा समय में देश में कुल 524 एआरटी सेंटर्स हैं जो मुफ्त में यह थेरेपी उपलब्ध करवा रहे हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार एचआईवी नाम की इस चुनौती का सामना करने की भरसक कोशिश कर रही है और उम्मीद बंधाने वाले कुछ नतीजे भी देखने को मिले हैं लेकिन जितनी भयावह यह समस्या है क्या उतनी ही तैयारी के साथ हम इससे लड़ पा रहे हैं..?

एचआईवी यानि “ह्यूमन इम्यूनो डिफिसिएंसी वायरस” से संक्रमण के बाद की स्थिति है एड्स यानि “एक्वायर्ड इम्यून डिफिसिएंसी सिन्ड्रोम”। एड्स स्वयं में कोई बीमारी नहीं है पर एड्स से पीड़ित मानव-शरीर जीवाणु-विषाणु आदि से होने वाली संक्रामक बीमारियों से लड़ने की प्राकृतिक प्रतिरक्षण क्षमता खो बैठता है। ऐसे में सर्दी-जुकाम से लेकर क्षय रोग जैसे रोग तक सहजता से हो जाते हैं और उनका इलाज करना मुश्किल से नामुमकिन होता चला जाता है। एचआईवी संक्रमण को एड्स की स्थिति तक पहुँचने में आठ से दस साल या कभी-कभी इससे भी अधिक वक्त लग सकता है लेकिन एक बार इसकी चपेट में आने के बाद जीवन की ओर जाने वाले सारे रास्ते एकदम से बन्द दिखने लगते हैं।

आज जो एड्स महामारी का रूप ले चुका है उसे 1980 से पहले लोग जानते तक नहीं थे। भारत की बात करें तो यहाँ एड्स का पहला मामला 1996 में दर्ज किया गया था और महज दो दशकों में इसके मरीजों की संख्या 21 लाख को पार कर चुकी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में केवल 2011 से 2014 के बीच ही डेढ़ लाख लोग इसके कारण मौत का शिकार हुए।

एचआईवी को लेकर एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया है कि विश्व में एचआईवी से पीड़ित होने वालों में सबसे अधिक संख्या किशोरों की है। यह संख्या 20 लाख से ऊपर है। यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2000 से अब तक किशोरों के एड्स से पीड़ित होने के मामलों में तीन गुना इजाफा हुआ है जो कि अत्यंत चिन्ता का विषय है। ये चिन्ता तब और भी बढ़ जाती है जब ये जानने को मिलता है कि एड्स से पीड़ित दस लाख से अधिक किशोर सिर्फ छह देशों में रह रहे हैं और भारत उनमें एक है। शेष पाँच देश दक्षिण अफ्रीका, नाईजीरिया, केन्या, मोजांबिक और तंजानिया हैं।

देखा जाय तो एचआईवी एड्स महज स्वास्थ्य की समस्या नहीं बल्कि सामाजिक संकट भी है। एक समय लोग सोचते थे कि भारत जैसे देश में यह रोग तेजी से नहीं फैलेगा क्योंकि यहाँ सामाजिक नियम बड़े कड़े हैं। बहुत जल्द ये धारणा गलत साबित हुई। आज ना केवल शहरों में रहने वाले बल्कि गाँवों के लोग भी इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि समाज के ऐसे कई पहलू हैं जिन्हें हमने या तो समझा नहीं है या समझना नहीं चाहते।

एड्स की भयावह समस्या का एक पहलू यह भी है कि इसको लेकर हम अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझते ही नहीं। भूकम्प और सुनामी आए तो मदद के लिए कई हाथ बढ़ते हैं लेकिन एड्स से पीड़ित व्यक्ति के प्रति हमारा रवैया ऐसा होता है जैसे वो समाज का अंग हो ही नहीं। यही वजह है कि 74 प्रतिशत एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति कामकाज की जगह पर अपनी बीमीरी की बात छिपाकर रखते हैं। क्या करुणा भी सोच-समझकर उपजनी चाहिए..? कम-से-कम एड्स के मामले में हमारा व्यवहार कुछ ऐसा ही कहता है। और तो और, इस भेदभाव में लिंग भी अपनी भूमिका निभाता है। पुरुषों की तुलना में स्त्रियाँ इसका कहर अधिक झेलती हैं। ज्यादातर मामलों मे एचआईवी संक्रमण होने पर उन्हें घर छोड़ने को कह दिया जाता है। पत्नियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने एचआईवी पॉजिटिव पति का साथ निभाएं लेकिन पति कम ही मामलों में वफादार साबित होते हैं।

सरकारी विज्ञापनों से हम ये तो जान गए हैं कि एड्स असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित सुई, संक्रमित खून चढ़ाने और गर्भवती माँ से होने वाले बच्चों को होता है लेकिन हमारा ये जानना अधिक जरूरी है कि एचआईवी अपने आप में कोई रोग नहीं है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। अगर इससे पीड़ित लोग अपनी जीवन-ऊर्जा और सामान्य जीवन जीने की ललक को कायम रख पाएं तो रोगों से लड़ने की उनकी क्षमता भले ही पूरी तरह वापस ना आए उसे काफी हद तक बढ़ाया जरूर जा सकता है। और ये हमारे-आपके सकारात्मक सहयोग के बिना सम्भव नहीं। बस हम अपनी सोच बदलें, फिर देखें कि सरकार का काम कितना आसान हो जाता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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महाशिवरात्रि अर्थात् परमात्मा शिव के दिव्य ‘अवतरण’ की रात्रि

आज देश भर में महाशिवरात्रि की धूम है। उत्तर प्रदेश में शिव की नगरी काशी हो या उत्तराखंड में उनकी जटा से निकली गंगा की धरती हरिद्वार, मध्यप्रदेश का उज्जैन हो या गुजरात का सोमनाथ, झारखंड का देवघर हो या बिहार का सिंहेश्वर… भारत के कोने-कोने में स्थित शिवालयों से लेकर पड़ोसी देश नेपाल के विश्वप्रसिद्ध पशुपतिनाथ मंदिर तक शिवभक्तों की भीड़ उमड़ रही है। इस बार की महाशिवरात्रि इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि चार साल के बाद शिव के प्रिय दिन सोमवार को महाशिवरात्रि का त्योहार आया है। इस साल महाशिवरात्रि पर दुर्लभ शिवयोग का संयोग बन रहा है। कहा जाता है कि इस विशेष योग में भक्तों को शिव की आराधना का कई गुणा अधिक फल प्राप्त होता है।

महाशिवरात्रि का धार्मिक महत्व बहुत अधिक है। ऐसी मान्यता है कि आज ही के दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह हुआ था। फाल्गुन महीने के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी यानि फरवरी-मार्च के महीने में पड़ने वाला ये त्योहार इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि माना जाता है कि आज के दिन भगवान शिव का अंश प्रत्येक शिवलिंग में पूरे दिन और रात मौजूद रहता है।

शिवपुराण के अनुसार सृष्टि के निर्माण के समय महाशिवरात्रि की मध्यरात्रि में शिव अपने रुद्र रूप में प्रकट हुए थे। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी तिथि में चन्द्रमा सूर्य के समीप होता है। इसी समय जीवनरूपी चन्द्रमा का मिलन शिवरूपी सूर्य के साथ होता है। अत: महाशिवरात्रि परमात्मा शिव के दिव्य ‘अवतरण’ की रात्रि है। देखा जाय तो यह त्योहार सम्पूर्ण सृष्टि को उनके निराकार से साकार रूप में आने की मंगल सूचना है। महाशिवरात्रि के दिन ग्रहों की दशा कुछ ऐसी होती है कि मानव शरीर में प्राकृतिक रूप से ऊर्जा ऊपर की ओर चढ़ती है।

योग परम्परा में शिव दुनिया के पहले गुरु माने जाते हैं जिनसे ज्ञान की उत्पत्ति हुई थी। इस मार्ग पर चलने वाले शिव की पूजा ईश्वर के रूप में नहीं बल्कि उन्हें आदिगुरु मानकर करते हैं।

एकमात्र शिव हैं जो स्वयं विष पीकर जग को अमृत देते हैं। उनके अलावा कौन है जिसकी पूजा ‘सुर’ ही नहीं ‘असुर’ भी करें। महज बेलपत्र और भांग-धतूरे से प्रसन्न हो जाने वाले शिव ‘सर्वहारा वर्ग’ के एकमात्र देवता हैं। शिवपुराण की ईशानसंहिता में कहा गया है कि आदिदेव शिव महाशिवरात्रि में करोड़ों सूर्यों के समान प्रभाव वाले लिंग रूप में प्रकट हुए थे। इस कथन की व्यावहारिक व्याख्या करें तो हम पाएंगे कि शिव का प्रभाव, उनका आभामंडल सचमुच ऐसा है कि उसमें करोड़ों देव समा जाएं… तभी तो वे देवों के देव हैं… महादेव हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पाँच राज्यों के चुनाव में ना तो मोदी ना ही राहुल के लिए अच्छी ख़बर

पाँच राज्यों में चुनाव की घोषणा के बाद सभी पार्टियां हरकत में आ चुकी हैं। हालांकि अभी चुनाव में थोड़ा वक्त है लोकिन चुनावपूर्व सर्वे का दौर शुरू हो गया है। शुरुआत सी-वोटर ने की है। सी-वोटर द्वारा चार राज्यों में कराए गए पोल में कई चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए हैं। इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित पोल के आंकड़े के अनुसार केरल में सीपीएम के नेतृत्व वाली एलडीएफ की सरकार बनेगी। पश्चिम बंगाल में भी सीपीएम की ताकत बढ़ेगी लेकिन कम बहुमत से ही सही, वापसी ममता की ही होगी। असम में तरुण गोगोई सरकार को झटका लग सकता है लेकिन बीजेपी गठबंधन भी बहुमत से पीछे ही रहेगा। उधर तमिलनाडु में जयललिता वापसी तो कर सकती हैं लेकिन मशक्कत के साथ।

सर्वे के मुताबिक केरल में लेफ्ट पार्टियां 44.6 प्रतिशत वोट हासिल करेंगी। सीटों के हिसाब से एलडीएफ को 140 में से 89 सीटों पर जीत मिलेगी, जबकि कांग्रेस का यूडीएफ गठबंधन महज 49 सीटों पर सिमट कर रह जाएगा। बता दें कि अभी वहाँ कांग्रेस के पास विधानसभा में 72 सीटें हैं।

पश्चिम बंगाल में एक बार फिर ममता वापसी करती दिख रही हैं। हालांकि उनकी पार्टी तृणमूल कांग्रेस को 156 सीटों से ही संतोष करना पड़ेगा। दूसरी ओर वहाँ अपना प्रदर्शन सुधारते हुए सीपीएम 114 सीटें हासिल करती दिख रही है। तमाम कोशिशों के बावजूद भाजपा के लिए यहाँ से अच्छी ख़बर नहीं है। आंकड़ों पर भरोसा करें तो उसके खाते में महज चार सीटें जा रही हैं।

असम में कांग्रेस की तरुण गोगोई सरकार मुश्किल में है। वोट शेयर में चार प्रतिशत गिरावट के साथ यहाँ कांग्रेस 34 सीटों पर सिमटती दिख रही है। उधर भाजपा गठबंधन 57 सीटों के साथ फायदे में तो रहेगा लेकिन सर्वे की मानें तो बहुमत के आंकड़े को वो भी नहीं छू पाएगा।

तमिलनाडु में जयललिता का जलवा कायम तो रह सकता है लेकिन एड़ी-चोटी का पसीना एक करने के बाद। सर्वे के मुताबिक उनकी पार्टी एआईएडीएमके को 116 सीटें मिल सकती हैं। पर यह आंकड़ा बहुमत से दो सीट कम है। करुणानिधि की पार्टी डीएमके 101 सीटों के साथ कड़े मुकाबले में दिख रही है।

वैसे देखा जाय तो इन राज्यों के चुनावी मूड का पूरा-पूरा अनुमान लगाना अभी सम्भव नहीं। सी-वोटर ने स्वयं कहा है कि सर्वे के नतीजों में स्टेट लेवल पर तीन प्रतिशत और रीजनल लेवल पर पाँच प्रतिशत का अंतर आ सकता है। इसके बावजूद ये सर्वे पार्टियों की मौजूदा स्थिति का संकेत जरूर देता है। बता दें कि इस सर्वे के लिए सी-वोटर ने 14, 353 लोगों से बात की।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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गांधी, गोड्से और गृहमंत्री यानि गौतम बुद्ध के ‘मध्यममार्ग’ पर भाजपा

संसद के ‘बाहर बैठे’ गांधीजी को आज बहुत सुकून मिला होगा। मोदी सरकार ने आज अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाक्रम में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के हत्यारे नाथूराम गोड्से की पूजा करने वालों से ना केवल अपनी ‘दूरी’ बनाई बल्कि जताई भी। गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने संसद में कहा कि महात्मा गांधी के हत्यारे की पूजा करने वालों के खिलाफ राज्य सरकारों को सख्त कदाम उठाने चाहिएं। उन्होंने कहा कि कोई कैसे नाथूराम गोड्से की पूजा कर सकता है..? केन्द्र ने गांधी की हत्या पर जश्न मनाने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने से किसी राज्य को नहीं रोका है। बता दें कि विपक्ष ने हिन्दू महासभा द्वारा गोड्से के मंदिर बनाए जाने और भाजपा सांसद साक्षी महाराज द्वारा गोड्से को कथित तौर पर राष्ट्रवादी बताए जाने के बाद मोदी सरकार पर हमला बोला था।

गृहमंत्री राजनाथ सिंह अत्यंत सुलझे हुए राजनेता हैं। उन्हें अच्छी तरह पता है कि गांधी का नाम और काम इतना बड़ा है कि उनसे ‘किनारा’ कर इस देश में किसी भी दल की ‘राजनीति’ सम्भव नहीं। इस बाबत केन्द्र की मोदी सरकार भी उतनी ही सतर्क है। वह जहाँ एक ओर दीनदयाल उपाध्याय और अटल बिहारी वाजपेयी जैसे भाजपा के ‘प्रतीकपुरुषों’ को लेकर चल रही है वहीं महात्मा गांधी की ‘विरासत’ पर भी अपनी बराबर की ‘दावेदारी’ जताने से नहीं चूक रही। स्वयं नरेन्द्र मोदी अपने भाषणों में महात्मा गांधी का नाम जिस तरह लेते हैं उसका एक सीधा संदेश यह होता है कि गांधी जितने और जैसे कांग्रेस के हैं उतने और वैसे ही भाजपा के भी। भाजपा ऐसा कर कांग्रेस को गांधी के ‘राजनीतिकरण’ से रोकना चाहती है लेकिन उसके ऐसा करने में ‘राजनीति’ नहीं है, ऐसा नहीं कहा जा सकता। खैर, गांधी के नाम पर होने वाले इस झगड़े में ‘राजनीति’ चाहे जितनी हो, यह झगड़ा फिर भी ‘प्रीतिकर’ लगता है।

बहरहाल, संसद में गांधी को लेकर दिया गया गृहमंत्री का बयान निस्संदेह स्वागतयोग्य है। हिन्दू महासभा और भाजपा का ‘जुड़ाव’ किसी से छिपा नहीं। इस ‘जुड़ाव’ के बावजूद हिन्दू महासभा के गोड्से से ‘जुड़ाव’ पर राजनाथ ने दो टूक बयान देकर ‘साहस’ का काम किया है। गृहमंत्री का बयान एक ओर गौतम बुद्ध के ‘मध्यममार्ग’ की याद दिलाता है तो दूसरी ओर यह भी साबित करता है कि बुद्ध और गांधी की ‘प्रासंगिकता’ किसी भी ‘पंथ’ और ‘वाद’ से ऊपर है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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स्कूली बच्चों को प्रधानमंत्री से ‘जोड़ने’ के लिए सीबीएसई की अधिसूचना

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ना केवल भारत बल्कि विश्व के उन गिने-चुने नेताओं में एक हैं जो तकनीक में गहरी रुचि रखते हैं। उन्होंने प्रारम्भ से ही ई-गवर्नेंस को प्रोत्साहित किया है। प्रधानमंत्री मोदी ने सूचना और सम्पर्क के विभिन्न माध्यमों का जैसा उपयोग आम जनता से सीधा संवाद करने के लिए किया है वो भारतीय राजनीति में उनसे पहले देखने को नहीं मिला था। अब हर घर में सुलभ रेडियो की ही बात करें। उनसे पहले के प्रधानमंत्री इसका उपयोग केवल विशेष अवसरों पर संदेश देने के लिए करते थे। किसी ने नहीं सोचा था कि रेडियो ‘मन की बात’ रखने का जरिया भी हो सकता है। अभी हाल ही में अपने रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में प्रधानमंत्री ने परीक्षा को लेकर कई बातें की थीं और छात्रों से अपील करते हुए कहा था कि वे पूरे विश्वास और आशा के साथ परीक्षा में भाग लें। इसी से उत्साहित होकर सीबीएसई (सेन्ट्रल बोर्ड ऑफ सेकेन्डरी एजुकेशन) ने अपने स्कूलों में बच्चों को प्रधानमंत्री से ‘जोड़ने’ के लिए अधिसूचना जारी की है।

सीबीएसई की उपरोक्त अधिसूचना ‘नरेन्द्र मोदी एप’ को लेकर है। इसमें कहा गया है कि कि बच्चों के माता-पिता, अध्यापक व छात्र ‘नरेन्द्र मोदी एप’ के जरिए परीक्षा के अपने अनुभवों को बांट सकते हैं। साथ ही प्रधानमंत्री भी अपने अनुभव को उनसे साझा करेंगे। सीबीएसई ने सभी स्कूलों के प्रमुखों से आग्रह करते हुए कहा है कि अध्यापक, माता-पिता व छात्रों को ‘नरेन्द्र मोदी एप’ डाउनलोड करने के लिए प्रोत्साहित करें। बोर्ड ने प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ के उस हिस्से का भी जिक्र किया है कि जिसमें दसवीं और बारहवीं की परीक्षा को लेकर उन्होंने छात्रों को अपना संदेश दिया है।

बता दें कि ‘नरेन्द्र मोदी एप’ प्रधानमंत्री के बारे में सभी नवीनतम जानकारियां एवं अपडेट प्रदान करता है। इस इंटरैक्टिव ‘एप’ पर बस एक क्लिक कर आप प्रधानंमंत्री के साथ जुड़ सकते हैं। यह प्रधानमंत्री से सीधे संदेश और ई-मेल प्राप्त करने का अनूठा अवसर भी देता है। इस ‘एप’ के ‘टू-डू टास्क’ के माध्यम से आप अपना योगदान दे सकते हैं और बैज अर्जित कर सकते हैं। यही नहीं, आप प्रधानमंत्री के ‘मन की बात’ के विभिन्न एपिसोड सुन सकते हैं, उनके ब्लॉग पढ़ सकते हैं और उनकी जीवनी पढ़कर उनके बारे में और जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।

इस ‘एप’ के माध्यम से प्रधानमंत्री मोदी के ‘सुशासन’ की शैली और सरकार की विभिन्न पहल और उपलब्धियों की जानकारी भी हासिल की जा सकती है। इसमें एक विशेष सेक्शन बनाया गया है जिसके अंतर्गत भारत की वैश्विक पहचान को और आगे बढ़ाने की दिशा में प्रधानमंत्री के प्रयासों का उल्लेख किया गया है। इसके ‘इन्फोग्राफिक्स’ सेक्शन के अंतर्गत यह दिखाया गया है कि सरकार कैसे लोगों के जीवन में सुधार लाने का काम कर रही है।

स्कूल के बच्चे अब तक चाचा नेहरू के बारे में सुना करते थे। बच्चों के बीच नेहरूजी की लोकप्रियता आज भी एक मिसाल है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी बच्चों से जुड़ने और संवाद करने का कोई अवसर नहीं छोड़ते। सीबीएसई ने अपनी अधिसूचना से उस ‘जुड़ाव’ और ‘संवाद’ को सार्थक दिशा देने की कोशिश की है। भारत के ‘भविष्य’ को गढ़ने के लिए प्रधानमंत्री की पहल के निमित्त सीबीएसई के इस प्रयास की सराहना राजनीति से ऊपर उठकर होनी चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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केन्द्र से अधिक ‘स्मार्ट’ होने का दावा नीतीश का ‘असंयम’ या ‘आत्मविश्वास’..?

बिहार चुनाव में महागठबंधन की जीत के कई कारण गिनाए गए हैं लेकिन सच ये है कि जिस चीज ने नीतीश की जीत में निर्णायक भूमिका निभाई वो है नीतीश का ‘संयम’ जिसे उन्होंने तमाम ‘वार’ झेलते हुए भी पूरे चुनाव में निभाया। दूसरी ओर शुरुआती हवा एनडीए के पक्ष में दिखने के बावजूद मोदी और उनकी टीम का ‘असंयमित’ व्यवहार उनकी हार का कारण बना। लेकिन लालू और कांग्रेस का साथ लेकर सरकार चला रहे नीतीश के संयम की डोर शायद थोड़ी ‘ढीली’ पड़ रही है..! अब ये उनका ‘असंयम’ है या ‘आत्मविश्वास’ ये तो आने वाला वक्त बताएगा, बहरहाल आज उन्होंने ये बयान दिया है कि केन्द्र केवल ‘बातों’ में स्मार्ट है, जबकि ‘हम’ काम करने में स्मार्ट हैं।

आज सीएम सचिवालय के संवाद कक्ष में विभिन्न योजनाओं की शुरुआत एवं लोकार्पण करते हुए स्मार्ट सिटी के मुद्दे पर केन्द्र को आड़े हाथ लेते हुए नीतीश ने कहा कि हमें स्मार्ट सिटी की चिन्ता नहीं है। केन्द्र सरकार प्रत्येक स्मार्ट सिटी को हर वर्ष सौ करोड़ रुपये देगी। इससे क्या होगा..? कोई शहर कितना स्मार्ट बनेगा..? पाँचवें राज्य वित्त आयोग की अनुशंसा के तहत हम आठ हजार करोड़ रुपये देंगे।

नीतीश कुमार ने कहा कि केन्द्र सरकार ने सौ शहरों को स्मार्ट बनाने की बात की थी, जबकि चयन केवल बीस का ही किया गया। बिहार को छोड़ दिया गया। अब हम अपने प्रयासों से शहरों को मजबूत बनाएंगे। इसके लिए शहरी अभियंत्रण संगठन बनाया जा रहा है जो निकायों के लिए इंजीनियरिंग क्षेत्र में लाभप्रद होगा।

बिहार के मुख्यमंत्री ने अपने सात निश्चयों को मिशन मोड में पूरा करने का संकल्प जताया। उन्होंने कहा कि शहर से लेकर गांव तक हमें हर हाल में नल का पानी उपलब्ध कराना है। पेयजल योजनाओं को नगर निकायों के माध्यम से पूरा किया जाएगा। सात निश्चयों में शामिल ‘हर घर में शौचालय’ के लिए भी उन्होंने प्रतिबद्धता जताई। उन्होंने कहा कि केन्द्र से इसके लिए सिर्फ चार हजार रुपये दिए जाते हैं। राज्य सरकार ने इसमें अपनी ओर से आठ हजार रुपये जोड़े हैं ताकि शौचालय निर्माण में कोई कमी ना रह जाय। उन्होंने नाली निर्माण और हर घर में बिजली के मुफ्त कनेक्शन की बात भी दुहराई।

नीतीश-राज में जनप्रतिनिधि आमतौर पर ‘अफसरशाही’ से त्रस्त रहे हैं। लेकिन आज नीतीश ने कहा कि निर्णय जनप्रतिनिधि को लेना है। अफसर का काम उन्हें क्रियान्वित करना है। उन्होंने अफसरों को काम के जरिए ‘पावरफुल’ होने की नसीहत दी और कहा कि काम से ही किसी के दिल में जगह बनती है।

नीतीश काम करने के लिए जाने जाते हैं। बिहार की जनता ने उन्हें पाँचवीं बार चुना भी इसीलिए है। नीतीश जैसे ‘मैच्योर्ड’ राजनेता को अच्छी तरह पता है कि केन्द्र से ‘सकारात्मक’ संबंध के बिना किसी राज्य का ‘निर्बाध’ विकास सामान्यतया संभव नहीं है। उन्हें चाहिए कि राज्य के हित के लिए ‘राजनीति’ से ऊपर उठें और जनता के विवेक पर भरोसा करें। सूचना-क्रांति के इस युग में जनता तक सही-गलत पहुँचने में वैसे भी देर नहीं लगती। और हाँ, अपना ‘संयम’ और अपनी ‘शालीनता’ तो वो हर हाल में बना कर रखें क्योंकि ये उनकी या किसी भी सफल व्यक्ति की सबसे बड़ी ‘पूंजी’ होती है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पप्पू की मानें तो “90% सांसद और विधायक नहीं रह सकते शराब और शबाब के बिना”..!

इसमें कोई दो राय नहीं कि हम सब ‘गिरावट’ के दौर से गुजर रहे हैं। निजी या सार्वजनिक जीवन में संस्कार, विचार, चरित्र और व्यवहार की जैसी गिरावट अभी देखने को मिल रही है वैसी मानव-सभ्यता के सम्पूर्ण इतिहास में शायद ढूंढे ना मिले। पर वो ‘गिरावट’ क्या इस कदर ‘गिर’ गई है कि सौ में नब्बे उसकी गिरफ्त में दिखने लगें। अपने विवादित बयानों के कारण सुर्खियों में रहने वाले जन अधिकार पार्टी के नेता और मधेपुरा के सांसद पप्पू यादव की मानें तो राजनीति के क्षेत्र में गिरावट का आंकड़ा यही ठहरता है। जी हाँ, पप्पू ने अपने एक सनसनीखेज बयान में कहा है कि 90% सांसद और विधायक शराब और शबाब के बिना नहीं रह सकते।

एक निजी कार्यक्रम के सिलसिले में सीवान पहुँचे पप्पू यादव ने पिछले दिनों राजद विधायक राजबल्लभ यादव पर लगे एक ‘नाबालिग’ से दुष्कर्म के आरोप की पृष्ठभूमि में कहा कि अब ठेकेदार, रंगदार, अपराधी, बिल्डर और अपहरणकर्ता सांसद और विधायक बन रहे हैं। ऐसे में राजनीति में ‘नैतिकता’ और ‘स्वच्छता’ आ ही नहीं सकती। राजबल्लभ प्रकरण में उन्होंने यह भी कहा कि जिस महिला ने विधायक तक ‘नाबालिग’ को पहुँचाया था, उसने खुद कहा है कि वह कई सांसदों-विधायकों को लड़कियां ‘सप्लाई’ करती है। ऐसे तमाम नेताओं की जाँच होनी चाहिए।

बीते विधानसभा चुनाव में अपने तमाम दावों के धाराशायी होने के बाद पहली बार आक्रामक दिख रहे पप्पू ने राज्य की वर्तमान स्थिति पर बड़ी तल्ख टिप्पणियां कीं। उन्होंने कहा कि यहाँ अपराध और अपराधी बेलगाम हो गए हैं। उनके अनुसार ये स्थिति इसलिए है कि तीन-तीन सीएम मिलकर राज्य की सरकार चला रहे हैं। नीतीश कुमार राजनीतिक सीएम हैं, प्रशांत किशोर टेक्निकल सीएम और लालू सर्वेसर्वा सीएम, जो अपराधियों को संचालित करते हैं। ऐसे में राज्य में अपराध बढ़ना लाजिमी है।

स्वयं पप्पू यादव के साथ उनके राजनीतिक जीवन के आरंभ से ही ‘बाहुबली’ का टैग लगा हुआ है। सच ये है कि इस ‘टैग’ से उन्हें ‘नुकसान’ कम और ‘लाभ’ अधिक हुआ है। ऐसे में वो अगर आज की राजनीति को बदलने की बाद करते हैं तो ये बात चौंकाने के साथ-साथ कहीं-ना-कहीं थोड़ी उम्मीद भी बंधाती है। लेकिन ये कैसे भूला जा सकता है कि पप्पू जिस लालू को आज अपराधियों का ‘संचालक’ बता रहे हैं, हाल तक उन्हीं की राजनीतिक विरासत पर वो अपना दावा ठोक रहे थे।

लेकिन हाँ, पप्पू के इस दावे पर जरूर लम्बी और बड़ी बहस होगी कि 90% सांसद और विधायक शराब और शबाब के बिना नहीं रह सकते। जो व्यक्ति स्वयं तकरीबन ढाई दशक से विधायक और सांसद रहता आया हो उसका ऐसा दावा करना कतई हल्के में नहीं लिया जाना चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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कन्हैया कुमार : ‘देशद्रोही’ या बिहार के बीहट से निकली बड़ी ‘संभावना’?

कन्हैया कुमार… पिछले दस दिनों से देश की सारी सुर्खियाँ बस इस एक नाम के इर्द-गिर्द हैं। टीवी, अख़बार और सोशल मीडिया की सारी बहसें मंझोले कद के, दुबले-पतले-से, दाढ़ी वाले इस शख़्स को लेकर हो रही हैं। फिलहाल दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद इस शख़्स की रिहाई के लिए जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय ही नहीं गुजरात के वडोदरा विश्वविद्यालय और आंध्रप्रदेश की हैदराबाद सेन्ट्रल यूनिवर्सिटी तक के छात्र प्रदर्शन कर रहे हैं। एक ओर उसके नाम पर पटना की सड़कों पर झड़पें हो रही हैं तो दूसरी ओर उसका नाम केरल की विधानसभा में गूंज रहा है। गुआहाटी में पूरब के बुद्धिजीवी और कलाकार सड़कों पर उतर आए हैं तो चेन्नई में तमिल लोकगायक कोवान कन्हैया के लिए ‘गीत’ गाते हुए हिरासत में लिए जा रहे हैं। एक ओर अपार समर्थन मिल रहा है उसे तो दूसरी ओर गृहमंत्री उसे देश के लिए ‘खतरा’ बता रहे हैं और उस पर ‘देशद्रोह’ का मुकदमा चलाने की बात हो रही है। आखिर कौन है ये कन्हैया कुमार..? और उससे भी बड़ा सवाल ये कि क्यों है उसके नाम पर इतना बड़ा विरोधाभास..?

बिहार के बेगूसराय जिला स्थित बीहट गांव के बेहद गरीब परिवार से आते हैं कन्हैया कुमार। बीहट से निकलकर मोकामा और फिर पटना के कॉमर्स कॉलेज होते हुए जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष पद तक पहुँचना कतई आसान नहीं था उनके लिए। क्रांतिकारियों-सा जज्बा और कम्यूनिस्ट विचारधारा के प्रति ‘नि:स्वार्थ’ समर्पण उन्हें विरासत में मिला। कभी मजदूर रहे और अब लकवाग्रस्त हो चुके पिता का पुत्र जिसका घर आंगनबाड़ी सेविका माँ की नाममात्र कमाई से चल रहा हो उसका ना तो ‘संघर्ष’ झूठा हो सकता है और ना ही उसके कुछ कर गुजरने की ‘ललक’ में लेशमात्र छलावा हो सकता है। फिर क्यों इस कन्हैया के नाम पर ‘राजनीति’ की रोटियां सेकी जा रही हैं..?

सौ आने ‘सच्ची’ है कन्हैया के भीतर की ‘आग’ पर जब आग की लपटें ज्यादा तेज हों और उसे ‘आवारा’ हवा की थोड़ी भी संगत मिल जाए तो ‘दिशा’ भटक जाना कोई बड़ी बात नहीं। बस यही और इतना ही ‘कसूर’ था कन्हैया कुमार का। करीब 22 मिनट के उस विवादित दिन के वीडियो को गौर से देखें। इसमें कन्हैया संविधान, लोकतंत्र और तिरंगे के सम्मान की बात कर रहे हैं। व्यवस्था से शिकायत है उन्हें और बदलाव की जरूरत बता रहे हैं वो। हाँ, उन्होंने आरएसएस, भाजपा और मनुवाद की मुखालफत की बात भी की लेकिन क्या इसके लिए उन पर ‘देशद्रोह’ का मुकदमा ठोक दिया जाय..? नहीं, हरगिज नहीं। बात यहीं तक रहती तो ठीक था। पर अपनी ‘रौ’ में कन्हैया ये भी कह गए कि कौन है कसाब..? कौन है अफजल गुरु..? कौन हैं ये लोग जो अपने शरीर में बम बांधकर हत्या करने को तैयार हैं..? इन पर यूनिवर्सिटी में बहस होनी चाहिए।

अगर कन्हैया का विरोध “फांसी’ के लिए था और वो इस पर ‘बहस’ चाहते थे तो उन्हें बस वहीं तक रहना चाहिए था। उनके प्रति पूरी सहानुभूति होने के बावजूद कसाब या अफजल तक उनका पहुँचना अखरता है। वो बेजोड़ और जोशीले वक्ता हैं इसमें कोई दो राय नहीं लेकिन जोश के साथ होश का ख्याल उन्हें हर हाल में रखना चाहिए था। तब तो और भी ज्यादा जब मुद्दा इतना संवेदनशील हो, कैंपस जेएनयू का हो और वो स्वयं छात्रसंघ के अध्यक्ष की हैसियत से बोल रहे हों। उस वक्त किसी भी तरह के ‘अतिवाद’ से बचने की नैतिक जिम्मेदारी बनती थी उनकी। माना कन्हैया से ‘भूल’ हुई लेकिन उस ‘भूल’ को ‘अपराध’ कहना और ‘देशद्रोह’ करार देना उससे भी बड़ी ‘भूल’ होगी। ऐसी कोशिश करने वालों को आँखें खोलकर देखना और सोचना चाहिए कि कन्हैया के समर्थन में हो रहे प्रदर्शनों में ‘भगत सिंह’ और ‘रोहित वेमुला’ की तस्वीरों वाली तख्तियां क्यों हैं..?

जेएनयू कैंपस में हुए 9 फरवरी के उस विवादित कार्यक्रम के ‘अलग-अलग’ विडियो सामने लाए जा रहे हैं। तस्वीरों से ‘छेड़छाड़’ की जा रही है। ये साबित करने की कोशिश की जा रही है कि कन्हैया ने देशविरोधी नारे लगाए और वो ‘देशद्रोही’ हैं। ये सारी कवायद तकलीफदेह है। जरूरत इस बात की है कि कन्हैया जैसे छात्रों की ‘धार’ से बदहाल व्यवस्था के ढाँचे और साँचे को तराशा जाय। उनके भीतर की ‘आग’ से देश के लिए ‘ऊर्जा’ पैदा की जाय। वामपंथ या दक्षिणपंथ का चश्मा लगाकर हम किसी ‘कन्हैया’ को करीब से नहीं जान पाएंगे। पहले हम ऐसे किसी भी चश्मे को उतारें, फिर देखें कि बिहार के बीहट से कितनी बड़ी ‘संभावना’ ने जन्म लिया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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भारतवंशी श्रीकांत श्रीनिवासन होंगे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के अगले जज !

भारतवासियों को गौरव से भर देने वाली ख़बर..! अगर अन्तिम क्षणों में कोई उलटफेर ना हो तो भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक श्रीकांत श्रीनिवासन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के अगले जज होंगे। 23 फरवरी 1967 को जन्मे 48 वर्षीय श्रीनिवासन इस पद पर पहुँचने वाले पहले भारतवंशी होंगे। जस्टिस एंटोनिन स्कैलिया की संदिग्ध अवस्था में अचानक मृत्यु के बाद यह पद रिक्त हुआ है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार संभावित जजों की सूची में श्रीकांत श्रीनिवासन का नाम सबसे ऊपर है। श्रीनिवासन अभी कोलंबिया डिस्ट्रिक्ट सर्किट की अपीलीय अदालत के जज हैं। बता दें कि कोलंबिया डिस्ट्रिक्ट सर्किट को आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के लिए नामांकित होने वाले जजों के लिए ‘लांचिंग पैड’ माना जाता है।

राष्ट्रपति बराक ओबामा ने विपक्षी दलों के विरोध के बावजूद स्कैलिया के उत्तराधिकारी को नामांकित करने की संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरा करने की बात कही है। स्कैलिया रूढ़िवादियों में लोकप्रिय थे। ऐसे में ओबामा इस बात को भलीभाँति जानते हैं कि उन्हें ऐसे उम्मीदवार की तलाश करनी है जिसे रिपब्लिकन भी स्वीकार करें। इस कसौटी पर श्रीनिवासन खरे उतरते हैं क्योंकि कांग्रेस में जबरदस्त राजनीतिक गतिरोध के बावजूद सीनेट में श्रीनिवासन को फेडरल जज बनाने के नामांकन को 97-0 से स्वीकार किया गया था और रिपब्लिकन पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद की दावेदारी हासिल करने में जुटे टेड क्रूज और मार्को रूबियो ने भी उनके पक्ष में वोट किया था। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में उनका पहुँचना तय माना जा रहा है।

श्रीकांत श्रीनिवासन की ना केवल जड़ भारत में है बल्कि वे दक्षिण और उत्तर भारत के बीच बड़ा दिलचस्प संतुलन भी साधते हैं। वो यूँ कि उनके पिता तिरुनेलवेली के थे और माँ चेन्नई की लेकिन श्रीनिवासन का जन्म चंडीगढ़ में हुआ था। श्रीनिवासन के माता-पिता 1960 में अमेरिका आए थे और पेशे से दोनों शिक्षक थे। पिता कान्सास यूनिवर्सिटी में मैथ्स के प्रोफेसर थे तो माँ कान्सास सिटी आर्ट इंस्टीट्यूट में पढ़ाती थीं।

कठिन परिश्रमी और स्वभाव से उदारवादी श्रीनिवासन ने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया और स्टैनफोर्ड लॉ स्कूल और स्टैनफोर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस से लॉ और बिजनेस में मास्टर्स किया। वे ओबामा के मुख्य उपमहाधिवक्ता रह चुके हैं। 2013 में उन्हें कोलंबिया सर्किट की अपीलीय अदालत का जज नियुक्त किया गया था। इस पद पर भी पहुँचने वाले वे पहले भारतवंशी हैं। अमेरिका के ‘सिलिकॉन वैली’ से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक भारतवंशियों का जलवा… सचमुच ‘असाधारण’ है ये उपलब्धि..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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इन पाँच ‘खिड़कियों’ से देखें… तब दिखेगी पूरी बसंत पंचमी

बसंत पंचमी यानि माघ महीने की शुक्ल पंचमी यानि ऋतुओं के राजा बसंत के आगमन का उद्घोष। इसी दिन से बसंत ऋतु की शुरुआत होती है और प्रकृति नवयौवना-सी सजना-संवरना शुरू करती है। पेड़ों के पुराने पत्तों की जगह आप नई कोंपलों को देखते हैं और प्रकृति में जैसे नए जीवन का संचार हो उठता है। बसंत सच्चे अर्थों में प्रकृति का उत्सव है जिसका आगाज उसकी पंचमी से होता है। पर केवल इतनी ही नहीं है बसंत पंचमी। इस बसंत पंचमी को देखने की खातिर कई खिड़कियाँ हैं। चलिए उनमें से इन पाँच खिड़कियों को खोलें।

पहली खिड़की…

बसंत पंचमी से जुड़ी एक रोचक कथा है। भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना तो कर दी लेकिन वो स्वयं अपनी रचना से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें अपनी ही रची सृष्टि मलिन और उदास लगती थी। हर तरफ बस मौन ही मौन छाया रहता था। उन्हें लगा कहीं कुछ कमी रह गई है। बहुत सोचने के बाद उन्होंने विष्णु से आज्ञा लेकर पृथ्वी पर अपने कमंडल से जल छिड़का। जलकण के पड़ते ही पृथ्वी में कम्पन होने लगा और वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई। वह एक चतुर्भुजी सुन्दर स्त्री थी जिसके एक हाथ में वीणा थी और दूसरा हाथ वर की मुद्रा में था। शेष दोनों हाथों में पुस्तक और माला थी। जी हाँ, वो शक्ति माँ सरस्वती थी। ब्रह्मा ने उनसे वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही माँ सरस्वती ने वीणा का मधुर नाद किया पूरी सृष्टि गुंजायमान हो गई। संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को ‘वाणी’ प्राप्त हो गई। तभी तो उन्हें वीणावादिनी और वाग्देवी जैसे नामों से पुकारते हैं। इस तरह बसंत पंचमी माँ सरस्वती का जन्मोत्सव भी है जिसे हम सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं।

दूसरी खिड़की…

बसंत पंचमी हमें त्रेता युग और रामकथा से भी जोड़ती है। सीताहरण के बाद श्रीराम उन्हें खोजते हुए दक्षिण की ओर बढ़े और जिन स्थानों पर वो गए उनमें एक दंडकारण्य भी था। यहीं शबरी नाम की भीलनी रहती थी जिसने राम की भक्ति में विभोर होकर उन्हें अपने जूठे बेर खिलाए थे। वह स्थान वर्तमान गुजरात के डांग जिले में है जहाँ शबरी का आश्रम था। आपको बता दें कि श्रीराम बसंत पंचमी के दिन ही शबरी के यहाँ गए थे।

तीसरी खिड़की…

बसंत पंचमी का ऐतिहासिक महत्व भी कम नहीं। ये दिन हमें इतिहासप्रसिद्ध पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। पृथ्वीराज ने मोहम्मद गोरी को सोलह बार पराजित किया और हर बार उदारता दिखाते हुए उसे छोड़ दिया। पर जब सत्रहवीं बार वो स्वयं पराजित हुए तब गोरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आँखें फोड़ दीं। इसके बाद की घटना जगतप्रसिद्ध है। मोहम्मद गोरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व पृथ्वीराज के शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा और पृथ्वीराज ने इस बार कोई भूल नहीं की। अपने साथी चंदबरदाई की मदद से उन्होंने पहले अपने बाण को गोरी के सीने में पहुँचाया और इसके बाद पृथ्वीराज और चंदबरदाई ने एक-दूसरे के पेट में छुरा भोंक आत्मबलिदान दे दिया। 1192 में ये ऐतिहासिक घटना बसंत पंचमी के दिन ही हुई थी।

चौथी खिड़की…

बसंत पंचमी का एक सूत्र ‘कूका पंथ’ की स्थापना करने वाले गुरु रामसिंह कूका से भी जुड़ा है। 1816 ई. में उनका जन्म बसंत पंचमी के दिन ही हुआ था। गुरु रामसिंह ने उस युग में ना केवल नारी उद्धार, अन्तर्जातीय विवाह, सामूहिक विवाह, स्वदेशी और गोरक्षा के लिए आवाज बुलंद की थी बल्कि अंग्रेजों से लड़ते हुए अपनी शहादत भी दी थी।

पाँचवीं खिड़की…

बसंत पंचमी के ही दिन 1899 में सरस्वती के वरदपुत्र महाकवि निराला का जन्म भी हुआ था। अपनी रचनाओं से हिन्दी को उन्होंने जैसा गौरव दिया उसकी कोई सानी नहीं। इस ‘महाप्राण’ को जाने बिना तो ‘सरस्वती’ की पूजा भी पूरी ना होगी।

बसंत पंचमी को चाहे प्रकृति में देखें चाहे पुराणों में… त्रेतायुग में ढूंढ़ें या आधुनिक भारत में… इतिहास की नज़र से देखें या साहित्य में गोते लगाकर… अन्त में हम बस यही पाएंगे कि यौवन हमारे जीवन का बसंत है और बसंत इस ‘सृष्टि’ और हमारे ‘संस्कार’ का यौवन।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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