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अब लालू को ‘क्रीम’ क्यों लगा रहे बाबा रामदेव..?

समय और सत्ता की महिमा अपरम्पार है। ‘रा’ज-योग’ सचमुच भारी है हर ‘योग’ पर। तभी तो एक-दूसरे के विरोधी रहे योगगुरु बाबा रामदेव और बिहार की सत्ता में भागीदार आरजेडी के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव एक-दूसरे के करीब आ गए हैं। अब ना केवल दोनों गले मिल रहे हैं बल्कि बाबा रामदेव को लालू में अपना ‘ब्रांड एम्बेसेडर’ भी दिखने लगा है।

जी हाँ, चौंकिए नहीं। बीते बुधवार की बात है कि बाबा रामदेव दिल्ली में अचानक और वो भी सुबह-सुबह लालू के मौजूदा आवास (शकुंतला फार्महाउस) पर ‘प्रकट’ हुए, उनसे अकेले में बातचीत की और यहाँ तक कि सबके बीच उनके चेहरे पर क्रीम भी लगा डाली। बातचीत का विषय क्या था इस पर दोनों भले ही मौन रहें लेकिन इसके ‘राजनीतिक’ और ‘व्यावसायिक’ दोनों मायने निकाले जा रहे हैं। चलिए बताते हैं कैसे।

बाबा रामदेव के हृदय में ये लालू-प्रेम यूँ ही नहीं उमड़ पड़ा। इसका पहला और स्पष्ट कारण तो ये है कि लालू के बड़े बेटे तेजप्रताप बिहार के स्वास्थ्य मंत्री हैं। जाहिर है कि बाबा रामदेव के ब्रांड ‘पतंजलि’ के लिए संभावनाओं के कई द्वार वो खोल सकते हैं। बता दें कि पिछले दिनों बाबा रामदेव मुलायम के छोटे भाई और यूपी की अखिलेश सरकार के वरिष्ठ मंत्री शिवपाल यादव के साथ भी एक कार्यक्रम में शामिल हुए थे।

बहरहाल, अब दूसरे कारण पर गौर करें। दरअसल कुछ दिनों पहले दिल्ली में हुए श्री श्री रविशंकर के कार्यक्रम में प्रधानमंत्री मोदी मौजूद थे और उनकी ये मौजूदगी योगगुरु को नागवार गुजरी। कारण ये कि दो साल पहले मोदी के चुनाव जीतने और प्रधानमंत्री बनने पर बाबा रामदेव ने दिल्ली में एक कार्यक्रम रखा था और मोदी को खास तौर पर आमंत्रित किया था लेकिन मोदी उस कार्यक्रम में नहीं गए थे।

रामदेव-लालू की मुलाकात पर भाजपा का कहना है कि बाबा रामदेव ना तो भाजपा के सदस्य हैं और ना ही सहयोगी। वो किसी से भी मिल सकते हैं। पर सच यह है कि इस मुलाकात ने योगगुरु और भाजपा के संबंधों में आई खटास को उजागर करने का काम तो किया ही है। जहाँ तक पूरी सच्चाई का प्रश्न है तो इसके बारे में अपने-अपने फन में माहिर दोनों धुरंधर – बाबा रामदेव और लालू – ही कुछ बोल सकते हैं। बाबा रामदेव का लालू के चेहरे पर ‘क्रीम’ लगाना अकारण तो खैर हरगिज नहीं हो सकता।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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रियल एस्टेट कानून आज से लागू, अब बिल्डर नहीं कर पाएंगे मनमानी

केन्द्र सरकार  ने मई दिवस के दिन आमलोगों को एक बड़ा तोहफा दिया। अगर आपने हाल-फिलहाल घर लिया है या लेने की योजना बना रहे हैं तो आपको जानकर विशेष खुशी होगी कि आम उपभोक्ताओं के हितों को संरक्षित करने और बिल्डरों की जवाबदेही बढ़ाने के लिए रियल एस्टेट कानून आज से लागू हो गया। इसके लागू होने के साथ ही बिल्डरों पर नकेल कस जाएगी और ग्राहक ठगे जाने से बच जाएंगे।

इस बहुप्रतीक्षित कानून के तहत बिल्डरों को तय समय के भीतर ग्राहकों को उनका आशियाना देना होगा। अब प्रमोटर और बिल्डर की मनमानी किसी सूरत में नहीं चल पाएगी। इस कानून के तहत सभी आवासीय और कॉमर्शियल प्रोजेक्ट के लिए रियल एस्टेट रेगुलेटर के पास रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य कर दिया गया है और यह नियम ना केवल नई बल्कि चालू परियोजनाओं पर भी लागू होगा।

रियल एस्टेट कानून के तहत एक महत्वपूर्ण प्रावधान ये है कि अब डेवलपर बिना ग्राहक की सहमति के प्रोजेक्ट में कोई बदलाव नहीं कर पाएगा। ग्राहकों की गाढ़ी कमाई के पैसे को सुरक्षित करने के लिए एक अन्य प्रावधान यह जोड़ा गया है कि बिल्डरों को खरीदारों से लिए पैसे का 70% संबंधित प्रोजेक्ट के अकाउंट में ही रखना होगा।

बता दें कि अब सभी राज्यों में रियल एस्टेट अथॉरिटी होगी जहाँ ना केवल बिल्डर बल्कि रियल एस्टेट एजेंट को भी रजिस्ट्रेशन कराना होगा। यही नहीं, कानून के प्रावधानों के अन्तर्गत केन्द्र और राज्य सरकारों को छह महीने के भीतर नियम बनाने होंगे। प्रोजेक्ट के तहत फ्लैटों की समय से डिलीवरी सुरक्षित कराने के लिए प्रस्तावित रियल एस्टेट रेगुलेटर और अपीलीय ट्रिब्यूनल भी एक साल में बन जाएंगे। बता दें कि नियमों का उल्लंघन करने वाले बिल्डरों के लिए भारी जुर्माने के साथ ही तीन साल की सजा का भी प्रावधान है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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अब टिकते नहीं बिहार में नीतीश के पैर..!

इधर लोग नीतीश कुमार के पीएम मैटेरियल होने ना होने पर बहस ही कर रहे हैं और उधर नीतीश बड़ी खामोशी से एक के बाद एक कदम रखते जा रहे हैं। जी हाँ, जेडीयू की कमान विधिवत सम्भालने के बाद वे मिशन 2019 को भी विधिवत शुरू करने जा रहे हैं। शुरुआत आगामी 7 मई को केरल से होगी जहाँ वो जनसभा को संबोधित करेंगे।

केरल के बाद नीतीश झारखंड का रुख करेंगे। वहाँ 10 मई को धनबाद में वो शराबबंदी अभियान के एक कार्यक्रम में शामिल होंगे। बता दें कि बिहार की तर्ज पर वहाँ भी महिलाओं ने उन्हें शराबबंदी के कार्यक्रम को संबोधित करने के लिए बुलाया है।

झारखंड के बाद नीतीश अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव के मद्देनज़र यूपी में दस्तक देंगे। 12 मई को बनारस तो 15 मई को वो लखनऊ में होंगे। इस दौरे में नीतीश यूपी को लेकर अपनी रणनीति को ठोस रूप देने की कोशिश करेंगे।

बता दें कि अभी हाल ही में एनसीपी के नेता शरद पवार ने नीतीश कुमार को पीएम मैटेरियल बताया था। इधर राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनके उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी ने भी उन्हें इस मुद्दे पर ‘नैतिक’ समर्थन दिया है। कहने की जरूरत नहीं कि अपनी बढ़ती स्वीकार्यता से 2019 को लेकर नीतीश के हौसले इधर और बुलंद हुए हैं। अब हाल ये है कि उनके पैर बिहार में टिक ही नहीं रहे। भाजपा और मोदी के विकल्प के तौर पर खुद को देश भर में पेश करने की खातिर उन्होंने पूरी ताकत झोंक देने की ठान ली है। नीतीश के ‘भारत-दौरे’ पर किसी ने कमाल की चुटकी ली कि मोदी (अपने विदेश-दौरों के कारण) भारत में नहीं दिखते और अब नीतीश बिहार में नहीं दिखेंगे..!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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यूपीएससी की प्रारम्भिक परीक्षा सात अगस्त को

संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा जारी अधिसूचना के अनुसार सिविल सेवा और भारतीय वन सेवा हेतु ऑनलाइन आवेदन प्राप्त करने की प्रक्रिया आरम्भ कर दी गई है। इस साल सिविल सर्विसेज के लिए 1079 पद हैं जिनमें भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय विदेश सेवा, भारतीय पुलिस सेवा सहित 24 वर्ग हैं तथा भारतीय वन सेवा के लिए 110 पद हैं। इस तरह दोनों सेवाओं को मिलाकर कुल 1189 पद हैं।

बता दें कि प्रत्येक वर्ग के लिए अभ्यर्थी 27 मई 2016 तक ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं। याद रखें कि यूपीएससी की प्रारम्भिक परीक्षा (पीटी) 7 अगस्त 2016 को होगी। इस बार परीक्षा केन्द्रों का निर्धारण ‘फर्स्ट अप्लाई, फर्स्ट अलॉट’ के आधार पर होगा जिसकी अधिसूचना यूपीएससी ने कर दी है।

जहाँ तक उम्र की बात है, 1 अगस्त 2016 तक जिनकी उम्र 32 वर्ष नहीं हुई है, वे परीक्षा दे सकते हैं। जबकि पूर्व में उम्र सीमा 30 थी और चार बार ही परीक्षा में भाग लिया जा सकता था। परन्तु अब सामान्य एवं ओबीसी वर्ग के अभ्यर्थी छह बार सिविल सेवा की परीक्षा में भाग ले सकते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार केन्द्र सरकार की ये बड़ी पहल है।

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चार श्रेणी में बंटेंगीं शहर की सड़कें

एक तो जनसंख्या का दिशाहीन विस्फोट और दूसरा लोगों का गांवों से शहरों की ओर पलायन। ऊपर से प्रत्येक शहर में प्रतिदिन सौ से लेकर हजारों की संख्या में मोटर साईकिल एवं अन्य सवारियों का रोड पर आना। इसके अतिरिक्त बेरोजगारों को बहुत कुछ करने के लिए सड़क ही तो सहारा होता है।

फिर भी इतनी परेशानियों के बावजूद सरकारी दफ्तरों से अधिक अनुशासन सड़कों पर ही नज़र आता है। लेकिन इस सत्य को भी झुठलाया नहीं जा सकता कि हर शहर में सुबह या शाम – जाम ही जाम एक कहावत बनता जा रहा है।

तभी तो नीतीश सरकार द्वारा बिहार अर्बन रोड पॉलिसी-2016 में यह प्रावधान किया गया है कि राज्य के शहरों की सड़कें कम-से-कम दस मीटर और चौड़ी होंगी और न्यूनतम 30 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से गाड़ियां दौड़ेंगी।

इसके अतिरिक्त बिहार शहरी अभिकरण एवं इंडियन रोड कांग्रेस आदि के मद्देनज़र रोड पॉलिसी के मौजूदा प्रारूप के अनुसार चार श्रेणियों में बंटेंगी शहर की सड़कें – पहली श्रेणी – 50 से 60 मीटर चौड़ी होंगी सड़कें जिस पर 80 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से वाहन दौड़ेंगे, दूसरी श्रेणी – 30 से 40 मीटर चौड़ी होंगी सड़कें जिस पर 60 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से वाहन दौड़ेंगे, तीसरी श्रेणी – 20 से 30 मीटर चौड़ी होंगी सड़कें जिस पर 50 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से वाहन दौड़ेंगे और चौथी श्रेणी – 10 से 20 मीटर चौड़ी होंगी सड़कें जिस पर 30 कि.मी. प्रति घंटे की रफ्तार से वाहन दौड़ेंगे।

इसके अतिरिक्त वन वे के लिए भी नियम बनाए गए हैं। नियम चाहे जितने बना दिए जाएं परन्तु उनको सफल बनाना तो जनमानस पर ही निर्भर होता है। एक भारतीय जापान में होता है तो रद्दी कागज के एक टुकड़े को सड़क पर चलते रहने के बाद डस्टबिन में ही फेंकता है, परन्तु वही जब भारत की धरती पर उतरता है तो सब कुछ भूल कर सड़क को गन्दा करने में लग जाता है।

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बी.पी.एस.सी. मुख्य परीक्षा की तिथि बढ़ी

बिहार लोक सेवा आयोग (बी.पी.एस.सी.) की मुख्य परीक्षा अब 15 जुलाई 2016 से होगी। पूर्व में यह परीक्षा 11 जून से 30 जून तक होने की अधिसूचना जारी की गई थी।

बता दें कि मुस्लिम समुदाय के अभ्यर्थियों ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार तथा आयोग के अधिकारियों से परीक्षा की तिथि बढ़ाने की मांग की थी। उनका कहना था कि जून का महीना पाक रमजान का महीना होगा। अप्रैल में ही जब ऐसी प्रचंड गर्मी है तो जून का हाल क्या होगा? बेहाल कर देने वाली गर्मी में मुस्लिम समुदाय के परीक्षार्थियों को परीक्षा देने में काफी परेशानियाँ होंगी।

इस मांग के आलोक में बिहार सरकार एवं बिहार लोक सेवा आयोग द्वारा संयुक्त रूप से विचार मंथन के बाद बी.पी.एस.सी. मुख्य परीक्षा की तिथि बढ़ाने का फैसला लिया गया। अब बी.पी.एस.सी. की मेंस परीक्षा 15 जुलाई 2016 से होगी। इसकी अधिसूचना अविलम्ब जारी कर दी जाएगी।

परीक्षा विशेषज्ञों ने इसे छात्रों के हित में सराहनीय फैसला बताते हुए ‘मधेपुरा अबतक’ से कहा कि इससे अल्पसंख्यक वर्ग के छात्रों को ना केवल प्रचंड गर्मी से राहत मिलेगी बल्कि रमजान के बाद परीक्षा में उनके बेहतर करने की संभावनाएँ भी बढ़ेंगी।

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मो. कुदरतुल्लाह ने बनाया था मधेपुरा को ताड़ी-शराबबंदी का अगुआ..!

प्रखर गांधीवादी, अमर स्वतंत्रतासेनानी एवं बारह वर्षों तक एम.एल.सी. रहे मो. कुदरतुल्लाह काजमी मधेपुरा की उस अजीम शख्सियत का नाम है जिन्होंने बापू के आह्वान पर नशाबंदी के लिए मधेपुरा की धरती पर सत्याग्रह किया था और इसकी शुरुआत उन्होंने अपने ही पिता की ताड़ी-शराब की दूकान बन्द करवा कर की थी। जी हाँ, अपने ही पिता की दूकान के आगे कई दिनों तक अनशन पर वे बैठे रहे और उठे तो पिता को राजी करने के बाद ही। आगे चलकर मधेपुरावासियों ने उनकी स्मृति को कायम रखने के लिए कुदरतुल्लाह यूनानी दवाखाना का निर्माण किया जो आज जीर्ण-शीर्ण अवस्था में है और अपने पुनरुद्धार के लिए सरकार की ओर टुकुर-टुकुर देख रहा है।

लगता है बिहार की वर्तमान नीतीश सरकार ने मो. कुदरतुल्लाह सरीखे गांधीवादियों एवं स्वतंत्रतासेनानियों की आत्मा की आवाज सुनकर ही बिहार के गरीबों की दशा सुधारने हेतु राज्य में पूर्ण नशाबन्दी का संकल्प और साहस दिखाया है। सभी तबके के लोगों ने दिल खोल कर सराहना भी की है इस कदम की परन्तु शराब छोड़ने के बाद लोग अक्सर अल्कोहल विड्राल सिंड्रोम से पीड़ित हो जाते हैं। हाल ही में आयोजित ऑल इंडिया यूनानी तिब्बी कॉन्फ्रेंस में उपस्थित विशेषज्ञों ने इस पर विचार व्यक्त करते हुए कहा कि ऐसे लोगों के लिए सौंफ का अर्क लाभप्रद होता है।

उक्त कॉन्फ्रेंस में मौजूद बिहार सरकार के अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री डॉ. अब्दुल गफूर ने कहा कि यूनानी चिकित्सा पद्धति को बढ़ावा देने की जरूरत है। प्राचीन काल से ही इस विधि द्वारा उपचार होता आ रहा है। शराब छोड़ने के बाद नींद ना आना, हाथ काँपना, भूख ना लगना आदि शिकायत होने लगती है। सौंफ का अर्क पीने के बाद लोगों को शराब पीने जैसी अनुभूति होती है जिससे वह शान्त हो जाता है।

बता दें कि कुछ समय पूर्व कुदरतुल्लाह साहब की 48वीं पुण्यतिथि समारोह के दरम्यान बिहार सरकार के आपदा-प्रबंधन मंत्री प्रो. चन्द्रशेखर ने समाजसेवी डॉ. मधेपुरी, राजद नेता मो. खालिद, बिजेन्द्र प्रसाद यादव व मो. शौकत अली आदि कि उपस्थिति में मधेपुरा के यूनानी दवाखाना को नवजीवन देते हुए यहाँ आयुष चिकित्सालय निर्माण कराने की बात कही थी। समाजसेवी लोग लगे रहेंगे और कोसी के मंत्री जगे रहेंगे तो क्षेत्र का विकास देर-सवेर होगा ही।

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मिशन 2019 में अभी से क्यों जुटे नीतीश..?

लोकसभा चुनाव में अभी तीन साल बाकी हैं लेकिन जेडीयू ने नीतीश कुमार को अभी से मैदान में उतार दिया है। पटना में पार्टी की राष्ट्रीय परिषद की बैठक में एक ओर अध्यक्ष के तौर पर नीतीश की ताजपोशी की गई तो दूसरी ओर गैरभाजपा दलों का एका करने संबंधी प्रस्ताव पारित किया गया। संदेश स्पष्ट है कि नीतीश अब औपचारिक रूप से राहुल गांधी, मुलायम सिंह यादव, ममता बनर्जी और अरविन्द केजरीवाल जैसे प्रधानमंत्री पद के दावेदार नेताओं के क्लब में शामिल हो गए।

ये स्पष्ट है कि बिहार की महागठबंधन सरकार में शामिल कांग्रेस गैरभाजपा विकल्प के तौर पर कभी नीतीश के नाम पर सहमत नहीं हो सकती और ना ही राजद समेत अन्य दलों ने अभी इस संबंध में अपनी राय खुलकर जाहिर की है। (हाँ, नीतीश को ‘पीएम मैटेरियल’ बताना अलग बात है।) लेकिन नीतीश और उनकी टीम जल्दी में दिख रही है। इस जल्दबाजी से उन्हें दो कारण दिख रहे हैं। पहला यह कि राष्ट्रीय स्तर पर अभी जैसा ‘मोदीमय’ माहौल है उसमें उनके विकल्प के तौर पर आक्रामक होकर आने का साहस और तैयारी किसी के पास नहीं दिख रही और इसका फायदा नीतीश और उनकी टीम उठाना चाहती है। दूसरा ये कि बिहार चुनाव के परिणाम के बाद नीतीश की जैसी करिश्माई छवि बनी है उस पर वक्त की धूल-मिट्टी पड़ने से पहले ही उसे भुना लेने की कोशिश की जा रही है।

नीतीश कुमार मंझे हुए नेता हैं और राजनीति की बिसात पर गोटियां बिठाना उन्हें खूब आता है। उन्हें पता है कि बड़े लक्ष्य के लिए केवल नारेबाजी से काम नहीं चलता, धरातल पर भी बहुत कुछ कर के दिखाना होता है। यही कारण है कि एक ओर वो संघमुक्त भारत का नारा दे रहे होते हैं तो दूसरी ओर शराबबंदी को राष्ट्रीय अभियान बनाने की बात करते हैं। महिला आरक्षण और स्टूडेंट क्रेडिट कार्ड जैसे फैसलों को नीतीश अब राष्ट्रीय फलक पर अपने विकास मॉडल के तौर पर पेश करना चाहते हैं।

यूपी चुनाव से पहले अजित सिंह के रालोद और बाबूलाल मरांडी के जेवीएम को मिलाकर अपना ‘कैनवास’ बड़ा करने की कोशिश नीतीश के मिशन 2019 का ही हिस्सा है। यूपी में उनकी सफलता या असफलता से भारत की भावी राजनीति की तस्वीर बहुत हद तक साफ हो जाएगी, इसमें कोई दो राय नहीं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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नए अवतार में नीतीश का तीन सूत्री कार्यक्रम

आज होने वाली जेडीयू की राष्ट्रीय परिषद की बैठक के लिए पटना का श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल सज कर तैयार है और राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को बधाई देने वाले बैनर, पोस्टर और होर्डिंग से पूरा पटना पटा हुआ है। राष्ट्रीय परिषद की बैठक में 350 डेलीगेट्स भाग लेंगे जिनके रजिस्ट्रेशन का काम कल ही पूरा कर लिया गया। इस बैठक में राष्ट्रीय अध्यक्ष के रूप में नीतीश कुमार की ताजपोशी होगी और नए अवतार में नीतीश जेडीयू की राष्ट्रीय राजनीति का शंखनाद करेंगे।

यूँ तो इस ‘मह्त्वाकांक्षी’ बैठक में कई बातें होनी हैं लेकिन जिन तीन मुद्दों पर पार्टी की आगे की रणनीति केन्द्रित होगी, वे हैं – बिहार में सफल शराबबंदी को अन्य राज्यों तक पहुँचाना, नीतीश के संघमुक्त भारत बनाने के आह्वान को राष्ट्रीय मुद्दा बनाना और समान विचारधारा वाले ‘धर्मनिरपेक्ष’ दलों से गठबंधन कर जेडीयू को बड़े फलक पर लाना। इन तीनों मुद्दों को आप एक साथ जोड़ दें तो साफ-साफ दिखेगा कि नीतीश 2019 की तैयारी में कितनी शिद्दत से जुटे हैं।

बहरहाल, इस बैठक को मुख्य रूप से नीतीश कुमार और निवर्तमान अध्यक्ष शरद यादव संबोधित करेंगे। आज इस बात की झलक भी मिल जाएगी कि आने वाले दिनों में पार्टी अपने पूर्व अध्यक्ष से कितना ‘मार्गदर्शन’ लेगी। यूपी चुनाव के मद्देनज़र अजित सिंह के रालोद व अन्य दलों के जेडीयू में होने जा रहे विलय के बाद शरद के हिस्से में क्या आएगा ये भी देखने की बात होगी ।

देखा जाय तो पहले समता पार्टी और फिर जेडीयू के गठन से लेकर आज तक पार्टी चलती तो रही नीतीश के इशारों पर लेकिन अगुआई पहले जॉर्ज फर्नांडिस और बाद में शरद यादव ने की। अब नीतीश घोषित तौर पर ‘सर्वेसर्वा’ होंगे। अब नीतीश जिस ‘प्लेटफॉर्म’ पर होंगे उस पर उनके सारे एजेंडे के मूल में बस एक एजेंडा होगा कि 2019 की लड़ाई मोदी बनाम नीतीश के तौर पर सामने आए। अगर राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस ने तब तक बड़ी ‘करवट’ ना ली तो ये होना असंभव भी नहीं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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मधेपुरा और भारतीय रेल यानि एक और ‘कोसी’ की गाथा

वर्ष 2008 का अगस्त माह। कुसहा बाँध टूटने से बाढ़ की त्रासदी ने ऐसी धूम मचाई कि कोसी अंचल के जल-प्रलय को तत्कालीन केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया गया। चारों ओर सड़कें टूटीं, बड़े-बड़े पुल बह गए एवं रेल की पटरियाँ ध्वस्त हो गईं। हाल तक मधेपुरा से रेल द्वारा यात्रा करना सपना बना रहा, जबकि यहाँ पर दो दिग्गज सांसद हैं – एक शरद यादव और दूसरे राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव और जनता बापू के बन्दर जैसे मुख बन्द किए बैठी है।

हाल में एक ट्रेन चलने लगी है – कोसी एक्सप्रेस। मुरलीगंज से मधेपुरा पहुँचती है सुबह के साढ़े तीन बजे। अब इसे सुबह कहा जाय कि रात, कहना मुश्किल है। बहरहाल, इस ट्रेन में ए.सी. का एक ही डब्बा होता है। मधेपुरा के लोग अपने परिवार के साथ उस ट्रेन से यात्रा करने हेतु कन्फर्म टिकट तो ले लेते हैं परन्तु स्टेशन पर गाड़ी उतनी देर (दो मिनट) भी नहीं ठहरती कि यात्री सपरिवार डब्बे में चढ़ सके। एक ही परिवार के कुछ लोग चढ़ जाते हैं और कुछ देखते हुए रह जाते हैं। कारण यह भी कि ट्रेन बड़ी लाईन वाली और प्लेटफॉर्म छोटी लाईन वाला। ट्रेन और प्लेटफॉर्म में अंतर इतना कि चढाई एवरेस्ट पर चढ़ने जैसी और उस पर तुर्रा यह कि रेल कर्मचारी एक-डेढ़ मिनट लगा देते हैं ए.सी. डब्बे के दोनों गेट खोलने में। तब तक ए.सी. के अधिकांश पैसेंजर को छोड़ गाड़ी सहरसा के लिए खुल जाती है। ऐसे में कुछ लोग तो किसी तरह अगल-बगल के नॉन ए.सी. डब्बे में चढ़ जाते हैं पर चढ़ने में असफल साबित हुए लोगों के सामने अब चुनौती होती है ट्रेन को सहरसा जाकर पकड़ने की।

खैर, कुछ लोग निजी मोटर गाड़ी से तो कुछ भाड़े के टैम्पू से सहरसा पहुँचकर उसी कोसी एक्सप्रेस पर सवार होते हैं परन्तु यहाँ पर उन्हे ट्रेन खुलने का इंतजार करना पड़ता है और वो भी दो-चार मिनट नहीं, लगभग घंटे भर और कई बार उससे भी अधिक। जरा सोचिए, उन यात्रियों को इस परिस्थिति में कैसा लगता होगा जो दौड़ते-हाँफते इस ट्रेन को पकड़ने सहरसा पहुँचे होंगे। कई बार तो सहरसा जाकर कोसी एक्सप्रेस पकड़ने की आपाधापी में यात्री अपनी अंतिम यात्रा पर भी चले गए हैं और सांसद-विधायक उनकी मातमपुर्सी करने और आर्थिक सहयोग देने पहुँचे हैं। पर क्या इन प्रतिनिधियों का कर्तव्य केवल इतना ही है..?

बहरहाल, इस ‘कोसी’ की ‘त्रासदी’ यहीं खत्म नहीं होती। आगे राजेन्द्र नगर टर्मिनल पर इस ट्रेन को दो मिनट से अधिक रुकना मंजूर नहीं लेकिन यहाँ से पटना जंक्शन की ढाई कि.मी. की दूरी ये आधे घंटे में तय करेगी..! तीन मिनट की दूरी ये तीस मिनट में क्यों तय करती है इसका जवाब कौन देगा..? यदि राजेन्द्र नगर में यह ट्रेन पाँच मिनट रुक जाती तो ज्यादातर यात्री यहीं उतर जाते और पटना जंक्शन पर यात्रियों और मोटर गाड़ियों का लोड स्वत: घट जाता। आखिर इसे कौन देखेगा..? क्या यात्रियों के लिए सब कुछ ‘प्रभु’ भरोसे ही छोड़ दिया जाएगा या हमारे जनप्रतिनिधि भी कुछ करेंगे..?

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. मधेपुरी से साभार

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