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अपने नाम को दें मंगल का मुकाम

इंसानी इच्छा और महत्वाकांक्षा का सचमुच कोई अंत नहीं। इंसान सशरीर भले ही हर जगह न जा पाए, लेकिन उसके मन को कहीं जाने से कोई कैसे रोक सकता है? हममें से हर कोई हर उस जगह पर अपनी या अपने नाम की मौजूदगी चाहता है जहां उसकी कल्पनाशक्ति सुकून पाती हो। यहां तक कि स्कूल-कॉलेज के बेंचो पर, ट्रेन के डिब्बों पर, ऐतिहासिक ईमारतों पर, पुराने पेड़ों पर और यहां तक कि पहाड़ों तक पर हममें से कई अपना नाम किसी नुकीली चीज से खुरचकर या घिसकर लिखने की कोशिश करते हैं। जीवन के एक-एक पल को जीने की ख्वाहिश कुछ ऐसी होती है कि समुद्र के किनारे बैठकर उस रेत तक पर हम अपना लिखते हैं जिसको अगले ही पल लहरों से मिल जाना होता है। जरा सोचिए, हमारी ख्वाहिशों की इस सूची में अगर मंगल ग्रह भी शामिल हो जाए तो क्या हो?

जी हां, चौंकिए नहीं। अगर आप मंगल ग्रह पर अपना नाम भेजने की ख्वाहिश रखते हैं तो आपके पास एक शानदार मौका है। यह जिम्मा अंतरिक्ष की दुनिया में अपनी पहचान और धाक रखने वाले नासा ने लिया है। दरअसल, नासा अगले साल लाल ग्रह पर पर इनसाइट लैंडर स्पेसक्राफ्ट को लॉन्च करने जा रहा है। यह स्पेसक्राफ्ट कुछ ऐसी चीजों का पता लगाने के लिए भेजा जा रहा है, जिनसे हम अब तक अनजान हैं। आप चाहें तो इसी स्पेसक्राफ्ट के जरिए अपने नाम को मंगल तक पहुंचा सकते हैं। इसके लिए बस आपको रजिस्ट्रेशन कराना होगा।

वैसे यह कोई पहली बार नहीं है जब नासा की ओर से मंगल पर नाम भेजने का मौका उपलब्ध कराया जा रहा है। इससे पूर्व साल 2015 में भी ऐसा हो चुका है। तब स्पेस एजेंसी ने एक सिलिकन चिप पर अपना नाम लिखने के लिए दुनिया भर से लोगों को आमंत्रित किया था। इन सभी नामों को इनसाइट मार्स लैंडर स्पेसक्राफ्ट के साथ जोडा जाएगा।

आपको जानकर हैरत होगी कि 8,27,000 लाख लोग पहले ही अपना नाम लिखने की अर्जी दे चुके हैं। नासा अब दूसरी माइक्रोचिप जोड़ने जा रहा है, जिसके जरिए अपने नाम मंगल पर भेजने का एक और मौका हर आम और खास को दिया जा रहा है।

बता दें कि नासा की तरफ से इनसाइट लैंडर को अगले साल मई में लॉन्च किया जाएगा। इसी के साथ एक सिलिकॉन चिप पर हजारों लोगों के नाम लिखकर भेजे जाएंगे। पहली चिप भर चुकी है, जबकि दूसरी चिप के लिए नासा ने नाम लिखने के लिए रजिस्ट्रेशन शुरू कर दिए गए हैं। अगर आप भी अपने नाम को मंगल का मुकाम देना चाहते हैं, तो 1 नवंबर से पहले आप भी इसमें रजिस्ट्रेशन करा सकते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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यही ‘भीड़’ आप जैसों को नेता बनाती है, चौबेजी !

बिहार से बाहर बड़े शहरों में रोजगार के लिए जाकर बसने वाले बिहारियों के लिए ‘बिहारी’ संबोधन का प्रयोग कई बार उन्हें ‘देहाती’, ‘असभ्य’ या ‘विकास के दौर में पिछड़ा’ जताने और बताने के लिए किया जाता है। हालांकि इधर कुछ वर्षों में यह प्रवृत्ति कम हुई है। लेकिन जब बिहार का प्रतिनिधित्व करने वाले, जिनके कंधों पर राज्य के गौरव का भार होता है, इस संबोधन का अमर्यादित प्रयोग करें तो क्या कहेंगे आप? जी हां, केन्द्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री अश्विनी चौबे ने कुछ ऐसा ही कर दिया है। मोदी कैबिनेट में स्वास्थ्य राज्यमंत्री चौबे ने खुली सभा में कहा कि बिहार के लोगों से एम्स में भीड़ बढ़ रही है। स्वाभाविक है कि ऐसे बयान के बाद उनकी आलोचना हो और सियासत का पारा गर्म हो जाए। राजद और कांग्रेस इस बयान के लिए चौबे से बिहार के लोगों से माफी मांगने को कह रहे हैं, तो जेडीयू उन्हें ऐसे बयानों से बचने की सलाह दे रही है।

बता दें कि केन्द्रीय मंत्री और बक्सर से सांसद अश्विनी चौबे ने यह बात एक कार्यक्रम में कही जब बिहार के लोगों पर चर्चा हो रही थी। उन्होंने कहा था कि बिहार के लोगों की वजह से दिल्ली के एम्स में भीड़ बढ़ गई है। बिहार के लोग छोटी सी बीमारी को लेकर भी एम्स पहुंच जाते हैं।

इस बयान के मीडिया में आने के बाद आरजेडी के उपाध्यक्ष शिवानंद तिवारी ने सोमवार को कहा कि सत्ता में बैठे लोग सत्ता के नशे में मदहोश हो गए हैं। लोगों को यह अधिकार है कि वह कहीं भी इलाज करा सकें। चौबे का यह बयान संविधान के खिलाफ है और उन्हें मंत्रिमंडल से बाहर निकाल देना चाहिए।

आरजेडी के प्रवक्ता शक्ति सिंह यादव ने इस बयान पर अपनी प्रतिक्रिया में अश्विनी चौबे को मानसिक रूप से कमजारे बताते हुए कहा कि बीजेपी ने हमेशा ही बिहार और बिहार के लोगों का अपमान किया है। इस बयान के लिए चौबे और बीजेपी को बिहार के लोगों से माफी मांगनी चाहिए। कांग्रेस नेता प्रेमचंद्र मिश्रा ने प्रधानमंत्री से ऐसे मंत्री को तत्काल बर्खास्त करने की मांग की है।

इस बीच जेडीयू के प्रवक्ता नीरज कुमार ने चौबे को ऐसे बयानों से बचने की नसीहत देते हुए कहा कि दिल्ली के एम्स में बिहार के ही ज्यादा चिकित्सक हैं। बिहार के लोग हर जगह हैं, ऐसे में बिहार के लोग कहीं भी इलाज कराने जा सकते हैं। हालांकि उन्होंने चौबे का बचाव करते हुए यह भी कहा कि मंत्री के बयान को इस तरह से लेना चाहिए कि बिहार में कई बीमारियों के इलाज की समुचित व्यवस्था होने के बावजूद भी लोग दिल्ली इलाज कराने जाते हैं, जिससे यहां के लोगों को बचना चाहिए। उधर वरिष्ठ भाजपा नेता व बिहार के उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी ने भी स्वाभाविक तौर पर उनका बचाव किया और कहा कि उनका मकसद पटना एम्स को बेहतर करने से था। यदि पटना में ही सारी सुविधाएं मिलने लगेगी तो लोगों को बाहर जाने की जरूरत ही नहीं होगी।

अब चौबे ने यह बयान चाहे जिस भाव से दिया हो, यहां की जनता को ‘भीड़’ कहने की भूल तो उनसे हो ही गई है। उन जैसे नेता भला ये कैसे भूल सकते हैं कि यही ‘भीड़’ उन्हें ‘भीड़’ से बाहर निकालकर नेता बनाती है, उन्हें सारे पद और अधिकार दिलाती है और बदले में बस थोड़ा-सा सम्मान चाहती है। हद तो तब हो जाती है जब वही नेता उन्हें भीड़ बताने तक से गुरेज नहीं करते..!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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राय के बड़े बोल, नए उत्साह में भाजपा

बिहार भाजपा प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के बाद भाजपा नए उत्साह में दिख रही है। बैठक के समापन के बाद पत्रकारों से बातचीत में प्रदेश अध्यक्ष नित्यानंद राय ने दावा किया कि लोकसभा चुनाव में आरजेडी का सूपड़ा साफ हो जाएगा। 2019 में लालू प्रसाद यादव की पार्टी आरजेडी एक सीट भी नहीं जीत पाएगी।

गौरतलब है कि 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने लोजपा, रालोसपा और हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा के साथ मिलकर बिहार की 40 में से 31 सीटें जीत ली थीं जबकि तब जेडीयू ने अकेले चुनाव लड़ा था। इस बार नीतीश कुमार भाजपा के साथ हैं। राय ने लालू पर सीधा प्रहार करते हुए कहा कि भ्रष्टाचार, झूठ, पिछड़ों की पीठ में छूरा मारने वाले और केंद्र में मंत्री तथा मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए बेनामी संपत्ति इकठ्ठा करने वाले आज ‘सत्यमेव जयते’ ट्वीट कर रहे हैं।
इस मौके पर राय ने पिछडा वर्ग आयोग के पुनर्गठन करने के लिये पीएम नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की तारीफ की। राय ने कहा कि यह पिछड़ों को अधिक भागीदारी सुनिश्चित कराने की ओर एक बडा कदम है। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री ने पिछड़ा वर्ग में क्रीमीलेयर की सीमा 6 लाख से बढ़ाकर 8 लाख तक की। साथ ही पहली बार पिछडा वर्ग आयोग को संवैधानिक दर्जा दिलाने के लिये 123वां संविधान संशोधन लाकर साबित किया है कि पिछडों की शुभचिंतक भाजपा ही है।

चलते-चलते बता दें कि भाजपा ने कई दावेदारों के होने के बावजूद अप्रत्याशित रूप से प्रदेश भाजपा की कमान नित्यानंद राय को दी थी। राय को इतनी अहम जिम्मेदारी देने के मूल में स्पष्ट रणनीति थी कि उनकी मदद से भाजपा यादव वोटबैंक में सेंध लगा सकेगी। हालांकि अध्यक्ष बनाए जाने के बाद से अब तक राय ने तीखे तेवर नहीं अपनाए थे, लेकिन प्रदेश कार्यसमिति की बैठक के बाद वे अलग अंदाज में दिखे। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा ने 2019 की तैयारी अभी से शुरू कर दी है।

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उच्च शिक्षा में अब जर्मनी और जापान से आगे हैं भारतीय महिलाएं

इस बात पर दुनिया भर के विचारक और समाजशास्त्री अब एकमत हैं कि महिलाओं को मुख्य धारा में लाए बिना और उन्हें हर क्षेत्र में बराबरी का दर्जा दिए बिना हम विकास की मुकम्मल परिभाषा नहीं गढ़ सकते। और यह बात भी शीशे की तरह साफ है कि विकास का रास्ता शिक्षा से होकर गुजरता है। इसलिए यह जानना जरूरी है कि इस दिशा में हम और हमारी दुनिया कहां है। 35 देशों के संगठन आर्गनाइजेशन फॉर इकोनोमिक कोऑपरेशन एंड डेवलपमेंट (ओईसीडी) की लिंगभेद संबंधी हालिया वैश्विक रिपोर्ट इस पर पर्याप्त रोशनी डालती है।

ओईसीडी के अनुसार भारत समेत दुनिया भर के विकसित और बड़े विकासशील देशों में उच्च शिक्षा में महिलाओं की हिस्सेदारी बढ़ी है ओईसीडी की इस रिपोर्ट के अनुसार भारतीय महिलाएं उच्च शिक्षा में जर्मनी और जापान की महिलाओं से आगे निकल गई हैं। हालांकि 35 देशों (दुनिया के सबसे विकसित और बड़े विकासशील देशों) की सूची में चीन समेत 22 देशों की महिलाएं भारत से आगे हैं।

शिक्षा में महिलाओं की ज्यादा भागीदारी वाले पांच देशों की बात करें तो वे हैं- स्वीडन (69.1%) कोस्टा रिका (63.7%), स्लोवाक गणराज्य (63.5%), नार्वे (63.2%) और लातविया (63%)। वहीं, स्नातक में महिलाओं की हिस्सेदारी देखें तो वहां भले ही भारत (49.4%) चीन (51.5) से पीछे हो, लेकिन स्विट्जरलैंड (48.8), जर्मनी (48.5) और जापान (45.4) को उसने पीछे छोड़ दिया है।

ओईसीडी की रिपोर्ट नौकरी में महिलाओं के साथ बरते जा रहे लिंगभेद  को भी उजागर करती है। इस दिशा में भारत की स्थिति अत्यंत दयनीय है। आपको हैरानी होगी कि भारत के कार्यबल में 52.9 प्रतिशत जेंडर गैप है, जो दुनिया में सबसे बदतर स्थिति है। वहीं, फिनलैंड में जेंडर के आधार पर कार्यबल में सबसे कम यानि 3 प्रतिशत अंतर है। प्रबंधन स्तर की नौकरियों की बात करें तो इस स्तर पर भारत में 14.5 प्रतिशत महिलाओं की हिस्सेदारी है, जबकि मध्यम आय वाली नौकरियों में जेंडर गैप 56 प्रतिशत का है।

नौकरी में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए हालांकि भारत में भी कोशिशें की जा रही हैं, लेकिन इस क्षेत्र में अभी लंबा सफर तय करना है। विश्व-पटल पर देखें तो ऑस्ट्रिया, बेल्जियम, फ्रांस, जर्मनी, ग्रीस, आइसलैंड, इटली, इजरायल और नॉर्वे जैसे देशों ने निजी व सरकारी नौकरियों में महिलाओं को अलग कोटा देने का प्रावधान कर रखा है। हमें भी इस दिशा ठोस कदम उठाने होंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप    

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शराबबंदी के बाद बाल विवाह और दहेज के विरुद्ध शंखनाद

राष्ट्रपिता महात्मा गांधी की 148वीं जयंती के मौके पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने बाल विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ एक बड़े अभियान का शंखनाद किया। बिहार में शराबबंदी को सख्ती से लागू करने के बाद नीतीश ने समाज को घुन की तरह खा रही इन दो कुरीतियों पर जिस तरह चोट की है, वह उन्हें राजनेताओं की भीड़ में निश्चित तौर पर एक अलग स्थान का हकदार बनाती है। देखा जाय तो बापू को इससे बड़ी श्रद्धांजलि हो भी क्या सकती थी!

गौरतलब है कि बाल विवाह के खिलाफ कड़े कानून होने के बावजूद यह बिहार में काफी प्रचलित है। खासकर राज्य के ग्रामीण इलाकों में यह कुप्रथा बहुत बड़े स्तर पर फैली हुई है। आंकड़ों की मानें तो कुछ वर्ष पहले तक बिहार में होने वाले कुल विवाह में से करीब 69 प्रतिशत बाल विवाह होते थे। हालांकि हाल ही में हुए राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य संरक्षण-4 में खुलासा हुआ है कि लड़कियों की शिक्षा पर जोर देने के कारण पिछले 10 सालों में यह आंकड़ा घटा है। फिर भी इस कुरीति को जड़ से उखाड़ फेंकने के लिए अभी काफी कुछ किए जाने की जरूरत थी। जहां तक दहेज प्रथा का प्रश्न है, उसके लिए तो आंकड़ों की भी जरूरत नहीं। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो बिहार क्या देश भर में शायद ही कोई माता-पिता हों जिन्हें दहेज के अजगर ने डंसा न हो। हर साल हजारों बेटियां दहेज के कारण न जाने कितने अत्याचार सहती हैं, उनमें से कई तो जिन्दा जला दी जाती हैं। ऐसे में बिहार में इन दोनों कुरीतियों के विरुद्ध शुरू की गई ये पहल निश्चित तौर बदलाव की ओर बढ़ाया गया एक बड़ा कदम है।

सोमवार को राजधानी पटना स्थित गांधी मैदान के समीप नवनिर्मित बापू सभागार से महाअभियान का आगाज करते हुए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने लोगों को शपथ दिलाई कि बिहार को बाल विवाह और दहेज प्रथा जैसी कुरीतियों से मुक्त कराने की प्रतिज्ञा लें। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों से अपील की कि इस अभियान को राजनीतिक चश्मे से न देखें। राजनीति अपनी जगह पर है और वह होती रहेगी। यह सामाजिक अभियान है। इस अभियान में पूरी एकजुटता से शामिल हों। उन्होंने ऐलान किया कि अगले वर्ष 21 जनवरी को बाल विवाह और दहेज विरोधी अभियान के समर्थन में पूरे प्रदेश में मानव श्रृंखला का आयोजन किया जाएगा।

मुख्यमंत्री ने कहा कि बाल विवाह और दहेज प्रथा के खिलाफ कानून काफी पहले से है। उसका हम मुस्तैदी से अनुपालन कराएंगे लेकिन इसके लिए जनभावना का साथ होना भी जरूरी है। उन्होंने लोगों के साथ पर भरोसा जताते हुए कहा कि इसकी बदौलत बहुत जल्द बिहार की तस्वीर बदलेगी और हम देश और दुनिया के लिए उदाहरण बन सकेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सत्यपाल मलिक बिहार के नए राज्यपाल, गंगा प्रसाद को मिला मेघालय

विजया दशमी के दिन पांच राज्यों को नए राज्यपाल मिले। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने इस दिन बिहार, तमिलनाडु, असम, अरुणाचल प्रदेश और मेघालय के राज्यपाल एवं अंडमान और निकोबार के उपराज्यपाल की नियुक्ति की। भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष रहे सत्यपाल मलिक बिहार के नए राज्यपाल होंगे, जबकि बनवारी लाल पुरोहित को तमिलनाडु जगदीश मुखी को असम और ब्रिगेडियर (सेवानिवृत्त) बीडी मिश्रा को अरुणाचल प्रदेश का राज्यपाल बनाया गया है। वहीं बिहार का राज्यपाल रहते हुए राष्ट्रपति के पद तक पहुंचने वाले कोविंद ने इन नियुक्तियों में बिहार का विशेष ख्याल रखते हुए बिहार भाजपा के पुराने नेता गंगा प्रसाद चौरसिया को मेघालय का राज्यपाल नियुक्त किया है। इन पांच राज्यों के राज्यपाल के अतिरिक्त केन्द्रशासित अंडमान और निकोबार के उपराज्यपाल के तौर पर राष्ट्रपति ने एडमिरल (सेवानिवृत्त) देवेन्द्र कुमार जोशी को मौका दिया है।

गौरतलब है कि बिहार के राज्यपाल रामनाथ कोविंद के राष्ट्रपति बनने के बाद से ही यहां राज्यपाल का पद रिक्त था। कोविंद के राष्ट्रपति बनने के बाद पश्चिम बंगाल के राज्यपाल केशरी नाथ त्रिपाठी को बिहार का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। नए राज्यपाल सत्यपाल मलिक इससे पूर्व केन्द्रीय संसदीय और पर्यटन राज्यमंत्री की जिम्मेदारी निभा चुके हैं। बीएससी और एलएलबी की डिग्री लेने वाले मलिक 1980-84 और 1986-89 तक राज्यसभा के सांसद और 1989-90 में लोकसभा के सांसद रहे हैं।

उधर मेघालय के राज्यपाल बनाए गए गंगा प्रसाद चौरसिया शुरू से जनसंघ के सदस्य रहे हैं। 1994 में वे पहली बार बिहार विधान परिषद के सदस्य निर्वाचित हुए और कुल 18 सालों तक परिषद के सदस्य रहे। वे बिहार भाजपा के महामंत्री भी रह चुके हैं। इसके अलावा वे बिहार राज्य आर्य प्रतिनिधि सभा, बिहार राज्य खाद्यान्न व्यवसायी संघ. अखिल भारतीय वैश्य महासम्मेलन और अखिल भारतीय चौरसिया महासभा जैसे संगठनों में भी सक्रिय रहते आए हैं।

कुल मिलाकर इन नियुक्तियों में भाजपा ने अपने लोगों को ‘वफादारी’ का इनाम दिया है। सत्यपाल मलिक और गंगा प्रसाद चौरसिया की तरह ही दिल्ली भाजपा के जगदीश मुखी भी पार्टी के पुराने वफादार रहे हैं। इसी तरह अन्य लोगों की प्रतिबद्धता भी केन्द्रासीन भाजपा के प्रति असंदिग्ध है। देखा जाय तो केन्द्र की सत्ता पर काबिज पार्टी द्वारा इस तरह ‘मलाई’ का वितरण कोई नई बात नहीं। नया बस यह है कि राज्यपाल जैसे संवैधानिक पद के लिए (वैसे देश के प्रथम व्यक्ति का पद भी अपवाद नहीं) ‘राजनीतिक तौर पर छोटा कद’ होना अब लगभग अनिवार्य हो गया है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप  

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नीतीश ने क्यों की अपनी मृत्यु की बात ?

आज जबकि पार्टियां प्राईवेट लिमिटेड कंपनी की तरह चलाई जा रही हैं, ऐसे में किसी राजनीतिक पार्टी के शीर्ष नेता के परिवार से किसी का राजनीति में न रहना और उस नेता का अपने न रहने की स्थिति में पार्टी के अस्तित्व की चिन्ता करना सचमुच बड़ी बात है। ये चिन्ता बताती है कि वह नेता पद, पावर और परिवार के लिए नहीं, उन विचारों और मुद्दों के लिए परेशान है, जिसे अपनी पार्टी के माध्यम से वो मुकाम तक पहुंचाना चाहता है। यहां बात की जा रही है, बिहार के लोकप्रिय मुख्यमंत्री और जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष नीतीश कुमार की, जिन्होंने रविवार को हुई राज्य कार्यकारिणी की बैठक में यह कहकर सबको चौंका दिया कि “अगर कल को मेरी मृत्यु हो जाती है, तो पार्टी का क्या होगा?”

बैठक में मौजूद वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि अपने अब तक के राजनीतिक जीवन में नीतीश कुमार ने हजारों सभाएं और बैठकें की हैं, लेकिन यह पहला मौका है जब उन्होंने इस तरह की बात कही हो। जब इस बारे में नीतीश से पूछा गया कि उन्होंने ऐसा क्यों कहा तो उन्होंने जवाब दिया कि कौन जानता है कल क्या होगा? हालांकि आगे उन्होंने जोड़ा कि अरे ऐसे ही मुंह से निकल गया, कुछ खास नहीं।

यहां गौर करने की जरूरत है कि नीतीश कुमार हमेशा अपनी बातों को बड़े ही व्यावहारिक और तार्किक तरीके से रखने के लिए जाने जाते हैं। अब अगर उन्होंने अगर ऐसी चिन्ता जाहिर की है तो यह भी अकारण नहीं है। शायद वे ऐसा कहकर नेताओं और कार्यकर्ताओं को याद दिलाने चाहते हैं कि उन्होंने पार्टी के लिए कितनी मेहनत की है ताकि उसी अनुपात में पार्टी के बाकी लोग भी अपनी भूमिका निभाएं। अगर वो पार्टी के लोगों को जेडीयू की बुनियादी विचारधारा की याद दिलाने चाहते हैं, देश और समाज के लिए उनकी प्रतिबद्धता को एक नई धार देने चाहते हैं, अपने विचार का फैलाव अपने बाद भी चाहते हैं तो यह एक सच्चे और अच्छे नेता की निशानी है।

बहरहाल, राज्य कार्यकारिणी की बैठक में नीतीश ने कहा कि जब तक मैं जिन्दा हूं तब तक बिहार से शराबबंदी का निर्णय वापस नहीं लिया जा सकता। अगर किसी को मेरे निर्णय से समस्या है तो वह मुझे मार सकता है लेकिन मैं इस नियम को किसी सूरत में नहीं हटाऊंगा। यहां बता दें कि शराबबंदी के बाद नीतीश कुमार सामाजिक मुद्दों को लेकर बिहार में दो और बड़े दांव खेलने वाले हैं। 2 अक्टूबर को गांधी जयंती के मौके पर वे दहेज प्रथा और बाल विवाह को पूरी तरह बंद करने के लिए बड़े अभियान का श्रीगणेश करेंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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प्रधानमंत्री मोदी ने शुरू की ‘सौभाग्य योजना’

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सोमवार को ‘सौभाग्य योजना’ का शुभारंभ किया। इस योजना के तहत सरकार का लक्ष्य 31 मार्च 2019 तक बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, ओडिसा, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर के राज्यों में हर घर में बिजली पहुंचाना है। 16320 करोड़ की इस महत्वाकांक्षी योजना का स्लोगन है – “रोशन होगा हर घर, गांव हो या शहर”।

गौरतलब है कि इस योजना के तहत जिनका नाम सामाजिक-आर्थिक जनगणना में है, ऐसे लोगों को मुफ्त में बिजली कनेक्शन दिया जाएगा। जिनका नाम सामाजिक-आर्थिक जनगणना में शामिल नहीं है, उन्हें 500 रु. में बिजली कनेक्शन दिया जाएगा। ये 500 रु. 10 किश्तों में जमा कराए जा सकेंगे। इस योजना के तहत बिजली कनेक्शन के साथ ही एक सोलर पैक भी दिया जाएगा। इस सोलर पैक में पांच एलईडी बल्ब, एक बैट्री पावर बैंक, एक डीसी पावर प्लग और एक डीसी पंखा दिया जाएगा।

कहने की जरूरत नहीं कि इस योजना के बाद मिट्टी के तेल का विकल्प बिजली होगी। शैक्षणिक, स्वास्थ्य और संचार सेवा में सुधार होगा। जनता की सुरक्षा में भी इस योजना से सुधार होने की उम्मीद है। यही नहीं, इससे रोजगार के अवसर बढ़ेंगे और जीवन-स्तर में भी सुधार होगा। खासकर महिलाओं को रोज के कामों में बड़ी सहूलियत मिलेगी।

चलते-चलते बता दें कि प्रधानमंत्री मोदी ने नई दिल्ली में ‘सौभाग्य योजना’ का ऐलान करने के साथ ही दीनदयाल ऊर्जा भवन का उद्घाटन भी किया। इस अवसर पर केन्द्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान एवं ऊर्जा मंत्री आरके सिंह भी मौजूद थे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार की औद्योगिक राजधानी बनने की ओर अग्रसर मधेपुरा

राज्य की कमान नीतीश कुमार जैसे सक्षम हाथों में, केन्द्र की मोदी सरकार का भी भरपूर सहयोग और जिला में सभी विकास कार्यों के क्रियान्वयन के लिए मो. सोहैल जैसे सक्षम व तत्पर जिला पदाधिकारी, भला क्यों न हो मधेपुरा का विकास और क्यों न कल को बने मधेपुरा राज्य की औद्योगिक राजधानी। जी हां, मधेपुरा में रेल इंजन कारखाने के सफलतापूर्वक आकार ले लेने के बाद देश और दुनिया के कई बिजनेस टाइकून की निगाह मधेपुरा पर है।

अभी हाल ही में इन पंक्तियों के लेखक को मधेपुरा रेल इंजन कारखाने के एक वरिष्ठ फ्रांसीसी अधिकारी के साथ पटना से मधेपुरा की यात्रा करने का मौका मिला और बहुत करीब से देखने को मिली उस अधिकारी की आंखों में मधेपुरा से जुड़ी उम्मीद और यहां से उपजे विश्वास की चमक। कहना गलत न होगा कि वो दिन दूर नहीं जब मधेपुरा भारत और विश्व के मानचित्र पर अपना अलग वजूद रखेगा।

मधेपुरा को लेकर यह विश्वास अकारण या अतिउत्साहवश नहीं है। अब कल की ही खबर लीजिए। जापान की कंपनी ‘तायकिसा इंजीनियरिंग इंडिया प्राइवेट लिमिटेड’ के वरिष्ठ अधिकारियों की टीम लगभग 100 करोड़ के पूंजी निवेश का प्रस्ताव लेकर मधेपुरा पहुंची। मधेपुरा के विद्युत रेल इंजन कारखाने से बनकर निकलने वाले इंजन के लिए यह कंपनी पार्ट-पुर्जा बनाएगी। शनिवार को कंपनी के प्रबंध निदेशक युताका ओनोजोवा, वाइस प्रेसिडेंट एचएन मकवाना और जनरल मैनेजर सचिन क्षीरसागर मधेपुरा के डीएम मो. सोहैल से मिले और पूंजी निवेश के संबंध में प्रस्ताव रखा। बता दें कि यह कंपनी मधेपुरा में 13 तरह के पार्ट्स बनाएगी।

जापानी कंपनी तायकिसा के अधिकारियों ने मधेपुरा में पूंजी निवेश करने का प्रस्ताव देने के साथ-साथ मधेपुरा लोकोमोटिव विद्युत इंजन कारखाना परिसर और आसपास के क्षेत्र का दौरा किया। अभी इस बात का निर्णय होना है कि यह फैक्ट्री कारखाना परिसर के अदर लगेगी या बाहर लगाई जाएगी। हालांकि डीएम सोहैल ने तायकिसा के अधिकारियों का आश्वस्त किया कि कारखाना परिसर के बाहर भी अगर फैक्ट्री के लिए जमीन की आवश्यकता होगी तो उपलब्ध कराई जाएगी। यही नहीं, इसके अतिरिक्त अन्य सुविधाओं का ध्यान रखने में भी कोई कोताही नहीं बरती जाएगी।

कहने की जरूरत नहीं कि मधेपुरा अपने विकास का नया अध्याय लिख रहा है। इस बात की प्रबल संभावना है कि मधेपुरा में शीघ्र देश-विदेश की कई और कंपनियां निवेश का प्रस्ताव लेकर आएंगी। बस मधेपुरा यूं ही प्रगति का परचम फहराता रहे, बिहार और देश के विकास में अपनी भूमिका निभाता रहे!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बेनजीर के पति ने ही कराई थी उनकी हत्या..!

बेनजीर भुट्टो मर्डर केस में भगोड़ा घोषित हो चुके पाकिस्तान के पूर्व राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ ने एक सनसनीखेज खुलासा किया है। उनकी मानें तो भुट्टो परिवार के खात्मे के लिए कोई और नहीं बेनजीर के पति आसिफ अली जरदारी जिम्मेदार थे। बकौल मुशर्रफ, जरदारी बेनजीर व मुर्तजा भुट्टो की हत्या में शामिल रहे हैं। मुशर्रफ के मुताबिक, जब भी कोई हत्या होती है तो पहले यह देखा जाना जरूरी है कि इसका सबसे अधिक फायदा किसे होगा। उनके अनुसार बेनजीर की हत्या से सबसे अधिक फायदा पीपुल्स पार्टी ऑफ पाकिस्तान के नेता और उनके पति आसिफ अली जरदारी को हुआ।

गौरतलब है कि पाकिस्तान की पूर्व प्रधानमंत्री बेनजीर भुट्टो के मर्डर केस को लेकर अभी हाल ही में परवेज मुशर्रफ को भगोड़ा करार दिया गया है। ऐसे में अपनी सफाई (चाहे वो पूरा सच हो, आंशिक सच हो या फिर झूठ हो) देने के लिए मुशर्रफ ने सोशल मीडिया को अपना जरिया चुना। उन्होंने जरदारी के संबंध में तमाम बातें अपने फेसबुक पेज पर डाले गए एक विडियो में कहीं।

इस विडियो में खुद को बेगुनाह ठहराते हुए मुशर्रफ ने कहा कि इस मामले में मुझे सबकुछ खोना पड़ा। मैं सत्ता में था और इस हत्याकांड ने मेरी सरकार को कठिन परिस्थितियों में ला खड़ा किया। उन्होंने आगे कहा, केवल एक ही शख्स था जिसे बेनजीर की हत्या से केवल और केवल फायदा होना था और वह शख्स आसिफ अली जरदारी थे।

मुशर्रफ ने जरदारी को कटघरे में खड़ा करते हुए सवाल किया है कि वे पांच सालों तक सत्ता में थे, फिर भी उन्होंने इस मामले की जांच जैसी होनी चाहिए थी, नहीं कराई। ऐसा इसलिए कि वह स्वयं बेनजीर हत्याकांड में शामिल थे। मुशर्रफ के अनुसार सबूतों से साफ था कि बैतुल्ला मसूद और उसके लोग इस हत्याकांड में शामिल थे पर उन्हें ऐसा करने को किसने कहा था। मुशर्रफ ने कहा, वह शख्स मैं नहीं हो सकता क्योंकि वह ग्रुप मुझसे और मैं उनसे नफरत करता था।

बहरहाल, मुशर्रफ के आरोप सच हों तो जरदारी के लिहाज से और झूठ हों तो मुशर्रफ के लिहाज से, राजनीति के घिनौने चेहरे से हमें दोनों ही हाल में रू-ब-रू कराते हैं। संबंध, संवेदना, सिद्धांत, सच्चाई – क्या सियासत के आगे इनका सचमुच कोई अस्तित्व नहीं?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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