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लगातार चौथे टेस्ट सीरीज में दोहरे शतक का ‘विराट’ कारनामा

दिन-ब-दिन और विराट होते जा रहे भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने शुक्रवार को इतिहास रच दिया। उन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ हैदराबाद में खेले जा रहे टेस्ट मैच के दूसरे दिन दोहरा शतक जड़कर वो कारनामा कर दिखाया जो क्रिकेट इतिहास में अब तक कोई नहीं कर पाया था। जी हाँ, कोहली अब दुनिया के अकेले ऐसे बल्लेबाज हैं जिसने लगातार चार टेस्ट सीरीज में दोहरे शतक बनाए हों। अपनी इस ऐतिहासिक पारी में कोहली ने 204 रन ठोके और और उनकी इस पारी की बदौलत भारत ने मात्र छह विकेट पर 687 रनों का पहाड़ खड़ा कर दिया। गौरतलब है कि टेस्ट क्रिकेट में भारत का यह पांचवां सर्वोच्च स्कोर है और इस स्कोर के साथ भारतीय टीम लगातार तीन पारियों में 600 से ज्यादा रन बनाने वाली दुनिया की इकलौती टीम बन गई है।

फिलहाल बात विराट कोहली के डबल सेंचुरी के अद्भुत ‘चौके’ की। शुक्रवार को बांगलादेश के खिलाफ खेले जा रहे एकमात्र टेस्ट के दूसरे दिन कोहली ने अपने ओवरनाइट स्कोर 111 से आगे खेलना शुरू किया और लंच के बाद अपना चौथा शतक पूरा किया। इस दौरान क्रिकेट के इस 28 वर्षीय ‘करिश्मे’ ने कई रिकॉर्ड अपने नाम किए। 204 रनों के साथ ही कोहली होम सीजन में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज भी बन गए। ऐसा करते हुए उन्होंने वीरेन्द्र सहवाग का रिकॉर्ड तोड़ा।

बहरहाल, कोहली का यह दोहरा शतक क्या मायने रखता है इसका अंदाजा हम इसी से लगा सकते हैं कि अपनी इस उपलब्धि के साथ उन्होंने सर डॉन ब्रैडमैन और राहुल द्रविड़ का रिकॉर्ड तोड़ दिया जिन्होंने लगातार तीन टेस्ट सीरीज में तीन दोहरे शतक लगाए थे।

याद दिला दें कि कोहली ने अपना पहला दोहरा शतक वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले टेस्ट में बनाया था। इस मैच में उन्होंने 200 रन बनाए थे। इसके बाद न्यूजीलैंड के खिलाफ इंदौर में उन्होंने 211 रन बनाए। उनका तीसरा दोहरा शतक (235 रन) इंग्लैंड के खिलाफ था और अब बांग्लादेश के खिलाफ 204 रनों की ये यादगार पारी।

टेस्ट क्रिकेट में चार दोहरे शतक के साथ कोहली ने सुनील गावस्कर की चार डबल सेंचुरी की बराबरी भी कर ली। वैसे भारत की ओर से सचिन और सहवाग ने सर्वाधिक 6-6 दोहरे शतक बनाए हैं, जबकि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे ज्यादा 12 दोहरे शतक डॉन ब्रैडमैन के नाम हैं। पर महज 28 साल के कोहली के रनों का जैसा तूफानी सिलसिला चल रहा है, कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर ये धाकड़ बल्लेबाज सर डॉन ब्रैडमैन के दोहरे शतकों का रिकॉर्ड भी तोड़ दे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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‘अम्मा’ की पार्टी ही नहीं, अब सरकार भी संभालेंगी ‘चिनम्मा’

पिछले कुछ दिनों से तमिलनाडु सरकार में नेतृत्व परिवर्तन के संकेत मिल रहे थे। अनुमान जताया जा रहा था कि जल्द ही मौजूदा मुख्यमंत्री पन्नीरसेल्वम को हटाकर ‘चिनम्मा’ शशिकला नटराजन उनकी जगह मुख्यमंत्री बनेंगी। इस परिवर्तन से जुड़ी अटकलें रविवार को सच साबित हुईं। पार्टी विधायकों की रविवार को हुई अहम बैठक में शशिकला को विधायक दल की नेता चुन लिया गया और मुख्यमंत्री के पद पर उनकी ताजपोशी का रास्ता साफ करते हुए पन्नीरसेल्वम ने राज्यपाल को मुख्यमंत्री पद से अपना इस्तीफा सौंप दिया। हालांकि उनके इस्तीफे के बाद एक बार फिर विधायक दल की बैठक होगी, जिसमें शशिकला को मुख्यमंत्री घोषित करने की औपचारिकता पूरी की जाएगी।

बहरहाल, इस घटनाक्रम के बाद शशिकला ने कहा कि अम्मा (जयललिता) के निधन के बाद ‘भाई’ पन्नीरसेल्वम ने ही मुझसे महासचिव का पद लेने को कहा और अब उन्होंने ही मुझसे सीएम बनने के लिए भी कहा। उन्होंने पन्नीरसेल्वम की जमकर तारीफ की और कहा कि जब भी पार्टी ने किसी मुश्किल हालात का सामना किया या अम्मा को दिक्कत हुई तो हमारे प्रिय भाई पन्नीरसेल्वम ही विश्वसनीय रहे।

बता दें कि शशिकला के पार्टी और सरकार का सर्वेसर्वा बनने का कई जगहों पर विरोध भी हो रहा है। साथ ही, उनके खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में आय से अधिक संपत्ति का मामला भी चल रहा है। लेकिन इससे फिलहाल शशिकला के बढ़ते आभामंडल पर कोई असर होगा, ऐसा फिलहाल तो नहीं लगता क्योंकि इससे इनकार नहीं किया सकता कि छिटपुट विरोध के बावजूद एआईएडीएमके के आम कार्यकर्ता उनमें ‘अम्मा’ जयललिता की छवि देखने लगे हैं।

चलते-चलते बता दें कि 62 वर्षीया शशिकला अगले एक से दो दिनों में मुख्यमंत्री पद की शपय़ लेंगी और वे जानकी रामचंद्रन और जयललिता के बाद तमिलनाडु की तीसरी महिला मुख्यमंत्री होंगी।

 

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बिहार का कसूर बताएं, जेटलीजी!

2017-18 के केन्द्रीय बजट में आश्चर्यजनक ढंग से बिहार की अनदेखी हुई है। इस बार भी बिहार का हाथ खाली का खाली रह गया। क्या ये बिहार विधानसभा चुनाव में मनोनुकूल परिणाम न मिलने की सजा है? अगर नहीं, तो जेटलीजी बिहार का कसूर बताएं। वे बताएं कि इस बार के बजट में अगर झारखंड और गुजरात में एम्स दिया जा सकता है, तो फिर बिहार की उपेक्षा का क्या आधार है? क्या ये महज संयोग है कि इन दो राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं और बिहार में नहीं?

कम-से-कम वित्तमंत्री अपने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वादे की लाज ही रख लेते, जिन्होंने अपनी चुनावी सभाओं में बिहार को विशेष पैकेज और विशेष दर्जा देने की बात कही थी। मगर, दूसरी बार भी बिहारवासियों के हिस्से में निराशा ही क्यों? क्या बिहार को महाराष्ट्र, गुजरात जैसे विकसित राज्य के समकक्ष लाने के लिए केन्द्रीय बजट में यहाँ के लिए अतिरिक्त राशि का प्रावधान जरूरी नहीं?

सड़क, पुल और परिवहन के मामले में भी बिहार की उपेक्षा हुई है। बजट में राज्य के लिए इस क्षेत्र में कोई नई योजना नहीं दिखी। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा घोषित सवा लाख करोड़ पैकेज में पहले से चल रही जिन योजानाओं की चर्चा थी, उनकी भी गति तेज करने का कोई प्रयास नहीं दिखा।

किसी से छिपा नहीं है कि बिहार को हर साल नेपाल से आने वाली नदियों से भारी तबाही झेलनी पड़ती है और साथ ही सूखे का प्रकोप भी झेलना पड़ता है। फिर भी इस बजट में नदियों को जोड़ने की परियोजना, गाद प्रबंधन नीति और फरक्का बराज से पैदा हुए संकट से उबरने के उपाय नहीं किए गए।

और तो और, इस बजट में बिहार को बीआरजीएफ (Backward Regions Grant Fund) मद की बकाया राशि केन्द्र से मिलने की उम्मीद थी, मगर वो भी नहीं मिली। क्या ये बिहार के साथ भेदभाव नही? आश्चर्य तो ये है कि प्रधानमंत्री तो प्रधानमंत्री, केन्द्र में बैठे बिहार के आधा दर्जन मंत्री भी इस मसले पर चुप हैं।

ये तो हुई बिहार की बात। वैसे भी इस बजट में आर्थिक सुधार के लिए कोई रणनीतिक तैयारी की झलक नहीं मिलती है, जबकि यह निजी निवेश में बढ़ोतरी की अनिवार्य शर्त है। सार्वजनिक निवेश में बढ़ोतरी के लिए भी खास नीति का जिक्र नहीं है। जो भी इन्सेंटिव दिया गया है, वह कुछ मायनों में हाउसिंग सेक्टर के लिए है। पर क्या देश का विकास सिर्फ इसी से हो जाएगा?

विकास के दो मुख्य आधार हैं – कृषि और उद्योग। लेकिन न तो कृषि को बढ़ावा देने की रणनीति पर कोई काम हुआ है, न ही उद्योग के नए क्षेत्रों के विकास पर बजट में कुछ खास कहा गया है। बजट में वैश्विक आधारभूत आय का जिक्र नहीं है, जबकि आर्थिक सर्वेक्षण में इसका उल्लेख है। आमतौर पर बजट और आर्थिक सर्वेक्षण में तालमेल रहता है, मगर इस बार इसका ख्याल नहीं रखा गया है। क्या वित्तमंत्री इस पर रोशनी डालने की जहमत उठाएंगे?

अंत में माननीय वित्तमंत्री से एक सवाल और। उन्होंने अपने दो घंटे से भी ज्यादा लंबे भाषण में ये क्यों नहीं बताया कि नोटबंदी के क्या-क्या फायदे हुए? उन्होंने इससे भविष्य में बेहतर परिणाम की बात तो कही, लेकिन नोटबंदी से जिनका रोजगार छिन गया उनकी क्षतिपूर्ति के लिए सरकार वर्तमान में क्या कर रही है, इस पर क्या उन्हें कुछ बोलना नहीं चाहिए?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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किसी में हिम्मत हो तो ‘उनके’ धर्मगुरु पर फिल्म बनाए : गिरिराज

अपने विवादास्पद बयानों के लिए चर्चा में रहने वाले भाजपा नेता एवं केन्द्र सरकार में मंत्री गिरिराज सिंह ने एक बार फिर गैरजिम्मेदाराना बयान दिया है। इस बार उनका बयान फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर आया है। गिरिराज का कहना है कि फिल्म में रानी पद्मावती को इस तरह दिखाने का मूल कारण यही है कि वो हिन्दू थीं। पद्मावती अगर हिन्दू नहीं होतीं तो शायद ही कोई इस तरह की हिम्मत दिखा पाता।

गौरतलब है कि 27 जनवरी को जयपुर के जयगढ़ किले में फिल्म ‘पद्मावती’ की शूटिंग के दौरान राजपूत संगठन करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने अचानक हमला बोल दिया था। उन्होंने सेट पर जमकर तोड़-फोड़ की, यूनिट के लोगों को मारा-पीटा और अभद्रता की पराकाष्ठा ये कि हिन्दी सिनेमा को कई यादगार फिल्में देने वाले इस फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली को थप्पड़ मारने से भी वे नहीं झिझके। उनका आरोप था कि इस फिल्म के लिए अलाउद्दीन खिलजी (रणवीर सिंह) और रानी पद्मावती (दीपिका पादुकोण) के बीच कथित तौर पर ‘लव सीन’ फिल्माया जा रहा था, जिस पर उन्हें सख्त आपत्ति थी। हालांकि भंसाली फिल्म ऐसे किसी आपत्तिजनक प्रसंग से इनकार कर चुके हैं।

बहरहाल, करणी सेना को इस घटना से पूर्व राजस्थान से बाहर के लोग शायद ही जानते हों। इस तरह के कई संगठन विभिन्न राज्यों में हैं जो संकीर्ण विचारधारा से प्रेरित होते हैं और ‘तात्कालिक लाभ’ के लिए इस तरह के कार्य करते हैं। लेकिन केन्द्रीय कैबिनेट में बैठे किसी मंत्री से ऐसे बयान की आशा नहीं की जा सकती थी। हद तो तब हो गई, जब उन्होंने उक्त घटना का समर्थन तक कर दिया। बकौल गिरिराज, ‘जनता ने भारतीय इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने वालों को सजा’ दी है। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि रानी पद्मावती ने अपने आपको मिटा दिया लेकिन मुगलों के आगे धुटना नहीं टेका, लेकिन इस देश में औरंगजेब और टीपू सुल्तान को आदर्श मानने वाले लोग इतिहास के साथ लगातार खिलवाड़ कर रहे हैं।

गिरिराज इतने पर भी रुक जाते तो एक बात थी। पर वे तो अपनी आदत (या राजनीति) से लाचार ठहरे। आगे उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि हिन्दू देवी-देवताओं पर कोई भी फिल्म बना देता है। फिर एक खास समुदाय की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि किसी में हिम्मत हो तो उनके धर्मगुरु पर कोई फिल्म बनाकर दिखाए। क्या गांधी के इस देश में नेताओं का काम बस ‘आग’ में ‘घी’ डालना रह गया है?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अबु धाबी के शहजादे ने कहा भारत जैसा कोई नहीं

गणतंत्र दिवस के मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में भारत आए अबु धाबी के शहजादे शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान भारत के मुरीद हो गए। गणतंत्र दिवस परेड की भव्यता, भारत का समृद्ध अतीत और वर्तमान की उपलब्धियां, भारत की मेहमाननवाजी और भारतीय संस्कारों में बसे हमारे मूल्य – अल नाहयान कहने को बाध्य हो गए कि भारत जैसा कोई नहीं। गौरतलब है कि अल नाहयान राजपथ पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अन्य गणमान्य हस्तियों के साथ मुख्य परेड के गवाह बने थे। उन्होंने गणतंत्र दिवस समारोह को ‘विविधता में एकता का जश्न’ की संज्ञा दी और कहा कि भारत ने इसके माध्यम से दुनिया को मानवता का संदेश दिया है।

अबु धाबी के शहजादे ने अपने औपचारिक ट्विटर अकाउंट एमबीज़ेड न्यूज पर कहा है कि मैं भारतीय लोगों के साथ गणतंत्र दिवस समारोह में शरीक होकर बहुत खुश हूँ और सम्मानित महसूस कर रहा हूँ। उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस समारोह में यूएई की भागीदारी हमारे रिश्तों की गहराई को दर्शाती है जो आपसी सम्मान और समान हितों पर आधारित है। बता दें कि भारत के इस 68वें गणतंत्र दिवस परेड के मौके पर यूएई सेना की टुकड़ी ने भी अपने देश के ध्वज के साथ हिस्सा लिया जिसमें उनका संगीत बैंड शामिल था। इस टुकड़ी में कुल 149 जवान थे जिनमें 35 संगीतकार हैं।

बता दें कि अबु धाबी के शहजादे अल नाहयान दुनिया के उन गिने-चुने नेताओं में शामिल हो गए हैं जिन्हें भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि का दर्जा दिया गया है। पिछले साल गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद थे, जबकि साल 2015 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा मुख्य अतिथि थे। इसी तरह साल 2014 में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे और 2013 में भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक मुख्य अतिथि थे। भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होने वाले नेताओं में निकोलस सरकोजी, ब्लादीमिर पुतिन, नेल्सन मंडेला, जॉन मेजर, मोहम्मद खातमी, याक शिराक आदि प्रमुख रहे हैं।

इस साल गणतंत्र दिवस का एक बड़ा आकर्षण यह भी रहा कि इस अवसर पर दुनिया की सबसे ऊँची इमारत बुर्ज खलीफा को एलईडी प्रकाश के माध्यम से तिरंगे के रंग से रंगा गया। भारत-यूएई के प्रगाढ़ संबंधों के साथ-साथ इसे विश्व-मंच पर भारत के बढ़ते कद की स्वीकृति कहना भी अनुचित नहीं होगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू ने कहा, आरक्षण खत्म करना चाहती है भाजपा

आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने मंगलवार को पटना में कहा कि एमएस गोलवलकर के सिद्धांतों पर चलने वाली भाजपा आरक्षण खत्म करना चाहती है। आरजेडी के प्रदेश कार्यालय में आयोजित बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जननायक कर्पूरी ठाकुर के जयंती समारोह में लालू ने कहा कि आरजेडी वंचितों और पिछड़ों के अधिकार के लिए संघर्ष करती रहेगी।

गौरतलब है कि लालू समारोह में गोलवलकर की एक किताब लेकर पहुंचे थे। किताब दिखाते हुए उन्होंने कहा कि ‘भाजपा और राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के लोग गोलवलकर के सिद्धांतों पर चलते हैं, गोलवलकर आरक्षण विरोधी थे, ये लोग भी आरक्षण विरोधी हैं। वोट पाने के लालच में आरक्षण समर्थक बन जाते हैं और जीतने पर फिर आरक्षण विरोधी हो जाते हैं।‘

उन्होंने कहा कि आरएसएस के लोग पहले तो अपने दिल में जो है, सो बोल देते हैं और जब भाजपा कहती है कि इससे वोट का नुकसान होगा, तब बात बदलने लगते हैं। ऐसी सांप्रदायिक शक्तियों के इरादे को कभी पूरा नहीं होने दिया जाएगा। लालू ने कहा कि सांप्रदायिक शक्तियों को बिहार ने तो सबक सिखा ही दिया, अब उन्हें उत्तर प्रदेश के चुनाव में भी धूल चटानी है।

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नीतीश भी लालू की राह पर, जेडीयू नहीं लड़ेगी यूपी का चुनाव

कल तक यूपी में चुनावी जमीन तलाश रही जेडीयू ने अचानक यू-टर्न लिया है। पहले वहाँ ‘महागठबंधन’, फिर ‘गठबंधन’ की तमाम कोशिशों के नाकाम रहने के बाद पार्टी ने मौजूदा विधानसभा चुनाव से दूर रहने का फैसला किया है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में पटना में सोमवार को हुई पार्टी नेताओं की बैठक में तय किया गया कि जेडीयू यूपी में सेक्युलर वोटों का बिखराव नहीं करेगी और सेक्युलर ताकतों की जीत के लिए अपील करेगी।

जेडीयू के यूपी चुनाव में ताल ठोकने की दो बड़ी वजहें थीं – पहली, बिहार में महागठबंधन के प्रयोग को मिली बड़ी सफलता और दूसरी, यहाँ लागू की गई शराबबंदी को मिला राष्ट्रव्यापी समर्थन। जेडीयू को लगा कि यूपी में हाथ आजमाने का ये सही वक्त है। लेकिन सारी जद्दोजहद के बावजूद पार्टी वहाँ के समीकरण में खुद को फिट नहीं कर पाई। जो भी हो, जेडीयू ने देर से सही लेकिन दुरुस्त निर्णय लिया है। वैसे भी जेडीयू की कमोबेश वहाँ वैसी ही स्थिति रहती जैसी समाजवादी पार्टी की बिहार में रही है या रह सकती है। ऐसे में चुनाव से दूर रहकर नीतीश ने अपनी साख को बट्टा लगने से तो बचा ही लिया, साथ ही सपा-कांग्रेस की जीत की स्थिति में सेक्युलर वोटों के नहीं बिखरने का श्रेय भी लेंगे वो अलग।

हालांकि सच यह है कि पार्टी ने किसी ‘चमत्कार’ की प्रतीक्षा अंतिम क्षण तक की। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव, प्रधान महासचिव केसी त्यागी, नीतीश के करीबी आरसीपी सिंह और रणनीतिकार प्रशांत किशोर की मदद से कोशिश की गई कि सपा-कांग्रेस गठबंधन में अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के शामिल होने की स्थिति में जेडीयू को भी कुछ सीटें मिल जाएं, लेकिन जब इस गठबंधन में यूपी के कुछ हिस्सों में अस्तित्व रखने वाली रालोद की जगह ही नहीं बन पाई तो फिर जेडीयू की बात ही क्या थी।

बहरहाल, नीतीश और उनकी पार्टी ने सूझ-बूझ वाला निर्णय लिया है। राजनीति के जानकार बताते हैं कि इस निर्णय के पीछे आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के यूपी चुनाव को लेकर लिए गए स्टैंड की भूमिका भी है। लालू ने पहले ही अपनी स्थिति भांप कर राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया था और चुनाव न लड़ने व सपा को साथ देने की बात की थी। अब जेडीयू भी कमोबेश उन्हीं के नक्शेकदम पर है। अच्छी बात है कि यूपी चुनाव के कारण बिहार के जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन में जो दूरी-सी आ गई थी, वो अब नहीं रहेगी। बिहार की राजनीतिक स्थिरता के लिए जहाँ ये अच्छा संकेत है, वहीं भाजपा इससे निराश हुई होगी – यूपी और बिहार दोनों के मद्देनज़र।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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विश्व-इतिहास की सबसे लंबी मानव-श्रृंखला..! बधाई बिहार..!!

आपने नशे में झूमना तो सुना होगा, लेकिन लोग नशे कि विरोध में झूमें ऐसा केवल बिहार में हो सकता है। जी हाँ, लोग झूमे और सैकड़ों, हजारों, लाखों में नहीं, करोड़ों की संख्या में झूमे… एक साथ झूमे… एक-दूसरे का हाथ पकड़कर झूमे… और ऐसा झूमे कि पूरे तीन करोड़ लोगों की 11, 292 किलोमीटर लंबी श्रृंखला बन गई। जी हाँ, ये विश्व की सबसे लंबी मानव-श्रृंखला है। अद्भुत, अभूतपूर्व, वर्णनातीत।

बिहार ने सचमुच इतिहास रच दिया। यह विश्व का अकेला ऐसा राज्य बन गया जिसने नशे को न कहने के लिए विश्व की सबसे लंबी मानव-श्रृंखला की परिकल्पना की और उसे अमलीजामा पहना दिया। इससे पहले 2004 में बांग्लादेश में प्रतिपक्ष ने सरकार के खिलाफ 1050 किमी मानव-श्रृंखला बनाई थी। देखा जाय तो तीन करोड़ लोगों का एक मकसद से एक दिन और एक समय एकजुट होना लगभग असंभव-सी बात थी, जिसे बिहार ने संभव कर दिखाया और शराबबंदी का ऐसा संदेश दिया जिसे पूरी दुनिया ने आश्चर्यचकित होकर देखा और सराहा।

Human Chain_2
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दिन में 12.15 से 1 बजे के बीच आयोजित इस ऐतिहासिक मानव-श्रृंखला की तस्वीर लेने के लिए तीन उपग्रहों तथा 40 ड्रोनों का इस्तेमाल किया गया। तीन उपग्रहों में एक विदेशी तथा दो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के थे। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार के चार हेलीकॉप्टरों से भी एरियल फोटोग्राफी और विडियोग्राफी की गई। इस श्रृंखला को विश्व रिकॉर्ड में शामिल करने के लिए लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के लोग भी पटना में मौजूद रहे।

Human Chain_3
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वैसे तो इस मानव-श्रृंखला का आयोजन बिहार सरकार ने किया लेकिन दलगत राजनीति से ऊपर उठकर तमाम दलों ने इसमें जिस तरह बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया वह काबिलेतारीफ है। इसको लेकर जितने उत्साह में जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता थे उतने ही भाजपा, लोजपा, रालोसपा समेत अन्य पार्टियों के लोग भी। विभिन्न राजनीतिक दलों के अधिकांश सांसद, विधायक एवं विधानपार्षद इस मौके के गवाह बने। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी ने पटना के गांधी मैदान में इस अभियान में हिस्सा लिया।

सरकारी कर्मचारी हों या स्कूली छात्र-छात्रा, विशिष्ट जन हों या आम नागरिक, स्त्री हों या पुरुष, बच्चे हों या बूढ़े सबके चेहरे पर अद्भुत उत्साह, सभी गर्व से ओतप्रोत। सभी जानते थे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आह्वान पर वे सभी इतिहास रचने को निकले हैं। अपने मुख्यमंत्री के संकल्प को जिस तरह पूरे राज्य की जनता ने साकार किया वो पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गया।

विश्व-इतिहास के इस महानतम आयोजन के लिए ‘मधेपुरा अबतक’ विकासपुरुष नीतीश कुमार, बिहार की महान जनता और राज्य के मुस्तैद प्रशासन को बधाई और साधुवाद देता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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चलो अपने दर्द को मकसद दें युवराज की तरह!

कटक के बाराबती स्टेडियम में भारत ने इंग्लैंड को तीन मैचों के वनडे सीरीज के दूसरे मैच में 15 रन से हराकर सीरीज अपने नाम कर लिया। इस बेहद खास जीत में सबसे अहम भूमिका निभाई वनडे टीम में तीन साल बाद वापसी कर रहे युवराज सिंह ने। मात्र 25 रन पर तीन विकेट खोकर दबाव में थी टीम इंडिया, तब युवराज ने पूर्व कप्तान महेन्द्र सिंह घोनी के साथ 256 रनों की यादगार साझेदारी की और कभी हार न मानने वाले अपने जज्बे से एक बार फिर करोड़ों दिलों को जीत लिया। बड़ी बात यह कि इस जांबाज खिलाड़ी ने अपने जुझारूपन से जिस तरह टीम इंडिया के हाथों से फिसलते कई मैचों को उसकी झोली में डाला है वैसे ही अपनी ज़िन्दगी का जंग भी जीता है, कैंसर जैसी बीमारी से लड़कर और जीत हासिल कर।

गुरुवार को खेले गए इस मैच में अपने वनडे करियर का 14वां शतक पूरा कर मैदान पर भावुक हो गए थे युवराज। उन्होंने भरी हुई आँखों से आसमान को देखा और भगवान का शुक्रिया अदा किया। इसके बाद बल्ला उठाकर दर्शकों और पैवेलियन में बैठे साथी खिलाड़ियों का अभिवादन किया। कहने की जरूरत नहीं कि उनके सम्मान में पूरी टीम खड़ी थी उस वक्त। यह सेंचुरी इसलिए भी खास थी कि उन्होंने 6 साल बाद यह शतक लगाया था। पर वे इतने पर नहीं रुके। इसके बाद उन्होंने इस पारी को अपने वनडे करियर के सबसे बड़े स्कोर में बदला और 150 रन कूट डाले, जिसमें 21 चौके और 3 छक्के शामिल थे।

याद दिला दें कि युवराज ने इससे पहले 2011 वर्ल्ड कप में सेंचुरी लगाई थी और इसके बाद वे कैंसर के शिकार हो गए। कैंसर से लड़ने के बाद मैदान पर वापसी कतई आसान नहीं थी। इलाज के बाद कमजोर हो चुके शरीर में वह स्टेमिना नहीं रह गई थी, जिसके लिए युवराज जाने जाते थे। पर उन्होंने हार नहीं मानी और न केवल टीम में वापसी की, बल्कि बता दिया कि उनमें काफी क्रिकेट बाकी है अभी और साथ ही बाकी है उनके ‘सर्वश्रेष्ठ’ का आना।

मैच के बाद भी लगातार भावुक दिखे युवराज। उन्होंने कहा भी कि वे जिस लड़ाई को लड़कर आए हैं, उसके बारे में सिर्फ उन्हें ही पता है। अपने उस दर्द को आज भी नहीं भूले युवराज। सच तो यह है कि इस दर्द ने उन्हें जीने का एक नया मकसद दे दिया है। आपको हैरत होगी कि अपनी तूफानी पारी के बाद जश्न मनाने के बदले उन्होंने कटक के ही एक होटल में कैंसर और ऑटिज्म पीड़ित बच्चों के साथ समय बिताया, उनका दर्द बांटा और अपनी खुशी साझा की। इससे पहले भी क्रिसमस के मौके पर उन्होंने मुंबई के परेल में सेंट जूड इंडिया चाइल्ड केयर सेंटर में कैंसर पीड़ित बच्चों के साथ समय बिताया था।

क्रिकेट के इस योद्धा ने अपने दर्द से जीने का नया मकसद पा लिया है। इसे जब और जिस तरह मौका मिलता है, कैंसर से लड़ने वालों को जीने का हौसला देना नहीं भूलता। औरों के दर्द को कम करना ही अब ‘जश्न’ है भारतीय क्रिकेट के ‘युवराज’ का। क्या हम सब अपने-अपने दर्द को कुछ ऐसा ही मकसद नहीं दे सकते? क्या हम भी ‘युवराज’ नहीं बन सकते?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘सलमान कोर्ट में आते हैं जेल में नहीं’

ट्विटर पर बॉलीवुड स्टार सलमान खान को लेकर ट्वीट्स की जैसे बौछार हो रही है। कोई कह रहा है ‘सलमान कोर्ट में आते हैं जेल में नहीं’ तो किसी का कहना है ‘जज घूमया थारे जैसा ना कोई!’ भाई ऐसे कमेंट तो आएंगे ही, बात ही ऐसी है। जोधपुर सेशंस कोर्ट ने बॉलीवुड के इस ‘सुल्तान’ को 18 साल पुराने आर्म्स ऐक्ट केस में बरी जो कर दिया है। जी हाँ, कोर्ट ने सलमान को ‘संदेह’ का फायदा देकर बरी किया है। हालांकि ये अलग बात है कि कोर्ट के इस फैसले के बाद दुख, क्रोध, खीझ और इन सबके कारण उपजे व्यंग्य से भरे ट्वीट की भी कमी नहीं है जिनमें ये कहा जा रहा है कि ‘हिरण खुद ही गोली के सामने आ गया होगा’ या फिर ‘बेचारे ने खुद को ही गोली मार ली होगी!’

बहरहाल, सलमान खान के खिलाफ आर्म्स ऐक्ट के तहत जोधपुर सेशंस कोर्ट में मामला चल रहा था और बुधवार सुबह 10.30 बजे फैसला सुनाने का वक्त मुकर्रर किया गया था। मगर सलमान करीब घंटाभर देरी से पहुँचे। फैसले के मुताबिक सलमान को संदेह का लाभ दिया गया है क्योंकि अभियोजन पक्ष के वकील मामला साबित नहीं कर सके। फैसले के दौरान सलमान की बहन अलवीरा उनके साथ थीं। फैसला सुनाने में जज को महज 5 मिनट लगे, जिसके तत्काल बाद सलमान कोर्ट से चले गए। उधर सरकारी वकील का कहना है कि फैसले के विश्लेषण के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

बता दें कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट दलपत सिंह राजपुरोहित ने सलमान को फैसला सुनाए जाने के दौरान अदालत में मौजूद रहने का निर्देश दिया था। इस मामले में अंतिम दलीलों पर सुनवाई पिछले साल 9 दिसंबर को शुरू हुई थी। सलमान पर कांकणी गांव में दो काले हिरणों के कथित शिकार के दौरान कथित रूप से उन हथियारों का इस्तेमाल करने और रखने के सिलसिले में मामला दर्ज किया गया था जिनके लाइसेंस की अवधि समाप्त हो चुकी थी। मामला वन विभाग ने दर्ज कराया था।

गौरतलब है कि आर्म्स ऐक्ट का यह मामला जोधपुर में सलमान के खिलाफ दर्ज चार मामलों में एक है। बाकी तीन मामले चिंकारा और काले हिरणों के शिकार से जुड़े हुए हैं। दो मामलों में सलमान को हाईकोर्ट से बरी किया जा चुका है। अब आर्म्स ऐक्ट के मामले में फैसला आने के बाद शिकार से जुड़ा एक ही मामला उनके खिलाफ लंबित है। कानूनी जानकार मानते हैं कि उस मामले में भी सलमान को राहत मिलने की पूरी उम्मीद है क्योंकि बाकी सभी मामले अब खारिज हो चुके हैं। इससे पहले सलमान हिट एंड रन केस में भी बरी हो चुके हैं। लब्बोलुआब ये कि तुलसीदास जिस बात को सैकड़ों साल पहले समझ कर समझा गए, उसे हमें कम से कम अब तो समझ ही लेना चाहिए कि ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं।‘

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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