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नीतीश से मिले तेजस्वी-तेजप्रताप

बिहार में चली आ रही राजनीतिक अनिश्चितता के बीच उस वक्त नए राजनीतिक संकेत मिले जब तेजस्वी और तेजप्रताप मुख्यमंत्री नीतीश कुमार से मिलने पहुंचे। उम्मीद की जा रही है कि इसके बाद जेडीयू-आरजेडी के बीच व्याप्त तनाव कम होगा और दोनों दलों के रुख में नरमी आएगी।

बता दें कि मंगलवार को कैबिनेट की बैठक थी जिसमें तेजस्वी के शामिल होने को लेकर कयास लगाए जा रहे थे। तेजस्वी पर सीबीआई के द्वारा किए गए एफआईआर के बाद यह पहला मौका था जब नीतीश और तेजस्वी को आमने-सामने होना था। अनुमान लगाया जा रहा था कि ऐसा होने पर दो दलों के रिश्तों के बीच जमती जा रही बर्फ पिघलेगी और ठीक ऐसा ही होता भी दिखा। बैठक में तेजस्वी अपने मंत्री भाई तेजप्रताप के साथ मौजूद रहे। उनके साथ आरजेडी कोटे के मंत्री चन्द्रशेखर, आलोक मेहता और विजय प्रकाश भी थे।

गौरतलब है कि तेजस्वी के सीबीआई के घेरे में आने के बाद से ही जेडीयू ने आरजेडी पर इस बात का दबाव बनाया हुआ है कि तेजस्वी खुद को पाक-साफ साबित करे या पद छोड़े। ऐसा न होने पर मुख्यमंत्री द्वारा उन्हें बर्खास्त किए जाने का विकल्प भी खुला बताया जा रहा था। दूसरी ओर आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने तेजस्वी के इस्तीफे से साफ इनकार कर दिया था। इसके बाद से ही राजनीति गरमा गई थी। यहां तक कि महागठबंधन सरकार के दिन भी गिने जाने लगे थे। इन सबके बीच महागठबंधन में शामिल तीसरी पार्टी कांग्रेस भी ऊहापोह में थी और दूसरी ओर भाजपा भावी समीकरणों में अपना हिसाब बिठाने में लगी हुई थी।

बहरहाल, इस पृष्ठभूमि में कैबिनेट की बैठक कितनी अहम थी, कहने की जरूरत नहीं। खास बात यह कि कैबिनेट में केवल रूटीन मुद्दों पर चर्चा हुई। इस दौरान तेजस्वी-प्रकरण उठा ही नहीं। दोनों दलों की ओर से नरमी के संकेत तब और ज्यादा स्पष्ट हुए जब बैठक के बाद तेजस्वी अपने भाई तेजप्रताप के साथ मुख्यमंत्री के चैंबर में पहुंचे और लंबे समय तक वहां रहे। हालांकि इस दौरान उनके बीच क्या बातें हुईं यह नहीं पता, लेकिन दो दलों के बीच संवादहीनता खत्म होना न केवल उनके लिए बल्कि बिहार की राजनीति खासकर महागठबंधन के लिए सुखद संकेत है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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राहुल नहीं, नीतीश संभालेंगे यूपीए की कमान !

बिहार की राजनीति में चल रही महाभारत के बीच मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी से अहम मुलाकात हुई। बताया जाता है कि इस बातचीत में तय हुआ कि नीतीश कुमार को संयुक्त विपक्ष में अहम जिम्मेदारी दी जाएगी और बिहार में महागठबंधन की सरकार चलती रहेगी। यही नहीं, तेजस्वी प्रसाद यादव उपमुख्यमंत्री पद से इस्तीफा भी दे देंगे। हालांकि फिलहाल कांग्रेस या जेडीयू के किसी पदाधिकारी ने अभी इस बात की पुष्टि नहीं की है।

गौरतलब है कि बिहार में चल रही राजनीतिक अनिश्चितता के मद्देनज़र सोनिया गांधी ने अपनी ओर से पहल करते हुए जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार और आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से बात की। कथित रूप से उन्होंने तेजस्वी के मामले में बीच का रास्ता निकालने के लिए दोनों दलों के प्रमुख को राजी कर लिया है। इसके साथ ही आगे की रणनीति पर भी बात हुई बताई जाती है।

सोनिया की इस पहल के बाद बिहार के राजनीतिक हलके में इस चर्चा ने जोर पकड़ लिया है कि अब राहुल गांधी कांग्रेस के अध्यक्ष नहीं बनेंगे। अगर बनेंगे भी तो वे प्रधानमंत्री पद के लिए दावेदारी नहीं करेंगे। ऐसा होने पर स्पष्ट है कि यूपीए 2019 का चुनाव नीतीश की अगुआई में लड़ेगा। देखा जाय तो बिहार समेत पूरे देश के लिए ये बड़ी ख़बर है।

चलते-चलते बता दें कि वर्तमान समय के प्रसिद्ध इतिहासकार व लेखक रामचंद्र गुहा ने बीते मंगलवार को एक कार्यक्रम के दौरान कहा था कि कांग्रेस को बचाना है, तो इसका नेतृत्व नीतीश कुमार को सौंप दें। हालांकि ये बात उन्होंने एक ‘आदर्श कल्पना’ के तौर पर कही थी, लेकिन अपने क्षेत्र के दिग्गज और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिष्ठित किसी आदमी का इतनी बड़ी बात कहना मायने रखता है। यूपीए की साख बढ़ाना और प्रकारान्तर से मोदी-शाह की दिन-ब-दिन बढ़ती ताकत को रोकना उनके मुताबिक नीतीश की अगुआई में ही संभव है। अब राजनीतिक हलके में जिस तरह की चर्चा चल रही है, उससे गुहा की ‘कल्पना’ सच होती दिख रही है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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इस राजनीतिक मेलोड्रामा का अंत क्या है ?

बिहार की राजनीति का मेलोड्रामा अपने चरम पर है। सिर पर नीतीश कैबिनेट से बर्खास्तगी की तलवार झेल रहे उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव के सुरक्षाकर्मियों ने बुधवार को सचिवालय के बाहर पत्रकारों से बदसलूकी और मारपीट की। दरअसल तेजस्वी कैबिनेट की बैठक के बाद बाहर आ रहे थे और बाहर सवालों की बौछार लिए पत्रकारों की भीड़ जमा थी। पत्रकारों ने ज्योंहि तेजस्वी से सवाल पूछने की कोशिश की, उनके सुरक्षाकर्मियों ने तथाकथित रूप से उन पर हमला कर दिया। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक तेजस्वी के गार्डों ने पत्रकारों को दौड़ाया और उनसे हाथापाई की। सचिवालय के बाहर बहुत देर तक हंगामा होता रहा और अफरा-तफरी मची रही।

गौरतलब है कि आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के परिवार पर भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण इन दिनों जांच एजेंसियों का शिकंजा कसता जा रहा है। इसके बाद से ही बिहार में महागठबंधन सरकार के भविष्य को लेकर कयासों का दौर चल रहा है। उपमुख्यमंत्री तेजस्वी पर सीबीआई द्वारा केस दर्ज किए जाने के बाद उन्हें कैबिनेट से बाहर का रास्ता दिखाए जाने की संभावना है। मंगलवार को अपनी पार्टी की बैठक के बाद नीतीश ने गेंद लालू के पाले में डालते हुए कहा था कि ये उनका और उनकी पार्टी का मामला है, इसीलिए इस पर वो स्वयं निर्णय लें। इस पर आरजेडी ने बिना देर किए टका सा जवाब दिया और कहा कि तेजस्वी किसी सूरत में इस्तीफा नहीं देंगे।

ऐसे में नीतीश की छवि और उनके ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए इस बात की संभावना जताई जा रही है कि लालू द्वारा इस समस्या का ‘समाधान’ नहीं निकाले जाने पर वो कोई कड़ा कदम उठा सकते हैं। उन्होंने अपनी पार्टी की अहम बैठक में स्पष्ट संकेत किया था कि भ्रष्टाचार के मामले में वो अपनी जीरो टॉलरेंस की नीति से कोई समझौता नहीं करेंगे। उन्होंने कहा था कि जिन पर आरोप लग रहे हैं उन्हें तथ्यों के साथ जनता के बीच जाना चाहिए। साथ में उन्होंने यह भी जोड़ा कि उनकी पार्टी के नेताओं पर जब भ्रष्टाचार के आरोप लगे तो उन्होंने मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया।

बहरहाल, इस सारी रस्साकशी में एक बात मन को मथे जा रही है कि क्या आज की राजनीति में नैतिकता, मर्यादा और शुचिता जैसे शब्दों का कोई अर्थ नहीं रह गया है? क्या इन शब्दों में सुविधानुसार अपना अर्थ भरा जा सकता है? अगर नहीं, तो लालू सकारात्मक दिशा में क्यों नहीं सोच पा रहे? अगर उनके कहे मुताबिक वे और उनका परिवार निर्दोष हैं तो फिर सांच को आंच क्या? सच जो भी है, जहां भी है, आज नहीं तो कल सामने आना ही है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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निर्भया के देश में ‘मॉम’

महज 4 साल की उम्र में कैमरे के सामने आने वाली श्रीदेवी अपने करियर के 50वें साल में ‘मॉम’ बनकर आई हैं। ‘इंग्लिश विंग्लिश’ के साथ उन्होंने अपनी दूसरी पारी धमाकेदार तरीके से शुरू की थी। अगर बलात्कार की पृष्ठभूमि में रची गई ‘मॉम’ की कहानी पर थोड़ी और मेहनत की गई होती तो इस फिल्म का धमाका उससे भी बड़ा हो सकता था। बल्कि यह क्लासिक का दर्जा पा सकती थी। बहरहाल, हिन्दी फिल्मों की पहली महिला सुपरस्टार की यह 300वीं फिल्म है और वो क्यों सुपरस्टार थीं (या हैं) यह जानने के लिए जरूर देखी जाने लायक है।

एक पंक्ति में कहें तो ‘मॉम’ एक मां के अपनी बेटी के साथ हुए बलात्कार के खिलाफ कानून का दरवाजा खटखटाने और इंसाफ न मिलने पर खुद ही उसे इंसाफ दिलाने की कहानी है। इस कहानी का दिलचस्प पहलू यह है कि जिस बेटी के लिए वह मां जमीन-आसमान एक कर देती है, वह न केवल उसकी सगी बेटी नहीं है, बल्कि उसने उसे मां का दर्जा भी नहीं दिया है। इस तरह मॉम केवल बदले की कहानी न होकर एक मां के मां का दर्जा पाने की तड़प और जद्दोजहद की कहानी भी है। बावजूद इसके, इसमें चौंकाने जैसी कोई बात नहीं क्योंकि यह फिल्म इंटरवल के बाद जिस क्लाइमेक्स की ओर बढ़ती है, वह काफी आजमाया हुआ-सा है और उसमें कोई नयापन नहीं है। इसके अलावा एक और चीज ‘मॉम’ के असर को कम करती है और वो यह कि दर्शक इससे पहले ऐसे ही विषय पर बनी रवीना टंडन की ‘मातृ’ देख चुके हैं। हालांकि ‘मॉम’ में ‘मातृ’ से इमोशन की एक परत ज्यादा है क्योंकि इसमें दो संघर्ष समानान्तर रूप से चलते हैं।

जैसा कि पहले कहा जा चुका है, फिल्म की कहानी और बेहतर हो सकती थी, पर इसका स्क्रीनप्ले बेहद क्रिस्प है। फिल्म का कैनवास बड़ा है और ट्रीटमेंट भी रिच है। सिनेमाटोग्राफी कमाल की है। डायलॉग्स धारदार हैं और अदाकारी के तो कहने ही क्या। अभिनय में श्रीदेवी ने तो अपनी छाप छोड़ी ही है, नवाजुद्दीन सिद्दीकी, अक्षय खन्ना और सजल अली का काम भी याद रखने लायक है। नवाज ने जहां एक बार फिर अपने लुक, लहजे और रेंज से चौंकाया है, वहीं अक्षय को देख कर यह बात कचोटती है कि अभिनय की अच्छी संभावना के बावजूद वो बीच-बीच में गायब क्यों हो जाते हैं।

निर्देशन की बात करें तो रवि उदयावर का काम बेहतरीन है। कई साल तक ऐड एजेंसी और ग्राफिक डिजाइनिंग के बाद बतौर डायरेक्टर यह उनकी डेब्यू फिल्म है। फिल्म के म्यूजिक के साथ एआर रहमान का नाम जुड़ा होने के बावजूद कुछ कमी रह गई-सी लगती है। हालांकि बैकग्राउंड स्कोर झकझोर देने वाला है।

कुल मिलाकर ‘निर्भया’ के इस देश में ‘मॉम’ इसलिए भी देखी जानी चाहिए कि इसमें जहां आप ‘बलात्कारी’ मानसिकता और सिस्टम को करीब से देखते हैं, वहीं गुनहगारों को अपने अंजाम तक पहुंचता देख (वो भी नारी-शक्ति के हाथों) अपने भीतर सुकून भरा एक अहसास भी उतरता पाते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप         

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उपराष्ट्रपति चुनाव में नीतीश विपक्ष के साथ !

कांग्रेस की ओर से की हाल की बयानबाजी से नाराज नीतीश कुमार को मनाने में कांग्रेस जोर-शोर से जुट गई है। माना जा रहा है कि राष्ट्रपति चुनाव को लेकर कांग्रेस और जेडीयू के बीच गहराता विवाद राहुल गांधी के हस्तक्षेप के बाद समाप्त हुआ है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक राहुल ने अपनी पार्टी के नेताओं से बिहार के मुख्यमंत्री के खिलाफ नहीं बोलने का निर्देश दिया है। जेडीयू ने भी इस दिशा में सकारात्मक रुख अपनाते हुए उपराष्ट्रपति चुनाव में विपक्ष के साथ होने के संकेत दिए हैं।

राहुल के हस्तक्षेप का असर सबसे पहले कांग्रेस महासचिव गुलाम नबी आजाद के यू-टर्न में दिखा। उन्होंने कहा कि बिहार के मुख्यमंत्री और महागठबंधन के नेता नीतीश कुमार हमारे साथ हैं। हमारे बीच किसी तरह का मतभेद नहीं है। यही नहीं, उन्होंने यहां तक कहा कि नीतीश कुमार का कहना सही है कि हमने राष्ट्रपति चुनाव में अपना उम्मीदवार घोषित करने में देर की है। हमसे यह गलती हुई है। इसलिए हमने यह तय किया है कि उपराष्ट्रपति चुनाव के मुद्दे पर समय रहते फैसला लिया जाएगा।

गौरतलब है कि इससे पहले नीतीश ने अपनी पार्टी की राज्य कार्यकारिणी के सदस्यों को संबोधित करते हुए कांग्रेस से साफ शब्दों में कहा था कि वे किसी के पिछलग्गू नहीं हैं। वे सहयोगी हैं और सहयोगी की तरह रहेंगे। नीतीश कुमार की नाराजगी गुलाम नबी आजाद के उस बयान को लेकर थी जिसमें उन्होंने राष्ट्रपति चुनाव में एनडीए को समर्थन दिए जाने पर कहा था कि नीतीश एक विचारधारा के नहीं, बल्कि कई विचारधारा के नेता हैं। इस पर नीतीश ने कांग्रेस पर हमलावर होते हुए कहा था कि सिद्धांत हम नहीं, आप बदलते रहते हैं। कांग्रेस ने आजादी के बाद सबसे पहले गांधी और बाद में नेहरू के सिद्धांतों को तिलांजलि दी। ऐसे में आजाद का इस कदर यू-टर्न लेना मायने रखता है। स्पष्ट है कि वे नीतीश की नाराजगी दूर करने की कोशिश में लगे हैं।

इन सारे घटनाक्रम के बीच विपक्ष ने उपराष्ट्रपति पद के लिए भी अपना उम्मीदवार उतारने की योजना बनाई है। आगामी 11 जुलाई को संसद भवन की लाइब्रेरी बिल्डिंग में एक बार फिर पूरे विपक्ष के जुटने के आसार हैं। इसमें जेडीयू के शामिल होने की बाबत पूछे जाने पर पार्टी के प्रधान महासचिव केसी त्यागी ने कहा कि विपक्षी दलों द्वारा उनकी पार्टी को आमंत्रित किया जाता है तो निश्चित तौर पर हम उसमें भाग लेंगे। सूत्रों के मुताबिक उस दिन कांग्रेस उपाध्यक्ष अलग से नीतीश कुमार से मुलाकात कर सकते हैं। कहने की जरूरत नहीं कि राहुल उपराष्ट्रपति चुनाव में नीतीश के साथ की सांकेतिक और व्यावहारिक जरूरत अच्छी तरह समझते हैं और इस पूरे प्रकरण में उन्होंने जो परिपक्वता दिखाई है, वो सचमुच काबिलेतारिफ है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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अमेरिका और भारत दोनों के इतिहास में अहम है 4 जुलाई

4 जुलाई कहने को एक तारीख है, लेकिन इतिहास के पन्नों में इस दिन की अहमियत किस कदर है, यह जानकर चौंक जाएंगे आप। जी हां, यही वो दिन है जिसके बाद अमेरिका और भारत दोनों देशों की किस्मत बदल गई। दरअसल, ये दिन दोनों ही देशों की आज़ादी से जुड़ा है।

पहले बात अमेरिका की। वर्तमान पीढ़ी के लिए शायद सोचना भी कठिन हो, लेकिन सच है कि आज दुनिया का सबसे ताकतवर देश कहलाने वाला अमेरिका भी कभी गुलाम था और 1776 में 4 जुलाई को ही आजाद हुआ और जॉर्ज वाशिंगटन देश के पहले राष्ट्रपति बने। इस तरह अमेरिका को आज़ाद हुए पूरे 241 साल हो चुके हैं। बता दें कि अमेरिका के विश्वप्रसिद्ध स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी, जिसे 1876 में उसे फ्रांस ने तोहफे के रूप में दी थी, पर अमेरिका की स्वतंत्रता की तिथि 4 जुलाई 1776 ही अंकित है।

अब बात भारत की। जैसा कि सब जानते हैं, भारतीय स्वतंत्रता के इतिहास में 15 अगस्त और 26 जुलाई मील के पत्थर हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि इसी तरह 4 जुलाई का दिन भी भारत की स्वतंत्रता के लिए बेहद खास है। दरअसल 1947 में इसी दिन ब्रिटिश पार्लियामेंट के सामने भारत की स्वतंत्रता से संबंधित बिल का प्रस्ताव रखा गया था। और इसी बिल के तहत देश का भारत ओर पाकिस्तान के रूप में बंटवारा हुआ था।

4 जुलाई की बात चल ही रही है तो यह हमें यह भी जानना चाहिए कि 1963 में आज ही के दिन पिंगली वेंकैय्या, जिन्हें भारत का राष्ट्रध्वज बनाने का श्रेय दिया जाता है, का निधन हुआ था। और चलते-चलते यह भी जानें कि आज ही के दिन स्वामी विवेकानंद की भी पुण्यतिथि है। अध्यात्म की दुनिया को अपनी अप्रतिम आभा से जगमग कर देने वाले युवाओं के इस सबसे बड़े ‘आईकॉन’ ने 1902 में आज ही के दिन अंतिम सांस ली थी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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10वीं-12वीं के छात्रों के लिए किताब लिख रहे मोदी सर

फेसबुक और ट्विटर पर अपनी जबरदस्त सक्रियता और रेडियो पर ‘मन की बात’ जैसे कार्यक्रम से युवाओं की दिनचर्या में उतर चुके प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अब उनसे एकदम अनोखे तरीके से संवाद करते दिखेंगे। जी हां, प्रधानमंत्री मोदी बहुत जल्द अपने युवा मित्रों से किताब के माध्यम से मुखातिब होंगे। खास बात यह कि पेंग्विन इंडिया से छपने जा रही यह किताब पूरी तरह इंटरएक्टिव होगी और इसे पढ़ने वाले युवा सीधे प्रधानमंत्री से संवाद कायम कर सकेंगे। हालांकि अभी यह स्पष्ट नहीं है कि प्रधानमंत्री से जुड़ने का स्वरूप कैसा होगा।

10वीं और 12वीं के छात्रों को विशेष रूप से ध्यान में रखकर लिखी जा रही इस किताब में प्रधानमंत्री परीक्षा के तनाव को दूर करने, चित्त शांत रखने और परीक्षा के बाद किए जाने वाले कामों के बारे में बताएंगे। इसमें छात्रों से जुड़े कई आयामों पर प्रकाश डाला जाएगा जो विशेष तौर पर 10वीं और 12वीं की परीक्षा के संदर्भ में अहम होगा। कुल मिलाकर इस किताब का सार यह होगा कि अंक के ऊपर ज्ञान को क्यों महत्व दिया जाय और भविष्य में अपनी जिम्मेदारियों के वहन कैसे किया जाय।

बता दें कि इस किताब को लिखने का विचार प्रधानमंत्री का अपना है। दरअसल इस साल परीक्षाओं के दौरान उनका रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ पूरी तरह छात्रों पर केन्द्रित था। इस कार्यक्रम को मिली अपार सफलता और उसके बाद छात्रों ने जिस तरह सीधे उन्हें पत्र लिखे, वही इस विषय पर किताब लिखने की प्रेरणा और कारण बना। माना जा रहा है कि किताब इसी साल बाज़ार में आ जाएगी। चलते-चलते बता दें कि अभी तक भारत के किसी प्रधानमंत्री ने पद पर रहते हुए बच्चों के लिए किताब नहीं लिखी है। निश्चित तौर पर प्रधानमंत्री मोदी इसके लिए साधुवाद के पात्र हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश ने कहा, मुझको लेकर कयास लगाना बंद करें

बिहार के मुख्यमंत्री व जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार ने कहा कि मेरे लिए कई तरह के कयास लगाए जा रहे हैं। कुछ लोग कहते हैं कि लालू के दबाव में काम कर रहे हैं तो कुछ कहते हैं कि भाजपा के साथ चले जाएंगे। लेकिन ये सब बकवास है। रविवार को राजधानी स्थित जेडीयू कार्यालय में आयोजित प्रदेश कार्यकारिणी की महत्वपूर्ण बैठक में नीतीश ने कहा कि मैं बिहार में ही राजनीति करुंगा। बिहार के विकास के लिए काम करुंगा।

कार्यकारिणी की बैठक में राष्ट्रपति व उपराष्ट्रपति चुनाव, महागठबंधन व सरकार से संबंधित तमाम महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा हुई। राष्ट्रपति चुनाव में जेडीयू द्वारा रामनाथ कोविंद को समर्थन की घोषणा के बाद जिस तरह लालू और कांग्रेस से नीतीश की बढ़ती ‘तल्खी’ और एनडीए से ‘मधुर’ होते संबंध की ख़बरें आ रही थीं, उस पर विराम लगाते हुए नीतीश ने कार्यकर्ताओं से संगठन की मजबूती के लिए काम करने को कहा। कार्यकर्ताओं से उन्होंने कहा कि संगठन ही आपकी पहचान है। संगठन की मजबूती की बदौलत ही आज भाजपा देश की सत्ता पर काबिज है।

कार्यकर्ताओं से संगठन को मजबूत करने का आह्वान करते हुए नीतीश ने कहा कि आपलोगों की सबसे पहली प्राथमिकता यह है कि संगठन का अधिक से अधिक विस्तार किया जाए और लोगों को इससे जोड़ा जाए। बैठक में पिछले वर्ष 5 जून को आरंभ हुए सदस्यता अभियान की समीक्षा भी की गई। बता दें कि पार्टी ने 50 लाख प्राथमिक एवं 2 लाख सक्रिय सदस्य बनाने का लक्ष्य रखा है।

इस बैठक में दहेज प्रथा और बाल विवाह के खिलाफ शुरू हुई सरकार की मुहिम में जेडीयू के भागीदार बनने की रणनीति भी बनी। बिहार के राजनीतिक समीकरण के लिहाज से अत्यंत संवेदनशील इस बैठक में पार्टी प्रमुख के अलावे प्रदेश अध्यक्ष बशिष्ठ नारायण सिंह, आरसीपी सिंह, राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह, श्याम रजक, मौलाना गुलाम रसूल बलियावी आदि प्रमुख रूप से मौजूद रहे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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1 जुलाई से बदल जाएगी आपकी दुनिया, जानिए कैसे

1 जुलाई 2017 से आपकी दुनिया वो नहीं रहेगी जो 30 जून तक होगी। ये दिन सभी भारतीयों के जीवन में एक साथ कई बदलावों को लेकर आने वाला है। आप शायद सोच रहे होंगे कि यहां जीएसटी से जुड़ी कोई बात कही जा रही होगी क्योंकि यह नया इनडायरेक्ट टैक्स सिस्टम 1 जुलाई से लागू होने जा रहा है और आजकल हर जगह इसी की चर्चा हो रही है। इसमें कोई दो राय नहीं कि जीएसटी हमारे जीवन में कई बदलावों का वाहक बनकर आ रहा है, लेकिन सच यह है कि 1 जुलाई के पिटारे में जीएसटी के साथ-साथ बदलावों की पूरी फेहरिस्त है। चलिए डालते हैं उन बदलावों पर एक नज़र।

सबसे पहले 1 जुलाई से आधार को लेकर होने वाले अहम बदलाव। बता दें कि सरकार ने आयकर रिटर्न के लिए अब आधार को अनिवार्य कर दिया है। आधार के बिना 1 जुलाई के बाद आप अपना रिटर्न फाईल नहीं कर पाएंगे। यही नहीं, सरकार ने टैक्स बचाने के लिए एक साथ कई पैन कार्ड का इस्तेमाल करने वाले लोगों पर शिकंजा कसने के लिए पैन को भी आधार से जोड़ना अनिवार्य कर दिया है। आधार के बिना अब आप नए पैन कार्ड के लिए आवेदन भी नहीं कर पाएंगे। और तो और आधार के बिना 1 जुलाई से आपका पासपोर्ट भी नहीं बनेगा। इन सबके साथ-साथ 1 जुलाई से छात्रों का स्कॉलरशिप हो, जनवितरण प्रणाली हो या आपका पीएफ खाता, आधार हर जगह जरूरी होगा।

1 जुलाई से भारतीय रेल भी अपने कई नियमों में बदलाव करने जा रही है। अच्छी बात यह कि ये सभी बदलाव आपको राहत देंगे। मसलन, 1 जुलाई से तत्काल टिकट कैंसिल कराने पर 50 फीसदी रिफंड भी मिलेगा, जो अब तक नहीं मिलता था। 1 जुलाई से तत्काल टिकटों की बुकिंग का समय भी बदल जाएगा। अब सुबह 10 से 11 बजे तक एसी कोच के लिए और 11 से 12 बजे तक स्लीपर कोच के लिए तत्काल टिकट की बुकिंग होगी। 1 जुलाई से रेल मंत्रालय राजधानी, शताब्दी, दुरंतो और मेल-एक्सप्रेस की तर्ज पर सुविधा ट्रेन चलाएगा, जिसमें यात्रियों को कन्फर्म टिकट की सुविधा दी जाएगी और वेटिंग लिस्ट का झंझट खत्म हो जाएगा। सुविधा ट्रेनों के टिकट को कैंसिल कराने पर भी आधा पैसा मिलेगा और कोच के हिसाब से चार्ज होगा। एक और बड़ा परिवर्तन यह कि 1 जुलाई से राजधानी और शताब्दी ट्रेनों में केवल मोबाईल टिकट ही वैद्य होगा।

1 जुलाई से भारतीय यात्रियों को विदेश यात्रा के लिए डिपार्चर फॉर्म भरने की आवश्यकता नहीं होगी। सरकार ने इमीग्रेशन प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए यह कदम उठाया है।

1 जुलाई से ही प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी चार्टर्ड अकाउंटेंट्स के लिए एक नए पाठ्यक्रम को लॉन्च करेंगे, जो कि अंतर्राष्ट्रीय एडुकेशन स्टैंडर्ड के अनुरूप होगा। इसमें नए टैक्सेशन सिस्टम जीएसटी को भी शामिल किया गया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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ओबामा ही नहीं ट्रंप के अमेरिका में भी छा गए मोदी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का अमेरिका दौरा संपन्न हुआ। उनके इस दौरे पर करोड़ों भारतवासियों समेत पूरी दुनिया की निगाहें टिकी थीं। इसका पहला कारण यह था कि डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद यह अमेरिका का उनका पहला दौरा था और ट्रंप अपने स्वभाव और शैली में ओबामा से कितने अलग हैं, ये छिपी बात नहीं। दूसरा, चीन द्वारा अपनी बढ़ती महत्वाकांक्षाओं के कारण पाकिस्तान को शह देने और इस कारण पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद में हो रहे इजाफे के मद्देनज़र भारत-अमेरिका संबंधों और आपसी हितों को नए सिरे से परिभाषित करना बेहद जरूरी था। इन दोनों ही कसौटियों पर मोदी की यह यात्रा अत्यंत सफल कही जाएगी। हालांकि एच-1 बी वीजा और पेरिस जलवायु समझौता जैसे मुद्दे भी थे, लेकिन इस यात्रा में इन पर बात संभव न हो सकी।

कहना गलत न होगा कि मोदी-ट्रंप की इस मुलाकात से भारत और अमेरिका के आपसी संबंधों को और मजबूती मिली। इस मुलाकात में सबसे ज्यादा आतंकवाद का मुद्दा छाया रहा। दोनों देशों ने आतंकवाद के खिलाफ मिलकर लड़ने की प्रतिबद्धता जताते हुए पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद पर कड़े तेवर दिखाए। अपने साझा बयान में दोनों देशों ने पाकिस्तान से कहा कि वह अपनी जमीन का इस्तेमाल आतंकवाद को प्रश्रय देने के लिए न करे। यही नहीं, दोनों देशों ने पाकिस्तान को अपनी जमीन पर सक्रिय आतंकी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई सुनिश्चित करने को भी कहा। साथ ही, भारत पर हुए 26/11 के आतंकी हमलों और पठानकोट एयरबेस पर हुए अटैक में शामिल आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई तेज करने की हिदायत भी पाकिस्तान को दी गई।

आतंकवाद के अलावे मोदी और ट्रंप के बीच व्यापार, सुरक्षा, द्विपक्षीय सहयोग और अफगानिस्तान में स्थिरता कायम करने के प्रयासों पर भी बातचीत हुई। इसके अलावा ट्रंप ने जीएसटी की तारीफ करते हुए इसे भारत का सबसे बड़ा टैक्स सुधार बताया। उन्होंने भ्रष्टाचार से लड़ने के मोदी सरकार के प्रयासों की भी तारीफ की। साथ ही उन्होंने माना कि भारत-अमेरिका के संबंध इतने मधुर कभी नहीं थे। इससे पहले मोदी का स्वागत करते हुए ट्रंप ने कहा कि “दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के नेता का व्हाइट हाउस में स्वागत करना सम्मान की बात है।“

चलते-चलते सारी बातों का सार यह कि अपने साझा बयान में ट्रंप ने जहां इस बात का खास तौर पर उल्लेख किया कि भारत और अमेरिका के संविधान के पहले तीन शब्द – ‘We the People’ – एक जैसे हैं और इसमें जोड़ा कि प्रधानंमत्री मोदी और मैं इन शब्दों का महत्व बहुत अच्छी तरह जानते हैं, वहीं प्रधानमंत्री मोदी अमेरिका के नए राष्ट्रपति को आज के संदर्भ में यह एहसास कराने में सफल रहे कि “न्यू इंडिया और मेक अमेरिका ग्रेट अगेन एक जैसे हैं।”

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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