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सौ भारतीय अमीरों में दो बिहारी

अमेरिकी पत्रिका फोर्ब्स की 100 सबसे अमीर भारतीयों की वार्षिक सूची में बिहार के दो उद्योगपतियों – संप्रदा सिंह और अनिल अग्रवाल – ने अपनी जगह बनाई है। धनकुबेरों की इस सूची में रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रमुख मुकेश अंबानी (कुल सम्पत्ति 1.52 लाख करोड़) लगातार नौवें साल शीर्ष पर हैं। सनफार्मा के दिलीप सांघवी (कुल सम्पत्ति 1.13 लाख करोड़) दूसरे और हिन्दूजा बंधु (कुल सम्पत्ति 1 लाख करोड़) तीसरे स्थान पर हैं। बता दें कि फोर्ब्स की सूची में इस साल छह नए अरबपतियों को पहली बार स्थान मिला है, जिनमें सबसे उल्लेखनीय नाम योगगुरु बाबा रामदेव के सहयोगी और पतंजलि आयुर्वेद के सह संस्थापक आचार्य बालकृष्ण का है। 16 हजार करोड़ की सम्पत्ति के साथ बालकृष्ण 48वें स्थान पर हैं।

बहरहाल, फोर्ब्स द्वारा जारी सूची के अनुसार भारत की पाँचवीं सबसे बड़ी फार्मास्युटिकल्स कम्पनी एल्केम लैबोरेट्रिज के मालिक संप्रदा सिंह सबसे अमीर बिहारी हैं और 17.9 हजार करोड़ की सम्पत्ति के साथ सौ अमीर भारतीयों में 42वें स्थान पर हैं। 25 जनवरी 1926 को बिहार के जहानाबाद जिले में जन्मे संप्रदा पिछले साल इस सूची में 47वें स्थान पर थे। संप्रदा ने अपने भाई नरेन्द्र के साथ 1973 में एल्केम लैबोरेट्रिज की स्थापना की थी। उनकी कम्पनी इस वक्त भारत समेत यूरोप, एशिया, दक्षिण अमेरिका और अमेरिका में संचालित होती है। एल्केम फार्मास्युटिकल्स को फार्मा लीडर अवार्ड मिल चुका है। अपने कार्यक्षेत्र में भीष्म पितामह का दर्जा रखने वाले 91 वर्षीय संप्रदा सिंह वर्तमान में सपरिवार मुंबई में रहते हैं।

7.4 हजार करोड़ की सम्पत्ति के साथ खनन व्यापारी अनिल अग्रवाल इस सूची में स्थान बनाने वाले दूसरे बिहारी हैं। इस साल अनिल को 63वां स्थान मिला है, जबकि पिछले साल वे 53वें पायदान पर थे। 2003 में शुरू हुई अनिल की वेदांता रिसोर्सेस लंदन स्टॉक एक्सचेंज में दर्ज होने वाली पहली भारतीय कम्पनी थी। 24 जनवरी 1954 को बिहार की राजधानी पटना में जन्मे अनिल अग्रवाल ने 15 साल की उम्र में स्कूल छोड़ा और पुणे में अपने पिता के एल्युमीनियम कंडक्टर बनाने के व्यापार में लग गए। 19 साल की उम्र में वे पुणे से मुंबई आए और अपना व्यापार शुरू किया। स्क्रैप मेटल का काम उन्होंने 1970 में शुरू किया और 1976 में शैमशर स्टेर्लिंग कार्पोरेशन को खरीदा। उसके बाद के उनके सफर से दुनिया भलीभांति परिचित है।

आज देश-दुनिया में बिहारी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। यह निश्चित रूप से गौरव का विषय है। इन सामर्थ्यवान बिहारियों की उपलब्धियों में तब चार चाँद लग जाएंगे, जब इनमें से आगे बढ़कर कोई बिहार में नए-नए उद्योगों के विकास के लिए सार्थक पहल करे। जिस दिन बिहार को ‘अमीर’ बनाते हुए कोई बिहारी अमीरों की सूची में शामिल होगा, वो दिन नि:संदेह बिहार के इतिहास में मील का पत्थर कहलाएगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

 

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आईये, ऑस्कर के द्वार तक पहुँची ‘विसारनाई’ के लिए दुआ करें

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता तमिल फिल्म ‘विसारनाई’ 2017 के ऑस्कर पुरस्कारों की विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी में भारत की आधिकारिक प्रविष्टी होगी। विसारनाई ने दौड़ में शामिल ‘बाजीराव मस्तानी’, ‘सुल्तान’, ‘एयरलिफ्ट’ और ‘उड़ता पंजाब’ समेत कुल 29 फिल्मों को पीछे छोड़ यह उपलब्धि हासिल की है। एम चन्द्रकुमार के उपन्यास ‘लॉक अप’ पर आधारित इस फिल्म के निर्माता दक्षिण भारतीय फिल्मों के अभिनेता धनुष हैं। फिल्म का लेखन और निर्देशन वेट्रिमारन ने किया है और मुख्य भूमिकाएं दिनेश रवि, आनंदी और आदुकलाम मुरूगदेश ने निभाई हैं।

‘विसारनाई’ पुलिस की बर्बरता, भ्रष्टाचार और अन्याय को दिखाती है। फिल्म अपना काम इतनी सहजता और बारीकी से करती है कि आप इसके दृश्यों को जीने लग जाएंगे और सचमुच भूल जाएंगे कि आप  फिल्म देख रहे हैं। इस साल 63वें राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह में इसने तीन पुरस्कार – सर्वेश्रेष्ठ तमिल फिल्म, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता (समुतिराकनी) और सर्वश्रेष्ठ संपादन (किशोर ते) – हासिल किए थे। 72वें वेनिस फिल्म महोत्सव में भी ‘विसारनाई’ ने झंडे गाड़े थे और एमनेस्टी इंटरनेशनल इटालिया अवार्ड अपने नाम किया था।

ऑस्कर मिलना ना मिलना बाद की बात है। भारत में हर साल बनने वाली हजारों फिल्मों की भीड़ में अपनी ओर ध्यान खींचना और दुनिया भर की चुनिंदा फिल्मों के साथ जा खड़ा होना भी कम बड़ी बात नहीं। इस फिल्म ने साबित किया है कि अच्छे काम को किसी ताम-झाम की जरूरत नहीं। बड़े बजट, बड़े स्टार, बड़ी पब्लिसिटी के बिना भी लोगों के दिल-दिमाग को छुआ और झकझोरा जा सकता है।

छोटी-छोटी उपलब्धियों पर शोर मचाने वालों को यह बता देना भी जरूरी है कि ‘विसारनाई’ से पहले आठ और तमिल फिल्में ऑस्कर में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। आईये, ऑस्कर के द्वार तक बड़ी शालीनता से पहुँचने वाली ‘विसारनाई’ की सफलता के लिए दुआ करें।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बजट पर केन्द्र के निर्णय को नीतीश ने नकारा

1924 से चली आ रही परम्परा टूट गई। अगले साल से रेलमंत्री संसद की सीढ़ियों पर ‘बजट’ का ब्रीफकेस उठाए फोटो खिंचाते नहीं दिखेंगे। 2017 से अलग पेश नहीं होगा रेल बजट। केन्द्रीय कैबिनेट ने ‘एक देश एक बजट’ के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी। कैबिनेट के इस ऐतिहासिक निर्णय के साथ ही रेल बजट इतिहास बन गया। उसे अब आम बजट के साथ ही पेश किया जाएगा। हालांकि रेलवे की अपनी पहचान आगे भी बरकरार रहेगी।

कैबिनेट की बैठक के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित किया और कहा कि अगले साल से रेल बजट अलग से पेश नहीं किया जाएगा। रेलवे संबंधी सभी प्रस्ताव आम बजट में शामिल होंगे। जेटली ने कहा कि आज स्थिति अलग है, सिर्फ परम्परा के आधार पर अलग से रेल बजट पेश किए जाने की जरूरत नहीं है। अब एक बजट और एक विनियोग विधेयक होगा। इससे संसद का मूल्यवान समय बचेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस निर्णय से रेलवे की स्वायत्ता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि हर साल रेलवे पर चर्चा हो।

इस फैसले के मद्देनज़र संसद का बजट सत्र अब 25 जनवरी से पहले बुलाया जा सकता है। फिलहाल फरवरी के अन्तिम सप्ताह में बजट सत्र शुरू होता है। इस प्रकार, अब बजट की तैयारियां अक्टूबर के प्रारंभ में ही शुरू हो जाएंगी। जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का अग्रिम अनुमान सात जनवरी को उपलब्ध होगा जो फिलहाल सात फरवरी को प्रस्तुत किया जाता है। अब तक बजट को संसद की मंजूरी मई के मध्य तक दो चरणों में मिलती थी और जून में मानसून दस्तक दे देता था, जिससे राज्य अधिकतर योजनाओं का क्रियान्वयन और खर्च अक्टूबर तक शुरू नहीं कर पाते थे। ऐसे में योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए छह महीने का ही समय बचता था। बजट को पहले पेश किए जाने का मतलब है कि पूरी प्रक्रिया 31 मार्च तक सम्पन्न हो जाएगी और व्यय के साथ-साथ कर प्रस्ताव नए वित्त वर्ष की शुरुआत में ही अमल में आ जाएगा। इससे बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सकेगा।

बहरहाल, केन्द्र सरकार ने अपने तई भले ही एक बड़ा कदम उठाया हो, पर बिहार के मुख्यमंत्री और अटल सरकार में रेल मंत्री रहे नीतीश कुमार इस पर जमकर बरसे। स्वतंत्र रूप से रेल बजट पेश करने की परम्परा खत्म करने पर नीतीश ने कहा कि इससे स्पष्ट हो गया कि आमलोगों की रेलवे केन्द्र सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। इससे रेलवे की स्वायत्तता पर भी खतरा मंडराने लगा है।

कई बार रेल बजट पेश कर चुके नीतीश का मानना है कि इस फैसले से किसी भी रूप में रेलवे का भला नहीं होगा। रेलवे के सुचारू संचालन के लिए रेल बजट का अलग रहना जरूरी था। उन्होंने कहा कि रेल बजट आमलोगों की आकांक्षा और भावनाओं से सीधे जुड़ता है और सरकार को चाहिए कि इसे उसके पुराने स्वरूप में ही रहने दे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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और अब पाकिस्तान ने दी एटमी हमले की धमकी

बेशर्मी की पराकाष्ठा देखिए, इधर उड़ी पर आतंकी हमले के बाद मिले सबूत चीख-चीख कर बोल रहे हैं कि इसमें पाकिस्तान की संलिप्तता थी और उधर उसके विदेश विभाग के प्रवक्ता इस हमले की निन्दा कर रहे हैं। हमले के बाद जारी बयान में पाकिस्तानी प्रवक्ता नफीस जकारिया ने कहा कि भारत ने हमले के तुरंत बाद इसके लिए पाकिस्तान को जिम्मेदार ठहरा दिया, जबकि इसकी कोई जांच भी नहीं की गई। हम इस दावे को खारिज करते हैं। साथ ही पाकिस्तान इस तरह को हमलों की निन्दा करता है।

खैर, ये पाकिस्तान का पुराना राग है, जो वो अपनी हर कायराना हरकत के बाद अलापता है। लेकिन दोमुंहेपन की हद ये है कि उसके प्रवक्ता जहाँ इन हमलों की ‘निन्दा’ कर रहे हैं, वहीं उसके विदेश मंत्री भारत पर एटमी हमले की धमकी दे रहे हैं। जी हाँ, पाकिस्तान के रक्षामंत्री ख्वाजा आसिफ ने एक साक्षात्कार में कहा है कि भारत द्वारा हमला किए जाने की स्थिति में हम अपने रणनीतिक हथियार परमाणु बम के इस्तेमाल से भी नहीं चूकेंगे। गौरतलब है कि यह साक्षात्कार शनिवार रात को उड़ी हमले से ठीक पहले रिकार्ड किया गया था।

इस साक्षात्कार में पाकिस्तान के रक्षामंत्री से भारत के साथ तनावपूर्ण रिश्तों के मद्देनज़र निकट भविष्य में युद्ध की आशंका पर सवाल पूछा गया था जिस पर उन्होंने कहा कि मुझे नहीं लगता कि तुरंत हमले की आशंका है। हालांकि, अल्लाह ने कुरान में कहा है कि अपने घोड़े हमेशा तैयार रखो। इसलिए हम हर समय बाहरी शक्तियों से अपनी आज़ादी के खतरे के प्रति हमेशा तैयार रहते हैं। इसके आगे उन्होंने जोड़ा कि दुनिया परमाणु ताकत में पाकिस्तान की ‘बादशाहत’ को स्वीकार करती है और साथ ही बड़ी निर्लज्जता से ये भी कह डाला कि हमारे पास ‘जरूरत से ज्यादा’ परमाणु हथियार हैं।

बहरहाल, उड़ी पर हुए घिनौने हमले की निन्दा दुनिया भर में हो रही है। अमेरिका, ब्रिटेन समेत तमाम देशों ने बड़े कड़े शब्दों में इस हमले की निन्दा की और भरोसा दिलाया कि आतंकवाद के खिलाफ जंग में वे हर कदम पर नई दिल्ली का साथ देंगे। परीक्षा की इस घड़ी में आपसी मतभेदों को भूल हमारे देश के तमाम राजनीतिक दल भी एकजुट हैं। सवा सौ करोड़ भारतीय बड़ी अपेक्षा से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की ओर देख रहे हैं। सच यह है कि आतंक के खिलाफ जंग आखिरी दौर में है और अब बात ‘ट्वीट’ से नहीं पाकिस्तान को ‘दो टूक’ जवाब देने से बनेगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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उड़ी की शहादत में सबसे आगे थे बिहार के बेटे

आज सुबह जम्मू-कश्मीर के उड़ी में सेना मुख्यालय पर हुए आतंकी हमले में सेना के 17 जवान शहीद हो गए। प्राप्त जानकारी के मुताबिक शहीद जवानों में 15 बिहार रेजिमेंट और 2 डोगरा रेजिमेंट के हैं। बिहार रेजिमेंट के शहीद 15 जवानों में से 6 बिहार के सपूत हैं। इन शहीदों को लेकर जहाँ बिहार सहित पूरे देश में गर्वमिश्रित शोक की लहर है, वहीं लोग इनके बारे में जानने को भी आतुर हो रहे हैं। इनके नामों की सूची अभी जारी नहीं की गई है। ‘पाकिस्तान-प्रायोजित’ इस घटना को चार आतंकियों ने अंजाम दिया था जिन्हें हमारे जांबाज जवानों ने मार गिराया।

इस घटना में मारे गए आतंकवादियों के पास से कई ऐसी चीजें मिली हैं जिन पर पाकिस्तान की मार्किंग है यानि वे चीजें पाकिस्तान में बनी हैं। सबूतों के आधार पर माना जा रहा है कि इन आतंकियों का संबंध ‘जैश-ए-मोहम्मद’ से है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस नाजुक मौके पर ट्वीट कर देश को भरोसा दिलाया है कि इस घिनौने हमले के दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।

बता दें कि पिछले 26 सालों में यह आर्मी बेस पर हुआ सबसे बड़ा हमला है। इस घटना से आहत देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने आज स्पष्ट और कड़े शब्दों में कहा कि पाकिस्तान एक आतंकी देश है और उसकी पहचान करके उसे अलग-थलग कर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि मैं बेहद निराश हूँ कि पाकिस्तान आतंकवाद और आतंकी संगठनों को लगातार मदद दे रहा है।

इस घटना के बाद जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने भी पाकिस्तान पर हमला बोला। उन्होंने कहा कि इस तरह के वाकयों से राज्य में युद्ध जैसे हालात बनाने की कोशिश की जा रही है। वहाँ के उपमुख्यमंत्री निर्मल सिंह का भी कहना है कि हमारे इलाकों में तनाव पैदा करने के लिए अलगाववादी, आतंकी और पाकिस्तान मिलकर भारत के खिलाफ साजिश कर रहे हैं।

बहरहाल, इस हमले के बाद बिहार के सभी आर्मी कैंप की सुरक्षा भी बढ़ा दी गई है। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि आतंकी हमले के खिलाफ केन्द्र सरकार कड़ी कार्रवाई करे, मैं आतंक के खिलाफ केन्द्र सरकार के समर्थन में खड़ा हूँ। वहीं, आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव आतंकियों के इस कायराना हमले के बाद केन्द्र सरकार से कड़ी कार्रवाई की मांग करते हुए प्रधानमंत्री मोदी के ‘56 इंच के सीने’ को ‘खोजते’ दिखे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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एक पैर से दुनिया जीतने वाले के लिए कोई जश्न नहीं?

रियो ओलंपिक में साक्षी के कांस्य और सिंधु के रजत पर आप जरूर खुशी से झूम गए होंगे। झूमना भी चाहिए। इन दोनों बेटियों की सफलता पर पूरा देश जश्न मना रहा था। मनाना भी चाहिए। पर क्या हमने रियो में ही स्वर्ण जीतने वाले मरियप्पन थंगावेलू के लिए भी वैसा ही जश्न मनाया? नहीं ना? बता सकते हैं क्यों? क्या इसलिए कि हमारे देश के किसी भी टीवी चैनल ने पैरालंपिक का सीधा प्रसारण नहीं दिखाया? या फिर इसलिए कि पैरालंपिक का आयोजन केवल विकलांग खिलाड़ियों के लिए होता है? अगर ऐसा है तो हमें जरूर जानना चाहिए कि ‘पैरालंपिक’ का ‘ओलंपिक’ से केवल शाब्दिक साम्य ही नहीं है, बल्कि भव्यता और व्यापकता की दृष्टि से भी ये उससे कमतर नहीं। इसे शारीरिक रूप से नि:शक्त खिलाड़ियों का ओलंपिक कहें तो गलत नहीं होगा। आप इसके ‘कैनवास’ का अंदाजा इस बात से लगायें कि इस साल के रियो पैरालंपिक में 176 देशों ने भाग लिया था।

जहाँ तक पैरालंपिक की शुरुआत की बात है, तो आपको बता दें कि 1960 में रोम ओलंपिक खेलों के खत्म होने के एक हफ्ते के बाद अंतर्राष्ट्रीय पैरालंपिक खेलों का आयोजन पहली बार किया गया था। लेकिन 1968 में मेक्सिको ने ओलंपिक के बाद पैरालंपिक खेलों का आयोजन करने से इनकार कर दिया था। आगे चलकर 2001 में इसे नियमित कर दिया गया। अब ओलंपिक की मेजबानी करने वाले देश को पैरालंपिक खेलों के लिए भी दावेदारी करनी पड़ती है। हालांकि ये स्पष्ट कर दें कि ओलंपिक और पैरालंपिक का आयोजन बिल्कुल अलग-अलग संस्थाओं के हाथ में है। इंटरनेशनल ओलंपिक कमेटी और इंटरनेशनल पैरालंपिक कमेटी दोनों अपना स्वतंत्र अस्तित्व रखती हैं।

बहरहाल, अनगिनत मुश्किलों और चुनौतियों को पीछे छोड़ते हुए भारत के मरियप्पन थंगावेलू ने रियो पैरालंपिक 2016 में भारत को पुरुषों की टी-42 हाई जंप में गोल्ड मेडल दिलाया। 21 वर्षीय मरियप्पन ने 1.89 मीटर की छलांग लगाकर भारत को ये ऐतिहासिक सफलता दिलाई। भारत के ही वरुण सिंह भाटी ने 1.86 मीटर की छलांग लगाकर इस इवेंट का कांस्य अपने नाम किया। बता दें कि टी-42 वर्ग में वैसे पैरा एथलीट आते हैं जिनके हाथ या पैर के साइज या मांसपेशियों में अन्तर होता है।

मरियप्पन को हाई जंप का गोल्ड मेडल ऐसे ही नहीं मिल गया। उसके पीछे की वजह है कड़ा संघर्ष। मरियप्पन का जन्म तमिलनाडु के सालेम से 50 किलोमीटर दूर पेरिवादमगट्टी गांव में हुआ था। उनकी माँ गांव में ही सब्जियां बेचकर गुजारा करतीं। पर घोर अभाव के बाद भी नियति को शायद मरियप्पन की और परीक्षा लेनी थी। जब वे पाँच साल के थे तब स्कूल जाते वक्त उनके पैर पर बस चढ़ गई। चोट इतनी गंभीर थी कि उनका दायां पैर पूरी तरह से खराब हो गया।

एक पैर खराब होने पर भी मरियप्पन की स्कूल के दिनों में खेलकूद में काफी रुचि थी और वे खासकर वॉलीबॉल खेला करते। इसी दौरान स्कूल के कोच की नज़र उन पर पड़ी। उन्होंने मरियप्पन को वॉलीबॉल छोड़ हाईजंप ज्वाइन करने की सलाह दी और ट्रेंड किया। जब मरियप्पन 14 साल के हुए तब उन्होंने पहली बार एक स्पोर्ट्स इवेंट में हिस्सा लिया और दूसरे नंबर पर रहे। महत्वपूर्ण बात ये कि इस प्रतियोगिता में उन्होंने नॉर्मल एथलीट्स को कम्पीट किया था।

मरियप्पन को नेशनल लेवल पर सफलता दिलाने का श्रेय कोच सत्यनारायण को जाता है। 18 साल की उम्र में वे ही मरियप्पन को नेशनल पैरा-एथेलेटिक्स चैम्पियनशिप में लेकर आए और इसके बाद की कहानी इतिहास है। आपको बता दें कि 1 नवंबर 2015 को मरियप्पन दुनिया के नंबर वन पैरा हाई जंपर बने और रियो पैरालंपिक में गोल्ड जीतने से पहले भी वे आईपीसी ट्यूनीशिया ग्रैंड प्रिक्स में 1.78 मीटर की स्वर्णिम छलांग लगा चुके हैं।

चलते-चलते:

पैरालंपिक के इतिहास में ये भारत का तीसरा गोल्ड मेडल है। मरियप्पन से पहले मुरलीकांत पेटकर (स्विमिंग) 1972 में और देवेन्द्र झाझरिया (जैवलिन थ्रो) 2004 में भारत के लिए स्वर्ण जीत चुके हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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‘मदर’ ने पूरा किया ‘सिस्टर’ से ‘संत’ का सफर

आज सारी दुनिया एक ऐतिहासिक पल की गवाह बनी। गरीबों और बेसहारा लोगों के लिए जीवन समर्पित करने वाली ‘भारतरत्न’ मदर टेरेसा को वेटिकन सिटी में संत की उपाधि दी गई। ईसाइयों के धर्मगुरु पोप फ्रांसिस ने लगभग एक लाख श्रद्धालुओं की मौजूदगी में उन्हें ‘संत’ की उपाधि से नवाजा। इस दौरान पीटर्स बेसीलिका पर मदर टेरेसा की एक बड़ी तस्वीर लगाई गई थी, जिसमें वह नीचे लोगों की ओर मुस्कराती प्रतीत हो रही थीं। गौरतलब है कि मदर टेरेसा को ‘संत’ की उपाधि उनकी 19वीं पुण्यतिथि से एक दिन पहले दी गई है। अब वो ‘संत मदर टेरेसा ऑफ कोलकाता’ के नाम से जानी जाएंगी।

मदर टेरेसा ने सिस्टर से संत बनने का सफर भारत में पूरा किया था। यहीं से उनकी ममता और करुणा की ज्योति पूरे संसार में फैली। स्वाभाविक है कि इस बेहद खास मौके पर वहाँ भारत का प्रतिनिधित्व हो। लिहाजा भारत की महानतम शख्सियतों में शुमार ‘मदर’ को संत की उपाधि दिए जाने के समय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज 12 सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ वेटिकन सिटी में मौजूद थीं। केन्द्रीय प्रतिनिधिमंडल के अलावा दिल्ली और पश्चिम बंगाल से दो राज्यस्तरीय प्रतिनिधिमंडल भी रोम में थे, जिनका नेतृत्व क्रमश: अरविन्द केजरीवाल और ममता बनर्जी ने किया। मिशनरीज ऑफ चैरिटीज की सुपीरियर जनरल सिस्टर मेरी प्रभा के नेतृत्व में देश के विभिन्न हिस्सों से आईं लगभग 50 ननों का एक समूह भी इस समारोह के दौरान मौजूद रहा।

मेसेडोनिया की राजधानी स्कोप्ये में कोसोवर अल्बेनियाई माता-पिता के घर जन्मी मदर टेरेसा का मूल नाम गोंक्जा एग्नेस था। 1928 में महज 18 साल की उम्र में नन बनने की खातिर उन्होंने अपना घर छोड़ दिया था। घर छोड़ने के बाद वो आयरलैंड स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ ब्लेस्ड वर्जिन मेरी (सिस्टर्स ऑफ लोरेटो) के साथ जुड़ गईं। यहाँ उन्हें नया नाम मिला – सिस्टर मेरी और वो कोलकाता के लिए निकल पड़ीं। वर्ष 1931 में वो कोलकाता की लोरेटो एन्टाली कम्यूनिटी से जुड़ीं और लड़कियों के सेंट मेरी स्कूल में पढ़ाने लगीं। बाद में वो प्रिंसिपल बनीं। 1937 के बाद से उन्हें मदर टेरेसा के नाम से पुकारा जाने लगा। कहा जाता है कि 1941 में एक ट्रेन यात्रा के दौरान ईश्वर ने उन्हें गरीबों के लिए काम करने को प्रेरित किया। इसके बाद वो लोरेटो से इजाजत लेकर 1948 में मेडिकल ट्रेनिंग के लिए पटना आईं।

ये कम लोगों को पता है कि मदर टेरेसा ने पटना सिटी में होली फैमिली अस्पताल में मेडिकल ट्रेनिंग ली थी। पटना में ये अस्पताल पादरी की हवेली (सेंट मेरी चर्च) से सटा है। तीन महीनों की ट्रेनिंग के दौरान मदर इस हवेली के एक छोटे से कमरे में रहती थीं। उनकी याद में इस कमरे को अब तक सहेज कर रखा गया है। कहने की जरूरत है कि मदर को संत घोषित किए जाने के बाद ये जगह किसी तीर्थ से कम नहीं होगी। बहरहाल, 1948 के बाद ही मदर टेरेसा ने मिशनरीज ऑफ चैरिटीज की स्थापना की और उसके बाद की कहानी से पूरी दुनिया वाकिफ है। 1979 में उन्हें नोबेल शांति पुरस्कार दिया गया था और 1980 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘भारतरत्न’ से नवाजा गया था।

मदर टेरेसा को संत की उपाधि दिए जाने के लिए जरूरी था कि वैटिकन मदर टेरेसा से मदद के लिए की गई प्रार्थनाओं के परिणामस्वरूप हुए दो चमत्कारों को मान्यता दे। इस संबंध में स्मरणीय है कि 2002 में पोप ने एक बंगाली आदिवासी मोनिका बेसरा के ट्यूमर ठीक होने को मदर का पहला चमत्कार माना था। इसके बाद 2015 में ब्रेन ट्यूमर से ग्रस्त एक ब्राजीलियन पुरुष के ठीक होने को उनका दूसरा चमत्कार माना गया। दूसरे चमत्कार को मान्यता मिलने के साथ ही उन्हें ‘संत’ घोषित करने का रास्ता साफ हो गया था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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दाना के कंधों पर पत्नी की लाश नहीं, समाज है हमारा

पिछले दिनों भारतीय अखबारों और टेलीविजन चैनलों ने ओडिशा के एक गरीब आदिवासी दाना मांझी की एक ऐसी तस्वीर से हमें रू-ब-रू कराया जो लम्बे समय तक मन और विवेक को सालती रहेगी। वो तस्वीर थी एक विवश और लाचार पति की जिसके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि अपनी पत्नी का मृत शरीर ढोने के लिए किसी गाड़ी या ठेले तक की व्यवस्था कर सके और अस्पताल इतना संवेदनशून्य कि उसने एंबुलेंस मुहैया कराना अपना धर्म नहीं समझा। दाना मांझी के पास कोई विकल्प नहीं था सिवाय इसके कि अपनी पत्नी की लाश अपने कंधे पर उठाए लगभग बारह किलोमीटर की दूरी पैदल तय करे।

टीवी चैनलों पर दाना मांझी को एक चादर में लिपटी हुई लाश को अपने कंधे पर लेकर चलते हुए दिखाए जाने का दृश्य बेहद दर्दनाक था। पत्नी की लाश कंधे पर और साथ में चलती रोती-बिलखती बेटी… फट क्यों नहीं जाता हमारा हृदय! देश की राजधानी दिल्ली में सड़क के किनारे गैंगरेप के बाद लहूलुहान और निर्वस्त्र फेंक दी गई निर्भया हो या दाना के कंधे पर हमेशा के लिए सोई उसकी पत्नी… हमारी आत्मा मर चुकी है, क्या इसमें कोई संशय रह जाता है?

दाना की पत्नी का देहांत टीबी से हुआ था। हम अच्छी तरह जानते हैं कि टीबी आज की तारीख में असाध्य नहीं है और बहुत कम खर्च में इसका इलाज संभव है। अब जरा सोचिए भारत की उस एक तिहाई आबादी के बारे में जो गरीबी रेखा से नीचे है, समय पर टीबी का इलाज तक कराने में असमर्थ है और जिसके पास पत्नी या परिजन की लाश ढोने के लिए अपने कंधे के सिवाय कुछ भी नहीं है। गौर करने की बात यह कि इन अभागों में अधिकांश आबादी दलित और आदिवासियों की है जो देश की आबादी का एक चौथाई हिस्सा हैं।

भारत की सामाजिक व्यवस्था का सबसे मजबूत पहलू यह है कि यह एक लोकतंत्र है और इसका सबसे कमजोर पहलू यह है कि आज़ादी के इतने सालों बाद भी देश की राजनीति और संसाधन एक विशेषाधिकार प्राप्त उच्च वर्ग की गिरफ्त में है। इस वर्ग ने एक ऐसा समाज बनाया है जिसमें गरीब और कमजोर के लिए सोचने की जगह सीमित होती जा रही है। इस स्वकेन्द्रित समाज में इंसानी रिश्तों का निर्धारण बस आपसी हित, जाति और धर्म के आधार पर होता है।

इस समाज की एक बड़ी खासियत है कि यहाँ संवेदना भी ‘फैशन’ की तरह दिखाई जाती है। इस समाज में दशरथ मांझी पर फिल्म बनाई जा सकती है लेकिन फिर किसी मांझी को किसी निर्मम ‘पहाड़’ से आजीवन लड़ना ना पड़े यह सोचने की फुरसत किसी को नहीं। दशरथ की पत्नी के जीवन के रास्ते में जो ‘पहाड़’ आया था उस पहाड़ का सीना चीरने में उसने पूरी ज़िन्दगी लगा दी और ‘रास्ता’ बना दिया। पर वो रास्ता खुला भी नहीं कि बन्द हो गया। कल दशरथ था, आज दाना आ गया। पर ‘मांझी’ की कहानी वहीं की वहीं है।

दाना मांझी की पत्नी को चंद रुपयों में बचाया जा सकता था, पर समाज ने जीवन से ही नहीं, इस गरीब को मौत के बाद भी इज्जत से महरूम रखा। यह तस्वीर बहुत लम्बे समय तक मानवता की आत्मा को झकझोरती रहेगी क्योंकि दाना अपनी पत्नी की लाश नहीं भारतीय लोकतंत्र और समाज की जड़ हो चुकी संवेदना का बोझ अपने कमजोर कंधों पर उठाए हुए थे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नालंदा विश्वविद्यालय : पूरा हुआ कलाम का सपना

प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की पुनर्स्थापना का जो सपना पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने देखा था, वह पूरा हुआ। नालंदा अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के प्रथम दीक्षांत समारोह के साथ करीब आठ सदी के बाद नालंदा के गौरवशाली इतिहास ने एक बार फिर करवट लिया। काश कि ‘मिसाईलमैन’ जीवित होते और इस ऐतिहासिक समारोह की शोभा बढ़ाते! खैर, वर्तमान राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने बीते शनिवार को आयोजित भव्य दीक्षांत समारोह में 12 छात्रों को सम्मानित किया और इसके साथ ही युगपुरुष डॉ. कलाम की परिकल्पना हकीकत में तब्दील हो गई।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने दीक्षांत समारोह में इस विश्वविद्यालय के निमित्त डॉ. कलाम के योगदान की चर्चा करते हुए कहा कि आज भले ही नालंदा विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह का आयोजन हो रहा हो परन्तु इसको पुनर्जीवित करने की परिकल्पना का श्रेय कलाम साहब को जाता है। बता दें कि 28 मार्च 2006 को तत्कालीन राष्ट्रपति डॉ. कलाम ने अपने बिहार दौरे के क्रम में इस प्राचीन विश्वविद्यालय को पुनर्जीवित करने की सलाह दी थी। यह विचार उन्होंने बिहार विधानमंडल के संयुक्त अधिवेशन को संबोधित करते हुए रखा था।

गौरतलब है कि पाँचवीं सदी में बने नालंदा विश्वविद्यालय में करीब दस हजार छात्र पढ़ते थे, जिनके लिए 1500 अध्यापक हुआ करते थे। छात्रों में अधिकांश एशियाई देशों चीन, कोरिया, जापान से आने वाले बौद्ध भिक्षु होते थे। इतिहासकारों के मुताबिक चीनी भिक्षु ह्वेनसांग ने भी सातवीं सदी में नालंदा में शिक्षा ग्रहण की थी। उन्होंने अपनी पुस्तक में नालंदा विश्वविद्यालय की भव्यता का उल्लेख किया है।

एक समय नालंदा विश्वविद्यालय बौद्ध धर्म का सबसे बड़ा शिक्षण-केन्द्र था, परन्तु 1200 ई. में बख्तियारपुर खिलजी के आक्रमण के दौरान यह विश्वविद्यालय पूर्णत: धरती के गर्भ में समा गया। हाल ही में यूनेस्को ने प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय के खंडहर को विश्व धरोहर (वर्ल्ड हेरिटेज साइट) में शामिल किया है। 446 एकड़ में बनने जा रहे वर्तमान विश्वविद्यालय का निर्माण-स्थल प्राचीन विश्वविद्यालय के इस खंडहर से करीब 10 किलामीटर दूर राजगीर में है। दीक्षांत समारोह में भाग लेने आए राष्ट्रपति ने राजगीर के पिल्खी गांव में विश्वविद्यालय के स्थायी परिसर की आधारशिला भी रखी। अभी यह विश्वविद्यालय एक सरकारी भवन में चलाया जा रहा है।

विश्वविद्यालय की कुलपति गोपा सबरवाल ने जानकारी दी कि विश्वविद्यालय के पहले सत्र में दो विषयों में तीन देशों के 12 छात्र थे, जबकि वर्तमान सत्र में तीन विषयों में 13 से अधिक देशों के 130 छात्र-छात्राएं हैं। उन्होंने कहा कि आने वाले समय में यहाँ आठ से ज्यादा विषयों की पढ़ाई होगी और 1600 छात्र नामांकित होंगे। दीक्षांत समारोह के मौके पर बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद, नालंदा विश्वविद्यालय के कुलाधिपति जॉर्ज यीओ, पूर्व कुलाधिपति अमर्त्य सेन एवं सदस्य लॉर्ड मेघनाद देसाई समेत कई गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे ।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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मोदीविरोध के ‘तवे’ पर पाकिस्तान की ‘रोटी’

सच से पुराना बैर है पाकिस्तान का। भारत के खिलाफ अपनी भोली जनता की भावनाएं भड़का कर ‘रोटी’ सेकना कोई उससे सीखे। हालांकि पाकिस्तान के लिए ये कोई नई बात नहीं, पर ताजा मामले में तो ‘मर्यादा’ की हर सीमा ही लांघ दी उसने। जी हाँ, पाकिस्तान की पंजाब असेंबली ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया है। चौंक गए ना? अब जरा कारण भी जान लें। शायद आपको स्मरण हो कि प्रधानमंत्री मोदी ने स्वतंत्रता दिवस पर अपने भाषण के दौरान बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था कि वहाँ और पीओके के लोगों ने उनकी समस्या उठाने के लिए उनको धन्यवाद ज्ञापित किया है। बस यही बात पाकिस्तान को चुभ गई। वहाँ की पंजाब असेंबली को ये बात इतनी नागवार गुजरी कि उसने पाकिस्तान की संघीय सरकार से इस मामले को संयुक्त राष्ट्र समेत तमाम अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाने की अपील की है।

गौरतलब है कि पंजाब प्रांत की असेंबली में वहाँ के कानून मंत्री राणा सनाउल्लाह ने प्रधानमंत्री मोदी के खिलाफ प्रस्ताव पेश किया और यह प्रस्ताव सर्वसम्मति से पास भी हो गया। प्रस्ताव में कहा गया कि सदन बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान पर मोदी के बयानों की कड़ाई से निन्दा करता है। सदन ने कहा कि पाकिस्तान की संघीय सरकार को चाहिए कि इस मामले को संयुक्त राष्ट्र समेत दूसरे अन्तर्राष्ट्रीय मंचों पर उठाए। विश्व को यह बताने की जरूरत है कि मोदी सरकार पाकिस्तान के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर रही है।

पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी के विधायक खुर्रम वाट्टू ने तो दो कदम आगे बढ़कर सदन से यहाँ तक कहा कि भारत से व्यापारिक संबंध तोड़ने के लिए संघीय सरकार से गुजारिश की जाए। वहीं पंजाब असेंबली में विपक्ष के नेता राशिद ने आरोप लगाया कि मोदी का बयान उनकी असहिष्णुता की नीति और दूसरे राज्यों के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप को दर्शाता है।

यहाँ गौर करने की बात ये है कि भारत-विरोध के नाम पर पाकिस्तान की तमाम पार्टियां कुल मिलाकर एक ही राग अलापती हैं। राजनीतिक, सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर पूरी तरह विफल हो चुके पाक के जिस्म पर ना जाने कितने ‘पैबंद’ लगे हैं, जिन्हें जनता की नज़रों में जाने से रोकने के लिए पाक का राजनीतिक और सैनिक नेतृत्व प्रारम्भ से बस भारत-विरोध का झंडा उठाता आया है। वैसे सच कहा जाय तो जहाँ ‘हाफिज सईद’ जैसों को पलकों पर रखा जाता हो वहाँ नरेन्द्र मोदी के खिलाफ प्रस्ताव पारित होने पर हमें आश्चर्य होना ही नहीं चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप    

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