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2019 के आईने में जेडीयू का राजगीर अधिवेशन

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने ‘संघमुक्त भारत’ के अपने अभियान की औपचारिक घोषणा कर दी। राजगीर में जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष का पद संभालने के बाद उन्होंने सभी विपक्षी दलों से मुद्दों के आधार पर एक मंच पर आने की अपील की। उन्होंने कहा कि वे गैर बीजेपी दलों के साथ आने को तैयार हैं। नीतीश कुमार का यह कदम 2019 के लोकसभा चुनाव से पहले गैर बीजेपी दलों का साझा मंच बनाने की कोशिश का हिस्सा है और कहने की जरूरत नहीं कि वह यह मंच अपनी अगुआई में चाहते हैं। दो दिनों के इस अधिवेशन में पार्टी ने नीतीश कुमार को साझे मंच का पीएम उम्मीदवार भी माना, हालांकि इतनी ‘सावधानी’ जरूर बरती गई कि राजनीतिक प्रस्तावना में इस बात का जिक्र ना हो।

इस अधिवेशन में नीतीश ने सर्जिकल स्ट्राइक पर पहली बार मोदी सरकार की आलोचना की। उन्होंने कहा कि वे शुरू से इस मुद्दे पर सरकार के साथ हैं और रहेंगे लेकिन अब इस मुद्दे पर बीजेपी राजनीति करने लगी है। उन्होंने कहा कि नरेन्द्र मोदी देश के पीएम हैं, किसी एक दल के नेता मात्र नहीं और उनका व्यवहार उसी अनुरूप होना चाहिए। पाकिस्तान मुद्दे पर सरकार को और कड़ा रुख अपनाने की सलाह देते हुए नीतीश ने कहा कि मोदी सरकार को पाकिस्तान को ‘लव लेटर’ लिखना बंद कर देना चाहिए। तीन तलाक के मुद्दे पर भी उन्होंने सरकार पर निशाना साधा और कहा कि यह सब धार्मिक संगठनों के ऊपर छोड़ दिया जाना चाहिए। उन्होंने मोदी सरकार पर आरोप लगाया कि विकास के मामले में पूरी तरह फेल होने के कारण वह ऐसे मुद्दे उठा रही है।

नीतीश कुमार ने अध्यक्ष पद संभालने के बाद घोषणा की कि अब वे सभी राज्यों का दौरा करेंगे। उन्होंने अपनी पार्टी के विस्तार और समान विचार वाले गैर बीजेपी दलों के साथ गठबंधन बनाने की बात भी कही। इसके अलावा उन्होंने सभी विपक्षी दलों से 16 नवंबर से होने वाले संसद सत्र के दौरान बड़े मुद्दों पर एक साथ मिलकर सरकार पर हमला बोलने का आग्रह किया।

कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि जेडीयू के राजगीर अधिवेशन से नीतीश और उनकी पार्टी की 2019 के चुनाव को ‘मोदी बनाम नीतीश’ का रूप देने की कोशिश और तेज हुई। इस अधिवेशन में विशिष्ट अतिथि के तौर पर पड़ोसी राज्य झारखंड के पूर्व मुख्यमंत्री बाबुलाल मरांडी की उपस्थिति भी अकारण नहीं थी। बिहार चुनाव में जीत हासिल करने के बाद से ही नीतीश मिशन 2019 के तहत बिहार के बाहर पैर पसारने में दिन-रात एक कर रहे हैं। शरद यादव की जगह उनका अध्यक्ष बनना हो, यूपी चुनाव को लेकर चहलकदमी हो, शराबबंदी को राष्ट्रव्यापी अभियान बनाने की कोशिश हो या फिर राजगीर अधिवेशन से उठाये जाने वाले स्वर – ये सारी कवायद अपना कद बढ़ाने और प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी जताने की खातिर है जिसे समझने के लिए आपका राजनीति का पंडित होना जरूरी नहीं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार का गौरव राष्ट्रीय अंडर-19 शतरंज चैम्पियन

अररिया के 14 वर्षीय कुमार गौरव ने आंध्रप्रदेश में हुई 46वीं राष्ट्रीय अंडर-19 शतरंज प्रतियोगिता का खिताब अपने नाम कर लिया। इस उपलब्धि के साथ गौरव विश्व जूनियर शतरंज में भारत का प्रतिनिधित्व करने के भी पात्र हो गए हैं। अब वह जूनियर वर्ल्ड चैम्पियनशिप, एशियन जूनियर चैम्पियनशिप और कॉमनवेल्थ चेस चैम्पियशिप में भारत का प्रतिनिधित्व करेंगे। बता दें कि गौरव बिहार के राष्ट्रीय जूनियर शतरंज विजेता बनने वाले तीसरे खिलाड़ी हैं। इससे पहले प्रमोद कुमार सिंह 1980 और 1981 में दो बार और मनीषी कृष्ण 1989 में बिहार के लिए यह खिताब जीत चुके हैं।

गौरतलब है कि बिहार के इस लाल ने 8 अक्टूबर को शुरू हुई अंडर-19 चेस चैम्पियनशिप का गोल्ड बिहार सहित अन्य राज्यों के 136 खिलाड़ियों को पीछे छोड़ कर जीता है जिनमें कई अन्तर्राष्ट्रीय मास्टर भी थे। यह पहला मौका नहीं है जब गौरव ने बिहार का मान बढ़ाया है। इसके पूर्व भी वह कई राष्ट्रीय व अन्तर्राष्ट्रीय पुरस्कार जीत चुके हैं। पिछले वर्ष कॉमनवेल्थ चेस चैम्पियनशिप अंडर-18 में उन्होंने कांस्य पदक अपने नाम किया था। 2014 में वह दिल्ली में आयोजित पार्श्वनाथ इंटरनेशनल चेस फेस्टिवल के चैम्पियन बने जिसमें 41 देशों के खिलाड़ियों ने भाग लिया था, और 2013 में पार्श्वनाथ इंटरनेशनल ओपन चेस टूर्नामेंट में उन्होंने बांग्लादेश की चेस क्वीन व वुमेन इंटरनेशनल मास्टर (डब्ल्यूआईएम) खिताबधारी 65 वर्षीया रानी हमीद को हराकर तहलका मचा दिया था। कभी हार ना मानने वाला जज्बा गौरव की सबसे बड़ी ताकत रही है।
ये जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि बिहार के अररिया शहर के शिवपुरी निवासी व अधिवक्ता देवनंदन दिवाकर के पुत्र कुमार गौरव में तो शतरंज की विलक्षण प्रतिभा है ही, उनके छोटे भाई-बहन भी इस खेल में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा चुके हैं। गौरव के छोटे भाई सौरभ आनंद 2012 में राष्ट्रीय अंडर-9 शतरंज चैम्पियन रह चुके हैं और इस समय सीनियर बिहार चैम्पियन हैं, जबकि उनकी छोटी बहन गरिमा गौरव राष्ट्रीय स्कूल शतरंज की विजेता रह चुकी हैं।
कहने की जरूरत नहीं कि कुमार गौरव की उपलब्धि से आज पूरा बिहार गौरवान्वित है। उनकी सफलता बिहार शतरंज में नई जान फूंकेगी। शतरंज के इस नन्हे उस्ताद ने साबित कर दिया है कि वह विश्व चैम्पियनशिप जीतने की भी क्षमता रखता है। पर इस चमकते सिक्के का दूसरा पहलू यह है कि प्रचंड प्रतिभा के धनी इस खिलाड़ी की राह में आर्थिक दिक्कतें बाधा बनती रही हैं। अगर उसे समुचित सुविधा मिले तो वह एक दिन शतरंज की सबसे ऊँची मीनार पर परचम लहराएगा, इसमें कोई दो राय नहीं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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तो यूपी में अगली सरकार भाजपा की!

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा के लिए अच्छी ख़बर! इंडिया टुडे-एक्सिस द्वारा हाल में किए गए जनमत सर्वेक्षण के अनुसार यूपी विधान सभा चुनाव में भाजपा के सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरने के आसार हैं, जबकि बसपा सुप्रीमो मायावती मुख्यमंत्री के तौर पर पहली पसंद के तौर पर उभरी हैं। इस सर्वेक्षण की मानें तो सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के हाथों से सत्ता की चाबी निकलती दिख रही है।

5 सितंबर से 5 अक्टूबर के बीच कराए गए इस सर्वेक्षण में 31% वोट और 170-183 सीटों के साथ भाजपा पहले और 28% वोट एवं 115-124 सीटों के साथ बसपा दूसरे स्थान पर है। सपा को इस सर्वेक्षण में 25% वोट तथा 94-103 सीटों के साथ तीसरा स्थान मिला है, जबकि यूपी को लेकर कई नए प्रयोगों में जुटी कांग्रेस के हिस्से में केवल 6% वोट और 8-12 सीटें आई हैं। अन्य के खाते में 1-10 सीटें और 10% वोट हैं।

सर्वेक्षण के विस्तार में जाएं तो पूर्वी (167 सीट) तथा पश्चिमी यूपी (136 सीट) में भाजपा को स्पष्ट बढ़त है। पूर्वी यूपी में भाजपा 33% वोटों के साथ सबसे आगे है। बसपा को 28%, सपा को 22% और कांग्रेस को 5% वोट मिल सकते हैं। उधर पश्चिमी यूपी में भाजपा के खाते में 31% वोट हैं, जबकि बसपा-सपा को 27%-27% और कांग्रेस को 4% वोट मिल सकते हैं।

81 सीटों वाले मध्य यूपी में सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की प्रतिष्ठा थोड़ी बचती दिख रही है। यहाँ 29 प्रतिशत वोटों के साथ सपा बाकियों से आगे है, जबकि 28% वोटों के साथ बसपा कुछ ही पीछे है। भाजपा को यहाँ 26% वोट मिल रहे हैं और कांग्रेस यहाँ भी दहाई के आंकड़े को नहीं छू पा रही है और उसके हिस्से में 6% वोट ही जा रहे हैं। शेष 11% वोटर अन्य के खाते में जाते दिख रहे हैं।

19 सीटों वाले बुंदेलखंड की बात करें तो 34% वोटों के साथ यहाँ बसपा को बढ़त मिल रही है। भाजपा 32% वोटों के साथ दूसरे और सपा 16% वोटों के साथ तीसरे स्थान पर है। कांग्रेस को यहाँ भी 6% वोटों के साथ संतोष करना पड़ रहा है।

बतौर मुख्यमंत्री मायावती 31% लोगों की पहली पसंद हैं, जबकि मौजूदा मुख्यमंत्री अखिलेश यादव को इस पद के लिए 27% लोगों ने पसंद किया है। भाजपा से गृहमंत्री राजनाथ सिंह 18% और योगी आदित्यनाथ 14% लोगों की पसंद हैं। हालांकि भाजपा ने अभी तक मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के नाम की घोषणा नहीं की है। वहीं कांग्रेस को निराशा होगी कि इस पद के लिए उनकी घोषित उम्मीदवार शीला दीक्षित मात्र 1% लोगों की पसंद हैं, जबकि प्रियंका गांधी को इस पद के लिए 2% लोगों ने पसंद किया।

बता दें कि यह सर्वे सर्जिकल स्ट्राईक के कुछ दिन पहले से लेकर बाद तक का है और इसके लिए वहाँ के 403 विधानसभा क्षेत्रों में 22,231 लोगों की राय ली गई।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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और फिर से जीवित हो गया जटायु..!

अगर रामकथा में आपकी रुचि है और आपने रामायण एक बार भी पढ़ी, सुनी या टीवी पर देखी है तो पक्षीराज जटायु को भूल जाएं, ऐसा हो नहीं सकता। जब रावण माता सीता का हरण कर उन्हें लंका ले जा रहा था तब जटायु ने रावण से युद्ध किया था और वीरगति को प्राप्त हुए थे। उन्हीं जटायु को समर्पित है हाल में बन कर तैयार हुआ केरल का जटायु नेचर पार्क। कहते हैं इस अनोखे पार्क में जटायु की विशाल प्रतिमा ठीक उसी जगह पर बनाई गई है जहाँ रावण द्वारा पंख काटे जाने पर जटायु मरणासन्न होकर गिरे और प्राण त्यागे थे।
जटायु नेचर पार्क केरल के कोल्लम जिले के चदयामंगलम गांव में बनाया गया है। यहाँ जटायु की जो प्रतिमा बनाई गई है उसे दुनिया का सबसे बड़ा स्कल्पचर कहा जा रहा है। बता दें कि यह स्कल्पचर 200 फीट लंबा, 150 फीट चौड़ा और 70 फीट ऊँचा है। 15000 वर्गफुट के प्लेटफॉर्म पर बनाए गए इस स्कल्पचर को तैयार करने में 7 साल का वक्त लगा है और केरल सरकार ने इस पर 100 करोड़ रुपए खर्च किए हैं।
पौराणिक मान्यताओं के मुताबिक जटायु अरुण देवता के पुत्र थे। इनके भाई का नाम सम्पाती था। रामायण में सीताजी के हरण के प्रसंग में जटायु का उल्लेख प्रमुखता से हुआ है। जब श्रीराम और लक्ष्मण विकल हो सीताजी को खोज रहे थे तब उन्होंने जटायु को मरणासन्न अवस्था में पाया था। जटायु ने ही श्रीराम को बताया कि रावण माता सीता का हरण करके लंका ले गया है और उन्हीं की गोद में अपने प्राण त्याग दिए। तत्पश्चात् श्रीराम ने अनुज लक्ष्मण के साथ मिलकर पुण्यात्मा जटायु का अंतिम संस्कार किया।
देखा जाय तो सम्पूर्ण रामकथा ‘पक्षीराज’ की ऋणी है। ये सोचना मुश्किल है कि अगर जटायु ना होते तो श्रीराम को सीताजी के हरण की जानकारी कैसे हो पाती! ये अलग बात है कि श्रीराम साक्षात् ब्रह्म थे, पर वो लीला कर रहे थे, ये कैसे भूला जा सकता है? गौर से देखें तो जटायु रामायण के पूर्वार्द्ध और उत्तरार्द्ध के सूत्रधार हैं। रामकथा के इस किरदार का महत्व जितना राम के प्रति उनके नि:स्वार्थ प्रेम और भक्ति के कारण है उतना ही इस बात के लिए कि वे मनुष्य और अन्य जीवों के अन्योन्याश्रय संबंध – वसुधैव कुटुम्बकम् – के बहुत बड़े प्रतीक हैं। यही कारण है कि रामायण में संक्षिप्त उपस्थिति के बावजूद उनका अमर और अमिट स्थान है।
कहना गलत ना होगा कि कल तक जो केरल अपनी खूबसूरती के लिए मशहूर था, अब उसके टूरिस्ट मैप पर हमारी संस्कृति का अत्यन्त महत्वपूर्ण अध्याय जटायु नेचर पार्क के तौर पर अंकित हो गया है। अपने समृद्ध अतीत को सहेजने का इससे बेहतर तरीका और क्या हो सकता है भला! वैसे चलते-चलते पर्यटन प्रेमियों को ये बता देना जरूरी है कि जटायु नेचर पार्क में बनी उनकी विशाल प्रतिमा के भीतर आप डिजिटल म्यूजियम और 6डी थियेटर का आनंद भी ले सकते हैं। और हाँ, केरल की प्रसिद्ध आयुर्वेद चिकित्सा सुविधा भी इस नेचर पार्क में आपके इंतजार में होगी।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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74वें पड़ाव पर कभी ना बुझने वाली लौ

कल 74 साल के हो गए अमिताभ। अमिताभ यानि कभी ना बुझने वाली लौ। अपने काम से अपने नाम को परिभाषित करने वाले बिरले ही होते हैं और अमिताभ बच्चन नाम का ये शख्स उन्हीं चंद लोगों में एक है। कितनी अद्भुत बात है कि पिता हरिवंश राय बच्चन के घनिष्ठ मित्र सुमित्रानंदन पन्त जन्म के बाद बालक अमिताभ को देखने नर्सिंग होम गए थे और देखते ही कहा था – कितना शांत दिखाई दे रहा है, मानो ध्यानस्थ अमिताभ। यह सुनकर माता-पिता ने अपने बच्चे को यही नाम दे दिया और उस बच्चे को देखिए, उसने उस नाम में उसके अर्थ से कहीं अधिक ‘आभा’ भर दी।

अमिताभ आज ‘संज्ञा’ से ‘विशेषण’ में तब्दील हो चुके हैं। सफलता के पर्याय बन चुके हैं। सिनेमा से जुड़ा हर शख्स उनके जैसा बनना-दिखना चाहता है। उनकी कामयाबी को दोहराना चाहता है। कारण यह कि उनके व्यक्तित्व में जीवन के वो सारे रंग हैं, जिन्हें पाने के लिए इंसान को सदियां लग जाती हैं। कहना गलत ना होगा कि आधुनिकता और परंपरा का जितना सुन्दर और सटीक मिश्रण उनमें है, जीवित भारतीयों में उतना किसी और में नहीं। वे सही मायनों में ‘सम्पूर्ण’ हैं और ये सम्पूर्णता जितनी नैसर्गिक और दैवी है उतनी ही हाड़तोड़ मेहनत और अथक संघर्ष है उसके पीछे।

पढ़ाई-लिखाई के बाद अमिताभ को कोलकाता के एक फर्म में नौकरी मिल गई थी। पर उनके मन में सपने कुछ और थे। खैर, मुंबई जाने से पहले उन्होंने 1963 से 1968 तक पाँच साल कलकत्ता में गुजारे। इस बीच दो प्राइवेट कम्पनियों में काम किया। नौकरी के साथ मटरगश्ती भी खूब की। कोयले का व्यवसाय करने वाली बर्ड एंड हिल्जर्स कम्पनी में उनकी पहली पगार पाँच सौ रुपए थी तो दूसरी कम्पनी ब्लैकर्स में उनकी अंतिम पगार थी 1680 रुपए।

नौकरी से अमिताभ की बाहरी जरूरतें भले ही पूरी होती रही हों लेकिन भीतर की भूख ज्यों की त्यों थी। नौकरी करते हुए भी अपनी दिनचर्या को उन्होंने थियेटर और सिनेमा के अपने शौक पर हावी ना होने दिया। वो ना केवल बना रहा बल्कि बढ़ता रहा। रंगमंच पर वे लगातार खुद को मांजते रहे और एक दिन फिल्मों की ओर रुख कर लिया। कोलकाता से वे मद्रास पहुँचे और वहाँ से मुंबई। अभिनेता बनने के आकांक्षी अमिताभ बच्चन का पहला फोटो अलबम उनके छोटे भाई अजिताभ ने तैयार कराया था, जो अब काम आने वाला था।

पहली फिल्म सात हिन्दुस्तानी में काम के बदले अमिताभ को मेहनताने में पाँच हजार रुपए मिले थे। यह फिल्म उन्होंने दिल्ली के शीला सिनेमा में अपने माता-पिता के साथ देखी थी। जब इस फिल्म को देख कर मशहूर अदाकारा मीना कुमारी ने उनकी तारीफ की तो अमिताभ लजा गए थे। शुरुआती दिनों में वे जलाल आगा की विज्ञापन कम्पनी में अपनी आवाज़ भी उधार दिया करते और बदले में प्रति विज्ञापन पचास रुपए पाते, जो तब उनके लिए पर्याप्त रकम हुआ करती। ये वो दिन थे जब काम की तलाश और खाली जेब साथ-साथ चला करती और अमिताभ वर्ली स्थित सिटी बेकरी से आधी रात के समय आधे दाम में मिलने वाले टूटे-फूटे बिस्कुट खरीदते और चाय के साथ खाकर गुजारा करते।

अमिताभ की शुरुआती एक दर्जन फिल्में बुरी तरह फ्लॉप हुईं। फिल्म इंडस्ट्री में उन्हें ‘अपशकुनी’ हीरो माना जाने लगा। कोई उन्हें घर लौट जाने की सलाह देता तो कोई कवि बनने की। ऐसे में ‘जंजीर’ आई और फिर उन्होंने पीछे मुड़कर नहीं देखा। कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती, सो नहीं हुई।

‘जंजीर’ में अमिताभ ने पुलिस इंस्पेक्टर की भूमिका की थी। पुलिस की वर्दी में वे जंचेंगे या नहीं, प्रकाश मेहरा (इस फिल्म के निर्माता और निर्देशक) को शक था। तब सलीम-जावेद ने कहा था कि इस रोल के लिए अमिताभ बच्चन से अच्छी कोई चॉइस हो ही नहीं सकती। इस बात का विश्वास मेहरा को पहले दिन की शूटिंग के दौरान ही हो गया। हुआ यूँ कि पुलिस चौकी के इस दृश्य में खान के रूप में प्राण साहब आते हैं और इंस्पेक्टर अमिताभ के सामने रखी कुर्सी पर बैठने लगते हैं। प्राण को बैठने का अवसर ना देते हुए अमिताभ कुर्सी को धकेलकर संवाद बोलते हैं – ये पुलिस स्टेशन है, तुम्हारे बाप का घर नहीं..। शॉट देने के बाद प्राण प्रकाश मेहरा को हाथ पकड़कर एक ओर ले जाते हैं और कहते हैं – प्रकाश, अभिनय तो कई वर्षों से करता आ रहा हूँ, पर ऐसा जबर्दस्त अनुभव मुझे कभी नहीं हुआ। मैं तुम्हें आज ही बता देता हूँ कि हिन्दी सिनेमा को एक बड़ा भारी एक्टर मिल गया है। दीवार पर लिखी इबारत मुझे साफ नजर आ रही है। शायद ये ‘ग्रेटेस्ट स्टार’ होगा।

प्राण साहब का कहा सच हुआ। आज अमिताभ बॉलीवुड के बिग बी हैं, शहंशाह हैं, सदी के महानायक हैं और उनका ये डायलॉग हकीकत बन चुका है कि वो जहाँ खड़े हो जाते हैं, लाइन वहीं से शुरू होती है। अभिनय के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार (चार बार) और फिल्म फेयर पुरस्कार (11 बार) समेत पुरस्कारों और पद्मश्री, पद्मभूषण और पद्म विभूषण समेत सम्मानों की लम्बी फेहरिस्त है उनके नाम।

आज आनंद, अभिमान, जंजीर, दीवार, शोले, चुपके-चुपके, कभी-कभी, अमर अकबर एंथनी, मुकद्दर का सिकन्दर, त्रिशूल, डॉन, काला पत्थर, लावारिस, सिलसिला, नमक हलाल, शक्ति, कुली, शराबी, मर्द, शहंशाह, अग्निपथ, हम, खुदा गवाह, मोहब्बतें, कभी खुशी कभी गम, कभी अलविदा ना कहना, आँखें, बागबान, ब्लैक, सरकार, चीनी कम, भूतनाथ, पा, पीकू, वजीर और पिंक जैसी फिल्में उनके खाते में है और इनमें उनके अभिनय के इतने रंग हैं कि एक्टिंग का पूरा स्कूल खुल जाय, पर अपनी हर अगली फिल्म में कुछ नया करने और देने की उनकी छटपटाहट आज भी ज्यों की त्यों है। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका उत्साह और जुनून आज की पीढ़ी के अभिनेताओं से बीस ठहरेगा। यही कारण है कि आज जबकि उनके तमाम समकालीन अभिनेता अपनी चमक बिखेर कर गायब हो चुके हैं, अमिताभ करोड़ों दिलों पर राज कर रहे हैं। सचमुच अद्भुत हैं अमिताभ। ईश्वर उन्हें चिरायु प्रदान करें!

  ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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हार्दिक पटेल संग क्या पका रहे केजरीवाल ?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की निगाहें दिल्ली के बाद पंजाब पर तो थीं ही, अब उनकी ‘ताक-झाँक’ गुजरात में भी शुरू हो गई है। जी हाँ, इन दिनों उनकी पाटीदारों के नेता हार्दिक पटेल से खूब निभ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इन धुर विरोधी नेताओं के बीच बढ़ती नजदीकियों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केजरीवाल हार्दिक के उन ट्वीट्स को रिट्वीट कर रहे हैं, जिनमें मोदी सरकार की आलोचना की गई है। बता दें कि गुजरात में अगले साल चुनाव होने वाले हैं और विरोधी अपने-अपने पक्ष में जमीन तैयार करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहे।

राजनीति के गलियारों में पैठ रखने वाले सूत्र बता रहे हैं कि गुजरात में केजरीवाल-हार्दिक आने वाले चुनावों में हाथ मिला सकते हैं। गौरतलब है कि हार्दिक पटेल ने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर ट्वीट किया था कि सर्जिकल स्ट्राइक का श्रेय सेना को जाता है, जबकि क्रेडिट मोदी ले रहे हैं। यह ट्वीट ‘आप’ और भाजपा के बीच सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर हो रही टीका-टिप्पणी के बाद सामने आया था। केजरीवाल ने इस ट्वीट को रिट्वीट किया। यही नहीं, केजरीवाल ने हार्दिक का वह ट्वीट भी रिट्वीट किया, जिसमें उन्होंने गुजरात में बेरोजगारी की समस्या पर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की थी।

जिन्होंने हार्दिक पटेल का ट्वीट ना देखा हो उन्हें उत्सुकता होगी कि आखिर उन दोनों ट्वीट में था क्या? सर्जिकल स्ट्राइक के बाद किए गए ट्वीट में हार्दिक के शब्द थे – “गोली खाई सेना ने, शहीद हुवा सेना का जवान, जवाब में आतंकी को मार गिराया सेना के जवानों ने, तो फिर उसका लाभ भाजपा और मोदी क्यों ले रहे हैं?” इसी तरह गुजरात में बेरोजगारी को लेकर हार्दिक ने अपने ट्वीट में कहा था – “गुजरात में सात वायब्रंट समिट के बाद भी 35 लाख लोग बेरोजगार हैं, सात प्रतिशत उद्योग और 31 फीसद फैक्ट्रियां बंद हैं।”

अरविन्द केजरीवाल खासे पढ़े-लिखे आदमी हैं। उनके पास ना तो डाटा की कमी होगी, ना सवाल उठाने में वो किसी से पीछे हैं। फिर गुजरात पर बात करने के लिए हार्दिक पटेल की ढाल क्यों? गौरतलब है कि मीडिया के माध्यम से हार्दिक के लिए ‘पारखी’ केजरीवाल का प्रेम तभी से सामने आता रहा है जब से पाटीदार आन्दोलन चर्चा में आया। प्रत्युत्तर में हार्दिक भी केजरीवाल में ‘सम्भावना’ जताते रहे हैं।

जो भी हो, इसमें कोई संशय नहीं कि केजरीवाल की महत्वाकांक्षा अब गुजरात के लिए हिलोड़ें मार रही हैं। लेकिन यहाँ एक सवाल यह उठता है कि क्या उनके पास गुजरात तक ‘पांव पसारने को चादर’ है? अगर नहीं तो समय से पहले पाली जा रही महत्वाकांक्षा की अकाल मृत्यु तय है। वैसे 16 अक्टूबर को केजरीवाल गुजरात यात्रा पर जाने वाले हैं, और आगे जो भी हो, वहाँ जाकर वो क्या और कितना गुल खिलाते हैं, इस पर निगाह तो रहेगी ही।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पाकिस्तान के ‘मौसेरे भाई’ ने पार की बेशर्मी की हद

चीन ने तिब्बत में अपनी एक पनबिजली परियोजना के लिए ब्रह्मपुत्र की एक सहायक नदी का पानी रोक दिया है। समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, चीन का कहना है कि वो इससे बिजली पैदा करेगा, पानी का इस्तेमाल सिंचाई के लिए करेगा और साथ ही इससे बाढ़ पर काबू पाने में मदद मिलेगी। लेकिन भारत और बांग्लादेश इससे चिन्तित हैं, क्योंकि इससे उनके इलाके में रहने वाले लाखों लोगों को पानी की आपूर्ति बाधित हो सकती है। गौरतलब है कि चीन से निकलकर ब्रह्मपुत्र नदी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों अरुणाचल प्रदेश और असम से होती हुई बांग्लादेश तक जाती है।

चीन ने यह काम ऐसे वक्त में किया है जब उड़ी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से सिंधु जल समझौते के तहत होने वाली बैठक रद्द कर दी और इस समझौते की समीक्षा करने का भी फैसला किया। भारत ने यह फैसला पाक पर दबाव बनाने के लिए किया था। ऐसे में चीन का ताजा रुख इस आशंका को बढ़ावा देता है कि कहीं वह पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत पर दबाव तो नहीं बना रहा। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के विदेशी मामलों के सलाहकार सरताज अजीज ने ब्रह्मपुत्र को लेकर चीन की चाल की धमकी पहले ही दे दी थी।

बहरहाल, शिन्हुआ के मुताबिक, चीन ने इस पनबिजली परियोजना पर वर्ष 2014 में काम शुरू किया था, जिसे वर्ष 2019 तक पूरा करना है। इस परियोजना पर चीन ने 750 मिलियन डॉलर का निवेश किया है और यह उसकी सबसे महंगी परियोजना बताई जा रही है। बता दें कि यह परियोजना तिब्बत के जाइगस में है जो सिक्किम के नजदीक है। जाइगस से ही ब्रह्मपुत्र नदी अरुणाचल प्रदेश में दाखिल होती है।

दरअसल अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत की सक्रियता और खासकर अमेरिका से उसकी बढ़ती नजदीकी चीन को रास नहीं आ रही है। उसकी बौखलाहट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरी दुनिया जिस मसूद अजहर को आतंकी मानती है, सारी नैतिकता और मर्यादा को ताक पर रख चीन उसे बचाने में जुटा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र में अगर चीन ने वीटो नहीं लगाया होता तो भारत की मांग पर मसूद को संयुक्त राष्ट्र का आतंकी घोषित कर दिया जाता।

कहने की जरूरत नहीं कि चाहे वीटो कर मसूद को बचाना हो या ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी का पानी रोकना, चीन का एकमात्र मकसद भारत से अपनी कटुता साधना है। पाकिस्तान के साथ उसकी ‘जुगलबंदी’ जगजाहिर है, और अब उस ‘जुगलबंदी’ से बेहयाई के सुर निकल रहे हैं। ये सुर जितने भद्दे हैं, उतने ही खतरनाक भी। भारत को चाहिए कि समय रहते इन ‘मौसेरे भाईयों’ का सही हल निकाल ले।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

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भारत ने पाकिस्तान से छीना टेस्ट का ताज

टीम इंडिया ने घरेलू मैदान पर खेले गए अपने 250वें टेस्ट को शानदार जश्न में तब्दील कर दिया। कोलकाता के प्रसिद्ध ईडन गार्डंस पर खेले गए दूसरे टेस्ट के चौथे दिन भारत ने न्यूजीलैंड को 178 रन से हराकर ना केवल तीन मैचों की सीरीज पर कब्जा जमाया, बल्कि अपने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान से टेस्ट में नंबर वन का ताज भी छीन लिया।

विराट कोहली की युवा टीम ने न्यूजीलैंड को 376 रन का विशाल लक्ष्य दिया था जिसका दबाव कीवी झेल नहीं पाए और पूरी टीम 197 रन पर ढेर हो गई। भारतीय गेंदबाजों ने कसी हुई गेंदबाजी की और कीवियों को सांस लेने का मौका नहीं दिया। दूसरी पारी में अश्विन, जडेजा और शमी ने तीन-तीन विकेट आपस में बांटे, जबकि पहली पारी में पाँच विकेट लेने वाले भुवनेश्वर को इस पारी में एक विकेट मिला। पहली पारी में अर्द्धशतक लगाने वाले रिद्धिमान साहा ने दूसरी पारी में भी महत्वपूर्ण 58 रन बनाए। उन्होंने पूरे मैच में 112 रन बनाए और खास बात यह कि दोनों पारियों में अविजित रहे। उनके इस शानदार प्रदर्शन पर उन्हें ‘मैन ऑफ द मैच’ चुना गया।

बता दें कि कप्तान कोहली के धुरंधरों ने डेढ़ महीने बाद पाकिस्तान को शीर्ष रैंकिंग से हटाया है। अब भारत की अगली चुनौती होगी कि वह पाकिस्तान को पहले पायदान की पहुँच से दूर रखे। यह तभी संभव है जब वह इंदौर में सीरीज का तीसरा और आखिरी टेस्ट जीते या ड्रॉ कराए। वैसे भारतीय टीम अभी जिस तरह के फॉर्म में है, उसे देखते हुए नहीं लगता कि निकट भविष्य में पाकिस्तान अपना रुतबा दोबारा हासिल कर पाएगा। गौरतलब है कि टीम इंडिया लगातार 13 मैचों से अजेय है। इसमें 11 जीत और 2 ड्रॉ शामिल हैं। यह भी याद दिला दें कि कोहली के नेतृत्व में यह लगातार चौथी टेस्ट जीत है।

चलते-चलते बता दें कि भारतीय टीम इससे पहले भी शीर्ष पर रह चुकी है। नवंबर 2009 से अगस्त 2011 तक टीम इंडिया आईसीसी की टेस्ट रैंकिंग में शिखर पर रही थी। फिर जनवरी 2016 से फरवरी 2016 के बीच भी वह पहले स्थान पर काबिज हुई थी।

 ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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और बापू ने घी का दिया जलाने से ‘बा’ को मना कर दिया

आईये, गांधी जयंती पर जानें उस महामानव से जुड़ी चार बातें और हृदय पर हाथ रखकर स्वयं से पूछें कि क्या हम गांधीजी को सचमुच जानते हैं? अगर जानते हैं तो उनके बताए पर कितना अमल करते हैं? और सबसे बड़ी बात कि क्या अपनी अगली पीढ़ी के जीवन में हम गांधी का सहस्त्रांश भी भर रहे हैं?

घी के दिये पर आपत्ति

सेवाग्राम में बापू के जन्मदिन के मौके पर ‘बा’ ने एक बार घी का दिया जलाया। बापू एकटक घी के दीपक को देखते रहे और थोड़ी देर बाद ‘बा’ से कहा – “आज अगर घी का दिया नहीं जलता तो कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे आस-पास कई लोगों के पास खाने को सूखा टुकड़ा तक नहीं है। ऐसे में यह तो पाप है।” बापू की जयंती मनाने से पहले हमें देखना चाहिए कि हमने अपने आस-पास के निर्धन लोगों की तकलीफों से कितनी दूरी बना रखी है। अगर ऐसा नहीं होता तो हमारे लाखों बच्चे हर साल कुपोषण से नहीं मर रहे होते।

शिक्षा के साथ दो हुनर

गांधीजी ने कहा था कि शिक्षा-व्यवस्था ऐसी हो जिसमें विद्यार्थी कम-से-कम दो हुनर भी सीखें। अपने भोजन और रहने का खर्च खुद ही निकालें। इससे हमारे जैसे गरीब देश में सभी बच्चों के लिए शिक्षा का इंतजाम करना आसान होगा। उन्होंने जोर देकर कहा था कि अंग्रेजों की शिक्षा बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए नहीं है। लेकिन इसके उलट हमारी शिक्षा-व्यवस्था लगातार महंगी होती गई। अपने बच्चों को ‘एयरकंडीशन्ड’ स्कूलों में भेजना हमारा चरम लक्ष्य बन गया, ना कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाना।

फोटो खिंचवाने की तीन शर्तें

महात्मा गांधी के पोते कनु गांधी एक फोटोग्राफर थे। शुरुआत में गांधीजी ने पैसे की कमी का हवाला देते हुए कैमरा खरीदकर देने से कनु को मना कर दिया था। लेकिन बाद में कनु के जिद करने पर उन्होंने घनश्यामदास बिड़ला से इसके लिए मदद मांगी। उन्होंने कनु को 100 रुपये दिए जिससे कनु ने रॉलीफ्लेक्स कैमरा खरीदा। इसके बाद उन्होंने खुद की फोटोग्राफी के लिए कनु के सामने तीन शर्तें रखीं। पहला यह कि वह कभी कैमरे के फ्लैश का इस्तेमाल नहीं करेंगे, दूसरा कि वह कभी उन्हें पोज देने को नहीं कहेंगे और तीसरा कि कभी भी वह अपने शौक के लिए आश्रम से पैसे नहीं मांगेंगे। तीसरी शर्त तो आप समझ ही गए होंगे। पहली और दूसरी शर्तें इसलिए कि गांधीजी को जीवन में पल भर की ‘बनावट’ भी बर्दाश्त नहीं थी। क्या प्रदर्शन पर पैसे उड़ाने और बनावट में यकीन रखने वाली आज की पीढ़ी इससे सीख लेगी?

महात्मा की पदवी से कष्ट

गांधीजी ने कहा था कि “मुझे नहीं लगता कि मैं महात्मा हूँ। लेकिन मैं यह अवश्य जानता हूँ कि मैं ईश्वर के सर्वाधिक दीन-विनीत प्राणियों में से एक हूँ। इस ‘महात्मा’ की पदवी ने मुझे बड़ा कष्ट पहुँचाया है। मुझे एक क्षण भी ऐसा याद नहीं जब इसने मुझे गुदगुदाया हो।” उनका मानना था कि यह पदवी व्यर्थ है क्योंकि यह उनके बाह्य कार्यकलाप, उनकी राजनीति के कारण है, जो उनका लघुतम पक्ष है और इसलिए क्षणजीवी भी है। आगे उन्होंने कहा – “मेरा वास्तविक पक्ष है सत्य और अहिंसा के प्रति मेरा आग्रह, और इसी का महत्व स्थायी है। यह पक्ष चाहे जितना छोटा हो पर इसकी उपेक्षा नहीं करनी है। यही मेरा सर्वस्व है।” क्या छोटी-सी उपलब्धि और उपाधि पर इतराने से पहले हमें बापू की ये बात याद नहीं करनी चाहिए?

तो ऐसे थे बापू। आईये, उन्हें नमन करें। जितनी सामर्थ्य हो हमारी, उतना उन्हें अपने जीवन में उतारें और कुछ ऐसा करें कि हमारी आने वाली नस्लें उनका कुछ अंश भी अपने जीवन में उतार पाएं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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45 साल में पहली बार, हमने किया एलओसी पार

भारतीय जवानों ने उड़ी में शहीद हुए अपने 18 साथी जवानों की शहादत का बदला ले लिया। उड़ी हमले के 10 दिन बाद हमारे जवान अदम्य साहस का परिचय देते हुए एलओसी के पार करीब तीन किलोमीटर अंदर घुसे और चार घंटे में सात आतंकी कैंपों को नेस्तनाबूद कर 38 आतंकियों को मार गिराया। 45 साल में पहली बार ऐसा हुआ कि हमने पाकिस्तान को पीओके (पाक अधिकृत कश्मीर) में घुसकर मारा। भारतीय सेना की तैयारी कितनी जबर्दस्त थी, इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि इतनी बड़ी कार्रवाई को अंजाम देने के बाद हमारे सभी जवान सुरक्षित वापस लौटे। उनमें से किन्हीं को चोट तक नहीं आई।

भारतीय सेना के इस हमले की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडल समिति की बैठक के बाद की गई। बैठक में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री अरुण जेटली, सेना प्रमुख दलबीर सिंह सुहाग और सैन्य अभियान महानिदेशक (डीजीएमओ) रणबीर सिंह मौजूद थे। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत 25 देशों के उच्चायुक्तों और राजदूतों को इन हमलों के बारे में सूचित किया। निश्चित रूप से यह उनके कूटनीतिक कौशल का परिचायक है। दूसरी ओर हमारे नैतिक बल की पराकाष्ठा यह कि इस हमले के बाद हमारे सैन्य अभियान महानिदेशक ने पाकिस्तान के सैन्य अभियान महानिदेशक से भी फोन पर बात की और उनसे इस अभियान का ब्योरा साझा किया।

इस हमले के बाद भारतीय सेना के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ (खास ठिकानों को लक्ष्य बनाकर गुप्त तरीके से हमला करना और यह सुनिश्चित करना कि सिर्फ लक्षित निशाने को ही नुकसान हो) की जानकारी दी गई। भारतीय सैन्य महानिदेशक ने बताया कि हमें अत्यन्त विश्वसनीय सूचना मिली थी कि आतंकी नियंत्रण रेखा पर बने आतंकी शिविरों में जम्मू-कश्मीर और अन्य महानगरों में हमले के उद्देश्य से एकत्र हुए हैं। इसी कारण बिना देर किए उन्हें उनके अंजाम तक पहुँचा दिया गया।

भारत के इस मुँहतोड़ जवाब के बाद पाकिस्तान बौखलाहट में है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान पलटवार कर सकता है। हालांकि उड़ी के बाद अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर बुरी तरह घिर चुके (गौरतलब है कि भारत के कड़े रुख के कारण इस्लामाबाद में प्रस्तावित सार्क सम्मेलन भी रद्द हो चुका है) और अन्दरूनी तौर पर अत्यन्त ‘जर्जर’ पाकिस्तान के लिए ऐसा करना बहुत आसान नहीं है, और अगर वह कोई नापाक हरकत कर भी बैठता है तो भारत इसके लिए पूरी तरह तैयार है।

सबसे अच्छी बात यह कि आतंक के खिलाफ कार्रवाई पर सभी राजनीतिक दल एक हैं। नियंत्रण रेखा पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद सभी दलों ने सेना को मुबारकबाद दी और सरकार को यकीन दिलाया कि आतंक के खिलाफ कार्रवाई में वे सरकार के साथ हैं। दूसरी ओर सरकार भी सभी दलों को विश्वास में लेकर चल रही है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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