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भारतवंशी श्रीकांत श्रीनिवासन होंगे अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के अगले जज !

भारतवासियों को गौरव से भर देने वाली ख़बर..! अगर अन्तिम क्षणों में कोई उलटफेर ना हो तो भारतीय मूल के अमेरिकी नागरिक श्रीकांत श्रीनिवासन अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के अगले जज होंगे। 23 फरवरी 1967 को जन्मे 48 वर्षीय श्रीनिवासन इस पद पर पहुँचने वाले पहले भारतवंशी होंगे। जस्टिस एंटोनिन स्कैलिया की संदिग्ध अवस्था में अचानक मृत्यु के बाद यह पद रिक्त हुआ है।

प्राप्त जानकारी के अनुसार संभावित जजों की सूची में श्रीकांत श्रीनिवासन का नाम सबसे ऊपर है। श्रीनिवासन अभी कोलंबिया डिस्ट्रिक्ट सर्किट की अपीलीय अदालत के जज हैं। बता दें कि कोलंबिया डिस्ट्रिक्ट सर्किट को आमतौर पर सुप्रीम कोर्ट के लिए नामांकित होने वाले जजों के लिए ‘लांचिंग पैड’ माना जाता है।

राष्ट्रपति बराक ओबामा ने विपक्षी दलों के विरोध के बावजूद स्कैलिया के उत्तराधिकारी को नामांकित करने की संवैधानिक जिम्मेदारी को पूरा करने की बात कही है। स्कैलिया रूढ़िवादियों में लोकप्रिय थे। ऐसे में ओबामा इस बात को भलीभाँति जानते हैं कि उन्हें ऐसे उम्मीदवार की तलाश करनी है जिसे रिपब्लिकन भी स्वीकार करें। इस कसौटी पर श्रीनिवासन खरे उतरते हैं क्योंकि कांग्रेस में जबरदस्त राजनीतिक गतिरोध के बावजूद सीनेट में श्रीनिवासन को फेडरल जज बनाने के नामांकन को 97-0 से स्वीकार किया गया था और रिपब्लिकन पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद की दावेदारी हासिल करने में जुटे टेड क्रूज और मार्को रूबियो ने भी उनके पक्ष में वोट किया था। ऐसे में सुप्रीम कोर्ट में उनका पहुँचना तय माना जा रहा है।

श्रीकांत श्रीनिवासन की ना केवल जड़ भारत में है बल्कि वे दक्षिण और उत्तर भारत के बीच बड़ा दिलचस्प संतुलन भी साधते हैं। वो यूँ कि उनके पिता तिरुनेलवेली के थे और माँ चेन्नई की लेकिन श्रीनिवासन का जन्म चंडीगढ़ में हुआ था। श्रीनिवासन के माता-पिता 1960 में अमेरिका आए थे और पेशे से दोनों शिक्षक थे। पिता कान्सास यूनिवर्सिटी में मैथ्स के प्रोफेसर थे तो माँ कान्सास सिटी आर्ट इंस्टीट्यूट में पढ़ाती थीं।

कठिन परिश्रमी और स्वभाव से उदारवादी श्रीनिवासन ने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया और स्टैनफोर्ड लॉ स्कूल और स्टैनफोर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस से लॉ और बिजनेस में मास्टर्स किया। वे ओबामा के मुख्य उपमहाधिवक्ता रह चुके हैं। 2013 में उन्हें कोलंबिया सर्किट की अपीलीय अदालत का जज नियुक्त किया गया था। इस पद पर भी पहुँचने वाले वे पहले भारतवंशी हैं। अमेरिका के ‘सिलिकॉन वैली’ से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक भारतवंशियों का जलवा… सचमुच ‘असाधारण’ है ये उपलब्धि..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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इन पाँच ‘खिड़कियों’ से देखें… तब दिखेगी पूरी बसंत पंचमी

बसंत पंचमी यानि माघ महीने की शुक्ल पंचमी यानि ऋतुओं के राजा बसंत के आगमन का उद्घोष। इसी दिन से बसंत ऋतु की शुरुआत होती है और प्रकृति नवयौवना-सी सजना-संवरना शुरू करती है। पेड़ों के पुराने पत्तों की जगह आप नई कोंपलों को देखते हैं और प्रकृति में जैसे नए जीवन का संचार हो उठता है। बसंत सच्चे अर्थों में प्रकृति का उत्सव है जिसका आगाज उसकी पंचमी से होता है। पर केवल इतनी ही नहीं है बसंत पंचमी। इस बसंत पंचमी को देखने की खातिर कई खिड़कियाँ हैं। चलिए उनमें से इन पाँच खिड़कियों को खोलें।

पहली खिड़की…

बसंत पंचमी से जुड़ी एक रोचक कथा है। भगवान विष्णु की आज्ञा से ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना तो कर दी लेकिन वो स्वयं अपनी रचना से संतुष्ट नहीं थे। उन्हें अपनी ही रची सृष्टि मलिन और उदास लगती थी। हर तरफ बस मौन ही मौन छाया रहता था। उन्हें लगा कहीं कुछ कमी रह गई है। बहुत सोचने के बाद उन्होंने विष्णु से आज्ञा लेकर पृथ्वी पर अपने कमंडल से जल छिड़का। जलकण के पड़ते ही पृथ्वी में कम्पन होने लगा और वृक्षों के बीच से एक अद्भुत शक्ति प्रकट हुई। वह एक चतुर्भुजी सुन्दर स्त्री थी जिसके एक हाथ में वीणा थी और दूसरा हाथ वर की मुद्रा में था। शेष दोनों हाथों में पुस्तक और माला थी। जी हाँ, वो शक्ति माँ सरस्वती थी। ब्रह्मा ने उनसे वीणा बजाने का अनुरोध किया। जैसे ही माँ सरस्वती ने वीणा का मधुर नाद किया पूरी सृष्टि गुंजायमान हो गई। संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को ‘वाणी’ प्राप्त हो गई। तभी तो उन्हें वीणावादिनी और वाग्देवी जैसे नामों से पुकारते हैं। इस तरह बसंत पंचमी माँ सरस्वती का जन्मोत्सव भी है जिसे हम सरस्वती पूजा के रूप में मनाते हैं।

दूसरी खिड़की…

बसंत पंचमी हमें त्रेता युग और रामकथा से भी जोड़ती है। सीताहरण के बाद श्रीराम उन्हें खोजते हुए दक्षिण की ओर बढ़े और जिन स्थानों पर वो गए उनमें एक दंडकारण्य भी था। यहीं शबरी नाम की भीलनी रहती थी जिसने राम की भक्ति में विभोर होकर उन्हें अपने जूठे बेर खिलाए थे। वह स्थान वर्तमान गुजरात के डांग जिले में है जहाँ शबरी का आश्रम था। आपको बता दें कि श्रीराम बसंत पंचमी के दिन ही शबरी के यहाँ गए थे।

तीसरी खिड़की…

बसंत पंचमी का ऐतिहासिक महत्व भी कम नहीं। ये दिन हमें इतिहासप्रसिद्ध पृथ्वीराज चौहान की भी याद दिलाता है। पृथ्वीराज ने मोहम्मद गोरी को सोलह बार पराजित किया और हर बार उदारता दिखाते हुए उसे छोड़ दिया। पर जब सत्रहवीं बार वो स्वयं पराजित हुए तब गोरी ने उन्हें नहीं छोड़ा। वह उन्हें अपने साथ अफगानिस्तान ले गया और उनकी आँखें फोड़ दीं। इसके बाद की घटना जगतप्रसिद्ध है। मोहम्मद गोरी ने मृत्युदंड देने से पूर्व पृथ्वीराज के शब्दभेदी बाण का कमाल देखना चाहा और पृथ्वीराज ने इस बार कोई भूल नहीं की। अपने साथी चंदबरदाई की मदद से उन्होंने पहले अपने बाण को गोरी के सीने में पहुँचाया और इसके बाद पृथ्वीराज और चंदबरदाई ने एक-दूसरे के पेट में छुरा भोंक आत्मबलिदान दे दिया। 1192 में ये ऐतिहासिक घटना बसंत पंचमी के दिन ही हुई थी।

चौथी खिड़की…

बसंत पंचमी का एक सूत्र ‘कूका पंथ’ की स्थापना करने वाले गुरु रामसिंह कूका से भी जुड़ा है। 1816 ई. में उनका जन्म बसंत पंचमी के दिन ही हुआ था। गुरु रामसिंह ने उस युग में ना केवल नारी उद्धार, अन्तर्जातीय विवाह, सामूहिक विवाह, स्वदेशी और गोरक्षा के लिए आवाज बुलंद की थी बल्कि अंग्रेजों से लड़ते हुए अपनी शहादत भी दी थी।

पाँचवीं खिड़की…

बसंत पंचमी के ही दिन 1899 में सरस्वती के वरदपुत्र महाकवि निराला का जन्म भी हुआ था। अपनी रचनाओं से हिन्दी को उन्होंने जैसा गौरव दिया उसकी कोई सानी नहीं। इस ‘महाप्राण’ को जाने बिना तो ‘सरस्वती’ की पूजा भी पूरी ना होगी।

बसंत पंचमी को चाहे प्रकृति में देखें चाहे पुराणों में… त्रेतायुग में ढूंढ़ें या आधुनिक भारत में… इतिहास की नज़र से देखें या साहित्य में गोते लगाकर… अन्त में हम बस यही पाएंगे कि यौवन हमारे जीवन का बसंत है और बसंत इस ‘सृष्टि’ और हमारे ‘संस्कार’ का यौवन।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अपनी एक साल की बेटी को उसके नाम की परिभाषा दे गए हनुमंथप्पा

लांसनायक हनुमंथप्पा कोप्पाड़ हमारे बीच नहीं रहे। सियाचिन ग्लेशियर में माइनस 45 डिग्री सेल्सियस तापमान के बीच छह दिन तक कई टन बर्फ के नीचे दबे रहने के बाद भी सियाचिन को जीत लेने वाला हनुमंथप्पा ज़िन्दगी की जंग हार गया। बीस हजार फुट ऊँची चोटी पर डेढ़ सौ घंटों तक बर्फ के नीचे दबे रहने के बावजूद हनुमंथप्पा का जिन्दा रहना ‘चमत्कार’ था। मानवता के सम्पूर्ण इतिहास में अदम्य जिजीविषा की ऐसी दूसरी बानगी नहीं। वे तो हनुमंथप्पा के शरीर के अहम अंग थे जिन्होंने इलाज के दौरान काम करना बंद कर दिया वरना ‘मन’ से तो उस जवान ने मौत को भी मात दे ही दी थी।

Hanumanthappa's Rescue Operation at Siachen.
Hanumanthappa’s Rescue Operation at Siachen.

आज जबकि हममें से ज्यादातर ऐशो-आराम के लिए ‘मरे’ जा रहे हैं, इस 33 साल के जांबाज ने अपनी 13 साल की नौकरी में शांति वाले क्षेत्रों की जगह आगे बढ़-बढ़कर कठिन और संघर्ष वाले क्षेत्रों को चुना और पूरे दस साल हम सबके लिए ‘लड़ने’ में बिता दिए। सियाचिन पोस्ट पर हनुमंथ्प्पा की तैनाती पिछले साल चार अक्टूबर को हुई थी। यहाँ दिन का तापमान माइनस 15 डिग्री होता है और रात में माइनस 55 डिग्री तक गिर जाता है लेकिन हनुमंथप्पा की मुस्तैदी में कभी रत्ती भर भी कमी नहीं देखी गई। तीन फरवरी को जब 800 फुट लम्बी और 400 फुट चौड़ी बर्फ की दीवार टूटकर दुनिया के सबसे ऊँचे युद्धक्षेत्र सियाचिन के उत्तरी ग्लेशियर में सेना के शिविर पर आ गिरी, उस वक्त भी ये जवान अपनी ‘ड्यूटी’ पर तैनात था और इस कदर तैनात था कि नौ साथियों के बर्फ की कब्र में शहीद हो जाने के बावजूद हमें ‘फर्ज’ और ‘साहस’ की सच्ची परिभाषा समझा देने तक खुद को जिन्दा रख पाया।

PM Modi & Army Chief Suhag Paying a visit to Hanamanthappa at Army Hospital in Delhi.
PM Modi & Army Chief Suhag Paying a visit to Hanamanthappa at Army Hospital in Delhi.

कर्नाटक में धारवाड़ के छोटे से गांव बेटूर के रहने वाले हनुमंथप्पा के गांव में ज्यादातर लोग किसान हैं। चार भाइयों में सबसे छोटे हनुमंथप्पा का परिवार भी खेती करता है। हनुमंथप्पा ने गांव के स्कूल में ही शुरुआती पढ़ाई की थी और रिटायर होने के बाद वहीं बच्चों को पढ़ाना चाहते थे। हनुमंथप्पा की शादी चार साल पहले हुई थी। अपनी पत्नी की गोद में वो एक बेटी छोड़ गए जो पिछले साल ही पैदा हुई। बेटी का नाम उन्होंने ‘नेत्रा’ रखा था।

Hanumanthappa's Mother, Wife & Daughter 'Netra'.
Hanumanthappa’s Mother, Wife & Daughter ‘Netra’.

एक साल की मासूम ‘नेत्रा’ अब अपने पिता को अपनी माँ के सूने नेत्रों में ही देख पाएगी लेकिन वो बड़ी होगी देश के करोड़ों नेत्रों के बीच जिनमें उसके पिता के लिए श्रद्धा का अथाह जल उमड़ रहा होगा। बड़ी होकर वो जान पाएगी कि उसके पिता ने अपनी बेटी का नाम ‘नेत्रा’ यूं नहीं रखा था… उसने अपने ‘बलिदान’ से उस नाम को परिभाषित भी किया था। नमन हनुमंथप्पा… शत्-शत् नमन।

Army chief Gen. Dalbir Singh Suhag, Air Chief Marshal Arup Raha and Navy chief, Admiral Robin K. Dhowan paying last respects to Lance Naik Hanumanthappa.
Army chief Gen. Dalbir Singh Suhag, Air Chief Marshal Arup Raha and Navy chief, Admiral Robin K. Dhowan paying last respects to Lance Naik Hanumanthappa.

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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तुम ये कैसे जुदा हो गए… हर तरफ हर जगह हो गए..!

लिखने वाले बहुत हुए और बहुत होंगे पर ऐसे कितने हैं जिनकी दो पंक्तियां आप सुनें और आपके मुँह से बरबस निकल पड़े कि ये ‘फलां’ की ही हो सकती हैं। शब्दों पर अपनी छाप लगा देना सबके बस की बात नहीं। माँ सरस्वती ये कृपा अपने बिरले पुत्रों पर करती हैं और निदा फ़ाज़ली उन्हीं में एक थे। “कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता/ कहीं जमीं तो कहीं आस्मां नहीं मिलता” या “दुनिया जिसे कहते हैं जादू का खिलौना है/ मिल जाए तो मिट्टी है खो जाए तो सोना है” या “तू इस तरह मेरी ज़िन्दगी में शामिल है” या फिर “होशवालों को ख़बर क्या, बेख़ुदी क्या चीज़ है” जैसी पंक्तियां आप सुनते हैं तो दिल और दिमाग पर बस एक अक्श उभरता है और वो है निदा फ़ाज़ली का जिन्होंने कल मुंबई में 78 साल की उम्र में अंतिम सांस ली। नियति की विडंबना देखिए, लाखों दिलों को धड़कना सिखा देने वाले शायर ने ये दुनिया भी छोड़ी तो दिल का दौरा पड़ने से..!

निदा फ़ाज़ली का जन्म 1938 में दिल्ली में रहने वाले एक कश्मीरी परिवार में हुआ था। मुर्तुजा हसन और जमील फातिमा के पुत्र निदा का असली नाम मुक्तदा हसन था। शायर के तौर पर उन्होंने खुद को निदा फ़ाज़ली कहलाना पसंद किया। ‘निदा’ का अर्थ है ‘स्वर’ और उसके साथ ‘फाजली’ की मौजूदगी है दूर रहकर भी कश्मीर से हमेशा जुड़े रहने के लिए।

आधुनिक साहित्य में गंगा-जमुनी तहजीब को जिन्दा रखने वालों में निदा की कोई सानी नहीं। वो जितने उर्दू के थे उतने ही हिन्दी के। उन्हें शायरी की प्रेरणा सूरदास और कबीर से मिली थी। उन्हें जितना उनकी ग़जलों के लिए याद किया जाएगा उतना ही बेहद आसान भाषा में लिखे दोहों के लिए। 1990 के दशक में उनके दोहों का एलबम ‘इनसाइट’ बहुत लोकप्रिय हुआ था जिसे जगजीत सिंह ने आवाज़ दी थी। ये एलबम भारत की मिली-जुली संस्कृति, सादगी और इंसानियत का जैसे आईना था। जगजीत सिंह और निदा फ़ाज़ली जब-जब साथ आए दोनों ने हर बार मिलकर बस ‘जादू’ ही तो रचा।

पद्मश्री (2013) और साहित्य अकादमी (1998) जैसे पुरस्कारों से सम्मानित निदा फ़ाज़ली सच्चे अर्थों में आम जनता के शायर थे और उनका ‘आम’ होना उन्हें और भी ‘खास’ बना देता है। जहाँ एक ओर उन्होंने ‘सफर में धूप तो होगी’, ‘खोया हुआ सा कुछ’, ‘आँखों भर आकाश’, ‘मौसम आते-जाते हैं’, ‘लफ्जों के फूल’, ‘मोर नाच’, ‘आँख और ख़्वाब के दर्मियां’ और ‘शहर में गांव’ जैसी यादगार कृतियां दीं वहीं ‘आहिस्ता-आहिस्ता’, ‘आप तो ऐसे न थे’, ‘रजिया सुल्तान’, ‘इस रात की सुबह नहीं’, ‘सरफरोश’ और ‘सुर’ जैसी फिल्मों को अपने गीतों से अमर कर दिया। हिन्दी-उर्दू जुंबां की शायरी की बात करें तो हिन्दी सिनेमा में मजरूह सुल्तानपुरी के बाद निदा फ़ाज़ली का ही नाम आएगा।

मंदिर-मस्जिद के नाम पर जहाँ आज भी दंगे होते हों वहाँ ये लिखने का साहस निदा फ़ाज़ली ही कर सकते थे कि “बच्चा बोला देखकर मस्जिद आलीशान, एक खुदा के पास इतना बड़ा मकान”। निदा ने ताउम्र बस एक धर्म जाना और वो था इंसानियत का धर्म। “घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूं कर लें/ किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए” – धर्म के मर्म को इस तरह बस निदा ही बयां कर सकते थे। आज जबकि वो हमारे बीच नहीं हैं, उन्हीं के शब्दों में बस इतना कहा जा सकता है “तुम ये कैसे जुदा हो गए… हर तरफ हर जगह हो गए”। इस अजीमोशान शायर को मधेपुरा अबतक की श्रद्धांजलि।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदी मिले दाऊद से… ये क्या कह दिया आजम ने..?

उत्तर प्रदेश के कद्दावर कैबिनेट मंत्री मोहम्मद आजम खान प्रभावशाली मुस्लिम नेता माने जाते हैं। हालाँकि मुस्लिम वोट बैंक पर उनकी कितनी पकड़ है ये विवाद का विषय हो सकता है लेकिन ये बात निर्विवाद रूप से कही और मानी जा सकती है कि राज्य की राजनीति और खास तौर पर समाजवादी पार्टी की राजनीति पर उनकी पकड़ बहुत गहरी है। इतनी गहरी कि वो जब जो चाहें कर दें, जो चाहें बोल दें… उन्हें रोकने और टोकने वाला कोई नहीं। उन्हें ‘चाचा’ कहने वाले मुख्यमंत्री अखिलेश की तो छोड़ें, सपा सुप्रीमो मुलायम भी उनके मामले में रहस्यमयी चुप्पी साधे रहते हैं।

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब उत्तर प्रदेश के राज्यपाल राम नाईक के साथ उनके कथित ‘दुर्व्यवहार’ का मामला सामने आया था। ये तो एक बानगी भर है। वैसे भी आजम आए दिन अपने बयानों से अपनी पार्टी को ‘असहज’ स्थिति में डालते रहे हैं। लेकिन इस बार तो उन्होंने हद ही कर दी। परसों उन्होंने एक सनसनीखेज बयान दिया कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जब पाकिस्तान में नवाज शरीफ और उनके परिवार से मुलाकात कर रहे थे तब उस दौरान कमरे में दाऊद इब्राहिम भी था। हालांकि सरकार ने बिना देर किए इस बयान का पुरजोर खंडन किया। सरकारी प्रवक्ता फ्रैंक नरोन्हा ने आजम के बयान को पूरी तरह आधारहीन, तथ्यहीन और झूठा बताया। लेकिन तब तक आजम ‘सुर्खियां’ बटोर चुके थे।

कहने को आजम खान यहाँ तक कहते हैं कि बादशाह (मोदी) कहें तो सबूत के तौर पर तस्वीर भी दिखा सकता हूँ। नवाज शरीफ के यहाँ उनकी माँ से मोदी की मुलाकात के दौरान साथ में अडानी और जिन्दल भी थे। उन्होंने यह भी कहा कि हमारे पीएम पाक के पीएम को पश्मीना शॉल और मलीहाबादी आम भेजते हैं तो वहाँ से सींक कबाब आता है। इसके भी मेरे पास सबूत हैं। उन्होंने साथ में यह भी जोड़ा कि कबाब लौकी से नहीं बनते हैं।

यहाँ एक साथ कई प्रश्न उठते हैं। पहला, अगर आजम ओछी राजनीति और सस्ती लोकप्रियता के लिए ऐसा नहीं कर रहे हैं और उनके पास सचमुच कोई ‘सबूत’ है तो उसे सामने लाने में देर किस बात की..? दूसरा, अगर किसी प्रदेश का मंत्री बिना किसी ‘सबूत’ के देश के प्रधानमंत्री पर इतने गंभीर आरोप लगा रहा है तो ऐसे में संविधान, संसद, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग जैसी संस्थाओं की क्या भूमिका रह जाती है..? तीसरा, क्या सचमुच ऐसे बयानों से उन्हें या उनकी पार्टी को लाभ हो सकता है..? और चौथा, ऐसे में हमारे लोकतंत्र का क्या भविष्य रह जाएगा..?

सच तो ये है कि ऐसे सवालों के जवाब ढूँढ़ने के लिए जैसा ‘नैतिक बल’ चाहिए वो आज की तारीख में किसी दल और किसी नेता के पास सौ फीसदी मिलना नामुमकिन-सा है। हमाम में कमोबेश सब नंगे दिखाई देते हैं। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा राज्य है और वहाँ चुनाव सिर पर है। देश की दिशा तय करने में इस राज्य ने हमेशा से बड़ी भूमिका निभाई है। क्या ये उम्मीद की जाय कि उत्तर प्रदेश इस चुनाव से सार्वजनिक जीवन में मर्यादा की नई लकीर खींच पाने की सफल शुरुआत करेगा..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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आईपीएल में गुजरात लायंस की ओर से खेलेगा बिहार का ‘शेर’ ईशान

क्रिकेट की दुनिया में बिहार की उम्मीदों को पर देने वाले ईशान किशन आईपीएल के नौवें सत्र में गुजरात लायंस की ओर से खेलेंगे। आईसीसी अंडर-19 विश्व कप में भारत की जूनियर टीम के कप्तान ईशान आईपीएल के लिए चुने जाने वाले पटना के पहले और बिहार के दूसरे खिलाड़ी हैं। उनसे पहले नालंदा के तेज गेंदबाज वीर प्रताप सिंह का चयन आईपीएल की टीम सनराइजर्स हैदराबाद के लिए हुआ था। हालाँकि नौवें सत्र के लिए वीर प्रताप को किसी टीम नहीं खरीदा। अब बिहार की अपेक्षाओं का सारा भार ईशान के कंधों पर होगा। बता दें कि महेन्द्र सिंह धोनी को आदर्श मानने वाले ईशान उन्हीं की तरह विकेटकीपर बल्लेबाज हैं।

आईपीएल के लिए बेटे के चयन से फूले नहीं समा रहे पिता प्रणव किशन पांडेय कहते हैं कि ईशान का क्रिकेट के इस लोकप्रिय फॉर्मेट के लिए चुना जाना बिहार के लिए गौरव की बात है। दुनिया भर के बेहतरीन क्रिकेटरों के साथ खेलने से उसके खेल में और निखार आएगा। उन्होंने बताया कि यह ईशान के लिए खुद को साबित करने का शानदार मौका है। बता दें कि पटना के डीपीएस के छात्र रहे ईशान को क्रिकेट खेलने की वजह से एटेंडेंस पूरा नहीं कर पाने के कारण स्कूल से निकाल दिया गया था। लेकिन पिता ने हार नहीं मानी और बेटे की खेल प्रतिभा पर भरोसा कर उसका दाखिला अश्विनी पब्लिक स्कूल में कराया जहाँ उसे क्रिकेट खेलने की सुविधा मिली और वो अपने ‘गन्तव्य’ की ओर कदम बढ़ा पाया।

बिहार के प्रसिद्ध क्रिकेटर अमीकर दयाल के शिष्य ईशान ने क्रिकेट की बारीकियां पटना में ही सीखीं। तीन साल पहले क्रिकेट खेलने वे रांची गए जहाँ सेल के कप्तान अरुण विद्यार्थी ने उनकी प्रतिभा को पहचाना और सेल के लिए खेलने का मौका दिया। ईशान ने अपने करियर की शुरुआत रणजी ट्रॉफी ग्रुप सी (प्रथम श्रेणी क्रिकेट) में 2014 में की। इसके बाद इस होनहार खिलाड़ी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। पहले भारत की जूनियर टीम के कप्तान और अब आईपीएल के लिए चुने जाकर इस खिलाड़ी ने अपनी नैसर्गिक प्रतिभा साबित की है। बता दें कि गुजरात लायंस ने उनके लिए 35 लाख की बोली लगाई।

ईशान किशन जिस रफ्तार से सफलता की सीढ़ियां चढ़ रहे हैं उसे देखते हुए ये आशा की जानी चाहिए कि वे बहुत जल्द भारतीय टीम के सदस्य बनेंगे। ना केवल बिहार बल्कि झारखंड भी इस विकेटकीपर बल्लेबाज में अगले ‘धोनी’ को देख रहा है। ‘मधेपुरा अबतक’ की ओर से क्रिकेट के इस ‘भविष्य’ को भविष्य के लिए ढेर सारी मंगलकामनाएं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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इतनी जल्दी खुल गई ‘महागठबंधन’ की गांठ..?

अभी ज्यादा दिन नहीं हुए जब लालू ने कहा था कि नीतीश बिहार में शासन चलाएंगे और वे खुद महागठबंधन की ‘मशाल’ लेकर देश भर में घूमेंगे। महागठबंधन के ‘भीतर’ और ‘बाहर’ “ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे” का माहौल दिख रहा था। पर ये क्या बिहार का बॉर्डर पार कर यूपी पहुँचते-पहुँचते उस ‘मशाल’ की लौ धीमी पड़ गई। अब ख़बर ये आ रही है कि यूपी चुनाव में ‘बड़े भाई’ और ‘छोटे भाई’ की राह अलग-अलग होगी। इस बात का संकेत और किसी ने नहीं स्वयं जेडीयू के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने दिया है।

मंगलवार को वशिष्ठ नारायण सिंह ने कहा कि बिहार जैसा महागठबंधन उत्तर प्रदेश में भी बने, ऐसा जरूरी नहीं है। उन्होंने बताया कि यूपी के कई दलों ने नीतीश कुमार से सम्पर्क किया है। पार्टी की सोच है कि वहाँ नीतीश कुमार के ‘नेतृत्व’ में महागठबंधन बने। इस बाबत कई सामाजिक संगठन भी सम्पर्क में हैं। सिंह ने कहा कि यूपी में हमारा ‘हस्तक्षेप’ होगा। हम वहाँ चुनाव में अपने उम्मीदवार उतारेंगे। आने वाले दिनों में नीतीश कुमार वहाँ राजनीतिक कार्यक्रमों में भाग लेंगे। वैसे बता दें कि नीतीश कल भी गाजीपुर के एक कार्यक्रम में सम्मिलित हुए।

यूपी चुनाव को लेकर जेडीयू का ये स्टैंड अकारण नहीं है। सूत्रों के अनुसार आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के बीच पारिवारिक रिश्ता होने के कारण इस बात की प्रबल सम्भावना है कि आरजेडी यूपी में समाजवादी पार्टी के खिलाफ सक्रिय नहीं होगी। दूसरी ओर, बिहार चुनाव से ठीक पहले महागठबंधन से सपा के अलग हो जाने के कारण जेडीयू मुलायम के साथ किसी भी प्रकार के राजनीतिक तालमेल के पक्ष में नहीं है।

जेडीयू ने यूपी में अपनी जमीन तलाशने को लेकर सक्रियता बढ़ा दी है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और प्रधान महासचिव केसी त्यागी पहले से ही ‘मिशन यूपी’ पर थे। अब मुख्यमंत्री नीतीश कुमार खुद यूपी की किलेबंदी की कवायद में कूद पड़े हैं। नीतीश अभी दिल्ली प्रवास पर हैं और बताया जा रहा है कि इस प्रवास का मूल उद्देश्य यूपी चुनाव से जुड़ी सम्भावनाओं पर काम करना है। उनकी मुलाकात पूर्वी उत्तर प्रदेश में मजबूत पकड़ रखने वाली ‘पीस पार्टी’ के नेता अय्यूब अंसारी और राष्ट्रीय लोकदल के अध्यक्ष अजीत सिंह से तय है। इसके अतिरिक्त जेडीयू ‘अपना दल’ के सम्पर्क में भी है।

ये तो हुई ‘बड़े भाई’ और ‘छोटे भाई’ की पार्टियों की बात। यूपी चुनाव को लेकर बिहार के महागठबंधन में शामिल तीसरी पार्टी कांग्रेस का रुख देखना भी कम दिलचस्प नहीं होगा। फिलहाल कांग्रेस ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। वैसे असम में नीतीश कांग्रेस को आगे कर जिस तरह ‘भाजपाविरोधी’ महागठबंधन की कोशिश में लगे हुए हैं उसे देखते हुए इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि यूपी में भी नीतीश के प्रस्तावित महागठबंधन से देर-सबेर कांग्रेस का ‘जुड़ाव’ हो जाय। ऐसे में सबकी निगाह ‘अकेली’ पड़ गई आरजेडी की प्रतिक्रिया पर होगी और साथ में इस पर भी कि क्या उस ‘प्रतिक्रिया’ का बिहार पर भी कोई ‘असर’ होगा..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जी हाँ, आपके प्रधानमंत्री के पास नहीं है अपनी गाड़ी..!

आज जबकि भ्रष्टाचार पर्याय बन गया हो राजनीति का और ‘बड़े’ स्तर पर होने वाले ‘छोटे’ घोटाले भी अरबों के होते हों, ऐसे में भारत के प्रधानमंत्री के पास अपनी गाड़ी तक ना हो तो क्या कहेंगे आप..? आज जबकि नेताओं के लिए ये याद रखना तक मुश्किल हो कि उनके कितने बैंकों में कितने खाते हैं, ऐसे में प्रधानमंत्री के पद पर आसीन व्यक्ति का दिल्ली में कोई खाता ही ना हो और कैश के नाम पर हों केवल 4700 रुपये तो यकीनन ये बात विस्मय से भर देगी। यकीन मानें हम यहाँ कोई पहेली नहीं बुझा रहे, ये सोलह आने सच है। जी हाँ, ये ब्योरा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सम्पत्ति का है जिसे प्रधानमंत्री कार्यालय ने जारी किया है।

प्रधानमंत्री कार्यालय द्वारा घोषित ताजा जानकारी के मुताबिक मोदी के हाथ में पिछले वित्त वर्ष के अन्त में मात्र 4700 रुपया कैश था। वित्त वर्ष के मध्य में यानि 18 अगस्त 2014 को घोषित विवरण में यह राशि 38,700 रुपये की थी। ये जानकारी भी सामने आई कि प्रधानमंत्री मोदी अब भी अपने पुराने बैंक का खाता ही बरकरार रखे हुए हैं। दिल्ली में उनका कोई बैंक खाता नहीं है। इस घोषणा के मुताबिक प्रधानमंत्री के पास कोई मोटर वाहन भी नहीं है।

चल सम्पत्ति की बात करें तो प्रधानमंत्री के पास सोने की चार अंगूठियां हैं जिनका कुल वजन करीब 45 ग्राम और मार्च 2015 के अनुसार कुल मूल्य करीब 1.19 लाख रुपये था। 18 अगस्त 2014 को इन अंगूठियों की कीमत 1.21 लाख रुपये आंकी गई थी। प्रधानमंत्री मोदी के पास 20 हजार रुपये का एलएंडटी इन्फ्रा बॉन्ड (टैक्स सेविंग), करीब 5.45 लाख रुपये के राष्ट्रीय बचत प्रमाण-पत्र तथा 1.99 रुपये की जीवन बीमा पॉलिसी है। बता दें कि उनकी कुल चल सम्पत्ति 41.5 लाख रुपये की है।

अचल सम्पत्ति के रूप में मोदी के पास गांधीनगर स्थित एक आवासीय परिसम्पत्ति का चौथाई हिस्सा है। उनके हिस्से में इस परिसम्पत्ति का 3531.45 वर्गफुट का दायरा है जिसमें निर्मित क्षेत्र 169.81 वर्गफुट है। प्रधानमंत्री कार्यालय ने स्पष्ट किया है कि यह विरासत में मिली परिसम्पत्ति नहीं है। घोषणा के मुताबिक इसे उन्होंने अक्टूबर 2002 में खरीदा था और उस समय इसका मूल्य एक लाख 30 हजार 488 रुपये था। इस जमीन पर निर्माण आदि के तौर पर 2 लाख 47 हजार 208 रुपये का निवेश किया गया। इस तरह इस परिसम्पत्ति की कुल लागत 3 लाख 77 हजार 696 रु. हुई। 13 साल में इसकी कीमत लगभग 26 गुना बढ़ गई और 2015 में इसका बाज़ार मूल्य एक करोड़ आंका गया।

इस तरह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पास कुल चल-अचल सम्पत्ति एक करोड़ 41 लाख 50 हजार की है। स्पष्ट है कि इसमें मुख्य योगदान एक रिहायशी प्रॉपर्टी का है और वो भी 13 साल की अवधि में मूल्य बढ़ जाने के कारण।

हमें याद रखना होगा कि हम यहाँ उस शख़्स की बात कर रहे हैं जो प्रधानमंत्री होने से पूर्व गुजरात जैसे राज्य का मुख्यमंत्री भी रह चुका है और वो भी लगातार चार बार। गुजरात दंगों के कारण उन्हें आरोपों और आलोचनाओं का सामना बेशक करना पड़ा लेकिन उनके धुर विरोधी भी उन पर किसी घोटाले का आरोप नहीं लगा सके। प्रधानमंत्री के रूप में उनकी सम्पत्ति का जो ब्योरा सामने आया है उससे उनकी इस ‘शुचिता’ पर मुहर लगती है। ‘अर्थ’ के युग में वो ‘अनर्थ’ से बचे हुए हैं तो ये सचमुच बड़ी बात है। भौतिकता के पीछे आँख पर पट्टी बांध दौड़ने वालों को क्या अपने प्रधानमंत्री से सीख नहीं लेनी चाहिए..? थोड़ी देर के लिए राजनीति से ऊपर उठकर..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश कुमार को पेरियार इंटरनेशनल का सोशल जस्टिस अवार्ड   

अगर आप काम करेंगे तो तय है कि आपको पहचान मिलेगी और अगर आपका काम समाज को समर्पित है तो आप वास्तव में बड़े सम्मान के हकदार हैं। हम यहाँ बात कर रहे हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जिन्हें ‘पेरियार इंटरनेशनल’ ने सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए ‘के. वीरमणि सोशल जस्टिस अवार्ड’ से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। नीतीश को यह सम्मान वर्ष 2015 के लिए दिया जाएगा। बता दें कि यह पुरस्कार महान समाज सुधारक और दलित आदर्श पेरियार ई.वी. रामासामी के अनिवासी भारतीय अनुयायियों द्वारा ‘द्रविड़ कड़गम’ के अध्यक्ष व तमिलनाडु स्थित पी.एम. यूनिवर्सिटी (Periyar Maniammai University) के चांसलर डॉ. के. वीरमणि के नाम पर शुरू किया गया है।

अमेरिका स्थित ‘पेरियार इंटरनेशनल’ सामाजिक न्याय के क्षेत्र में कार्य करने वाला विश्वस्तरीय संगठन है। इस संगठन द्वारा इससे पूर्व यह सम्मान पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, एम करुणानिधि, सीताराम केसरी और मायावती जैसी 16 हस्तियों को दिया जा चुका है। चन्द्रजीत यादव, जीके मूपनार, वी. हनुमंत राव और छगन भुजबल भी यह पुरस्कार पा चुके हैं। अवार्ड समिति के अध्यक्ष लक्ष्मण तमिल ने कहा कि पेरियार इंटरनेशनल नीतीश को यह सम्मान पटना में देने की योजना बना रहा है।

अपने लम्बे राजनीतिक जीवन में नीतीश ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। उनके कुछ निर्णयों की आलोचना भी हुई है। लेकिन न्याय के साथ विकास के लिए उन्होंने जो प्रतिबद्धता दिखाई है उसके कायल उनके विरोधी भी रहे हैं। बिहार चुनाव में महागठबंधन को मिली ऐतिहासिक सफलता ने प्रमाणित किया कि नीतीश की व्यक्तिगत छवि बिहार के तमाम राजनीतिक समीकरणों पर भारी है। बिहार जैसे जटिल सामाजिक व राजनीतिक संरचना वाले राज्य में ‘सुशासन’ की धाक जमा कर नीतीश ने ना केवल राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है। नीतीश को दिया जाने वाला उपरोक्त पुरस्कार इसी बात की तस्दीक है।

बिहार और देश के हित में निरन्तर कार्य कर भविष्य में ऐसी अनेक उपलब्धियां हासिल करने के निमित्त ‘मधेपुरा अबतक’ सामाजिक न्याय के इस पुरोधा को अपनी शुभकामनाएं देता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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वैश्विक भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत का 76वां स्थान और आगे का सफर

भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल ने बुधवार को 2015 का वैश्विक भ्रष्टाचार सूचकांक (इन्टरनेशनल करप्शन परसेप्शन इंडेक्स) पेश किया जिसमें भारत 76वें स्थान पर है। 100 के ग्रेड स्केल में भारत का स्कोर 38 है। सर्वाधिक 91 स्कोर के साथ डेनमार्क इस सूची में लगातार दूसरे साल शीर्ष पर है। उत्तर कोरिया और सोमालिया न्यूनतम 8 स्कोर के साथ सबसे निचले पायदान पर हैं। बता दें कि बर्लिन स्थित ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल विश्वस्तर पर प्रतिष्ठित संस्था है जो विश्व बैंक आदि स्रोतों से प्राप्त डेटा के आधार पर भ्रष्टाचार सूचकांक तैयार करती है। इस सूचकांक से शून्य (अत्यधिक भ्रष्ट) से 100 (बहुत साफ-सुथरा) के स्केल पर विभिन्न देशों के सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार के स्तर का पता चलता है।

ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल ने इस साल कुल 168 देशों की सूची जारी की है। 2014 में इस संस्था ने 174 देशों का मूल्यांकन किया था जिसमें भारत का 85वां स्थान था। कहने का अर्थ यह है कि भारत ने 2015 में अपनी रैंकिंग में 9 स्थान की छलांग लगाई है। यह ख़बर राहत तो देती है लेकिन आंशिक रूप से, क्योंकि भारत के स्कोर में कोई सुधार नहीं हुआ। भारत का स्कोर पिछले साल भी 38 ही था।

यह बता देना भी जरूरी है कि भारत उक्त सूचकांक में 76वें स्थान पर अकेला नहीं है। इस पायदान पर उसके साथ थाइलैंड, ब्राजील, ट्यूनीशिया, जांबिया और बुर्किनाफासो भी खड़े हैं। भारत के पड़ोसियों की बात करें तो भूटान 65 स्कोर के साथ 27वें स्थान पर है। चीन का स्कोर 37 है और वह 83वें स्थान पर है। पाकिस्तान और बांग्लादेश की हालत दयनीय है। पाकिस्तान जहाँ 30 स्कोर के साथ 117वें स्थान पर है वहीं बांग्लादेश 25 स्कोर के साथ 139वें स्थान पर।

ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल के इस सूचकांक के अनुसार डेनमार्क जैसे कुछ देश भ्रष्टाचार के मामले में भले ही बहुत हद तक साफ-सुथरे हों लेकिन दुनिया में एक भी देश ऐसा नहीं जिसे भ्रष्टाचार से मुक्त कहा जा सके। दुनिया के 68 प्रतिशत देशों में भ्रष्टाचार की समस्या अत्यन्त गंभीर रूप में व्याप्त है। ऐसे देशों में जी-20 समूह के आधे सदस्य देश भी शामिल हैं।

यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि समूचे विश्व में भ्रष्टाचार एकमात्र ऐसा मुद्दा है जिसे ‘सर्वव्यापी’ कहा जा सकता है। संसार का शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसका सामना जीवन के किसी ना किसी मोड़ पर किसी ना किसी रूप में भ्रष्टाचार नाम की इस चीज से ना हुआ हो। जब ‘महामारी’ इस कदर फैल जाय तो जाहिर है कि उससे उबरने की कोशिश भी होगी। भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली इस संस्था ने इस ओर भी इशारा किया और कहा कि बदलाव की ‘जन आकांक्षा’ के कारण ही भारत और श्रीलंका जैसे देशों में नई सरकारें आईं।

अगर ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल की निगाह और टिप्पणी सरकारों के भ्रष्टाचाररोधी मंचों के जरिये सत्ता में आने पर है तो इस बात पर भी है कि भारत (और श्रीलंका) के नेताओं ने इस समस्या को लेकर लम्बे-चौड़े वादे तो किए लेकिन पूरा करने में नाकाम रहे। क्या हम ये उम्मीद करें कि हमारे हुक्मरान इस प्रतिष्ठित संस्था की ‘टिप्पणी’ को गम्भीरता से लेंगे और कुछ ऐसा जतन करेंगे कि अगले साल के सूचकांक में हम डेनमार्क जैसे देशों के करीब जाने के लिए कुछ और ऊपर का सफर तय कर लेंगे..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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