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20 नवम्बर को गाँधी मैदान में, पाँचवीं बार मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे नीतीश कुमार

सर्वप्रथम नीतीश मंत्रिपरिषद की बैठक होती है | फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सरकारी आवास 7, सर्कुलर रोड में आयोजित जद(यू) विधान मंडल दल की बैठक होती है जिसमें 16वीं विधान सभा के जदयू के 71 विधायकों एवं 26 विधान पार्षदों की मौजूदगी में सर्वसम्मति से नीतीश कुमार को नेता चुना जाता है |

आगे जब नीतीश कुमार को महागठबंधन का नेता चुना जाता है तब राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद एवं नीतीश कुमार दोनों एक ही कार में बठकर राज्यपाल रामनाथ कोविंद से मिलकर इस्तीफा देने, 15वीं विधानसभा भंग करने एवं 16वीं विधानसभा के लिए नया मंत्रिमंडल बनाने का दावा पेश करने हेतु राजभवन की ओर कूच करते हैं | काफिले के आगे-आगे प्रमुख नेता होते हैं- जदयू के राष्ट्रीय अद्यक्ष शरद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, कांग्रेस नेता सी.पी.जोशी, जदयू अद्यक्ष वशिस्ठ नारायण सिंह, राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.त्यागी आदि |

नयी सरकार गठन हेतु राज्यपाल द्वारा 20 नवम्बर की तिथि निर्धारित की जाती है | तब तक के लिए केयर टेकर मुख्यमंत्री का दायित्व नीतीश कुमार को सौंपा जाता है | और जानिये, जहाँ नीतीश कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि कोई जीत के गुमान में न रहें, निष्ठापूर्वक काम करें | वहीं लालू प्रसाद ने कहा कि सरकार चलाने की अधिक जिम्मेवारी राजद पर है | और अन्त में महागठबंधन के सूत्रधार राष्ट्रीय नेता शरद यादव ने कहा कि महागठबंधन के तीनों घटक दलों को सदा एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए |

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मधेपुरा को दिया मोदी सरकार ने 20 हजार करोड़ का दीपावली उपहार……..!

लालू प्रसाद के रेल मंत्रित्व काल के दरमियान 2007 में ही रेल मंत्रालय द्वारा मधेपुरा में रेल विधुत इंजन कारखाना निर्माण हेतु श्रीपुर चकला गाँव के निकट तीन सौ एकड़ जमीन अधिग्रहण की गई लेकिन उनके रेल मंत्री से हटते ही कारखाना निर्माण की गति धीमी पड़ गई | विलम्ब का कारण रेलवे द्वारा राशि के अभाव का रोना ही सामने आता रहा |

बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने मधेपुरा और मढोरा को दिया दीपावली का बम्पर उपहार ! मधेपुरा को रेल विधुत इंजन कारखाना निर्माण हेतु 20 हजार करोड़ और मढोरा (छपरा) को डीजल इंजन कारखाना निर्माण हेतु 15 हजार करोड़ |

यह भी जानें कि मधेपुरा का रेल विधुत इंजन कारखाना बनाएगी फ़्रांस की ट्रांसपोर्ट कंपनी आल्सटाम और मढोरा का रेल डीजल इंजन कारखाना बनायेगा- जेनरल इलेक्ट्रिक कंपनी ऑफ अमेरिका |

फिलहाल इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ की अब तक की सर्वाधिक बड़ी सफलता मानी जा रही है |

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गाँधी मैदान में 20 नवम्बर को नीतीश सरकार का होगा शपथ-ग्रहण

बिहार विधानसभा चुनाव-2015 में भारी बहुमत मिलने के बाद पटना के गाँधी मैदान में महागठबंधन की सरकार शपथ लेगी जिसमें पाँचवीं बार मुख्यमंत्री बनेंगे नीतीश कुमार | शपथ-ग्रहण समारोह में मुख्यरूप से जो राजनेतागण उपस्थित होंगे उनमें प्रमुख हैं- जदयू अद्यक्ष शरद यादव, राजद अद्यक्ष लालू प्रसाद, कांग्रेस अद्यक्ष सोनिया गाँधी, उपाध्यक्ष राहुल गाँधी सहित दिल्ली के सी.एम.अरविन्द केजरीवाल, वेस्ट बंगाल से ममता बनर्जी, असम के सी.एम.तरुण गोगई, उडीसा के सी.एम.नवीन पटनायक एवं आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू आदि |

मधेपुरा अबतक द्वारा जब समाजसेवी एवं जदयू के वरिष्ठ नेता डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी से नीतीश सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह में सम्मिलित होने हेतु पटना जाने तथा मधेपुरा जिला से जीते हुए महागठबंधन के विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल किये जाने के बाबत पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मुझे यह सूट नहीं करता है क्योंकि 2010 के 27 नवम्बर को पटना गाँधी मैदान के शपथ-ग्रहण समारोह से लौटते ही मुझे दो बार वॉयपास सर्जरी से गुजरना पड़ा था | मैं मधेपुरा अबतक के माध्यम से ही सभी राजनेताओं को शुभकामनाएं अर्पित करता हूँ | साथ ही इस जिले से तीन मंत्रियों द्वारा शपथ लेने की कामना करता हूँ | वे तीन होंगे- श्री नरेन्द्र नारायण यादव जद(यू), तीन बार विधायक बनने वाले जद(यू) के दलित कोटा से प्रो.रमेश ऋषिदेव एवं सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाले राजद से दो बार विधायक बनने वाले प्रो.चन्द्रशेखर |

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मधेपुरा के डॉ.असीम प्रकाश कलकत्ता में हुए सम्मानित …..!

शहर की चमचमाती रोशनी में ही केवल प्रतिभा नहीं चमकती बल्कि गाँवों की गलियों के अंधेरे में भी प्रतिभा अपनी रोशनी बिखेरती है | तभी तो मुरलीगंज प्रखंड के जीतापुर गांव से सटे द्वारिका टोला के आदर्श दंपति श्रीमती अनिता-डॉ.जयप्रकाश के घर जन्मे डॉ. असीम प्रकाश कोलकाता में आयोजित दो दिवसीय (31Oct – 1Nov) ऑल इंडिया एशोसिएशन ऑफ़ ग्रस्ट्रालॉजी– 2015 के कांन्फ्रेंस में आमंत्रित किये गये |

डॉ.असीम प्रकाश ने Madhepura अबतक को बताया कि इस दो दिवसीय गेस्टोकान सम्मलेन में देश-विदेश से लगभग 500 डॉक्टर भाग लेने आये थे जिसमें गेस्ट्रोइनटेसटाइन एंड लीवर डिजीज पर विस्तार से चर्चाएँ हुईं | एम.बी.बी.एस एवं एम.डी. की डिग्री के अतिरिक्त रूस और अमेरिका से डिग्रीयाँ प्राप्त करनेवाले डॉ.असीम भला किससे पीछे रहने वाले थे | कानफ्रेंस के एकेडेमिक सेशन में हेपेटाइटिस पर सर्वोत्कृष्ट व्याख्यान देने के उपलक्ष्य में डॉ.प्रकाश को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया | इस धरती पुत्र डॉ.असीम के इस सम्मान से Madhepura  ही नहीं सम्पूर्ण बिहार सम्मानित एवं गौरवान्वित हुआ है |

मॉडर्न एप्रोच टू हेपेटाइटिस बी पर विचार व्यक्त करते हुए ख्यातिप्राप्त डॉ.विजय प्रकाश के सहयोगी डॉ.असीम प्रकाश ने कहा- यह बीमारी एड्स से भी अधिक खतरनाक है | इसके भयावह फैलाव का अंदाजा तो इसी से लगाया जा सकता है कि हर बीस लोगों में से एक इसी बीमारी की चपेट में है | उन्होंने कहा कि इस बीमारी का लम्बा इलाज है जिसे पूर्णत: ठीक होने में लगभग पाँच साल तक लग सकता है |

अन्त में अपनी नवविवाहिता डॉक्टर धर्मपत्नी डॉ.नेहा की उपस्थिति में डॉ.असीम प्रकाश ने मधेपुरा ( Madhepura ) अबतक से कहा कि लोग इस बीमारी के बारे में अभी भी अनभिज्ञ हैं | लोगों को पूरी तरह सजग करने की जरुरत है | जागरूक करने के बाबत उन्होंने लोगों से इस बीमारी के मूल कारणों को यूँ गिनाया- गलत निडिल का प्रयोग, संक्रमित ब्लड चढ़ाना एवं असुरक्षित प्रसव के साथ-साथ संक्रमित लोगों से यौन सम्बन्ध बनाना आदि | डॉ.असीम प्रकाश ने पुरुष से अधिक महिलाओं पर इस बीमारी के खतरे की चर्चा की और यह भी कहा कि अब छोटे-छोटे शहरों में भी इस बीमारी का फैलाव तेजी से होने लगा है |

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महागठबंधन की बड़ी जीत और भाजपा की बड़ी हार के पाँच बड़े कारण

इधर बिहार में महागठबंधन की महाजीत का महाजश्न हो रहा है, उधर भयभीत भाजपा में भूचाल आया हुआ है। महागठबंधन की जीत और भाजपा की हार के कारण ढूँढ़े जा रहे हैं। हर चुनाव में हारने वाली पार्टी अपने हारने और अपने प्रतिद्वंद्वी के जीतने का कारण ढूँढ़ती है और ढूँढ़ना चाहिए भी। इसीलिए भाजपा के ऐसा करने में कुछ नया नहीं है। नया इस बात में है कि सारे कारण बीच चुनाव में दिख गए थे लेकिन भाजपा देख नहीं पाई। गांव-गली की गंवई जनता ने जो देख लिया उसे भाजपा के ‘हाईटेक’ रणनीतिकार देखने से चूक गए। वे भूल गए कि लाख संचार-क्रांति हो जाए तब भी चुनाव के मैदान में आपका हाथ ‘माउस’ से ज्यादा जनता की नब्ज पर होना चाहिए। तो चलिए कारणों की ‘भीड़’ से निकाल कर पाँच बड़े कारणों को देखें।

  1. ‘विकास’ में ‘सामाजिक न्याय’ का तड़का

वर्षों की दूरी और तमाम मतभेदों को किनारे कर जिस दिन नीतीश और लालू एक साथ आए उसी दिन उन्होंने आधी लड़ाई जीत ली थी। वक्त की नजाकत देख जेपी के दोनों शिष्यों ने ना केवल कांग्रेस से हाथ मिलाया बल्कि अंत तक निभाया। समूचा एनडीए पूरे चुनाव में महागठबंधन को ‘महास्वार्थबंधन’, ‘महालठबंधन’ और ना जाने क्या-क्या कहता रहा लेकिन जनता की नज़र में ये परफेक्ट कम्बिनेशन साबित हुआ। जिसमें एक ओर नीतीश की ‘विकासपुरुष’ की निर्विवाद छवि थी तो दूसरी ओर लालू के ‘सामाजिक न्याय’ का मजबूत आधार। नीतीश और लालू के एक साथ आने से इस सामाजिक न्याय को 25 साल पहले वाली ‘धार’ मिल गई। ये केवल ‘माय’ तक सीमित नहीं रहा।

यही नहीं, मात्र 41 सीटों पर लड़ रही कांग्रेस ने भी महागठबंधन में बड़ी भूमिका निभाई जिसे नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता। कांग्रेस के साथ आने से ना केवल उसके राष्ट्रीय ‘कैनवास’ का सांकेतिक जुड़ाव महागठबंधन से हुआ बल्कि अगड़ी जातियों में भी थोड़ी-बहुत सेंधमारी करने में महागठबंधन को सफलता मिली।

  1. नीतीश का ‘चेहरा’ और तगड़ा टीमवर्क

नेताओं की बड़ी फौज के बावजूद मुख्यमंत्री पद के लिए एक अदद चेहरा ना ढूँढ़ पाना एनडीए की बड़ी कमजोरी साबित हुई। इस मामले में भाजपा का रवैया जरूरत से ज्यादा ‘डिफेंसिव’ रहा। उधर नीतीश कुमार का तपा-तपाया, हर तरह से आजमाया और सर्वमान्य ‘चेहरा’ था। नीतीश को नेता मानने और हर मंच से उन्हें अपना मुख्यमंत्री बताने में लालू ने सचमुच बड़े भाई जैसी ‘उदारता’ दिखाई। सोनिया और राहुल ने भी अपने भाषणों में नीतीश के नाम और काम को आगे रखा। टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव-प्रचार और पाँचों चरणों के मतदान तक कहीं भी महागठबंधन के टीमवर्क में कमी नहीं दिखी। जबकि एनडीए में ‘टीमवर्क’ नाम की चीज थी ही नहीं। टिकट में हिस्सेदारी को लेकर शुरू हुए पासवान, मांझी और कुशवाहा के आपसी मतभेद और खींचातानी ने अंतत: भाजपा की लुटिया डुबो दी।

सच तो ये है कि अपने साथियों को भाजपा ने उनकी ‘औकात’ से ज्यादा सीटें दीं। इससे उसकी अन्दरूनी कमजोरी दिखी। यही नहीं, आम जनता ने ये समझने में भी देर नहीं की कि पप्पू यादव भाजपा के द्वारा ‘स्पांसर्ड’ हैं, मुलायम सिंह के अचानक मुलायम पड़ने के पीछे स्पष्ट ‘डील’ है और ओवैसी का बिहार में अचानक कूद पड़ना भी ‘अकारण’ नहीं है।

  1. मोदी का ‘बड़े’ मंच से ‘छोटा’ व्यवहार

नरेन्द्र मोदी ने अपनी पार्टी द्वारा प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित होने से प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने तक और उसके बाद अपनी एक के बाद एक विदेश यात्राओं से दुनिया भर में जो सुर्खियां और तालियां बटोरीं और अपने कद में इजाफा किया उसे एकदम से दांव पर लगाने बिहार आ गए। वो नीतीश को हर मंच से अहंकारी कहते रहे लेकिन असल में अहंकार उनके बॉडी लैंग्वेज में था जिसे बिहार की जनता बहुत गहरे जाकर देख रही थी। उनके हाव-भाव से स्पष्ट दिख रहा था कि जिस नीतीश ने कभी प्रधानमंत्री पद के लिए मुझे चुनौती दी थी उसे मैं मुख्यमंत्री भी नहीं रहने दूंगा। उन्होंने बिहार चुनाव को इस कदर ‘पर्सनलाइज’ कर दिया कि भाजपा और एनडीए की जगह केवल वही दिख रहे थे। ये सचमुच दिखने की ‘अति’ थी। एक प्रधानमंत्री का और उसमें भी उनके कद के प्रधानमंत्री का एक राज्य के चुनाव लिए 26 रैलियां करना मन में कई तरह के सवाल खड़े करता है।

खैर, बात रैलियों तक रहती तो एक बात थी। रैलियों में उनका भाषण वो नहीं था जिसके लिए वो जाने जाते हैं। भाषण की भाषा और शैली तो हरगिज शोभा देने वाली नहीं थी। सबसे पहले उन्होंने नीतीश का ‘डीएनए’ खराब होने की बात कहकर और मुसीबत मोल लेने की शुरुआत कर दी। इसके बाद उन्होंने सवा लाख करोड़ का पैकेज दिया लेकिन जिस तरह से बोली लगा कर दिया उसने उनका और उस पैकेज दोनों का वजन कम कर दिया। इसी तरह राजद को बार-बार “रोजाना जंगलराज का डर” और जदयू को “जनता का दमन और उत्पीड़न” कहकर उन्होंने ‘हल्कापन’ दिखाया और अंतत: जनता का एक बड़ा ‘अस्वीकार’ उन्हें झेलना पड़ा। लोक -‘तांत्रिक’ वाली बात भी लोगों को हजम नहीं हुई। और हाँ, इन सबके बरक्स नीतीश ने अपने ‘संयम’ और ‘शालीनता’ से बिहार और बिहार के बाहर भी लोगों के दिल और दिमाग में जगह बनाई।

  1. आरक्षण, बीफ और पाकिस्तान में पटाखे

ऊपर के तीन कारण ही भाजपा की हार के लिए कम नहीं थे। जो कसर रही वो बीच चुनाव में मोहन भागवत के आरक्षण की समीक्षा वाले बयान, गिरिराज सिंह जैसे नेताओं का बेवजह ‘बीफ’ को मुद्दा बनाने और अंत में अमित शाह के “महागठबंधन के जीतने पर पाकिस्तान में पटाखे फूटेंगे” वाले बयान ने पूरी कर दी। इन नकारात्मक मुद्दों को बिहार की परिपक्व जनता ने खारिज कर पूरे देश में एक बड़ा मैसेज दिया। नीतीश और लालू ने इन मुद्दों से हवा को अपने पक्ष में करने में कोई चूक नहीं की। एनडीए जहाँ इन अनर्गल मुद्दों पर आक्रामक होने का ‘स्वांग’ करने में उलझा रहा वहीं महागठबंधन इन सबका जवाब देने के साथ-साथ ‘नीतीश के सात निश्चय’ को भी जनता के बीच पहुँचाने में सफल रहा। एनडीए की लाख कोशिशों के बावजूद लोगों के मन में ‘जंगलराज’ का डर तो नहीं बैठा लेकिन लालू वोटरों में ये डर बिठाने में कामयाब रहे कि बीजेपी को सत्ता दोगे तो आरक्षण छिन जाएगा।

  1. अगड़ों की ‘आग’ से पिछड़ों का पिघलना

भाजपा ने बड़ी रणनीति के तहत रामविलास पासवान, जीतनराम मांझी, उपेन्द्र कुशवाहा, रामकृपाल यादव, भूपेन्द्र यादव, मुकेश सहनी जैसे प्रतीकों को खड़ा किया। उसे उम्मीद थी कि ऐसा कर वो दलित-महादलित और पिछड़े-अतिपिछड़े वोटों में बड़ी सेंधमारी कर पाएगी। और तो और प्रधानमंत्री को पहले पिछड़ा और फिर अतिपिछड़ा बताने की कोशिश भी की गई। लेकिन इन तमाम कोशिशों पर भाजपा के ‘अगड़े’ नेताओं का नीतीश-लालू के खिलाफ उग्र से उग्रतर होते जाना और ‘अपशब्दों’ का धड़ल्ले से प्रयोग करना भारी पड़ गया। अगड़ों ने आग क्या उगली, पिछड़े पिघलकर महागठबंधन से जा मिले।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू एवं नीतीश कुमार को बधाइयों का ताँता ……!!

बिहार में अगले पाँच साल ! केवल और केवल नीतीश कुमार !! ऐसी अदभुत जीत के लिए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित महागठबंधन के सभी विजेताओं को डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी की कोटि-कोटि हार्दिक बधाई !

इस नतीजे का सही अर्थ बिहार के अन्दर और बाहर के लोगों की समझ में यही आया है कि ये सिर्फ और सिर्फ विकास,सुशासन और साम्प्रदायिक सदभाव की जीत है – केवल कहने के लिए है कि भाजपा का अहंकार ही उसे खा गया |

यह सार्वभौमिक सत्य है कि यदि कोई राजनेता सृजन के कार्यों में ध्यानमग्न होकर उसकी गहराइयों में पूर्णरूपेण उतरने लगता है तो उस विशेष कालावधि के लिए उसकी सारी ऊर्जा जनहित की योजनाओं को धरती पर उतारने में समाहित होने लगती है और वही राजनेता अहंकारमुक्त होने लगता है |

राजनीति के फिसलन भरे रास्ते पर बिना फिसले चलते रहना उतना ही कठिन है जितना तेज धारवाली नंगी तलवार पर नंगे पैर चलना कठिन है | फिरभी वैसे कठिन रास्ते पर चलकर “ बिहार के स्वाभिमान” और “ माय समीकरण” के उत्साह को चर्मोत्कर्ष पर पहुँचाकर बिहार वासियों के दिल को जीतने के लिए राजनेता द्वय नीतीश-लालू सहित पूरी टीम को हार्दिक बधाई |

नीतीश जी ! आप बिहार की राजनीति को अगले पाँच वर्षो तक नित्य नया संस्कार देते रहेंगे ताकि किसी अपनों को भी छठे वर्ष यह कहने का कोई अवसर ना मिले कि ‘आप’ को भी अहंकार छू गया बल्कि बिहार की सुशासनप्रिय तथा सांप्रदायिक सदभाव में विश्वास करने वाली विकासोन्मुखी जनता सहित राष्ट्रीय पार्टियों के अध्यक्ष – शरद यादव, लालू प्रसाद, सोनिया गाँधी….. यहाँ तक कि मुलायम सिंह यादव भी सम्मिलित रूप से यही कहने लगे…. और कहते रहे कि –

इस चन्द्रगुप्त की गद्दी पर
बैठो नीतीश तुम बार-बार !
इस बिहार की लोकभूमि पर
आना नीतीश तुम बार-बार !!

– डॉ.मधेपुरी की कलम से……

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मोदी-शाह की करारी हार, नीतीश-लालू का हुआ बिहार

बिहार में लालू-नीतीश की जोड़ी मोदी और शाह पर बहुत भारी पड़ी। चुनाव में ना मोदी का भाषण काम आया, ना शाह का मैनेजमेंट। प्रधानमंत्री ने चुनाव को “केन्द्र बनाम बिहार” बनाया, पूरे कैबिनेट को प्रचार में झोंका, अपने कद तक को दांव पर लगा दिया लेकिन हाथ कुछ ना आया। एनडीए को जैसी हार और महागठबंधन को जैसी जीत मिली उससे तमाम सर्वे और एग्जिट पोल धाराशायी हो गए।

बिहार चुनाव में महागठबंधन अत्यन्त भव्य और ऐतिहासिक जीत दर्ज करने जा रही है। उसे 243 में से 178 सीटें मिलने जा रही है। एनडीए महज 59 सीटों पर सिमटती दिख रही है। 80 सीटों के साथ राजद सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरी है और इस तरह अपने राजनीतिक जीवन की निर्णायक लड़ाई लालू प्रसाद यादव ने बड़े शान से जीती है। ‘चेहरा’ और ‘सेहरा’ नीतीश कुमार का रहा लेकिन ‘मैन ऑफ द मैच’ लालू रहे, इसमें कोई दो राय नहीं।

भाजपा और उसके तमाम सहयोगी दलों ने पूरे चुनाव में नीतीश पर सबसे अधिक तंज इस बात के लिए कसा कि उन्होंने लालू और कांग्रेस (खासकर लालू) के साथ गठबंधन किया। नीतीश के घोर समर्थक भी दबी जुबान से कहते रहे कि लालू के साथ खड़ा होना उनकी राजनीतिक सेहत के लिए ठीक नहीं। उन्हें अकेले अपने दम पर चुनाव लड़ना चाहिए था। लेकिन बिहार की जनता ने जिस तरह अपने मत से महागठबंधन को निहाल किया है उससे तमाम आलोचक बस बगलें झाँक रहे हैं।

लालू, नीतीश और कांग्रेस ने टिकट बंटवारे से लेकर चुनाव-प्रचार तक बहुत समझदारी से काम लिया। एनडीए एक ओर मोदी के ‘आभामंडल’ से उपजे अतिआत्मविश्वास का शिकार हुआ तो दूसरी ओर सहयोगी दलों की खींचातानी में उलझा रहा। उधर महागठबंधन ने एक-एक कदम बड़ी सावधानी से रखा और लगातार ‘टीमवर्क’ किया। जेडीयू ने अपनी वो सीटें उदारता से कुर्बान कीं जिन पर राजद और कांग्रेस भाजपा से ज्यादा बेहतर लोहा ले सकती थीं। इसका लाभ सामने है। आज भले ही जेडीयू की अपनी सीटें कम हो गई हों लेकिन नीतीश की मुहर महागठबंधन की सारी 179 सीटों पर लगी हुई है।

2010 में जेडीयू की 115, राजद की 22 और कांग्रेस की 4 सीटें थीं। इस बार जेडीयू को 71, राजद को 80 और कांग्रेस को 27 सीटें मिल रही हैं। लालू-नीतीश का साथ पाकर मुरझायी कांग्रेस में एक बार फिर जान आ गई। एनडीए की बात करें तो भाजपा और उसके तमाम सहयोगी दल मिलकर भी अकेले लालू या अकेले नीतीश से पीछे हैं। भाजपा को छोड़ दें तो पासवान, मांझी और कुशवाहा की सीटें मिलाकर भी कल तक ‘बेचारी’ कही जाने वाली कांग्रेस तक से चौथाई से भी कम रह गई है। पिछली बार नीतीश के साथ भाजपा को 91 सीटें मिली थीं। इस बार उसका खाता 53 पर बन्द हो रहा है। लोजपा को 3, रालोसपा को 2 और हम को महज 1 सीट मिल रही हैं। पिछली बार भी लोजपा को 3 ही सीटें मिली थीं। हम और रालोसपा तब अस्तित्व में नहीं थीं। अन्य के खाते में 6 सीटें जाती दिख रही हैं। पूरा परिणाम आने पर ये सीटें हो सकता है और कम रह जाएं।

कोसी की बात करें तो यहाँ की 13 में से 12 सीटों पर महागठबंधन का कब्जा होने जा रहा है। आलगनगर से नरेन्द्र नारायण यादव, सुपौल से बिजेन्द्र प्रसाद यादव, सिमरी बख्तियारपुर से दिनेश चन्द्र यादव जीत का परचम फहरा रहे हैं। एनडीए की ओर से बस नीरज कुमार बबलू (छातापुर) ही मैदान में टिक पाए हैं। कोसी या सीमांचल में पप्पू फैक्टर की चर्चा पूरे चुनाव के दौरान रही। दावा तो पप्पू पूरे बिहार पर कर रहे थे। लेकिन उनके तमाम उम्मीदवार महागठबंधन के झोंके में उड़ गए। ज्यादातर सीटों पर उनके उम्मीदवार हजार का आंकड़ा छूने को भी तरस गए। महागठबंधन का साथ बीच राह में छोड़ने वाले मुलायम भी पूरे परिदृश्य से जैसे अदृश्य हो गए।

कुल मिलाकर ये कि बिहार ने केन्द्र के लिए भले ही नरेन्द्र मोदी को चुना हो लेकिन बिहार के लिए उसका ऐतबार अभी भी नीतीश कुमार पर है। ‘विकासपुरुष’ के काम को लोगों ने सम्मान दिया। ये साफ हो गया कि मतदान में महिलाओं की लम्बी कतार नीतीश के लिए थी। महादलितों ने भी मांझी से अधिक नीतीश को तरजीह दी। कमोबेश सभी जातियों के वोट महागठबंधन को मिले। मुस्लिम पूरी तरह उसके पक्ष में एकजुट रहे।

पूरे चुनाव में नीतीश ने जो शालीनता बरती उससे उनका कद राष्ट्रीय स्तर पर और बढ़ा है। लालू ने भी अपना खोया आत्मविश्वास इस चुनाव से हासिल किया है। कांग्रेस को भविष्य की राजनीति का सूत्र मिल गया। एनडीए के लिए अब बंगाल और उत्तर प्रदेश की डगर बहुत मुश्किल हो गई। मोदी और उनकी ‘अति आक्रामक’ टीम को अब समझना पड़ेगा कि सभाओं में भीड़ जुटना और भीड़ का वोट में तब्दील होना अलग-अलग बात है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में ‘कमल’ की बहार हो… पर नीतीशे कुमार हो..!

हेडलाईन पढ़कर जरूर चौंके होंगे आप। ये हेडलाईन जेडीयू के चुनाव-गीत “बिहार में बहार हो, फिर से नीतीशे कुमार हो” में ‘थोड़े’ पर ‘बहुत बड़े’ परिवर्तन के बाद बनी है। अगर कहा जाय कि रिकॉर्ड 60 प्रतिशत मतदान के साथ सम्पन्न हुए बिहार चुनाव के पाँचवें और अन्तिम चरण के उपरान्त तमाम न्यूज़ चैनलों पर दिखाए गए एग्जिट पोल का यही ‘वास्तविक’ निचोड़ है, तो गलत ना होगा। 2010 की तरह जेडीयू और भाजपा ने इस बार भी साथ चुनाव लड़ा होता तो 8 नवंबर को निकलकर आनेवाली तस्वीर बहुत कुछ वैसी ही दिखती जैसी हेडलाईन के साथ दी गई तस्वीर दिख रही है। जी हाँ, यही वो तस्वीर है जो बिहार की जनता देखना चाहती थी। केन्द्र में नरेन्द्र मोदी और बिहार में नीतीश कुमार। दोनों साथ-साथ। वहाँ भी और यहाँ भी।

बिहार की जनता का ‘द्वंद्व’ एग्जिट पोल से जैसे झाँक रहा है। हालाँकि सारे एग्जिट पोल का औसत निकाल कर देखें तो पलड़ा महागठबंधन का भारी है लेकिन अन्तिम समय में कौन बाजी मार ले जाएगा, कहना मुश्किल है। भोली-भाली जनता अब ‘चतुर’ हो गई है। उसने पूरी ‘पिक्चर’ को कुछ इस तरह निर्देशित किया है कि ‘सस्पेंस’ आखिरी दृश्य में ही खुलेगा। और वो ‘सस्पेंस’ उसके… केवल उसके मन का होगा… सारे नेता चाहे जो शोर मचाते रहें। बहरहाल, चलिए देखें कि एग्जिट पोल कह क्या रहे हैं।

एबीपी न्यूज़/नीलसन के अनुसार महागठबंधन को 130, एनडीएको 108 और अन्य को 5 सीटें मिल रही हैं। यानि स्पष्ट तौर पर महागठबंधन की सरकार बन रही है। एक और प्रमुख चैनल इंडिया टीवी/सी-वोटर्स ने महागठबंधन को 112-131, एनडीए को 101-121 और अन्य को 6-14 सीटें दी हैं। यानि सरकार महागठबंधन की बन रही है। न्यूज़ नेशन का आकलन भी कुछ ऐसा ही है। उसने अपने एग्जिट पोल में महागठबंधन को 125, एनडीए को 114 और अन्य को 4 सीटें दी हैं। न्यूज़ एक्स/सीएनएक्स ने महागठबंधन की जीत और बड़े फासले से होने की बात कही है। इस एग्जिट पोल में महागठबंधन को 130 से 140 सीटें मिल रही हैं, जबकि एनडीए के खाते में 90 से 100 सीटें ही जा रही हैं। अन्य को 7 सीटें मिल सकती हैं। टाइम्स नाउ/सी-वोटर के मुताबिक भी नीतीश की अगुआई वाला महागठबंधन आगे है। इस एग्जिट पोल में महागठबंधन को 112 से 132 सीटें मिलने का अनुमान है, भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को 101 से 121 सीटें मिल सकती हैं और अन्य के खाते में 6 से 14 सीटें जाने की बात कही गई है।

एबीपी न्यूज़, इंडिया टीवी, न्यूज़ नेशन, न्यूज़ एक्स और टाइम्स नाउ – इन पाँच चैनलों के मुताबिक महागठबंधन की सरकार बन रही है। इसके बरक्स एक और तस्वीर है जो न्यूज़ 24/टूडेज चाणक्या के एग्जिट पोल से निकल कर आई है। इस एग्जिट पोल के आंकड़े चौंकाने वाले हैं। इसमें एनडीए को 155, महागठबंधन को 83 और अन्य को 5 सीटें दी गई हैं। यानि पूर्ण बहुमत के साथ भाजपा के नेतृत्व में सरकार। बता दें कि दिल्ली चुनाव में ‘आप’ को दो तिहाई बहुमत की भविष्यवाणी भी न्यूज़ 24/चाणक्या ने ही की थी और वो सच साबित हुई थी।

अब एक नज़र आज तक पर दिखाए गए इंडिया टुडे/सिसरो के एग्जिट पोल पर डालें। इसमें एनडीए को 113 से 127, महागठबंधन को 111 से 123 और अन्य को 4-8 सीटें दी गई हैं। वोटों के प्रतिशत की बात करें तो इस एग्जिट पोल में एनडीए को 41, महागठबंधन को 40 और अन्य को 19 प्रतिशत वोट मिल रहे हैं। कहने का मतलब ये कि कड़े मुकाबले में एनडीए थोड़ा आगे है।

इस तरह इन सात चैनलों के एग्जिट पोल में पाँच के अनुसार महागठबंधन की सरकार बन रही है और दो के अनुसार भाजपा की अगुआई में नई सरकार बनने जा रही है। इन सभी एग्जिट पोल का औसत निकालें तो महागठबंधन को 119, एनडीए को 117 और अन्य को 7 सीटें मिलती हैं। यानि मुकाबला सचमुच काँटे का है। ये भी ध्यान रखा जाना चाहिए कि कई सीटों पर वोटों का अन्तर बहुत कम होने की सम्भावना है। इस कारण भी ‘सस्पेंस’ अंत तक बना रहेगा।

8 नवंबर को चाहे जो हो, कम-से-कम एग्जिट पोल में तो महागठबंधन ने एनडीए को पटखनी दे ही दी है। अभी जितने सर्वे में महागठबंधन को आगे बताया गया है, सितम्बर-अक्टूबर के लगभग उतने ही प्री-पोल सर्वे में एनडीए की बढ़त थी।

चलिए, हमने सारे एग्जिट पोल को जान लिया। सीटों का जोड़-घटाव, गुणा-भाग कर लिया। लेकिन क्या इन सारे एग्जिट पोल में केवल सीटों का आंकड़ा ही देखा जाना चाहिए..? क्या इन सारे एग्जिट पोल से बिहार की जनता का ‘द्वंद्व’ नहीं झाँक रहा है..? क्या ये नहीं लग रहा कि बिहार भले ही नरेन्द्र मोदी में ‘सम्भावना’ देख रहा है लेकिन नीतीश कुमार में उसकी ‘आस्था’ अभी भी है। क्या ऊपर दी गई तस्वीर ही वो सच्चाई नहीं है जिसे दरअसल बिहार की जनता देखना चाहती थी..? अगर 2010 की तरह जेडीयू और भाजपा ने चुनाव साथ लड़ा होता तो शायद किसी एग्जिट पोल की जरूरत ही ना पड़ती। परिणाम सबको पता होता। खैर छोड़िए… चलिए 8 नवंबर का इंतजार करते हैं और देखते हैं कि होता क्या है..? समय बड़ा बलवान होता है, वो कब क्या कराएगा, कौन जानता है..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पाँचवें चरण में ‘माय’ की माया… किसके हिस्से में धूप, किसे मिलेगी छाया..?

बिहार चुनाव का आज पाँचवां और अंतिम चरण है। मतदान केन्द्रों पर लम्बी कतारें लगी हैं। शाम के 5 बजते ही न्यूज चैनलों पर एक्जिट पोल, विश्लेषण और मंथन का दौर शुरू हो जाएगा। नेता हों, कार्यकर्ता हों या आम जनता – सबकी निगाहें 8 नवंबर पर टिक जाएंगी। राजनीति के गलियारों में सम्भावनाओं और समीकरणों को लेकर गहमागहमी शुरू हो जाएगी। नई सरकार किसकी होगी, उस सरकार में कौन-कौन से चेहरे होंगे, किसका कद बुलंदियों पर होगा और कौन अपनी खोई साख को रोएगा – अब बातें इसी पर होंगी। फिलहाल एक नज़र पाँचवें चरण की खास बातों पर डालें।

पाँचवें चरण में नौ जिलों की 57 सीटों पर मतदान हो रहा है। सीमांचल और मिथिलांचल के ये नौ जिले हैं – मधुबनी, सुपौल, अररिया, किशनगंज, पूर्णिया, कटिहार, मधेपुरा ( Madhepura ) , सहरसा और दरभंगा। 57 सीटों के लिए 58 महिलाओं सहित कुल 827 उम्मीदवार मैदान में हैं। इनके भाग्य का फैसला एक करोड़ 55 लाख 36 हजार 660 मतदाता करेंगे। मतदान केन्द्रों की कुल संख्या 14061 है जिनमें 5518 ‘क्रिटिकल’ और 276 नक्सल प्रभावित केन्द्र हैं।

इस चरण में बिहार कैबिनेट के कई मंत्रियों की साख दांव पर लगी है। बिजेन्द्र प्रसाद यादव (सुपौल), नरेन्द्र नारायण यादव (आलमनगर), लेसी सिंह (धमदाहा), बीमा भारती (रूपौली), नौशाद आलम (ठाकुरगंज) और दुलालचंद गोस्वामी (बलरामपुर) की किस्मत आज ईवीएम में बंद हो जाएगी। इस चरण के अन्य दिग्गज उम्मीदवारों में बिहार विधान सभा में विपक्ष के नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी (अलीनगर), पूर्व मंत्री एवं जगन्नाथ मिश्र के बेटे नीतीश मिश्रा (झंझारपुर), एआईसीसी के सचिव शकील अहमद खान (कदवा), बिहार भाजपा के मुख्य प्रवक्ता विनोद नारायण झा (बेनीपट्टी), पूर्व सांसद एवं जदयू के उम्मीदवार दिनेश चन्द्र यादव (सिमरी बख्तियारपुर), पूर्व मंत्री एवं इस बार भाजपा के उम्मीदवार रवीन्द्र चरण यादव (बिहारीगंज), लालू यादव के बेहद खास भोला यादव (बहादुरपुर) एवं एआईएमआईएम के प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल ईमान (कोचाधामन) प्रमुख हैं।

2010 में इस चरण की 57 सीटों में 24 जेडीयू, 20 भाजपा, 8 राजद और 5 कांग्रेस के खाते में गई थीं। बदले समीकरणों के तहत इस बार एनडीए की ओर से भाजपा के 38, लोजपा के 11, रोलोसपा के 5 और ‘हम’ के 3 उम्मीदवार मैदान में हैं। महागठबंधन की ओर से जेडीयू के 25, राजद के 21 और कांग्रेस के 11 उम्मीदवार खड़े हैं। इन दोनों गठबंधनों के अतिरिक्त पप्पू यादव की जन अधिकार पार्टी के 40 और ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम के 6 उम्मीदवार भी मैदान में हैं।

बिहार में बहुचर्चित ‘माय’ समीकरण के लिहाज से पाँचवां चरण खासा महत्वपूर्ण है। इस ‘माय’ समीकरण को लालू ने और लालू को ‘माय’ समीकरण ने एक अलग पहचान दी और इस बार इस समीकरण के चलने की जरूरत लालू (और उनके महागठबंधन के लिए) हर बार से ज्यादा है । अगर पप्पू और ओवेसी कई सीटों पर मुकाबले को तिकोना ना बना रहे होते तो लालू-नीतीश के महागठबंधन के लिए यह सबसे ‘सुरक्षित’ चरण था। उदाहरण के तौर पर मधेपुरा ( Madhepura )सीट को लें। ‘माय’ समीकरण को ध्यान में रख शायद ही इससे अनकूल कोई सीट महागठबंधन के लिए हो। लेकिन पप्पू के उम्मीदवार के भरोसे भाजपा इस सीट पर भी खुद को मुकाबले में ले आई है।

पाँचवें चरण में पप्पू यादव और असदउद्दीन ओवैसी (खासकर पप्पू यादव) अगर बड़े ‘वोटकटवा’ साबित नहीं हुए तो महागठबंधन के लिए विशेष चिन्ता की बात नहीं। लेकिन एनडीए ने महागठबंधन के ‘गढ़’ में सेंधमारी कर दी है, इससे हरगिज इनकार नहीं किया जा सकता। हाँ, ये सेंधमारी कितनी बड़ी है ये हम 8 नवंबर को जान पाएंगे। इसी ‘सेंधमारी’ पर सीमांचल, मिथिलांचल और ‘माय’ समीकरण की राजनीतिक दिशा तय होगी और कदाचित् बिहार की राजनीतिक दिशा भी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू ने अटल को ‘अच्छा’ कह ‘प्रणाम’ किया और ‘साम्प्रदायिक’ मोदी को कहा ‘घटिया’

महागठबंधन के नेता और राजद के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव मधेपुरा विधान सभा क्षेत्र के महागठबंधन के प्रत्याशी प्रो. चन्द्रशेखर के प्रचार के लिए स्थानीय शिवनंदन प्रसाद मंडल उच्च विद्यालय परिसर में 12.55 बजे अपराह्न में मंच पर आए और अपने 20 मिनट के भाषण में पाँच बार नरेन्द्र मोदी का नाम लेते हुए कहा कि आज तक ऐसा ‘घटिया’ प्रधानमंत्री नहीं देखा। वहीं पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को बहुत अच्छा कहते हुए उन्होंने मंच से ही प्रणाम निवेदित किया। अपने भाषण में मोदी को ‘साम्पदायिक’ कहने के साथ-साथ लालू ने भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को एक बार फिर ‘नरभक्षी’ कहा और संघ प्रमुख मोहन भागवत की ‘धुनाई’ में भी कोई कसर नहीं छोड़ी।

उपस्थित युवाओं एवं मतदाताओं से लालू ने अपने खास अंदाज में (और आवाज मोटी कर) कहा कि नरेन्द्र मोदी के सामने कोई झूठ बोलने और ‘जुमला’ पढ़ने में टिक नहीं सकता। उन्होंने मोदी की नकल भी उतारी और लोगों से पूछा कि क्या विदेश से काला धन आया..? क्या एक-एक आदमी के खाते में पन्द्रह-पन्द्रह लाख रुपये आए..? लालू ने चुटकी लेते हुए कहा कि यह सुनकर तो हम भी हिसाब करने लगे और जोड़ कर देखा तो परिवार में ‘एक करोड़ पचहत्तर लाख’ का हिस्सा पड़ा।

इसी तरह हँसाते हुए लालू ने लोगों से महागठबंधन को ‘हरपेट’ कर वोट देने की अपील की और विश्वास दिलाया कि ‘नरेन्दर’ मोदी को दिल्ली से भी भगा देंगे। और हाँ, लालू ने पूरे भाषण के दौरान दो बार कहा कि नीतीश महागठबंधन के नेता हैं और हमारे मुख्यमंत्री वही बनेंगे।

उधर मधेपुरा में डेरा डाले मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आलमनगर, बिहारीगंज, धमदाहा आदि विधान सभा क्षेत्रों में चुनावी सभाएं कीं। वो अपने भाषणों में सरकार बनने पर महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण देने पर जोर देते हैं और याद दिलाते हैं कि पंचायत चुनाव में महिलाओं को 50 प्रतिशत आरक्षण देकर ‘शुरुआत’ हमने ही की थी। नीतीश कहते हैं कि मेरी घोषणाएं स्थायी होती हैं… प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की तरह ‘हवा-हवाई’ नहीं।

जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव भी मधेपुरा सहित कोसी के विभिन्न क्षेत्रों में ताबड़तोड़ सभाएं कर रहे हैं। वो अपनी सभाओं में कहते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने देश में ‘अघोषित इमरजेंसी’ का माहौल पैदा कर दिया है। यही कारण है कि सम्पूर्ण देश के कवि, लेखक, इतिहासकार, वैज्ञानिक और कलाकार अपने-अपने सम्मान को वापस कर रहे हैं। शरद साम्प्रदायिक ताकतों को कमजोर करने तथा नीतीश कुमार के विकास के कार्यक्रमों को आगे बढ़ाने में सहयोग करने की अपील करते हैं।

कुल मिलाकर यही कि मोदी ने मधेपुरा में रैली कर वहाँ के माहौल पर जो असर डाला है उसे बेअसर करने में ये तीनों कोई कसर नहीं छोड़ रहे। अब जनता क्या करती है, जनता जाने।

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