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हार्दिक पटेल संग क्या पका रहे केजरीवाल ?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल की निगाहें दिल्ली के बाद पंजाब पर तो थीं ही, अब उनकी ‘ताक-झाँक’ गुजरात में भी शुरू हो गई है। जी हाँ, इन दिनों उनकी पाटीदारों के नेता हार्दिक पटेल से खूब निभ रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इन धुर विरोधी नेताओं के बीच बढ़ती नजदीकियों का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि केजरीवाल हार्दिक के उन ट्वीट्स को रिट्वीट कर रहे हैं, जिनमें मोदी सरकार की आलोचना की गई है। बता दें कि गुजरात में अगले साल चुनाव होने वाले हैं और विरोधी अपने-अपने पक्ष में जमीन तैयार करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ रहे।

राजनीति के गलियारों में पैठ रखने वाले सूत्र बता रहे हैं कि गुजरात में केजरीवाल-हार्दिक आने वाले चुनावों में हाथ मिला सकते हैं। गौरतलब है कि हार्दिक पटेल ने प्रधानमंत्री मोदी को लेकर ट्वीट किया था कि सर्जिकल स्ट्राइक का श्रेय सेना को जाता है, जबकि क्रेडिट मोदी ले रहे हैं। यह ट्वीट ‘आप’ और भाजपा के बीच सर्जिकल स्ट्राइक को लेकर हो रही टीका-टिप्पणी के बाद सामने आया था। केजरीवाल ने इस ट्वीट को रिट्वीट किया। यही नहीं, केजरीवाल ने हार्दिक का वह ट्वीट भी रिट्वीट किया, जिसमें उन्होंने गुजरात में बेरोजगारी की समस्या पर मोदी सरकार को घेरने की कोशिश की थी।

जिन्होंने हार्दिक पटेल का ट्वीट ना देखा हो उन्हें उत्सुकता होगी कि आखिर उन दोनों ट्वीट में था क्या? सर्जिकल स्ट्राइक के बाद किए गए ट्वीट में हार्दिक के शब्द थे – “गोली खाई सेना ने, शहीद हुवा सेना का जवान, जवाब में आतंकी को मार गिराया सेना के जवानों ने, तो फिर उसका लाभ भाजपा और मोदी क्यों ले रहे हैं?” इसी तरह गुजरात में बेरोजगारी को लेकर हार्दिक ने अपने ट्वीट में कहा था – “गुजरात में सात वायब्रंट समिट के बाद भी 35 लाख लोग बेरोजगार हैं, सात प्रतिशत उद्योग और 31 फीसद फैक्ट्रियां बंद हैं।”

अरविन्द केजरीवाल खासे पढ़े-लिखे आदमी हैं। उनके पास ना तो डाटा की कमी होगी, ना सवाल उठाने में वो किसी से पीछे हैं। फिर गुजरात पर बात करने के लिए हार्दिक पटेल की ढाल क्यों? गौरतलब है कि मीडिया के माध्यम से हार्दिक के लिए ‘पारखी’ केजरीवाल का प्रेम तभी से सामने आता रहा है जब से पाटीदार आन्दोलन चर्चा में आया। प्रत्युत्तर में हार्दिक भी केजरीवाल में ‘सम्भावना’ जताते रहे हैं।

जो भी हो, इसमें कोई संशय नहीं कि केजरीवाल की महत्वाकांक्षा अब गुजरात के लिए हिलोड़ें मार रही हैं। लेकिन यहाँ एक सवाल यह उठता है कि क्या उनके पास गुजरात तक ‘पांव पसारने को चादर’ है? अगर नहीं तो समय से पहले पाली जा रही महत्वाकांक्षा की अकाल मृत्यु तय है। वैसे 16 अक्टूबर को केजरीवाल गुजरात यात्रा पर जाने वाले हैं, और आगे जो भी हो, वहाँ जाकर वो क्या और कितना गुल खिलाते हैं, इस पर निगाह तो रहेगी ही।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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चौंकाती है ये चुप्पी लालूजी की

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव आजकल चुप-चुप से हैं। बिहार में सबसे बड़ी पार्टी उनकी, महागठबंधन के वो अभिभावक, दोनों बेटे सरकार में, बेटी को राज्यसभा भेज चुके… फिर भी सोशल मीडिया उनके तीखे, चुटीले और हंसोड़ बयानों के बिना सूना और नीरस है आजकल। लोग तरह-तरह की अटकलें लगा रहे हैं कि आखिर चुप क्यों हैं लालूजी? वैसे भी जिन्हें बिहार की राजनीति की थोड़ी भी समझ है वे जानते हैं कि लगभग तीन दशकों से बिहार की राजनीति पर छाए रहने वाले इस शख्स की ‘चुप्पी’ किस कदर मायने रखती है।

ऐसे में जाहिर है, कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना। लोगों की मानें तो लालू तभी से खामोश हैं जब से शहाबुद्दीन वापस जेल गए हैं। हाल ये है कि लालू ही नहीं, उनके दोनों बेटे तेजस्वी और तेजप्रताप से लेकर आरजेडी के तमाम बयानवीरों ने चुप्पी साधी हुई है। शहाबुद्दीन के वापस जेल जाने से लालू आहत थे ही कि दुष्कर्म के आरोपी विधायक राजवल्लभ यादव का मामला भी सामने आ गया। दोनों ही मामलों में बिहार सरकार का सुप्रीम कोर्ट जाना लालूजी को रास नहीं आया | लेकिन ‘गठबंधन धर्म’ की विवशता में वो ना कुछ कर सके, ना कुछ कह सके।

इधर लालू चुप हैं और उधर शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब ने एक चौंकाने वाला बयान दिया है। हिना ने कहा कि 2005 में जब सात दिन की सरकार बनी थी, तब शहाबुद्दीन ने आरजेडी को समर्थन दिया था। उसी का बदला निकालने के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उनके पति की जमानत रद्द करवा कर जेल भेज दिया। इसके लिए डीएम-एसपी को हथियार बनाया गया, जो सरकार की कानून-व्यवस्था को लेकर गलत रिपोर्ट भेजते थे। हिना ने तंज कसा कि नीतीश कुमार को लगता था कि शहाबुद्दीन के बाहर आने से बिहार में भय का माहौल पैदा हो गया है, तो उनके जेल जाने पर क्या अमन-शांति का माहौल है? हिना ने आगे कहा कि अगर कानून-व्यवस्था खराब रहती तो लाखों लोग सीवान नहीं पहुँचते। क्या यहाँ आने वाले सभी लोग भयभीत थे?

बहरहाल, हिना का आग उगलना समझ में आता है। बिहार सरकार और उसके मुखिया नीतीश कुमार को वो कोसेंगी ही, इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं। लेकिन लालू यहाँ फिर चुप हैं, ये जरूर चौंकाने वाली बात है। याद दिला दें कि शहाबुद्दीन ने जेल से निकलते ही लालू को अपना नेता बताया था और नीतीश को ‘परिस्थितियों का नेता’ कहा था और लालू तब भी चुप ही थे। अब देखना यह है कि लालूजी की ‘चुप्पी’ कब तक कायम रहती है, और टूटती है तो किस तरह टूटती है?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पाकिस्तान के ‘मौसेरे भाई’ ने पार की बेशर्मी की हद

चीन ने तिब्बत में अपनी एक पनबिजली परियोजना के लिए ब्रह्मपुत्र की एक सहायक नदी का पानी रोक दिया है। समाचार एजेंसी शिन्हुआ के अनुसार, चीन का कहना है कि वो इससे बिजली पैदा करेगा, पानी का इस्तेमाल सिंचाई के लिए करेगा और साथ ही इससे बाढ़ पर काबू पाने में मदद मिलेगी। लेकिन भारत और बांग्लादेश इससे चिन्तित हैं, क्योंकि इससे उनके इलाके में रहने वाले लाखों लोगों को पानी की आपूर्ति बाधित हो सकती है। गौरतलब है कि चीन से निकलकर ब्रह्मपुत्र नदी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों अरुणाचल प्रदेश और असम से होती हुई बांग्लादेश तक जाती है।

चीन ने यह काम ऐसे वक्त में किया है जब उड़ी हमले के बाद भारत ने पाकिस्तान से सिंधु जल समझौते के तहत होने वाली बैठक रद्द कर दी और इस समझौते की समीक्षा करने का भी फैसला किया। भारत ने यह फैसला पाक पर दबाव बनाने के लिए किया था। ऐसे में चीन का ताजा रुख इस आशंका को बढ़ावा देता है कि कहीं वह पाकिस्तान के साथ मिलकर भारत पर दबाव तो नहीं बना रहा। पाकिस्तानी प्रधानमंत्री के विदेशी मामलों के सलाहकार सरताज अजीज ने ब्रह्मपुत्र को लेकर चीन की चाल की धमकी पहले ही दे दी थी।

बहरहाल, शिन्हुआ के मुताबिक, चीन ने इस पनबिजली परियोजना पर वर्ष 2014 में काम शुरू किया था, जिसे वर्ष 2019 तक पूरा करना है। इस परियोजना पर चीन ने 750 मिलियन डॉलर का निवेश किया है और यह उसकी सबसे महंगी परियोजना बताई जा रही है। बता दें कि यह परियोजना तिब्बत के जाइगस में है जो सिक्किम के नजदीक है। जाइगस से ही ब्रह्मपुत्र नदी अरुणाचल प्रदेश में दाखिल होती है।

दरअसल अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में भारत की सक्रियता और खासकर अमेरिका से उसकी बढ़ती नजदीकी चीन को रास नहीं आ रही है। उसकी बौखलाहट का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पूरी दुनिया जिस मसूद अजहर को आतंकी मानती है, सारी नैतिकता और मर्यादा को ताक पर रख चीन उसे बचाने में जुटा हुआ है। संयुक्त राष्ट्र में अगर चीन ने वीटो नहीं लगाया होता तो भारत की मांग पर मसूद को संयुक्त राष्ट्र का आतंकी घोषित कर दिया जाता।

कहने की जरूरत नहीं कि चाहे वीटो कर मसूद को बचाना हो या ब्रह्मपुत्र की सहायक नदी का पानी रोकना, चीन का एकमात्र मकसद भारत से अपनी कटुता साधना है। पाकिस्तान के साथ उसकी ‘जुगलबंदी’ जगजाहिर है, और अब उस ‘जुगलबंदी’ से बेहयाई के सुर निकल रहे हैं। ये सुर जितने भद्दे हैं, उतने ही खतरनाक भी। भारत को चाहिए कि समय रहते इन ‘मौसेरे भाईयों’ का सही हल निकाल ले।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

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भारत ने पाकिस्तान से छीना टेस्ट का ताज

टीम इंडिया ने घरेलू मैदान पर खेले गए अपने 250वें टेस्ट को शानदार जश्न में तब्दील कर दिया। कोलकाता के प्रसिद्ध ईडन गार्डंस पर खेले गए दूसरे टेस्ट के चौथे दिन भारत ने न्यूजीलैंड को 178 रन से हराकर ना केवल तीन मैचों की सीरीज पर कब्जा जमाया, बल्कि अपने चिर प्रतिद्वंद्वी पाकिस्तान से टेस्ट में नंबर वन का ताज भी छीन लिया।

विराट कोहली की युवा टीम ने न्यूजीलैंड को 376 रन का विशाल लक्ष्य दिया था जिसका दबाव कीवी झेल नहीं पाए और पूरी टीम 197 रन पर ढेर हो गई। भारतीय गेंदबाजों ने कसी हुई गेंदबाजी की और कीवियों को सांस लेने का मौका नहीं दिया। दूसरी पारी में अश्विन, जडेजा और शमी ने तीन-तीन विकेट आपस में बांटे, जबकि पहली पारी में पाँच विकेट लेने वाले भुवनेश्वर को इस पारी में एक विकेट मिला। पहली पारी में अर्द्धशतक लगाने वाले रिद्धिमान साहा ने दूसरी पारी में भी महत्वपूर्ण 58 रन बनाए। उन्होंने पूरे मैच में 112 रन बनाए और खास बात यह कि दोनों पारियों में अविजित रहे। उनके इस शानदार प्रदर्शन पर उन्हें ‘मैन ऑफ द मैच’ चुना गया।

बता दें कि कप्तान कोहली के धुरंधरों ने डेढ़ महीने बाद पाकिस्तान को शीर्ष रैंकिंग से हटाया है। अब भारत की अगली चुनौती होगी कि वह पाकिस्तान को पहले पायदान की पहुँच से दूर रखे। यह तभी संभव है जब वह इंदौर में सीरीज का तीसरा और आखिरी टेस्ट जीते या ड्रॉ कराए। वैसे भारतीय टीम अभी जिस तरह के फॉर्म में है, उसे देखते हुए नहीं लगता कि निकट भविष्य में पाकिस्तान अपना रुतबा दोबारा हासिल कर पाएगा। गौरतलब है कि टीम इंडिया लगातार 13 मैचों से अजेय है। इसमें 11 जीत और 2 ड्रॉ शामिल हैं। यह भी याद दिला दें कि कोहली के नेतृत्व में यह लगातार चौथी टेस्ट जीत है।

चलते-चलते बता दें कि भारतीय टीम इससे पहले भी शीर्ष पर रह चुकी है। नवंबर 2009 से अगस्त 2011 तक टीम इंडिया आईसीसी की टेस्ट रैंकिंग में शिखर पर रही थी। फिर जनवरी 2016 से फरवरी 2016 के बीच भी वह पहले स्थान पर काबिज हुई थी।

 ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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और बापू ने घी का दिया जलाने से ‘बा’ को मना कर दिया

आईये, गांधी जयंती पर जानें उस महामानव से जुड़ी चार बातें और हृदय पर हाथ रखकर स्वयं से पूछें कि क्या हम गांधीजी को सचमुच जानते हैं? अगर जानते हैं तो उनके बताए पर कितना अमल करते हैं? और सबसे बड़ी बात कि क्या अपनी अगली पीढ़ी के जीवन में हम गांधी का सहस्त्रांश भी भर रहे हैं?

घी के दिये पर आपत्ति

सेवाग्राम में बापू के जन्मदिन के मौके पर ‘बा’ ने एक बार घी का दिया जलाया। बापू एकटक घी के दीपक को देखते रहे और थोड़ी देर बाद ‘बा’ से कहा – “आज अगर घी का दिया नहीं जलता तो कोई फर्क नहीं पड़ता। हमारे आस-पास कई लोगों के पास खाने को सूखा टुकड़ा तक नहीं है। ऐसे में यह तो पाप है।” बापू की जयंती मनाने से पहले हमें देखना चाहिए कि हमने अपने आस-पास के निर्धन लोगों की तकलीफों से कितनी दूरी बना रखी है। अगर ऐसा नहीं होता तो हमारे लाखों बच्चे हर साल कुपोषण से नहीं मर रहे होते।

शिक्षा के साथ दो हुनर

गांधीजी ने कहा था कि शिक्षा-व्यवस्था ऐसी हो जिसमें विद्यार्थी कम-से-कम दो हुनर भी सीखें। अपने भोजन और रहने का खर्च खुद ही निकालें। इससे हमारे जैसे गरीब देश में सभी बच्चों के लिए शिक्षा का इंतजाम करना आसान होगा। उन्होंने जोर देकर कहा था कि अंग्रेजों की शिक्षा बच्चों को आत्मनिर्भर बनाने के लिए नहीं है। लेकिन इसके उलट हमारी शिक्षा-व्यवस्था लगातार महंगी होती गई। अपने बच्चों को ‘एयरकंडीशन्ड’ स्कूलों में भेजना हमारा चरम लक्ष्य बन गया, ना कि उन्हें आत्मनिर्भर बनाना।

फोटो खिंचवाने की तीन शर्तें

महात्मा गांधी के पोते कनु गांधी एक फोटोग्राफर थे। शुरुआत में गांधीजी ने पैसे की कमी का हवाला देते हुए कैमरा खरीदकर देने से कनु को मना कर दिया था। लेकिन बाद में कनु के जिद करने पर उन्होंने घनश्यामदास बिड़ला से इसके लिए मदद मांगी। उन्होंने कनु को 100 रुपये दिए जिससे कनु ने रॉलीफ्लेक्स कैमरा खरीदा। इसके बाद उन्होंने खुद की फोटोग्राफी के लिए कनु के सामने तीन शर्तें रखीं। पहला यह कि वह कभी कैमरे के फ्लैश का इस्तेमाल नहीं करेंगे, दूसरा कि वह कभी उन्हें पोज देने को नहीं कहेंगे और तीसरा कि कभी भी वह अपने शौक के लिए आश्रम से पैसे नहीं मांगेंगे। तीसरी शर्त तो आप समझ ही गए होंगे। पहली और दूसरी शर्तें इसलिए कि गांधीजी को जीवन में पल भर की ‘बनावट’ भी बर्दाश्त नहीं थी। क्या प्रदर्शन पर पैसे उड़ाने और बनावट में यकीन रखने वाली आज की पीढ़ी इससे सीख लेगी?

महात्मा की पदवी से कष्ट

गांधीजी ने कहा था कि “मुझे नहीं लगता कि मैं महात्मा हूँ। लेकिन मैं यह अवश्य जानता हूँ कि मैं ईश्वर के सर्वाधिक दीन-विनीत प्राणियों में से एक हूँ। इस ‘महात्मा’ की पदवी ने मुझे बड़ा कष्ट पहुँचाया है। मुझे एक क्षण भी ऐसा याद नहीं जब इसने मुझे गुदगुदाया हो।” उनका मानना था कि यह पदवी व्यर्थ है क्योंकि यह उनके बाह्य कार्यकलाप, उनकी राजनीति के कारण है, जो उनका लघुतम पक्ष है और इसलिए क्षणजीवी भी है। आगे उन्होंने कहा – “मेरा वास्तविक पक्ष है सत्य और अहिंसा के प्रति मेरा आग्रह, और इसी का महत्व स्थायी है। यह पक्ष चाहे जितना छोटा हो पर इसकी उपेक्षा नहीं करनी है। यही मेरा सर्वस्व है।” क्या छोटी-सी उपलब्धि और उपाधि पर इतराने से पहले हमें बापू की ये बात याद नहीं करनी चाहिए?

तो ऐसे थे बापू। आईये, उन्हें नमन करें। जितनी सामर्थ्य हो हमारी, उतना उन्हें अपने जीवन में उतारें और कुछ ऐसा करें कि हमारी आने वाली नस्लें उनका कुछ अंश भी अपने जीवन में उतार पाएं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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45 साल में पहली बार, हमने किया एलओसी पार

भारतीय जवानों ने उड़ी में शहीद हुए अपने 18 साथी जवानों की शहादत का बदला ले लिया। उड़ी हमले के 10 दिन बाद हमारे जवान अदम्य साहस का परिचय देते हुए एलओसी के पार करीब तीन किलोमीटर अंदर घुसे और चार घंटे में सात आतंकी कैंपों को नेस्तनाबूद कर 38 आतंकियों को मार गिराया। 45 साल में पहली बार ऐसा हुआ कि हमने पाकिस्तान को पीओके (पाक अधिकृत कश्मीर) में घुसकर मारा। भारतीय सेना की तैयारी कितनी जबर्दस्त थी, इसका अंदाजा इस बात से लगता है कि इतनी बड़ी कार्रवाई को अंजाम देने के बाद हमारे सभी जवान सुरक्षित वापस लौटे। उनमें से किन्हीं को चोट तक नहीं आई।

भारतीय सेना के इस हमले की घोषणा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में हुई सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडल समिति की बैठक के बाद की गई। बैठक में रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर, विदेश मंत्री सुषमा स्वराज, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, वित्त मंत्री अरुण जेटली, सेना प्रमुख दलबीर सिंह सुहाग और सैन्य अभियान महानिदेशक (डीजीएमओ) रणबीर सिंह मौजूद थे। प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, जम्मू-कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती, पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह समेत 25 देशों के उच्चायुक्तों और राजदूतों को इन हमलों के बारे में सूचित किया। निश्चित रूप से यह उनके कूटनीतिक कौशल का परिचायक है। दूसरी ओर हमारे नैतिक बल की पराकाष्ठा यह कि इस हमले के बाद हमारे सैन्य अभियान महानिदेशक ने पाकिस्तान के सैन्य अभियान महानिदेशक से भी फोन पर बात की और उनसे इस अभियान का ब्योरा साझा किया।

इस हमले के बाद भारतीय सेना के इतिहास में ऐसा पहली बार हुआ कि बाकायदा प्रेस कांफ्रेंस कर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ (खास ठिकानों को लक्ष्य बनाकर गुप्त तरीके से हमला करना और यह सुनिश्चित करना कि सिर्फ लक्षित निशाने को ही नुकसान हो) की जानकारी दी गई। भारतीय सैन्य महानिदेशक ने बताया कि हमें अत्यन्त विश्वसनीय सूचना मिली थी कि आतंकी नियंत्रण रेखा पर बने आतंकी शिविरों में जम्मू-कश्मीर और अन्य महानगरों में हमले के उद्देश्य से एकत्र हुए हैं। इसी कारण बिना देर किए उन्हें उनके अंजाम तक पहुँचा दिया गया।

भारत के इस मुँहतोड़ जवाब के बाद पाकिस्तान बौखलाहट में है। रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि पाकिस्तान पलटवार कर सकता है। हालांकि उड़ी के बाद अन्तर्राष्ट्रीय मंच पर बुरी तरह घिर चुके (गौरतलब है कि भारत के कड़े रुख के कारण इस्लामाबाद में प्रस्तावित सार्क सम्मेलन भी रद्द हो चुका है) और अन्दरूनी तौर पर अत्यन्त ‘जर्जर’ पाकिस्तान के लिए ऐसा करना बहुत आसान नहीं है, और अगर वह कोई नापाक हरकत कर भी बैठता है तो भारत इसके लिए पूरी तरह तैयार है।

सबसे अच्छी बात यह कि आतंक के खिलाफ कार्रवाई पर सभी राजनीतिक दल एक हैं। नियंत्रण रेखा पर ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ के बाद सभी दलों ने सेना को मुबारकबाद दी और सरकार को यकीन दिलाया कि आतंक के खिलाफ कार्रवाई में वे सरकार के साथ हैं। दूसरी ओर सरकार भी सभी दलों को विश्वास में लेकर चल रही है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सौ भारतीय अमीरों में दो बिहारी

अमेरिकी पत्रिका फोर्ब्स की 100 सबसे अमीर भारतीयों की वार्षिक सूची में बिहार के दो उद्योगपतियों – संप्रदा सिंह और अनिल अग्रवाल – ने अपनी जगह बनाई है। धनकुबेरों की इस सूची में रिलायंस इंडस्ट्रीज के प्रमुख मुकेश अंबानी (कुल सम्पत्ति 1.52 लाख करोड़) लगातार नौवें साल शीर्ष पर हैं। सनफार्मा के दिलीप सांघवी (कुल सम्पत्ति 1.13 लाख करोड़) दूसरे और हिन्दूजा बंधु (कुल सम्पत्ति 1 लाख करोड़) तीसरे स्थान पर हैं। बता दें कि फोर्ब्स की सूची में इस साल छह नए अरबपतियों को पहली बार स्थान मिला है, जिनमें सबसे उल्लेखनीय नाम योगगुरु बाबा रामदेव के सहयोगी और पतंजलि आयुर्वेद के सह संस्थापक आचार्य बालकृष्ण का है। 16 हजार करोड़ की सम्पत्ति के साथ बालकृष्ण 48वें स्थान पर हैं।

बहरहाल, फोर्ब्स द्वारा जारी सूची के अनुसार भारत की पाँचवीं सबसे बड़ी फार्मास्युटिकल्स कम्पनी एल्केम लैबोरेट्रिज के मालिक संप्रदा सिंह सबसे अमीर बिहारी हैं और 17.9 हजार करोड़ की सम्पत्ति के साथ सौ अमीर भारतीयों में 42वें स्थान पर हैं। 25 जनवरी 1926 को बिहार के जहानाबाद जिले में जन्मे संप्रदा पिछले साल इस सूची में 47वें स्थान पर थे। संप्रदा ने अपने भाई नरेन्द्र के साथ 1973 में एल्केम लैबोरेट्रिज की स्थापना की थी। उनकी कम्पनी इस वक्त भारत समेत यूरोप, एशिया, दक्षिण अमेरिका और अमेरिका में संचालित होती है। एल्केम फार्मास्युटिकल्स को फार्मा लीडर अवार्ड मिल चुका है। अपने कार्यक्षेत्र में भीष्म पितामह का दर्जा रखने वाले 91 वर्षीय संप्रदा सिंह वर्तमान में सपरिवार मुंबई में रहते हैं।

7.4 हजार करोड़ की सम्पत्ति के साथ खनन व्यापारी अनिल अग्रवाल इस सूची में स्थान बनाने वाले दूसरे बिहारी हैं। इस साल अनिल को 63वां स्थान मिला है, जबकि पिछले साल वे 53वें पायदान पर थे। 2003 में शुरू हुई अनिल की वेदांता रिसोर्सेस लंदन स्टॉक एक्सचेंज में दर्ज होने वाली पहली भारतीय कम्पनी थी। 24 जनवरी 1954 को बिहार की राजधानी पटना में जन्मे अनिल अग्रवाल ने 15 साल की उम्र में स्कूल छोड़ा और पुणे में अपने पिता के एल्युमीनियम कंडक्टर बनाने के व्यापार में लग गए। 19 साल की उम्र में वे पुणे से मुंबई आए और अपना व्यापार शुरू किया। स्क्रैप मेटल का काम उन्होंने 1970 में शुरू किया और 1976 में शैमशर स्टेर्लिंग कार्पोरेशन को खरीदा। उसके बाद के उनके सफर से दुनिया भलीभांति परिचित है।

आज देश-दुनिया में बिहारी अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। यह निश्चित रूप से गौरव का विषय है। इन सामर्थ्यवान बिहारियों की उपलब्धियों में तब चार चाँद लग जाएंगे, जब इनमें से आगे बढ़कर कोई बिहार में नए-नए उद्योगों के विकास के लिए सार्थक पहल करे। जिस दिन बिहार को ‘अमीर’ बनाते हुए कोई बिहारी अमीरों की सूची में शामिल होगा, वो दिन नि:संदेह बिहार के इतिहास में मील का पत्थर कहलाएगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

 

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आईये, ऑस्कर के द्वार तक पहुँची ‘विसारनाई’ के लिए दुआ करें

राष्ट्रीय पुरस्कार विजेता तमिल फिल्म ‘विसारनाई’ 2017 के ऑस्कर पुरस्कारों की विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी में भारत की आधिकारिक प्रविष्टी होगी। विसारनाई ने दौड़ में शामिल ‘बाजीराव मस्तानी’, ‘सुल्तान’, ‘एयरलिफ्ट’ और ‘उड़ता पंजाब’ समेत कुल 29 फिल्मों को पीछे छोड़ यह उपलब्धि हासिल की है। एम चन्द्रकुमार के उपन्यास ‘लॉक अप’ पर आधारित इस फिल्म के निर्माता दक्षिण भारतीय फिल्मों के अभिनेता धनुष हैं। फिल्म का लेखन और निर्देशन वेट्रिमारन ने किया है और मुख्य भूमिकाएं दिनेश रवि, आनंदी और आदुकलाम मुरूगदेश ने निभाई हैं।

‘विसारनाई’ पुलिस की बर्बरता, भ्रष्टाचार और अन्याय को दिखाती है। फिल्म अपना काम इतनी सहजता और बारीकी से करती है कि आप इसके दृश्यों को जीने लग जाएंगे और सचमुच भूल जाएंगे कि आप  फिल्म देख रहे हैं। इस साल 63वें राष्ट्रीय पुरस्कार समारोह में इसने तीन पुरस्कार – सर्वेश्रेष्ठ तमिल फिल्म, सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता (समुतिराकनी) और सर्वश्रेष्ठ संपादन (किशोर ते) – हासिल किए थे। 72वें वेनिस फिल्म महोत्सव में भी ‘विसारनाई’ ने झंडे गाड़े थे और एमनेस्टी इंटरनेशनल इटालिया अवार्ड अपने नाम किया था।

ऑस्कर मिलना ना मिलना बाद की बात है। भारत में हर साल बनने वाली हजारों फिल्मों की भीड़ में अपनी ओर ध्यान खींचना और दुनिया भर की चुनिंदा फिल्मों के साथ जा खड़ा होना भी कम बड़ी बात नहीं। इस फिल्म ने साबित किया है कि अच्छे काम को किसी ताम-झाम की जरूरत नहीं। बड़े बजट, बड़े स्टार, बड़ी पब्लिसिटी के बिना भी लोगों के दिल-दिमाग को छुआ और झकझोरा जा सकता है।

छोटी-छोटी उपलब्धियों पर शोर मचाने वालों को यह बता देना भी जरूरी है कि ‘विसारनाई’ से पहले आठ और तमिल फिल्में ऑस्कर में भारत का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं। आईये, ऑस्कर के द्वार तक बड़ी शालीनता से पहुँचने वाली ‘विसारनाई’ की सफलता के लिए दुआ करें।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बजट पर केन्द्र के निर्णय को नीतीश ने नकारा

1924 से चली आ रही परम्परा टूट गई। अगले साल से रेलमंत्री संसद की सीढ़ियों पर ‘बजट’ का ब्रीफकेस उठाए फोटो खिंचाते नहीं दिखेंगे। 2017 से अलग पेश नहीं होगा रेल बजट। केन्द्रीय कैबिनेट ने ‘एक देश एक बजट’ के प्रस्ताव पर अपनी मुहर लगा दी। कैबिनेट के इस ऐतिहासिक निर्णय के साथ ही रेल बजट इतिहास बन गया। उसे अब आम बजट के साथ ही पेश किया जाएगा। हालांकि रेलवे की अपनी पहचान आगे भी बरकरार रहेगी।

कैबिनेट की बैठक के बाद वित्त मंत्री अरुण जेटली ने एक प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित किया और कहा कि अगले साल से रेल बजट अलग से पेश नहीं किया जाएगा। रेलवे संबंधी सभी प्रस्ताव आम बजट में शामिल होंगे। जेटली ने कहा कि आज स्थिति अलग है, सिर्फ परम्परा के आधार पर अलग से रेल बजट पेश किए जाने की जरूरत नहीं है। अब एक बजट और एक विनियोग विधेयक होगा। इससे संसद का मूल्यवान समय बचेगा। उन्होंने स्पष्ट किया कि इस निर्णय से रेलवे की स्वायत्ता पर कोई असर नहीं पड़ेगा। सरकार यह सुनिश्चित करेगी कि हर साल रेलवे पर चर्चा हो।

इस फैसले के मद्देनज़र संसद का बजट सत्र अब 25 जनवरी से पहले बुलाया जा सकता है। फिलहाल फरवरी के अन्तिम सप्ताह में बजट सत्र शुरू होता है। इस प्रकार, अब बजट की तैयारियां अक्टूबर के प्रारंभ में ही शुरू हो जाएंगी। जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद) का अग्रिम अनुमान सात जनवरी को उपलब्ध होगा जो फिलहाल सात फरवरी को प्रस्तुत किया जाता है। अब तक बजट को संसद की मंजूरी मई के मध्य तक दो चरणों में मिलती थी और जून में मानसून दस्तक दे देता था, जिससे राज्य अधिकतर योजनाओं का क्रियान्वयन और खर्च अक्टूबर तक शुरू नहीं कर पाते थे। ऐसे में योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए छह महीने का ही समय बचता था। बजट को पहले पेश किए जाने का मतलब है कि पूरी प्रक्रिया 31 मार्च तक सम्पन्न हो जाएगी और व्यय के साथ-साथ कर प्रस्ताव नए वित्त वर्ष की शुरुआत में ही अमल में आ जाएगा। इससे बेहतर क्रियान्वयन सुनिश्चित हो सकेगा।

बहरहाल, केन्द्र सरकार ने अपने तई भले ही एक बड़ा कदम उठाया हो, पर बिहार के मुख्यमंत्री और अटल सरकार में रेल मंत्री रहे नीतीश कुमार इस पर जमकर बरसे। स्वतंत्र रूप से रेल बजट पेश करने की परम्परा खत्म करने पर नीतीश ने कहा कि इससे स्पष्ट हो गया कि आमलोगों की रेलवे केन्द्र सरकार की प्राथमिकता में नहीं है। इससे रेलवे की स्वायत्तता पर भी खतरा मंडराने लगा है।

कई बार रेल बजट पेश कर चुके नीतीश का मानना है कि इस फैसले से किसी भी रूप में रेलवे का भला नहीं होगा। रेलवे के सुचारू संचालन के लिए रेल बजट का अलग रहना जरूरी था। उन्होंने कहा कि रेल बजट आमलोगों की आकांक्षा और भावनाओं से सीधे जुड़ता है और सरकार को चाहिए कि इसे उसके पुराने स्वरूप में ही रहने दे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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दो शहीद के परिवारों की अद्भुत दास्तां

उड़ी के शहीद गया के सुनील कुमार विद्यार्थी की तीन बेटियों ने अपने पिता की तरह सैनिक धर्म निभाया। मानवीय संवेदना के मोर्चे पर उनका ये युद्ध उनके पिता के युद्ध से कम मुश्किल नहीं था। जरा सोचकर देखिए। फोन पर पिता के शहीद होने की ख़बर आ चुकी है। माँ बिलख रही है। घर क्या पूरे मुहल्ले में मातम छाया हुआ है। पर अपने पिता की ये तीन लाडलियां खुद को तैयार करती हैं। आँसू इनके भी नहीं रुक रहे। हिचकियां ले-लेकर रो रही हैं तीनों। छलकती आँखों से प्रश्नपत्र तक धुंधले दिखेंगे, पर इन्हें स्कूल जाना है। आज इनकी परीक्षा जो है। इन्हें अपने पिता से किया वादा जो निभाना है। इन्हें भी आर्मी ऑफिसर जो बनना है।

शहीद सुनील की तीनों बेटियां डीएवी पब्लिक स्कूल (मेडिकल यूनिट) में पढ़ती हैं। बड़ी बेटी आरती कक्षा आठ, दूसरी बेटी अंशु कक्षा छह और तीसरी अंशिका कक्षा दो में पढ़ती है। सुनील अपनी तीसरी बेटी का नामांकन कराने इसी साल जून में आए थे और स्कूल प्राचार्य से कहा था – दो बेटियां आपके स्कूल में पढ़ रही हैं, तीसरी का भी नामांकन कर लीजिए। आपकी छांव में तीनों बेटियां पढ़ेंगी। इन्हें आर्मी ऑफिसर्स बनना है। कल तीनों की परीक्षा थी और छोटी-सी उम्र में आर्मी का अनुशासन जैसे उनकी रगों में दौड़ रहा था। तभी तो उनकी हिचकियों से बेंच भले हिलती रही, वे अपने कर्तव्य-पथ से नहीं हिलीं। तीनों ने परीक्षा पूरी की और फिर घर आकर माँ से लिपटकर खूब रोईं। माँ, जिसे अपनी सुध भले ही ना हो उस वक्त लेकिन अपने पति का कहा निभाने के लिए बेटियों को स्कूल जाने को कहना नहीं भूली थी।

आँसू, श्रद्धा और प्रेरणा से लबालब कर देने वाली एक और कहानी है उड़ी के एक और शहीद कैमूर के राकेश कुमार की पत्नी किरण की। शहीद राकेश का शव आज सुबह दस बजे उनके पैतृक गांव लाया गया तो जैसे उनके अंतिम दर्शन को पूरा कैमूर उमड़ पड़ा। उनका शव गांव के मध्य विद्यालय परिसर में रखा गया। परिजनों के चीत्कार से पूरा वातावरण जैसे रो उठा। शहीद राकेश का पार्थिव शरीर लाने वाले साथी जवान भी अपने आँसू नहीं रोक पा रहे थे। पर उस शहीद की पत्नी के पहुँचते ही माहौल और गमगीन होने की बजाय वीरता और देशभक्ति से ओतप्रोत हो गया।

जी हाँ, उस वीरांगना ने अपने पति के अंतिम दर्शन किए। उनको सलामी दी। रोती-बिलखती सास से कहा – मम्मी आप रोएंगी तो हम भी कमजोर पड़ जाएंगे। फिर एक साल के बेटे हर्ष से कहा – बेटे, पापा पर फूल चढ़ाओ। इतना ही नहीं, शव के सिरहाने खड़ी किरण ने वहाँ मौजूद सैनिकों से बड़ी दृढ़ता के साथ कहा – आपलोग प्रधानमंत्री मोदी तक मेरा यह संदेश जरूर पहुँचा दें कि वे पाकिस्तान को ऐसा सबक सिखाएं कि दुनिया के नक्शे से उसका नामोनिशान मिट जाए। बहू की हिम्मत देख शहीद के माता-पिता भी शोक से बाहर निकल जवानों से अपने बेटे की मौत का बदला लेने और सरकार तक पाकिस्तान पर कार्रवाई करने का पैगाम पहुँचाने को कहा। उन्होंने कहा कि ऐसा नहीं होने पर वे आमरण अनशन पर बैठेंगे। अन्त में, गगनभेदी नारों के बीच शव को बक्सर रवाना किया गया, जहाँ एक साल के बेटे ने अपने पिता को मुखाग्नि दी।

Dead Body of Shaheed Rakesh Kaimur
Dead Body of Shaheed Rakesh Kaimur

 ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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