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कराहते सीरिया का सच

क्या आप ओमरान दक्नीश को जानते हैं? यकीनन आपमें से ज्यादातर लोग उसके नाम से वाकिफ नहीं होंगे, लेकिन अगर आपके हाथ में स्मार्ट फोन है या इंटरनेट से आपका दूर का भी वास्ता है या देश-दुनिया की ख़बरों में आपकी थोड़ी-सी भी रुचि है तो ऊपर दी गई तस्वीर को पहचान जरूर लेंगे। खून और मिट्टी से सना ये पाँच साल का बच्चा ओमरान दक्नीश है, जो एंबुलेंस में बैठा है और जिसकी सूनी आँखें जंग से कराहते सीरिया का सच बयां कर रही हैं। सोशल मीडिया पर वायरल हो चुकी ये तस्वीर सीरिया के मौजूदा हालात का प्रतीक बन गई है।

आप सोच रहे होंगे कि इस मासूम बच्चे को आखिर किस गुनाह की सजा मिली है? तो जान लें कि इस बच्चे का गुनाह ये है कि इसका घर सीरिया के ‘विद्रोहियों’ के इलाके में मौजूद है और ये ‘गुनाह’ इस बात के लिए काफी है कि सीरियन आर्मी और रूस उसके घर पर हवाई हमला कर सकें। बता दें कि अलेप्पो मीडिया सेंटर ने इस पूरी घटना का वीडियो भी सोशल मीडिया पर शेयर किया है।

वैसे ये कहानी केवल ओमरान दक्नीश की नहीं। ओमरान तो फिर भी खुशकिस्मत है कि जीवित है। आप याद करें अयलान कुर्दी को। एक तीन साल का बच्चा जो सितंबर 2015 में अपने माता-पिता के साथ सीरिया से भागकर यूरोप आ रहा था कि नाव पलट गई और उसकी नन्ही-सी लाश बहकर समुद्र के किनारे आ लगी। अयलान ने अपने पिता से आखिरी शब्द कहे थे – “मैं आपका हाथ नहीं पकड़ूँगा, आप मेरा हाथ पकड़ो पापा, मेरा हाथ छूट जाएगा”…। हाथ सचमुच छूट गया था और समुद्र के किनारे बहकर आई उस नन्ही-सी लाश का वजन पूरी दुनिया ने अपनी छाती पर महसूस किया था।

सीरिया सब दिन ऐसा नहीं था। कभी इसे समृद्ध देशों में शुमार किया जाता था। पर इसकी खुशहाली को किसी की नज़र लग गई। आज आईएसआईएस, रेबल ग्रुप, सीरियन सरकार, नाटो और रशियन आर्मी ने इसे जंग के मैदान में तब्दील कर दिया है। इस जंग में अब तक करीब डेढ़ लाख लोग मारे गए हैं और  एक करोड़ से ज्यादा लोगों को विस्थापन झेलना पड़ा है। एक अनुमान के मुताबिक अब तक 76 लाख लोग भागकर यूरोप के देशों में पहुँचे हैं और ये अभी भी लगातार जारी है।

सीरिया का ये संकट साल 2011 में वहाँ की बशर अल असद के नेतृत्व वाली ‘बाथ सरकार’ के समर्थकों और विरोधियों के बीच सशस्त्र संघर्ष से शुरू हुआ था, जो अब विध्वंशकारी रूप ले चुका है। विद्रोही चाहते हैं कि राष्ट्रपति असद पदत्याग करें और बाथ पार्टी के शासन का अंत हो। कहने को यह सीरिया का गृहयुद्ध है पर वास्तविकता यह है कि सीरिया को लेकर पूरी दुनिया दो खेमों में बंट गई है। अपने-अपने हितों को देखते हुए एक ओर रूस और ईरान जैसे देश इस बात पर अड़े हैं कि बशर अल असद ही सीरिया के राष्ट्रपति बने रहेंगे तो दूसरी ओर अमेरिका, सऊदी अरब और तुर्की जैसे देश हैं जो सीरिया के असदविरोधी गठबंधन ‘नेशनल कोएलिशन’ के समर्थक हैं और उनकी हर संभव मदद कर रहे हैं।

सीरिया संकट एशिया की दो महाशक्तियों भारत और चीन की विदेश नीति की परीक्षा भी है। अपने-अपने व्यापारिक हितों के कारण दोनों देश इस मुद्दे पर खुलकर कुछ बोलने को तैयार नहीं हैं लेकिन किसी भी सैनिक कार्रवाई का विरोध करते रहे हैं।

बहरहाल, कूटनीति अपनी जगह है और संवेदना अपनी जगह। हो सकता है सीरिया के विद्रोहियों की हर मांग जायज और राष्ट्रपति बशऱ अल असद की हर इनकार नाजायज ना हो। लेकिन इन सबमें अयलान कुर्दी या ओमरान दक्नीश का क्या कसूर?  मानवीय संवेदना को मारकर हमने तख्तोताज हासिल भी कर लिया तो क्या? अयलान की मुंदी हुई और ओमरान की सूनी पड़ी आँखें क्या हमारी ‘कंगाली’ की गवाही नहीं दे रही होंगी?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश की राह में केजरीवाल का रोड़ा

हमारे नीतीशजी इन दिनों बड़ी शिद्दत से अपने ‘अखिल भारतीय’ अभियान पर हैं। ‘विकास-पुरुष’ का जो तमगा उन्हें बिहार के लिए मिला उस पर पूरे देश की ‘मुहर’ चाहते हैं वो। 2019 में प्रधानमंत्री मोदी के बरक्स खुद को खड़ा करने करने के लिए शराबबंदी को राष्ट्रीय मुद्दा बनाने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ नीतीशजी। वैसे देखा जाय तो 2019 के लिए मैदान में ‘भीड़’ है भी नहीं और मोदी के जवाब के तौर पर उन्हें राहुल गांधी से बेहतर मानने वालों की भी कमी नहीं। पर मोदी हैं कि हाथ लग ही नहीं रहे। और तो और, उनके और मोदी के बीच, बीच में ‘टपकने’ के लिए मशहूर अरविन्द केजरीवाल भी कूद पड़े हैं।

जी हाँ, इंडिया टुडे और कार्वी इनसाइट्स के सर्वे के मुताबिक गुड गवर्नेंस और लोकप्रियता में तो मोदी देश के किसी भी राजनेता से कोसों आगे हैं ही, मुख्यमंत्री के तौर पर दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल भी बिहार के मुख्यमंत्री से अधिक लोकप्रिय आंके गए हैं और मोदी के लिए ‘खतरे’ के तौर पर भी राहुल के बाद नीतीश के साथ-साथ लगभग बराबरी पर खड़े हैं।

सर्वे के मुताबिक देश के 53 प्रतिशत लोग बतौर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का प्रदर्शन शानदार मानते हैं। सर्वे में शामिल आधे लोगों ने उन्हें देश का नंबर वन नेता माना है और प्रधानमंत्री पद के लिए बेहतर उम्मीदवार बताया है, जबकि 13 प्रतिशत लोग इसके लिए कांग्रेस उपाध्यक्ष और 6 प्रतिशत उनकी माँ सोनिया गांधी को सही मानते हैं।

अगले लोकसभा चुनाव की बात करें तो राहुल गांधी मोदी को कड़ी टक्कर दे सकते हैं। 23 प्रतिशत लोगों ने 2019 के लिए राहुल को मोदी के लिए सबसे बड़ा खतरा माना है, जबकि 13 प्रतिशत लोगों ने नीतीश और 12 प्रतिशत लोगों ने केजरीवाल के पक्ष में अपनी राय दी है।

मुख्यमंत्रियों की बात करें तो दिल्ली के अरविन्द केजरीवाल देश के सबसे बेहतर मुख्यमंत्री हैं। बिहार के नीतीश कुमार को दूसरा स्थान मिला है और तीसरे स्थान पर पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी हैं। हालांकि केजरीवाल की लोकप्रियता 2015 के मुकाबले 2016 में कम हुई है, लेकिन मुख्यमंत्री के रूप में वो लोगों की पहली पसंद हैं।

बता दें कि इंडिया टुडे और कार्वी इनसाइट्स का ये सर्वे 15 जुलाई से 2 अगस्त के बीच किया गया और 19 राज्यों के 97 संसदीय और 194 विधानसभा क्षेत्रों में 12,321 लोगों से राय ली गई।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सिंधू और साक्षी : देश की दो अनमोल बेटियां

आज ऑफिस से जल्दी आया था। करोड़ों भारतीयों की तरह मैं भी चाहता था कि ‘इतिहास’ को बनता हुआ देखूं। साक्षी के ब्रॉन्ज के बाद सिंधू का सिल्वर तो कल ही तय हो चुका था, पर आज उस सिल्वर का रंग ‘सुनहला’ होते देखना चाहता था। 21 साल की सिंधू ने दुनिया की नंबर एक खिलाड़ी स्पेन की मरीन के साथ खेला भी लगभग बराबरी पर। पर खेल तो खेल है। जीत किसी एक की ही होनी थी, सो मरीन जीत गई। सिंधु के सिल्वर का रंग ‘सुनहला’ होते-होते रह गया। पर क्या हुआ कि सोने का पदक नहीं मिला सिंधू को, उसने तो वो कर दिखाया कि सोने से भी उसे तौल दें तो कम होगा। इतिहास तो देश की ये दोनों बेटियां कल ही रच चुकी थीं। रक्षाबंधन पर इन दोनों ने पूरे देश को वो उपहार दिया जो अद्भुत, अभूतपूर्व, अविस्मरणीय है।

बहरहाल, सिंधू ने आज रियो में बैडमिंटन महिला सिंगल्स का सांस रोक देने वाला फाइनल खेला और शुरुआत में पिछड़ने के बावजूद पहला सेट 21-19 से अपने नाम कर लिया। दूसरे सेट में मरीन ने वापसी की और 12-21 से जीत दर्ज की। निर्णायक तीसरे सेट में एक-एक प्वाइंट के लिए दोनों खिलाड़ियों का संघर्ष देखने लायक था। एक समय तो 10-10 की बराबरी पर थीं दोनों, पर अंतत: मरीन का अनुभव काम आया और उसने 15-21 से फाइनल जीत लिया।

सिंधू हारीं जरूर लेकिन सिल्वर जीतकर वो ओलंपिक में ऐसा करने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बन गईं। यही नहीं, भारतीय ओलंपिक इतिहास में ये किसी भी खिलाड़ी द्वारा चौथा व्यक्तिगत सिल्वर मेडल है। इससे पहले ये सफलता राज्यवर्द्धन सिंह राठौर (ट्रैप शूटिंग), सुशील कुमार (कुश्ती) और विजय कुमार (शूटिंग) ने हासिल की है।

अब जरा कल के दिन अपने ‘पसीने’ से रियो ओलंपिक में भारत के मेडल का ‘सूखा’ खत्म करने वाली साक्षी मलिक की बात। इस 23 वर्षीया भारतीय महिला पहलवान ने रियो में महिला रेसलिंग के 58 किलोग्राम फ्री स्टाइल मुकाबले में किर्गिस्तान की एसुलू तिनिवेकोवा को 8-5 से हराकर ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किया। साक्षी पहली भारतीय महिला पहलवान हैं जिन्होंने फ्री स्टाइस कुश्ती में ये कामयाबी हासिल की है। इसके अलावा वो भारतीय ओलंपिक इतिहास की चौथी महिला खिलाड़ी हैं जिन्होंने कांस्य हासिल किया है। उनसे पहले कर्णम मलेश्वरी, मैरी कॉम और साइना नेहवाल ही ये कमाल कर पाई हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ अपनी और अपने तमाम पाठकों की ओर से देश की इन दोनों बेटियों को सलाम करता है। काश कि हम ‘स्पोर्ट्स कल्चर’ और हमारी सरकारें ‘स्पोर्ट्स इन्फ्रास्ट्रक्टर’ के प्रति जागरुक और ईमानदार रहें और गौरव के ऐसे क्षण बार-बार आएं!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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रजनीकांत : कद, करिश्मा और ‘कबाली’

आमतौर पर बॉलीवुड के बड़े स्टार अपनी फिल्म की रिलीज के लिए दिवाली और ईद जैसे छुट्टी वाले दिन चुनते हैं लेकिन रजनीकांत की फिल्म जिस दिन रिलीज होती है उस दिन छुट्टी डिक्लेयर हो जाती है। रजनीकांत पर बने चुटकुलों में कई अविश्वसनीय बातें कही जाती हैं और आप शायद सोच रहे होंगे कि ये भी वैसी ही कोई बात है। अगर ऐसा है तो आप गलत हैं। पिछले महीने तमिल, तेलगु, हिन्दी और अंग्रेजी में एक साथ रिलीज हुई रजनीकांत की फिल्म ‘कबाली’ ने ऐसी कई असंभव-सी बातों को संभव कर दिया है।

जी हाँ, चेन्नई की तमाम बड़ी-छोटी कम्पनियों ने जिस दिन कबाली रिलीज हुई उस दिन यानि 22 जुलाई को छुट्टी घोषित कर दी थी। दक्षिण भारतीय महानायक की इस फिल्म की माया कुछ ऐसी थी  कि मलेशिया, जहाँ फिल्म मलय भाषा में रिलीज हुई, की सरकार ने रजनीकांत के सम्मान में ‘कबाली स्टैम्प’ जारी किया, एक एयरलाइन कम्पनी ने स्पेशल ‘कबाली फ्लाइट’ लॉन्च की और पूरे हवाई जहाज को ‘रजनीमय’ कर दिया, गूगल प्ले ने ‘कबाली ऐप’ लॉन्च किया और केरल की कम्पनी मुथूट फिनकॉर्प ने खास ‘कबाली चांदी के सिक्के’ जारी किए जिन पर रजनीकांत अपने ‘कबाली’ अवतार में छपे हुए हैं।

इतना सब सुनने के बाद सहज रूप से उत्सुकता होती है कि आखिर ‘कबाली’ में ऐसा क्या है? क्या कहानी है इसकी? कैसा अभिनय, कैसा निर्देशन, कैसा गीत-संगीत है इसका? किस क्रिटिक ने इसके रिव्यू में क्या लिखा? वगैरह-वगैरह। पर जनाब जिस फिल्म को देखने के लिए फैन्स रात के तीन बजे से ही टिकट काउंटर पर लाईन लगा लें और फिल्म की रिलीज से पहले ही सिनेमाघर हाउसफुल हो जाएं उस फिल्म को किसी रिव्यू की क्या दरकार? रजनीकांत की फिल्म में लोग केवल रजनीकांत को देखने आते हैं, बाकी क्या, क्यों और कैसा है, उनके फैन्स को ये सोचने की ना तो जरूरत होती है, ना फुरसत।

वैसे पा रंजीत के निर्देशन में बनी इस फिल्म की कहानी टिपिकल रजनीकांत फिल्मों की तरह है जहाँ रजनी एक नेक दिल आदमी हैं और गरीबों, दीन-दुखियों की दिल खोलकर सेवा करते हैं। उनके इस काम के लिए पैसा कहाँ से आता है, इसका पता नहीं चलता लेकिन कुछ लोग उनको दबी जुबान में डॉन कहते हैं। इसके बाद कहानी फ्लैशबैक में जाती है और ‘कबाली द डॉन’ के ‘कबाली द समाजसेवी’ बनने तक का सफर सामने आता है। फिर एंट्री होती है एक चाईनीज बिजनेसमैन की जो हर गलत काम करता है और कबाली को बर्बाद कर देना चाहता है। क्या कबाली उसे रोक पाता है? आप ही बताएं, इसका जवाब भला किसे पता नहीं होगा? अपने इन्हीं ‘जवाबों’ से तो रजनीकांत अपने करोड़ों फैन्स को दशकों से लाजवाब करते आए हैं।

रजनीकांत अपने फैन्स को निराश नहीं करते और उससे भी बड़ी बात ये कि अगर निराश करना भी चाहें तो उनके फैन्स निराश नहीं होते। उनके एक-एक डायलॉग में वो अदा है जो आपको सीटी बजाने पर मजबूर कर देगी और हॉल का माहौल आपको ऐसा महसूस करा देगा मानो आप सदी की सर्वश्रेष्ठ फिल्म देख रहे हैं। और फिर इससे आगे फिल्म की बॉक्स आफिस रिपोर्ट तो है ही जहाँ लगभग 700 करोड़ का करिश्माई आँकड़ा आपका इन्तजार कर रहा है।

पर क्या ‘कबाली’ और रजनीकांत की चर्चा केवल इन्हीं बातों के लिए होनी चाहिए? प्रश्न यह उठता है कि साधारण शक्ल-सूरत और मामूली कद-काठी का, दक्षिण भारतीय लोगों की किसी भी भीड़ में आसानी से  खो जा सकने वाले एक सांवले शख्स में ऐसा क्या है जो उसे इतना खास बनाता है? सच तो यह है कि 70 के दशक में पर्दे पर जिस दमन, अन्याय और भ्रष्टाचार से लड़कर अमिताभ बच्चन हिन्दी फिल्मों के महानायक बने, वही ‘लड़ाई’ रजनीकांत आज तक लड़ रहे हैं, 65 साल की उम्र में भी। रजनीकांत का ‘महानायकत्व’ साबित करता है कि आम लोग आज भी ‘व्यवस्था’ से किस कदर त्रस्त हैं, कि उन्हें आज भी ‘मुक्ति’ का कोई मार्ग नहीं दिखता, कि वे पर्दे पर ‘रजनीकांत’ बनकर और समाज के ‘गुनहगारों’ को सजा देकर खुश हो लेते हैं। जब तक आम लोगों को ‘रजनीकांत’ बनकर खुशी मिलती रहेगी, ‘कबाली’ कमाल करती रहेगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

 

 

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लंदन का ये ‘आत्मविश्वास’ बनाए रखना तेजस्वी !

बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव दस दिनों के विदेश दौरे पर हैं। 8 से 15 अगस्त तक वो इंगलैंड में रहेंगे, जबकि 16 और 17 अगस्त को स्विट्जरलैंड के जिनेवा में संयुक्त राष्ट्र संघ के तत्वाधान में आयोजित बिहार आधारित एक कार्यक्रम में शामिल होंगे। अपनी इस यात्रा के दौरान 11 अगस्त को लंदन में उन्होंने प्रवासी भारतीयों से मुलाकात कर बिहार में निवेश की संभावनाओं पर विस्तृत चर्चा की। उपमुख्यमंत्री ने प्रवासी भारतीयों को बिहार के गौरवशाली इतिहास के साथ-साथ विगत वर्षों में सकल घरेलू राज्य उत्पाद (जीएसडीपी) में बिहार राज्य के शीर्ष पर होने के कारणों की चर्चा भी की।

तेजस्वी ने बताया कि Ease of Doing Business में देश भर में बिहार कैसे प्रथम स्थान पर है और कैसे यहाँ की इंडस्ट्री पॉलिसी इन्वेस्टमेंट फ्रेंडली है। उन्होंने भारतीय मूल के व्यवसायियों को आंकड़ों के साथ बताया कि देश के तमाम विकसित राज्यों को पछाड़ते हुए बिहार 15.6 प्रतिशत विकास दर के साथ अव्वल राज्य रहा है।

तेजस्वी ने बिहार सरकार के सात निश्चय और इन्फ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की चर्चा करते हुए औद्योगिक समूहों को बिहार आने का न्योता दिया। बता दें कि प्रवासी भारतीयों ने बिहार में शिक्षा, स्वास्थ्य, टूरिज्म, स्पोर्ट्स एवं हॉस्पिटैलिटी के क्षेत्र में निवेश की इच्छा जाहिर की और उपमुख्यमंत्री ने सभी को बिहार सरकार की तरफ से हर प्रकार की सहायता का आश्वासन दिया। उन्होंने ब्रिटेन में फुटबॉल फॉर यूनिटी के संस्थापक चरणजीत गिल एवं साउथ हॉल फुटबॉल क्लब के प्रबंध निदेशक के साथ बिहार में फुटबॉल अकादमी खोलने की योजना पर भी गहन चर्चा की।

इससे पहले 10 अगस्त को तेजस्वी ने लंदन के इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स को संबोधित किया और नॉलेज ट्रांसफर सेशन में भाग लिया। इंस्टीट्यूट ऑफ इंजीनियर्स में उन्होंने बिहार को लेकर अपना विज़न पेश किया। उन्होंने कहा कि बिहार के लिए वैज्ञानिक और समयबद्ध तरीके से रोड मास्टर प्लान तैयार किया जा रहा है। इस मास्टर प्लान के तहत अगले बीस वर्षों में 500 किमी नए नेशनल हाईवे, 6000 किमी नए स्टेट हाइवे और विभिन्न जिलों को जोड़ने वाली करीब 25000 किमी महत्वपूर्ण सड़कों के निर्माण का प्रस्ताव है और इस प्लान को पूरा करने में लगभग 14 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च होंगे। गौरतलब है कि बिहार में पथ निर्माण विभाग उपमुख्यमंत्री तेजस्वी ही देख रहे हैं।

अपने युवा उपमुख्यमंत्री को लंदन में देखना और उनके मुँह से विकासशील बिहार की बात सुनना निश्चित तौर पर राज्य के लोगों को अच्छा लगना चाहिए। महज नौवीं पास होने के कारण जिन तेजस्वी के ऊपर ना जाने कितने ‘तंज’ कसे गए उन्हें अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर आत्मविश्वास से लबरेज देखना सचमुच सुखद है। पर ये सब तब और ज्यादा अच्छा लगता जब बिहार में अक्षरश: वही माहौल होता जिसकी बात तेजस्वी लंदन में कर रहे हैं। ये अजीब विरोधाभास है कि जिस दौरान तेजस्वी लंदन के प्रवासी भारतीयों को बिहार में अच्छे माहौल का भरोसा दिला रहे थे उसी दौरान बेखौफ अपराधियों ने यहाँ बेतिया में पूर्व मंत्री वैद्यनाथ प्रसाद कुशवाहा से 1 करोड़ 20 लाख की रंगदारी वसूलने के लिए उनके घर पर बम फेंका, अरवल में पुलिस लाइन के सामने से रिटायर्ड दारोगा के पोते का अपहरण हुआ, मुजफ्फरपुर में एक कैश कलेक्शन एजेंसी के 4.84 लाख लूटे गए और पूर्णिया में 11 लाख की डकैती को अंजाम दिया गया।

बिहार के युवा उपमुख्यमंत्री अपने मुख्यमंत्री के साथ मिलकर बस इस विरोधाभास को दूर कर दें, फिर वो अपनी ऐसी तमाम यात्राओं के लिए विशेष बधाई के हकदार होंगे। वैसे उनका प्रयास अभी भी सही दिशा में है और इसके लिए उन्हें बधाई तो दी ही जानी चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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तो क्या गाय सचमुच केवल दूध देती है, वोट नहीं ?

लालू तंज कसने में कभी नहीं चूकते, बस मौका मिलना चाहिए। और जब सामने प्रधानमंत्री मोदी हों तो कहना ही क्या। अब जबकि छोटे भाई नीतीश के लिए उनका सत्रह साल पुराना ‘प्रेम’ फिर से जग गया है, कांग्रेस से भी ‘अपनापा’ है, मांझी पर ‘डोरे’ ही डालने में लगे हैं और रामविलास समेत बाकी लोगों की खास चिन्ता उन्हें है नहीं, तो बचता भी कौन है भाजपा और नरेन्द्र मोदी के सिवा। हाँ, नेता तो प्रदेश भाजपा के भी कई हैं लेकिन उन्हें ना तो लालू और ना नीतीश तंज कसने के ‘लायक’ मानते हैं।

बहरहाल, ताजा मामला प्रधानमंत्री मोदी के उस बयान से जुड़ा है जिसमें उन्होंने कहा था कि गाय की रक्षा के नाम पर असामाजिक तत्व अपनी दुकान चला रहे हैं। राजद सुप्रीमो ने अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा है कि आखिरकार मोदीजी को ये बात समझ आ गई कि गाय दूध देती है, वोट नहीं।

बता दें कि कल प्रधानमंत्री ने गोरक्षा के नाम पर गुजरात के ऊना में दलितों की पिटाई के संदर्भ में बयान दिया था। उन्होंने कहा था कि गोरक्षा के नाम पर असामाजिक तत्व अपनी दुकान चला रहे हैं। ऐसे लोगों पर उन्हें गुस्सा आता है। कुछ लोग पूरी रात एंटी सोशल एक्टिविटी करते हैं लेकिन दिन में गोरक्षक का चोला पहन लेते हैं। उन्होंने राज्य सरकारों कहा कि ऐसे जो स्वयंसेवी निकले हैं उनका जरा डोजियर तैयार करें, इनमें से 70-80 फीसदी एंटी सोशल एलिमेंट निकलेंगे।

इतना सुनना था कि लालू ने बिना देर किए अपने फेसबुक पोस्ट में लिखा – “नागपुर वालों, यह सत्य की विजय और पाखंड की पराजय है। लगता है मेरे द्वारा दो दिन पहले कही गई बात मोदीजी को अच्छे से समझ में आ गई कि गाय दूध देती है, वोट नहीं।“ लालू ने आगे लिखा – “गौमाता इनकी सरकार बनवाना तो दूर, बनी बनाई सरकारों को हिला रही है। ये हमारी जीत और उनकी हार है।“

लालू आखिर लालू ठहरे। वो इतने पर भी नहीं रुके। उन्होंने ये भी कह डाला कि “गौमाता के नाम पर बेवकूफ बनाने चले थे, अब दाँव उल्टा पड़ गया तो भाषा बदल रही है।… आप लोग बिहार चुनाव में कैसे बड़े-बड़े विज्ञापन निकालते थे। ये उन विज्ञापनों की पराकाष्ठा थी कि चुनाव में दाल नहीं गली। हाँ, अब आपका दल जरूर गल जाएगा।”

बिहार चुनाव में महागठबंधन को और खासकर लालूजी की पार्टी को जैसी सफलता मिली उसे देखते हुए लालू अगर कह रहे हैं कि बिहार चुनाव में भाजपा की दाल नहीं गली तो गलत भी नहीं कह रहे लेकिन फिलहाल दिन-ब-दिन ‘बड़ी’ होती भाजपा के लिए गल जाने की बात हजम नहीं होती। लालूजी और उनके छोटे भाई अक्सर भूल जाते हैं कि बिहार से बाहर जहाँ और भी हैं। और हाँ, लालूजी से ये पूछना भी बनता है कि क्या उनके गठबंधन, उनके दल और खास तौर पर उनके लिए क्या सचमुच ‘गाय’ ने केवल दूध ही दिया है अब तक, कभी वोट नहीं दिलाए..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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अलविदा, पारले-जी !

सुबह की चाय अब फीकी लगेगी, पड़ोस की छोटी दूकान से लेकर बड़े डिपार्टमेंटल स्टोर तक आँखें अनायास ही उसे ढूंढेंगी पर वो नहीं मिलेगी… जी हाँ, बचपन की यादों का एक कोना हमेशा के लिए सूना कर ‘पारले-जी’ बंद हो गया। ‘पारले-जी’, जो कहने को एक बिस्कुट था पर किसी जिगरी दोस्त से कम ना था। ना जाने कितनी एकाकियों और कितनी ही यात्राओं में साथ निभाया था उसने। पर बाज़ार के बदले समीकरणों में वो टिका ना रह पाया। पिछले महीने के आखिर में मुंबई के विले पार्ले स्थित पारले-जी की 87 साल पुरानी फैक्ट्री आखिरकार बंद हो गई। फैक्ट्री बंद होने का कारण इसके प्रोडक्शन का कम होना बताया जा रहा है।

अपने जमाने के इस मशहूर बिस्कुट का ‘पारले-जी’ नामकरण इसकी फैक्ट्री के विले पार्ले में होने के कारण हुआ था, पर ज्यों-ज्यों इसका नाम और स्वाद लोगों की जुबान पर चढ़ता गया, ये बिस्कुट विले पार्ले का पर्याय होता चला गया। पता नहीं इस इलाके के लोग इसकी फैक्ट्री के बंद होने को कैसे पचा पाएंगे जब सैकड़ों किलोमीटर दूर रहकर हम सब इसके बंद होने पर यकीन नहीं कर पा रहे हैं। हालांकि कम्पनी प्रबंधन ने फिलहाल 10 एकड़ में फैले और 300 कर्मचारियों वाले विले पार्ले यूनिट को ही बंद करने का फैसला किया है, पर निकट भविष्य में बाकी यूनिटें भी बंद की जा सकती हैं।

बहरहाल, बता दें कि ‘पारले प्रोडक्ट्स प्राईवेट लिमिटेड’ की ओर से इस फैक्ट्री की स्थापना 1929 में हुई थी पर शुरू में यहाँ मिठाईयाँ और टॉफियाँ बनाई जाती थीं। इस बिस्कुट का उत्पादन दस साल बाद यानि 1939 में शुरू किया गया था। अपने उत्पादन के समय से ही ये बिस्कुट ग्लूकोज युक्त एनर्जी बूस्टर के तौर पर पूरे देश में जानी जाने लगी। शुरू में इस बिस्कुट को ‘ग्लूको’ नाम से बाजार में उतारा गया था। लेकिन, बाद में इसका नाम बदलकर ‘पारले-जी’ रख दिया गया। स्मरण करा दें कि पारले-जी का ‘जी’ जीनियस का छोटा संक्षिप्त रूप था।

बता दें कि पारले-जी भारत में बिकने वाला सबसे बड़ा बिस्कुट ब्रांड था। देश में बिस्कुट के 40% बाजार पर इसका कब्जा था। 2009-10 के आंकड़ों के अनुसार ‘पारले-जी’ की बिक्री दुनिया के चौथे सबसे बड़े बिस्कुट उपभोक्ता मुल्क चीन से भी ज्यादा थी। भारत से बाहर ये यूरोप, ब्रिटेन, कनाडा आदि में भी उपलब्ध था। ये अकेला एक ऐसा बिस्कुट था जो शहर और गांव दोनों जगह एक ही मूल्य पर बिकता था और इसकी लोकप्रियता दोनों ही जगह एक समान थी।

इस बिस्कुट की लोकप्रियता का बड़ा कारण इसका विज्ञापन का तरीका था जो 80 के दशक में सबसे अलग था। ये वो दौर था जब आम आदमी के जीवन में टेलीविजन का नया-नया प्रवेश हुआ था। टेलीविजन की चमकदार जीवन शैली जब अपने साथ विज्ञापन को भी लेकर आई तो आम भारतीय उस जादू में खो-सा गया। इसी दौर में ‘पारले-जी’ ने तकनीक के साथ नये प्रयोग किए। साल 1979 में उसने एनिमेशन के द्वारा एक छोटी-सी बच्ची की तस्वीर को अपने पैकेट पर अंकित किया। ये तस्वीर ‘पारले-जी’ की लोकप्रियता का बड़ा आधार साबित हुई। अब भी लोगों के जेहन में वो बच्ची बसी हुई है और इस आधुनिक युग में भी उस तस्वीर के एनिमेटेड होने पर किसी को यकीन नहीं आता। सोचिए इस बिस्कुट का कैसा जादू था लोगों पर।

एक नहीं, दो नहीं बल्कि तकरीबन छह पीढ़ियों को अपने मोहपाश में बांधे रखने वाले ‘पारले-जी’ को चलिए बड़े प्यार से अलविदा कहें।

पुनश्च:

कम्पनी के प्रबंधन का दावा है कि उत्पादन लगातार गिर रहा था। इसका मतलब है कि बाज़ार में कम्पनी की डिमांड गिर रही थी, जिससे उत्पादन कम हो रहा था। लेकिन बिस्कुट बाज़ार में जिस कम्पनी की तूती बोलती हो उसके लिए यह बात पचती नहीं कि बाज़ार में बिस्कुट की डिमांड कम हो रही थी। दूसरी बात ये कि क्या सिर्फ मुंबई यूनिट का उत्पादन गिर रहा था या फिर देश भर में जहाँ पारले का उत्पादन होता है, उन यूनिटों की भी यही स्थिति है? अगर दूसरी जगहों पर इस तरह की बात नहीं थी तो मुंबई में यह कैसे हो सकता है? कहीं फैक्ट्री बंद होने के पीछे रीयल स्टेट बाज़ार का दबाव तो काम नहीं कर रहा? हम इस बात को नज़रअंदाज नहीं कर सकते कि मुंबई के इस उपनगर में जमीन 25 से 30 हज़ार रुपये प्रति स्क्वायर फीट की दर से बिक रही है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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जीएसटी : अब तक का सबसे ‘बड़ा’ और ‘कड़ा’ आर्थिक सुधार

सालों लम्बे इंतजार के बाद आखिरकार कल राज्य सभा में जीएसटी बिल पास हो गया। कुछ सुझावों और शंकाओं के बावजूद कांग्रेस समेत अन्य दलों के समर्थन के बाद जीएसटी यानि गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (वस्तु एवं सेवा कर) को लागू करने के लिए जरूरी संविधान संशोधन विधेयक पर संसद की मुहर लग गई। यह अब तक का सबसे बड़ा और कड़ा आर्थिक सुधार है क्योंकि इससे पूरे देश में एक समान कर लगेगा। बता दें कि राज्य सभा से बिल पास हो जाने पर अब केन्द्र सरकार इस पर लोकसभा की सहमति जुटाएगी। इसके बाद कई और विधायी प्रक्रिया प्रक्रिया पूरी करनी होंगी और नियम-कानून को अंतिम रूप देना होगा। तब कहीं जाकर ये बिल अगले साल एक अप्रैल से व्यावहारिक धरातल पर उतर पाएगा।

बहरहाल, गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स केन्द्र और राज्यों के 20 से ज्यादा अप्रत्यक्ष करों की जगह लेगा। इसके लागू होने पर एक्साइज, सर्विस टैक्स, एडिशनल कस्टम ड्यूटी, वैट, सेल्स टैक्स, मनोरंजन कर, लग्जरी टैक्स और ऑक्ट्रॉय एंड एंट्री टैक्स जैसे कई टैक्स खत्म हो जाएंगे। पूरे देश में एक समान टैक्स लागू होने से कीमतों का अंतर घटेगा।

सरकार और उद्योग जगत दोनों का ही मानना है कि जीएसटी लागू होने से पूरे देश में कारोबार करना आसान होगा, जिससे जीडीपी में कम-सेकम दो प्रतिशत की बढ़ोतरी हो सकती है। पर जीएसटी से जुड़ा एक और पहलू महंगाई का है जिसे नज़रअंदाज करना मुश्किल है। सच ये है कि पूरी दुनिया में जब भी किसी क्षेत्र में समान बिक्री कर लागू किया गया वहाँ थोड़े समय के लिए महंगाई बढ़ी। भारत में भी इससे महंगाई बढ़ेगी ये तयप्राय है। हालांकि सरकार ने पेट्रोल-डीजल, बिजली और शराब को फिलहाल जीएसटी से अलग रखकर महंगाई बढ़ने की सम्भावना को यथासंभव कम करने की कोशिश की है। इसलिए शुरुआत में इसका सबसे अधिक असर सेवाओं पर होगा।

देखा जाय तो जीएसटी अभी तक संसद में एक तकनीकी बहस का मुद्दा भर रहा है लेकिन पास होने के बाद ये सड़क पर एक राजनीतिक मुद्दा बनेगा। खास कर तब जब केन्द्र की मोदी सरकार महंगाई को काबू में रखने और राज्यों की अपेक्षा पूरी करने में असफल होगी। कांग्रेस नेता और पूर्व वित्त मंत्री पी चिदंबरम पहले ही कह चुके हैं कि अगर टैक्स की दरें 18 प्रतिशत से अधिक रहीं तो सड़क पर विरोध किया जाएगा।

सच तो ये है कि 18 प्रतिशत की दर भी बहुत सारी चीजों को महंगा बना देगी, जैसे बाहर खाना, फोन बिल, सिनेमा और इसी तरह की कई सेवाएं। कहने की जरूरत नहीं कि ये सारी चीजें उच्च मध्यवर्ग को सीधे चुभेंगी और समग्र महंगाई में योगदान करेंगी सो अलग। आने वाले समय में जीएसटी भारत का एक विवादित विषय बन जाए तो भी कोई आश्चर्य की बात नहीं। लेकिन फिलहाल वित्त मंत्री अरुण जेटली और सरकार के मुखिया नरेन्द्र मोदी के लिए इस साहसिक कदम पर बधाई तो बनती ही है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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लालू, मांझी और यूपी का हासिल

यूपी चुनाव को लेकर बिहार के दो बड़े नेताओं ने अपना-अपना ‘स्टैंड’ स्पष्ट कर दिया। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने जहाँ महागठबंधन के शेष दो साथियों – जेडीयू और कांग्रेस – से अपना रास्ता अलग करते हुए यूपी चुनाव से दूर रहने का फैसला किया (और फिर तेजस्वी ने अखिलेश यादव के काम की सराहना करते हुए सपा को समर्थन देने की बात कही), वहीं ‘हम’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने भी अपने गठबंधन (एनडीए) से अलग रास्ता अख्तियार किया, यूपी में अकेले लड़ने का फैसला कर।

कहने वाले भले ही कहें कि लालू ने यूपी में चुनाव ना लड़ने का फैसला कर मुलायम से अपनी रिश्तेदारी निभाई, लेकिन सच यह है कि उन्होंने बड़ा ही परिपक्व निर्णय लिया है। उन्हें पता था कि यूपी में उनकी ‘हैसियत’ उससे अधिक नहीं जितनी मुलायम की बिहार में है। ऐसे में वो अधिक-से-अधिक ‘वोटकटवा’ की भूमिका ही निभा सकते थे वहाँ। यूपी की मृग-मरीचिका में बिना भटके ही उन्हें यह कहने का मौका भी मिल गया कि भाजपा-विराधी वोटों के ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने ये फैसला किया। अच्छा है कि लालू नीतीश की तरह किसी ‘मुगालते’ के शिकार नहीं हुए। अपने कद को अखिल भारतीय करने के ‘मद’ में नीतीश ये मानने को तैयार ही नहीं कि यूपी में उनकी ‘बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की’।

बहरहाल, नीतीश के लड़ने और लालू के ना लड़ने की बात तो समझ में आती है लेकिन मांझी ने किस गलतफहमी का शिकार हो यूपी जाने की सोची, ये समझ के परे है। बिहार में तो बमुश्किल अपनी सीट बचा पाए वो, यूपी में जाने क्या मिलने वाला है उन्हें! हाँ, यूपी के बिहार से सटे कुछ इलाकों में दलित वोटों के मामले में उनकी स्थिति कुछ-कुछ वैसी जरूर मानी जा सकती है जैसी कोसी के इलाके में यादव वोटों के मामले में जन अधिकार पार्टी के पप्पू यादव की। तो क्या यूपी में वो भाजपा के हक में उसके साथ दोस्ताना मैच खेल रहे हैं, जैसे पप्पू ने खेला था बिहार में?

वैसे मांझी का ये दोस्ताना मैच मुलायम के लिए भी हो सकता है और इसके दो बड़े स्पष्ट कारण हैं। पहला ये कि यूपी को जीतने के लिए मायावती के वोटबैंक में सेंध लगाने की जरूरत भाजपा से कहीं अधिक सपा को है और दूसरा ये कि उन्हें इस ‘मैच’ के लिए तैयार करने की खातिर मुलायम के समधी लालू हैं यहाँ। मांझी के लिए लालू का ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ महागठबंधन के जन्मकाल से ही जगजाहिर है।

खैर, बिहार के इन नेताओं को यूपी से क्या हासिल होगा, ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन यूपी के चुनाव ने बिहार के दो बड़े गठबंधनों की गांठ ढीली कर दी है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या रसूखवालों के लिए ही बना है न्याय ?

“समरथ को नहिं दोष गोसाईं” – तुलसीदासजी की कही ये बात आज अगर सबसे ज्यादा लागू होती है तो हमारी न्यायपालिका पर। सामर्थ्यवान लोग आए दिन हमारी न्याय-व्यवस्था का मखौल उड़ाते हैं और हम मूकदर्शक बने रहते हैं। अब सलमान खान का चिंकारा मामला ही लीजिए। बॉलीवुड का ये सुपर स्टार आखिरकार चिंकारा मामले में भी बरी हो ही गया। राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले से सलमान को बड़ी राहत दी है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चिंकारा के शिकार में बरामद गोलियां उनकी लाइसेंसी बंदूक से नहीं चलाई गई थी। शिकार के लिए जिस जीप का इस्तेमाल किया गया था उसके ड्राईवर के ‘लापता’ होने की वजह से भी अभियोजन के पक्ष को कमजोर माना गया।

बता दें कि सलमान खान के खिलाफ 26-27 सितम्बर को 1998 को भवाद गांव में दो चिंकारा और 28-29 सितम्बर 1998 में मथानिया (घोड़ा फॉर्म) में एक चिंकारा के शिकार के संबंध में वन्य जीव संरक्षण की धारा 51 के तहत मामले दर्ज किए गए थे। निचली अदालत (सीजेएम) ने उन्हें दोनों मामलों में दोषी ठहराते हुए 17 फरवरी 2006 को एक साल और 10 अप्रैल 2006 को पांच साल के कारावास की सजा सुनाई थी। सजा के खिलाफ सलमान खान ने हाईकोर्ट में अपील की थी। गौर करने की बात है कि जिस ‘संदेह’ के आधार पर निचली अदालत ने सलमान को सजा सुनाई थी, उसी ‘संदेह’ का लाभ हाईकोर्ट ने सलमान को देते हुए उन्हें मामले में बरी कर दिया।

हिरण के शिकार में इस्तेमाल की गई जिप्सी के ड्राईवर ने मजिस्ट्रेट के सामने सीआरपीसी की धारा 164 में अपना बयान भी दर्ज करवाया था। लेकिन, इसका क्रॉस एग्जामिनेशन नहीं होने पर अदालत ने उस बयान को खारिज कर दिया। पुलिस के छापे में सलमान खान के कमरे में पहले तो कोई हथियार नहीं मिला और बाद में बरामदगी में एयरगन को दिखाकर खुलेआम कानून के साथ आंखमिचौली खेली गई। हद तो तब हो गई जब बरामदगी में एक ऐसे चाकू को दिखाया गया जिससे हिरण का गला काटा जाना संभव ही नहीं था। ऊपर से सलमान खान के हथियार के लाइसेंस को एक्सपायर्ड बताते हुए उन पर मामूली आर्म्स एक्ट का मुकदमा किया गया।

चिंकारा मामले में फैसले के आते ही लोगों के बीच ये सवाल फिर से उठने लगा है कि क्या न्याय ऊंची रसूख और पहुंच वाले लोगों के लिए ही बना है? जबकि गरीबों को इसके लिए बार-बार पैर घसीटने होते हैं। अदालतों के चक्कर लगा-लगाकर उनकी जिंदगी बीत जाती है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस वी. एन. खरे ने खुद स्वीकार किया था कि हमारे देश में गरीबों के लिए न्याय के रास्ते करीब-करीब बंद हो चुके हैं। उन्होंने कहा था कि बिना पैसों के अदालत की ओर देखना भी गुनाह है।

सलमान खान के केस में जिस तरह से सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई और उन्हें तोड़ा-मरोड़ा गया वो पूर्व जस्टिस के बयान की पुष्टि करता है। इस मामले में जिस तरह न्याय का मजाक उड़ाया गया उस पर सोशल मीडिया में खुलकर सवाल उठाये जा रहे हैं। ऊंची पहुंच वाले लोगों के मामले में आज जिस प्रकार न्यायपालिका अपना काम कर रही है वो आम लोगों के मन में उसकी प्रतिष्ठा को तो कम करता ही है, निष्पक्ष न्याय को लेकर आशंका और अविश्वास को भी बल देता है। अगर समय रहते हम नहीं संभले तो इसके दूरगामी परिणाम निश्चित तौर पर बहुत घातक होंगे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

 

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