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हम क्यों मनाते हैं बाल दिवस ?

14 नवंबर यानि चाचा नेहरू का जन्मदिन जिसे हम बाल दिवस के रूप में मनाते हैं। अगर पूछा जाय कि क्यों मनाते हैं तो आपका जवाब होगा कि ऐसा इसलिए क्योंकि पं जवाहरलाल नेहरू बच्चों से बहुत स्नेह करते थे। आपकी ये बात सही तो होगी लेकिन अधूरी होगी क्योंकि पं. नेहरू बच्चों से केवल स्नेह ही नहीं करते थे, प्रौढ़ों और युवाओं की तुलना में उन्हें अधिक महत्व भी देते थे।

पं. नेहरू का स्पष्ट मानना था कि आज जन्मा शिशु भविष्य में राजनीतिज्ञ, शिक्षक, लेखक, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या फिर किसान और मजदूर ही क्यों न बने, राष्ट्र निर्माण का दायित्व उन्हीं के कंधों पर होता है। कहने का तात्पर्य यह कि पं. नेहरू बच्चों को देश का भविष्य मानते थे और यही इस दिन को बाल दिवस के रूप में मनाने का औचित्य है। बल्कि और बेहतर तरीके से यह कहा जाना चाहिए कि 14 नवंबर केवल स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री को याद करने का दिन ही नहीं, उनके बहाने बच्चों में विश्वास जताने का दिन भी है।

वैसे जब हम बाल दिवस की बात कर ही रहे हैं तो हमें यह जरूर जानना चाहिए कि बाल दिवस केवल भारत में ही नहीं दुनिया भर में मनाया जाता है लेकिन अलग-अलग तारीखों में। चलिए जानते हैं कैसे हुई इसकी शुरुआत?

असल में बाल दिवस की नींव 1925 में रखी गई थी, जब बच्चों के कल्याण पर विश्व-कांफ्रेंस में बाल दिवस मनाने की घोषणा हुई। 1954 में इसे दुनिया भर में मान्यता मिली। संयुक्त राष्ट्र ने यह दिन 20 नवंबर के लिए तय किया लेकिन अलग-अलग देशों में यह अलग दिन मनाया जाता है। हालांकि कुछ देश 20 नवंबर को भी बाल दिवस मनाते हैं। 1950 से बाल संरक्षण दिवस यानि 1 जून भी कई देशों में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

खैर, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाल दिवस हम 14 नवंबर को मनाते हैं, 20 नवंबर को मनाते हैं, 1 जून को मनाते हैं या किसी और दिन। महत्वपूर्ण यह है कि हम इस दिन पं. नेहरू के बच्चों में जताए विश्वास को याद करें। हम जानें और मानें कि हर बच्चा खास है और देश के बेहतर भविष्य के लिए उन्हें बेहतर जीवन देना बेहद जरूरी है। इन बच्चों का शरीर, मस्तिष्क या संस्कार जितना कुपोषित होगा, हमारे समाज, देश और दुनिया को भी उसी अनुपात में कुपोषण झेलना पड़ेगा, इस सच से नज़र चुराने की भूल हमें हरगिज नहीं करनी चाहिए। यही इस दिन का संदेश है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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अमिताभ और प्रियंका नहीं मोदी होंगे अतुल्य भारत अभियान का चेहरा

पर्यटन को बढ़ावा देने वाले अतुल्य भारत (इन्क्रेडिबल इंडिया) अभियान का चेहरा अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी होंगे। पर्यटन मंत्रालय ने अमिताभ बच्चन समेत बॉलीवुड के अन्य सितारों को अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाने का विचार छोड़ दिया है। गौरतलब है कि इस साल की शुरुआत में अभिनेता आमिर खान को हटाए जाने के बाद ब्रांड एंबेसडर के रूप में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा को लाए जाने के कयास लगाए जा रहे थे।

पर्यटन मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार पिछले ढाई वर्षों के दौरान देश और विदेश में पर्यटन को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं। उन्होंने देश के विभिन्न स्थानों की विशेषता और विविधता का वर्णन बड़े ही प्रभावशाली तरीके से किया है। पर्यटन मंत्रालय प्रधानमंत्री द्वारा अलग-अलग स्थानों और अवसरों पर कही गईं ऐसी तमाम बातों एवं वक्तव्यों के विडियो फुटेज को जुटाने में लगा हुआ है। इन्हीं फुटेजों का इस्तेमाल अतुल्य भारत अभियान में किया जाएगा।

भारत के पर्यटन मंत्री महेश शर्मा इससे पूर्व कह चुके हैं कि अतुल्य भारत अभियान को बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री सबसे उपयुक्त चेहरा हैं। जिन देशों का उन्होंने दौरा किया है, वहाँ से पर्यटकों के आगमन में उछाल देखा गया है। बकौल शर्मा पिछले दो वर्षों में प्रधानमंत्री के कई देशों के दौरे से भारत को लेकर धारणा में उल्लेखनीय बदलाव आया है। ऐसे में भारतीय पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उनसे बेहतर चेहरा और कौन हो सकता है!

पर्यटन मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर जो राय रखी है उससे इनकार नहीं किया जा सकता। अपने सघन और प्रभावशाली विदेशी दौरों से मोदी सम्पूर्ण विश्व में भारत के ब्रांड एंबेसडर के तौर पर उभरे हैं। अपनी वक्रता और कुशल कूटनीति से भारतीय संस्कार और संभावनाओं का उन्होंने एक नया आयाम रच दिया है। विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए सचमुच अब बॉलीवुड के किसी चेहरे की आवश्यकता हमें नहीं है। देर से लिए गए इस दुरुस्त निर्णय के लिए पर्यटन मंत्रालय को बधाई!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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काले धन पर मोदी की चोट, 500 और 1000 के नोट आज से बंद

आज मध्य रात्रि से 500 और 1000 रुपये के नोट आधिकारिक तौर पर बंद हो जाएंगे। अगर आपके पास ईमानदारी से कमाए पैसे हैं तो आप उन्हें 30 दिसंबर तक बेहिचक बैंक या डाकघर में जमा करा सकते हैं लेकिन अगर आपने धन अनैतिक तरीके से कमाया है और वो 500 या 1000 रुपये के नोटों की शक्ल में है तो आज रात 12 बजे के बाद वो रद्दी में तब्दील हो जाएंगे। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आज देर शाम स्वयं यह ऐतिहासिक घोषणा की। काले धन के काले इस्तेमाल पर रोक लगाने की खातिर ऐसा साहसिक निर्णय आज तक संसार के किसी देश ने नहीं लिया था। भारत में आतंकवादी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए नकली नोटों का इस्तेमाल जिस तरह बढ़ रहा था, उसे देखते हुए भी केन्द्र से एक बड़े निर्णय की अपेक्षा थी। लेकिन वो निर्णय इतना बड़ा और इतने बड़े पैमाने पर होगा, इसकी हवा प्रधानमंत्री ने अपने निकटतम लोगों को भी लगने नहीं दी थी।

बहरहाल, इस बड़ी ख़बर से जुड़ी पाँच बड़ी बातों पर निगाह डालना बेहद जरूरी है। पहली बात, 11 नवंबर की रात 12 बजे तक पेट्रोल पंप, सीएनजी स्टेशन, रेलवे स्टेशन, बस स्टैंड, हवाई अड्डे, अस्पताल और दवा की दूकान पर 500 और 1000 रुपये के नोट स्वीकार किए जाएंगे। दूसरी बात, 9 नवंबर को सारे बैंक और एटीएम बंद रहेंगे। कुछ एटीएम 10 नवंबर को भी बंद रहेंगे। तीसरी बात, समुचित व्यवस्था होने तक जरूरी खर्चों के लिए शुरू में कुछ दिनों तक 2000 और उसके बाद 4000 तक के नोट आप बैंकों से बदल सकते हैं। चौथी बात, 10 नवंबर से 30 दिसंबर तक आप अपने पास रखे 500 और 1000 रुपये के नोट बैंक या डाकघर में जमा करा सकते हैं। और पाँचवीं बात, कल के बाद 500 के नए नोट तो आप देखेंगे, लेकिन 1000 के नोट अब इतिहास की चीज हो जाएंगे। इनकी जगह सरकार ने 2000 के नोट जारी करने का निर्णय लिया है।

याद रखें, आप इतिहास को बनते हुए रख रहे हैं। सरकार के इस बड़े निर्णय के बाद आपकी दिनचर्या से लेकर देश की अर्थव्यवस्था तक कई परिवर्तन आपको देखने को मिलेंगे, लेकिन आपकी धनराशि हर हाल में आपकी ही रहेगी। आपको चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है। शर्त बस इतनी कि आपने वो धनराशि घोषित स्रोतों से और ईमानदारी से कमाई हो।

हमारे देश में भ्रष्टाचार और कालाधन जैसी बीमारियों ने जड़ जमा लिया था। देश से गरीबी हटाने की राह में सबसे बड़ी बाधा यही थी। इसकी वजह से आतंकी भी आसानी से भारत में पैर जमा लेते थे। हवाला के जरिए हथियारों की खरीद कोई छिपी हुई बात नहीं। चुनावों में काले धन के इस्तेमाल से भला कौन वाकिफ नहीं! देश आखिर पनपता तो कैसे?

करोड़ों भारतवासी जिनकी रगों में अब भी ईमानदारी दौड़ा करती है, बड़ी शिद्दत से भ्रष्टाचार, काले धन और आतंक के खिलाफ निर्णायक लड़ाई की प्रतीक्षा कर रहे थे। मोदी सरकार के इस शक्तिशाली और अभूतपूर्व कदम के बाद उनकी उम्मीदों को कितने पंख लग गए, उन्हें नंगी आंखों से शायद हम देख भी ना पाएं। प्रधानमंत्री को इस निर्णायक निर्णय के लिए बारंबार बधाई और साधुवाद!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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अभी तुममें बहुत क्रिकेट बाकी है धोनी !

खेलप्रेमियों के मन को इन दिनों एक बड़ा सवाल मथ रहा है कि भारतीय क्रिकेट को नई ऊँचाईयां देने वाले महेन्द्र सिंह धोनी क्या वर्ल्ड कप 2019 तक टीम का हिस्सा होंगे? हालांकि धोनी के करीबी सूत्रों का कहना है कि फिलहाल उनका वनडे क्रिकेट से संन्यास का कोई इरादा नहीं है। वैसे धोनी ने कहा जरूर था कि वह 2016 के अंत तक अपने फॉर्म और फिटनेस पर विचार करेंगे, लेकिन न्यूजीलैंड के खिलाफ धमाकेदार तरीके से वनडे सीरीज जीतने के बाद अब उनकी नज़र 2017 में होने वाली चैम्पियंस ट्रॉफी पर टिक गई है। जाहिर है, अब धोनी अपने वनडे करियर पर उसके बाद ही कोई निर्णय लेंगे और फिलहाल उनके करोड़ों चाहने वालों के लिए ये राहत भी कम नहीं।

गौरतलब है कि अपना लिमिटेड ओवर करियर बढ़ाने के लिए ही धोनी ने 2014 में टेस्ट क्रिकेट से संन्यास लिया था और उनकी फिटनेस को लेकर आज तक कोई सवाल नहीं उठा है। वर्ल्ड कप 2019 तक वे 38 साल के जरूर हो जाएंगे लेकिन अभी भी जिस ऊर्जा के साथ वे खेल रहे हैं, उसे देखते हुए ये कहीं से नहीं लगता कि अगले तीन-चार साल उम्र उनके खेल के आड़े आएगी। पाकिस्तान के यूनिस खान और मिसबाह-उल-हक का ही उदाहरण लें। ये क्रिकेटर 40 की उम्र पार करने के बाद भी अन्तर्राष्ट्रीय क्रिकेट खेल रहे हैं। इसीलिए कोई कारण नहीं दिखता कि 2019 वर्ल्ड कप तक वे टीम के साथ न रहें।

भारतीय खिलाड़ियों की बात करें तो हमारे सामने एक उदाहरण धोनी के साथी खिलाड़ी आशीष नेहरा का है जिन्होंने 37 की उम्र में वापसी की, तो दूसरी ओर 2011 वर्ल्ड कप के हीरो युवराज सिंह और गौतम गंभीर जैसे खिलाड़ी हैं जो 2019 वर्ल्ड कप खेलने की दावेदारी रखते हैं। ऐसे में धोनी क्यों नहीं?

टीम इंडिया के पूर्व निदेशक रवि शास्त्री बिल्कुल सही कहते हैं कि धोनी जब तक खेल का आनंद उठा रहे हैं, उन्हें खेलते रहना चाहिए। उन्होंने आगे कहा कि “धोनी कपिल देव, सुनील गावस्कर और सचिन तेंदुलकर के समकक्ष खिलाड़ी हैं। वह एक बड़े खिलाड़ी हैं और उनमें 2019 का वर्ल्ड कप खेलने की क्षमता है। भारत को धोनी की जरूरत है और मुझे यकीन है कि वह यूं ही टीम को छोड़कर नहीं जाएंगे।”

सच तो यह है कि धोनी केवल भारत के सबसे सफल कप्तान ही नहीं हैं, भारतीय क्रिकेट का चेहरा और तेवर बदलने का श्रेय भी उन्हें ही जाता है। क्रिकेट की वर्तमान पीढ़ी के लिए वे एक ‘प्रतीक-पुरुष’ हैं और उनमें बहुत क्रिकेट बाकी है अभी। बस खुद को हमेशा की तरह फिट बनाए रखते हुए वे वर्ल्ड कप 2019 के लिए टीम तैयार करने में जुट जाएं। बाकी सब कुछ आने वाला समय खुद-ब-खुद तय कर देगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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संसार के हर त्योहार से विलक्षण है छठ

समय के साथ सब कुछ बदलता है। आपके तौर-तरीके ही नहीं, त्योहार तक बदल जाते हैं। तकनीक ने हमें बाहर जितना विस्तार दिया, भीतर उसी अनुपात में सिमटते गए हम और इस ‘संकुचन’ को बड़ी बेशर्मी से ‘आधुनिकता’ का नाम दिया हमने। आयातित बोली, आयातित शिक्षा, आयातित परिधान, आयातित संगीत, आयातित नृत्य, आयातित साहित्य, आयातित सिनेमा, आयातित उपकरण… इस आधुनिकता में सब कुछ आयातित था। आयात-आधारित इस आधुनिकता में हम विचारधारा भी आयात करने लगे और अब तो त्योहार आयात करने में भी हमें संकोच नहीं होता हमें। इसे हम समय के साथ बदलना कहने लगे हैं।

इस ‘आधुनिकता’ की होड़ में गांव बड़ी तेजी से शहरों में खोते जा रहे हैं। डिब्बाबंद दूध, ‘डेलिवर’ किए गए फास्ट फूड और बोतलबंद पानी पर बड़ी हुई पीढ़ी ‘ईएमआई’ चुकाना भले सीख ले, मिट्टी का ‘कर्ज’ चुकाने के संस्कार से वो कोसों दूर रहेगी। हम गौर से देखें, जड़ तक जाकर पड़ताल करें तो पाएंगे कि हमारे सारे व्रत और त्योहार हमारी मिट्टी से जुड़े हैं। हम आजीवन अपनी मिट्टी से जो लेते हैं दरअसल व्रत रखकर और त्योहार मनाकर उसी का आभार जताते हैं हम। पर लानत है हम पर कि अब हम अपनी मिट्टी तक में ‘मिलावट’ करने लगे हैं। इसी का परिणाम है कि होली, दीपावाली जैसे त्योहारों का बड़ी तेजी से ‘शहरीकरण’ होने लगा है। या यूँ कहें कि अब इन त्योहारों को हम ‘आधुनिक’ तरीके से मनाने लगे हैं।

आधुनिकता की इस चकाचौंध में भी अगर हमारी आँखें पूरी तरह चुंधिया नहीं गई हैं तो इसका बहुत बड़ा श्रेय छठ को जाता है। अपनी जड़ों से कटकर महानगरों के आसमान में उड़ना सीख गए बच्चे होली-दीपावली चाहे जहाँ मना लें पर छठ के लिए वे अपने ‘घोंसले’ को लौट आते हैं। उन बच्चों के बच्चे जान पाते हैं कि ‘टू बेडरूम फ्लैट’ से बाहर की दुनिया कितनी बड़ी होती है और दो इकाईयों के साथ रहने से बने परिवार और कई परिवारों के जुड़ने से बने परिवार में क्या फर्क होता है। वे समझ पाते हैं कि ‘डिस्कवरी’ पर नदियों को देखना और उसे छूकर महसूसना कितना अलग होता है। वे जान पाते हैं कि क्या होता है सूप, कैसा होता है दौउरा, कौन बनाते हैं इन चीजों को और समाज के कितने अभिन्न अंग हैं वे। छठ ही बताता है उन्हें डाभ, चकोतरा (टाब नींबू), सिंघाड़ा, अल्हुआ और सुथनी जैसे फलों का अस्तित्व।

छठ धर्म से ज्यादा समाज का, सामूहिकता का और समानता का त्योहार है। समाजवाद का सबसे जीवंत दृश्य आपको छठ घाट पर दिखेगा। मालिक और मजदूर दोनों एक समान सिर पर प्रसाद का दौउरा ढोते मिलेंगे आपको। सबके सूप का मोल-महत्व एक समान होगा। कोई आडम्बर नहीं। किसी को भी पुरोहित की ‘मध्यस्थता’ नहीं चाहिए होती। बस आस्था होनी चाहिए, आपकी पूजा सीधे छठी मईया तक पहुँच जाती है। हिन्दू-मुसलमान के बीच खड़ी ‘दीवार’ भी इस आस्था के आगे सिर झुकाती है। ऐसा कोई बाज़ार नहीं जिसमें छठ की पूजन सामग्री बेचने वालों में मुस्लिम समाज के लोग ना हों। उनकी श्रद्धा और उत्साह में रत्ती भर भी कमी निकाल कर दिखा दें आप। और तो और आप शिद्दत से ढूँढेंगे तो कुछ घाट ऐसे भी होंगे जहाँ अर्ध्य देतीं मुस्लिम माताएं और बहनें भी दिख जाएंगी आपको।

अगर छठ ना हो तो आज के युग में ‘डूबते सूरज’ को प्रणाम करना हम सीख ही नहीं पाएंगे। बेटियों को कोख में ही मार देने वाले कभी नहीं जान पाएंगे कि किसी पर्व में बेटियों की भी मन्नत मांगी जाती है। हिन्दू समाज का ये सम्भवत: एकमात्र पर्व है जिसमें अराधना के लिए किसी ‘मूर्ति’ की जरूरत नहीं पड़ती। व्रत करने वाली हर नारी छठी मईया का रूप होती है और उम्र में आपसे छोटी ही क्यों ना हों उनके पैर छूकर ही प्रसाद ग्रहण करना होता है आपको। नारी-सशक्तिकरण के किसी नारे में इतनी ताकत हो तो बताएं।

संसार का कोई त्योहार, कोई पर्व एक साथ इतनी विलक्षण खूबियों को अपने में नहीं समा सकता, इसीलिए छठ ‘महापर्व’ है। हमारी आस्था का, हमारे संस्कार का, हमारी पवित्रता का, हमारे विस्तार का ‘महापर्व’। मिट्टी के सोंधेपन से सने छठ के गीत सुनकर जब तक आपके रोम-रोम झंकृत होते रहेंगे तब तक समझिए अपनी जड़ से जुड़े हैं आप और तथाकथित ‘आधुनिकता’ की कैसी भी आंधी क्यों ना हो बहुत मजबूती से टिके हैं आप।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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पाक को हरा भारत ने जीती एशियन चैम्पियंस ट्रॉफी हॉकी

भारतीय हॉकी टीम ने अपने देशवासियों को दीपावली का यादगार तोहफा दिया। रविवार को कुआंटान (मलेशिया) में ‘भारत माता की जय’ के उद्घोष के बीच एशियन चैम्पियंस ट्रॉफी हॉकी के फाइनल में पाकिस्तान को 3-2 से हरा कर हमारी टीम ने देश की दीपावली को और जगमग कर दिया। मैच के दौरान स्टेडियम में दोनों ही देशों के लगभग बराबर समर्थक थे, लेकिन नारे ‘भारत माता की जय’ के ही सुनाई देते रहे। लीग मैच में भी भारत ने पाकिस्तान को 3-2 से ही हराया था। भारत के सरदार सिंह ‘प्लेयर ऑफ द फाइनल’ रहे, जबकि 11 गोल करके टूर्नामेंट के टॉप स्कोरर रहे रूपिंदर पाल सिंह ‘बेस्ट प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट’ बने। सेमीफाइनल के हीरो रहे पीआर श्रीजेश चोट की वजह से फाइनल मैच नहीं खेल पाए। उनकी जगह आकाश छिकते भारत के गोलकीपर रहे।

इस महामुकाबले में भारत की तरफ से पहला गोल 18वें मिनट में रूपिंदर पाल सिंह ने, दूसरा गोल 23वें मिनट में अफ्फान यूसुफ ने और तीसरा व निर्णायक गोल 51वें मिनट में निकिन थिमैया ने किया। वहीं पाकिस्तान की ओर से मोहम्मद अलीम बिलाल (26वें मिनट में) और अली शान (38वें मिनट में) गोल करने में सफल रहे। इस दिलचस्प मैच के दूसरे हाफ तक दोनों टीमें 2-2 गोल कर बराबर थीं। लेकिन भारत ने दूसरे हाफ में गजब की तेजी दिखाई, जिसका उसे लाभ मिला और पाकिस्तान की टीम दबाव में आकर मैच गंवा बैठी।

इससे पहले बीते शनिवार को हुए पहले सेमीफाइनल में भारत ने दक्षिण कोरिया को पहले 2-2 से ड्रॉ पर रोका और फिर पेनाल्टी शूट आउट में 5-4 से रोमांचक जीत हासिल की। भारत के गोलकीपर कप्तान श्रीजेश ने कोरियन खिलाड़ी देईयोल ली के प्रयास को रोक कर यह जीत भारत की झोली में डाली थी। उधर दूसरे सेमीफाइनल में पाकिस्तान ने मेजबान मलेशिया को पेनाल्टी शूटआउट में ही 3-2 से हराकर फाइनल में जगह बनाई थी।

गौरतलब है कि भारत और पाकिस्तान दो-दो बार यह टूर्नामेंट जीत चुके हैं। पाकिस्तान ने 2012 और 2013 में यह टाइटल जीता था, जबकि भारत ने 2011 में इनॉगरल एडिशन जीतने के बाद अब 2016 में खिताब अपने नाम किया। जहाँ तक तीसरे स्थान की बात है, तो मेजबान मलेशिया ने रविवार को ही दक्षिण कोरिया को पेनाल्टी शूट आउट में 3-1 से हराकर लगातार चौथी बार उस पर अपना कब्जा बरकरार रखा।

 ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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हमारी दीपावली से अब सारा संसार जगमगाता है

दीपों का उत्सव, प्रकाश का पर्व, तमाम आसुरी वृत्तियों पर विजय का उद्घोष – दीपावली। ब्रह्मपुराण के अनुसार कार्तिक अमावस्या की इस अधेरी रात्रि में महालक्ष्मी स्वयं भूलोक पर आती हैं और प्रत्येक सद्गृहस्थ के घर में विचरण करती हैं। जो घर हर प्रकार से स्वच्छ, शुद्ध, सुसज्जित और प्रकाशयुक्त होता है, वहां लक्ष्मी अंश रूप में ठहर जाती हैं। पूरी श्रद्धा और आस्था के साथ दीपावली पर उनका आह्वान करें तो प्रसन्न होकर सद्गृहस्थों के घर वो स्थायी रूप से निवास करती हैं। लक्ष्मी की विशेष कृपा पाने के लिए ही व्यापारियों में आज ही के दिन बही-खाता बदलने की परंपरा है।

धर्मग्रंथों के अनुसार कार्तिक अमावस्या को भगवान श्रीराम चौदह वर्ष का वनवास काटकर तथा रावण का संहार कर अयोध्या लौटे थे। तब अयोध्यावासियों ने राम के आगमन और उनके राज्यारोहण पर दीपमालाओं का महोत्सव मनाया था। अद्भुत संयोग है कि आगे चलकर इसी दिन सम्राट् विक्रमादित्य का राजतिलक हुआ। बता दें कि विक्रम संवत् का आरम्भ भी इसी दिन माना जाता है। यह भी मान्यता है कि दीपावली की अमावस्या से ही पितरों की रात्रि प्रारम्भ होती है। कहीं वे मार्ग भटक न जाएं, इसलिए भी सर्वत्र दीप व आतिशबाजी के माध्यम से प्रकाश की व्यवस्था की जाती है। इस तरह कहा जा सकता है कि अपने अतीत, वर्तमान और भविष्य को एक साथ प्रकाश-पथ पर अग्रसर करने का पुनीत पर्व है दीपावली।

हमारे वेदों-उपनिषदों ने हमें ‘तमसो मा ज्योतिर्गमय’ का जो पाठ पढ़ाया उसे भारत समेत दुनिया भर में फैलाने का श्रेय दीपावली को ही जाता है। आज दीपावली केवल भारत तक सीमित नहीं रह गई है। इसे संसार के हर कोने में मनाया जाता है। सच तो यह है कि क्रिसमस और ईद की तरह आलोक का यह पर्व भी अब विश्वपर्व कहलाने का अधिकारी है।

दरअसल भारत से दशकों पहले (1834 से 1884 के बीच) सात समंदर पार चले गए भारतीय अपने तीज-त्योहारों को आज तक नहीं भूले। उदाहरण के तौर पर त्रिनिदाद और टोबैगो की ही बात करें। यहाँ भारतवंशियों की पहली टुकड़ी पहुँची थी। आज यहाँ की एक चौथाई आबादी हिन्दू है। दीपावली के पर्व पर यहाँ राष्ट्रीय अवकाश होता है। भारत में हमलोग भले ही मोमबत्ती को दीये के विकल्प के तौर पर अपनाने लगे हों, लेकिन इस दिन यहाँ हर घर को आप मिट्टी के दीये से ही सजा पाएंगे। इस कैरिबियाई टापू देश के पास स्थित देश गुयाना में भी आलोक के इस पर्व को बहुत भव्य तरीके से मनाया जाता है।

त्रिनिदाद और टोबैगो तथा गुयाना की तरह ही फिजी, मॉरीशस, सूरीनाम, सिंगापुर, श्रीलंका, नेपाल, बर्मा, बंगलादेश, म्यांमार, थाईलैंड, मलेशिया, सिंगापुर, इंडोनेशिया, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, केन्या, तंजानिया, दक्षिण अफ्रीका, नीदरलैंड्स, कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और यहाँ तक कि पाकिस्तान में भी दीपावली की छटा देखी जा सकती है।

अमेरिका के राष्ट्रपति बराक ओबामा ने पिछले वर्ष प्रधानमंत्री नेरन्द्र मोदी को फोन कर दीपावली की बधाई दी थी। उसके बाद हमारे प्रधानमंत्री ने कहा था कि यह जानकर अच्छा लगा कि व्हाइट हाउस में भी दीपावली का त्योहार मनाया जाता है। बता दें कि वर्ष 2009 में पहली बार किसी अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर ओबामा ने व्हाइट हाउस के ईस्ट रूम में दीपोत्सव का परंपरागत दीया जलाया था। अब तो आलम यह है कि अमेरिका में चल रहे वर्तमान राष्ट्पति चुनाव के दोनों उम्मीदवार हिलेरी क्लिंटन और डोनाल्ड ट्रंप दीपावली के पहले से ही भारतवंशियों के बीच जाकर दीये जला रहे हैं।

आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि सिंगापुर, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में दीपावली के दिन सरकारी छुट्टी होती है, कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन टूडो दीपावली पर आयोजित कार्यक्रम में कुर्ता-पायजामा पहनकर पंजाबी गाने पर डांस करते हैं और हिन्दुओं को दोयम दर्जा देने वाले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ तक इस दिन हिन्दुओं को संबोधित करते हैं। दक्षिण अफ्रीका के जोहांबर्ग के निकट लेनासिया और चैट्सवर्थ और डरबन के फोनेक्स में तो दीपावली बहुत ही भव्य तरीके से मनाई जाती है। इतना ही नहीं, पड़ोसी देश नेपाल में दीपावली का पर्व पांच दिनों तक मनाया जाता है और लक्ष्मीपूजा के दिन से ही नेपाल संवत् शुरू होता है।

सच तो यह है कि दीपावली का यह प्रसार अकारण नहीं है। दीपावली में छिपा संदेश है ही इतना व्यापक कि इसमें समूचे संसार की संवेदना समा जाय। तो आईये, इस बार हम बाकी दीयों के साथ-साथ एक दीया विश्वपर्व दीपावली के निमित्त अपने गौरव के लिए भी जलाएं। और हां, हर दीये से पहले एक दीया हमारे लिए शहीद हुए उड़ी के वीर जवानों के लिए जलाएं। ये जवान न हों तो कैसी होली, कैसी ईद, कैसी बैसाखी, कैसा क्रिसमस और कैसी दीपावली? शुभ दीपावली!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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जरूरी है मुलायम और अखिलेश की ‘जंग’ को समझना

कहने की जरूरत नहीं कि अर्थवाद, अवसरवाद और अधिकारवाद के दौर में समाजवाद अब अन्तिम सांसें ले रहा है, लेकिन आज भी तथाकथित समाजवाद का नाम लेकर राजनीति करने वालों की बात करें तो मुलायम सिंह यादव एक बड़ा नाम है। राममनोहर लोहिया होते तो राजनीति में आ चुकी गिरावट पर अपना सिर धुनते लेकिन कुछ लोग हैं जो आज भी सीना ठोक कर उनका नाम लेते हैं और उन्हें वोट भी मिलते हैं। हां, नाम की छौंक के साथ और भी कई मसाले मिलाए जाते हैं, वो बात अलग है। जो भी हो, मुलायम समाजवादी पार्टी के संस्थापक, सर्वमान्य नेता और सर्वेसर्वा रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। देश की राजनीति की धुरि कहलाने वाले उत्तर प्रदेश में अपने बूते उन्होंने एक नहीं कई बार सरकार बनाई है, इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता। लेकिन ढलती उम्र में उन्होंने अपनी विरासत बेटे अखिलेश यादव को सौंपी और वक्त ने ऐसी करवट ली कि आज अपनी बनाई पार्टी में वे स्वयं ही हाशिए पर हैं। कम-से-कम समाजवादी कुनबे में कलह के बाद का सर्वे तो यही कहता है।

उत्तर प्रदेश की सत्ता के केन्द्र में बैठे यादव परिवार के हाई वोल्टेज विवाद के बाद सी वोटर द्वारा किए गए सर्वे की मानें तो लोकप्रियता के मामले में अखिलेश अपने पिता और सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव से आगे निकल गए हैं। 403 सीटों पर लगभग 11 हजार लोगों के बीच किए गए इस सर्वे का मकसद यह जानना था कि पार्टी में चल रहे विवाद में किस नेता को लोगों का अधिक समर्थन मिला। इस सर्वे के अनुसार यादव वोटरों में 70.3% लोग अखिलेश को नेता और मुख्यमंत्री के रूप में चाहते हैं, जबकि मुलायम को 26.1% लोगों ने अपनी पसंद माना। मुसलमानों के बीच भी कमोबेश यही स्थिति है। 75.6% मुसलमानों ने अखिलेश को अपनी पसंद कहा, जबकि इस समुदाय के 19.4% लोग अब भी मुलायम में आस्था रखते हैं। शिवपाल यादव की बात करें तो इस सर्व में वे अखिलेश के आसपास भी नहीं दिखते। सपा समर्थकों के बीच अखिलेश की लोकप्रियता 88.1 प्रतिशत जबकि शिवपाल की लोकप्रियता मात्र 4.6 प्रतिशत है।

गौर से देखें तो मुलायम और अखिलेश के बीच की जंग दो पीढ़ी, दो सोच और राजनीति की दो अलग शैली की जंग है। मुलायम उम्र के इस पड़ाव पर बदलने को तैयार नहीं और अखिलेश उनके सांचे में ढलने को तैयार नहीं। मुलायम के लिए शिवपाल यादव, अमर सिंह और आजम खान जैसे नाम आज भी जरूरी और प्रासंगिक हैं लेकिन अखिलेश इन प्रतीकों को लेकर नहीं चलना चाहते। हां, जरूरत के हिसाब से नए प्रतीक वे गढ़ जरूर रहे हैं। सहारा तो ऐसे प्रतीकों का वे भी लेंगे लेकिन अपना और अपने काम का चेहरा आगे रखकर, नए तौर-तरीकों के साथ।

यहां यह रेखांकित करना भी जरूरी है कि लाख असहमति के बावजूद अपने पिता और राजनीतिक गुरु के प्रति आज भी सार्वजनिक तौर पर असम्मान व्यक्त करने का दुस्साहस अखिलेश न तो कर रहे हैं, न कर सकते हैं और न उन्हें करना चाहिए। कारण ये कि मुलायम अपने निर्माता स्वयं हैं, जबकि अखिलेश की नींव मुलायम ने रखी थी। बदले संदर्भों और हालातों में मुलायम भले ही कमजोर दिख रहे हों लेकिन आज भी उनकी जड़ें इतनी मजबूत जरूर हैं कि अखिलेश की स्थिति आने वाले चुनाव में असहज हो जाए। अखिलेश को पता है कि चुनाव का बाज़ार चाहे जितना बदल गया हो, मुलायम नाम के सिक्के को खोटा बताकर वो खुद को ही कटघरे में खड़ा करेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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दीपावली नहीं, धनतेरस है धन का पर्व

आज धनतेरस है – एक अनोखा पर्व जो न केवल दीपावली आने की पूर्व सूचना देता है बल्कि समृद्दि के लिए स्वास्थ्य का महत्व भी रेखांकित करता है। आम धारणा के अनुसार धन का पर्व दीपावली है, जो सही नहीं है। दीपावली तो धन के साथ-साथ अन्य सिद्धियों का दिन भी है। धन का दिन तो असल में धनतेरस है। साथ ही यह दिन औषधि और स्वास्थ्य के स्वामी धन्वंतरि का भी दिन है, जो इस बात का संदेश देता है कि धन का भोग करने के लिए लक्ष्मी की कृपा जितनी जरूरी है, उतनी ही जरूरत उत्तम स्वास्थ्य और दीर्घायु की होती है। बता दें कि आर्युवेद, जिसकी रचना ब्रह्मा ने की थी, को प्रकाश में लाने का श्रेय धन्वंतरि को ही जाता है और इसी पृष्ठभूमि में धनतेरस को ‘आर्युवेद दिवस’ मनाने का निर्णय केन्द्र की वर्तमान सरकार ने लिया है।

धनतेरस का पर्व हर वर्ष कार्तिक के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी को मनाया जाता है। दीपावली की महानिशा से दो दिन पहले इसी खास दिन यक्ष-यक्षिणियों का जागरण होता है। यक्ष-यक्षिणी इस स्थूल जगत के उन सभी चमकीले तत्वों के नियंता कहे जाते हैं, जिन्हें दुनिया ‘दौलत’, ‘सम्पत्ति’, ‘वैभव’, ‘ऐश्वर्य’ जैसे नामों से जानती है। जानना दिलचस्प होगा कि कुबेर को यक्ष और लक्ष्मी को यक्षिणी का रूप माना जाता है। कुबेर और लक्ष्मी यक्ष-यक्षिणी के रूप में हमारे जीवन की उस ऊर्जा को नियंत्रित करते हैं, जिससे हमारी जीवन-शैली निर्धारित और नियंत्रित होती है।

‘धनतेरस’ में ‘धन’ शब्द को धन-संपत्ति और धन्वंतरि दोनों से ही जोड़कर देखा जाता है। भगवान धन्वंतरि को हिन्दू धर्म में देव वैद्य का पद हासिल है। कुछ ग्रंथों में इन्हें विष्णु का अवतार भी माना गया है। मान्यता है कि समुद्र-मंथन के दौरान धन्वंतरि चांदी के कलश और शंख के साथ प्रकट हुए थे। इसी कारण धनतेरस के दिन शंख और चांदी का कोई पात्र, बर्तन या सिक्का खरीदना शुभ माना जाता है। सामर्थ्य के अनुसार कुछ लोग चांदी की जगह सोना तो कुछ लोग पीतल या स्टील की चीज खरीदते हैं, लेकिन ये रस्म लोग निभाते जरूर हैं। दीपावली के लिए इसी दिन लक्ष्मी-गणेश की प्रतिमा और पूजन सामग्री खरीदना भी शुभ माना गया है।

तंत्र शास्त्र में इस दिन लक्ष्मी, गणपति, विष्णु और धन्वंतरि के साथ कुबेर की साधना की जाती है। धनतेरस की रात्रि में कुबेर यंत्र, कनकधारा यंत्र, श्री यंत्र तथा लक्ष्मी स्वरूप श्री दक्षिणावर्ती शंख के पूजन को अचूक माना गया है। इस दिन अपने मस्तिष्क को स्वर्ण समझकर ध्यानस्थ होने से धन अर्जित करने की आन्तरिक क्षमता सक्रिय होती है, जो सही मायने में समृद्धि का कारक बनती है।

एक बात और, ‘धनतेरस’ में ‘धन’ से जुड़े ‘तेरस’ शब्द को लेकर एक बड़ी महत्वपूर्ण मान्यता यह है कि इस दिन खरीदे गए धन, विशेषकर सोना या चांदी, में तेरह गुना वृद्धि हो जाती है। ईश्वर करे आपके धन में भी तेरह गुना की वृद्धि हो और हर धनतेरस को हो। ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से इस दिन की ढेर सारी शुभकामनाएं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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भारत लगातार तीसरी बार बना कबड्डी का विश्वचैम्पियन

भारत ने कबड्डी वर्ल्ड कप में एक बार फिर से इतिहास रचते हुए खिताब पर अपना कब्जा कायम रखा। शनिवार को अहमदाबाद के ‘द एरेना बाय ट्रांसस्टेडिया’ पर ईरान की टीम को 38-29 से रौंद कर भारत लगातार तीसरी बार विश्वचैम्पियन बना। हालांकि मैच की शुरुआत में ईरानी टीम ने भारत पर दबाव बना दिया था और मैच के दूसरे हाफ में भी वह बहुत देर तक भारत से आगे चल रही थी, पर भारत की इस जीत के नायक रहे अजय ठाकुर ने शानदार खेल दिखाते हुए न केवल मैच में भारत की वापसी कराई बल्कि जीत की यादगार हैट्रिक की मुश्किल दिख रही राह भी आसान कर दी।

सांस रोक देने वाले फाइनल मुकाबले में एक समय 19-14 से पिछड़ रही भारतीय टीम ने अजय ठाकुर की शानदार रेड के बाद वापसी की और एक ही बार में ईरान के दो खिलाड़ियों को बाहर कर दिया। इसके बाद भारत ने मैच में पकड़ बनाए रखी। एक वक्त पर 5 अंकों से पिछड़ रही टीम इंडिया ने स्कोर को 20-20 से बराबर कर दिया और ईरान की टीम को ऑल आउट कर मैच में 24-21 की बढ़त ले ली। इसके बाद भारत ने कोई गलती नहीं कि और मैच अपने नाम कर लिया। अजय ठाकुर के साथ ही प्रदीप, अनूप, सुरजीत समेत बाकी खिलाड़ियों ने भी शानदार खेल दिखाया।

जो जीता वही सिकंदर – इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन ईरान की टीम को भी दाद देनी होगी कि उसने मैच में फेवरेट मानी जा रही भारतीय टीम को कड़ी चुनौती पेश की। अपनी रेड और मजबूत डिफेंस से ईरान ने जता दिया कि इस खिताब के लिए वह सब कुछ झोंक देने के इरादे से उतरा है। पर अंत में भारतीय टीम ने अपना सर्वश्रेष्ठ खेल दिखाते हुए विश्वविजेता का खिताब बरकरार रखा।

भारत की इस जीत ने बता दिया कि क्यों उसे कबड्डी का पर्याय माना जाता है। आज पूरा देश टीम इंडिया की इस उपलब्धि पर गौरवान्वित हो रहा है। पर यहाँ एक सवाल पूछने को दिल करता है कि क्या कबड्डी का विश्वविजेता कहलाना क्रिकेट या बाकी खेलों का विश्वविजेता कहलाने से कमतर है? क्या ऐसी उपलब्धियों पर होने वाली खुशियों में कोई फर्क है? अगर नहीं तो हम क्रिकेट के सामने बाकी खेलों का दर्जा दोयम क्यों कर देते हैं?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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