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सपा-साइकिल अखिलेश की, अब बारी उत्तर प्रदेश की!

पिता मुलायम सिंह यादव से सपा और साइकिल की लड़ाई जीतने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि उनका अपने पिता से कोई झगड़ा नहीं था। उन्होंने कहा कि वह मेरे पिता हैं, उनसे कभी रिश्ता नहीं टूटेगा। उधर बेटे के हाथों मात खाने के बाद मुलायम भी ‘मुलायम’ दिख रहे हैं। सूत्रों की मानें तो पिता-पुत्र ने समझौते के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी भी शुरू कर दी है।

गौरतलब है कि चुनाव आयोग से पार्टी और सिंबल का विधिवत अधिकार मिलने के बाद अखिलेश दो बार पिता से मिल चुके हैं। इसे रिश्तों में जमी बर्फ पिघलने के तौर पर देखा जा रहा है। वैसे यह मानने वालों की भी कमी नहीं है कि इनके रिश्तों पर कभी बर्फ जमी ही नहीं थी। बहरहाल, ख़बर है कि मुलायम ने अखिलेश को अपने 38 उम्मीदवारों की सूची सौंपी है और वे चाहते हैं कि अखिलेश इन सभी को टिकट दें। बदले में वे सपा उम्मीदवारों के खिलाफ अपना कोई प्रत्याशी नहीं उतारेंगे। सूत्रों के मुताबिक इस सूची में शिवपाल यादव का नाम नहीं है लेकिन उनके बेटे आदित्य का नाम इसमें शामिल है। कहा जा रहा है कि बदली परिस्थितियों में शिवपाल चुनाव नहीं लड़ना चाहते।

उधर अखिलेश खेमे से मिल रहे संकेतों के अनुसार मुलायम की सूची पर जल्द ही कोई ‘सकारात्मक’ जवाब मिलेगा। अखिलेश ने सोमवार को चुनाव आयोग से सिंबल मिलने के बाद पिता मुलायम से मिलकर उनका आशीर्वाद लिया था और मंगलवार को अपने सरकारी आवास पर पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए जोर देकर कहा कि पिता मुलायम के साथ कभी उनके मतभेद नहीं थे। उन्होंने कहा, सच तो यह है कि हमारी और उनकी लिस्ट में 90 प्रतिशत उम्मीदवार एक ही हैं।

देखा जाय तो पिछले कई हफ्तों से चल रहे समाजवादी संग्राम का अखिलेश के लिए इससे अच्छा अंत नहीं हो सकता था। इस पूरे घटनाक्रम के बाद न केवल पिता की सींची पार्टी पर उनका एकाधिकार हो गया, बल्कि चुनाव से ठीक पहले के अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले समय में चौक-चौराहे से लेकर तमाम चैनलों की चर्चा के केन्द्र में वे रहे और अपने ‘स्टैंड’ व साफ-सुथरी छवि से आम जनता, जिनमें युवावर्ग को अलग से रेखांकित करना जरूरी है, की सहानुभूति और विश्वास भी अपनी झोली में भर ली। आज अखिलेश न केवल पार्टी के भीतर बल्कि बाहर भी इतनी मजबूत स्थिति में हैं कि कांग्रेस और आरएलडी जैसी पार्टियां उनसे गठबंधन को बांहें पसारे खड़ी हैं।

बता दें कि तेजी से आकार ले रही परिस्थितियों में अखिलेश-डिंपल, राहुल-प्रियंका और अजित सिंह के बेटे जयंत जैसे युवा चेहरों के एक मंच पर आने में अब औपचारिकता भर शेष है। न भूलें कि मुलायम और अजित भी संरक्षक की भूमिका में साथ खड़े होंगे। चुनाव निश्चित तौर पर अनिश्चितताओं का खेल है, पर इन सबके साथ आने पुर कुल मिलाकर जो तस्वीर उभर कर सामने आती है उससे भाजपा और बसपा के माथे पर बल पड़ रहे होंगे, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या मोदी के हाथों में होगी राष्ट्रपति चुनाव की कुंजी?

पाँच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव से दो बातें साफ हो जाएंगी – पहली, नोटबंदी के बाद भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति देश का रुख क्या है? और दूसरी, मोदी के हाथों में राष्ट्रपति चुनाव की कुंजी होगी या नहीं? पहली बात से आप चौंके नहीं होंगे, लेकिन दूसरी बात पर आप जरूर ठहर गए होंगे कि इन चुनावों से राष्ट्रपति चुनाव का आखिर क्या कनेक्शन है? यकीन मानिए, कनेक्शन है और ऐसा है कि इन राज्यों, खासकर यूपी और पंजाब, में भाजपा के नहीं जीतने पर मोदी अपने मन का राष्ट्रपति नहीं बना पाएंगे। चलिए, जानते हैं कैसे?

राष्ट्रपति चुनाव के वोटों का समीकरण देखें तो वर्तमान में एनडीए के पास करीब 4.52 लाख वोट हैं और अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए उसे करीब एक लाख और वोटों की जरूरत है। अभी जिन पाँच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उनमें कुल 1, 03, 756 वोट दांव पर हैं। सबसे ज्यादा 83, 824 वोट यूपी के पास हैं और उसके बाद पंजाब की महत्वपूर्ण भूमिका है। जानकारों का मानना है कि भाजपा के यूपी और पंजाब में हारने की स्थिति में भी मोदी सरकार राष्ट्रपति चुनाव में अपना उम्मीदवार जिताने में कामयाब हो जाएगी। बस फर्क यह आएगा कि फिर उसे अपनी पसंद के उम्मीदवार की जगह सर्वस्वीकार्य उम्मीदवार की ओर जाना होगा। यानि ऐसा उम्मीदवार जो सभी दलों को मान्य हो।

राष्ट्रपति पद के अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए जरूरी संख्याबल न होने की स्थिति में भाजपा को अन्य क्षेत्रीय दलों से बात करनी होगी। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस, एआईएडीएमके, बीजेडी, तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी पार्टियों की भूमिका अहम हो जाएगी और भाजपा उनके रुख की ओर देखने के लिए बाध्य होगी। कहने की जरूरत नहीं कि इस स्थिति में एनडीए को अपने उम्मीदवार का चयन सोच-समझकर करना होगा, ताकि सबकी सहमति मिल सके।

गौरतलब है कि भारत में राष्ट्रपति पद का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत किया जाता है। इसमें लोकसभा-राज्यसभा के चुने हुए सांसद और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक हिस्सा होते हैं। विधायकों के वोट का मूल्य 1971 की आबादी के आधार पर एक निश्चित अनुपात में तय किया जाता है, और सभी राज्यों और दिल्ली-पुडुचेरी विधानसभाओं के कुल मतों के बराबर लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 238 सदस्यों के वोटों का मूल्य होता है। फिलहाल एनडीए के पास करीब 4.52 लाख वोट हैं, जिनमें से अकेले भाजपा के पास करीब 3.68 लाख वोट हैं। वहीं, यूपीए के पास लगभग 2.30 वोट हैं, जिनमें से कांग्रेस के पास 1.50 लाख वोट हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदी-नीतीश हुए ‘नजदीक’ तो लालू हुए मंच से ‘दूर’!

पटना में आयोजित प्रकाश-पर्व अपनी अनूठे आतिथ्य और अभूतपूर्व भव्यता के साथ दो और कारणों से चर्चा में है – पहला, मोदी-नीतीश की जुगलबंदी से निकले नए सुर और दूसरा, लालू को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राज्यपाल रामनाथ कोविंद, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और मेजबान नीतीश कुमार के साथ मंच पर जगह नहीं मिलना, जबकि लालू अपने दोनों बेटों के साथ मंच के सामने ही विराजमान थे। बात अगर केवल मोदी और नीतीश द्वारा एक-दूसरे की तारीफ करने तक ही सीमित रहती तो थोड़ी देर के लिए कुछ और भी सोचा-समझा जा सकता था। लेकिन एक तरफ वे दोनों एक-दूसरे की प्रशंसा के पुल बांध रहे थे और दूसरी तरफ राज्य के मुख्यमंत्री और केन्द्र में रेलमंत्री रह चुके और वर्तमान में सत्तारूढ़ महागठबंधन के सबसे बड़े दल के सर्वेसर्वा लालू प्रसाद यादव अपने दोनों ‘लाल’ के साथ अपनी ‘असह्य अनदेखी’ से अपमान का दंश झेल रहे थे। जाहिर है, बात करने वाले बात करेंगे ही।

प्रश्न उठता है, ऐसा क्यों हुआ? क्या लालू की शख्सियत इतनी आसानी से नज़रअंदाज कर दी जाने वाली है, और वो भी बिहार में? कायदे से मंच पर उनकी जगह तो बननी ही चाहिए थी, पदानुसार उनके उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी को भी वहाँ होना चाहिए था। पर बाप-बेटे दोनों नदारद। मंच से भी और मोदी और नीतीश के संबोधन से भी। हालांकि प्रशासन के लोग ये तर्क दे रहे हैं कि केन्द्र के मंत्रियों को मंच पर जगह मिलनी चाहिए, ये पीएमओ की ओर से कहा गया था। चलिए ये मान लेते हैं। तो क्या ये भी मान लिया जाय कि लालू और तेजस्वी को मंच पर जगह न मिले, इसका भी निर्देश ‘ऊपर’ से ही था? क्या मेजबान नीतीश अपने विवेक का प्रयोग कर कम-से-कम लालू को मंच पर नहीं बुला सकते थे, जबकि मंच पर पर्याप्त जगह थी?

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब मोदी और नीतीश एक-दूसरे को फूटी आँख देखना पसंद नहीं करते थे। 17 साल तक एनडीए के साथ सत्ता का सुख भोग चुके नीतीश ने मोदी को प्रधानंमत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के साथ गठबंधन रिश्ते तोड़ डाले थे। बिहार के चुनाव में एक-दूसरे पर निशाना साधने में दोनों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मोदी ने नीतीश पर अपने सामने से ‘थाली’ खींच लेने का आरोप लगाया तो नीतीश ने ‘डीएनए’ को मुद्दा बनाकर बकायदा हस्ताक्षर अभियान चलाया था। ऐसे में दोनों के बीच रिश्तों में आई ‘गर्माहट’ से अटकलबाजियों का बाज़ार गर्म होना स्वाभाविक है।

गौरतलब है कि आरजेडी और जेडीयू में भले ही गठबंधन हो, लेकिन दागी आरजेडी विधायक राजवल्लभ से लेकर सांसद शहाबुद्दीन तक के मामलों पर दोनों दलों का टकराव सामने आ चुका है। जमानत पर कुछ दिन के लिए बाहर निकले शहाबुद्दीन ने नीतीश को अपना नेता मानने से ही इनकार कर दिया था। वरिष्ठ आरजेडी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह खुलेआम कई बार नीतीश पर निशाना साध चुके हैं। नोटबंदी पर विपक्ष के एकजुट होने के प्रस्ताव पर जेडीयू के अलग होने पर भी आरजेडी सुप्रीमो लालू ने परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए इसे ‘इगो’ की समस्या कहा था।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि नीतीश का ताजा रुख लालू पर राजनीतिक दवाब कायम करने की कवायद हो सकती है। नीतीश लालू को मैसेज देना चाहते हैं कि उनके सामने विकल्प खुले हुए हैं। उधर भाजपा को लगता है कि उसे स्वाभाविक तौर पर एक अतिरिक्त सहयोगी मिल जाय तो हर्ज ही क्या है? राज्यसभा में केन्द्र के सत्ताधारी गठबंधन का कम संख्याबल भी भाजपा को जेडीयू से नजदीकी बढ़ाने को प्रेरित करता है। कई अहम बिल वहाँ पास होने हैं। ऐसे में अगर आने वाले समय में मोदी और नीतीश का एक-दूसरे के लिए उपजा ‘प्रेम’ और प्रगाढ़ हो जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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मोदी भी हुए मुरीद, प्रकाश-पर्व पर मेजबानी की मिसाल बना बिहार

और नरेन्द्र मोदी भी मुरीद हो गए बिहार और नीतीश कुमार के। गुरु गोविंद सिंह के 350वें प्रकाश-पर्व पर आज पटना आए प्रधानमंत्री ने दिल खोलकर इस अवसर पर की गई भव्य व्यवस्था और भावपूर्ण आतिथ्य की सराहना की। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मुक्त कंठ से तारीफ की उनके शराबबंदी अभियान को लेकर और कहा कि देश और दुनिया के लिए मिसाल बनेगा बिहार। इससे पहले नीतीश कुमार ने भी शराबबंदी को लेकर गुजरात और इस संदर्भ में वहाँ के मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी के योगदान की तारीफ की थी। अब परस्पर की गई ये ‘तारीफ’ कितनी ‘दूर’ तक जाती है, ये तो आने वाला वक्त बताएगा, फिलहाल बात प्रकाश-पर्व की।

देखा जाय तो बिहार के लिए इससे सुंदर नहीं हो सकता था नए साल का आगाज। एक ओर राजधानी पटना में सिक्खों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह की 350वीं जयंती पर प्रकाशोत्सव का आयोजन तो दूसरी ओर बुद्ध की नगरी गया में 34वीं कालचक्र पूजा का अनुष्ठान… पटना में देश-विदेश से आए सिख तो गया में बौद्ध श्रद्धालुओं का सैलाब… यानि अंतर्राष्ट्रीय महत्व के दो विशाल आयोजनों का मेजबान बनना था बिहार को। देश-दुनिया की निगाहें टिकी थीं बिहार पर और बिहार ने इतिहास रच दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में क्या शानदार इंतजाम किया हमारे शासन और प्रशासन ने!

पिछले साल सितंबर में प्रकाशोत्सव की कड़ी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सिख कॉनक्लेव ने ही यह संकेत दे दिया था कि बिहार एक नया इतिहास लिखने की राह पर है। इसे महसूस कर ही पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने उस समय कहा था कि बिहार जैसा तो पंजाब भी नहीं कर सका। तब और आज प्रकाशोत्सव पर आई विभिन्न क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों, श्रद्धालुओं, सेवादारों, जत्थेदारों के सुर एक हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और पंजाब कांग्रस के अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह, पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल, केन्द्रीय मंत्री एसएस अहलुवालिया से लेकर पंजाब सहित देश और दुनिया के अलग-अलग कोने से आए अनगिनत श्रद्धालु तक – सब के सब चकित हैं बिहार की व्यवस्था और आतिथ्य देखकर।

पटना स्थित हरमंदिर साहब गुरुद्वारा हो, वहीं स्थित बाललीला साहब हो, भव्य दरबार हॉल हो, गांधी मैदान, पटना बाईपास और पटना सिटी स्थित कंगन घाट पर टेंट सिटी का निर्माण हो, इन स्थलों पर अनवरत चलने वाले लाखों लोगों का लंगर हो, मंगल तालाब का लेजर शो हो, गांधी मैदान से गुरुद्वारे तक लगभग नौ किलोमीटर तक चला नगर-कीर्तन हो, गुरु गोविंद सिंह के चित्रों की प्रदर्शनी हो, हरमंदिर साहब और गांधी मैदान सहित श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल, भारतीय नृत्य कला मंदिर, रविन्द्र भवन आदि के सांस्कृतिक आयोजन हों, शहर के चप्पे-चप्पे की सफाई, सजावट और सुरक्षा हो, स्वागत-द्वार, होर्डिंग व बैनर से पटे चौक-चौराहे हों या फिर कदम-कदम पर बने हेल्प डेस्क – हर चीज अद्भुत, अभूतपूर्व और अविस्मरणीय। मुख्य आयोजन-स्थल पटना के गांधी मैदान में तो जैसे पूरा का पूरा शहर ही बसा दिया गया – हर सुविधा से लैस।

बीते कुछ वर्षों में असहिष्णुता देश में बड़ा सियासी व सामाजिक मुद्दा बनकर सामने आया है। इन्हीं कारणों से बड़े धार्मिक आयोजन भी संवेदनशील बनते गए हैं। ऐसे में इतने बड़े उत्सव का इतना सफल आयोजन कर बिहार ने न केवल देश बल्कि दुनिया भर में मिसाल कायम की है। उम्मीद है कि एक बार  फिर बिहार की धरती से सर्व धर्म समभाव का संदेश दुनिया भर में जाएगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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यूपी समेत पाँच राज्यों में चुनाव की रणभेरी, परिणाम 11 मार्च को

चुनाव आयोग ने पाँच राज्यों में विधानसभा चुनाव की तारीखों की घोषणा कर दी है। उत्तर प्रदेश में 11 फरवरी से 4 मार्च के बीच कुल सात चरणों में चुनाव होंगे। पंजाब और गोवा में चुनाव की तारीख 4 फरवरी और उत्तराखंड में 15 फरवरी निश्चित की गई है, जबकि मणिपुर में दो चरणों में 4 और 8 मार्च को चुनाव होंगे। सभी राज्यों में मतों की गिनती 11 मार्च को होगी।

सबसे पहले बात राजनीतिक रूप से सर्वाधिक महत्वपूर्ण उत्तर प्रदेश की। उत्तर प्रदेश की 403 सीटों के लिए सात चरणों में चुनाव होंगे। 11 फरवरी को पश्चिमी यूपी के 15 जिलों की 73 सीटों पर मतदान होगा। दूसरे दौर में 15 फरवरी को उत्तराखंड से लगे जिलों की 67 सीटों पर चुनाव होंगे। तीसरे दौर में 12 जिलों की 69 सीटों पर 19 फरवरी को मतदान होगा। पुन: चौथे दौर में 12 जिलों की 35 सीटों पर चुनाव होंगे। पाँचवें चरण में 11 जिलों की 52 सीटों पर 27 फरवरी को चुनाव होंगे। छठे चरण में 7 जिलों की 49 सीटों पर 4 मार्च को मतदान होगा। सातवें और अंतिम चरण में पूर्वांचल के 7 जिलों की 40 सीटों पर 8 मार्च को चुनाव होंगे। वर्तमान में यूपी की 403 सीटों में 224 सपा, 80 बसपा, 47 भाजपा, 28 कांग्रेस, 14 निर्दलीय और 14 सीटें अन्य छोटे दलों के पास हैं।

पंजाब में 4 फरवरी को चुनाव होंगे। वहाँ कुल 117 सीटें हैं। वर्तमान में इनमें से 54 सीटें शिरोमणि अकाली दल, 12 भाजपा, 26 कांग्रेस और 6 निर्दलीय के पास हैं। गोवा की 40 सीटों के लिए भी 4 फरवरी को ही चुनाव होने हैं। वर्तमान में इन 40 सीटों में 21 भाजपा, 9 कांग्रेस, 5 निर्दलीय, 3 महाराष्ट्र गोमांतक पार्टी और 2 गोवा विकास पार्टी के पास हैं।

उत्तराखंड में 15 फरवरी को चुनाव होने हैं। वहाँ कुल 70 सीटें हैं। वर्तमान में इनमें 32 कांग्रेस, 31 भाजपा, 3 बसपा, 3 निर्दलीय और 1 सीट उत्तराखंड क्रांति दल के पास है। उधर मणिपुर की 60 विधानसभा सीटों में से 38 पर 4 मार्च को और शेष 2 सीटों पर 8 मार्च को चुनाव होंगे।

दिल्ली स्थित निर्वाचन आयोग में चुनाव कार्यक्रम का ऐलान करते हुए मुख्य निर्वाचन आयुक्त नसीम जैदी ने कहा कि इन चुनावों में पहली बार ईवीएम पर उम्मीदवारों के नामों के साथ उनकी तस्वीरें भी लगी होंगी। उन्होंने बताया कि उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और पंजाब में उम्मीदवारों के खर्च की सीमा 28 लाख रखी गई है, जबकि मणिपुर और गोवा में यह सीमा 20 लाख की होगी। कहने की जरूरत नहीं कि चुनाव की तारीखों के ऐलान के साथ ही पाँचों राज्यों में आचार संहिता लागू हो गई है। अब केन्द्र या राज्य सरकार इन राज्यों के लिए किसी स्कीम आदि की घोषणा नहीं कर सकती।

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लालू के सारे सवाल ‘अनर्गल’ नहीं हैं प्रधानमंत्रीजी!

नोटबंदी के 50 दिन बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश को आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने पूरी तरह फ्लॉप शो करार दिया है। नववर्ष की पूर्व संध्या पर दिए गए प्रधानमंत्री के इस संदेश को शून्य अंक देते हुए लालू ने भावहीन, प्रभावहीन, उत्साहहीन और घुटनों के बल रेंगता हुआ प्री-बजट भाषण बताया। भाषण में नोटबंदी की चर्चा नहीं करने पर तंज कसते हुए लालू ने कहा कि प्रधानमंत्री ने भी मान लिया है कि उनका अभियान बुरी तरह फेल हो गया, इसीलिए इसकी कोई चर्चा नहीं की। उपलब्धि होती तो पीट-पीटकर ढोल फाड़ देते।

प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती देते हुए आरजेडी के मुखिया ने कहा कि त्याग-बलिदान की कथा और परमार्थ की बातें वे अपने अमीर मित्रों के सुनाकर देखें। दो मिनट में कुर्सी छिन जाएगी। इस ‘शुद्धि यज्ञ’ की ओट में गरीबों की बलि चढ़ाने का अधिकार उन्हें किसने दिया? प्रधानमंत्री पर देश को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए लालू ने कहा कि 50-50 दिन चिल्लाने वाले प्रधानमंत्री पर अब कोई भरोसा नहीं करेगा। सैकड़ों लोगों की जान चली गई। 25 करोड़ लोगों का रोजगार छिन गया। इसके बावजूद इतना संवेदनहीन और हृदयहीन भाषण। अफसोस का एक शब्द भी नहीं।

प्रधानमंत्री से सवालों की झड़ी लगाते हुए लालू ने पूछा कि अर्थव्यवस्था का कितना नुकसान हुआ? इसकी भरपाई कैसे होगी? जीडीपी में कितनी गिरावट आई? नए नोट छापने पर कितना खर्च हुआ? कितना कालाधन आया? बैंकों में कितना जमा हुआ? कितनी नौकरी गई? लालू ने कहा कि मोदी को बताना चाहिए था कि आम लोगों की इतनी फजीहत के बाद कितना कालाधन आया? कितने भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हुई? जो लोग कतारों में खड़े रहकर मर गए, उनके परिजनों को कितना मुआवजा दिया जाएगा? फैक्ट्रियों के बंद होने से बेरोजगार होने वाले लाखों युवाओं को सरकार कितनी राशि देगी?

इसमें कोई दो राय नहीं कि नोटबंदी मोदी सरकार का साहसिक और कई मायनों में ऐतिहासिक निर्णय था। इसके दूरगामी परिणाम भी प्रधानमंत्री के वादे के मुताबिक होंगे, ये भी मान लेते हैं। लालू का इस तरह सवालों की बौछार करना भी उनकी राजनीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन एक बार अपने हृदय पर हाथ रखें और कहें कि क्या सचमुच लालू के सारे सवाल तथ्यहीन और अनर्गल हैं? क्या नववर्ष की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री मोदी सचमुच उस ‘रंग’ में थे, जिसके लिए वे जाने जाते हैं? उनके बहुप्रतीक्षित संबोधन में कुछ लुभावनी घोषणाएं तो थीं, लेकिन क्या हमारे-आपके मन में उमड़ते-घुमड़ते कई प्रश्न अनुत्तरित नहीं रह गए?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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तो क्या यह पिता-पुत्र का ‘प्रायोजित’ ड्रामा था..?

मुलायम सिंह यादव का ‘समाजवादी’ कुनबा ढहते-ढहते बच गया। निष्कासन के महज चंद घंटों बाद अखिलेश-रामगोपाल की पार्टी में वापसी के साथ पिछले दो-तीन दिनों से चल रहे यूपी के हाई वोल्टेज सियासी ड्रामे का फिलहाल अंत होता दिख रहा है। इन दो-तीन दिनों के तेजी से बदलते घटनाक्रम में 200 से ज्यादा विधायकों को अपने साथ खड़ा कर अखिलेश यादव पहले से भी ज्यादा, अतिशयोक्ति नहीं होगी अगर कहा जाय कि अपने पिता से भी ज्यादा, मजबूत होकर उभरे हैं।

अखिलेश द्वारा शक्ति-परीक्षण में चाचा शिवपाल (और पिता मुलायम को भी) को भी पछाड़ने के बाद उनका खेमा अब अपनी मांगों पर अड़ गया है। इन मांगों में शिवपाल के पर कतरना और अमर सिंह को पार्टी से बाहर का रास्ता दिखाना शामिल है। ये तो खैर तय हो ही चुका है कि उम्मीदवारों की सूची अब नए सिरे से जारी होगी और उसमें मुलायम-अखिलेश के अलावा किसी की भूमिका नहीं होगी। अखिलेश खेमा नेताजी ‘मुलायम’ को आजीवन संरक्षक और राष्ट्रीय अध्यक्ष की भूमिका में देखना चाहता है लेकिन उनके इर्द-गिर्द रहने वाले ‘षड्यंत्रकारी’ उन्हें किसी भी कीमत पर बर्दाश्त नहीं हैं।

पहले विधायकों के साथ बैठक के दौरान यह कहकर कि “मैं अपने पिता से अलग नहीं हूँ” और “नेताजी को मैं यूपी की जीत का तोहफा देना चाहता हूँ”, फिर उनसे मिलने पहुँचकर अखिलेश ने अपने पारिवारिक और राजनीतिक ‘विवेक’ का परिचय दिया। विपरीत परिस्थितियों में भी अपने और अपनी पार्टी के ‘निर्माता’ मुलायम के प्रति एक भी कटु शब्द का प्रयोग न कर उन्होंने एक साथ संवेदना और समझदारी दोनों का परिचय दिया। पिता के ‘सम्मान’ का ख्याल रख उन्होंने एक साथ दोनों खेमे की सहानुभूति पा ली। मुलायम ने भी बांहें फैलाने में कोई कसर नहीं छोड़ी। आखिर उन्हें पता जो था कि उनकी हार में भी ‘जीत’ आखिर उन्हीं की है। वैसे इस पूरे प्रकरण की ऐसी व्याख्या करने वालों की भी कमी नहीं है कि यह ड्रामा पिता-पुत्र के द्वारा ही ‘प्रायोजित’ था ताकि यह दिखाया जा सके कि जन्मना और कर्मणा मुलायम के असली वारिस अखिलेश हैं, न कि शिवपाल या कोई और।

बहरहाल, इस पूरे घटनाक्रम में अखिलेश के अलावा जो शख्स पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरा है, वह आजम खान हैं। पिता-पुत्र के ‘मिलन’ के सूत्रधार वही रहे। आजम खान और अमर सिंह के तल्ख रिश्तों की सच्चाई भी किसी से छिपी नहीं है। अखिलेश और रामगोपाल का निष्कासन वापस होने के बाद आजम खान ने कहा कि समाजवादी पार्टी पूरी तरह एक है। उन्होंने कहा कि पार्टी को मुलायम सिंह यादव ने बनाया है और वह पार्टी के ‘बागबां’ हैं। आजम ने कहा कि पार्टी में जो कुछ भी चल रहा था उससे सबसे ज्यादा फिक्रमंद मुस्लिम थे क्योंकि सपा के कमजोर होने का फायदा बीजेपी को मिलता।

सूत्रों के मुताबिक रामगोपाल यादव द्वारा 1 जनवरी को बुलाया गया पार्टी का आपातकालीन राष्ट्रीय अधिवेशन अब चुनावी सभा में तब्दील होगा। इसमें खुद मुलायम भी शामिल होंगे। अधिवेशन को मुलायम के अलावा अखिलेश और आजम खान संबोधित कर सकते हैं। उम्मीद है कि कल के दिन कई महत्वपूर्ण घोषणाएं हों जिनमें अखिलेश को मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित किया जाना शामिल है।

चलते-चलते

यूपी के इस हाई वोल्टेज ड्रामे में अपने लालूजी ने भी ‘किरदार’ निभा ही दिया। और वो भी बड़ा ‘सार्थक’। लालू ने एक ओर मुलायम को फोन कर उन्हें अखिलेश से बात करने की सलाह दी तो दूसरी ओर अखिलेश से बात कर उन्हें मुलायम से मिलने जाने को कहा। यूपी से बाहर के एकमात्र वही रहे जिन्होंने इस पूरे मामले को लेकर न केवल अपना ‘कंसर्न’ दिखाया बल्कि सच्चे अर्थों में उस परिवार और पार्टी का ‘शुभचिंतक’ होने का परिचय भी दिया।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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तो क्या अलग हो जाएंगे अखिलेश!

देश की राजनीति की दिशा तय करने की ताकत रखने वाले राज्य उत्तर प्रदेश में सत्ताधारी समाजवादी पार्टी टूट की कगार पर खड़ी दिख रही है। अगर एक दम से कोई चमत्कार हो और मुलायम-अखिलेश ‘समझदारी’ दिखाते हुए किसी ‘सार्थक’ निष्कर्ष पर पहुँच जाएं तो बात अलग है, वरना समाजवादी कुनबे का बिखरना तय लग रहा है। जी हाँ, अपने वफादारों की टिकट कटने से नाराज अखिलेश ने 235 उम्मीदवारों की अपनी अलग सूची जारी कर दी है। सूत्रों के मुताबिक ये उम्मीदवार बतौर निर्दलीय अलग-अलग चुनाव-चिह्नों पर चुनाव मैदान में उतर सकते हैं। हालांकि अब देर हो चुकी है, फिर भी कयास इस बात के भी लगाए जा रहे हैं कि अखिलेश अपनी अलग पार्टी बनाकर नया चुनाव-चिह्न लेने की कोशिश भी कर सकते हैं।

बहरहाल, बता दें कि उत्तर प्रदेश में कुल 403 विधानसभा सीटें हैं जिनमें से 325 सीटों के लिए बुधवार को सपा उम्मीदवारों की सूची जारी हुई। सूची स्वयं सपा सुप्रीमो मुलायम सिंह यादव ने जारी की। और अब एक दिन बाद अखिलेश यादव ने ‘अपनी’ सूची जारी कर दी। अभी कुछ ही दिन बीते हैं जब पार्टी दो-फाड़ होते-होते बची थी, लेकिन कुछ समय के ‘संघर्षविराम’ के बाद परिवार की लड़ाई फिर सतह पर आ गई है। एक ओर अखिलेश और उनके समर्थक नेता हैं तो दूसरी ओर उनके चाचा शिवपाल यादव। अखिलेश के साथ रामगोपाल यादव खड़े हैं तो शिवपाल के सिर पर पार्टी और परिवार के मुखिया मुलायम का हाथ है।

गौरतलब है कि 325 उम्मीदवारों की सूची जारी होने के एक दिन बाद अखिलेश ने पिता मुलायम से मुलाकात की और उम्मीदवारों के चयन पर अपनी नाराजगी जताई। अखिलेश की शिकायत थी कि उन्हें दरकिनार कर ये सूची जारी की गई है। अखिलेश को जिन नामों पर ऐतराज था उन्हें भी टिकट दिए गए। यहाँ तक कि उनके कई करीबियों के पत्ते भी साफ हो गए, जबकि दूसरी ओर शिवपाल की इस सूची में ‘जरूरत से ज्यादा’ चली।

गुरुवार सुबह से ही मुलायम, अखिलेश और शिवपाल के घरों के आगे नेताओं और कार्यकर्ताओं की भीड़ उमड़नी शुरू हो गई थी। अखिलेश ने अपने वफादार मंत्रियों और विधायकों से मुलाकात और मंत्रणा की। इस दौरान उनके विश्वासपात्रों ने शिवपाल यादव, अमर सिंह, बेनी प्रसाद वर्मा आदि पर भड़ास निकाली और साथ ही उन्हें उनका ‘बल’ भी याद दिलाया। उन्होंने अखिलेश को भरोसा दिलाया कि वे उनके साथ हैं और वे चाहें तो बड़ा कदम उठा सकते हैं। उधर गठबंधन को लेकर मुलायम से जवाब पा चुकी कांग्रेस तो इस फिराक में है ही कि अखिलेश अलग चुनाव लड़ें और कांग्रेस उनके साथ चुनाव की ‘वैतरणी’ पार कर ले।

बहरहाल, अगले एक-दो दिन में समाजवादी पार्टी के ‘भाग्य’ का फैसला हो जाएगा। भले ही मुलायम के दीर्घ राजनीतिक जीवन में परीक्षा की ऐसी घड़ी कभी न आई हो, पर विपरीत परिस्थितियों को साधने के उनके ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए आश्चर्य नहीं होना चाहिए अगर वे कोई बीच का रास्ता निकाल लें और चुनाव में सपा की चुनौती बरकरार रहे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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2016 की दर्दनाक विदाई, कानपुर में फिर ट्रेन हादसा

अजमेर-सियालदह एक्सप्रेस की 15 बोगियां आज सुबह 5.16 पर पटरी से उतर गई। हादसा कानपुर देहात के रूरा स्टेशन पर हुआ। हादसों के कारणों का अभी पता नहीं लग पाया है। गौरतलब है कि पिछले ही महीने इंदौर से रवाना हुई इंदौर-पटना एक्सप्रेस की 14 बोगियां कानपुर के पास ही पुखरायां में पटरी से उतर गई थी। इस हादसे में 150 से अधिक लोगों की मौत हुई थी। यही वजह है कि सोशल मीडिया पर आज ये सवाल वायरल हो रहा है कि आखिर कानपुर के पास ही हादसे क्यों हो रहे हैं? दूसरा सवाल जो जेहन में कौंधता है, वो ये कि क्या हमारे राजनेताओं को बुलेट ट्रेन की बात करने से पहले सैकड़ों निरीह यात्रियों की बलि लेने वाली इन पटरियों की मरम्मत नहीं करवानी चाहिए?
बहरहाल, बता दें कि कानपुर देहात का रूरा स्टेशन, जहाँ यह हादसा हुआ, कानपुर से करीब 70 किलोमीटर की दूरी पर है और यह हादसा रूरा स्टेशन के होम स्टार्टर के नजदीक खंभा नंबर 1061/22 के पास हुआ। अभी तक मिली जानकारी के मुताबिक ट्रेन की 13 बोगियां पटरी से उतर गईं, जबकि दो बोगियां नहर में गिर गईं। स्लीपर कोच नंबर 98222 नहर में गिरी है, जबकि स्लीपर कोच नंबर 11246 नहर में लटकी हुई है। इन बोगियों को निकालने की कोशिश जारी है। हादसे के शिकार हुए ज्यादातर डब्बे स्लीपर बोगी के हैं। अभी तक 70 लोगों के घायल होने और 2 यात्रियों के मरने की पुष्टि हुई है। हालांकि सच यह है कि इस हादसे के बाद कुछ बोगियों के परखच्चे जिस तरह उड़े हैं उन्हें देखकर घायलों व मृतकों की वास्तविक संख्या का अभी अंदाजा लगाना भी मुश्किल है।
गौरतलब है कि इंदौर-पटना एक्सप्रेस हादसे के समय ही रेलवे की एक रिपोर्ट में बताया गया था कि इस रूट की रेल ट्रैक कई जगह अनफिट है। साथ ही इन जगहों पर अधिकतम स्पीड 30 किलोमीटर प्रति घंटा रखने की सलाह दी गई थी। नवंबर में हुए हादसे के बाद इस पूरे रूट की अच्छी तरह जांच की गई थी। इसके बावजूद महज एक महीने बाद यह हादसा किन कारणों से हुआ, इसका खुलासा तो जांच के बाद ही हो पाएगा। अगर जांच सही और निष्पक्ष हुई तो।
बहरहाल, पुलिस, प्रशासन, रेलवे के अधिकारी और स्थानीय लोग राहत और बचाव-कार्य में लगे हुए हैं। सभी घायलों को जिला अस्पताल भेजा गया है। कानपुर और टूंडला जाने के लिए बसों की व्यवस्था की गई है। कानपुर मेडिकल कॉलेज को हाई अलर्ट मोड में रखा गया है।
यह भी बता दें कि इस हादसे के बाद कानपुर के पास नई दिल्ली जाने वाली शताब्दी एक्सप्रेस (ट्रेन नंबर 12033) कैंसल कर दी गई है। कई ट्रेनों को डायवर्ट किया गया है। गोमती एक्सप्रेस को मुरादाबाद के रास्ते डायवर्ट किया गया है। कैफियत एक्सप्रेस (ट्रेन नंबर 12225) को भी मुरादाबाद के रास्ते डायवर्ट किया गया है।

चलते-चलते

आपकी सुविधा के लिए इस हादसे से जुड़ी कोई भी जानकारी पाने के लिए रेलवे द्वारा जारी किए गए हेल्पलाइन नंबर इस प्रकार हैं: कानपुर – 0512-2323015, 2323016, 2323018, इलाहाबाद – 0532-2408149, 2408128, 2407353, टूंडला – 05612-220337, 220338, 220339 और अलीगढ़ – 0571-2404056, 2404055.

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू ने कहा, सजा के लिए मनपसंद चौराहा चुन लें प्रधानमंत्री

नोटबंदी को लेकर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने एक बार फिर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर तीखा हमला बोला। सोमवार को उन्होंने प्रधानमंत्री से सीधा सवाल किया कि उन्हें किस चौराहे पर सजा दी जाए? वे अपना मनपसंद चौराहा चुन लें, जहाँ जनता उन्हें सजा देगी। दरअसल, नोटबंदी के बाद 13 नवंबर को गोवा में एक कार्यक्रम के दौरान प्रधानमंत्री ने कहा था कि 50 दिनों में स्थिति नहीं सुधरी तो उन्हें चौराहे पर जो सजा दी जाएगी, वह उसे स्वीकार करेंगे। बता दें कि नोटबंदी के विरोध मे आरजेडी ने 28 दिसंबर को राज्य के सभी जिला मुख्यालयों में महाधरना देने की घोषणा भी की है।
सोमवार को लालू राजधानी पटना के सर्कुलर रोड स्थित अपने आवास पर प्रेस कांफ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। उन्होंने कहा कि नोटबंदी के बाद आजतक हालात नहीं सुधरे हैं। काम छिन जाने के कारण लाखों मजदूर शहर छोड़कर गांव लौटने को विवश हो रहे हैं। हजारों कंपनियां वेतन देने में असमर्थ हैं क्योंकि उनके पास पर्याप्त नकद नहीं है। उन्होंने नोटबंदी पर अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका फोर्ब्स के उस आकलन का हवाला भी दिया जिसमें कहा गया है कि भारत सरकार ने एक अप्रत्याशित कदम उठाया जिससे न सिर्फ अर्थव्यवस्था की क्षति हुई, बल्कि हाशिये पर खड़े करोड़ों गरीब लोगों को संकट में डाला गया।
इस दौरान लालू ने शिवसेना के उस बयान का भी समर्थन किया जिसमें उसने भाजपा को नसीहत देते हुए कहा है कि उत्तर प्रदेश चुनाव को लेकर वह मदमस्त हाथी नहीं बने। उत्तर प्रदेश का इतिहास रहा है कि जब-जब सत्ताधारी मस्ती में आए हैं, जनता ने तब-तब उन्हें सत्ता से उतार फेंका है। लालू ने कहा कि शिवसेना ठीक कह रही है। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनावों में सपा फिर विजयी होगी और भाजपा प्रदेश में कहीं नहीं दिखेगी।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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