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सलाम साइना

बैडमिंटन में भारत को नई ऊँचाईयां देने वाली साइना नेहवाल ने एक बार फिर पूरे देश का सिर गर्व से ऊँचा कर दिया। बीते रविवार को शानदार खेल दिखाते हुए उन्होंने ऑस्ट्रेलियन ओपन सुपर सीरीज अपने नाम कर लिया। सिडनी में खेले गए फाइनल मैच में साइना ने चीन की सुन यू को 11-21, 21-14, 21-19 से हराया। बता दें कि साइना ने इस खिताब पर दूसरी बार कब्जा किया है और ऐसा करने वाली वो पहली खिलाड़ी हैं। रियो ओलंपिक से पहले हासिल की गई ये जीत उनके लिए निश्चित रूप से मोरल बूस्टर का काम करेगी।

7.5 लाख डॉलर की इनामी राशि वाले इस टूर्नामेंट का फाइनल मुकाबला अत्यंत रोमांचक रहा। तमाम भारतीय दर्शक उस वक्त बेहद निराश हुए जब साइना ने अपना पहला सेट गंवा दिया था। लेकिन जबरदस्त वापसी करते हुए उन्होंने दूसरा सेट अपने नाम कर लिया। हालांकि, तीसरे सेट में सुन यू ने उन्हें कड़ी टक्कर दी लेकिन साइना ने अंतत: खिताब अपने नाम कर लिया। सुन यू के खिलाफ साइना का पलड़ा वैसे भी भारी रहा है। इससे पहले खेले गए छह मुकाबलों में साइना को पाँच बार जीत मिली थी। पिछली बार साइना ने चाइना ओपन में सुन यू के खिलाफ जीत हासिल की थी।

साइना की ये जीत महज एक खिलाड़ी की जीत नहीं है। उनकी ये जीत हरियाणा के उस समाज को चुनौती है जो महिलाओं को पुरुषों से कम समझता है। ये हरियाणा ही है जहाँ सबसे ज्यादा कन्या भ्रूण हत्यायें होती हैं। यहीं के एक जाट परिवार में जब साइना का जन्म हुआ था तो उनकी दादी ने अपनी पोती का चेहरा देखने से इंकार कर दिया था। कई महीनों तक उन्होंने साइना से खुद को दूर रखा। लेकिन, साइना के माता-पिता ने उन्हें हमेशा अपनी शक्ति समझा। बैडमिंटन खिलाड़ी माता-पिता ने शुरू से ही साइना को बैडमिंटन खेलने के लिए प्रेरित किया। साइना के साथ उन्होंने भी जी-तोड़ मेहनत की और एक दिन वो आया जब साइना विश्व बैडमिंटन रैंकिंग में शीर्ष स्थान तक पहुँचीं।

ये साइना ही थीं जिन्होंने बैडमिंटन में चीनी खिलाड़ियों के वर्चस्व को खत्म कर भारतीय चुनौती को जिंदा किया। ओलंपिक खेलों में महिला एकल क्वार्टर फाइनल तक पहुंच कर कांस्य पदक जीतने वाली वो देश की पहली महिला खिलाड़ी बनीं। अपनी बेजोड़ उपलब्धियों के कारण 26 वर्षीया साइना ‘पद्मभूषण’ और ‘राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार’ से सम्मानित हो चुकी हैं।

साइना ने जितनी मेहनत अपने इस मुकाम को हासिल करने के लिए की है, उससे ज्यादा त्याग उनके माता-पिता ने उन्हें इस मंजिल तक पहुंचाने में किया है। उन्होंने जाट समुदाय की बेटियों के कमतर होने की बात को गलत साबित करके दिखाया है। आज साइना की दादी को भी उन पर गर्व है। देश का गुरूर बन चुकी इस बेटी को दिल से सलाम।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सिब्बल, वैंकेया, अमर, ऑस्कर और एमजे अकबर राज्य सभा पहुँचे

आज सात राज्यों में राज्य सभा की 27 सीटों के लिए हुए चुनाव में भाजपा के 11, सपा के 7, कांग्रेस के 6, बसपा के 2 और एक निर्दलीय उम्मीदवार ने जीत हासिल की। यूपी में तमाम आशंकाओं को दरकिनार करते हुए कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने जीत हासिल की। उनकी जीत की राह बसपा के समर्थन से आसान हुई। सिब्बल के अलावे आज संसद के उच्च सदन पहुँचने वाले अन्य प्रमुख उम्मीदवार हैं – राजस्थान से केन्द्रीय मंत्री वैंकेया नायडू, यूपी से सपा के अमर सिंह और बेनी प्रसाद वर्मा तथा बसपा के सतीश चंद्र मिश्र, मध्य प्रदेश से भाजपा के एमजे अकबर, झारखंड से केन्द्रीय मंत्री मुख्तार अब्बास नकवी, हरियाणा से केन्द्रीय मंत्री बीरेन्द्र सिंह, कर्नाटक से केन्द्रीय मंत्री निर्मला सीतारमण तथा कांग्रेस उम्मीदवार ऑस्कर फर्नांडीस और जयराम रमेश एवं उत्तराखंड से कांग्रेस के प्रदीप टम्टा।

कांग्रेस की निगाह यूपी पर टिकी हुई थी। भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी प्रीति महापात्रा के मैदान में आने के बाद कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और पूर्व केन्द्रीय मंत्री कपिल सिंब्बल की लड़ाई मुश्किल हो गई थी। पर मायावती के समर्थन से सिब्बल ने ये मुश्किल लड़ाई जीत ली। प्रीति महापात्रा की हार से भाजपा को यहाँ झटका लगा। बता दें कि कांग्रेस के सिब्बल के अतिरिक्त यूपी से सत्तारूढ़ सपा के सभी सात उम्मीदवार तथा बसपा के दो और भाजपा के एक उम्मीदवार ने जीत हासिल की।

प्रीति महापात्रा को लेकर भाजपा को यूपी में जहाँ मुँह की खानी पड़ी, वहीं हरियाणा और झारखंड में वो उलटफेर करने में कामयाब रही। हरियाणा में भाजपा समर्थित निर्दलीय प्रत्याशी व जी टीवी के संस्थापक सुभाष चन्द्रा ने जीत हासिल की। इन्होंने प्रसिद्ध अधिवक्ता तथा कांग्रेस और आईएनएलडी समर्थित उम्मीदवार आरके आनंद को हराया। उधर झारखंड में भाजपा ने दोनों सीटें जीत लीं। यहाँ भाजपा के पहले उम्मीदवार मुख्तार अब्बास नकवी तो आसानी से जीते ही, इसके दूसरे उम्मीदवार महेश पोद्दार ने भी जेएमएम के बसंत सोरेन को हरा दिया। जबकि बसंत सोरेन को कांग्रेस का समर्थन भी हासिल था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अहम पदों पर ओबीसी आरक्षण हटाने की जल्दी में क्यों केन्द्र सरकार?

केन्द्र सरकार ने एक बड़ा फैसला लेते हुए ओबीसी यानि अन्य पिछड़ा वर्ग को प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर की नौकरी के लिए मिलने वाले आरक्षण के लाभ को समाप्त कर दिया है। अब इन पदों के लिए नौकरी पाने की इच्छा रखने वालों को सामान्य वर्ग के साथ कदमताल करना पड़ेगा। केन्द्र सरकार ने अचानक लिए इस फैसले को तत्काल प्रभाव से लागू भी कर दिया है।

बता दें कि इस फैसले से पहले प्रोफेसर, एसोसिएट प्रोफेसर और असिस्टेंट प्रोफेसर के पदों पर ओबीसी के लिए 27 प्रतिशत आरक्षण निर्धारित था लेकिन यूजीसी द्वारा देश के सभी 40 केन्द्रीय विश्वविद्यालयों में भेजे गए नोटिस के मुताबिक प्रोफेसर और एसोसिएट प्रोफेसर के पदों पर इस वर्ग को मिलने वाला आरक्षण तत्काल प्रभाव से हटा लिया गया है। अब इस वर्ग के अभ्यर्थियों को आरक्षण का लाभ केवल असिस्टेंट प्रोफेसर के पद के लिए मिलेगा। जबकि एससी (अनुसूचित जाति) और एसटी (अनुसूचित जनजाति) को पूर्व की भँति इन तीनों पदों पर आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा।

ओबीसी को इन पदों पर आरक्षण मिलना चाहिए या नहीं या फिर आरक्षण सही है या गलत, यहाँ ये मुद्दा नहीं। मुद्दा ये है कि आखिर केन्द्र सरकार ने किस ‘मजबूरी’ या ‘दबाव’ में ये फैसला लिया? और लिया भी तो इतना अहम फैसला इस कदर ‘अचानक’ और ‘आनन-फानन’ में क्यों? बिना किसी चर्चा या रायशुमारी के लिए गए इस फैसले से ना केवल ओबीसी वर्ग में गलत संदेश जाएगा बल्कि इस फैसले के बाद केन्द्र सरकार पर ‘आरक्षणविरोधी’ होने के आरोप भी स्वाभाविक रूप से लगेंगे। और कुछ ना सही, केन्द्र सरकार को कम-से-कम इतने बड़े फैसले के पीछे रहा कोई एक बड़ा कारण तो बताना ही चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप    

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निर्विरोध चुने गए शरद, मीसा, राम जेठमलानी, आरसीपी और गोपाल

आज नाम वापसी की समयसीमा खत्म होने के साथ बिहार से राज्य सभा के पाँचों उम्मीदवार निर्विरोध चुन लिए गए। जेडीयू से शरद यादव और रामचंद्र प्रसाद सिंह, आरजेडी से मीसा भारती और राम जेठमलानी और बीजेपी से गोपाल नारायण सिंह संसद के उच्च सदन में पहुँचे। बता दें कि महाठबंधन के चारों उम्मीदवारों ने 30 मई और बीजेपी के उम्मीदवार ने 31 मई को नामांकन दाखिल किया था।

उधर बिहार विधान परिषद के सात उम्मीदवार भी निर्विरोध चुने गए। इनमें महागठबंधन के तीन और बीजेपी के दो उम्मीदवार थे। जेडीयू ने गुलाम रसूल बलियावी और सीपी सिन्हा, आरजेडी ने कमर आलम और रणविजय सिंह, कांग्रेस ने तनवीर अख्तर और बीजेपी ने अर्जुन सहनी और विनोद नारायण झा को उम्मीदवार बनाया था।

राज्य सभा के लिए निर्वाचित होने वाले अन्य राज्यों के प्रमुख उम्मीदवारों में रेल मंत्री सुरेश प्रभु और कांग्रेस नेता अंबिका सोनी शामिल हैं। बीजेपी ने प्रभु को आंध्र प्रदेश से तो कांग्रेस ने अंबिका को पंजाब से उम्मीदवार बनाया था। निर्विरोध चुनाव जीतने वाले अन्य प्रमुख उम्मीदवार हैं – पूर्व वित्त मंत्री और वरिष्ठ कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम, केन्द्र के वर्तमान और तेजतर्रार मंत्री पीयूष गोयल, पूर्व केन्द्रीय मंत्री और एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल तथा शिवसेना के संजय राउत। ये सभी महाराष्ट्र से उम्मीदवार थे।

बता दें कि बिहार के साथ ही महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और पंजाब के सभी उम्मीदवार निर्विरोध संसद के उच्च सदन पहुँच रहे हैं। बस उत्तर प्रदेश में आखिरी क्षणों में निर्दलीय प्रीति महापात्र के 12वां उम्मीदवार बनने के कारण वहाँ की 11 सीटों का चुनाव जरूर दिलचस्प हो गया है। यहाँ अब अगले हफ्ते 11 जून को चुनाव होना तय है। इस चुनाव में कांग्रेस उम्मीदवार कपिल सिब्बल की प्रतिष्ठा दांव पर लगी होगी क्योंकि यूपी में कांग्रेस के केवल 29 विधायक हैं और राज्य सभा पहुँचने के लिए जरूरत 34 वोटों की है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अच्छी ख़बर, 10 सालों में बाल विवाह में आई 14 प्रतिशत की कमी

आज जबकि भ्रष्टाचार, अपराध, हिंसा और राजनीति की उठापटक से जुड़ी ख़बरों से ही मीडिया को फुरसत ना मिलती हो और अच्छी ख़बरों के लिए कान तरस जाते हों, ऐसे में कोई सकारात्मक और प्रगतिमूलक ख़बर सुनने को मिले तो कहना ही क्या..! जी हाँ, ऐसी ही एक ख़बर है देश में बाल विवाह के आँकड़ों में कमी आना। हमारे समाज में व्याप्त यह कुरीति विभिन्न धार्मिक समुदायों और यहाँ तक कि अल्प शिक्षित वर्गों में भी तेजी से समाप्त हो रही है। बता दें कि कल जारी की गई 2011 की जनगणना के मुताबिक बीते 10 सालों में बाल विवाह में 14 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। 18 साल से पहले ब्याह दी जाने वाली लड़कियों का आँकड़ा 2001 में 44 प्रतिशत था जो 2011 में घटकर 30 प्रतिशत रह गया।

बाल विवाह के मामले में हिन्दू और मुस्लिम समुदाय की स्थिति कमोबेश एक जैसी है। दोनों समुदायों में 31 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले कर दी जाती है। एक दशक पहले यह आँकड़ा 43 से 45 प्रतिशत था। सिख और ईसाई समुदायों की बात करें तो इनमे बाल विवाह की दर मात्र 11-12 प्रतिशत है, जबकि जैन समाज में 16 प्रतिशत लड़कियों की शादी व्यस्क होने से पहले कर दी जाती है। बौद्धों में यह आँकड़ा 28 प्रतिशत है और पारसी समेत अन्य धार्मिक समूहों में 24 प्रतिशत।

समाज में आए इस बदलाव की बड़ी वजह विभिन्न समुदायों का मिलकर रहना और उनमें आधुनिक शिक्षा का प्रसार है। आँकड़ों के मुताबिक जिन लड़कियों को पढ़ाई का अवसर मिला, उनकी शादी भी अमूमन देर से हुई। दूसरी ओर अशिक्षित लड़कियों में से करीब 38 प्रतिशत की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो गई। हालांकि 2001 में यह आँकड़ा 51 प्रतिशत का था। वहीं, ग्रैजुएट या उससे ऊपर की पढ़ाई करने वाली लड़कियों में से महज 5 प्रतिशत की शादी ही 18 साल की उम्र से पहले हुई।

जनगणना के ताजा आँकड़ों से पता चलता है कि शादी, बच्चे और ऐसे तमाम मसलों पर विभिन्न धार्मिक समुदायों की सोच कमोबेश एक जैसी है। शादी की औसत उम्र में बढ़ोतरी, दो बच्चों के पैदा होने के बीच अंतर आदि मसलों पर एक जैसा रुझान देखा जा सकता है। पर यहाँ इस बात का उल्लेख भी जरूरी है कि बाल विवाह की कुरीति भले ही कम हो रही हो लेकिन दहेज प्रथा, बेटे की चाह और कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराइयां अभी भी हमारे समाज में पहले की तरह व्याप्त हैं। काश कि हम आपको इनके आँकड़ो में कमी की ख़बर भी दे पाते..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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और लालू ने ममता से पहली बंगाली प्रधानमंत्री बनने को कहा..!

विधान सभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज करने वाली ममता बनर्जी ने आज दूसरी बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिया। उनके शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव साथ-साथ कोलकाता पहुँचे। इस अवसर पर लालू ने ममता से कुछ ऐसा पूछ लिया जो कहने को था तो मजाक लेकिन उसके राजनीतिक मायने भी लगा लिए जाएं तो कोई बड़ी बात ना होगी।

वाक्या कुछ यों है कि लालू ने ममता से पूछा कि “क्या वह पहली बंगाली प्रधानमंत्री बनेंगी..?” इस पर ममता ने कहा कि “आप ही लोग बन जाओ।“ लालू ने बाद में ये भी कहा कि साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने के लिए ममता बनर्जी और भाजपाविरोधी बाकी नेताओं के साथ जल्द ही एक बड़ी बैठक होगी।

बता दें कि एक इंटरव्यू के दौरान जब ममता से प्रधानमंत्री बनने का सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा था कि वो एक आम इंसान हैं और वीआईपी की जगह एक सामान्य इंसान की तरह पहचानी जाना चाहती हैं। हालांकि उन्होंने साथ में ये भी कहा था कि उनके कई ऐसे दोस्त हैं जिनके साथ वो भाजपाविरोधी गठबंधन के बारे में बात कर सकती हैं। इस संदर्भ में पूछे जाने पर उन्होंने नीतीश कुमार, नवीन पटनायक और अरविन्द केजरीवाल का नाम भी लिया था। पर कांग्रेस के नाम पर उन्होंने कुछ खास प्रतिक्रिया नहीं दी थी।

अब जरा असल मुद्दे पर लौटें। ये सच है कि लालू मजाकिया स्वभाव के हैं और इससे सारी दुनिया वाकिफ भी है। पर कई बार वो मजाक-मजाक में कुछ ऐसा कह और कर जाते हैं जिसका निहितार्थ लोग बाद में समझते हैं। आज ममता से लालू ने जो पूछा उसे लोग भले ही मजाक समझें लेकिन क्या ऐसा कह कर ‘बड़े भाई’ ने ‘छोटे भाई’ के बरक्स ममता को खड़ा नहीं कर दिया..? कहीं आज का ये ‘मजाक’ कल होकर नीतीश के ‘अखिल भारतीय’ सपने पर ‘ग्रहण’ ना लगा दे..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

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पुडुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर बनीं किरण बेदी

भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी पुडुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर (एलजी) होंगी। केन्द्र के प्रस्ताव पर मुहर लगाते हुए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने आज उन्हें पुडुचेरी का एलजी नियुक्त किया। किरण 2015 में दिल्ली में भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार थीं। इस चुनाव में भाजपा को तो हार का सामना करना ही पड़ा, स्वयं किरण बेदी भी भाजपा का गढ़ मानी जाने वाली कृष्णानगर सीट से चुनाव हार गई थीं।

किरण बेदी को पुडुचेरी का एलजी बनाए जाने के पीछे कई कयास लगाए जा रहे हैं। इसे उन्हें दिल्ली की राजनीति से दूर रखने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक दिल्ली भाजपा में बड़ा फेरबदल होने वाला है। संभव है कि पार्टी यहाँ जल्द ही किसी नए और चर्चित चेहरे को दिल्ली भाजपा का अध्यक्ष बनाए। इसके लिए नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से भाजपा सांसद मनोज तिवारी का नाम सबसे आगे चल रहा है। याद दिला दें कि दिल्ली चुनाव के दौरान मनोज तिवारी द्वारा किरण बेदी की ‘कार्यशैली’ पर की गई ‘टिप्पणी’ काफी चर्चा में रही थी।

बहरहाल, एलजी बनाए जाने पर किरण ने सरकार का आभार जताया। वो पुडुचेरी की 24वीं लेफ्टिनेंट गवर्नर होंगी। वो अजय कुमार सिंह की जगह लेंगी। 1972 में देश की पहली महिला आईपीएस बनने वाली किरण ने 35 सालों तक पुलिस में अपनी सेवा दी। इस दौरान वो तिहाड़ जेल की आईजी भी रहीं। उनकी कर्तव्यनिष्ठता और ईमानदारी की आज भी मिसाल दी जाती है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री और अन्ना आन्दोलन के दौरान उनके साथी रहे अरविन्द केजरीवाल ने उन्हें इस नई जिम्मेदारी के लिए जहाँ बधाई दी, वहीं चर्चित कवि और केजरीवाल के करीबी कुमार विश्वास उन पर तंज कसने से नहीं चूके। उन्होंने ट्वीट किया – “वो जो फिरता था लिए हाथ में सूरज कल तक, आज खैरात में जुगनू बटोर कर खुश है।”

भाजपा चाहे जिस भी वजह से किरण बेदी को पुडुचेरी भेज रही हो पर कहना पड़ेगा कि किरण बेदी जैसी शख़्सियत के लिए ‘खैरात’ जैसे शब्द का प्रयोग कर कुमार विश्वास ने मर्यादा का उल्लंघन किया है। किरण में खुद की ‘इतनी’ रोशनी जरूर थी और है कि वो ‘जुगनू’ से भी जग को रोशन कर दे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

 

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क्या कहते हैं पाँच राज्यों के परिणाम..?

पाँच राज्यों में हुए विधानसभा के नतीजों में पश्चिम बंगाल में ‘दीदी’ और तमिलनाडु में ‘अम्मा’ का डंका एक बार फिर बजा तो असम में सर्वानंद ने भाजपा को ‘आनंद’ से भर दिया। वहीं केरल ‘लाल’ होकर लेफ्ट के हाथों में चला गया। रहा पुडुचेरी तो वहाँ डीएमके और कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने बता दिया कि वो अकेले सब पर भारी हैं। वहाँ ना तो लेफ्ट और कांग्रेस का ‘अस्वाभाविक’ गठबंधन उनके सामने टिका, ना ही मोदी और उनके रणनीतिकारों की ‘मेहनत’ काम आई। यहाँ ममता अकेले 294 में से 211 सीटें ले उड़ीं और मुकाबले को एकतरफा कर दिया। कांग्रेस को 44, लेफ्ट को 32, भाजपा को 3 और अन्य को 4 सीटों पर संतोष करना पड़ा।

असम में सत्ता की दौड़ भाजपा ने जीती और अब उत्तर-पूर्व में पहली बार उसकी सरकार बनने जा रही है। यहाँ कांग्रेस को 15 साल के शासन से बेदखल करना उसकी बड़ी उपलब्धि है। भाजपा को यहाँ अपने मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार सर्वानंद सोनोवाल की साफ-सुथरी छवि का बड़ा लाभ मिला। यहाँ की 126 सीटों में से उसके गठबंधन ने 86 सीटें अपने नाम कर लीं, जबकि कल तक यहाँ शासन में रही कांग्रेस अपने साथियों के साथ महज 26 सीटों पर सिमट गई। आईयूडीएफ को 13 और अन्य को 1 सीट मिली।

तमिलनाडु में जयललिता ने जबरदस्त वापसी की। 27 सालों में यहाँ पहली बार ऐसा हुआ कि एक पार्टी सरकार लगातार दूसरी बार बनने जा रही है। यहाँ की 234 में से 134 सीटें एआईएडीएमके के खाते में गईं। डीएमके और कांग्रेस मिलकर भी एआईडीएमके का सामना नहीं कर पाईं। तमाम कोशिशों के बावजूद करुणानिधि की पार्टी को जहाँ 89 सीटें ही मिलीं, वहीं कांग्रेस किसी तरह 8 सीटों पर काबिज हो पाई। अन्य के खाते में 1 सीट गई।

बुरे वक्त से गुजर रही कांग्रेस को केरल में भी निराश होना पड़ा। यहाँ की 140 सीटों में से 91 सीटें लेफ्ट गठबंधन के हिस्से में गईं। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ 47 सीटें ही मिल पाईं। 1 सीट के साथ भाजपा ने यहाँ अपना खाता खोला। बची 1 सीट अन्य को मिली।

30 सीटों वाले पुडुचेरी ने डीएमके और कांग्रेस के जख्म पर थोड़ा मरहम जरूर लगाया। इन दोनों ने मिलकर यहाँ 17 सीटें अपने नाम कीं। एआईएनआरसी को 9, एआईएडीएमके को 4 और अन्य को 1 सीट मिली।

इन राज्यों के परिणाम आने के बाद स्वाभाविक रूप से कांग्रेस खेमे में मायूसी है और भाजपा उत्साहित दिख रही है। देखा जाय तो भाजपा का उत्साह अकारण भी नहीं है। अगर इन पाँच राज्यों की सीटों को मिलाकर देखें तो भाजपा ने 670 सीटों पर चुनाव लड़ा और 65 सीटों पर दर्ज की, जबकि 2011 में पार्टी ने 771 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे बस 5 सीटों पर जीत मिली थी। इस बार उसकी सीटों में जहाँ 13 गुना इजाफा हुआ वहीं असम भी झोली में आ गिरा। लेकिन इन परिणामों ने यह भी स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय दलों का युग अभी समाप्त होने वाला नहीं। दिन-ब-दिन कमजोर होती कांग्रेस से देश भर में भाजपा को जितना भी लाभ मिला हो, सच यही है कि उससे कहीँ अधिक फायदे में क्षेत्रीय दल रहे हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार रचेगा इतिहास, राज्य में दौड़ेगी स्काई ट्रेन

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सात निश्चयों में एक निश्चय पाँच घंटे में बिहार के किसी भी कोने से पटना पहुँचना है। पर बिहार के नगर विकास एवं आवास विभाग की कोशिश इस समय को और कम करने की है। इतना कम कि शायद आप यकीन ना करें। जी हाँ, अगर विभाग की ये कोशिश रंग लाई तो बहुत जल्द बिहार में स्काई ट्रेन दौड़ती दिखाई देगी जो बिहार के जिला मुख्यालयों से पटना को 240 से 260 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से जोड़ेगी।

नगर विकास एवं आवास विभाग ने इस दिशा में अपने कदम बढ़ा दिए हैं। सरकार इस योजना को पीपीपी मोड (सार्वजनिक-निजी सहभागिता) पर चलाएगी। विभाग के मंत्री माहेश्वर हजारी ने स्काई ट्रेन का निर्माण करने वाली कम्पनी ‘नाईटशेड ग्लोबल इंफ्रा’ से विचार-विमर्श के बाद अधिकारियों से इस दिशा में आगे बढ़ने को कहा है। जल्द ही विभाग इस प्रोजेक्ट की तकनीकी जाँच कराएगा। रिपोर्ट में सब कुछ ठीक रहा तो सरकार इस योजना को अमलीजामा पहनाने में लग जाएगी।

बता दें कि स्काई ट्रेन को नासा ने डिजाईन किया है। पोल के सहारे चलने वाली यह ट्रेन छोटी-छोटी बोगियों का समूह होगी। एक बोगी में चार लोग बैठ सकेंगे। मेट्रो ट्रेन से तुलना करें तो स्काई ट्रेन रफ्तार में उससे लगभग चार गुना तेज और लागत में लगभग चार गुना कम होगी। मेट्रो की रफ्तार 55 से 80 किमी प्रति घंटा होती है, जबकि स्काई ट्रेन की 240 से 260 किमी प्रति घंटा। इसी तरह मेट्रो की लागत 250 से 500 करोड़ प्रति किमी होती है, जबकि स्काई ट्रेन की 90 से 120 करोड़ प्रति किमी।

स्काई ट्रेन की एक बड़ी खूबी यह है कि इसके लिए भूमि अधिग्रहण की ज्यादा जरूरत नहीं होगी। यही नहीं, इसके रखरखाव पर भी ज्यादा खर्च नहीं होगा और ध्वनि प्रदूषण भी काफी कम होगा। वर्तमान में इस ट्रेन का परिचालन इजरायल में हो रहा है। जहाँ तक भारत की बात है तो बिहार स्काई ट्रेन चलाने वाला पहला राज्य होगा। बिहार सरकार इस महत्वाकांक्षी योजना की शुरुआत बुद्ध सर्किट से करना चाहती है। पहले चरण में इस योजना के तहत गया, बोधगया, राजगीर, वैशाली, केसरिया, अरेराज और लोरिया जैसे शहर पटना से जुड़ेंगे।

संसार के पहले गणतंत्र की स्थापना से लेकर सम्पूर्ण क्रांति की उद्घोषणा तक बिहार हमेशा देश और दुनिया का अगुआ रहा है। आज भी महिलाओं को समान अधिकार देने से लेकर शराबबंदी का अभियान चलाने तक बिहार बाकी राज्यों से आगे है। अगर स्काई ट्रेन जैसी यातायात की नई तकनीक का इस्तेमाल कर बिहार मूलभूत सुविधा के क्षेत्र में भी देश की अगुआई करे तो बढ़ते बिहार को बढ़ते भारत की पहचान बनने से कोई रोक नहीं सकेगा।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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वृद्धाश्रम में रहने को विवश हैं गांधीजी के सबसे प्रिय पोते..!

कहने को हमारा देश महात्मा गांधी के दिखाए रास्ते पर चल रहा है पर उनके परिवार को देखने की फुरसत आज किसी को नहीं है। सुनकर शायद हैरानी हो आपको पर राष्ट्रपिता के सबसे प्रिय पोते वृद्धाश्रम में रहने को विवश हैं। जी हाँ, कभी महात्मा गांधी और कस्तूरबा गांधी की गोद में खेले कनु रामदास गांधी पिछले एक सप्ताह से अपनी पत्नी सहित दिल्ली-फरीदाबाद बॉर्डर स्थित गुरु विश्राम वृद्धाश्रम में रह रहे हैं। पर उनका हालचाल पूछने ना राज्य सरकार की ओर से कोई गया है, ना केन्द्र सरकार की ओर से और ना ही पिछली तीन पीढ़ियों से ‘गांधी’ उपनाम इस्तेमाल करने वाले परिवार और उनकी पार्टी की ओर से।

एमआईटी से शिक्षा प्राप्त कर नासा में काम कर चुके कनु गांधी इसके लिए किसी को दोषी नहीं ठहराते और ना ही गुजरात छोड़कर यहाँ आने का कारण खुलकर बताते हैं। लेकिन यह जरूर कहते हैं कि वो किसी के आगे मदद के लिए हाथ नहीं फैला सकते। सरल स्वभाव के वयोवृद्ध कनु कहते हैं कि “मेरी गलती है कि मैं भीख मांगने से शर्माता हूँ। प्रधानमंत्री वर्धा के सेवाश्रम गए थे, मैंने उन्हें घूम-घूम कर वहाँ के हालात दिखाए थे, उन्होंने मुझसे कहा था कि आप जब चाहें मेरे पास आ सकते हैं, आपके लिए कुछ करूँगा, लेकिन मैं नहीं गया, क्योंकि मुझे हाथ फैलाना पसंद नहीं।”

महात्मा गांधी के बेटे रामदास के बेटे कनु 20 साल की उम्र में गांधीजी की मदद करने सेवाग्राम चले गए थे। बाद के दिनों में वो नासा गए। 40 साल अमेरिका में रहकर भारत लौटे कनु आज अपने नासा में बीते दिनों को याद कर वो भावुक हो उठते हैं। वो कहते हैं कि “मैं याद करता हूँ कि मैंने कैसे काम किया था और आज यह क्या हो गया। मैं अपनी पत्नी की हालत देखता हूँ तो रो पड़ता हूँ।”

कनु गांधी के वृद्धाश्रम आने के बाद से यहाँ ‘आम’ लोगों का आना बढ़ गया है लेकिन किसी ‘खास’ के पैर यहाँ नहीं पड़े। वृद्धाश्रम के मालिक विश्राम मानव बिल्कुल सही कहते हैं कि “यह पूरे देश के लिए शर्म की बात है कि गांधीजी के पोते इस हाल में हैं। मुझे लगता है कि नेताओं से ज्यादा आम लोगों को उनकी कद्र है और वह उनसे मिलने आते हैं।“ ऐसे में कनु गांधी की पत्नी अपना दर्द भला कैसे छिपाएं..? वो यह कहने से खुद को नहीं रोक पातीं कि जिस देश की कल्पना लेकर वापस आए थे, देश वैसा नहीं है।

बहरहाल देखते हैं कि महात्मा गांधी के नाम के बिना जिन नेताओं के भाषण पूरे नहीं होते वे कनु गांधी के लिए कब और क्या करते हैं..! कनु गांधी, जिन्हें हाथ फैलाना पसंद नहीं पर चाहते हैं कि लोग उनकी इस प्रकार से मदद करें कि (उम्र के इस पड़ाव पर भी) उनकी ‘मजबूती’ का इस्तेमाल हो।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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