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बिहार के बाद ‘मिशन असम’ पर हैं नीतीश और उनके ‘चाणक्य’

बिहार में महागठबंधन की जीत में बड़ी भूमिका निभाने वाले नीतीश के चाणक्य प्रशांत किशोर ने अब असम का रुख किया है। नीतीश ने उन्हें बिहार की तरह असम में भी ‘महागठबंधन’ की सम्भावना तलाशने भेजा है। सूत्रों के मुताबिक प्रशांत किशोर पिछले सप्ताह असम में थे और उन्होंने असम की पार्टी एआईयूडीएफ के नेता बदरूद्दीन अजमल से बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की ‘लम्बी’ बातचीत कराई है।

2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को असम में बड़ी कामयाबी मिली थी। तब सबको चौंकाते हुए उसने वहाँ की 14 में से 7 लोकसभा सीटें जीत ली थीं। राज्य में भाजपा की बढ़ती ताकत को देख उसे रोकने लिए तमाम विरोधी दल एक होने की जरूरत महसूसने लगे थे पर किसी ‘सम्भावना’ को ठोस आकार नहीं मिल पा  रहा था। बिहार में जेडीयू-राजद-कांग्रेस महागठबंधन की सफलता से इस सम्भावना को आकार और गति देने का फार्मूला मिल गया और उस फार्मूले को जमीन पर उतारने के लिए प्रशांत किशोर जैसा रणनीतिकार भी। लिहाजा राजनीति की नब़्ज पहचानने वाले नीतीश ने अपने ‘चाणक्य’ को ‘मिशन असम’ पर भजने में जरा भी देर नहीं की।

बता दें कि जेडीयू असम में एआईयूडीएफ, असम गण परिषद और कांग्रेस के ‘महागठबंधन’ को आकार देने में लगी है। पार्टी के महासचिव केसी त्यागी का मानना है कि इन दलों के एक साथ आने पर भाजपा को रोकना बहुत आसान होगा।

असम में नीतीश की ‘चहलकदमी’ अप्रत्याशित नहीं है। उनके शपथग्रहण में देश भर के तमाम मोदीविरोधी दलों और दिग्गज नेताओं के जमावड़े ने स्पष्ट कर दिया था कि वो पाँचवीं बार बिहार की सत्ता पाकर ही रुकने वाले नहीं हैं। उनका अगला कदम मोदीविरोधी राजनीति की धुरी बन स्वयं को मोदी के विकल्प के तौर पर पेश करना होगा। असम से उन्होंने इसी की शुरुआत की है। पश्चिम बंगाल और यूपी पर भी उनकी निगाह बराबर बनी हुई है। ये देखना खासा दिलचस्प होगा कि आँकड़ों के लिहाज से केवल बिहार में राजनीतिक वज़ूद रखनेवाले एक दल का नेता क्या केवल अपनी ‘छवि’ की बदौलत मोदी के राष्ट्रीय कद और भाजपा के राष्ट्रीय नेटवर्क का मुकाबला कर पाएगा..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में बनी सरकार… तो मिल गया मोदी पर मुकदमे का अधिकार..?

बिहार में चुनाव खत्म हो चुके। महागठबंधन की सरकार भी बन चुकी। लेकिन विकास के नाम पर राजनीति अब भी जारी है। जुम्मा-जुम्मा आठ दिन बीते कि भाजपा को बिहार में ‘जंगलराज’ दिखने लगा और राजद विशेष पैकेज को मुद्दा बना प्रधानमंत्री को अदालत में घसीटने की तैयारी करने लगी। जी हाँ, राजद के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने बिहार के लिए घोषित सवा लाख करोड़ के विशेष पैकेज को नहीं देने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को अदालत में घसीटने की धमकी दी है।

पूर्व केन्द्रीय ग्रामीण विकास मंत्री ने कहा कि मोदी ने चुनाव के पहले ही बिहार को विशेष पैकेज देने की घोषणा की थी, जिसके मिलने की उम्मीद अभी तक नहीं दिख रही है। अब और इंतजार नहीं किया जा सकता। अब हिसाब होगा। ‘हिसाब’ करने के लिए राजद के इस दिग्गज नेता को ‘एकमात्र’ विकल्प अदालत का दिख रहा है और इसके लिए वो जल्द ही किसी अच्छे वकील से सलाह लेने वाले हैं।

प्रधानमंत्री पर बिहार की हकमारी और यहाँ की जनता के साथ धोखाधड़ी का आरोप लगाते हुए रघुवंश प्रसाद सिंह ने कहा कि उन्होंने बिहार को विशेष पैकेज देने का वादा करके उलटे कई केन्द्रीय योजनाओं की राशि में कटौती कर दी है। यह बिहार के साथ अन्याय है। खासकर प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना की राशि में कटौती कर नरेन्द्र मोदी सरकार ने पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के काम और विचारों की हत्या कर दी है।

रघुवंश प्रसाद सिंह ना केवल राजद बल्कि बिहार के चुनिंदा नेताओं में गिने जाते हैं। राज्य और केन्द्र में वो कई जिम्मेदार पदों पर रह चुके हैं। बिहार के लिए उनकी चिन्ता स्वाभाविक है और सराहनीय भी। लेकिन उनका ‘अधैर्य’ समझ के परे है। बिहार में महागठबंधन की सरकार बन जाने का ये अर्थ कतई नहीं कि उन्हें या उनकी पार्टी को कभी भी और किसी पर भी मुकदमे का अधिकार मिल गया। चुनाव से पहले नीतीश कुमार ने भी सात निश्चयों की घोषणा की थी। क्या सारे ‘निश्चय’ पूरे किए जा चुके..? बिहार ने नीतीश पर विश्वास किया है और वो उस विश्वास पर खरा उतरने की हर सम्भव कोशिश भी करेंगे लेकिन इसमें वक्त लगेगा। अगर नीतीश और उनकी राज्य सरकार को इसके लिए वक्त दिया जा सकता है तो केन्द्र की मोदी सरकार को क्यों नहीं..?

हर मुद्दे का राजनीतिकरण करने की प्रवृत्ति ठीक नहीं। लेकिन ये बीमारी महामारी की तरह फैल चुकी है। इतनी जल्दी ‘नाउम्मीद’ होने और ‘मुकदमा’ में समय और पैसा खर्च करने के बदले रघुवंश बाबू और उनकी पार्टी महागठबंधन के अन्य सहयोगियों के साथ मिलकर प्रधानमंत्री और केन्द्र सरकार से बात करें तो शायद बिहार का अधिक भला हो। इस तरह के पैकेज की घोषणा चाहे केन्द्र की सरकार करे या राज्य की, उसे एक झटके में पूरा करना सम्भव नहीं। हमें समझना होगा कि कई तरह की प्रक्रियाओं से गुजरकर ही ऐसे वादों को अमलीजामा पहनाया जा सकता है। हमें थोड़ा ‘धैर्य’ और थोड़ा ‘विश्वास’ राजनीति से ऊपर उठकर रखना होगा। विकास के लिए ‘टकराव’ भी एक रास्ता हो सकता है लेकिन ‘सहयोग’ की हर सम्भावना खत्म होने के बाद।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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चारो पहर हवा में घुल रहा जहर

भाई साब ! ठहरिये !! आप ही से कुछ कहना चाहता हूँ| आपने कभी यह जानने की कोशिश की है कि अपने बिहार राज्य की राजधानी ‘पटना’ तो वायु प्रदूषण के मामले में देश की राजधानी ‘नई दिल्ली’ के बाद दूसरे नंबर पर आ गया है ! अब तो पटनावासियों के साथ-साथ पटना आने-जाने वालों को भी प्रदूषण कम करने के उपायों पर गंभीरतापूर्वक चिंतन-मनन शुरू कर देना होगा |

प्रदूषणों से मुक्ति के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं के साथ-साथ स्कूली बच्चों को भी प्रार्थना के वक्त ही प्रदूषण की भयावह स्थितियों से अवगत कराना होगा ताकि वे घर जाकर अपने माता-पिता एवं अभिभावकों से सारी बातें बोले और समाज को प्रदूषण से मुक्ति दिलाने का माहौल हर घर में बनने लगे |

समस्त शिक्षकवृन्द अपने-अपने छात्रों को वायु प्रदूषण के बारे में बतायें कि दीपावली के बाद वायु प्रदूषण का विश्लेषण किये जाने पर पता चला कि पटना में जान लेवा प्रदूषित धुल-कण 400 माइक्रोन/घन मीटर तक पहूँच गया है जबकि वह 100 माइक्रोन/घन मीटर से ऊपर होना ही प्राणघातक माना जाता है |

सरकार दीपावली के अवसर पर मात्र यही अपील करके अपनी जवाबदेही का इतिश्री कर लेती है- बच्चों को पटाखों से दूर रखें ! सरकार गाँव से लेकर जिला स्तर तक बाल संरक्षण समिति बनाने को उत्सुक है परन्तु, पटाखे निर्माता कंपनियों के लायसेंस रद्द करना नहीं चाहती – जबकि चिकित्सकों के अनुसार वायु प्रदूषण से बच्चों के फेफड़ों में तेजी से संक्रमण हो रहा है | इसके साथ ही ब्रोंकाइटिस-अस्थामा जैसी बीमारियाँ, कान व नाक में कई प्रकार की खराबियों के साथ-साथ बच्चों के सुनने की शक्ति भी कमजोर पड़ने लगी है |

सड़कों पर अहर्निश धुआं उगलते सर्वाधिक वाहनों के बीच बच्चों का प्रतिदिन स्कूल आना-जाना और वैसे वाहनों के फिटनेस चेक करने के लिए परिवहन विभाग को फुर्सत का सर्वथा अभाव होना- भला बच्चों के फेफड़ों को खोखला नहीं तो क्या करेगा ?

भाई साहब ! क्या ये सब कुछ सरकार के भरोसे छोड़ देना उचित है ? जिस तरह महिलाएँ दवाब डालकर ‘शराबबंदी’ कराई उसी तरह सचेतन मर्दों को सरकार पर दवाब डालकर ‘पटाखेबन्दी’ के लिए कोशिश करनी होगी | स्वामी रामदेव महाराज को भी राष्ट्रनिर्माण के साथ स्वास्थ्यनिर्माण के लिए चर्चा आरम्भ करनी होगी | राष्ट्रीय समस्याओं से हम तभी निजात पा सकेंगे जब सारा राष्ट्र चारो पहर सजग रहेगा, लगा रहेगा और जगा रहेगा |

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हमें पता है हाफिज सईद और शाहरुख खान में फर्क, फिर ‘दिलवाले’ पर मुर्दाबाद क्यों..?

भारत की सफलतम फिल्मों में शुमार ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में राज (शाहरुख) और सिमरन (काजोल) की प्रेम कहानी ने पर्दे पर जैसे जादू-सा रच डाला था। उम्मीद की जा रही थी कि 20 साल बाद ‘दिलवाले’ में ये जोड़ी एक बार फिर कुछ वैसा ही कमाल दिखाएगी। उनके चाहनेवाले बेसब्री से इंतजार कर रहे थे शुक्रवार 18 दिसम्बर का। फिल्म तय दिन पर रिलीज भी हुई लेकिन ‘शाहरुख मुर्दाबाद’ के नारे के साथ। बिहार समेत भारत के कई राज्यों में इस फिल्म का विरोध किया जा रहा है। कहीं फिल्म के पोस्टर फाड़े जा रहे हैं तो कहीं शाहरुख का पुतला जल रहा है। लोगों से फिल्म नहीं देखने की अपील की जा रही है। कुछ जगहों पर विरोध-प्रदर्शन इतना उग्र हो गया कि पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा।

सबसे पहले तो ये जान लें कि देश के कई सिनेमाघरों में जिस ‘दिलवाले’ के शो स्थगित किये जा रहे हैं उसके कंटेंट से प्रदर्शनकारियों का कोई लेना-देना नहीं। फिल्म आज के हिट डायरेक्टर रोहित शेट्टी के निर्देशन में बनी है और शाहरुख-काजोल के अलावे वरुण धवन और कीर्ति सेनन ने भी इसमें अभिनय किया है। फिल्म का विरोध वास्तव में इसके नायक शाहरुख खान को लेकर है। अभिनय के अलावे शाहरुख इस फिल्म के निर्माण से भी जुड़े हैं और इसकी सफलता-असफलता पर बहुत कुछ टिका है उनका। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या कर दिया शाहरुख ने..? ‘दिलवाले’ का विरोध कर किस जुर्म की सजा दी जा रही है उन्हें..?

आज एक ओर विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, हिन्दू सेना, शिवराष्ट्र सेना जैसे हिन्दूवादी संगठन और दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता जिस वजह से शाहरुख की फिल्म का बहिष्कार कर रहे हैं उसके मूल में है पिछले कुछ महीने से भारतीय समाज और राजनीति के पटल पर धब्बे की तरह उभरा असहिष्णुता (Intolerance) का मुद्दा। पहले कन्नड़ लेखक कलबुर्गी और कुछ समय बाद यूपी के दादरी में गोमांस रखने के शक में अखलाक नामक शख्स की हत्या के बाद ये मुद्दा भड़का और पूरे देश में फैल गया। कई लेखकों, फिल्मकारों और वैज्ञानिकों ने देश में बढ़ रहे तथाकथित इन्टॉलरेंस के विरोध में अपने पुरस्कार लौटा दिए। इसी दौरान आमिर खान का देश छोड़ने वाला बयान सामने आया और शाहरुख उनके समर्थन में दिखे। 2 नवम्बर को अपने 50वें जन्मदिन पर एक चैनल से उन्होंने कहा कि “देश में इन्टॉलरेंस बढ़ रहा है। अगर मुझसे कहा जाता है तो एक सिम्बॉलिक जेस्चर के तहत मैं भी अवार्ड लौटा सकता हूँ। देश में तेजी से कट्टरता बढ़ी है।“

हालांकि ‘दिलवाले’ के रिलीज से पहले 16 दिसम्बर को शाहरुख ने कहा कि उनके बयान का गलत मतलब निकाला गया। देश में कोई इन्टॉलरेंस नहीं है। अगर उन्होंने किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है तो वह माफी मांगते हैं। पर उन्हें ‘माफी’ नहीं मिली। खासकर उन राज्यों से जहाँ सत्ता में बीजेपी है। मसलन गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और झारखंड। वैसे विरोध-प्रदर्शन राजधानी दिल्ली और बिहार, यूपी जैसे राज्यों में भी हुए जहाँ बीजेपी का शासन नहीं है। पर विरोध करने वाले लोग हर जगह ‘समान विचार’ वाले  हैं।

हजारों साल का इतिहास गवाह है कि इन्टॉलरेंस यानि असिष्णुता इस देश के संस्कार में ही नहीं है। अगर ये देश असहिष्णु होता तो तीनों खान (शाहरुख-आमिर-सलमान) हिन्दी सिनेमा पर राज नहीं कर रहे होते। इस देश में इन्हें पलकों पर बिठाने वाले करोड़ों लोग हैं और ऐसे में आमिर और शाहरुख के बयानों से कुछ लोगों के ‘आहत’ होने को भी गलत नहीं कहा जा सकता। पर भावनाओं को ठेस पहुँचना एक बात है और उसे राजनीति का रंग देना दूसरी। अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नकारकर मान भी लें कि शाहरुख ने गलत कहा था तो भी क्या बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का शाहरुख को देशद्रोही कहना या फिर बीजेपी के ही सांसद योगी आदित्यनाथ का शाहरुख की तुलना आतंकी हाफिज सईद से करना और साध्वी प्राची का ये कहना कि वे पाकिस्तान के एजेंट हैं कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह की प्रतिक्रिया ही अपने आप में ‘असहिष्णुता’ है।

ना जाने कितने ‘हाफिज सईद’ हर पल इस ताक में रहते हैं कि कब इस तरह का मौका आए और वे हमारे किसी ‘शाहरुख’ को ट्वीट कर पाकिस्तान आने का ‘निमंत्रण’ दे। शाहरुख के मामले में हाफिज सईद ने ठीक यही किया भी। जब तक हम अपने-अपने स्वार्थ में असहिष्णुता (Intolerance) जैसे मुद्दों को हवा देते रहेंगे तब तक हाफिज सईद जैसे लोगों को भारतीय मुसलमानों से ‘छद्म’ सहानुभूति दिखाने का मौका मिलता रहेगा। हमें पूरी दृढ़ता से ये बताना होगा कि भारत सदियों से ‘शरण’ देता आया है। यहाँ से किसी को कहीं जाकर ‘शरण’ लेने की नौबत ना तो कभी आई है, ना आएगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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रामदरश मिश्र, मनमोहन झा, शमीम तारिक और साइरस मिस्त्री को साहित्य अकादमी पुरस्कार

‘असहिष्णुता’ को लेकर पुरस्कारवापसी का शोर अभी थमा ही था कि साहित्य अकादमी ने साल 2015 के लिए पुरस्कारों की घोषणा कर दी। हिन्दी में रामदरश मिश्र, मैथिली में मनमोहन झा, उर्दू में शमीम तारिक और अंग्रेजी में साइरस मिस्त्री को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना गया है। अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में कल हुई कार्यकारी मंडल की बैठक में 23 भारतीय भाषाओं के लिए पुरस्कार घोषित किए गए। बांग्ला भाषा के लिए पुरस्कार की घोषणा बाद में की जाएगी। पिछले दिनों 39 साहित्यकारों ने देश में कथित तौर पर बढ़ती ‘असहिष्णुता’ और साहित्य अकादमी के बोर्ड मेंबर एम. एम. कलबुर्गी की हत्या के विरोध में अपने पुरस्कार वापस कर दिए थे। अकादमी ने इस बाबत बड़ा निर्णय लेते हुए कहा कि लौटाए गए पुरस्कार वापस नहीं लिए जाएंगे। अकादमी की ओर से श्रीकांत बाहुलकर को भाषा सम्मान दिए जाने की घोषणा भी की गई।

अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासन राव के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस साल पुरस्कार के लिए छह कविता-संग्रह, छह कहानी-संग्रह, चार उपन्यास, दो निबंध-संग्रह, दो नाटक, दो समालोचना और एक संस्मरण का चयन किया गया है। रामदरश मिश्र को उनके कविता-संग्रह ‘आग की हंसी’, मनमोहन झा को कहानी-संग्रह ‘खिस्सा’, शमीम तारिक को समालोचना ‘तसव्वुफ और भक्ति’ और साइरस मिस्त्री को उनके उपन्यास ‘क्रॉनिकल ऑफ द कॉर्प्स बियरर’ के लिए पुरस्कार से नवाजा जाएगा। संस्कृत में इस वर्ष रामशंकर अवस्थी को उनके कविता-संग्रह ‘वनदेवी’ के लिए पुरस्कृत किया जाएगा।

भारतीय मानचित्र में सबसे ऊपर बैठे जम्मू-कश्मीर को देखें तो कश्मीरी में बशीर भद्रवाही को ‘जमिस त कशीरी मंज कशीर नातिया अदबुक’ (समालोचना) और डोगरी में ध्यान सिंह को ‘परछामें दी लो’ (कविता) के लिए सम्मानित किया जाएगा। ‘जन-गण-मन’ के ‘पंजाब-सिंध-गुजरात-मराठा’ की ओर चलें तो पंजाबी में जसविन्दर सिंह को उपन्यास ‘मात लोक’, सिंधी में माया राही को कहानी-संग्रह ‘महंगी मुर्क’, गुजराती में रसिक शाह को निबंध-संग्रह ‘अंते आरंभ’ (खंड एक और दो) और मराठी में अरुण खोपकर को संस्मरण ‘चलत-चित्रव्यूह’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा जाएगा। राजस्थानी में यह सम्मान मधु आचार्य ‘आशावादी’ को उनके उपन्यास ‘गवाड़’ और कोंकणी में उदय भेंब्रे को उनके नाटक ‘कर्ण पर्व’ के लिए दिया जाएगा।

‘द्रविड़’ यानि दक्षिण भारतीय भाषाओं की बात करें तो तमिल में ए. माधवन को ‘इक्किया सुवडुकल’ (निबंध), तेलुगु में वोल्गा को ‘विमुक्त’ (कहानी), कन्नड़ में के. वी. तिरूमलेश को ‘अक्षय काव्य’ (कविता) और मलयालम में के. आर. मीरा को ‘आराचार’ (उपन्यास) के लिए अकादमी पुरस्कार दिया जा रहा है। ‘उत्कल’ की ओर रुख करें तो ओड़िया में विभूति पटनायक को ‘महिषासुर मुहन’ (कहानी) के लिए चुना गया है।

उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ने पर असमिया में कुल सेइकिया को ‘आकाशेर छबि आर अनन्न गल्प’ (कहानी) के लिए, मणिपुरी में क्षेत्री राजन को ‘अहिड़ना येकशिल्लिबरा मड़’ (कविता)  के लिए, बोडो में ब्रजेन्द्र कुमार ब्रह्मा को ‘बायदी देंखे बायदी गाब’ (कविता) के लिए, संथाली में रबिलाल टुडू को ‘पारसी खातिर’ (नाटक) के लिए और नेपाली में गुप्त प्रधान को ‘समयका प्रतिविम्बहरू’ (कहानी) के लिए  पुरस्कार से नवाजा जा रहा है।

सभी घोषित पुरस्कार 16 फरवरी 2016 को दिल्ली के फिक्की सभागार में दिए जाएंगे। बता दें कि पुरस्कार के तौर पर विजेताओं को ताम्रपट्टिका, शॉल और एक लाख रुपये प्रदान किए जाते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अगले गैंगरेप पर अगली कविता लिखने तक

[निर्भया कांड केवल एक दुर्घटना नहीं, अमानवीयता की पराकाष्ठा थी। 16 दिसम्बर 2012 को देश की राजधानी दिल्ली में छह नरपशुओं ने चलती बस में 23 वर्षीया निर्भया का गैंगरेप किया। बर्बरता की सारी हदें पार कर दी थीं उन दरिंदों ने। उन सबने असंख्य जख्म दिए निर्भया को। फिर भी जीना चाहती थी वो। तेरह दिनों तक मौत से लड़ती रही वो जब तक कि एक-एक कर उसके सारे अंगों ने काम करना बंद नहीं कर दिया। 29 दिसंबर 2012 को हमेशा के लिए सो गई निर्भया। लेकिन सोने से पहले सारे देश को झकझोर दिया था उसने। ऐसी कोई आँख ना थी जिसमें आँसू और आक्रोश ना हो।

आज उस नृशंस घटना के तीन साल हो गए। लेकिन क्या बदला..? कुछ भी तो नहीं। 2012 बीतने को था जब निर्भया कांड हुआ। उसके बाद के तीन सालों में क्या हुआ ये जानना चाहिए आपको। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के मुताबिक राजधानी दिल्ली में 2013 में दुष्कर्म के 1441, 2014 में 1813 और इस साल यानि 2015 में 31 अक्टबूर तक 1856 मामले दर्ज हुए। बात यहीं खत्म नहीं होती। इन मामलों में 46 प्रतिशत दुष्कर्म पीड़ित नाबालिग हैं। कहाँ चली गई हमारी इंसानियत..? क्या कर रहा है हमारे देश का कानून..? क्यों इस कदर मर गया हमारी आँखों का पानी..? एक तरफ बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा और दूसरी तरफ हर रोज एक नई निर्भया..? क्या शर्म नहीं आनी चाहिए हमें..

जहाँ भी होगी निर्भया, आज भी बेचैन होगी। पेश है उस निर्भया को समर्पित उन्हीं दिनों लिखी गई डॉ. ए. दीप की बहुचर्चित कविता जिसका शीर्षक है अगले गैंगरेप पर अगली कविता लिखने तक]

कविता

अगले गैंगरेप पर अगली कविता लिखने तक

किसी ने तुम्हें वेदना कहा
किसी को तुम दामिनी दिखी
किसी ने निर्भया कहकर पुकारा
और तकनीकी शब्दावली में
गैंगरेप-पीड़िता थीं तुम…
जो भी नाम हो तुम्हारा
नमन करता हूँ तुम्हें
कि तुम जागी रहीं तब तक
जब तक बारी-बारी से
सो नहीं गए
तमाम अंग तुम्हारे।

आत्मा का आवरण ही नहीं
आत्मा भी लहूलुहान थी तुम्हारी
फिर भी
पूरे तेरह दिनों तक
तुम जीवित बैठी रहीं चिता पर
सोई नहीं
हमारे जागने से पहले।

मलाला का मलाल
अभी साल ही रहा था
कि जाना
छह-छह पशुओं ने मिलकर
बनाया तुम्हें शिकार
अपनी हवस का…
आज मैं लज्जित हूँ
अपने पुरुष होने पर
कि वे सारे पशु
पुरुष जाति के थे।

तुम निढ़ाल
नंगी पड़ी रहीं
सड़क के किनारे
पर कृष्ण के इस देश ने
देर कर दी
दो गज कपड़ा तक जुटाने में…
बस में उन पशुओं ने
जो तुम्हारे शरीर के साथ किया
वही दुष्कर्म करते रहे
तुम्हारे अस्तित्व के साथ
वहाँ से गुजरने वाले
न जाने कितने पिता, पुत्र, पति और भाई…
लज्जित हूँ
कि उन पशुओं के साथ-साथ
ये भी पुरुष जाति के थे।

यकीन मानो
उस दिन से आज तक
नजरें चुरा रहा हूँ
अपनी दो साल की बेटी से
और हो जाता हूँ कुंठित
जाकर पास पत्नी के
कि मैं
पुरुष जाति का हूँ।

तुम्हीं बताओ
अब कैसे करूँ पाठ
दुर्गा सप्तशती का
कैसे चढ़ाऊँ जल
पवित्र तुलसी को
कैसे दूँ बहन को
रक्षा का वचन
और कैसे दबाऊँ पैर
अपनी माँ के
कि मैं पुरुष जाति का हूँ।

लज्जित हूँ
कि पकड़े गए केवल वही छह
और बाहर हैं उनकी जाति के
बाकी हम सारे पशु।

लज्जित हूँ
कि हमारी सभ्यता के
हजारों साल होने को आए
पर हम अदद पशुता को भी
जीत नहीं पाए।

लज्जित हूँ
कि अब भी वीर्य बहता है
हमारे भीतर
और आदम की भूमिका
अब भी निभाएगा
आदमी ही।

लज्जित हूँ
कि तुम्हारे जगाने के बाद
जागकर ये कविता तो लिख दी…
अब शायद बैठ जाऊँगा
अगले गैंगरेप पर
अगली कविता लिखने तक।

डॉ. ए. दीप की कविता

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पप्पू यादव  के ‘जख़्मों’ पर ‘बायोपिक’ का मरहम वाया ‘अमेरिका’

मधेपुरा के सांसद पप्पू यादव पर भारतीय मूल के अमेरिकी निर्देशक परम गिल बायोपिक फिल्म बनाएंगे। हाल के विधानसभा चुनाव में उन्हें मिले जख़्मों पर ये ख़बर मरहम का काम करेगी। चुनाव से पहले उन्होंने लालू यादव से ‘उत्तराधिकार’ मांगा और इस बेतुकी मांग के बदले राजद से निकाले गए। फिर उन्होंने ‘जन अधिकार पार्टी’ बनाई लेकिन उनकी पार्टी के ‘जन’ को जनता से भी कोई ‘अधिकार’ नहीं मिला। इसके बाद ख़बरों से नदारद थे पप्पू यादव। हाँ, बीच में उन्होंने अपने उस बड़बोले दावे पर माफी जरूर मांगी थी जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर लालूजी के दोनों बेटे चुनाव जीत जाते हैं तो वे राजनीति छोड़ देंगे। बहरहाल, लम्बे अन्तराल के बाद उनकी कोई ख़बर आई है। ख़बर… ‘गैर’राजनीतिक … और वो भी ‘अमेरिकी कनेक्शन’ के साथ।

पप्पू यादव पर बनने वाली फिल्म की कहानी बिहार (Bihar) के अमरनाथ झा की किताब पर आधारित है। उन्होंने ही इसका स्क्रीनप्ले भी लिखा है। पप्पू यादव की आत्मकथा ‘द्रोहकाल का पथिक’ में उन्हें ‘फिल्मी’ मैटेरियल दिखा था। किताब में एक ओर पप्पू यादव की ‘हीरो’ जैसी ज़िन्दगी थी तो दूसरी ओर एक खूबसूरत लव स्टोरी जिसमें रॉबिनहुड की छवि वाले राजनेता को एक सिख लड़की से प्यार हो जाता है। वो इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने किताब के राइट्स खरीद लिए।

प्रस्तावित फिल्म में पप्पू के जीवन के हर पहलू को दिखाने की कोशिश होगी। फिल्म के निर्देशक परम गिल का मानना है कि पप्पू यादव ने अपनी ज़िन्दगी में कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। उन्होंने पिछड़ी जातियों के अधिकार के लिए संघर्ष किया है जिसे दुनिया के सामने आना चाहिए। गिल के अनुसार उनकी कहानी काफी ‘दिलचस्प’ है जिसे पर्दे पर उतारना ‘व्यावसायिक’ तौर पर भी ‘फायदेमंद’ होगा। फिलहाल वो फिल्म के लिए कलाकारों के चयन में जुटे हैं। बता दें कि परम गिल अपनी हॉलीवुड फिल्म ‘गोइंग टू अमेरिका’ के लिए जाने जाते हैं।

बिहार (Bihar) के कोसी और सीमांचल के इलाके में पप्पू यादव की अच्छी पैठ है पर विधानसभा चुनाव में वो सीधे “मैं बदलूँगा बिहार” के नारे के साथ उतर गए। एक तो उन्होंने एकदम से अपना ‘कैनवास’ बहुत बड़ा कर लिया, दूसरा उनके नारे का ‘मैं’ ज्यादातर लोगों के गले नहीं उतरा और तीसरा बीजेपी से उनकी ‘सांठगांठ’ छिपी ना रह सकी। सीधे मुकाबले में तो पप्पू वैसे भी नहीं थे पर वो ‘असर’ छोड़ेंगे ये उम्मीद जरूर थी। चुनाव के नतीजे आने पर इसके उलट पप्पू खासे ‘बेअसर’ साबित हुए। वो जान गए कि अपने लिए वोट मांगना और अपने नाम पर औरों के लिए वोट जुटाना दो अलग बातें हैं। यहाँ तक कि जिस इलाके पर वो अपनी ‘मुहर’ लगाकर चल रहे थे वहाँ से भी उन्हें यही सबक मिला। जाहिर है कि इतना सब कुछ होने के बाद पप्पू के लिए स्थितियां सहज नहीं रहीं और उन्होंने सुर्खियों से दूर रहना ही ठीक समझा। अब जबकि उनके ऊपर फिल्म बनने की ख़बर सामने आई है, पप्पू को नए सिरे से लोगों का सामना करने में ‘सहूलियत’ होगी।

राजनेताओं के सार्वजनिक जीवन को लेकर इससे पहले भी कई फिल्में बनी हैं। इससे नाम और चर्चा जो मिले लेकिन ये नहीँ भूलना चाहिए कि बायोपिक बनाना लोगों को किसी के निजी जीवन में झाँकने के लिए खुला आमंत्रण देना है। बशर्ते कि वो ईमानदारी से बने। जीवन को ज्यों का त्यों दिखा देना बहुत साहस और जोखिम का काम होता है। ये देखने की बात होगी कि पप्पू यादव इस पैमाने पर कितना खरा उतरते हैं। अभी उन्हें एक लम्बा राजनीतिक जीवन जीना है। ऐसे में वो निर्देशक को किस हद तक ‘रचनात्मक स्वतंत्रता’ देते हैं, इस पर आलोचकों की निगाह होगी। उनके साथ ‘बाहुबली’ का टैग क्यों जुड़ा, फिल्म इस पर क्या और कैसे कहती है, यह देखना दिलचस्प होगा और सांसद पत्नी रंजीत रंजन के संग उनके प्रेम-प्रसंगों को लेकर भी उत्सुकता रहेगी। सम्भवत: उनके जीवन के कुछ अनछुए पहलू भी दुनिया के सामने आएं।

पप्पू यादव की आत्मकथा ‘द्रोहकाल का पथिक’ पहले ही प्रकाशित हो चुकी है और अब उनके जीवन पर फिल्म बनने जा रही है। उनसे बड़ी विनम्रता के साथ एक सवाल करने को जी चाहता है कि क्या उन्हें स्वयं को थोड़ा और वक्त नहीं देना चाहिए था..? तब शायद उनके जीवन में बताने और साझा करने लायक कुछ और महत्वपूर्ण अध्याय जुड़ जाते..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सरकार के बाद संगठन की बारी, मीसा को पार्टी सौंपने की तैयारी

आरजेडी में आजकल ‘आवाज़’ खूब उठ रही है और लालूजी बड़ी तन्मयता से उन आवाजों को सुन भी रहे हैं। कार्यकर्ताओं की ‘आवाज़’ इतने दिल से निकलती है कि कई बार तो लालूजी तक बिना बोले ही पहुँच जाती है। पहले उनकी पार्टी में ‘आवाज़’ उठी कि दोनों ‘तेज’ को राजनीति में लाओ, लालूजी ले आए। फिर ‘आवाज़’ उठी कि दोनों को सरकार में लाओ और तेजस्वी को डिप्टी सीएम बनाओ, लालूजी ने बहुत ध्यान से सुना और बिल्कुल ऐसा ही किया। ‘आवाज़’ आने का सिलसिला और तेज हुआ। इस बार ‘आवाज़’ उठी कि तेजस्वी को विधायक दल का नेता भी बना दो और साथ में माँ राबड़ी को विधान मंडल दल की कमान सौंप दो, लालूजी ने दरियादिली दिखाते हुए ये दोनों काम भी कर दिया। पर ‘आवाज़’ है कि रुकती ही नहीं। लालूजी करें तो क्या करें..? अब फिर ‘आवाज़’ उठने लगी है कि बेटी मीसा के हाथ में पार्टी की बागडोर दे दो। लगता है लालूजी को इस बार भी ‘आवाज़’ सुननी ही पड़ेगी।

वैसे राजनीति में इस तरह की ‘आवाज़’ उठना कोई नई बात नहीं। नेहरू-गाँधी परिवार को तो ऐसी आवाज़ सुनने में महारत हासिल है। कई पीढ़ियों से वो ऐसी ‘आवाज़’ सुनता आ रहा है। देखा जाय तो आज़ादी से लेकर अब तक इस तरह की ‘आवाज़’ सुनने वालों की लम्बी फेहरिस्त है। जो अब नहीं हैं उनकी बात ना भी करें, तो भी सूची छोटी होने से रही। जो ‘आवाज़’ लालूजी सुन रहे हैं, ठीक वैसी ही ‘आवाज़’ मुलायम सिंह यादव, प्रकाश सिंह बादल, ओमप्रकाश चौटाला, वसुंधरा राजे सिंधिया, करुणानिधि, फारूख अब्दुल्ला, मुफ्ती मोहम्मद सईद, शिबू सोरेन, रामविलास पासवान, यशवंत सिन्हा  जैसे कितने ही नेताओं ने सुनी हैं। ना तो कोई दल अपवाद है, ना कोई राज्य।

बहरहाल, सूत्रों की मानें तो लालू प्रसाद यादव अपनी बड़ी बेटी मीसा भारती को बिहार आरजेडी का अध्यक्ष बनाने जा रहे हैं। पार्टी के अन्दर ये मांग ‘जोरशोर’ से उठने लगी है कि उन्हें ‘बड़ी’ भूमिका में लाया जाय। लालू के खासमखास रहे इलियास हुसैन ने बाकायदा आरजेडी सुप्रीमो से मांग की है कि मीसा को प्रदेश का नेतृत्व सौंपा जाय। युवाओं को जिम्मेदारी देने का अभी ‘सही’ वक्त है। यही नहीं, मीसा को जिम्मेदारी देने से पार्टी ‘सही’ दिशा में काम करेगी। गौरतलब है कि इलियास हुसैन आरजेडी सरकार में पहले मंत्री रह चुके हैं। वर्तमान में वे विधायक हैं और साथ में पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता भी।

मीसा भारती पिछले लोकसभा चुनाव में पाटलिपुत्र से रामकृपाल यादव (बीजेपी) के हाथों चुनाव हार गई थीं। इसके बावजूद पार्टी के तमाम कार्यक्रमों में वो लगातार सक्रिय रहीं। इस बार के विधानसभा चुनाव में तो वो ‘स्टार प्रचारक’ थीं। सोशल मीडिया पर भी उनकी भरपूर मौजूदगी देखी जा सकती है। अभी बीते चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने उन्हें ‘बेचारी’ क्या कह दिया था, मीसा ने विरोध में पूरा अभियान छेड़ दिया।

वैसे एक सम्भावना ऐसी भी है कि मीसा को आरजेडी का राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष बनाया जाय। ऐसा करने से ना केवल उनकी भूमिका और बड़ी हो जाएगी, बल्कि प्रदेश स्तर पर किसी को ‘एडजस्ट’ भी किया जा सकेगा। लालू ने अपने दोनों ‘लाल’ को बिहार ‘सम्भालने’ के लिए तैनात कर ही दिया है। अब बच जाता है केन्द्र। तो उसके लिए मीसा ‘पापा’ की पहली पसंद होंगी। राजनीति के जानकार निकट भविष्य में मीसा का राज्यसभा जाना तय मान रहे हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मधेपुरा विधानसभा क्षेत्र से सामाजिक न्याय के पुरोधा बी.पी.मंडल के बाद प्रो.चन्द्रशेखर ही बने बिहार सरकार के कबीना मंत्री

बिहार में पहली बार 16वीं विधानसभा चुनाव में राजद-जदयू एवं कांग्रेस समन्वित महागठबंधन की सरकार बनी है जो लालू-शरद-सोनिया के ताकतवर धर्मनिरपेक्ष विचारों का फल है | इस महागठबंधन की सरकार में नीतीश कुमार ने मुख्यमंत्री के रूप में पाँचवीं बार शपथ ग्रहण किया है तथा पहली बार उपमुख्यमंत्री बने हैं तेजस्वी यादव और आपदा प्रबंधन के कबीना मंत्री बने हैं- प्रो.चन्द्रशेखर |

यूँ तो मधेपुरा  जिले के प्रथम कबीना मंत्री (विधि मंत्री) बने शिवनंदन प्रसाद मंडल परन्तु मधेपुरा  विधानसभा क्षेत्र से प्रथम कबीना मंत्री बनने वाले बी.पी.मंडल के बाद प्रो.चन्द्रशेखर को ही कबीना मंत्री के रूप में जनता-जनार्दन की सेवा करने का अवसर प्राप्त हुआ है |

Dr.Bhupendra Madhepuri blessing the honourable minister Prof. Chandrashekhar.
Dr.Bhupendra Madhepuri blessing the honourable minister Prof. Chandrashekhar.

6 दिसम्बर 2015 को स्थानीय रासविहारी उच्च विद्यालय का वह ऐतिहासिक मंच और दर्शकों-सम्मानकर्ताओं से खचाखच भरा वह मैदान माननीय मंत्री प्रो.चंद्रशेखर के अद्वितीय एवं अपूर्व नागरिक महाअभिनंदन का गवाह बना- जिसे देखकर समाजसेवी एवं साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने विगत कालखंडों में इस मंच पर पधारे समाजवादी चिंतकों डॉ.लोहिया, भूपेन्द्र नारायण मंडल, चौधरी चरण सिंह, लोकनायक जयप्रकाश………. कर्पूरी ठाकुर आदि की चर्चा करते हुए अपने संबोधन के अन्त में अपने अनुज प्रो.चन्द्रशेखर को आशीर्वचन के रूप में यही कहा-

शिवनंदन-भूपेन्द्र बने रे, जिस कोसी तट की हरियाली !
शेखर उसी चमन का तुम भी, बन जा एक यशस्वी माली !!

Massive gathering for felicitating Cabinet Minister Prof.Chandrashekhar.
Massive gathering for felicitating Cabinet Minister Prof.Chandrashekhar.

11 बजे दिन से 5 बजे शाम तक चले मंत्री प्रो.चन्द्रशेखर के इस महानागरिक सम्मान समारोह में विशिष्ठ अतिथियों के रूप में शरीक हुए- पूर्व पर्यटन मंत्री अशोक कुमार सिंह, विधान पार्षद विजय कुमार वर्मा, विधायक रमेश ऋषिदेव, पूर्व विधायक परमेश्वरी प्रसाद निराला, वयोवृद्ध राजद नेता जगदीश प्रसाद यादव एवं राजद के जिला अद्यक्ष प्रो.खालिद, जदयू के सियाराम यादव, कांग्रेस के सत्येन्द्र सिंह, पूर्व प्रमुख सियाशरण यादव, डॉ.विजेंद्र, नरेश पासवान, डॉ.शांति यादव, गुड्डी देवी, प्रधान जी, डॉ.अरुण, पारो जी सहित जिले के कोने-कोने से आये महागठबंधन के सभी प्रखंडों के अद्यक्ष, विभिन्न प्रकोष्ठों के पदाधिकारीगण, किसान-मजदूर-छात्र-नौजवान तथा माता-बहनों की उपस्थिति में सम्मानित होनेवाले सभी स्वतंत्रता सेनानियों के साथ-साथ समाजसेवी साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी को भी माननीय मंत्री प्रो.चन्द्रशेखर ने शाल ओढ़ाकर एवं माला पहनाकर केवल सम्मानित ही नहीं किया बल्कि अपने सामाजिक ऋण को हल्का भी किया और आगे भी इस ऋण को अपनी सरकार के माध्यम से चुकाते रहने का संकल्प बार-बार दुहराया भी |

Samajsevi Sahityakaar Dr.Bhupendra Madhepuri being honoured by Minister Prof.Chandrashekhar .
Renowned Educationist Dr.Bhupendra Madhepuri being honoured by Minister Prof.Chandrashekhar at Madhepura .

माननीय मंत्री प्रो.चन्द्रशेखर ने भ्रष्टाचार-अनाचार-दुराचार के संवाहकों को कठोर दण्ड देने का संकल्प लेते हुए उपस्थित जनमानस के माध्यम से क्षेत्र के लोगों के बीच यह पैगाम प्रेषित किया कि-

मेरा घर खुला है, खुला ही रहेगा तुम्हारे लिए !
मोबाइल भी खुला ही रहेगा, तुम्हारी सेवा के लिए !!

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मिले बिल गेट्स और नीतीश कुमार, खुलेंगे नई संभावनाओं के द्वार

माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स आज मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से उनके पटना स्थित आवास पर मिले। 7, सर्कुलर रोड पर हुई दो दिग्गजों की ये मुलाकात बेहद खास रही। मिलते ही नीतीश ने गेट्स को ‘वेलकम’ कहा और गेट्स ने कहा ‘कांग्रेचुलेशन मिस्टर कुमार’। बिहार चुनाव में मिली बड़ी जीत और नई सरकार के गठन के बाद गेट्स और नीतीश की यह पहली मुलाकात थी। इस मुलाकात के बाद नीतीश सरकार और ‘बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन’ के बीच शीघ्र ही नए समझौते होने के आसार हैं।

गर्मजोशी और आत्मीयता भरे माहौल में दोनों शख्सियतों ने स्वास्थ्य सहित कई क्षेत्रों में नई संभावनाओं पर चर्चा की। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बिल गेट्स को बिहार में चल रही स्वास्थ्य, शिक्षा और मानव-विकास से जुड़ी विभिन्न योजनाओं की जानकारी दी। राज्य सरकार द्वारा चलाई जा रही इन योजनाओं से गेट्स काफी प्रभावित दिखे। उन्होंने इन योजनाओं की तारीफ ही नहीं की बल्कि हर संभव सहयोग की बात भी कही। नीतीश ने इस अवसर पर गेट्स को भगवान बुद्ध का स्मृति-चिह्न और सुप्रसिद्ध मिथिला पेंटिंग की कढ़ाई वाली शॉल भेंट की।

बिहार में सामाजिक और महिला सुधार के क्षेत्र में ‘बिल एंड मिलिंडा गेट्स फाउंडेशन’ की कई योजनाएं पहले से ही चल रही हैं। यह फाउंडेशन विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं के स्वास्थ्य और प्रसव के साथ-साथ नवजात बच्चों के स्वास्थ्य के लिए उल्लेखनीय काम करता आ रहा है। यही नहीं, गेट्स का फाउंडेशन महिलाओं को परिवार नियोजन को लेकर जागरुक करने का कार्य भी करता है। नीतीश और गेट्स की ये मुलाकात इन तमाम योजनाओं के लिहाज से अहम मानी जा रही हैं।

बिहार की जनता ने ढेर सारी अपेक्षाओं के साथ नीतीश को पाँचवीं बार राज्य की बागडोर सौंपी है। नीतीश अच्छी तरह जानते हैं कि इस बार उनके सामने पहले से अधिक और पहले से अलग चुनौतियां हैं। वे विभिन्न मंचों पर बड़े आत्मविश्वास के साथ बिहार के विकास मॉडल की वकालत करते रहे हैं। अपने नए कार्यकाल में उन्हें इस मॉडल पर पूरे देश की मुहर लगवानी है। जाहिर है कि इसके लिए आज जैसी मुलाकात और बिल गेट्स जैसे सहयोगी बहुत अहम साबित होंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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