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राजनीति का ‘मुखौटा युग’ और बिहार चुनाव

हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी / जिसको भी देखना हो कई बार देखना – निदा फ़ाज़ली ने ये पंक्तियां आज के आदमी के लिए कही हैं पर ये आज के समाज और पूरे समय के लिए भी उतनी ही मौजू हैं और सबसे अधिक मौजू हैं आज की राजनीति के लिए। आज राजनीति ऐसी हो चुकी है कि आप जो चेहरा लेकर सुबह निकलते हैं, शाम उसी चेहरे के साथ वापस नहीं आते। आपके कितने चेहरे हैं और कितने हो सकते हैं ये स्वयं आप भी नहीं जान रहे होते। ये स्थिति सचमुच बहुत खतरनाक है। आज हम मुखौटों के युग में रह रहे हैं और मुखौटे ही हमारा चेहरा हैं। बस जरूरत के अनुसार आप अपना मुखौटा बदलते रहिए, गिनने की क्या जरूरत है कि आपके भीतर आदमी दस-बीस हैं या उससे भी ज्यादा।

बहरहाल, मुद्दे पर आते हैं और बिहार चलते हैं जहाँ ‘मुखौटों’ के लिए सबसे माकूल मौसम चल रहा है अभी। कहने की जरूरत नहीं कि मुखौटों की फसल चुनाव के मौसम में लहलहाने लगती है। क्या पार्टी, क्या नेता, क्या कार्यकर्ता सभी ताबड़तोड़ मुखौटा उपजाते दिख जाएंगे आपको। पर मजे की बात तो ये है कि मुखौटों की भीड़ में सबसे बड़ा मुखौटा ये होता है कि मैं तो बिना मुखौटे के खड़ा हूँ, आप तो बस सामनेवाले को पकड़िए जिसने फलां मुखौटा पहना हुआ है।

अगर कहा जाय कि बिहार में असली लड़ाई ‘मुखौटे’ को लेकर है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इधर महागठबंधन शोर मचा रहा है कि भाजपा पार्टी नहीं, आरएसएस का मुखौटा है केवल तो उधर एनडीए चिल्ला-चिल्ला कर बोल रहा है कि नीतीश तो मुखौटा हैं केवल, पीछे लालू का जंगलराज पार्ट-2 है। अब ये जनता पर है कि वो किसके मुखौटे को उतारेगी। जिसका मुखौटा उतरेगा वो मैदान से बाहर।

लालू लम्बे समय से भाजपा पर संघ का मुखौटा होने का आरोप लगाते रहे हैं। और अब भाजपा से रिश्ता टूटने के बाद नीतीश भी उनके सुर में सुर मिलाने लगे हैं। संघप्रमुख मोहन भागवत ने बीच चुनाव में आरक्षण की ‘समीक्षा’ की बात कहकर इन दोनों को और ताल ठोकने का मौका दे दिया। अब दोनों ललकार कर कह रहे हैं कि हिम्मत है तो आरक्षण खत्म करके दिखाएं। वे लोगों को समझा रहे हैं कि भाजपा आरएसएस का राजनीतिक संगठन है, जो आरएसएस का विचार है वही भाजपा का विचार है। भाजपा अगर बिहार में सत्ता में आई तो आरक्षण खत्म कर देगी। शुरू में भाजपा इस मुद्दे पर बैकफुट पर जाते दिखी लेकिन जल्द ही उसके सारे नेता ये विश्वास दिलाने में जुट गए कि भाजपा भी आरक्षण का समर्थन करती है और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा। भाजपा ने एक तरफ ‘डैमेज कंट्रोल’ तो दूसरी तरफ हमला तेज करने की नीति बनाई। अमित शाह गरजकर कहने लगे कि नीतीश के मुखौटे के पीछे लालू का ‘जंगलराज’ खड़ा है। नीतीश विकास की बात कर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। बोलते-बोलते वो यहाँ तक बोल गए कि अब नीतीश के लिए बिहार में कोई जगह नहीं है। साथ में ये भी कि 8 नवंबर यानि मतगणना के दिन वो अपना इस्तीफा तैयार रखें। अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के नक्शेकदम पर सुशील मोदी समेत बिहार के बाकी नेता भी अपने-अपने तरीके से मुखौटे की बात दोहराते हैं। और इस तरह, ‘मंच’ हो कोई भी, दोनों गठबंधन बस ‘मुखौटे’ का गीत गाते हैं।

कहने की जरूरत नहीं कि मुखौटे की माया बहुत बड़ी है। इस माया से सर्वथा मुक्त होना सम्भव भी नहीं। चुनाव में चाहे जो जीते, राज तो कोई ‘मुखौटा’ ही करेगा। मुखौटे का ही ‘राज’ और मुखौटे का ही ‘धर्म’। (पत्रकार से पॉलिटिशियन बने आशुतोष ने अपनी किताब का नाम ‘मुखौटे का राजधर्म’ बहुत सोचकर रखा होगा..!) लेकिन अपने-अपने मुखौटे पर इतराते नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकबारगी ये भी सोच लेना चाहिए कि जिस जनता के बीच वो मुखौटा पहने घूम रहे हैं वो भी मुखौटे में हो सकती है और जिस दिन जनता मुखौटा पहन लेगी वो कहीं के नहीं रहेंगे। फिर तो करोड़ों मुखौटे मिलकर उनके चेहरे पर एक पर एक चढ़े मुखौटों को उतारेंगे जैसे प्याज को उघेरते हैं परत-दर-परत।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बड़ी गहरी मोदी की मार, ‘थाली’ के बदले लिया बिहार

लगता है दिल्ली भेजे गए लाखों डीएनए सैंपल नीतीश के काम नहीं आ रहे। बिहार की जनता नीतीश के ‘स्वाभिमान’ के मुकाबले ‘छीनी गई थाली’ को लेकर प्रधामनंत्री मोदी की ‘शिकायत’ को ज्यादा तरजीह दे रही है शायद। इतनी ज्यादा कि अब थाली के बदले मोदी को पूरा बिहार मिलने जा रहा है। जी हाँ, ताजा सर्वे की मानें तो बिहार में एनडीए की सरकार बन रही है और वो भी दो तिहाई बहुमत से। जी न्यूज ने बीते 29 और 30 सितंबर को बिहार की सभी 243 सीटों पर ‘जनता का मूड’ जानने के लिए सर्वे किया। सर्वे का नाम भी ‘जनता का मूड’ ही था। इस सर्वे के अनुसार भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को स्पष्ट रूप से 147 सीटें मिलती दिख रही हैं, जबकि जदयू, राजद और कांग्रेस का महागठबंधन मात्र 64 सीटों पर सिमट रहा है। शेष 32 सीटों पर कांटे का मुकाबला है। इन सीटों पर पलड़ा किसी ओर झुक सकता है। बता दें कि इससे पहले जी न्यूज का सर्वे 18 सितंबर को आया था जिसमें एनडीए को 140 सीटें दिखाई गई थीं और महागठबंधन को 70 सीटें दी गई थीं।

12 अक्टूबर को 10 जिलों की 49 सीटों पर होने जा रहे पहले चरण के चुनाव की बात करें तो एनडीए को 53.8 प्रतिशत, महागठबंधन को 40.2 प्रतिशत और अन्य को 6 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है। सर्वे में एक दिलचस्प अनुमान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को लेकर है। एनडीए को सबसे अधिक फायदा इन्हीं क्षेत्रों में होने जा रहा है। खास तौर से आरा से सीतामढ़ी तक पड़ने वाले इलाके में एनडीए को 54.6 प्रतिशत, जबकि महागठबंधन को 39.7 प्रतिशत वोट मिलने की सम्भावना बताई गई है।

सितम्बर के आखिरी हफ्ते में ही ‘लोकनीति सीएसडीएस’ ने भी सर्वे किया। सीएसडीएस सर्वे भी एनडीए की स्पष्ट बढ़त बता रहा है। इस सर्वे के मुताबिक एनडीए 42 प्रतिशत वोट हासिल करता दिख रहा है। नीतीश-लालू-कांग्रेस के महागठबंधन को 38 प्रतिशत वोट मिलने के आसार हैं और वो एनडीए से 4 प्रतिशत पीछे है। 4 प्रतिशत का ये अन्तर सीटों के बड़े अन्तर का कारण बन सकता है। हालांकि सर्वे के मुताबिक नीतीश कुमार अभी भी बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं और ग्रामीण इलाकों में महागठबंधन को अधिक वोट भी मिल रहे हैं लेकिन कुल मिलाकर बाजी एनडीए मार ले जा रहा है।

अब तक हुए सारे सर्वे पर गौर करें तो हम पाएंगे कि पहले बढ़त महागठबंधन को हासिल थी। बिहार में लोगों की आम राय थी कि केन्द्र के लिए मोदी और बिहार के लिए नीतीश ठीक हैं। लेकिन चुनाव ज्यों-ज्यों परवान चढ़ रहा है, त्यों-त्यों नरेन्द्र मोदी बिहार में भी अपनी जगह बनाते और फैलाते जा रहे हैं। इसे एक अन्य सर्वे के उदाहरण से समझें। एबीपी न्यूज/नीलसन के अब तक तीन सर्वे आए हैं। पहला सर्वे 24 जुलाई को आया था जिसमें महागठबंधन को 129 और एनडीए को 112 सीटें मिली थीं। 15 सितंबर को आए उनके दूसरे सर्वे में कांटे की टक्कर थी जिसमें महागठबंधन के हिस्से में 122 और एनडीए के हिस्से में 118 सीटें आई थीं। लेकिन 7 अक्टूबर तक आते-आते परिदृश्य बदल गया। उनके तीसरे सर्वे में एनडीए को 128 सीटें मिल रही हैं और महागठबंधन को 112 सीटें। अन्य के खाते में 3 सीटें गई हैं। यानि एनडीए की सरकार पूर्ण बहुमत से बन रही है। वोटों के प्रतिशत की बात करें तो एनडीए को 42, महागठबंधन को 40 और अन्य को 18 प्रतिशत वोट मिल रहे हैं।

कह सकते हैं कि सर्वे सम्भावनाओं का खेल है और आँख मूंदकर किसी सर्वे पर ऐतबार नहीं करना चाहिए। फिर भी राजनीति में अगर आप रुचि रखते हों और चुनाव परिणाम को लेकर आपके भीतर उत्सुकता हो तो एक बार आप बारी-बारी से बिहार के चार मुख्य दलों जदयू, राजद, कांग्रेस और भाजपा के पटना स्थित पार्टी कार्यालय जाएं। इन कार्यालयों का नजारा देख आप स्वयं किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहेंगे। पहले तीन दलों के कार्यालय में आपको  थोड़े विश्वास, थोड़ी आशंका के साथ ‘परीक्षा ठीक से गुजर जाय’ वाला भाव दिखेगा लेकिन भाजपा के कार्यालय की चहल-पहल देख आपको लगेगा कि वहाँ ‘अच्छे दिन’ की प्रतीक्षा हो रही है।

बिहार के चार कोने में चार परिवर्तन रैली के बाद चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की योजना एक के बाद एक कई रैलियों की है। उनका अभियान जितना आक्रामक दिख रहा है उतना ही व्यवस्थित भी। मोदी के कद का प्रधानमंत्री लगभग हर जिले में खुद पहुँच रहा हो तो ये सचमुच एक बड़ी बात है। हालांकि देखा जाय तो पोस्टर से लेकर प्रचार तक नीतीश कुमार कहीं भाजपा से पीछे नहीं हैं। लेकिन उन्हें कदम-कदम पर जिस तरह लालू और उनके तथाकथित ‘जंगलराज’ को डिफेंड करना पड़ रहा है उसे उनके ‘हार्डकोर’ समर्थक भी पूरी तरह पचा नहीं पा रहे हैं। नीतीश की ‘विकासपुरुष’ वाली छवि अब भी कायम है, लोगों ने उन्हें बिल्कुल भुला दिया हो ऐसी बात भी नहीं, ‘मांझी’ समेत बाकी परेशानियों का हल भी नीतीश शायद निकाल लें लेकिन दो विपरीत हो चुके ‘ध्रुव’ जिन परिस्थितियों में और जिस तरह साथ आए हैं वो उनके कार्यकर्ताओं और महागठबंधन के नाम पर ‘कुर्बान’ हुए नेताओं को ‘सहज’ नहीं होने दे रहा है। ऊपर से लालू कभी खुद को ‘नक्सली’ कहकर, कभी ‘गौमांस’ पर बयान देकर तो कभी अपने बड़े बेटे के छोटे और छोटे के बड़े हो जाने को लेकर रोज नई मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं सो अलग।

एक समय नरेन्द्र मोदी समेत अन्य भाजपा नेताओं को भोज पर आमंत्रित कर नीतीश ने अचानक वो कार्यक्रम स्थगित कर दिया था। हालांकि अब जाकर नीतीश इसके मूल में सुशील मोदी को बता रहे हैं लेकिन अगर ये सच भी हो तो बताने में शायद देर कर दी है उन्होंने। अब तो वो बीच रणभूमि में हैं और सर्वे अगर सच साबित हुए तो इसका मतलब ये होगा कि नरेन्द्र मोदी उनसे ‘छीनी गई थाली’ के बदले पूरा बिहार लेने जा रहे हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या ‘सवर्णों’ को स्वीकार्य होगा भाजपा का यादव, पिछड़ा या अतिपिछड़ा मुख्यमंत्री..?

आमतौर पर चुनाव में सभी पार्टियां अपने वोटबैंक को बनाए रखने के साथ-साथ विपक्षी पार्टी (या पार्टियों) के वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश करती हैं। आज के ‘तथाकथित’ लोकतंत्र में ये ‘तथ्य’ अब ‘अखंड सत्य’ की तरह स्वीकार्य है। इसका अपवाद ढूँढ़ने की कोशिश करना भी बेमानी हो चुका है। इसीलिए ये कहने में कुछ भी नया नहीं कि बिहार चुनाव में भी यही हो रहा है। नया ये है कि अब अपने वोटबैंक को जोड़ने की जगह दूसरे के वोटबैंक को तोड़ने की कोशिश ज्यादा हो रही है। केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का ये कहना कि भाजपा का अगला मुख्यमंत्री यादव, पिछड़ा या अतिपिछड़ा होगा, इस बात का स्पष्ट प्रमाण है।

अभी हाल ही में भाजपा के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने बयान दिया कि भाजपा की ओर से राज्य का अगला मुख्यमंत्री यादव, पिछड़ा या अतिपिछड़ा होगा। कोई सवर्ण मुख्यमंत्री नहीं बनेगा। गिरिराज सिंह बहुत बड़े ‘बयानवीर’ हैं और कई मौकों पर अपने बयानों से भाजपा को असहज स्थिति में डाल चुके हैं। कई बार उन्हें केन्द्रीय नेतृत्व की ‘फटकार’ भी लग चुकी है। लेकिन इस बार इतने बड़े मौके पर उन्होंने इतना बड़ा बयान दिया और पार्टी ने इसका आधिकारिक खंडन नहीं किया, इसका सीधा मतलब ये है कि उन्होंने ये बयान दिया नहीं, बल्कि उनसे दिलवाया गया है।

बिहार में मुकाबला नीतीश के नेतृत्व वाले महागठबंधन और भाजपा की अगुआई वाले एनडीए के बीच है। हालांकि कुछ पार्टियों ने ऐन चुनाव के मौके पर ‘थर्ड फ्रंट’ बनाकर और तारिक अनवर का चेहरा आगे कर मुकाबले को त्रिकोणात्मक बनाने की कोशिश की है लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये थर्ड फ्रंट भाजपा के ‘पॉलिटिकल मैनेजमेंट’ और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का कमाल है और ऐसा नहीं है तब भी इससे सीधा फायदा उसी को हो रहा है। लेकिन इतने के बावजूद भाजपा संतुष्ट नहीं हुई और गिरिराज से इतना अहम बयान दिलवाया। भाजपा के रणनीतिकारों ने इस बयान से जुड़े तमाम पहलुओं पर शायद विचार ही नहीं किया।

यहाँ एक साथ कई सवाल उठते हैं। पहला ये कि भाजपा अगड़ों के अपने वोटबैंक को जोड़ने से ज्यादा यादव, पिछड़े या अतिपिछड़े यानि लालू-नीतीश के वोटबैंक को तोड़ने की कोशिश क्यों कर रही है..? दूसरा, क्या भाजपा का पिछड़ा मुख्यमंत्री अगड़ों को स्वीकार्य होगा..? तीसरा, अगर स्वीकार्य होगा तो क्या इसका मतलब ये है कि अगड़ों का एकमात्र विकल्प भाजपा है..? चौथा, अगर ऐसा नहीं है तो भाजपा सवर्णों को ‘टेकेन फॉर ग्रान्टेड’ क्यों मान रही है..? और पाँचवाँ, अगर मुख्यमंत्री अगड़ा, पिछड़ा या अतिपिछड़ा होगा तो सवर्णों को क्या देगी भाजपा..?

टिकट बंटवारे को देखें तो भाजपा ने दो दर्जन से ज्यादा यादव उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। महागठबंधन से नाराज लोगों को खास तरजीह दी है। महादलितों पर तो वो मेहरबान है ही। और अब यादव, पिछड़ा या अतिपिछड़ा मुख्यमंत्री। क्या सवर्णों को लेकर भाजपा ‘ओवरकॉन्फिडेन्ट’ है..?  सुशील कुमार मोदी, प्रेम कुमार (और मुस्लिम उम्मीदवार शाहनवाज हुसैन) को छोड़ मुख्यमंत्री पद के ज्यादातर उम्मीदवार – राधामोहन सिंह, राजीव प्रताप रूडी, मंगल पांडेय, सीपी ठाकुर, अश्विनी चौबे और स्वयं गिरिराज सिंह – अगड़ी जाति से आते हैं। ऐसे में भाजपा का ये दांव कहीं उलटा ना पड़ जाय। इसकी सम्भावना तब और ज्यादा हो जाती है जबकि संघ प्रमुख मोहन भागवत के ‘आरक्षण की समीक्षा’ वाले बयान को ‘अपने’ लोगों के बीच ले जाने और भुनाने में लालू और नीतीश कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।

भाजपा के तमाम वरिष्ठ नेता बयान देते रहे हैं कि पार्टी का संसदीय बोर्ड मुख्यमंत्री पद का फैसला करेगा। तमाम व्यंग्य और उकसावों के बावजूद भाजपा ने किसी चेहरे को आगे करने की जगह चुप्पी बनाए रखी थी अब तक। कारण साफ है, वहाँ कोई ऐसा है ही नहीं जिसकी भाजपा और एनडीए में वैसी स्वीकार्यता हो जैसी महागठबंधन में नीतीश कुमार की है। ऐसे में गिरिराज से बयान दिलवाकर भाजपा का संयम तोड़ना समझ से परे है। मुख्यमंत्री किस जाति का होगा, इसमें उलझने और उलझाने से बेहतर है कि भाजपा अपने अभियान के केन्द्र में नरेन्द्र मोदी को रखकर ही आगे बढ़े।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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इक्कीसवीं सदी में भी तुम नौवीं पास क्यों रह गए तेजस्वी..? 

इक्कीसवीं सदी में भी तुम नौवीं पास क्यों रह गए तेजस्वी..? जो वैसी सुविधाओं में पला हो जिनकी कल्पना तक सबके बस की बात नहीं… राज्य से लेकर केन्द्र तक जिसके परिवार की तूती बोलती हो… जिसके घर में पिता ही नहीं माँ के भी मुख्यमंत्री होने का बिरला संयोग हो… जिसमें एक बड़ी राजनीतिक पार्टी अपना भविष्य देख रही हो… जिसे आज के युवा-सपनों का प्रतीक बनाकर लाखों लोगों के बीच मंच पर खड़ा किया जा रहा हो, वो केवल नौवीं पास होकर रह जाय, तो सवाल उठेंगे ही। यहाँ बात लालू प्रसाद यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव की हो रही है जिनकी सम्पत्ति तो करोड़ों में है लेकिन जाने किस मजबूरी में वो नौवीं पास हैं केवल..!

कम पढ़ा होना गुनाह नहीं। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जब कम पढ़े-लिखे और यहाँ तक कि अनपढ़ लोगों ने भी इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है। अनपढ़ होने के बावजूद अकबर बादशाह हुए और कागज ना छूने के बावजूद कबीर ने घर-घर में जगह बनाई। लेकिन उनके साथ क्या परिस्थितियां रहीं और उनके सामने कैसी चुनौतियां थीं, ये भी इतिहास में दर्ज है। आज हम इक्कीसवीं सदी में हैं और ग्वोवलाइजेशन के दौर में दुनिया जहाँ छोटी हुई है वहीं जीवन और जटिल हो गया है। ऐसे में तेजस्वी जैसे युवा का केवल नौवीं पास होना हैरान करता है।

आरजेडी सुप्रीमो ने इस बार अपने दोनों बेटों को चुनाव-मैदान में उतारा है। छोटे बेटे तेजस्वी राघोपुर से भाग्य आजमा रहे हैं जहाँ से लालू और राबड़ी दो-दो बार एमएलए रह चुके हैं। शनिवार, 3 अक्टूबर को उन्होंने अपना नामांकन भरा। नामांकन-पत्र के साथ दायर हलफनामे के अनुसार वे दिल्ली के जाने-माने स्कूल डीपीएस से केवल नौवीं पास हैं और पेशे से समाजसेवी और व्यवसायी हैं। मैट्रिक करने में वो भले ही सफल ना हो पाए हों लेकिन ‘व्यवसाय’ में उन्होंने जरूर सफलता पाई है। 2014-15 के सालाना आयकर रिटर्न में उनकी आमदनी 5 लाख से ज्यादा बताई गई है और उनकी कुल सम्पत्ति है 1 करोड़ 40 लाख रुपये। हलफनामे के अनुसार अलग-अलग बैंकों में तेजस्वी के सात अकाउंट हैं और उन्होंने कई कम्पनियों में निवेश कर रखा है। उनके पास दस तोले सोने की ज्वेलरी और 1 लाख बीस हजार नकद हैं। 34 लाख रुपये का बैंक लोन भी है उनके ऊपर।

दुनिया जानती है कि तेजस्वी के पिता लालू प्रसाद यादव अत्यन्त साधारण परिवार से आते हैं। उनका बचपन संघर्षों में बीता। मुख्यमंत्री होने तक वो अपने बड़े भाई के चपरासी क्वार्टर में रहे और उनके ज्यादातर बच्चे वहीं हुए। तमाम विपरीत परिस्थितियों और छात्र-जीवन में ही राजनीति में कूद पड़ने के बावजूद वो ना केवल पटना यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में एमए हैं बल्कि एलएलबी की डिग्री भी है उनके पास। रेलमंत्री के रूप में उनके सफल प्रयोगों के बाद बड़ी-बड़ी जगहों से उन्हें मैनेजमेंट के छात्रों को ‘पढ़ाने’ के बुलावे आए और बाकायदा जाकर उन्होंने ‘पढ़ाया’ भी। ऐसे में उनकी अगली पीढ़ी से उनके आगे नहीं तो उनके बराबर या कम-से-कम उनके आसपास होने की उम्मीद तो होगी ही।

एक तर्क हो सकता है कि तेजस्वी क्रिकेटर रहे हैं और इस कारण पढ़ाई पर कम ध्यान दे पाए। अगर उन्होंने क्रिकेट में ही करियर बनाया होता तो ये तर्क स्वीकार सहज स्वीकार्य होता। आज 12वीं पास तेन्दुलकर से भला कौन पूछेगा कि उन्होंने आगे की पढ़ाई क्यों नहीं की। लेकिन जब क्रिकेट में तेजस्वी का करियर नहीं बना और राजनीति में भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा हो अब तक, ऐसा नहीं कहा जा सकता, तब घर का ऐसा कौन-सा भार था उनके ऊपर कि वे पढ़ाई की जगह तथाकथित ‘व्यवसाय’ में लग गए और पिता लालू या माँ राबड़ी ने उन्हें डाँटा नहीं..?

अक्सर किसी का पढ़ना, कम पढ़ना या ना पढ़ना सामाजिक स्थितियों पर निर्भर करता है। शिक्षा या ज्ञान के स्तर के अनुपात में ही कोई समाज ऊँचा उठता है और जब आप समाज के सबसे ऊँचे पायदान पर हों तब पढ़ना बहुत हद तक आपकी सामाजिक जिम्मेदारी हो जाती है क्योंकि तब आप हजारों-लाखों के ‘रोल मॉडल’ हो जाते हैं। इसीलिए ये सवाल उठेगा भी और गूँजेगा भी कि इक्कीसवीं सदी में भी तुम नौवीं पास क्यों रह गए तेजस्वी..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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महात्मा गांधी और नोबेल पुरस्कार का सच

1964 में मार्टिन लूथर किंग जूनियर (अमेरिका), 1980 में अडोल्फो पेरेस एस्कुइवेल (अर्जेंटीना), 1989 में दलाई लामा (तिब्बत), 1991 में आंग सान सू की (बर्मा), 1993 में नेल्सन मंडेला (दक्षिण अफ्रीका), 2007 में अल गोर (अमेरिका) और 2009 में बराक ओबामा (अमेरिका) नोबेल शांति पुरस्कार से नवाजे गए। एक ही पुरस्कार से सम्मानित होने के अलावे भी इन सबमें एक समानता है और वो ये कि इन सभी को महात्मा गांधी के जीवन, उनके व्यक्तित्व और उनके विचारों ने प्रभावित किया था। क्या आपके मन में ये सवाल नहीं उठता कि इन सबके जिस ‘संघर्ष’ ने इन्हें नोबेल पुरस्कार तक पहुँचाया उस संघर्ष को ‘आकार’ देनेवाले गांधीजी को ही नोबेल नहीं मिला..? आगे चलकर 2014 में शांति का नोबेल भारत के कैलाश सत्यार्थी को मिला और उनके प्रशस्ति-पत्र में बाकायदा ये लिखा गया कि वे गांधी के मार्ग पर चले। कितने आश्चर्य की बात है कि जिस ‘गांधी’ के नाम के बिना एक नोबेल विजेता का ‘प्रशस्ति-पत्र’ पूरा नहीं होता उसी गांधी को नोबेल से वंचित रखा गया। इसे नोबेल की ‘भूल’ नहीं उसका ‘अपराध’ कहा जाना चाहिए।

हालांकि नोबेल कमिटी ने ये ‘अपराधबोध’ व्यक्त भी किया लेकिन गांधी की मृत्यु के 58 साल बाद। 2006 में दिए अपने सार्वजनिक वक्तव्य में नोबेल कमिटी ने कहा – “The greatest omission in our 106 year history is undoubtedly that Mahatma Gandhi never received the Nobel Peace prize. Gandhi could do without the Nobel Peace prize, whether Nobel committee can do without Gandhi is the question. (हमारे 106 साल के इतिहास में सबसे बड़ी चूक महात्मा गांधी को नोबेल शांति पुरस्कार नहीं दिया जाना है। गांधी तो बिना नोबेल पुरस्कार के रह सकते थे, पर बड़ा प्रश्न यह है कि क्या नोबेल शांति पुरस्कार कमिटी गांधी को बिना यह पुरस्कार प्रदान किए सहज है ?)”

नोबेल की ये ‘स्वीकारोक्ति’ गलत नहीं है। पूरी दुनिया जानती और मानती है कि महात्मा गांधी आधुनिक युग में अहिंसा और शांति के सबसे बड़े प्रतीक हैं। इतने बड़े कि गौतम बुद्ध और ईसा मसीह के बाद मानव-जाति पर ऐसा व्यापक प्रभाव अब तक नहीं देखा गया है। ऐसे गांधी को भला नोबेल की क्या जरूरत..? हाँ, उन्हें पाकर नोबेल का सम्मान जरूर और बढ़ जाता। लेकिन इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि दुनिया में किसी व्यक्ति को मिलने वाला यह सबसे बड़ा सम्मान है। ऐसे में ये प्रश्न उठना अत्यन्त स्वाभाविक है कि आखिर गांधीजी को क्यों नहीं… और वो भी एक बार नहीं, दो बार नहीं, पूरे पाँच बार नामांकित होने के बावजूद..!

जी हाँ, गांधीजी को नोबेल के लिए पूरे पाँच बार नामंकित किया गया था। 1937, 1938 और 1939 में लगातार तीन साल और इसके बाद भारत की स्वतंत्रता और विभाजन के वर्ष 1947 में उनका नामांकन हुआ। पाँचवीं बार उन्हें 1948 में नामांकित किया गया लेकिन नामांकन के महज चार दिनों के बाद उनकी हत्या हो गई।

बहुत दिनों तक माना गया कि गांधीजी को नोबेल देकर सम्भवत: नोबेल कमिटी अंग्रेजी साम्राज्य का ‘कोपभाजन’ नहीं बनना चाहती थी। लेकिन तत्कालीन दस्तावेजों से अब यह सत्य सामने आ चुका है कि नोबेल कमिटी पर ब्रिटिश सरकार की ओर से ऐसा कोई दबाव नहीं था। प्रश्न उठता है कि फिर उन्हें नोबेल देने के मार्ग में क्या कठिनाई थी..?

नोबेल पुरस्कार के लिए पहली बार गांधीजी का नाम नॉर्वे के एक सांसद ने सुझाया था लेकिन पुरस्कार देते समय उन्हें नज़रअंदाज कर दिया गया। नोबेल कमिटी के एक सलाहकार जैकब वारमुलर ने तब टिप्पणी की थी कि गांधी एक अच्छे, आदर्श और तपस्वी व्यक्ति हैं और सम्मान के योग्य हैं लेकिन ‘सुसंगत’ रूप से शांतिवादी नहीं हैं। जैकब के अनुसार गांधीजी को पता रहा होगा कि उनके कुछ अहिंसक आन्दोलन हिंसा और आतंक में बदल जाएंगे। ये बात उन्होंने 1920-1921 में गांधीजी द्वारा चलाए गए असहयोग आन्दोलन के संदर्भ में कही थी जब उत्तेजित भीड़ ने चौरीचौरा में एक पुलिस थाने को जला दिया था और कई पुलिसकर्मी मारे गए थे। करोड़ों की आबादी, सदियों का शोषण और एक भी ‘चौरीचौरा’ ना हो, ये कैसी अपेक्षा थी जैकब की..? ये गांधी ही थे कि भारत जैसे संवेदनशील और स्वाभिमानी देश में ‘चौरीचौरा’ की सैकड़ों-हजारों पुनरावृत्ति नहीं हुई।

 खैर, जैकब की अगली टिप्पणी भी कम दिलचस्प नहीं थी कि गांधीजी की राष्ट्रीयता भारतीय संदर्भों तक सीमित रही। यहाँ तक कि दक्षिण अफ्रीका में उनका आन्दोलन भी भारतीय लोगों तक सीमित रहा। उन्होंने कालों के लिए कुछ नहीं किया जो भारतीयों से भी बदतर ज़िन्दगी गुजार रहे थे। कैसी विडम्बना है कि आगे चलकर मार्टिन लूथर किंग जूनियर, नेल्सन मंडेला और बराक ओबामा इस पुरस्कार से नवाजे गए और ये तीनों ना केवल ‘काले’ थे बल्कि गांधी को अपना आदर्श और पथ-प्रदर्शक मानते थे।

1947 में नोबेल के लिए कुल छह लोग नामांकित थे और उनमें एक नाम गांधीजी का था। लेकिन भारत-विभाजन के बाद अखबारों में छपे गांधीजी के कुछ (तथाकथित) ‘विवादास्पद’ बयानों को आधार बनाकर यह पुरस्कार उनकी जगह मानवाधिकार आन्दोलन ‘क्वेकर (Quakers)’ (जिसका प्रतिनिधित्व फ्रेंड्स सर्विस काउंसिल, लंदन और अमेरिकन फ्रेंड्स सर्विस कमिटी, फिलाडेल्फिया नाम की दो संस्था कर रही थी) को दे दिया गया।

1948 में खुद क्वेकर ने शांति के नोबेल के लिए गांधीजी का नाम प्रस्तावित किया। लेकिन इसे दु:संयोग की पराकाष्ठा ही कहा जाएगा कि नामांकन की आखिरी तारीख के महज दो दिन पूर्व गांधीजी की हत्या हो गई। इस समय तक नोबेल कमिटी को गांधीजी के पक्ष में पाँच संस्तुतियां मिल चुकी थीं। लेकिन तब समस्या यह थी कि उस समय तक मरणोपरांत किसी को नोबेल पुरस्कार नहीं दिया जाता था। हालांकि ये कानूनी गुंजाइश थी कि विशेष स्थिति में मरणोपरांत भी यह पुरस्कार दिया जा सकता है। लेकिन यहाँ भी एक समस्या थी कि पुरस्कार की रकम आखिर किसे दी जाय क्योंकि गांधीजी का कोई संगठन या ट्रस्ट नहीं था। यहाँ तक कि उनकी कोई जायदाद भी नहीं थी और ना ही इस संबंध में उन्होंने कोई वसीयत ही छोड़ी थी। हालांकि यह इतनी बड़ी समस्या नहीं थी कि इसे सुलझाया ही नहीं जा सके। ऐसे में यही कहा जा सकता है कि ‘इतिहास’ रचने के लिए जो ‘इच्छाशक्ति’ होनी चाहिए थी वो नोबेल कमिटी के पास थी ही नहीं। अंतत: 1948 में ये पुरस्कार किसी को नहीं दिया गया और नोबेल कमिटी ने कहा कि इसके लिए कोई ‘योग्य जीवित उम्मीदवार’ नहीं है। ‘योग्य जीवित उम्मीदवार’ ना होने की बात सीधे तौर पर गांधीजी के ना रहने से जुड़ी हुई थी, इसमें रत्ती भर भी संदेह नहीं है।

अगर 1948 में गांधीजी की हत्या नहीं हुई होती तो ये पुरस्कार उन्हें मिल गया होता और नोबेल पर वो ‘दाग’ लगता ही नहीं जिसे ‘भूल’ या ‘चूक’ की किसी ‘स्वीकारोक्ति’ से कभी मिटाया नहीं जा सकता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नासा ने नहीं, लुजेन्द्र ओझा ने खोजा मंगल पर पानी

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने 28 सितम्बर को एक बड़ा खुलासा किया। नासा ने कहा कि मंगल ग्रह पर बहते पानी के सबूत मिले हैं। इस खोज के बाद मंगल पर जीवन की सम्भावना बढ़ गई है। जब सोमवार को नासा अमेरिकी समय के हिसाब से दिन के 11.30 बजे अपने मुख्यालय के ‘जेम्स वेब ऑडिटोरियम’ में आयोजित प्रेस कांफ्रेस में ये ऐतिहासिक घोषणा कर रहा था तब नासा के ग्रह-विज्ञान निदेशक जिम ग्रीन, मंगल अन्वेषण कार्यक्रम के प्रमुख वैज्ञानिक माइकल मेयेर, नासा के एमेस अनुसंधान केन्द्र की मैरी बेथ विल्हेल्म और एरिजोना यूनिवर्सिटी में प्लैनेटरी जियोलॉजी के प्रोफेसर एल्फ्रेड माकईवेन के साथ पीएचडी का एक छात्र भी मौजूद था। उस ‘असाधारण’ छात्र का नाम है लुजेन्द्र ओझा। ‘असाधारण’ इसलिए कि मंगल पर बहते पानी को नासा से पहले इस छात्र ने देखा था।

मात्र 21 साल के लुजेन्द्र ओझा मूल रूप से काठमांडू (नेपाल) के हैं और अटलांटा के जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्लैनेटरी साइंस में पीएचडी कर रहे हैं। इस युवा वैज्ञानिक ने माकईवेन के साथ मंगल ग्रह पर जल सक्रियता की सम्भावना का अध्ययन किया है। मंगल ग्रह पर देखी गई जिन गहरी लकीरों (मंगल की सतह पर दिखने वाले गड्ढ़ों की ढलान पर बनी उँगली जैसी रेखाएँ) को अब तरल पानी के सामयिक बहाव से जोड़कर देखा जा रहा है, उन्हें साल 2011 में डिग्री कोर्स के दौरान लुजेन्द्र द्वारा किए गए शोध से ही पहचाना गया था। विज्ञान और प्राविधि की साइट inverse.com ने अगर लुजेन्द्र को नासा के प्रेस-कांफ्रेस में मौजूद ‘अनोखा’ व्यक्ति कहा तो यह अकारण नहीं है।

बहरहाल, आप लुजेन्द्र ओझा के वेबसाइट www.lujendraojha.net  पर जाएं तो होम पेज पर आपको हाथ में गिटार लिए लंबे बालों वाला ‘रॉकस्टार’ दिखेगा। पहली नज़र में आपको लगेगा कि शायद आपने कोई गलत साइट लॉग इन कर दिया है। लेकिन जब थोड़ी देर ठहरकर आप होम पेज के बीचोंबीच लिखा ‘स्टेटमेंट’ पढ़ेंगे और बारी-बारी से बाकी पन्नों को खोलेंगे तब आप नैसर्गिक प्रतिभा के धनी एक युवा वैज्ञानिक के ‘अद्भुत संसार’ को देख रहे होंगे।

लुजेन्द्र ओझा उर्फ लुजु को एरिजोना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ‘संयोगवश’ इस बात के सबूत मिले थे कि मंगल पर पानी तरल रूप में मौजूद है। उन्हें मंगल की सतह की तस्वीरों के अध्ययन के बाद इस बात के सबूत मिले थे। इस खोज को ‘भाग्यशाली संयोग’ मानने वाले लुजेन्द्र शुरुआत में इसे समझ नहीं पाए। मंगल की सतह पर बने गड्ढ़ों का कई साल तक अध्ययन करने के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इनकी ढलान पर बनी गहरी लकीरें बहते खारे पानी के कारण बनी हैं। ये ‘लकीरें’ गर्मियों में बढ़ जाती थीं और सर्दियां आते-आते गायब हो जाती थीं। सावधानीपूर्वक अध्ययन और विशलेषण के बाद अब वैज्ञानिक यह कहने को तैयार हैं कि ये लकीरें वास्तव में जलधाराएं हैं। इस तरह नासा ने लुजेन्द्र की बात पर ही मुहर लगाई है।

मंगल पर तरल पानी की मौजूदगी की पुष्टि होने के बाद ये तय हो गया है कि यह ग्रह भौगोलिक रूप से अब भी सक्रिय है। यही नहीं अब तो वहाँ माइक्रोब्स पाए जाने की सम्भावना भी जग गई है। साथ ही सतह के नजदीक पानी के स्रोतों की पहचान होने से भविष्य में मंगल ग्रह पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों का वहाँ रहना भी आसान हो सकता है। क्या पता कल होकर वहाँ मानव अपनी बस्तियाँ ही बसा ले।

साइंस फिक्शन में गहरी रुचि रखने वाले लुजेन्द्र ओझा स्ट्रिंग थ्योरी, मल्टीपल यूनिवर्स और टाइम ट्रेवल जैसे विचारों से खासा प्रभावित रहे हैं। अपने हाई स्कूल के दिनों में वे आगे चलकर ‘टाइम-मशीन’ का आविष्कार करने के बारे में सोचते थे। उनका ऐसा कोई आविष्कार तो अब तक सामने नहीं आया है लेकिन मंगल पर पानी की खोज में उन्होंने जो भूमिका निभाई है उसने विज्ञान की दुनिया में उनका सम्मानित स्थान तो सुरक्षित कर ही दिया है। सम्भावनाओं के इस उदीयमान पुंज को मधेपुरा अबतक की शुभकामनाएं।

  मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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केजरीवालजी..! मोदी ‘गिड़गिड़ाने’ नहीं गए थे अमेरिका

अरविन्द केजरीवाल… भारतीय राजनीति में इस नाम ने जैसा स्थान बनाया और जितनी तेजी से बनाया वो अपने आप में अनूठा है। पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन के लिए जब सन् 2000 में केजरीवाल ने दिल्ली में ‘परिवर्तन’ नाम से नागरिक आन्दोलन शुरू किया तब उन्होंने हरगिज ना सोचा होगा कि इस ‘परिवर्तन’ से एक दिन पूरी ‘दिल्ली’ परिवर्तित हो जाएगी। सूचना के अधिकार के लिए अपने संघर्ष और 2006 में ‘रमन मैग्सेसे’ मिलने के बाद वो चर्चा में आए, और छाए अन्ना हजारे के साथ जनलोकपाल आन्दोलन से। आगे चलकर 2012 में आम आदमी पार्टी के गठन से लेकर 2013 में दिल्ली के मुख्यमंत्री पद तक का उनका सफर किसी स्वप्न जैसा है। इतिहास में ‘संघर्ष’ होते रहे हैं और होते रहेंगे लेकिन ‘संघर्ष’ का इस तरह से ‘मुकाम’ पाना बार-बार होने की चीज नहीं है।

‘जंतर-मंतर’ से दिल्ली के मुख्यमंत्री के ‘दफ्तर’ का सफर अरविन्द केजरीवाल ने इतनी जल्दी तय किया था कि वे ‘शासन’ और ‘आन्दोलन’ में फर्क ही नहीं कर पाए। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली का मुख्यमंत्री खुद बात-बात पर धरने पर बैठ जाता था। अपने वादों को भी वो आन्दोलन की तरह ही पूरा करना चाहता था, जो व्यवहार में सम्भव ना था। अंतत:  महज 49 दिनों में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। दिल्ली की जनता ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया की और उन्हें अपने ‘भगोड़ेपन’ का अहसास हो गया। बिना देर किए ‘प्रायश्चित’ में उन्होंने पूरी ताकत झोंक दी और दिल्ली ने उन्हें माफ भी कर दिया। उदार और दिलदार दिल्ली ने 2015 में उन्हें 70 में से 67 सीटें दे दीं।

ऐसे मेनडेट के बाद दिल्ली और देश को भी केजरीवाल से कुछ अलग और कुछ ज्यादा अपेक्षा है तो ये अत्यन्त स्वाभाविक है। खुद से जुड़ी अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए उन्हें ना केवल अतिरिक्त मेहनत करनी होगी बल्कि अतिरिक्त गम्भीरता भी बरतनी होगी। लेकिन इस गम्भीरता की कमी केजरीवाल में ‘गम्भीर’ रूप से है। आए दिन अपने ‘अगम्भीर’ बयानों से केजरीवाल अपने चाहनेवालों को निराश करते रहते हैं। दिल्ली के एलजी नजीब जंग और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्ववाली सरकार को लेकर उनके ज्यादातर बयान ऐसे ही होते हैं। चलिए मान लेते हैं कि नजीब जंग से उनकी ‘तनातनी’ दिल्ली सरकार के कामकाज या अधिकार-क्षेत्र को लेकर है और दिल्ली की सवा करोड़ जनता का प्रतिनिधि होने के नाते उन्हें बहुत हद तक बोलने का हक भी मिल जाता है। लेकिन सवा करोड़ जनता के प्रतिनिधि का सवा सौ करोड़ लोगों के प्रतिनिधि को लेकर अमर्यादित बयान देना सचमुच निराश करता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी अमेरिका के दौरे पर थे। वहाँ 25 सितम्बर को उन्होंने सतत विकास शिखर सम्मेलन में विश्व भर के राष्ट्राध्यक्षों को संबोधित किया, जिसकी मेजबानी संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की-मून ने की। इस महत्वपूर्ण दौरे के अन्तिम दिन यानि 28 सितम्बर को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ उनकी एक साल के भीतर तीसरी शिखर बैठक हुई। इस बैठक के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में उच्च स्तरीय शांतिरक्षा शिखर सम्मेलन और विश्व के कई नेताओं – ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन, फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांद, कतर के अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल थानी, मेक्सिको के राष्ट्रपति एनरीक पेना नीटो और फिलीस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास – से मोदी की द्विपक्षीय मुलाकातों का व्यस्त कार्यक्रम था। पर उनकी इस यात्रा में जो बात सबसे अधिक सुर्खियों में रही वो थी फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग, एप्पल के सीईओ टिम कुक, गूगल के सीईओ सुन्दर पिचाई और माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्य नडेला से उनकी मुलाकात। विश्व के इन शीर्षस्थ ‘कार्यकारी अधिकारियों’ के साथ मोदी की मुलाकात ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘मेक इन इंडिया’ की सम्भावनाओं के लिहाज से कितनी महत्वपूर्ण थी, ये कहने की जरूरत नहीं। मोदी ने इन दिग्गज कम्पनियों को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित किया।

बहरहाल, पूरा देश इन मुलाकातों को लेकर उत्सुक था और उत्साहित भी कि इसी दरम्यान 27 सितम्बर को केजरीवाल का बयान आता है कि मोदी विदेश में ‘गिड़गिड़ा’ रहे हैं। उन्होंने बाकायदा ट्वीट करके कहा कि अगर हम मेक इंडिया कर लेंगे तो मेक इन इंडिया ऑटोमेटिक हो जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर हम अपने देश को विकसित कर लेंगे तो दूसरे देश यहाँ खुद निवेश करने आएंगे। हमें उनके दरवाजों पर जाकर निवेश के लिए ‘गिड़गिड़ाना’ नहीं पड़ेगा।

सबसे पहली बात तो ये कि ‘मेक इंडिया’ को ‘मेक इन इंडिया’ से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दूसरे, नई सम्भावनाओं को तलाशना, अपने आयाम को बढ़ाना कहीं से भी गिड़गिड़ाना नहीं कहा जा सकता। तीसरे, मोदी वहाँ ‘व्यक्ति मोदी’ या ‘भाजपाई मोदी’ नहीं बल्कि ‘भारत के प्रधानमंत्री’ मोदी थे और यहाँ के सवा सौ करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। ऐसे में शब्दों के चयन में गरिमा और गम्भीरता निहायत जरूरी था।

केजरीवालजी को कुछ कहने से पहले ‘सिलिकॉन वैली’ से ‘सैप सेन्टर’ तक ‘मोदी-मोदी’ की गूंज जरूर सुननी चाहिए थी। ये गूंज किसी ‘गिड़गिड़ाने’ वाले के लिए नहीं, करोड़ों आँखों में 21वीं सदी के भारत के लिए उम्मीद और विश्वास जगाने वाले के लिए थी। उन्हें सुनना चाहिए था कि मोदी ‘उपनिषद’ से ‘उपग्रह’ की यात्रा को किस नजरिए से देखते हैं और अपनी तमाम ‘यात्राओं’ से उसे कैसा विस्तार देना चाहते हैं। ‘हाशिए’ पर खड़े भारत को ‘केन्द्रबिन्दु’ में लाना हो तो बात केवल ‘दिल्ली’ से नहीं बनेगी। पूरी दुनिया का भरोसा आपको जीतना होगा। मोदी नाम के इस शख्स ने अपने विज़न, अपने आत्मविश्वास, अपनी ऊर्जा से सात समुन्दर पार भी अपने लिए भरोसा पैदा किया है तो ये बड़ी बात है। देखा जाय दुनिया का ये भरोसा मोदी के बहाने (और मोदी के मुताबिक) उस भारत के लिए है जिसकी 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम की है और जिसे अभी बहुत लम्बा सफर तय करना है।

अन्त में, बहुत विनम्रता से कहना चाहूँगा केजरीवालजी से कि कमेंट करने से कद बड़ा नहीं होता। कद केवल और केवल काम से बड़ा होता है। मोदी अपना काम कर रहे हैं और केजरीवाल अपना काम करें। कमेंट करने का काम ‘समय’ पर छोड़ दें। वो हर किसी पर और हर दम सही ‘कमेंट’ करता है।

पुनश्च :

आज से लगभग साल भर पहले मोदी अमेरिका गए थे। प्रधानमंत्री के रूप में यह उनकी अमेरिका की  पहली यात्रा थी। पाँच दिन की उस यात्रा के अंतिम दिन उपराष्ट्रपति जो बिडेन की तरफ से मोदी के सम्मान में लंच का आयोजन किया गया। उस मौके पर अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी ने कहा था कि हम चाहते हैं कि भारत के विकास में प्रधानमंत्री मोदी के योगदान और भारत की आजादी में महात्मा गांधी के योगदान को एक तरह से याद किया जाय। यहाँ इस वाकये को सुनाने का यह मतलब कतई नहीं कि मोदी को महात्मा गांधी के बराबर में खड़ा किया जाय या कैरी ने मोदी के लिए जो कहा वैसा ही कुछ केजरीवाल भी कहें लेकिन इतना कहना तो जरूर बनता है कि जब घर के ‘मुखिया’ को ‘बाहरवाले’ इज्जत दे रहे हों तो ‘घरवालों’ की भी इज्जत (और साख भी) बढ़ती है, किसी भी सूरत में घटती तो हरगिज नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जी हाँ, मुकेश अंबानी से अधिक ‘अमीर’ हैं केरल के सनी वर्की..!

सनी वर्की, क्या आपने सुना है ये नाम..? अगर सुना भी हो तब भी ये जरूर मानेंगे कि भारत में सौ में से निन्यानवे आदमी इस नाम को नहीं जानते होंगे। दूसरी ओर मुकेश अंबानी हैं जिनका नाम भारत में बोलना सीख रहा बच्चा भी जानता है। जानने की वजह भी है। दुनिया की जानी-मानी पत्रिका ‘फोर्ब्स’ ने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन मुकेश अंबानी को लगातार नौवें साल दुनिया का सबसे अमीर भारतीय घोषित किया है। ‘फोर्ब्स’ द्वारा जारी की गई दुनिया के सौ सबसे अमीर भारतीयों की सूची में 18.9 अरब डॉलर यानि 1255 अरब रुपये के साथ मुकेश पहले नंबर पर हैं। इस सूची में 18 अरब डॉलर यानि 1190 अरब रुपये के साथ सन फ़ार्मास्यूटिकल इंडस्ट्रीज़ के दिलीप सांघवी को दूसरा और 15.9 अरब डॉलर यानि 1052 अरब रुपये के साथ विप्रो के अज़ीम प्रेमजी को तीसरा स्थान मिला है। आप सोच रहे होंगे कि इन धनकुबेरों के सामने भला इस अनाम से शख्स सनी वर्की की क्या औकात..!

मुकेश अंबानी… जो ना केवल भारत बल्कि दुनिया के गिने-चुने अमीरों में एक हैं… जो 4 लाख वर्गफुट और 27 मंजिलों वाले दुनिया के सबसे महंगे मकान ‘अंतिलिया’ में रहते हैं… जिनकी सैलरी 15 करोड़ रुपये है और जिनकी कम्पनी रिलायंस इंडस्ट्रीज का मार्केट कैप 290,245.66 करोड़ है…. उनकी तुलना मैं सनी वर्की से कर रहा हूँ..! जी हाँ, कर रहा हूँ और पूरे होशोहवास में कर रहा हूँ। तुलना ही नहीं कर रहा बल्कि इस सनी वर्की को उनसे अधिक ‘अमीर’ बता रहा हूँ। पूरी बात जानकर शायद आप भी यही बोलेंगे।

जिस मशहूर पत्रिका ‘फोर्ब्स’ ने दुनिया के सौ सबसे अमीर भारतीयों की सूची प्रकाशित की है, उसी ने एशिया प्रशांत के 13 देशों के दानदाताओं की सूची भी प्रकाशित की है जिसमें सात भारतीय हैं। इन ‘दानवीर’ भारतीयों में पहला स्थान सनी वर्की का है। सनी वर्की केरल में जन्मे उद्योगपति हैं और दुबई स्थित जीईएमएस कम्पनी के संस्थापक हैं। यह कम्पनी 14 देशों में 70 निजी स्कूल चलाती है। वर्की ने इसी साल जून में अपनी 2.25 अरब डॉलर यानि लगभग 15 हजार करोड़ की सम्पत्ति का आधा हिस्सा दान में देने की घोषणा की। आपको बता दें कि ‘फोर्ब्स’ ने दानवीरों की यह सूची शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में योगदान के लिए बनाई है जिसमें वर्की के अलावे भारतीय आईटी कम्पनी इंफोसिस के तीन सहसंस्थापक सेनापथे गोपालकृष्णन, नंदन नीलकेणी और एसडी शिबूलाल, इंफोसिस के एक और सहसंस्थापक एन नारायणमूर्ति के पुत्र रोहन और लंदन में रहने वाले उद्योगपतियों सुरेश रामकृष्णन और रमेश रामकृष्णन के नाम शामिल हैं।

आप कहेंगे, सनी वर्की की सम्पत्ति 2.25 अरब डॉलर है और मुकेश अंबानी की 18.9 अरब डॉलर यानि 8 गुने से भी अधिक, तो फिर वर्की अंबानी से अधिक अमीर कैसे हो गए..? मेरे दोस्त, आज के इस भौतिकवादी युग में पैसे का ‘मोल’ किस हद तक बढ़ चुका है ये ना आपसे छिपा है ना मुझसे। पैसा आज हर चीज की परिभाषा तय कर रहा है। आज ‘अर्थ’ चाहे जो ‘अनर्थ’ करा दे, हम-आप मूक दर्शक बने रह जाएंगे। ऐसे में कोई वर्की आगे आता है और अपनी आधी सम्पत्ति यानि 1.25 अरब डॉलर यानि साढ़े सात हजार करोड़ रुपये शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए दान कर देता है..! जरा सोचिए, ऐसा करके क्या हासिल हुआ होगा उसे..? सड़क के किनारे या चलती ट्रेन में कितना भी लाचार भिखारी आ जाय, अगर हमारी जेब में एक या दो का सिक्का ना हो तो तमाम दया-धर्म के बावजूद दस का नोट तो दूर पाँच का सिक्का निकालने से पहले भी हम पाँच बार सोचते हैं। ऐसे में साढ़े सात हजार करोड़ रुपये दान करना कितनी बड़ी बात है ये शायद हम ठीक से सोच भी ना सकें। अब मैं आपसे पूछूँ कि मुकेश अंबानी अधिक अमीर हैं या सनी वर्की, तो आप क्या कहेंगे..?

आज जबकि मनुष्यता के पहले पायदान पर ही हम फिसल रहे हों, हर दिन एक नए तरीके से मानव-मूल्यों का अवमूल्यन हो रहा हो, ‘बाहर’ के चकाचौंध से ‘भीतर’ के विवेक और नैतिकता की अकाल मृत्यु हो रही हो और हर तरफ केवल ‘अनास्था’ का बोलबाला हो, ऐसे में सनी वर्की का ‘दान’ उसे इतना ‘धनवान’ तो बना ही देता है कि मुकेश अंबानी की अकूत सम्पत्ति भी कम पर जाय उसके सामने।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदी के सामने चेहरा नीतीश का, पर मुकाबले में लालू

महागठबंधन ने 243 में से 242 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। 23 सितम्बर को जदयू, राजद और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्षों की मौजूदगी में नीतीश कुमार ने महागठबंधन की सूची जारी की। इस मामले में महागठबंधन ने निश्चित रूप से एनडीए की तुलना में अधिक ‘समझदारी’ और ‘एकजुटता’ का परिचय दिया। इन तीनों दलों का तालमेल सीट बांटने और सूची जारी करने में ही नहीं उम्मीदवारों के चयन में भी दिखा। महागठबंधन के उम्मीवारों की सूची से एक बात साफ हो गई कि ‘इंजीनियरिंग’ की डिग्री भले ही नीतीश के पास हो लेकिन इसमें ‘सोशल इंजीनियरिंग’ लालू की चली है। केवल यही नहीं, सीट-दर-सीट विश्लेषण करें तो ये भी स्पष्ट हो जाएगा कि नरेन्द्र मोदी के सामने चेहरा भले ही नीतीश का हो पर मुकाबले में लालू हैं।

आप निश्चित तौर पर जानना चाहेंगे कि ऊपर कही गई बात का आधार क्या है..? इस ‘आधार’ को जानने के लिए हमें उस ‘आधार’ तक पहुँचना होगा जिसके बूते महागठबंधन बिहार के महासमर को जीतने उतरा है। मजे की बात तो ये है कि महागठबंधन की सूची पर निगाह डालते ही हम उस ‘आधार’ तक पहुँच जाएंगे और वो भी बिना मशक्कत के। आप भले ही अचरज करें लेकिन सच ये है कि लालू के ‘आधार’ को ही महागठबंधन ने अपना ‘आधार’ बनाया है। जी हाँ, 242 उम्मीदवारों में 64 यादव और 33 मुसलमान उम्मीदवारों का होना महज संयोग नहीं है। 64 यादव उम्मीदवारों में 48 लालू के, 14 नीतीश के और 2 कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। मुस्लिम उम्मीदवारों की बात करें तो राजद के 16, जदयू के 7 और कांग्रेस के 10 उम्मीदवार मैदान में हैं। इस तरह ‘माय’ समीकरण के तहत महागठबंधन ने 64 + 33 = 97 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं जो कुल उम्मीदवारों का 40% है।

ये तो हुई यादव और मुस्लिम उम्मीदवारों की बात। अब महागठबंधन के 242 उम्मीदवारों का विश्लेषण कुछ अलग तरह से करें। ये जानना दिलचस्प होगा कि इन 242 उम्मीदवारों में 164 यानि 68% उम्मीदवार पिछड़े, अति पिछड़े तथा मुस्लिम हैं। सवर्ण तथा एससी-एसटी उम्मीदवारों की बात करें तो उन्हें 16-16% हिस्सेदारी मिली है। कुल मिलाकर, ये कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि नीतीश और कांग्रेस ने लालू की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को ही फॉलो किया है।

महागठबंधन के उम्मीदवारों को एक और कोण से देखने के बाद इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाएगा कि मोदी से असली टक्कर लालू ले रहे हैं। 2010 में नीतीश के विजय-रथ पर भाजपा भी सवार थी और उसे 91 सीटें मिली थीं। इस बार भाजपा के कब्जे वाली इन 91 सीटों में से 41 पर नीतीश और कांग्रेस के उम्मीदवार भाजपा के सामने होंगे जबकि शेष 50 सीटों पर अकेले लालू के उम्मीदवार भाजपा से लोहा ले रहे होंगे। इन सीटों पर राजद दूसरे नंबर पर था। लालू को भरोसा है कि पिछली बार जेडीयू-भाजपा साथ थी तब उनकी पार्टी दूसरे नंबर पर थी। इस बार जेडीयू और राजद साथ हैं तो इसका सीधा फायदा उन्हें मिलेगा। देखा जाय तो लालू के इस ‘विश्वास’ को नकारना बहुत मुश्किल है। एनडीए के मार्ग में जितनी कठिनाई नीतीश के ‘सुशासन’ को लेकर है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल लालू खड़ी कर रहे हैं, यादव-मुस्लिम के साथ-साथ पिछड़ों में भी अपनी पैठ के कारण।

वैसे भी महागठबंधन के अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक एनडीए के हमले का केन्द्र-बिन्दु लालू रहे हैं। भाजपा के घोषित उम्मीदवारों की सूची में 26 यादवों की मौजूदगी भी इसी तथ्य की पुष्टि करती है। भाजपा और उसके साथी दलों ने लालू पर जितना निशाना साधा है उतना ही लालू का ‘वोटबैंक’ उनके लिए एकजुट हुआ है, ऐसा राजद खेमा मानता है। खैर, लालू का वोटबैंक उनके लिए कितना एकजुट रहेगा ये तो 8 नवंबर को मतगणना के बाद ही पता चलेगा लेकिन फिलहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि बिहार के इस महामुकाबले में अगर नरेन्द्र मोदी पिछड़ते हैं और ताज फिर नीतीश के सिर होता है तो ऐसा ‘किंगमेकर’ कहलाना पसंद करने वाले लालू प्रसाद यादव के कारण ही होगा, वरना नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में भाजपा की ‘बढ़त’ पर भारी ‘दो भूल’..!

बिहार में चुनाव धीरे-धीरे परवान चढ़ रहा है। पहले चरण के लिए नामांकन हो चुके हैं और दूसरे चरण की नामांकन-प्रक्रिया चल रही है। जद्दोजहद के बाद एनडीए और महागठबंधन ने लगभग सारी सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम भी तय कर लिए हैं। अब तक के प्रचार-अभियान में भाजपा बाकी दलों से ज्यादा आक्रामक दिखी है। ‘सर्वे’ और ‘समीकरण’ से भी उसकी बढ़त दिख रही है और एनडीए खेमे में ‘फील गुड’ का माहौल साफ तौर पर देखा जा सकता है। इन ‘अच्छी-अच्छी’ बातों पर ‘दो भूल’ भाजपा को भारी पड़ सकती है।

आखिर वो ‘दो भूल’ है क्या..? ये जानने से पहले ये जानें कि जिन दो लोगों से ये ‘दो भूल’ हुई है वो हैं कौन..? आप सुनकर हैरान होंगे कि इनमें एक भाजपा के वरिष्ठ नेता और देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह हैं तो दूसरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत। ऐसे कद के लोगों से भाजपा ने ऐसी उम्मीद हरगिज ना की होगी। दिल्ली विधान सभा चुनाव में हुई भाजपा की ऐतिहासिक पराजय में नरेन्द्र मोदी के उस एक भाषण का बड़ा योगदान है जिसमें उन्होंने कहा था कि “मेरे ‘अच्छे भाग्य’ से पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम हो गई हैं और आम आदमी अधिक बचत करता है तो ‘बदकिस्मत’ व्यक्ति को लाने की क्या जरूरत है।“ उनके इस कथन का ‘संदर्भ’ चाहे जो रहा हो लेकिन उनकी जुबान ‘थोड़ी’ फिसली और भाजपा की किस्मत वहाँ ‘पूरी’ पलट गई। अगर सावधानी ना बरती गई तो बिहार में भी ऐसा होते देर नहीं लगेगी।

बहरहाल, जानते हैं कि बात क्या थी। पहले राजनाथ सिंह की बात। दिल्ली से सबक लेकर भाजपा ने बिहार में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित ना कर नरेन्द्र मोदी के ‘चेहरे’ के सहारे ही आगे बढ़ने का फैसला किया। जदयू, राजद समेत तमाम पार्टियों ने इस पर तंज कसने में कोई कसर ना छोड़ी। भाजपा को ललकारा गया कि दम है तो अपना उम्मीदवार घोषित करे। सारी पार्टियां जानती थीं कि ये भाजपा की ‘कमजोर नस’ है और भाजपा चुपचाप सारे ‘हमले’ झेलती रही। इतने दावेदार थे यहाँ कि उसे डर था कि किसी एक चेहरे को आगे करना दिल्ली को दुहराने जैसा होगा। भाजपा “एक चुप, सौ सुख” के फार्मूले पर थी और यही ठीक भी था उसके लिए। सारी पार्टियां भी समझ गईं कि ये ‘चुप्पी’ उसकी रणनीति का हिस्सा है। ये मुद्दा अपनी धार खो ही रहा था कि अचानक 6 सितम्बर को राजनाथ सिंह का बयान आया कि भाजपा जल्द ही मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का चुनाव कर लेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि भाजपा का संसदीय बोर्ड जल्द इस बात का निर्णय कर लेगा कि बिहार चुनाव में किसे सीएम पद का प्रत्याशी बनाना है। राजनाथ के इस बयान को आए 19 दिन हो गए लेकिन आज तक प्रत्याशी तय करना तो दूर इस बात को लेकर कोई सुगबुगाहट तक नहीं हुई। लोग अब पूछने लगे कि राजनाथ सरीखे नेता ने ये बयान आखिर किस आधार पर दिया था..? इससे बिहार में भाजपा के पास कोई ‘प्रतिनिधि’ चेहरा ना होने की ‘कमजोरी’ एक बार फिर उजागर हुई और कुछ नहीं। महागठबंधन को भी दोबारा ‘व्यंग्य-बाण’ छोड़ने का मौका मिल गया सो अलग।

खैर, राजनाथ के बयान से तो बात ‘व्यंग्य-बाण’ के आस-पास थी। मोहन भागवत के बयान से तो पूरा खेल ही बिगड़ जाने का डर है। जी हाँ, आरएसएस प्रमुख ने आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइज़र’ में बयान दिया है कि आरक्षण को हमेशा राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया गया है। आगे उन्होंने कहा कि एक गैर राजनीतिक समिति का गठन होना चाहिए जो समीक्षा करे कि किसे आरक्षण की जरूरत है और कब तक..? भागवत के इस बयान के आते ही आरक्षण का जिन्न बाहर निकल चुका था और भाजपा बचाव की मुद्रा में थी। पार्टी ने तुरत कहा कि वह आरक्षण की समर्थक है और भागवत के बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। लेकिन तब तक ये मुद्दा बन चुका था। नीतीश कुमार ने कहने में जरा भी देर ना की कि आरएसएस का जो विचार है वही भाजपा का विचार है और ये भी कि भाजपा बिहार चुनाव के कारण अपने को इस बयान से अलग कर रही है। अब जिस किसी ने उसे वोट किया वो अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारेगा। उधर लालू अपने अंदाज में दहाड़ रहे थे कि माँ का दूध पिया है तो आरक्षण खत्म करके दिखाओ। तुम आरक्षण खत्म करने की बात कहते हो, हम इसे आबादी के अनुपात में बढ़ाएंगे। लगे हाथ उन्होंने ये भी पूछ लिया कि हाल ही में ‘पिछड़ा’ बने मोदी बताएं कि अपने आका मोहन भागवत के कहने से आरक्षण खत्म करेंगे या नहीं..?

मोहन भागवत ने गलत कहा या सही कहा, ये यहाँ विचारणीय नहीं है। यहाँ बात बिहार में भाजपा की संभावनाओं को लेकर हो रही है। इस लिहाज से देखा जाय तो भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की बात गलत समय उठाई है। कम या ज्यादा इसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। इसी तरह राजनाथ ने सीएम प्रत्याशी की घोषणा जल्द करने की बात हो सकता है केन्द्रीय नेतृत्व स्तर पर हुए किसी विमर्श के आधार पर कही हो लेकिन व्यावहारिक तौर पर भाजपा के लिए जो ‘उचित’ या ‘सम्भव’ ना हो उसे मीडिया में कहने की जरूरत क्या थी..?

समीकरण, समय और संवाद के संयोग से ही सियासत में सफलता मिलती है। समीकरण पक्ष में हो, समय भी साथ दे रहा हो लेकिन संवाद में जरा भी चूक हो जाय तो संयोग बिगड़ने में देर नहीं लगती। इस संवाद के कारण भाजपा ने सफलता और असफलता दोनों का स्वाद चखा है। इस चुनाव में उसे क्या मिलेगा ये उसके द्वारा बरती गई सावधानी से ही तय होगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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