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बड़ी गहरी मोदी की मार, ‘थाली’ के बदले लिया बिहार

लगता है दिल्ली भेजे गए लाखों डीएनए सैंपल नीतीश के काम नहीं आ रहे। बिहार की जनता नीतीश के ‘स्वाभिमान’ के मुकाबले ‘छीनी गई थाली’ को लेकर प्रधामनंत्री मोदी की ‘शिकायत’ को ज्यादा तरजीह दे रही है शायद। इतनी ज्यादा कि अब थाली के बदले मोदी को पूरा बिहार मिलने जा रहा है। जी हाँ, ताजा सर्वे की मानें तो बिहार में एनडीए की सरकार बन रही है और वो भी दो तिहाई बहुमत से। जी न्यूज ने बीते 29 और 30 सितंबर को बिहार की सभी 243 सीटों पर ‘जनता का मूड’ जानने के लिए सर्वे किया। सर्वे का नाम भी ‘जनता का मूड’ ही था। इस सर्वे के अनुसार भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को स्पष्ट रूप से 147 सीटें मिलती दिख रही हैं, जबकि जदयू, राजद और कांग्रेस का महागठबंधन मात्र 64 सीटों पर सिमट रहा है। शेष 32 सीटों पर कांटे का मुकाबला है। इन सीटों पर पलड़ा किसी ओर झुक सकता है। बता दें कि इससे पहले जी न्यूज का सर्वे 18 सितंबर को आया था जिसमें एनडीए को 140 सीटें दिखाई गई थीं और महागठबंधन को 70 सीटें दी गई थीं।

12 अक्टूबर को 10 जिलों की 49 सीटों पर होने जा रहे पहले चरण के चुनाव की बात करें तो एनडीए को 53.8 प्रतिशत, महागठबंधन को 40.2 प्रतिशत और अन्य को 6 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है। सर्वे में एक दिलचस्प अनुमान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को लेकर है। एनडीए को सबसे अधिक फायदा इन्हीं क्षेत्रों में होने जा रहा है। खास तौर से आरा से सीतामढ़ी तक पड़ने वाले इलाके में एनडीए को 54.6 प्रतिशत, जबकि महागठबंधन को 39.7 प्रतिशत वोट मिलने की सम्भावना बताई गई है।

सितम्बर के आखिरी हफ्ते में ही ‘लोकनीति सीएसडीएस’ ने भी सर्वे किया। सीएसडीएस सर्वे भी एनडीए की स्पष्ट बढ़त बता रहा है। इस सर्वे के मुताबिक एनडीए 42 प्रतिशत वोट हासिल करता दिख रहा है। नीतीश-लालू-कांग्रेस के महागठबंधन को 38 प्रतिशत वोट मिलने के आसार हैं और वो एनडीए से 4 प्रतिशत पीछे है। 4 प्रतिशत का ये अन्तर सीटों के बड़े अन्तर का कारण बन सकता है। हालांकि सर्वे के मुताबिक नीतीश कुमार अभी भी बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं और ग्रामीण इलाकों में महागठबंधन को अधिक वोट भी मिल रहे हैं लेकिन कुल मिलाकर बाजी एनडीए मार ले जा रहा है।

अब तक हुए सारे सर्वे पर गौर करें तो हम पाएंगे कि पहले बढ़त महागठबंधन को हासिल थी। बिहार में लोगों की आम राय थी कि केन्द्र के लिए मोदी और बिहार के लिए नीतीश ठीक हैं। लेकिन चुनाव ज्यों-ज्यों परवान चढ़ रहा है, त्यों-त्यों नरेन्द्र मोदी बिहार में भी अपनी जगह बनाते और फैलाते जा रहे हैं। इसे एक अन्य सर्वे के उदाहरण से समझें। एबीपी न्यूज/नीलसन के अब तक तीन सर्वे आए हैं। पहला सर्वे 24 जुलाई को आया था जिसमें महागठबंधन को 129 और एनडीए को 112 सीटें मिली थीं। 15 सितंबर को आए उनके दूसरे सर्वे में कांटे की टक्कर थी जिसमें महागठबंधन के हिस्से में 122 और एनडीए के हिस्से में 118 सीटें आई थीं। लेकिन 7 अक्टूबर तक आते-आते परिदृश्य बदल गया। उनके तीसरे सर्वे में एनडीए को 128 सीटें मिल रही हैं और महागठबंधन को 112 सीटें। अन्य के खाते में 3 सीटें गई हैं। यानि एनडीए की सरकार पूर्ण बहुमत से बन रही है। वोटों के प्रतिशत की बात करें तो एनडीए को 42, महागठबंधन को 40 और अन्य को 18 प्रतिशत वोट मिल रहे हैं।

कह सकते हैं कि सर्वे सम्भावनाओं का खेल है और आँख मूंदकर किसी सर्वे पर ऐतबार नहीं करना चाहिए। फिर भी राजनीति में अगर आप रुचि रखते हों और चुनाव परिणाम को लेकर आपके भीतर उत्सुकता हो तो एक बार आप बारी-बारी से बिहार के चार मुख्य दलों जदयू, राजद, कांग्रेस और भाजपा के पटना स्थित पार्टी कार्यालय जाएं। इन कार्यालयों का नजारा देख आप स्वयं किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहेंगे। पहले तीन दलों के कार्यालय में आपको  थोड़े विश्वास, थोड़ी आशंका के साथ ‘परीक्षा ठीक से गुजर जाय’ वाला भाव दिखेगा लेकिन भाजपा के कार्यालय की चहल-पहल देख आपको लगेगा कि वहाँ ‘अच्छे दिन’ की प्रतीक्षा हो रही है।

बिहार के चार कोने में चार परिवर्तन रैली के बाद चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की योजना एक के बाद एक कई रैलियों की है। उनका अभियान जितना आक्रामक दिख रहा है उतना ही व्यवस्थित भी। मोदी के कद का प्रधानमंत्री लगभग हर जिले में खुद पहुँच रहा हो तो ये सचमुच एक बड़ी बात है। हालांकि देखा जाय तो पोस्टर से लेकर प्रचार तक नीतीश कुमार कहीं भाजपा से पीछे नहीं हैं। लेकिन उन्हें कदम-कदम पर जिस तरह लालू और उनके तथाकथित ‘जंगलराज’ को डिफेंड करना पड़ रहा है उसे उनके ‘हार्डकोर’ समर्थक भी पूरी तरह पचा नहीं पा रहे हैं। नीतीश की ‘विकासपुरुष’ वाली छवि अब भी कायम है, लोगों ने उन्हें बिल्कुल भुला दिया हो ऐसी बात भी नहीं, ‘मांझी’ समेत बाकी परेशानियों का हल भी नीतीश शायद निकाल लें लेकिन दो विपरीत हो चुके ‘ध्रुव’ जिन परिस्थितियों में और जिस तरह साथ आए हैं वो उनके कार्यकर्ताओं और महागठबंधन के नाम पर ‘कुर्बान’ हुए नेताओं को ‘सहज’ नहीं होने दे रहा है। ऊपर से लालू कभी खुद को ‘नक्सली’ कहकर, कभी ‘गौमांस’ पर बयान देकर तो कभी अपने बड़े बेटे के छोटे और छोटे के बड़े हो जाने को लेकर रोज नई मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं सो अलग।

एक समय नरेन्द्र मोदी समेत अन्य भाजपा नेताओं को भोज पर आमंत्रित कर नीतीश ने अचानक वो कार्यक्रम स्थगित कर दिया था। हालांकि अब जाकर नीतीश इसके मूल में सुशील मोदी को बता रहे हैं लेकिन अगर ये सच भी हो तो बताने में शायद देर कर दी है उन्होंने। अब तो वो बीच रणभूमि में हैं और सर्वे अगर सच साबित हुए तो इसका मतलब ये होगा कि नरेन्द्र मोदी उनसे ‘छीनी गई थाली’ के बदले पूरा बिहार लेने जा रहे हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या ‘सवर्णों’ को स्वीकार्य होगा भाजपा का यादव, पिछड़ा या अतिपिछड़ा मुख्यमंत्री..?

आमतौर पर चुनाव में सभी पार्टियां अपने वोटबैंक को बनाए रखने के साथ-साथ विपक्षी पार्टी (या पार्टियों) के वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश करती हैं। आज के ‘तथाकथित’ लोकतंत्र में ये ‘तथ्य’ अब ‘अखंड सत्य’ की तरह स्वीकार्य है। इसका अपवाद ढूँढ़ने की कोशिश करना भी बेमानी हो चुका है। इसीलिए ये कहने में कुछ भी नया नहीं कि बिहार चुनाव में भी यही हो रहा है। नया ये है कि अब अपने वोटबैंक को जोड़ने की जगह दूसरे के वोटबैंक को तोड़ने की कोशिश ज्यादा हो रही है। केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का ये कहना कि भाजपा का अगला मुख्यमंत्री यादव, पिछड़ा या अतिपिछड़ा होगा, इस बात का स्पष्ट प्रमाण है।

अभी हाल ही में भाजपा के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने बयान दिया कि भाजपा की ओर से राज्य का अगला मुख्यमंत्री यादव, पिछड़ा या अतिपिछड़ा होगा। कोई सवर्ण मुख्यमंत्री नहीं बनेगा। गिरिराज सिंह बहुत बड़े ‘बयानवीर’ हैं और कई मौकों पर अपने बयानों से भाजपा को असहज स्थिति में डाल चुके हैं। कई बार उन्हें केन्द्रीय नेतृत्व की ‘फटकार’ भी लग चुकी है। लेकिन इस बार इतने बड़े मौके पर उन्होंने इतना बड़ा बयान दिया और पार्टी ने इसका आधिकारिक खंडन नहीं किया, इसका सीधा मतलब ये है कि उन्होंने ये बयान दिया नहीं, बल्कि उनसे दिलवाया गया है।

बिहार में मुकाबला नीतीश के नेतृत्व वाले महागठबंधन और भाजपा की अगुआई वाले एनडीए के बीच है। हालांकि कुछ पार्टियों ने ऐन चुनाव के मौके पर ‘थर्ड फ्रंट’ बनाकर और तारिक अनवर का चेहरा आगे कर मुकाबले को त्रिकोणात्मक बनाने की कोशिश की है लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये थर्ड फ्रंट भाजपा के ‘पॉलिटिकल मैनेजमेंट’ और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का कमाल है और ऐसा नहीं है तब भी इससे सीधा फायदा उसी को हो रहा है। लेकिन इतने के बावजूद भाजपा संतुष्ट नहीं हुई और गिरिराज से इतना अहम बयान दिलवाया। भाजपा के रणनीतिकारों ने इस बयान से जुड़े तमाम पहलुओं पर शायद विचार ही नहीं किया।

यहाँ एक साथ कई सवाल उठते हैं। पहला ये कि भाजपा अगड़ों के अपने वोटबैंक को जोड़ने से ज्यादा यादव, पिछड़े या अतिपिछड़े यानि लालू-नीतीश के वोटबैंक को तोड़ने की कोशिश क्यों कर रही है..? दूसरा, क्या भाजपा का पिछड़ा मुख्यमंत्री अगड़ों को स्वीकार्य होगा..? तीसरा, अगर स्वीकार्य होगा तो क्या इसका मतलब ये है कि अगड़ों का एकमात्र विकल्प भाजपा है..? चौथा, अगर ऐसा नहीं है तो भाजपा सवर्णों को ‘टेकेन फॉर ग्रान्टेड’ क्यों मान रही है..? और पाँचवाँ, अगर मुख्यमंत्री अगड़ा, पिछड़ा या अतिपिछड़ा होगा तो सवर्णों को क्या देगी भाजपा..?

टिकट बंटवारे को देखें तो भाजपा ने दो दर्जन से ज्यादा यादव उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। महागठबंधन से नाराज लोगों को खास तरजीह दी है। महादलितों पर तो वो मेहरबान है ही। और अब यादव, पिछड़ा या अतिपिछड़ा मुख्यमंत्री। क्या सवर्णों को लेकर भाजपा ‘ओवरकॉन्फिडेन्ट’ है..?  सुशील कुमार मोदी, प्रेम कुमार (और मुस्लिम उम्मीदवार शाहनवाज हुसैन) को छोड़ मुख्यमंत्री पद के ज्यादातर उम्मीदवार – राधामोहन सिंह, राजीव प्रताप रूडी, मंगल पांडेय, सीपी ठाकुर, अश्विनी चौबे और स्वयं गिरिराज सिंह – अगड़ी जाति से आते हैं। ऐसे में भाजपा का ये दांव कहीं उलटा ना पड़ जाय। इसकी सम्भावना तब और ज्यादा हो जाती है जबकि संघ प्रमुख मोहन भागवत के ‘आरक्षण की समीक्षा’ वाले बयान को ‘अपने’ लोगों के बीच ले जाने और भुनाने में लालू और नीतीश कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

भाजपा के तमाम वरिष्ठ नेता बयान देते रहे हैं कि पार्टी का संसदीय बोर्ड मुख्यमंत्री पद का फैसला करेगा। तमाम व्यंग्य और उकसावों के बावजूद भाजपा ने किसी चेहरे को आगे करने की जगह चुप्पी बनाए रखी थी अब तक। कारण साफ है, वहाँ कोई ऐसा है ही नहीं जिसकी भाजपा और एनडीए में वैसी स्वीकार्यता हो जैसी महागठबंधन में नीतीश कुमार की है। ऐसे में गिरिराज से बयान दिलवाकर भाजपा का संयम तोड़ना समझ से परे है। मुख्यमंत्री किस जाति का होगा, इसमें उलझने और उलझाने से बेहतर है कि भाजपा अपने अभियान के केन्द्र में नरेन्द्र मोदी को रखकर ही आगे बढ़े।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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इक्कीसवीं सदी में भी तुम नौवीं पास क्यों रह गए तेजस्वी..? 

इक्कीसवीं सदी में भी तुम नौवीं पास क्यों रह गए तेजस्वी..? जो वैसी सुविधाओं में पला हो जिनकी कल्पना तक सबके बस की बात नहीं… राज्य से लेकर केन्द्र तक जिसके परिवार की तूती बोलती हो… जिसके घर में पिता ही नहीं माँ के भी मुख्यमंत्री होने का बिरला संयोग हो… जिसमें एक बड़ी राजनीतिक पार्टी अपना भविष्य देख रही हो… जिसे आज के युवा-सपनों का प्रतीक बनाकर लाखों लोगों के बीच मंच पर खड़ा किया जा रहा हो, वो केवल नौवीं पास होकर रह जाय, तो सवाल उठेंगे ही। यहाँ बात लालू प्रसाद यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव की हो रही है जिनकी सम्पत्ति तो करोड़ों में है लेकिन जाने किस मजबूरी में वो नौवीं पास हैं केवल..!

कम पढ़ा होना गुनाह नहीं। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जब कम पढ़े-लिखे और यहाँ तक कि अनपढ़ लोगों ने भी इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है। अनपढ़ होने के बावजूद अकबर बादशाह हुए और कागज ना छूने के बावजूद कबीर ने घर-घर में जगह बनाई। लेकिन उनके साथ क्या परिस्थितियां रहीं और उनके सामने कैसी चुनौतियां थीं, ये भी इतिहास में दर्ज है। आज हम इक्कीसवीं सदी में हैं और ग्वोवलाइजेशन के दौर में दुनिया जहाँ छोटी हुई है वहीं जीवन और जटिल हो गया है। ऐसे में तेजस्वी जैसे युवा का केवल नौवीं पास होना हैरान करता है।

आरजेडी सुप्रीमो ने इस बार अपने दोनों बेटों को चुनाव-मैदान में उतारा है। छोटे बेटे तेजस्वी राघोपुर से भाग्य आजमा रहे हैं जहाँ से लालू और राबड़ी दो-दो बार एमएलए रह चुके हैं। शनिवार, 3 अक्टूबर को उन्होंने अपना नामांकन भरा। नामांकन-पत्र के साथ दायर हलफनामे के अनुसार वे दिल्ली के जाने-माने स्कूल डीपीएस से केवल नौवीं पास हैं और पेशे से समाजसेवी और व्यवसायी हैं। मैट्रिक करने में वो भले ही सफल ना हो पाए हों लेकिन ‘व्यवसाय’ में उन्होंने जरूर सफलता पाई है। 2014-15 के सालाना आयकर रिटर्न में उनकी आमदनी 5 लाख से ज्यादा बताई गई है और उनकी कुल सम्पत्ति है 1 करोड़ 40 लाख रुपये। हलफनामे के अनुसार अलग-अलग बैंकों में तेजस्वी के सात अकाउंट हैं और उन्होंने कई कम्पनियों में निवेश कर रखा है। उनके पास दस तोले सोने की ज्वेलरी और 1 लाख बीस हजार नकद हैं। 34 लाख रुपये का बैंक लोन भी है उनके ऊपर।

दुनिया जानती है कि तेजस्वी के पिता लालू प्रसाद यादव अत्यन्त साधारण परिवार से आते हैं। उनका बचपन संघर्षों में बीता। मुख्यमंत्री होने तक वो अपने बड़े भाई के चपरासी क्वार्टर में रहे और उनके ज्यादातर बच्चे वहीं हुए। तमाम विपरीत परिस्थितियों और छात्र-जीवन में ही राजनीति में कूद पड़ने के बावजूद वो ना केवल पटना यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में एमए हैं बल्कि एलएलबी की डिग्री भी है उनके पास। रेलमंत्री के रूप में उनके सफल प्रयोगों के बाद बड़ी-बड़ी जगहों से उन्हें मैनेजमेंट के छात्रों को ‘पढ़ाने’ के बुलावे आए और बाकायदा जाकर उन्होंने ‘पढ़ाया’ भी। ऐसे में उनकी अगली पीढ़ी से उनके आगे नहीं तो उनके बराबर या कम-से-कम उनके आसपास होने की उम्मीद तो होगी ही।

एक तर्क हो सकता है कि तेजस्वी क्रिकेटर रहे हैं और इस कारण पढ़ाई पर कम ध्यान दे पाए। अगर उन्होंने क्रिकेट में ही करियर बनाया होता तो ये तर्क स्वीकार सहज स्वीकार्य होता। आज 12वीं पास तेन्दुलकर से भला कौन पूछेगा कि उन्होंने आगे की पढ़ाई क्यों नहीं की। लेकिन जब क्रिकेट में तेजस्वी का करियर नहीं बना और राजनीति में भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा हो अब तक, ऐसा नहीं कहा जा सकता, तब घर का ऐसा कौन-सा भार था उनके ऊपर कि वे पढ़ाई की जगह तथाकथित ‘व्यवसाय’ में लग गए और पिता लालू या माँ राबड़ी ने उन्हें डाँटा नहीं..?

अक्सर किसी का पढ़ना, कम पढ़ना या ना पढ़ना सामाजिक स्थितियों पर निर्भर करता है। शिक्षा या ज्ञान के स्तर के अनुपात में ही कोई समाज ऊँचा उठता है और जब आप समाज के सबसे ऊँचे पायदान पर हों तब पढ़ना बहुत हद तक आपकी सामाजिक जिम्मेदारी हो जाती है क्योंकि तब आप हजारों-लाखों के ‘रोल मॉडल’ हो जाते हैं। इसीलिए ये सवाल उठेगा भी और गूँजेगा भी कि इक्कीसवीं सदी में भी तुम नौवीं पास क्यों रह गए तेजस्वी..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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महात्मा गांधी और नोबेल पुरस्कार का सच

1964 में मार्टिन लूथर किंग जूनियर (अमेरिका), 1980 में अडोल्फो पेरेस एस्कुइवेल (अर्जेंटीना), 1989 में दलाई लामा (तिब्बत), 1991 में आंग सान सू की (बर्मा), 1993 में नेल्सन मंडेला (दक्षिण अफ्रीका), 2007 में अल गोर (अमेरिका) और 2009 में बराक ओबामा (अमेरिका) नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजे गए। एक ही पुरस्कार से सम्मानित होने के अलावे भी इन सबमें एक समानता है और वो ये कि इन सभी को महात्मा गांधी के जीवन, उनके व्यक्तित्व और उनके विचारों ने प्रभावित किया था। क्या आपके मन में ये सवाल नहीं उठता कि इन सबके जिस ‘संघर्ष’ ने इन्हें नोबेल पुरस्कार तक पहुँचाया उस संघर्ष को ‘आकार’ देनेवाले गांधीजी को ही नोबेल नहीं मिला..? आगे चलकर 2014 में शांति का नोबेल भारत के कैलाश सत्यार्थी को मिला और उनके प्रशस्ति-पत्र में बाकायदा ये लिखा गया कि वे गांधी के मार्ग पर चले। कितने आश्चर्य की बात है कि जिस ‘गांधी’ के नाम के बिना एक नोबेल विजेता का ‘प्रशस्ति-पत्र’ पूरा नहीं होता उसी गांधी को नोबेल से वंचित रखा गया। इसे नोबेल की ‘भूल’ नहीं उसका ‘अपराध’ कहा जाना चाहिए।

हालांकि नोबेल कमिटी ने ये ‘अपराधबोध’ व्यक्त भी किया लेकिन गांधी की मृत्यु के 58 साल बाद। 2006 में दिए अपने सार्वजनिक वक्तव्य में नोबेल कमिटी ने कहा – “The greatest omission in our 106 year history is undoubtedly that Mahatma Gandhi never received the Nobel Peace prize. Gandhi could do without the Nobel Peace prize, whether Nobel committee can do without Gandhi is the question. (हमारे 106 साल के इतिहास में सबसे बड़ी चूक महात्मा गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया जाना है। गांधी तो बिना नोबेल पुरस्कार के रह सकते थे, पर बड़ा प्रश्न यह है कि क्या नोबेल शांति पुरस्कार कमिटी गांधी को बिना यह पुरस्कार प्रदान किए सहज है ?)”

नोबेल की ये ‘स्वीकारोक्ति’ गलत नहीं है। पूरी दुनिया जानती और मानती है कि महात्मा गांधी आधुनिक युग में अहिंसा और शांति के सबसे बड़े प्रतीक हैं। इतने बड़े कि गौतम बुद्ध और ईसा मसीह के बाद मानव-जाति पर ऐसा व्यापक प्रभाव अब तक नहीं देखा गया है। ऐसे गांधी को भला नोबेल की क्या जरूरत..? हाँ, उन्हें पाकर नोबेल का सम्मान जरूर और बढ़ जाता। लेकिन इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि दुनिया में किसी व्यक्ति को मिलने वाला यह सबसे बड़ा सम्मान है। ऐसे में ये प्रश्न उठना अत्यन्त स्वाभाविक है कि आखिर गांधीजी को क्यों नहीं… और वो भी एक बार नहीं, दो बार नहीं, पूरे पाँच बार नामांकित होने के बावजूद..!

जी हाँ, गांधीजी को नोबेल के लिए पूरे पाँच बार नामंकित किया गया था। 1937, 1938 और 1939 में लगातार तीन साल और इसके बाद भारत की स्वतंत्रता और विभाजन के वर्ष 1947 में उनका नामांकन हुआ। पाँचवीं बार उन्हें 1948 में नामांकित किया गया लेकिन नामांकन के महज चार दिनों के बाद उनकी हत्या हो गई।

बहुत दिनों तक माना गया कि गांधीजी को नोबेल देकर सम्भवत: नोबेल कमिटी अंग्रेजी साम्राज्य का ‘कोपभाजन’ नहीं बनना चाहती थी। लेकिन तत्कालीन दस्तावेजों से अब यह सत्य सामने आ चुका है कि नोबेल कमिटी पर ब्रिटिश सरकार की ओर से ऐसा कोई दबाव नहीं था। प्रश्न उठता है कि फिर उन्हें नोबेल देने के मार्ग में क्या कठिनाई थी..?

नोबेल पुरस्कार के लिए पहली बार गांधीजी का नाम नॉर्वे के एक सांसद ने सुझाया था लेकिन पुरस्कार देते समय उन्हें नज़रअंदाज कर दिया गया। नोबेल कमिटी के एक सलाहकार जैकब वारमुलर ने तब टिप्पणी की थी कि गांधी एक अच्छे, आदर्श और तपस्वी व्यक्ति हैं और सम्मान के योग्य हैं लेकिन ‘सुसंगत’ रूप से शांतिवादी नहीं हैं। जैकब के अनुसार गांधीजी को पता रहा होगा कि उनके कुछ अहिंसक आन्दोलन हिंसा और आतंक में बदल जाएंगे। ये बात उन्होंने 1920-1921 में गांधीजी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलन के संदर्भ में कही थी जब उत्तेजित भीड़ ने चौरीचौरा में एक पुलिस थाने को जला दिया था और कई पुलिसकर्मी मारे गए थे। करोड़ों की आबादी, सदियों का शोषण और एक भी ‘चौरीचौरा’ ना हो, ये कैसी अपेक्षा थी जैकब की..? ये गांधी ही थे कि भारत जैसे संवेदनशील और स्वाभिमानी देश में ‘चौरीचौरा’ की सैकड़ों-हजारों पुनरावृत्ति नहीं हुई।

 खैर, जैकब की अगली टिप्पणी भी कम दिलचस्प नहीं थी कि गांधीजी की राष्ट्रीयता भारतीय संदर्भों तक सीमित रही। यहाँ तक कि दक्षिण अफ्रीका में उनका आन्दोलन भी भारतीय लोगों तक सीमित रहा। उन्होंने कालों के लिए कुछ नहीं किया जो भारतीयों से भी बदतर ज़िन्दगी गुजार रहे थे। कैसी विडम्बना है कि आगे चलकर मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला और बराक ओबामा इस पुरस्कार से नवाजे गए और ये तीनों ना केवल ‘काले’ थे बल्कि गांधी को अपना आदर्श और पथ-प्रदर्शक मानते थे।

1947 में नोबेल के लिए कुल छह लोग नामांकित थे और उनमें एक नाम गांधीजी का था। लेकिन भारत-विभाजन के बाद अखबारों में छपे गांधीजी के कुछ (तथाकथित) ‘विवादास्पद’ बयानों को आधार बनाकर यह पुरस्कार उनकी जगह मानवाधिकार आन्दोलन ‘क्वेकर (Quakers)’ (जिसका प्रतिनिधित्व फ्रेंड्स सर्विस काउंसिल, लंदन और अमेरिकन फ्रेंड्स सर्विस कमिटी, फिलाडेल्फिया नाम की दो संस्था कर रही थी) को दे दिया गया।

1948 में खुद क्वेकर ने शांति के नोबेल के लिए गांधीजी का नाम प्रस्तावित किया। लेकिन इसे दु:संयोग की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा कि नामांकन की आखिरी तारीख के महज दो दिन पूर्व गांधीजी की हत्या हो गई। इस समय तक नोबेल कमिटी को गांधीजी के पक्ष में पाँच संस्तुतियां मिल चुकी थीं। लेकिन तब समस्या यह थी कि उस समय तक मरणोपरांत किसी को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जाता था। हालांकि ये कानूनी गुंजाइश थी कि विशेष स्थिति में मरणोपरांत भी यह पुरस्कार दिया जा सकता है। लेकिन यहाँ भी एक समस्या थी कि पुरस्कार की रकम आखिर किसे दी जाय क्योंकि गांधीजी का कोई संगठन या ट्रस्ट नहीं था। यहाँ तक कि उनकी कोई जायदाद भी नहीं थी और ना ही इस संबंध में उन्होंने कोई वसीयत ही छोड़ी थी। हालांकि यह इतनी बड़ी समस्या नहीं थी कि इसे सुलझाया ही नहीं जा सके। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि ‘इतिहास’ रचने के लिए जो ‘इच्छाशक्ति’ होनी चाहिए थी वो नोबेल कमिटी के पास थी ही नहीं। अंतत: 1948 में ये पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया और नोबेल कमिटी ने कहा कि इसके लिए कोई ‘योग्य जीवित उम्मीदवार’ नहीं है। ‘योग्य जीवित उम्मीदवार’ ना होने की बात सीधे तौर पर गांधीजी के ना रहने से जुड़ी हुई थी, इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं है।

अगर 1948 में गांधीजी की हत्या नहीं हुई होती तो ये पुरस्कार उन्हें मिल गया होता और नोबेल पर वो ‘दाग’ लगता ही नहीं जिसे ‘भूल’ या ‘चूक’ की किसी ‘स्वीकारोक्ति’ से कभी मिटाया नहीं जा सकता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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केजरीवालजी..! मोदी ‘गिड़गिड़ाने’ नहीं गए थे अमेरिका

अरविन्द केजरीवाल… भारतीय राजनीति में इस नाम ने जैसा स्थान बनाया और जितनी तेजी से बनाया वो अपने आप में अनूठा है। पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन के लिए जब सन् 2000 में केजरीवाल ने दिल्ली में ‘परिवर्तन’ नाम से नागरिक आन्दोलन शुरू किया तब उन्होंने हरगिज ना सोचा होगा कि इस ‘परिवर्तन’ से एक दिन पूरी ‘दिल्ली’ परिवर्तित हो जाएगी। सूचना के अधिकार के लिए अपने संघर्ष और 2006 में ‘रमन मैग्सेसे’ मिलने के बाद वो चर्चा में आए, और छाए अन्ना हजारे के साथ जनलोकपाल आन्दोलन से। आगे चलकर 2012 में आम आदमी पार्टी के गठन से लेकर 2013 में दिल्ली के मुख्यमंत्री पद तक का उनका सफर किसी स्वप्न जैसा है। इतिहास में ‘संघर्ष’ होते रहे हैं और होते रहेंगे लेकिन ‘संघर्ष’ का इस तरह से ‘मुकाम’ पाना बार-बार होने की चीज नहीं है।

‘जंतर-मंतर’ से दिल्ली के मुख्यमंत्री के ‘दफ्तर’ का सफर अरविन्द केजरीवाल ने इतनी जल्दी तय किया था कि वे ‘शासन’ और ‘आन्दोलन’ में फर्क ही नहीं कर पाए। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली का मुख्यमंत्री खुद बात-बात पर धरने पर बैठ जाता था। अपने वादों को भी वो आन्दोलन की तरह ही पूरा करना चाहता था, जो व्यवहार में सम्भव ना था। अंतत:  महज 49 दिनों में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। दिल्ली की जनता ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया की और उन्हें अपने ‘भगोड़ेपन’ का अहसास हो गया। बिना देर किए ‘प्रायश्चित’ में उन्होंने पूरी ताकत झोंक दी और दिल्ली ने उन्हें माफ भी कर दिया। उदार और दिलदार दिल्ली ने 2015 में उन्हें 70 में से 67 सीटें दे दीं।

ऐसे मेनडेट के बाद दिल्ली और देश को भी केजरीवाल से कुछ अलग और कुछ ज्यादा अपेक्षा है तो ये अत्यन्त स्वाभाविक है। खुद से जुड़ी अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए उन्हें ना केवल अतिरिक्त मेहनत करनी होगी बल्कि अतिरिक्त गम्भीरता भी बरतनी होगी। लेकिन इस गम्भीरता की कमी केजरीवाल में ‘गम्भीर’ रूप से है। आए दिन अपने ‘अगम्भीर’ बयानों से केजरीवाल अपने चाहनेवालों को निराश करते रहते हैं। दिल्ली के एलजी नजीब जंग और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्ववाली सरकार को लेकर उनके ज्यादातर बयान ऐसे ही होते हैं। चलिए मान लेते हैं कि नजीब जंग से उनकी ‘तनातनी’ दिल्ली सरकार के कामकाज या अधिकार-क्षेत्र को लेकर है और दिल्ली की सवा करोड़ जनता का प्रतिनिधि होने के नाते उन्हें बहुत हद तक बोलने का हक भी मिल जाता है। लेकिन सवा करोड़ जनता के प्रतिनिधि का सवा सौ करोड़ लोगों के प्रतिनिधि को लेकर अमर्यादित बयान देना सचमुच निराश करता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी अमेरिका के दौरे पर थे। वहाँ 25 सितम्बर को उन्होंने सतत विकास शिखर सम्मेलन में विश्व भर के राष्ट्राध्यक्षों को संबोधित किया, जिसकी मेजबानी संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की-मून ने की। इस महत्वपूर्ण दौरे के अन्तिम दिन यानि 28 सितम्बर को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ उनकी एक साल के भीतर तीसरी शिखर बैठक हुई। इस बैठक के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में उच्च स्तरीय शांतिरक्षा शिखर सम्मेलन और विश्व के कई नेताओं – ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन, फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांद, कतर के अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल थानी, मेक्सिको के राष्ट्रपति एनरीक पेना नीटो और फिलीस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास – से मोदी की द्विपक्षीय मुलाकातों का व्यस्त कार्यक्रम था। पर उनकी इस यात्रा में जो बात सबसे अधिक सुर्खियों में रही वो थी फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग, एप्पल के सीईओ टिम कुक, गूगल के सीईओ सुन्दर पिचाई और माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्य नडेला से उनकी मुलाकात। विश्व के इन शीर्षस्थ ‘कार्यकारी अधिकारियों’ के साथ मोदी की मुलाकात ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘मेक इन इंडिया’ की सम्भावनाओं के लिहाज से कितनी महत्वपूर्ण थी, ये कहने की जरूरत नहीं। मोदी ने इन दिग्गज कम्पनियों को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित किया।

बहरहाल, पूरा देश इन मुलाकातों को लेकर उत्सुक था और उत्साहित भी कि इसी दरम्यान 27 सितम्बर को केजरीवाल का बयान आता है कि मोदी विदेश में ‘गिड़गिड़ा’ रहे हैं। उन्होंने बाकायदा ट्वीट करके कहा कि अगर हम मेक इंडिया कर लेंगे तो मेक इन इंडिया ऑटोमेटिक हो जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर हम अपने देश को विकसित कर लेंगे तो दूसरे देश यहाँ खुद निवेश करने आएंगे। हमें उनके दरवाजों पर जाकर निवेश के लिए ‘गिड़गिड़ाना’ नहीं पड़ेगा।

सबसे पहली बात तो ये कि ‘मेक इंडिया’ को ‘मेक इन इंडिया’ से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दूसरे, नई सम्भावनाओं को तलाशना, अपने आयाम को बढ़ाना कहीं से भी गिड़गिड़ाना नहीं कहा जा सकता। तीसरे, मोदी वहाँ ‘व्यक्ति मोदी’ या ‘भाजपाई मोदी’ नहीं बल्कि ‘भारत के प्रधानमंत्री’ मोदी थे और यहाँ के सवा सौ करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। ऐसे में शब्दों के चयन में गरिमा और गम्भीरता निहायत जरूरी था।

केजरीवालजी को कुछ कहने से पहले ‘सिलिकॉन वैली’ से ‘सैप सेन्टर’ तक ‘मोदी-मोदी’ की गूंज जरूर सुननी चाहिए थी। ये गूंज किसी ‘गिड़गिड़ाने’ वाले के लिए नहीं, करोड़ों आँखों में 21वीं सदी के भारत के लिए उम्मीद और विश्वास जगाने वाले के लिए थी। उन्हें सुनना चाहिए था कि मोदी ‘उपनिषद’ से ‘उपग्रह’ की यात्रा को किस नजरिए से देखते हैं और अपनी तमाम ‘यात्राओं’ से उसे कैसा विस्तार देना चाहते हैं। ‘हाशिए’ पर खड़े भारत को ‘केन्द्रबिन्दु’ में लाना हो तो बात केवल ‘दिल्ली’ से नहीं बनेगी। पूरी दुनिया का भरोसा आपको जीतना होगा। मोदी नाम के इस शख्स ने अपने विज़न, अपने आत्मविश्वास, अपनी ऊर्जा से सात समुन्दर पार भी अपने लिए भरोसा पैदा किया है तो ये बड़ी बात है। देखा जाय दुनिया का ये भरोसा मोदी के बहाने (और मोदी के मुताबिक) उस भारत के लिए है जिसकी 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम की है और जिसे अभी बहुत लम्बा सफर तय करना है।

अन्त में, बहुत विनम्रता से कहना चाहूँगा केजरीवालजी से कि कमेंट करने से कद बड़ा नहीं होता। कद केवल और केवल काम से बड़ा होता है। मोदी अपना काम कर रहे हैं और केजरीवाल अपना काम करें। कमेंट करने का काम ‘समय’ पर छोड़ दें। वो हर किसी पर और हर दम सही ‘कमेंट’ करता है।

पुनश्च :

आज से लगभग साल भर पहले मोदी अमेरिका गए थे। प्रधानमंत्री के रूप में यह उनकी अमेरिका की  पहली यात्रा थी। पाँच दिन की उस यात्रा के अंतिम दिन उपराष्ट्रपति जो बिडेन की तरफ से मोदी के सम्मान में लंच का आयोजन किया गया। उस मौके पर अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी ने कहा था कि हम चाहते हैं कि भारत के विकास में प्रधानमंत्री मोदी के योगदान और भारत की आजादी में महात्मा गांधी के योगदान को एक तरह से याद किया जाय। यहाँ इस वाकये को सुनाने का यह मतलब कतई नहीं कि मोदी को महात्मा गांधी के बराबर में खड़ा किया जाय या कैरी ने मोदी के लिए जो कहा वैसा ही कुछ केजरीवाल भी कहें लेकिन इतना कहना तो जरूर बनता है कि जब घर के ‘मुखिया’ को ‘बाहरवाले’ इज्जत दे रहे हों तो ‘घरवालों’ की भी इज्जत (और साख भी) बढ़ती है, किसी भी सूरत में घटती तो हरगिज नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदी के सामने चेहरा नीतीश का, पर मुकाबले में लालू

महागठबंधन ने 243 में से 242 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। 23 सितम्बर को जदयू, राजद और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्षों की मौजूदगी में नीतीश कुमार ने महागठबंधन की सूची जारी की। इस मामले में महागठबंधन ने निश्चित रूप से एनडीए की तुलना में अधिक ‘समझदारी’ और ‘एकजुटता’ का परिचय दिया। इन तीनों दलों का तालमेल सीट बांटने और सूची जारी करने में ही नहीं उम्मीदवारों के चयन में भी दिखा। महागठबंधन के उम्मीवारों की सूची से एक बात साफ हो गई कि ‘इंजीनियरिंग’ की डिग्री भले ही नीतीश के पास हो लेकिन इसमें ‘सोशल इंजीनियरिंग’ लालू की चली है। केवल यही नहीं, सीट-दर-सीट विश्लेषण करें तो ये भी स्पष्ट हो जाएगा कि नरेन्द्र मोदी के सामने चेहरा भले ही नीतीश का हो पर मुकाबले में लालू हैं।

आप निश्चित तौर पर जानना चाहेंगे कि ऊपर कही गई बात का आधार क्या है..? इस ‘आधार’ को जानने के लिए हमें उस ‘आधार’ तक पहुँचना होगा जिसके बूते महागठबंधन बिहार के महासमर को जीतने उतरा है। मजे की बात तो ये है कि महागठबंधन की सूची पर निगाह डालते ही हम उस ‘आधार’ तक पहुँच जाएंगे और वो भी बिना मशक्कत के। आप भले ही अचरज करें लेकिन सच ये है कि लालू के ‘आधार’ को ही महागठबंधन ने अपना ‘आधार’ बनाया है। जी हाँ, 242 उम्मीदवारों में 64 यादव और 33 मुसलमान उम्मीदवारों का होना महज संयोग नहीं है। 64 यादव उम्मीदवारों में 48 लालू के, 14 नीतीश के और 2 कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। मुस्लिम उम्मीदवारों की बात करें तो राजद के 16, जदयू के 7 और कांग्रेस के 10 उम्मीदवार मैदान में हैं। इस तरह ‘माय’ समीकरण के तहत महागठबंधन ने 64 + 33 = 97 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं जो कुल उम्मीदवारों का 40% है।

ये तो हुई यादव और मुस्लिम उम्मीदवारों की बात। अब महागठबंधन के 242 उम्मीदवारों का विश्लेषण कुछ अलग तरह से करें। ये जानना दिलचस्प होगा कि इन 242 उम्मीदवारों में 164 यानि 68% उम्मीदवार पिछड़े, अति पिछड़े तथा मुस्लिम हैं। सवर्ण तथा एससी-एसटी उम्मीदवारों की बात करें तो उन्हें 16-16% हिस्सेदारी मिली है। कुल मिलाकर, ये कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि नीतीश और कांग्रेस ने लालू की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को ही फॉलो किया है।

महागठबंधन के उम्मीदवारों को एक और कोण से देखने के बाद इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाएगा कि मोदी से असली टक्कर लालू ले रहे हैं। 2010 में नीतीश के विजय-रथ पर भाजपा भी सवार थी और उसे 91 सीटें मिली थीं। इस बार भाजपा के कब्जे वाली इन 91 सीटों में से 41 पर नीतीश और कांग्रेस के उम्मीदवार भाजपा के सामने होंगे जबकि शेष 50 सीटों पर अकेले लालू के उम्मीदवार भाजपा से लोहा ले रहे होंगे। इन सीटों पर राजद दूसरे नंबर पर था। लालू को भरोसा है कि पिछली बार जेडीयू-भाजपा साथ थी तब उनकी पार्टी दूसरे नंबर पर थी। इस बार जेडीयू और राजद साथ हैं तो इसका सीधा फायदा उन्हें मिलेगा। देखा जाय तो लालू के इस ‘विश्वास’ को नकारना बहुत मुश्किल है। एनडीए के मार्ग में जितनी कठिनाई नीतीश के ‘सुशासन’ को लेकर है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल लालू खड़ी कर रहे हैं, यादव-मुस्लिम के साथ-साथ पिछड़ों में भी अपनी पैठ के कारण।

वैसे भी महागठबंधन के अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक एनडीए के हमले का केन्द्र-बिन्दु लालू रहे हैं। भाजपा के घोषित उम्मीदवारों की सूची में 26 यादवों की मौजूदगी भी इसी तथ्य की पुष्टि करती है। भाजपा और उसके साथी दलों ने लालू पर जितना निशाना साधा है उतना ही लालू का ‘वोटबैंक’ उनके लिए एकजुट हुआ है, ऐसा राजद खेमा मानता है। खैर, लालू का वोटबैंक उनके लिए कितना एकजुट रहेगा ये तो 8 नवंबर को मतगणना के बाद ही पता चलेगा लेकिन फिलहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि बिहार के इस महामुकाबले में अगर नरेन्द्र मोदी पिछड़ते हैं और ताज फिर नीतीश के सिर होता है तो ऐसा ‘किंगमेकर’ कहलाना पसंद करने वाले लालू प्रसाद यादव के कारण ही होगा, वरना नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में भाजपा की ‘बढ़त’ पर भारी ‘दो भूल’..!

बिहार में चुनाव धीरे-धीरे परवान चढ़ रहा है। पहले चरण के लिए नामांकन हो चुके हैं और दूसरे चरण की नामांकन-प्रक्रिया चल रही है। जद्दोजहद के बाद एनडीए और महागठबंधन ने लगभग सारी सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम भी तय कर लिए हैं। अब तक के प्रचार-अभियान में भाजपा बाकी दलों से ज्यादा आक्रामक दिखी है। ‘सर्वे’ और ‘समीकरण’ से भी उसकी बढ़त दिख रही है और एनडीए खेमे में ‘फील गुड’ का माहौल साफ तौर पर देखा जा सकता है। इन ‘अच्छी-अच्छी’ बातों पर ‘दो भूल’ भाजपा को भारी पड़ सकती है।

आखिर वो ‘दो भूल’ है क्या..? ये जानने से पहले ये जानें कि जिन दो लोगों से ये ‘दो भूल’ हुई है वो हैं कौन..? आप सुनकर हैरान होंगे कि इनमें एक भाजपा के वरिष्ठ नेता और देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह हैं तो दूसरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत। ऐसे कद के लोगों से भाजपा ने ऐसी उम्मीद हरगिज ना की होगी। दिल्ली विधान सभा चुनाव में हुई भाजपा की ऐतिहासिक पराजय में नरेन्द्र मोदी के उस एक भाषण का बड़ा योगदान है जिसमें उन्होंने कहा था कि “मेरे ‘अच्छे भाग्य’ से पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम हो गई हैं और आम आदमी अधिक बचत करता है तो ‘बदकिस्मत’ व्यक्ति को लाने की क्या जरूरत है।“ उनके इस कथन का ‘संदर्भ’ चाहे जो रहा हो लेकिन उनकी जुबान ‘थोड़ी’ फिसली और भाजपा की किस्मत वहाँ ‘पूरी’ पलट गई। अगर सावधानी ना बरती गई तो बिहार में भी ऐसा होते देर नहीं लगेगी।

बहरहाल, जानते हैं कि बात क्या थी। पहले राजनाथ सिंह की बात। दिल्ली से सबक लेकर भाजपा ने बिहार में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित ना कर नरेन्द्र मोदी के ‘चेहरे’ के सहारे ही आगे बढ़ने का फैसला किया। जदयू, राजद समेत तमाम पार्टियों ने इस पर तंज कसने में कोई कसर ना छोड़ी। भाजपा को ललकारा गया कि दम है तो अपना उम्मीदवार घोषित करे। सारी पार्टियां जानती थीं कि ये भाजपा की ‘कमजोर नस’ है और भाजपा चुपचाप सारे ‘हमले’ झेलती रही। इतने दावेदार थे यहाँ कि उसे डर था कि किसी एक चेहरे को आगे करना दिल्ली को दुहराने जैसा होगा। भाजपा “एक चुप, सौ सुख” के फार्मूले पर थी और यही ठीक भी था उसके लिए। सारी पार्टियां भी समझ गईं कि ये ‘चुप्पी’ उसकी रणनीति का हिस्सा है। ये मुद्दा अपनी धार खो ही रहा था कि अचानक 6 सितम्बर को राजनाथ सिंह का बयान आया कि भाजपा जल्द ही मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का चुनाव कर लेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि भाजपा का संसदीय बोर्ड जल्द इस बात का निर्णय कर लेगा कि बिहार चुनाव में किसे सीएम पद का प्रत्याशी बनाना है। राजनाथ के इस बयान को आए 19 दिन हो गए लेकिन आज तक प्रत्याशी तय करना तो दूर इस बात को लेकर कोई सुगबुगाहट तक नहीं हुई। लोग अब पूछने लगे कि राजनाथ सरीखे नेता ने ये बयान आखिर किस आधार पर दिया था..? इससे बिहार में भाजपा के पास कोई ‘प्रतिनिधि’ चेहरा ना होने की ‘कमजोरी’ एक बार फिर उजागर हुई और कुछ नहीं। महागठबंधन को भी दोबारा ‘व्यंग्य-बाण’ छोड़ने का मौका मिल गया सो अलग।

खैर, राजनाथ के बयान से तो बात ‘व्यंग्य-बाण’ के आस-पास थी। मोहन भागवत के बयान से तो पूरा खेल ही बिगड़ जाने का डर है। जी हाँ, आरएसएस प्रमुख ने आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइज़र’ में बयान दिया है कि आरक्षण को हमेशा राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया गया है। आगे उन्होंने कहा कि एक गैर राजनीतिक समिति का गठन होना चाहिए जो समीक्षा करे कि किसे आरक्षण की जरूरत है और कब तक..? भागवत के इस बयान के आते ही आरक्षण का जिन्न बाहर निकल चुका था और भाजपा बचाव की मुद्रा में थी। पार्टी ने तुरत कहा कि वह आरक्षण की समर्थक है और भागवत के बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। लेकिन तब तक ये मुद्दा बन चुका था। नीतीश कुमार ने कहने में जरा भी देर ना की कि आरएसएस का जो विचार है वही भाजपा का विचार है और ये भी कि भाजपा बिहार चुनाव के कारण अपने को इस बयान से अलग कर रही है। अब जिस किसी ने उसे वोट किया वो अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारेगा। उधर लालू अपने अंदाज में दहाड़ रहे थे कि माँ का दूध पिया है तो आरक्षण खत्म करके दिखाओ। तुम आरक्षण खत्म करने की बात कहते हो, हम इसे आबादी के अनुपात में बढ़ाएंगे। लगे हाथ उन्होंने ये भी पूछ लिया कि हाल ही में ‘पिछड़ा’ बने मोदी बताएं कि अपने आका मोहन भागवत के कहने से आरक्षण खत्म करेंगे या नहीं..?

मोहन भागवत ने गलत कहा या सही कहा, ये यहाँ विचारणीय नहीं है। यहाँ बात बिहार में भाजपा की संभावनाओं को लेकर हो रही है। इस लिहाज से देखा जाय तो भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की बात गलत समय उठाई है। कम या ज्यादा इसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। इसी तरह राजनाथ ने सीएम प्रत्याशी की घोषणा जल्द करने की बात हो सकता है केन्द्रीय नेतृत्व स्तर पर हुए किसी विमर्श के आधार पर कही हो लेकिन व्यावहारिक तौर पर भाजपा के लिए जो ‘उचित’ या ‘सम्भव’ ना हो उसे मीडिया में कहने की जरूरत क्या थी..?

समीकरण, समय और संवाद के संयोग से ही सियासत में सफलता मिलती है। समीकरण पक्ष में हो, समय भी साथ दे रहा हो लेकिन संवाद में जरा भी चूक हो जाय तो संयोग बिगड़ने में देर नहीं लगती। इस संवाद के कारण भाजपा ने सफलता और असफलता दोनों का स्वाद चखा है। इस चुनाव में उसे क्या मिलेगा ये उसके द्वारा बरती गई सावधानी से ही तय होगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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एक नहीं पाँच सर्वे का सार, ‘घिर’ गए नीतीश कुमार

इस बार के चुनाव में नीतीश कुमार ने अपने पॉलिटिकल करियर का सबसे बड़ा दांव खेला है। बीजेपी से संबंध तोड़ने और मांझी को मुख्यमंत्री बनाने से भी बड़ा दांव है लालू और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाना। लालू से अलग होकर समता पार्टी की नींव रखना उनके लिए सबसे बड़ा (और सबसे पॉजिटिव भी) टर्निंग प्वाइंट था। जेपी के घोषित ‘चेले’ होने के कारण कांग्रेस-विरोध भी समझ में आता था। लेकिन अपनी जिन ‘भूलों’ की भरपाई के लिए इन्होंने फिर से लालू (और साथ में कांग्रेस) से संबंध जोड़ा है, वो कहीं और बड़ी भूल ना साबित हो जाए। कम-से-कम अब तक आए पाँच सर्वे, जिनमें देश के चार बड़े चैनल/एजेंसियों के साथ-साथ बीजेपी का आंतरिक सर्वे भी शामिल है, का सार तो यही है।

2010 में जेडीयू ने 141 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 115 सीटों पर उसे जीत मिली थी। तब बीजेपी के साथ गठबंधन था नीतीश का। दूसरी ओर लालू के राजद का गठबंधन रामविलास पासवान की लोजपा से था। तब लालू ने 168 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और केवल 22 पर उन्हें जीत मिली थी। कांग्रेस 2010 में एकमात्र ऐसी पार्टी थी जिसने सारी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे जीत मिली थी मात्र 4 सीटों पर। अब इस बार का समीकरण देखिए। इस बार ये तीनों एक साथ हैं और इनका सीट शेयर इस तरह है – जेडीयू 101 + राजद 101 + कांग्रेस 41 = 243 सीटें। यानि पिछले चुनाव में 115 सीटें जीतने वाली जेडीयू इस बार लड़ ही रही है 100 सीटों पर। कहने का मतलब ये है कि अगर 100 की 100 सीटें भी जीत जाय जेडीयू तब भी 15 सीटों का तो सीधा नुकसान हो ही रहा है नीतीश को। पर नीतीश ने इतनी ही ‘कुर्बानी’ दी होती तो एक बात थी। महागठबंधन के लिए उन्होंने अपनी 25 जीती हुई सीटें राजद को और 10 जीती हुई सीटें कांग्रेस को दी हैं। यानि 35 सीटिंग विधायकों की बलि नीतीश को चढ़ानी पड़ी और बदले में मिली राजद की केवल एक सीट। महागठबंधन को नीतीश भले ही वक्त की ‘जरूरत’ और उनकी पार्टी ‘मास्टर स्ट्रोक’ कह ले लेकिन वास्तव में ये ‘कमजोर’ और ‘हताश’ हो चुके नीतीश का ‘अक्श’ मात्र है।

अब एक नज़र अब तक के सर्वे पर डालें। सबसे पहले 9 सितंबर को इंडिया टीवी/सी वोटर्स का सर्वे आया। इस सर्वे के मुताबिक एनडीए को 94-110 सीटें, महागठबंधन को 116-132 सीटें और अन्य को 13-21 सीटें मिलनी चाहिएं। अगले ही दिन यानि 10 सितंबर को आए इंडिया टीवी/सिसरो के सर्वे में एनडीए को 120-130 सीटें, महागठबंधन को 102-103 सीटें और अन्य को 10-14 सीटें दी गई थीं। इसके बाद 15 सितंबर को एबीपी न्यूज/नीलसन का सर्वे सामने आया जिसमें एनडीए को 118, महागठबंधन को 122 और अन्य को 3 सीटें मिलने का अनुमान है। यहाँ तक मुकाबला कांटे का दिखता है। पहले सर्वे में महागठबंधन को बढ़त मिली थी, दूसरे में एनडीए को और तीसरे में दोनों लगभग बराबरी पर थे। कहानी में मोड़ इसके बाद हुए सर्वेक्षणों से आया।

18 सितंबर को आए जी न्यूज के सर्वे के मुताबिक 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में एनडीए को 140 सीटें मिलने जा रही हैं जबकि महागठबंधन महज 70 सीटों पर सिमट सकता है। शेष 33 सीटों पर कड़ा मुकाबला है। इस सर्वे के मुताबिक 50.8 फीसदी मतदाता भगवा रंग में रंगे हैं और नीतीश-लालू के साथ 42.5 प्रतिशत मतदाता ही हैं।

बीजेपी के आंतरिक सर्वे के अनुसार भी वो ‘आसानी’ से बहुमत हासिल करती दिख रही है। बीजेपी के अपने आकलन के मुताबिक एनडीए को 160 से 170 सीटें मिलनी चाहिएं। इस सर्वे के अनुसार महागठबंधन महज 70 सीटों पर सिमट रहा है और इन 70 सीटों में भी ज्यादातर सीटें लालू की होने जा रही हैं। इसका अर्थ ये है कि नीतीश कुमार हर तरह से ‘घिर’ गए हैं। यहाँ यह बताना जरूरी है कि बीजेपी ने इससे पहले भी आंतरिक सर्वे कराए थे जिनमें एनडीए पिछड़ा हुआ था। बीजेपी के अपने ‘ग्राफ’ के मुताबिक भी ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आता गया है, त्यों-त्यों बीजेपी बढ़त बनाने में सफल हुई है।

देखा जाय तो बीजेपी को बढ़त मिलने के कारण भी स्पष्ट हैं। मुलायम सिंह ने महागठबंधन से नाता तोड़कर और अब ‘थर्ड फ्रंट’ को आकार देकर बीजेपी को स्पष्ट तौर पर फायदा पहुँचाया है। इस थर्ड फ्रंट में पप्पू यादव के शामिल होने तथा तारिक अनवर को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में सामने लाने से भी महागठबंधन को नुकसान होगा। मांझी महादलितों के वोट में सेंध लगा ही चुके थे और अब ओवैसी ने सीमांचल में चहलकदमी कर महागठबंधन की ही चिन्ता बढ़ाई है। वामदलों को भी थोड़ा-बहुत जो मिलेगा, महागठबंधन के हिस्से का ही। इसीलिए सारे सर्वे को किनारे भी कर दें तो भी एनडीए बेहतर स्थिति में तो है ही।

जिस तरह रंगों से रंग निकलते चले जाते हैं और उनकी गिनती सम्भव नहीं, वैसे ही राजनीति में एक समीकरण से कितने समीकरण जुड़े होते हैं और उन समीकरणों से कितने नए समीकरण बन जाएंगे इसका आकलन पूरी तरह सम्भव नहीं। लेकिन इन पंक्तियों के लिखने तक बिहार में मुकाबला कांटे का  है और इस कांटे के मुकाबले में बढ़त फिलहाल एनडीए को है यानि उसकी राह के ‘कांटे’ दूर होते दिख रहे हैं। यहाँ तक कि नीतीश के साथी लालू और कांग्रेस के हिस्से में भी ‘कांटे’ अपेक्षाकृत कम हैं लेकिन नीतीश हर तरह से ‘कांटों’ में घिरे दिख रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पप्पू या ओवैसी, बिहार चुनाव का ‘एक्स’ फैक्टर कौन..?

एक ओर लालू-नीतीश-कांग्रेस का महागठबंधन, दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी की अगुआई में एनडीए, तीसरी ओर मुलायम की ‘थर्ड फ्रंट’ को लेकर कोशिशें… लेकिन बिहार चुनाव का ‘एक्स’ फैक्टर पप्पू या ओवैसी होने जा रहे हैं। मत होइए हैरान, समीकरण कुछ ऐसा ही कह रहे हैं। इस बार के चुनाव में ये दोनों ‘निर्णायक’ प्रभाव डाल सकते हैं और वो भी कोसी-पूर्णिया के इलाके से। कोसी और पूर्णिया प्रमंडल की सीटों पर एनडीए और महागठबंधन की नज़र जितनी अपने प्रदर्शन पर होगी, उससे कहीं अधिक पप्पू और ओवैसी पर होगी। ये दोनों मतदाताओं पर जितना असर छोड़ेंगे, उतनी ही बीजेपी की बांछें खिलेंगी और इन ‘सूरमाओं’ के धाराशायी होने पर जश्न महागठबंधन के खेमे में होगा। चलिए, समझने की कोशिश करते हैं कैसे..?

पप्पू यादव का राजनीतिक करियर बिहार में लगभग ढाई दशक पुराना है। इस अवधि में वे कई पार्टियों में आते-जाते रहे… विवादों से घिरते, केस झेलते और जेल जाते रहे… इन सबके बीच कुछ मौकों को छोड़ ज्यादातर चुनावों में स्वयं जीतते और पत्नी रंजीत रंजन को जिताते रहे… समानान्तर रूप से संगठन ‘युवा-शक्ति’ चलाते रहे… और अब ‘जनअधिकार’ नाम से उन्होंने अपनी पार्टी भी बना ली है। पार्टी बनाने से पहले भी वो खुद को समूचे बिहार के राजनीतिक पटल पर रखने की पुरजोर कोशिश करते रहे हैं। अब तो इस मामले में इतने ‘कांसस’ हो गए हैं वो कि ‘छोटे’ मसले पर भी ‘बड़ी’ बात बोलना उनकी आदत बनती जा रही है। उनकी तमाम कोशिशें अपनी जगह हैं और ये सच अपनी जगह कि उनकी पार्टी का ‘जन’ और ‘अधिकार’ दोनों बिहार में अगर कहीं है, तो फिलहाल कोसी और पूर्णिया के इलाके में ही। अभी पप्पू मधेपुरा से सांसद हैं और पत्नी रंजीत सुपौल से। पूर्णिया का प्रतिनिधित्व वो कई बार कर चुके हैं और अच्छी पैठ रखते हैं। कटिहार, अररिया, किशनगंज में भी उनकी चहलकदमी रही है। कुल मिलाकर वर्तमान पूर्णिया और कोसी कमिश्नरी पर उनका असर है, इसमें कोई दो राय नहीं।

अब बात ओवैसी की करें। कौन हैं ये ओवैसी जिनकी चर्चा बिहार में और वो भी पूर्णिया और कोसी के ‘सीमांचल’ कहलाने वाले इलाके में हो रही है और इसी इलाके से आनेवाले तस्लीमुद्दीन, तारिक अनवर और शाहनवाज जैसे मुस्लिम नेताओं की मौजूदगी के बावजूद और उनसे ज्यादा हो रही है..? देश के राजनीतिक फलक पर भले ही इस शख्स़ का ख़ास वज़ूद अभी ना दिखता हो लेकिन बहुत कम समय में मुस्लिम राजनीति का ‘चेहरा’ बनने में कामयाब तो ये हो ही गया है। फिलहाल आंध्रप्रदेश के हैदराबाद से सांसद असदउद्दीन ओवैसी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानि एआईएमआईएम के प्रमुख हैं। आंध्र में इनका परिवार कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार। इतने कम दिनों में मुसलमान इन्हें अपना ‘मोदी’ कहने लगे हैं तो ये अकारण नहीं है। कहने की जरूरत नहीं कि दिल्ली के औरंगजेब रोड का नाम डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर रखे जाने का विरोध करने वाले ओवैसी मुस्लिम कट्टरपंथ के हिमायती हैं। अपने बयानों और भाषणों से ‘उन्माद’ पैदा करने में फिलहाल इनकी कोई सानी नहीं है। अपनी इसी ‘काबिलियत’ और सुर्खियों में बने रहने की ‘कला’ को ओवैसी बिहार में भुनाना चाहते हैं। यही कारण है कि एनडीए जहाँ इनसे ‘उम्मीद’ लगाए बैठा है वहीं महागठबंधन इनमें अपनी ‘नाउम्मीदी’ की झलक देख रहा है।

कहने की जरूरत नहीं कि पप्पू और ओवैसी दोनों को बीजेपी का ‘मौन समर्थन’ है जो अब चीख-चीख कर ‘बोलने’ लगा है। कुशवाहा के अलग होने के बाद नीतीश लगभग उस झटके से उबर गए थे लेकिन मांझी का दिया जख़्म अभी ताजा है। ऐसे में उन्हें लालू के ‘माय’ समीकरण से बड़ी उम्मीद थी लेकिन पप्पू और ओवैसी उसी वोटबैंक में बहुत ‘घातक’ सेंध लगा रहे हैं। वैसे भी बीजेपी की सारी चिन्ता इस चुनाव में लालू के इर्द-गिर्द ही टिकी हुई है। नीतीश के साथ ‘विकास’ का जो टैग है उसका हल बीजेपी को मोदी के ‘विकास’ टैग से निकल जाने की उम्मीद है लेकिन लालू के ‘माय’ का किला उसे अभेद्य दिख रहा था। अब इसका हल पप्पू और ओवैसी से निकलता उसे दिख रहा है।

पप्पू का ताल्लुक कभी सपा, कभी एनसीपी तो कभी राजद से रहा है। अपने पूरे करियर में वे किसी दलविशेष के प्रति समर्पित नहीं रहे। या यूँ कहें कि उनकी महत्वाकांक्षा ने उन्हें समर्पित होने नहीं दिया। जिस लालू से वे राजद का ‘उत्तराधिकार’ मांग रहे थे उसकी सफलता या संघर्ष में कभी उनका याद रखने लायक कोई योगदान नहीं रहा। सब दिन अपनी राजनीति के केन्द्र में वो स्वयं रहे। पप्पू भी जानते थे कि जो चीज वो मांग रहे हैं वो उनकी है ही नहीं। उन्हें तो बस किसी बहाने लालू से ‘लड़ना’ था और जितना उन्हें लड़ना था उससे कहीं अधिक बीजेपी को उन्हें ‘लड़वाना’ था। ऐसा ही कुछ ओवैसी के साथ है। आरएसएस और बीजेपी को अपना दुश्मन नंबर वन बताने वाले ओवैसी बिहार में अपने आने का उद्देश्य बीजेपी को कमजोर करना बताते हैं। लेकिन ये बात बड़ी हास्यास्पद लगती है कि उनके आने से कोसी और पूर्णिया के ‘सीमांचल’ में बीजेपी को होनेवाले फायदे का जो गणित कोई बच्चा भी बता सकता है, उसे वो ख़ुद नहीं जान रहे हैं..!

अररिया, कटिहार, पूर्णिया और किशनगंज – इन चार जिलों से मिलकर बने ‘सीमांचल’ की आबादी तकरीबन एक करोड़ है जिसमें मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत है।  किशनगंज में तो 69 फीसदी आबादी मुस्लिमों की है। एक आकलन के मुताबिक सीमांचल की 21 सीटों पर ओवैसी स्पष्ट प्रभाव डाल सकते हैं। सीमांचल में आर्टिकल 371 के तहत रिजनल डेवलपमेंट काउंसिल की मांग वो यूँ ही नहीं उठा रहे हैं। जानकार तो यहाँ तक बता रहे हैं कि सीमांचल यानि कोसी-पूर्णिया डिविजन की 21 सीटों के अलावे  भागलपुर-मुंगेर डिविजन की 15 सीटों पर भी ओवैसी प्रभाव डाल सकते हैं। बताना जरूरी होगा कि बिहार की 10.50 करोड़ आबादी में 17 फीसदी मुस्लिम हैं और बिहार की कुल 243 विधान सभा सीटों में लगभग 50 सीटों के चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में बीजेपी से जो भी ‘डील’ हुई हो ओवैसी की, आंध्र और महाराष्ट्र में पैर पसार चुकने के बाद बिहार के इस चुनाव से  मुसलमानों का ‘बड़ा’ नेता बनने का अवसर भी वो खोना नहीं चाहते।

मुसलमानों के बाद इस इलाके में यादव बड़ी तादाद में हैं। सीमांचल के चार जिलों को छोड़ दें तो शेष जिलों – मधेपुरा, सहरसा और सुपौल – में यादव मुसलमान से कहीं ज्यादा हैं और हर लिहाज से प्रभावशाली हैं। सीमांचल में भी यादवों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। यादवों के इसी वोट बैंक पर पप्पू निगाह गड़ाए बैठे हैं। देखा जाय तो उनका दायरा एक अर्थ में ओवैसी से अधिक बड़ा हो जाता है कि ओवैसी जहाँ मुस्लिम बहुल सीटों पर ही छाप छोड़ेंगे वहीं पप्पू कमोबेश इस इलाके की हर सीट पर कुछ-ना-कुछ बटोर लेंगे। यादव के साथ ही कुछ मुस्लिम और कुछ अन्य जातियों के वोट भी उन्हें मिल सकते हैं। मुसलमान मुख्यमंत्री की बात पप्पू सोची-समझी रणनीति के तहत ही कर रहे हैं। लालू के ‘माय’ के समानान्तर वो अपना ‘माय’ खड़ा करना चाहते हैं।

ये भी सच है और तमाम दावों के बावजूद पप्पू और ओवैसी दोनों जानते हैं कि इन्हें सीटें इक्की-दुक्की ही मिल पाएंगी। यहाँ तक कि ना भी मिले। लेकिन ‘कोसी’ और ‘पूर्णिया’ की ‘कुंजी’ कमोबेश इन्हीं दोनों के हाथों में होगी। ‘प्रतीकात्मक’ असर ओवैसी का ज्यादा दिख रहा है तो ‘व्यावहारिक’ असर पप्पू का। लेकिन राजनीति दोनों में से किसी की ‘सार्थक’ और ‘सकारात्मक’ दिशा में नहीं है, ये कहने में कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए किसी को।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नरेन्द्र मोदी और नीतीश नहीं, अब भी लालू हैं बिहार की राजनीति की धुरी..!

बिहार चुनाव की घोषणा के बाद सारे दल अपनी-अपनी रणनीति को अन्तिम रूप देने में जी-जान से जुटे हैं। प्रथम चरण के नोटिफिकेशन के साथ-साथ ही भाजपा के 43 प्रत्याशियों की पहली सूची भी आ गई। अब कहाँ दिन का चैन और कहाँ रातों की नींद..! मतगणना तक सबके मन के तार कितने सुरों में बजेंगे, क्या मजाल कि कोई उसकी गिनती कर दे। बहरहाल, ऊपरी तौर पर सीटों का बंटवारा भले ही हो गया हो, अन्दरूनी तौर पर अभी भी दोनों ‘गठबंधन’ सीटों की समस्या सुलझाने में उलझे हुए हैं। जब तक ये तमाम दल अन्तिम रूप से किसी निष्कर्ष पर पहुँचें, क्यों ना हमलोग ये पड़ताल करें कि इस चुनाव में बिहार की राजनीति की धुरी कौन हैं – ‘केन्द्र’ के शीर्ष पर बैठे नरेन्द्र मोदी, ‘विकास’ की अग्निपरीक्षा दे रहे ‘(विकास ?)पुरुष’ नीतीश कुमार या अपने (और अपनी अगली पीढ़ी की भी) ‘अस्तित्व’ की अब तक की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहे लालू प्रसाद यादव..? ये सवाल सुनने में शायद आसान लगा हो आपको, लेकिन इसका जवाब एक झटके में दे दें तो मान जाऊँ मैं। अगर इस सवाल का जवाब ढूँढ़ लें तो हम बिहार में होने जा रहे चुनाव ही नहीं, बिहार को भी समझ लेंगे।

इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार की राजनीति को पिछले दस वर्षों से नीतीश कुमार ने डोमिनेट किया है। राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी के उदय से पहले तक बिहार में सब कुछ ‘नीतीशमय’ दिख रहा था। उनका ‘विकासपुरुष’ वाला टैग आमलोगों से लेकर देश-विदेश के मीडिया तक में खूब चला और ऐसा चला कि नीतीश ने पहले ‘विकास’ के नाम पर नरेन्द्र मोदी के ‘वैकल्पिक’ (याद कीजिए समग्र विकास के लिए ‘गुजरात मॉडल’ अच्छा कि ‘बिहार मॉडल’ की लड़ाई) और फिर ‘साम्प्रदायिकता’ के नाम पर ‘विपरीत’ ध्रुव के रूप में खुद को स्थापित करना चाहा। ये बताने और जताने की कोशिश भी हुई कि एनडीए में अटल के बाद की पीढ़ी में उनके जैसी स्वीकार्यता किसी की हो सकती है तो नीतीश की। यहाँ तक नीतीश और मोदी लगभग बराबर पर चल रहे थे कि अचानक तमाम अटकलों को खारिज करते हुए नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया और फिर तो उनकी ‘सुनामी’ ही चल पड़ी। हाँ, सुनामी ही कहना ठीक होगा क्योंकि मोदी जिस रफ्तार से आए और छाए वो लगभग कल्पनातीत था।

राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी के उदय और उनके साथ नीतीश के ‘अहं’ के टकराव की परिणति दो रूपों में हुई। पहली तो ये कि एनडीए से वे अलग हुए और बिहार में उनकी अकेले की सरकार बनी और दूसरी 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी भयानक हार हुई और अपनी ‘झेंप’ छिपाने के लिए उन्हें मांझी का चेहरा आगे करना पड़ा। यही वो बिन्दु है जहाँ से बिहार की राजनीति में एक के बाद एक कई परिवर्तन हुए।

लोकसभा चुनाव ने जहाँ बिहार में बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी होने का मौका दे दिया, वहीं रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा के लिए इसने ‘संजीवनी’ का काम किया। वे अचानक नीतीश को ‘ललकारने’ की स्थिति में आ गए। यही नहीं, लोकसभा चुनाव में जो मांझी अपने क्षेत्र तक में ठीक से मुकाबले में नहीं थे, वे नीतीश की ‘अचानक’ हुई ‘कृपा’ से मुख्यमंत्री बन बैठे और कुछ दिनों तक ‘औपचारिक’ अहसान मानने के बाद उन्हें ही आँख दिखाने लगे। ये सचमुच बुरा वक्त था नीतीश के लिए। इतना बुरा कि उन्हें अन्तत: उसी लालू के पास जाना पड़ा जिनके विरोध में कभी उन्होंने अपनी समता पार्टी खड़ी की थी। बाद में जेडीयू के बनने और एनडीए से अलग होने तक उनकी पूरी राजनीति इसी ‘लालूविरोध’ पर टिकी रही। अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए उसी लालू से हाथ मिलाना विकल्प रह गया था उनके लिए। खैर, लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा के उपचुनाव में इसका उन्हें फायदा भी मिला और नीतीश-लालू फिर से ‘छोटे भाई-बड़े भाई’ की भूमिका में आ गए।

नीतीश अब लालू की ‘शरण’ में थे। बदले परिदृश्य में नीतीश के लालू की ‘गोद’ में बैठने की बात हो रही थी और लालू मीडिया में और मंच से ‘लाड़’ जताते हुए ये बोलने से नहीं चूक रहे थे कि गोद में छोटा भाई नहीं बैठेगा को कौन बैठेगा। जरूरत लालू की भी कम नहीं थी। ‘जहर’ पीकर भी तेजप्रताप और तेजस्वी का ‘कैरियर’ बनाने के लिए उन्हें नीतीश को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकारना ही पड़ा। लेकिन जब आप सत्ता में रहते हुए किसी की मदद लेने को हाथ बढ़ाते हैं तो आपका हाथ अपने आप नीचे हो जाता है। यही नीतीश के साथ हुआ।

जो लालू और नीतीश को करीब से नहीं जानते हैं, वे भी वक्त की इस करवट को इन दोनों के चेहरे पर देख सकते हैं और फर्क समझ सकते हैं। नीतीश के चेहरे से जहाँ उनके बैकफुट पर होने का भाव झाँकता है वहीं लालू के चेहरे की पुरानी चमक बहुत हद तक लौट गई दिखती है। ‘स्वाभिमान रैली’ ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। वहाँ ना केवल लालू अन्तिम वक्ता थे बल्कि मौजूद भीड़ ने भी बता दिया कि ‘असर’ जो भी हो नीतीश का लेकिन ‘जादू’ तो लालू का ही चलता है बिहार में। वैसे भी तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद लालू का वोटबैंक उनके लिए जितना समर्पित है, उतना नीतीश का बनाया वोटबैंक नीतीश के लिए नहीं। यहाँ तक कि जिन महादलितों को सामाजिक और राजनीतिक ‘सुविधा’ देकर ‘अपना’ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी नीतीश ने, उनके नेता भी अब मांझी बन बैठे हैं।

नरेन्द्र मोदी एक नहीं चार बार आए बिहार और ‘रोजाना जंगलराज का डर’ दिखा गए और साथ में गुजरात का संबंध ‘यदुवंश’ से जोड़ गए, सुशील मोदी समेत बिहार भाजपा के तमाम नेता अगर नीतीश को घेर रहे हैं तो सबसे अधिक लालू से हाथ मिलाने को ही लेकर, सोनिया बिहार आती हैं और नीतीश के ‘नेतृत्व’ के साथ लालू के ‘सराहनीय योगदान’ को चिह्नित करना नहीं भूलतीं, पप्पू को अगर राजनीतिक विरासत चाहिए तो लालू की ही, बीजेपी अगर पप्पू की पीठ पर हाथ रखती है तो लालू का ही वोट काटने, ‘मुलायम’ को ‘कठोर’ बनाया जाता है तो समधी लालू से दूर करने, रामकृपाल यादव मंत्री और भूपेन्द्र यादव बिहार भाजपा के प्रभारी बनते हैं तो लालू को ही कमजोर करने, पासवान को ‘मौसम वैज्ञानिक’ कहे जाने की खीझ है तो लालू से ही, एनडीए में मनमाफिक सीटें ना मिलने पर मांझी के लिए जिनसे हाथ मिलाने की चर्चा होती है तो वो भी लालू ही हैं – क्या अब भी इसमें कोई संदेह है कि 1990 से लेकर अब तक यानि पच्चीस साल बाद भी लालू ही बिहार की राजनीति की धुरी हैं..?

लालू का ठेठ बिहारी अंदाज उन्हें औरों से अलग करता है। साधारण तबके से आनेवाला बिहारी खुद को उनके अधिक करीब पाता है। वे बिहार में पिछड़ों को राजनीति की मुख्यधारा में लाए इस सच्चाई को नकारना मुश्किल है। ये भूलना भी मुश्किल है कि रेल मंत्रालय को ज्यादातर मंत्री भले ही बिहार से मिले हों लेकिन उस रूप में भी किसी ने अलग छाप छोड़ी है तो वो लालू ही हैं। तमाम विसंगतियों और विरोधाभासों के बावजूद लालू की प्रासंगिकता बनी हुई है। रिक्शे पर जाकर और हाथी पर आकर वो ‘जेलयात्रा’ को भी महिमामंडित कर देंगे और आप ये पूछना भूल जाएंगे उनसे कि आखिर जेल गए क्यों थे। वैसे भी, इतिहास गवाह है कि बिहार की जनता ‘भूलने’ की ‘भूल’ करती रही है और इस बार भी वो कुछ लालू का भूलेगी, कुछ नीतीश का तो कुछ नरेन्द्र मोदी का। और अन्त में जो परिणाम आएगा उसे भी वो पाँच साल तक झेलेगी सब कुछ भूलकर।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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