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लालू पर फिर सीबीआई का छापा, राबड़ी-तेजस्वी से घंटों पूछताछ

बेहद बुरे दौर से गुजर रहे हैं इन दिनों आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और उनका परिवार। बेनामी संपत्ति और रेलवे के होटल घोटाले मामले में उनकी और उनके परिवार की मुसीबतें लगातार बढ़ती जा रही हैं। सीबीआई ने शुक्रवार को उनसे जुड़े 12 ठिकानों पर छापे मारे और उनकी पत्नी व पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी और उनके छोटे बेटे व बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव से घंटों सवाल किए। जबकि लालू चारा घोटाला मामले को लेकर अदालत में पेश होने के लिए रांची में हैं। इधर वायरल बुखार से पीड़ित मुख्यमंत्री नीतीश कुमार स्वास्थ्य कारणों से गुरुवार से ही राजगीर में हैं।

गौरतलब है कि सीबीआई ने भ्रष्टाचार के मामले में तलाशी के लिए शुक्रवार सुबह पटना के 10 सर्कुलर रोड स्थित राबड़ी के आवास पर छापा मारा। सूत्रों के मुताबिक 27 अधिकारियों की टीम ने राबड़ी और तेजस्वी से पूछताछ की। राबड़ी से 8 घंटे तक पूछताछ हुई। तेजस्वी से भी देर शाम तक पूछताछ होती रही। बताया जाता है कि तेजस्वी से पटना में बन रहे मॉल से संबंधित सवाल पूछे गए। ऐसा आरोप है कि लालू यादव ने रेल मंत्री रहते हुए बेनामी कंपनी के जरिए तीन एकड़ भूमि के रूप में रिश्वत लेने के बाद एक कंपनी को रेलवे के दो होटलों के रखरखाव का काम सौंपा। सीबीआई के एडिशनल डायरेक्टर राकेश अस्थाना के मुताबिक 2004 से 2014 के बीच रची गई इस कथित साजिश के लिए लालू और अन्य आरोपियों के खिलाफ प्रिवेंशन ऑफ करप्शन एक्ट, 1988 के तहत केस दर्ज किया गया है।

उधर छापेमारी की ख़बर के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजगीर में राज्य के आला अधिकारियों की बैठक बुलाई, जिसमें मुख्य सचिव अंजनी कुमार सिंह, गृह सचिव आमिर सुब्हानी और डीजीपी पीके ठाकुर शामिल हैं। एहतियातन पूरे बिहार के हाई अलर्ट कर दिया गया है। हंगामा करने वालों से सख्ती से निबटने के निर्देश जारी कर दिए गए हैं। भाजपा, आरजेडी, जेडीयू व कांग्रेस समेत सभी राजनीतिक दलों के प्रदेश कार्यालयों की सुरक्षा बढ़ा दी गई है।

इन सारे घटनाक्रम के बीच लालू प्रसाद यादव ने कहा है कि वे किसी भी हाल में झुकने वाले नहीं हैं। उनका कहना है कि संबंधित मामले में उनके रेल मंत्री रहते हुए सब कुछ नियमों के तहत किया गया था। उन्होंने इन छापों को साजिश बताते हुए कहा कि हम मिट्टी में मिल जाएंगे लेकिन बीजेपी और मोदी सरकार को हटाकर ही दम लेंगे।

चलते-चलते बता दें कि राजनीति के गलियारों में सवाल उठने लगा है कि अब जबकि उपमुख्यमंत्री तेजस्वी के खिलाफ भी मुकदमा दर्ज कर लिया गया है, ऐसे में क्या मुख्यमंत्री उन्हें अपने कैबिनेट से हटाएंगे? सूत्रों के मुताबिक, सारे घटनाक्रम पर महागठबंधन के वरीय नेताओं से विमर्श कर नीतीश अगर जल्दी ही कोई बड़ा फैसला लें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

 

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उपराष्ट्रपति चुनाव में नीतीश विपक्ष के साथ !

कांग्रेस की ओर से की हाल की बयानबाजी से नाराज नीतीश कुमार को मनाने में कांग्रेस जोर-शोर से जुट गई है। माना जा रहा है कि राष्ट्रपति चुनाव को लेकर कांग्रेस और जेडीयू के बीच गहराता विवाद राहुल गांधी के हस्तक्षेप के बाद समाप्त हुआ है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक राहुल ने अपनी पार्टी के नेताओं से बिहार के मुख्यमंत्री के खिलाफ नहीं बोलने का निर्देश दिया है। जेडीयू ने भी इस दिशा में सकारात्मक रुख अपनाते हुए उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के साथ होने के संकेत दिए हैं।

राहुल के हस्तक्षेप का असर सबसे पहले कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद के यू-टर्न में दिखा। उन्होंने कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री और महागठबंधन के नेता नीतीश कुमार हमारे साथ हैं। हमारे बीच किसी तरह का मतभेद नहीं है। यही नहीं, उन्होंने यहां तक कहा कि नीतीश कुमार का कहना सही है कि हमने राष्ट्रपति चुनाव में अपना उम्मीदवार घोषित करने में देर की है। हमसे यह गलती हुई है। इसलिए हमने यह तय किया है कि उपराष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर समय रहते फैसला लिया जाएगा।

गौरतलब है कि इससे पहले नीतीश ने अपनी पार्टी की राज्य कार्यकारिणी के सदस्यों को संबोधित करते हुए कांग्रेस से साफ शब्दों में कहा था कि वे किसी के पिछलग्गू नहीं हैं। वे सहयोगी हैं और सहयोगी की तरह रहेंगे। नीतीश कुमार की नाराजगी गुलाम नबी आजाद के उस बयान को लेकर थी जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए को समर्थन दिए जाने पर कहा था कि नीतीश एक विचारधारा के नहीं, बल्कि कई विचारधारा के नेता हैं। इस पर नीतीश ने कांग्रेस पर हमलावर होते हुए कहा था कि सिद्धांत हम नहीं, आप बदलते रहते हैं। कांग्रेस ने आजादी के बाद सबसे पहले गांधी और बाद में नेहरू के सिद्धांतों को तिलांजलि दी। ऐसे में आजाद का इस कदर यू-टर्न लेना मायने रखता है। स्पष्ट है कि वे नीतीश की नाराजगी दूर करने की कोशिश में लगे हैं।

इन सारे घटनाक्रम के बीच विपक्ष ने उपराष्ट्रपति पद के लिए भी अपना उम्मीदवार उतारने की योजना बनाई है। आगामी 11 जुलाई को संसद भवन की लाइब्रेरी बिल्डिंग में एक बार फिर पूरे विपक्ष के जुटने के आसार हैं। इसमें जेडीयू के शामिल होने की बाबत पूछे जाने पर पार्टी के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने कहा कि विपक्षी दलों द्वारा उनकी पार्टी को आमंत्रित किया जाता है तो निश्चित तौर पर हम उसमें भाग लेंगे। सूत्रों के मुताबिक उस दिन कांग्रेस उपाध्यक्ष अलग से नीतीश कुमार से मुलाकात कर सकते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि राहुल उपराष्ट्रपति चुनाव में नीतीश के साथ की सांकेतिक और व्यावहारिक जरूरत अच्छी तरह समझते हैं और इस पूरे प्रकरण में उन्होंने जो परिपक्वता दिखाई है, वो सचमुच काबिलेतारिफ है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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आरजेडी स्थापना दिवस में लालू ने बताया भाजपा को हराने का फार्मूला

बुधवार को राष्ट्रीय जनता दल ने धूमधाम से अपना 21वां स्थापना दिवस मनाया। पटना के वीरचंद पटेल पथ स्थित पार्टी कार्यालय में आयोजित कार्यक्रम में राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव ने भाजपा पर जमकर हमला बोलते हुए उसे 2019 में हराने का ‘फार्मूला’ भी बताया। इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री तेजस्वी प्रसाद यादव, स्वास्थ्य मंत्री तेजप्रताप यादव, वित्त मंत्री अब्दुल बारी सिद्दीकी, राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह, प्रदेश अध्यक्ष रामचन्द्र पूर्वे समेत पार्टी के अधिकांश मंत्री, सांसद और विधायक मौजूद रहे।

अपने संबोधन में लालू ने कहा कि देश में अघोषित आपातकाल जैसे हालात हैं। ऐसे में उन्होंने समान विचारधारा के लोगों को एक साथ आने की जरूरत बताई। उन्होंने कहा कि “हर कोई अपनी विचारधारा के अनुरूप काम कर रहा है, चाहे वह मायावतीजी हों, अखिलेश हों, रॉबर्ट वाड्रा जी हों, प्रियंका गांधी जी हों, ममता दी हों या केजरीवाल हों, लालू यादव हों या उनका परिवार। बीजेपी हमें तोड़ना चाहती है, क्योंकि वह हमारी शक्ति के बारे में जानती है। और बीजेपी यह भी जानती है कि अगर सभी विपक्षी पार्टियां एक हो जाती हैं तो बीजेपी का 2019 में सरकार बनाने का सपना, सपना ही रह जाएगा।”

आरजेडी सुप्रीमो ने उत्तर प्रदेश में सपा-बसपा के एक होने को 2019 में भाजपा का गेम ओवर करने का फार्मूला बताया। बकौल लालू, अगर यूपी में पूर्व सीएम अखिलेश यादव और बसपा सुप्रीमो मायावती एक हो जाते हैं तो बीजेपी के अगला चुनाव जीतने का कोई चांस नहीं होगा।

राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद पर सवाल उठाते हुए लालू ने कहा कि वे दलित नहीं हैं। वे कोली जाति से आते हैं और गुजरात में कोली जाति ओबीसी है। दरअसल वहां चुनाव है इसलिए उन्हें उम्मीदवार बनाया गया है, ताकि गुजरात में 18 प्रतिशत कोलियों का मत हासिल किया जा सके। लालू ने कहा कि वे सिद्धांत से समझौता नहीं करते हैं। अगर कांग्रेस भी एनडीए उम्मीदवार का समर्थन करती, इसके बावजूद वो उन्हें समर्थन नहीं करते।

इस मौके पर तेजस्वी ने सुशील मोदी पर हमला बोलते हुए कहा कि कुछ लोग अखबार में बने रहने के लिए हम पर आरोप लगाते हैं। हमारी तीन पीढियां साजिश की शिकार हुई हैं। माता-पिता के बाद अब हमलोग और हमारी बहनों के बच्चे सीबीआई रेड देख रहे हैं। हम डरने वाले नहीं हैं। 27 अगस्त को पता चलेगा कि कौन बेईमान है। बता दें कि इसी दिन आरजेडी ने अपनी महत्वाकांक्षी ‘भाजपा भगाओ, देश बचाओ रैली’ आयोजित की है।

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नीतीश ने कहा, मुझको लेकर कयास लगाना बंद करें

बिहार के मुख्यमंत्री व जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने कहा कि मेरे लिए कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि लालू के दबाव में काम कर रहे हैं तो कुछ कहते हैं कि भाजपा के साथ चले जाएंगे। लेकिन ये सब बकवास है। रविवार को राजधानी स्थित जेडीयू कार्यालय में आयोजित प्रदेश कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक में नीतीश ने कहा कि मैं बिहार में ही राजनीति करुंगा। बिहार के विकास के लिए काम करुंगा।

कार्यकारिणी की बैठक में राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति चुनाव, महागठबंधन व सरकार से संबंधित तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। राष्ट्रपति चुनाव में जेडीयू द्वारा रामनाथ कोविंद को समर्थन की घोषणा के बाद जिस तरह लालू और कांग्रेस से नीतीश की बढ़ती ‘तल्खी’ और एनडीए से ‘मधुर’ होते संबंध की ख़बरें आ रही थीं, उस पर विराम लगाते हुए नीतीश ने कार्यकर्ताओं से संगठन की मजबूती के लिए काम करने को कहा। कार्यकर्ताओं से उन्होंने कहा कि संगठन ही आपकी पहचान है। संगठन की मजबूती की बदौलत ही आज भाजपा देश की सत्ता पर काबिज है।

कार्यकर्ताओं से संगठन को मजबूत करने का आह्वान करते हुए नीतीश ने कहा कि आपलोगों की सबसे पहली प्राथमिकता यह है कि संगठन का अधिक से अधिक विस्तार किया जाए और लोगों को इससे जोड़ा जाए। बैठक में पिछले वर्ष 5 जून को आरंभ हुए सदस्यता अभियान की समीक्षा भी की गई। बता दें कि पार्टी ने 50 लाख प्राथमिक एवं 2 लाख सक्रिय सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा है।

इस बैठक में दहेज प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ शुरू हुई सरकार की मुहिम में जेडीयू के भागीदार बनने की रणनीति भी बनी। बिहार के राजनीतिक समीकरण के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील इस बैठक में पार्टी प्रमुख के अलावे प्रदेश अध्यक्ष बशिष्ठ नारायण सिंह, आरसीपी सिंह, राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, श्याम रजक, मौलाना गुलाम रसूल बलियावी आदि प्रमुख रूप से मौजूद रहे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पासवान ने कहा, बिहार के भले के लिए एनडीए में आएं नीतीश

केन्द्रीय खाद्य एवं सार्वजनिक वितरण मंत्री व लोजपा सुप्रीमो रामविलास पासवान ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए एनडीए उम्मीदवार रामनाथ कोविंद का समर्थन करने के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की प्रशंसा करते हुए उन्हें एनडीए में आने का न्योता दिया है। उन्होंने कहा कि नीतीश कुमार के निर्णय का हम स्वागत करते हैं और उनसे आग्रह करते हैं कि दो नाव पर पांव नहीं रखें। जल्दी से एनडीए में आ जाएं। उनके आने से एनडीए भी मजबूत होगा, वे भी मजबूत होंगे और बिहार का भला हो जाएगा।

पासवान ने आगे कहा कि नीतीश महागठबंधन में असहज महसूस कर रहे हैं। हाल के दिनों में ऐसे कई मौके आए हैं जब उनकी असहजता सामने आई है। नोटबंदी पर साथ देने और कोविंद को समर्थन देने का उल्लेख करते हुए पासवान ने कहा कि ऐसे फैसलों से पता चलता है कि उनके और लालू के रास्ते अलग हैं। ऐसे में नीतीशजी को अब एनडीए में आ जाना चाहिए।

नीतीश की कल की टिप्पणी कि “विपक्षी दलों ने बिहार की बेटी (मीरा कुमार) को हारने के लिए उम्मीदवार बनाया” को सही ठहराते हुए पासवान ने कहा कि “नीतीशजी ने सही ही कहा है कि विपक्षी दलों ने राष्ट्रपति चुनाव के लिए मीरा कुमार को जानबूझकर चुना है, क्योंकि इसमें विपक्ष की हार निश्चित है। यूपीए के 10 वर्षों के शासनकाल में जब सत्ता कांग्रेस के हाथों में थी, तब उन्हें बिहार की बेटी की याद क्यों नहीं आई?” उन्होंने कहा कि इस बार भी जब रामनाथ कोविंद का नाम आया है तब मीरा कुमार का नाम इन लोगों ने आगे किया है।

बहरहाल, इस बीच नीतीश शनिवार को लालू द्वारा दी गई इफ्तार पार्टी में शामिल जरूर हुए, पर उनकी लाख कोशिशों के बावजूद कोविंद को समर्थन देने से पीछे नहीं हटे। बल्कि लालू की इफ्तार पार्टी से निकलने के बाद उन्होंने विपक्ष को आड़े हाथों लिया। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष ने जीत की बजाय हार की रणनीति बना ली है। अपने निर्णय का बचाव करते हुए उन्होंने कहा कि पहली बार बिहार के राज्यपाल को सीधे राष्ट्रपति बनाया जा रहा है। साथ में यह भी कि कोविंद आरएसएस की पृष्ठभूमि के नहीं हैं। उन्होंने मोरारजी देसाई के साथ अपनी राजनीति की शुरुआत की थी। नीतीश ने यह भी दोहराया कि यह चुनाव राष्ट्रीय स्तर का है और हमारा गठबंधन बिहार में है। इससे सरकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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नीतीश ने ठुकराई लालू की अपील

राष्ट्रपति पद के लिए मीरा कुमार के विपक्ष की साझा उम्मीदवार बनते ही जहां एकतरफा दिख रहा चुनाव दिलचस्प हो गया है, वहीं बिहार की राजनीति पर भी ‘अनिश्चितता’ और ‘अविश्वास’ के बादल मंडराने लगे हैं। आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने नीतीश द्वारा कोविंद को समर्थन दिए जाने को ‘ऐतिहासिक भूल’ करार दिया और मीरा की उम्मीदवारी की घोषणा के तत्काल बाद नीतीश से अपने फैसले पर पुनर्विचार करने की अपील की। लालू की इस अपील पर अपनी स्थिति साफ करने में जेडीयू ने वक्त नहीं लगाया और कहा कि राजनीतिक फैसले मिनट और सेकेंड में नहीं बदले जाते हैं। जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता केसी त्यागी ने स्पष्ट किया कि रामनाथ कोविंद को समर्थन देने का फैसला कई बातों पर विचार करने के बाद लिया गया है। हमारी पार्टी की सर्वोच्च समिति ने यह तय किया है, इसलिए इसे बदलने का, इस पर फिर से विचार करने का कोई सवाल ही नहीं है।

बहरहाल, विपक्ष के उम्मीदवार के चयन के लिए दिल्ली में हुई 17 विपक्षी दलों की बैठक में मीरा कुमार का नाम तय किए जाने के बाद संवाददाताओं से बातचीत में लालू ने कहा था कि “मैं नीतीश कुमार से अपील करता हूं और शुक्रवार को पटना जाकर भी अपील करुंगा कि वह ऐतिहासिक भूल न करें। उनकी पार्टी से गलत निर्णय हो गया, उसे बदलें।” उन्होंने कहा कि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने भी नीतीश कुमार से यह अपील की है। यह पूछे जाने पर कि क्या नीतीश के एनडीए उम्मीदवार को समर्थन देने से बिहार सरकार पर खतरा पैदा हो गया है और क्या उन्हें धोखा दिया गया है, लालू ने कहा कि “धोखा दिया या नहीं यह नीतीश जानें। सरकार चलती रहेगी। उस पर कोई खतरा नहीं है।”

बात जहां तक महागठबंधन सरकार की है, तो उसमें बने रहना तीनों घटक दलों की जरूरत है। इन दिनों एक साथ कई मुश्किलों से घिरे लालू के लिए तो शायद सबसे अधिक। हां, इतना जरूर है कि कांग्रेस और लालू नीतीश की ओर से इस तरह के निर्णय के लिए बिल्कुल ‘तैयार’ नहीं थे। हालांकि जेडीयू का कहना है कि कोविंद का नाम आना नीतीश के लिए ‘धर्मसंकट’ की तरह था और विपक्ष को उनके इस निर्णय को इसी परिप्रेक्ष्य में लेना चाहिए। उनके इस निर्णय से संघमुक्त भारत की उनकी लड़ाई पर किसी को संदेह नहीं होना चाहिए।

कुल मिलाकर राजनीति शह और मात का खेल है और नीतीश ने अपनी चाल चल दी है। अब अपने निर्णय को वापस लेना उनके लिए ‘घर का न घाट का’ होने जैसा होगा। इसलिए तय है कि वे ऐसा नहीं करेंगे। लेकिन इतना जरूर है कि मीरा कुमार के सामने होने से वे कहीं-न-कहीं थोड़े ‘असहज’ जरूर होंगे। कारण यह कि मीरा कुमार कोविंद की तरह दलित होने के साथ-साथ महिला भी हैं और सबसे बड़ी बात यह कि वो बिहार से हैं। उधर मतों के हिसाब से कोविंद की जीत में मोदी-शाह को अब शायद संदेह न हो, लेकिन मीरा कुमार हर लिहाज से इतनी ‘सक्षम’ उम्मीदवार हैं कि भारतीय राजनीति की ये कद्दावर जोड़ी भी ‘जश्न’ परिणाम आने के बाद ही मना पाएगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

 

 

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राष्ट्रपति चुनाव में नीतीश एनडीए के साथ

जैसी कि संभावना थी, बिहार के मुख्यमंत्री व जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने राष्ट्रपति पद के लिए एनडीए के उम्मीदवार रामनाथ कोविंद को समर्थन देने का ऐलान कर दिया। बुधवार को पार्टी विधायकों की मीटिंग में नीतीश ने कहा कि वे सभी कोविंद के लिए वोट करें। नीतीश के इस निर्णय के साथ ही विपक्ष बिखर-सा गया। कांग्रेस ने अंत तक नीतीश को विपक्ष में बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन वे अपने निर्णय पर अडिग रहे। बदली हुई परिस्थितियों में कांग्रेस क्या निर्णय लेती है और किसे अपना उम्मीदवार बनाती है, यह देखने की बात होगी। उधर कोविंद को लेकर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव का क्या रुख रहता है, यह देखना भी दिलचस्प होगा, क्योंकि अब उनके एक तरफ कांग्रेस है तो दूसरी तरफ नीतीश। और इन सबके बीच महागठबंधन सरकार कितनी ‘निर्विघ्न’ रह पाती है, इस पर भी सबकी निगाहें रहेंगी।

बहरहाल, नीतीश के समर्थन के बाद रामनाथ कोविंद की स्थिति और मजबूत हो गई है। अब उन्हें 50 प्रतिशत से ज्यादा वोट मिल सकते हैं। यही नहीं, नीतीश की घोषणा के बाद डीएमके भी ‘धर्मसंकट’ में है। कोई आश्चर्य नहीं कि डीएमके समेत कुछ अन्य पार्टियां भी कोविंद को समर्थन दे दें। अगर ऐसा होता है तो एनडीए उम्मीदवार को 70 प्रतिशत तक मत मिल सकते हैं।

ये नीतीश ही थे, जिन्होंने राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्ष को एकजुट करने की पहल की थी। अब जबकि वे एनडीए उम्मीदवार के साथ खड़े हो गए हैं, विपक्षी एकता ताश के पत्तों-सी बिखरती दिख रही है। हालांकि नीतीश कुमार ने कांग्रेस को भरोसा दिलाया है कि उनका निर्णय केवल राष्ट्रपति चुनाव की बाबत है, अन्यथा वे विपक्ष के साथ बने हुए हैं। गौरतलब है कि मंगलवार को उनकी इस मुद्दे पर कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आज़ाद से लंबी चर्चा हुई थी।

गौरतलब है कि नीतीश द्वारा कोविंद को समर्थन देने के दो स्पष्ट कारण हैं। पहला यह कि बतौर राज्यपाल कोविंद ने नीतीश सरकार के लिए कभी कोई मुश्किल पैदा नहीं की। जब शराबबंदी का मामला कानूनी विवादों में आया तब भी वे नीतीश के साथ मजबूती से थे। कुलपतियों की नियुक्ति को लेकर भी पूर्व के राज्यपाल की तरह उन्होंने कोई नुक्ताचीनी नहीं की थी। दूसरा, यह कि कोविंद का विरोध कर नीतीश किसी भी स्थिति में यह संदेश नहीं दे सकते थे कि वे दलितविरोधी हैं। बिहार में उन्होंने अपनी जो राजनीतिक जमीन तैयार की है, उसमें दलितों-महादलितों की भूमिका छिपी नहीं है।

कुल मिलाकर ये कि राष्ट्रपति चुनाव को लेकर बिहार की राजनीति में खलबली-सी मच गई है। अब बाकी जो हो, कोविंद का राष्ट्रपति बनना और उधर मोदी का और इधर नीतीश का फायदे में रहना तय है, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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कोविन्द की उम्मीदवारी और दलों के समीकरण

देश के सर्वोच्च पद के लिए एनडीए का उम्मीदवार बनाए जाने के ठीक बाद बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया, जिसे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने मंजूर कर लिया है। कोविंद की जगह पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरीनाथ त्रिपाठी बिहार के राज्यपाल का अतिरिक्त प्रभार संभालेंगे। इस बीच कोविंद ने अपने नाम की घोषणा होते ही दिल्ली जाकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व एनडीए के वरिष्ठ नेताओं से मुलाकात की और अपना आभार जताया। यही नहीं, कोविंद बिहार के लोगों को भी धन्यवाद देना नहीं भूले।

उधर राष्ट्रपति पद के लिए कोविंद के उम्मीदवार बनते ही विपक्ष के सारे समीकरण धरे के धरे रह गए। मोदी के इस मास्टर स्ट्रोक का जवाब फिलहाल किसी दल को नहीं सूझ रहा। कांग्रेस, शिवसेना और तृणमूल कांग्रेस ने अपनी ‘नाखुशी’ जरूर जाहिर की, लेकिन कोविंद के नाम का सीधा विरोध करना उनके लिए भी कठिन है। सच यह है कि शिवसेना, जिसने इस फैसले को ‘वोटबैंक’ की राजनीति करार दिया, वो भी उस ‘महादलित’ समुदाय का विरोधी कहलाना नहीं चाहेगी, जिससे कोविंद ताल्लुक रखते हैं।

वैसे जहां तक वोटबैंक की बात है, तो कोविंद से जिस पार्टी का वोटबैंक सबसे अधिक प्रभावित हो सकता है, वो है बहुजन समाज पार्टी। मायावती की तो पूरी राजनीति ही इस वोटबैंक पर टिकी है। अब बदले हालात में वो भाजपा को चाहे लाख कोस लें, लेकिन कोविंद का विरोध करने की भूल वो चाह कर भी नहीं कर सकतीं। उनका ऐसा करना अपना वोटबैंक दांव पर लगाने जैसा होगा।

इधर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और तेलंगाना के मुख्यमंत्री के चन्द्रशेखर राव सहित कई नेताओं ने भाजपा के इस फैसले का स्वागत किया। नीतीश कुमार ने अपनी खुशी जाहिर करते हुए कहा कि ये मेरे लिए गर्व की बात है कि बिहार के राज्यपाल राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार हैं। हालांकि, कोविंद को समर्थन देने की बाबत उन्होंने जरूर कहा कि इसका फैसला वो पार्टी की मीटिंग के बाद करेंगे, लेकिन ये तय माना जा रहा है कि नोटबंदी की तरह इस मामले में भी वे विपक्ष से अपनी राह अलग करेंगे।

राजनीति के जानकार बताते हैं कि नीतीश कोविंद को समर्थन देकर एक तीर से कई निशाने साधना चाहेंगे। सबसे पहले तो यह कि वे ऐसा कर कोविंद से अब तक अच्छे रहे रिश्ते को और ‘प्रगाढ़’ करना चाहेंगे। दूसरा, महागठबंधन से अलग भी उनके पास एक ‘विकल्प’ रहेगा और तीसरा, महादलितों के बीच इससे ‘पॉजिटिव’ मैसेज जाएगा। कुल मिलाकर ये कि राजनीति का निराला खेल देखिए, अभी हाल-हाल तक नीतीश राष्ट्रपति चुनाव के लिए विपक्षी एकता की पहल कर रहे थे, और अब संभवत: विपक्षी दलों में से कोविंद को समर्थन देने की पहल भी वही करें।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सचमुच मोदी के पेट में था राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार का नाम

एनडीए की ओर से राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार के संबंध में आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने अपने अंदाज में बड़ा दिलचस्प बयान दिया था कि उनके उम्मीदवार का नाम और कहीं नहीं, नरेन्द्र मोदी के पेट में है। आज एनडीए द्वारा देश के सर्वोच्च पद के लिए अपने उम्मीदवार का नाम घोषित करते ही लालू की बात बिल्कुल सही साबित हुई। लालकृष्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, मोहन भागवत, सुषमा स्वराज, सुमित्रा महाजन, द्रौपदी मुर्मू जैसे कई नाम बस कयास बनकर हवा में तैरते रहे और आज घोषणा हुई रामनाथ कोविंद के नाम की। पेशे से वकील रहे कोविंद वर्तमान में बिहार के राज्यपाल हैं। साफ-सुथरी छवि वाले, शालीन और अनुभवी व्यक्ति हैं कोविंद। राज्यपाल बनने से पूर्व दो बार राज्यसभा के सदस्य भी रह चुके हैं, लेकिन उन्हें राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया जाएगा, ये स्वयं उनके लिए भी कल्पनातीत बात रही होगी। राजनीति के जानकार बताते हैं कि उन्हें राज्यपाल भी ‘अचानक’ ही बनाया गया था और अब राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार भी वे ‘अचानक’ ही बने हैं।

बहरहाल, भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने आज रामनाथ कोविंद के नाम का ऐलान किया। इससे पहले राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार तय करने को लेकर राजधानी दिल्ली में भाजपा संसदीय बोर्ड की बैठक हुई। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, पार्टी अध्यक्ष अमित शाह समेत सभी बड़े नेता इस बैठक में पहुंचे। मीटिंग में सांसदों और विधायकों को मौजूद रहने को कहा गया ताकि वे उम्मीदवार के नॉमिनेशन पेपर पर दस्तखत कर सकें। करीब 45 मिनट की मीटिंग के बाद शाह और मोदी ने अकेले में बैठक की। इसके बाद ही कोविंद के नाम का ऐलान कर दिया गया।

बता दें कि 1 अक्टूबर 1945 को कानपुर देहात में जन्मे कोविंद दलित समुदाय से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने कानपुर यूनिवर्सिटी से बीकॉम और एलएलबी की डिग्री हासिल की। दिल्ली हाईकोर्ट में वकील रहे कोविंद 1994 में यूपी से राज्यसभा के लिए चुने गए और लगातार दो बार यानि 2006 तक राज्यसभा के सदस्य रहे। वे कई संसदीय कमिटियों के चेयरमैन भी रहे। यह भी गौरतलब है कि कोविंद ऑल इंडिया कोली समाज और भाजपा दलित मोर्चा के अध्यक्ष रह चुके हैं।

कोविंद को राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाकर मोदी ने एक तीर से कई निशाना साधने की कोशिश की है। सबसे पहले तो यह कि मोदी के आभामंडल को कोविंद से दूर-दूर तक कोई ‘चुनौती’ नहीं मिल सकती। दूसरा यह कि कोविंद के दलित समुदाय से होने के कारण उनका सीधा विरोध करने से पहले हर पार्टी को कई बार सोचना पड़ेगा, यानि कि उनकी जीत सुनिश्चित। और तीसरा यह कि 2019 के चुनाव में उत्तर प्रदेश में, जहां से सबसे ज्यादा सांसद चुने जाते हैं, इससे बड़ा लाभ मिलेगा, क्योंकि कानपुर से आने वाले कोविंद के राष्ट्रपति बनने से वहां की दलित नेता मायावती की राजनीतिक धार कमोबेश कुंद जरूर होगी, जिससे भाजपा फायदे में रहेगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मदर्स डे का पूरक है फादर्स डे

पिता यानि हमारे सर्जक, हमारे निर्माता, हमारे ब्रह्मा… जिनकी ऊंगलियों के इशारे से हमारी दुनिया आकार लेती है, जिनके दिए संस्कार से हमारे विचार व्यवहार में ढलते हैं, जिनकी तपस्या से हम सम्पूर्ण मनुष्य बनते हैं… और दुनिया का क्रम चलता रहता है। जिस तरह मां के लिए कहा जाता है कि ईश्वर स्वयं हर जगह नहीं हो सकते, इसीलिए उन्होंने मां को बनाया, उसी तरह पिता के लिए कहना गलत न होगा कि मां के रूप में हर जगह होकर भी ईश्वर के लिए संसार चलाना संभव न था, इसीलिए उन्होंने अपनी पूर्णता के लिए अपनी ही असंख्य प्रतिकृतियां बनाईं और उन्हें पिता का नाम दे दिया। इन्हीं पिता को समर्पित दिन है – फादर्स डे। संतान के लिए पिता के अवदान के प्रति, उनके प्रेम, संघर्ष और त्याग के प्रति श्रद्धा से सिर झुकाने का दिन। दूसरे शब्दों में मदर्स डे का पूरक दिन।

फादर्स डे की मूल परिकल्पना अमेरिका की है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक फादर्स डे सर्वप्रथम 19 जून 1909 को मनाया गया था। वाशिंगटन के स्पोकेन शहर में सोनोरा डॉड ने अपने पिता की स्मृति में इस दिन की शुरुआत की थी। इसकी प्रेरणा उन्हें मदर्स डे से मिली थी।

आगे चलकर 1916 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति वुडरो विल्सन ने इस दिन को मनाने के प्रस्ताव को स्वीकृति दी। धीरे-धीरे इस दिन को मनाने का चलन बढ़ता गया और 1924 में राष्ट्रपति कैल्विन कुलिज ने इसे राष्ट्रीय आयोजन घोषित किया। इसके उपरान्त 1966 में राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने इसे जून के तीसरे रविवार को मनाने का फैसला किया और 1972 में राष्ट्रपति रिचर्ड निक्सन ने इस दिन को नियमित अवकाश के रूप में घोषित किया।

माता-पिता इस धरती के साक्षात ईश्वर हैं। उन्हें सम्मान हम चाहे जिस बहाने से दें वो गलत नहीं, लेकिन अगर सम्मान केवल दिनविशेष में सिमट कर रह जाए तो ये अनैतिकता की पराकाष्ठा होगी। पर आज हो कुछ ऐसा ही रहा है। समय बीतने के साथ मदर्स डे और फादर्स डे का व्यवसायीकरण होता गया। ग्रीटिंग कार्ड और उपहार तो हमें याद रहे लेकिन इन दिनों के सार, संदर्भ और संदेश को हम भुला बैठे। आज दुनिया के लगभग हर हिस्से में ये दिन मनाए जाते हैं और विरोधाभास देखिए कि दुनिया के हर हिस्से में ओल्ड एज होम भी बढ़ रहे हैं। आज हमारे पास अपने माता-पिता के लिए वक्त नहीं, लेकिन फेसबुक और व्हाट्स एप पर ये जताने में हम सबसे आगे होते हैं कि हम उन्हें कितना चाहते हैं, हमें उनकी कितनी फिक्र है और वो हमारे लिए क्या मायने रखते हैं। आईये, इस विरोधाभास को दूर करें। माता-पिता के लिए अपने सम्मान को केवल औपचारिकता न बन जानें दें।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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