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मनोज वाजपेयी ने जीता एशिया पेसिफिक स्क्रीन अवार्ड

अपने संजीदा अभिनय से बॉलीवुड में बिहार को गौरवान्वित करने वाले अभिनेता मनोज वाजपेयी ने ‘एशिया पेसिफिक स्क्रीन अवार्ड्स’ (आप्सा) में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार हासिल किया। नवाजुद्दीन सिद्दीकी को इसी कैटेगरी में स्पेशल अवार्ड से सम्मानित किया गया। फिल्म उद्योग में सर्वोच्च सम्मान के तौर पर पहचाने जाने वाले इस पुरस्कार की घोषणा शुक्रवार रात ब्रिस्बेन में हुए एक समारोह के दौरान की गई। इस समारोह को ऑस्ट्रेलियाई अभिनेता डेविड वेल्हम ने होस्ट किया।

बता दें कि इस साल आप्सा का 10वां सीजन था। आप्सा सिनेमा के लिए सजग विश्व के 70 देशों का साझा मंच है और यह पुरस्कार इन देशों में सिनेमा की उत्कृष्टता और संस्कृति को बढ़ावा देने के लिए प्रदान किया जाता है। इसके आयोजन में इन सभी देशों की झलक एक साथ देखने को मिलती है। कहने की जरूरत नहीं कि इतने बड़े और विशिष्ट मंच पर ‘सर्वश्रेष्ठ’ कहलाना कितनी बड़ी उपलब्धि है।

मनोज वाजपेयी को यह पुरस्कार हंसल मेहता की फिल्म ‘अलीगढ़’ में निभाई उनकी प्रोफेसर सिरास की अविस्मरणीय भूमिका के लिए मिला। आप्सा में यह उनका दूसरा नॉमिनेशन था। इससे पहले 2012 में अनुराग कश्यप की फिल्म ‘गैंग्स ऑफ वासेपुर’ के लिए उन्हें नॉमिनेशन मिला था। नवाजुद्दीन को इस साल अनुराग कश्यप की ही फिल्म ‘रमन राघव 2.0’ के लिए स्पेशल अवार्ड मिला।

फिल्म अलीगढ़ में मनोज ने प्रोफेसर सिरास की भूमिका को इतना जीवंत कर दिया है कि दर्शक न केवल उनके किरदार से बंध जाता है बल्कि उसे जीने लग जाता है। आप्सा इंटरनेशनल के जूरी सदस्य जेन चैपमैन ने उनकी भूमिका के लिए कहा कि “यह बेहतरीन और दमदार अभिनय है। इसके मानवीय पक्ष और गहराई ने मुझे प्रभावित किया।” जूरी के एक अन्य सदस्य श्याम बेनेगल के शब्दों में “उन्होंने असाधारण और बेहतरीन अभिनय किया। हर छोटी बात को विस्तार और गहराई से दर्शाया गया है, जो अभिनय में नज़र आता है।”

गौरतलब है कि अप्रैल में मनोज को अलीगढ़ के लिए ही दादा साहब फाल्के पुरस्कार (क्रिटिक्स च्वाइस) के लिए चुना गया। यहाँ भी उन्होंने सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार अपने नाम किया। बिहार के इस लाल को ‘मधेपुरा अबतक’ की बधाई।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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अमेरिका को थर्राने वाले फिदेल कास्त्रो नहीं रहे

क्यूबा के पूर्व राष्ट्रपति और वहाँ की विश्वप्रसिद्ध क्रांति के जनक फिदेल कास्त्रो नहीं रहे। अमेरिका के पड़ोस में रहकर 50 साल तक उसकी आँख की किरकिरी बने रहे इस कम्युनिस्ट सिपाही ने शुक्रवार को हमेशा के लिए आँखें मूंद लीं। जैतून के रंग की वर्दी, बेतरतीब दाढ़ी और सिगार पीने के अपने अंदाज के लिए मशहूर कास्त्रो न केवल दुनिया के सबसे बड़े कम्युनिस्ट नेताओं में शुमार किए जाते थे बल्कि वे दुनिया के तीसरे ऐसे नेता थे जिन्होंने किसी देश पर लंबे समय तक राज किया हो। उन्होंने साल 1959 में क्यूबा की सत्ता संभाली और साल 2008 में खराब स्वास्थ्य के कारण सत्ता अपने भाई राउल कास्त्रो को सौंपी। हालांकि तब भी पर्दे के पीछे असली ताकत वही बने रहे।

क्यूबा के समयानुसार शुक्रवार रात साढ़े दस बजे मौजूदा राष्ट्रपति राउल कास्त्रो ने सरकारी टेलीविजन से घोषणा की कि क्यूबा की क्रांति के सर्वोच्च कमांडर फिदेल अब नहीं हैं। इस घोषणा के साथ ही क्यूबा शोक में डूब गया और सड़कें सूनसान हो गईं। वहाँ पूरे नौ दिन का राष्ट्रीय शोक घोषित किया गया है। बता दें कि कास्त्रो को चाहने वाले भारत समेत दुनिया भर में हैं। भारत के तो वे अभिन्न मित्र थे। खासतौर पर जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी से उनके बड़े प्रगाढ़ संबंध रहे।

फिदेल कास्त्रो साम्यवादी व्यवस्था के बहुत बड़े और मजबूत स्तम्भ थे, इतने मजबूत कि सोवियत संघ के टूट जाने के बाद भी उसमें ‘दरारें’ तक नहीं आईं। साम्राज्यवादी व्यवस्था के शोषण के खिलाफ लड़कर उन्होंने क्यूबा में साम्यवादी सत्ता स्थापित की थी। अमेरिका की दहलीज के इतने करीब होते हुए भी उन्होंने ताज़िन्दगी क्यूबा में पूंजीवादी व्यवस्था को घुसने नहीं दिया। शायद यही वजह रही कि क्यूबा की गिनती आज भी दुनिया की सबसे खुशहाल जनता वाले देशों में होती है।

अमेरिका के खिलाफ खुलकर बोलने वाली इतनी मजबूत आवाज़ अब शायद कभी न हो। उनकी एक आवाज़ से पूरा अमेरिका थर्रा जाता था। 1962 में शीत युद्ध के दौरान सोवियत संघ को अपनी सीमा में अमेरिका के खिलाफ मिसाइल तैनात करने की मंजूरी देकर उन्होंने पूरी दुनिया को सकते में ला दिया था। इस शख्स से दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश कितना घबराता था, इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि अमेरिका की खुफिया एजेंसी सीआईए ने उन्हें एक अनुमान के मुताबिक 638 बार मारने की योजना बनाई पर कास्त्रो हर बार बच निकले। अमेरिका के एक नहीं, दो नहीं पूरे 11 राष्ट्रपति आए और चले गए पर कास्त्रो जहाँ थे वहीं रहे, चट्टान की तरह अडिग। उन्होंने डटकर आइजनहावर से लेकर क्लिंटन तक का सामना किया, अमेरिका की ओर से लगाए गए सभी आर्थिक प्रतिबंधों को झेला और तमाम साजिशों को अपनी चतुराई और कूटनीति से नाकाम किया। हाँ, ओबामा के शासनकाल में अमेरिका और क्यूबा के संबंधों में नए अध्याय जरूर जुड़े।

13 अगस्त 1926 को जन्मे कास्त्रो के पिता एक समृद्ध स्पेनी प्रवासी जमींदार थे और उनकी माँ क्यूबा की निवासी थीं। बचपन से ही कास्त्रो चीजों को बहुत जल्दी सीख जाते थे। वह बेसबॉल के प्रशंसक थे और कभी उनका सपना था कि नामचीन अमेरिकी लीगों में खेलें और खेल ही में अपना भविष्य बनाएं। लेकिन उनकी राह तो राजनीति देख रही थी। उन्हें आधुनिक क्यूबा का इतिहास जो गढ़ना था।

चलते-चलते

कास्त्रो जितने तेजतर्रार व्यक्तित्व के धनी थे, वक्ता भी उतने ही शानदार थे। संयुक्त राष्ट्र में सबसे लंबा भाषण देने का गिनीज रिकॉर्ड उन्हीं के नाम दर्ज है। उन्होंने 29 सितंबर 1960 को संयुक्त राष्ट्र में 4 घंटे 29 मिनट का भाषण दिया था। इतना ही नहीं, क्यूबा में में 1986 में दिया उनका एक भाषण तो 7 घंटे 10 मिनट लंबा था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप    

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नीतीश फिर भाजपा के करीब !

मीडिया में आ रही ख़बरों के मुताबिक बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इन दिनों भाजपा के संपर्क में हैं। कहा जा रहा है कि भाजपा के एक बड़े नेता से उनकी बात हुई है और बहुत संभव है कि आने दिनों में जेडीयू और भाजपा फिर एक साथ दिखाई दें। दरअसल इस तरह की सुगबुगाहट तभी शुरू हो गई थी जब यूपी चुनाव को लेकर जेडीयू और आरजेडी ने अपनी राहें अलग कर लीं। पर पिछले दिनों नीतीश ने लालू और कांग्रेस के स्टैंड से एकदम उलट जिस तरह केन्द्र सरकार के नोटबंदी के फैसले की तारीफ की, उसके बाद इस चर्चा ने खासा जोर पकड़ लिया है।

टीवी रिपोर्ट्स के मुताबिक नीतीश ने भाजपा के एक बड़े नेता से बात की और नोटबंदी की तारीफ की। गौर करने की बात है कि यह ‘तारीफ’ उन तारीफों के अतिरिक्त है जो वे सार्वजनिक मंचों से कर रहे हैं। वैसे इन तारीफों के अलग मायने इसलिए भी लगाए जा रहे हैं क्योंकि हाल के दिनों में जेडीयू और आरजेडी के बीच तल्खियां आम हो चली हैं। उदाहरण के तौर पर नीतीश की निश्चय यात्रा का संदर्भ ही लें। आरजेडी के वरिष्ठ नेता और उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने इस यात्रा को ‘बेकार’ करार दिया। उन्होंने यहाँ तक कहा कि यात्रा के दौरान केवल बातें की जा रही हैं, धरातल पर काम नहीं दिख रहा। यह केवल जेडीयू की यात्रा बनकर रह गई है।

नोटबंदी जैसे बड़े मुद्दे पर लालू-नीतीश की बिखरती जुगलबंदी और खुलकर सामने आई। एक ओर लालू प्रसाद यादव अपने एक के बाद एक आक्रामक ट्वीट और बयानों में इसे ‘फर्जिकल स्ट्राइक’ करार दे रहे हैं तो दूसरी ओर नीतीश इस फैसले को ‘साहसिक’ बताते हुए इसका स्वागत कर रहे हैं। उनके बेहद करीबी और हाल में राष्ट्रीय महासचिव बनाए गए हरिवंश भी नोटबंदी के पक्ष में लेख लिख रहे हैं। हाँ, पार्टी के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव जरूर इसके विरोध में खड़े दिख रहे हैं, पर जेडीयू की अंदरूनी राजनीति से वाकिफ लोग बखूबी जानते हैं कि पार्टी में उनका ‘स्थान’ और ‘सम्मान’ केवल सांकेतिक है।

अंदरखाने इस बात की भी चर्चा है कि लालू को राष्ट्रीय राजनीति में नीतीश की बढ़ती दिलचस्पी रास नहीं आ रही। चाहे यूपी चुनाव में गठबंधन की कवायद हो या शराबबंदी को देशव्यापी अभियान बनाने की कोशिश, लालू अच्छी तरह समझ रहे हैं कि नीतीश दिन-रात एक कर 2019 में खुद को मोदी के बरक्स लाने में जुटे हैं। नीतीश की इस तरह की कोशिशों को लालू के करीबी ‘वादाखिलाफी’ करार देते हैं। कारण यह कि जब महागठबंधन की नींव रखी जा रही थी, तब तथाकथित तौर पर तय यह हुआ था कि नीतीश बिहार संभालेंगे और लालू देश भर में घूम-घूमकर महागठबंधन की राजनीति को विस्तार देंगे।

बहरहाल, कारणों को न खंगालें तो भी इतना तो तय है कि महागठबंधन में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा। नहीं तो प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी को न तो यह कहने की जरूरत पड़ती कि “महागठबंधन एकजुट है” और न यह दावा करने की कि “महागठबंधन में दरार पैदा करने की कोशिशें नाकाम साबित होंगी।”

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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शराबबंदी कानून में ‘जरूरी’ संशोधन को नीतीश तैयार

संसद से सड़क तक नोटबंदी पर हो रहे हो-हंगामे के बीच बिहार में शराबबंदी कानून पर सर्वसम्मति बनाने के उद्देश्य से बिहार सरकार ने सार्थक पहल की है। बिहार विधानसभा पुस्तकालय में शराबबंदी कानून पर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक में मुख्य विपक्षी दल भाजपा समेत सभी दलों की राय जानने के बाद मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि इस बैठक और लोकसंवाद में मिले सुझावों पर कानूनविदों की राय लेंगे और जो प्रस्ताव होगा उसे सदन में लेकर आएंगे। इस बैठक के बाद यह साफ हो गया कि शराबबंदी कानून में ‘जरूरी’ संशोधन के लिए सरकार मन बना चुकी है।

गौरतलब है कि इससे पूर्व 14 नवंबर को मुख्यमंत्री ने लोगों से सीधा संवाद कर उनके सुझाव सुने थे। इन दोनों ही बैठकों में सबने शराबबंदी का खुले दिल से समर्थन किया, लेकिन इसके लिए बने कानून के कुछ प्रावधानों पर सवाल भी उठाए। सर्वदलीय बैठक में नीतीश ने कहा कि सबलोग एकजुट रहेंगे तो शराबबंदी अभियान में मजबूती आएगी। अलग-अलग विचार होने से गलत करने वालों का हौसला बढ़ता है। अगर कोई कानून अतिवादी है तो उसके बदले क्या होना चाहिए, इस पर बात हो। हम सदन के अंदर और बाहर कहते रहे हैं कि ठोस सुझाव दिए जाएं।

सर्वदलीय बैठक के बाद अब इस बात की पूरी संभावना है कि 25 नवंबर से शुरू हो रहे शीतकालीन सत्र में इस बाबत संशोधन विधेयक लाया जाए। आधिकारिक सूत्रों के अनुसार घर में शराब मिलने पर सभी वयस्कों को सजा का प्रावधान तर्कसंगत नहीं माना जा रहा है। महिलाओं और बुजुर्गों को इससे बाहर रखने पर विचार चल रहा है। इसी तरह शराब मिलने पर उस मकान या परिसर की जब्ती, कारोबार होने पर पूरे गांव पर सामूहिक जुर्माना या जिलाबदर करने जैसे प्रावधान को भी कठोर माना जा रहा है।

प्रसन्नता की बात है कि ऐसे तमाम ‘जरूरी’ संशोधनों पर सरकार पूरी गंभीरता से मंथन में जुट गई है। हालांकि संशोधन में इसका पूरा ख्याल रखा जाएगा कि वे शराबबंदी के मूल उद्देश्य से अलग न हों। शराबबंदी पर सरकार की स्पष्ट राय है कि लोगों की असुविधा कम हो पर अवैध तरीके से कारोबार करने वालों पर शिकंजा बरकरार रहे।

चलते-चलते

क्या हमारे प्रधानमंत्री कुछ ऐसा ही कदम नोटबंदी को लेकर नहीं उठा सकते? ताकि कालेधन पर रोक तो लगे पर निरीह जनता की परेशानी न बढ़े!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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विराट के वीरों की इंग्लैंड पर बड़ी जीत

कोहली और पुजारा की शानदार बल्लेबाजी, अश्विन के ऑलराउंड खेल और गेंदबाजों के दमदार प्रदर्शन की बदौलत भारत ने विशाखापत्तनम टेस्ट में शानदार जीत दर्ज करते हुए पाँच मैंचों की सीरीज में 1-0 की बढ़त बना ली। सोमवार को पाँचवें और आखिरी दिन इंग्लैंड की दूसरी पारी 405 रन के लक्ष्य का पीछा करते हुए मात्र 158 रन पर ढेर हो गई। इसके साथ ही भारत को इंग्लैंड पर 246 रन की बड़ी जीत मिली। पहली पारी में 167 और दूसरी पारी में 81 रन बनाने वाले भारतीय कप्तान विराट कोहली ‘मैन ऑफ द मैच चुने गए।

ऐसा कम ही देखने को मिलता है कि ऐसी बड़ी जीत मिले और जीत का श्रेय बल्लेबाजों को दिया जाय कि गेंदबाजों को, ये तय करने में धर्मसंकट वाली स्थिति हो जाए। बल्लेबाजी की बात करें तो पहली पारी में विराट कोहली (167), चेतेश्वर पुजारा (119) और आर अश्विन (58) तो दूसरी पारी में फिर विराट कोहली (81), अजिंक्य रहाणे (26) और जयंत यादव (27 नाबाद) ने महत्वपूर्ण पारियां खेलीं। जहाँ तक गेंदबाजी की बात है तो उसकी धुरी हालांकि मैच में 8 विकेट (पहली पारी में 5 और दूसरी पारी में 3) लेने वाले आर अश्विन रहे लेकिन बाकी गेंदबाजों ने भी उम्दा खेल दिखाया। पहला टेस्ट खेल रहे जयंत यादव ने अपनी यादगार शुरुआत की। उन्होंने पहली पारी में 1 और दूसरी पारी में 3 विकेट लिए। दूसरी पारी में 27 महत्वपूर्ण रन बनाए सो अलग। रविन्द्र जडेजा और मोहम्मद शमी को मैच में 3-3 विकेट मिले। उमेश यादव की झोली भी खाली नहीं रही और उन्होंने 1 विकेट हासिल किया।

इस मैच में गेंदबाजों का दबदबा कैसा था, इसका अंदाजा इसी से लग जाता है कि जिस इंग्लैंड ने चौथे दिन 59.2 ओवर खेलकर दो विकेट गंवाए थे, पाँचवें दिन उसकी बल्लेबाजी 38.1 ओवर में ही ढेर हो गई। गौरतलब है कि दूसरी पारी में इंग्लैंड का पहला विकेट 75 रन पर गिरा था और बाकी के नौ विकेट गंवा कर उसने महज 83 रन पर हासिल किए। दूसरी पारी में उसके केवल चार खिलाड़ी – कुक (54), हमीद (25), रूट (25) और बेयरस्टा (34) – ही दहाई के आंकड़े तक पहुँच सके। बचे हुए बल्लेबाजों में तीन तो शून्य पर आउट हुए। जेम्स एंडरसन दोनों ही पारियों में शून्य पर आउट हुए।

इंग्लैंड के कप्तान एलिस्टेयर कुक जहाँ इस हार से खासे निराश हैं, वहीं भारतीय कप्तान विराट कोहली का आभामंडल इस जीत के बाद और भी ‘विराट’ हो गया। मैच में 8 विकेट लेने वाले दुनिया के नंबर वन गेंदबाज आर अश्विन इस मैच के बाद इस साल सबसे ज्यादा विकेट लेने वाले गेंदबाज बन गए। उनके विकेटों की संख्या अब 55 हो गई है। उनके बाद श्रीलंका के रंगना हेराब (54 विकेट) और इंग्लैंड के स्टुअर्ट ब्रॉड (46 विकेट) का स्थान है। इस मैच में भारत की एक और उपलब्धि अपना पहला टेस्ट खेल रहे जयंत यादव हैं। शानदार गेंदबाजी के साथ-साथ बल्लेबाजी में भी हाथ दिखा कर उन्होंने भविष्य के लिए उम्मीद जगा दी। स्वयं कप्तान कोहली उनकी तारीफ करते नहीं थक रहे।

 ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

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अब बैंकों में होंगे ‘इस्लामिक विंडो’

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने पारंपरिक बैंकों में ‘इस्लामिक विंडो’ खोलने का प्रस्ताव रखा है ताकि देश में धीरे-धीरे शरिया के अनुकूल या ब्याजमुक्त बैंकिंग लागू की जा सके। बता दें कि रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार लम्बे समय से इस्लामिक बैंकिंग शुरू करने की संभावना तलाश रहे हैं। इसका मकसद समाज के उन तबकों का वित्तीय समावेशन सुनिश्चित करना बताया जा रहा है जो धार्मिक कारणों से अब तक फाइनेंसियल सिस्टम से बाहर हैं।

गौरतलब है कि इस्लामिक या शरिया बैंकिंग मुख्य रूप से ब्याज नहीं लेने के सिद्धांत पर आधारित है क्योंकि इस्लाम में सूदखोरी को हराम माना गया है। इस्लाम सूद के खिलाफ इसलिए है कि ब्याज की बुनियाद पर बनी व्यवस्था में बहुत सारे लोगों के पैसे चंद लोगों के हाथ में आ जाते हैं। इसके मुकाबले ‘जकात’ (बचत के एक हिस्से का दान) की व्यवस्था है, जिससे कुछ लोगों का पैसा बहुत सारे लोगों के पास जाता है। ब्याज की व्यवस्था के मुकाबले इस्लाम का कहना है कि नफे और नुकसान में कर्ज देने और लेने वाले दोनों ही बराबर के हिस्सेदार हैं। यानि संक्षेप में कहें तो इस्लामिक बैंकिंग साझेदारी वाली व्यवस्था है।

बहरहाल, वित्त मंत्रालय को लिखे पत्र में रिजर्व बैंक ने कहा है कि “सोच-विचार से बनी हमारी राय में इस्लामिक फाइनेंस की पेचीदगियों और इस मामले से जुड़े विभिन्न नियामिकीय एवं पर्यवेक्षीय चुनौतियों के मद्देनजर भारत में क्रमबद्ध तरीके से इस्लामिक बैंकिंग शुरू की जा सकती है।” रिजर्व बैंक मानता है कि इस क्षेत्र में भारतीय बैंकों को कोई अनुभव नहीं है। इसीलिए सरकार की ओर से जरूरी अधिसूचनाएं जारी किए जाने के बाद पारंपरिक बैंकों में इस्लामिक विंडो के जरिए शुरू-शुरू में कुछ ऐसे सामान्य प्रोडक्ट्स लाने पर विचार होगा जो पारंपरिक बैंकों से मिलते-जुलते हैं। नफे-नुकसान वाले पेचीदे प्रोडक्ट के साथ पूरी इस्लामिक बैंकिंग पर बाद में अनुभव के आधार पर विचार किया जाएगा।

वैसे चलते-चलते ये बताना निहायत जरूरी है कि भारत में इस्लामिक बैंकिंग के लिए दरवाजा खोलने का श्रेय किसी और को नहीं हमारे मौजूदा प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को जाता है। आपको शायद हैरत हो लेकिन भारत में पहला इस्लामिक बैंक खोलने को हरी झंडी उनके गृहराज्य और उन्हीं की पार्टी द्वारा शासित गुजरात में मिली। पारंपरिक बैंकों में इस्लामिक विंडो का प्रस्ताव वास्तव में इसका अगला चरण है, जिससे आगे चलकर देश भर में इस्लामिक बैंक स्वतंत्र रूप से अस्तित्व में आ सकते हैं।

गौरतलब है कि भारत ऐसा पहला गैर इस्लामिक देश है जहाँ इस्लामिक बैंक की सेवा मौजूद होगी। इस ‘उदार’ पहल के लिए रिजर्व बैंक और केन्द्र सरकार की सराहना की जानी चाहिए लेकिन शर्त यह कि उससे पहले ‘समान नागरिक संहिता’ की पुनर्व्याख्या हो। नहीं तो देखने वाले इसके पीछे ‘तुष्टिकरण’ को देखेंगे और आप उनकी आँखें बंद नहीं कर पाएंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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मोदी को समझने से पहले इंदिरा को समझें

हाल के कुछ वर्षों में नरेन्द्र मोदी देश की राजनीतिक बहसों का केन्द्र होते चले गए हैं। देश के किसी भी कोने में कोई भी पार्टी हो, मोदी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप में उसकी रणनीति को प्रभावित करने की स्थिति में हैं, इसमें कोई दो राय नहीं। प्रशासक के तौर पर देखें तो पिछले कुछ दिनों में सर्जिकल स्ट्राइक और नोटबंदी जैसे बड़े फैसलों के बाद उनकी ‘सख्त’ (सकारात्मक अर्थ में) छवि सामने आई है। उनके इन फैसलों को लेकर मिश्रित प्रतिक्रिया देखने को मिली। सर्जिकल स्ट्राइक पर तो अमूमन सारी पार्टियों ने दिल खोलकर उनका साथ दिया लेकिन नोटबंदी पर राजनीतिक पार्टियों से लेकर आम जनता तक बंटी नज़र आती है। हालांकि विरोध नोटबंदी से ज्यादा उसके बाद मची ‘अफरा-तफरी’ को लेकर है। कहा जा रहा है कि इतने बड़े फैसले से पहले सरकार ने पूरा ‘होमवर्क’ नहीं किया था। अगर इसे मान भी लिया जाय तो भी उनके राजनीतिक साहस और इच्छाशक्ति की सराहना उनके विरोधी तक कर रहे हैं, भले ही उनमें से कुछ सार्वजनिक तौर पर इसे स्वीकार न करें।

बहरहाल, मोदी के इन कठोर फैसलों के आलोक में विश्लेषक उनकी तुलना पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से कर रहे हैं। आज जबकि संयोग से इंदिराजी की जयंती भी है, क्यों न उनके कुछ बेहद साहसी और कठोर फैसलों की चर्चा करें जिन्होंने भारत की दशा और दिशा बदलने में अहम भूमिका निभाई।

सबसे पहले 1971 का युद्ध। भारत और पाकिस्तान के बीच तीसरे युद्ध के दौरान इंदिरा गांधी के कठोर तेवरों की बहुत चर्चा होती है। वो भी तब जब माना जा रहा था कि वैश्विक मंच पर अमेरिका पाकिस्तान को शह दे रहा था। उस युद्ध में पाकिस्तान को हार का सामना करना पड़ा और दुनिया को बांग्लादेश के तौर पर एक नया मुल्क मिला। उनके इस फैसले के कारण ही उन्हें ‘आयरन लेडी’ कहा जाता है।

इसके बाद आता है 1974 का परमाणु परीक्षण। इंदिरा गांधी ने बतौर प्रधानमंत्री मई, 1974 में परमाणु परीक्षण करने की मंजूरी दी। राजस्थान के पोखरण में हुए इस परमाणु परीक्षण की भनक दुनिया के पांच शक्तिशाली देशों तक को नहीं लगी थी। इस परीक्षण के बाद ही भारत ने परमाणु संपन्न देश होने की दिशा में कदम बढ़ाए थे।

अब बात करें 1967 में शुरू हुई हरित क्रांति की। 1966 में जब इंदिरा गांधी भारत की प्रधानमंत्री बनीं, तब देश में भुखमरी की स्थिति थी। भारत अनाज के मामले में दूसरे देशों पर निर्भर था। इन परिस्थितियों में हरित क्रांति शुरू हुई और भारत जल्द ही अनाज उत्पादन के मामले में आत्मनिर्भर बन गया। इंदिरा गांधी ने इसमें अहम भूमिका निभाई थी।

1969 में बैंकों का राष्ट्रीयकरण एक और ऐसा निर्णय था जो इंदिरा गांधी के कारण ही संभव हो पाया। 14 जुलाई 1969 की आधी रात को उन्होंने 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण कर दिया। उनके लिए ये फैसला आसान नहीं था। यहां तक कि कांग्रेस के अंदर भी इस पर एक राय नहीं थी। लेकिन इंदिरा ने ये कठिन निर्णय लिया और देश में आर्थिक स्थायित्व का दौर शुरू हुआ।

इंदिरा गांधी की बात हो और उनके नारे ‘गरीबी हटाओ’ की बात न हो ऐसा नहीं हो सकता। 1971 के चुनाव से ठीक पहले उन्होंने देश भर में ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया। गरीबों और बेरोजगारों के लिए उन्होंने कई योजनाएं शुरू कीं। हालांकि समय के साथ उनका ये नारा अपनी चमक खोता गया, लेकिन आप इससे इनकार नहीं कर सकते कि मोदी के चुनावी नारे ‘अच्छे दिन आने वाले हैं’ से पहले तक यह देश का सबसे बड़ा चुनावी नारा बना रहा।

इन फैसलों के अलावे इंदिरा गांधी ने कुछ ऐसे फैसले भी लिए जो विवादास्पद रहे। जून 1975 में आपातकाल की घोषणा, जून 1984 में ऑपरेशन ब्लू स्टार और अपने दो कार्यकाल में राष्ट्रपति शासन का हथियार की तरह (कुल 50 बार) इस्तेमाल करने को लेकर उन्हें खासी आलोचना झेलनी पड़ी। ऑपरेशन ब्लू स्टार की कीमत तो उन्हें जान देकर चुकानी पड़ी। इस ऑपरेशन के चार महीने बाद ही उनके सिख अंगरक्षकों बेअंत सिंह और सतवंत सिंह ने गोलियों से छलनी कर उनकी हत्या कर दी।

इंदिरा गांधी को दिवंगत हुए 33 साल बीत गए। पर एक बात बिना किसी झिझक के कही जा सकती है कि इस 33 पर शून्य लग जाने के बाद भी उनके अवदानों को नहीं भुलाया जा सकता। स्वतंत्र भारत का इतिहास उनके बिना पूरा होगा, इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती। ठीक वैसे ही जैसे हमारी इक्कीसवीं सदी का इतिहास मोदी के बिना पूरा होगा, ऐसा सोचना नामुमकिन है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू ने कहा, नोटबंदी आम जनता का ‘फेक एनकाउंटर’ है !

नोटबंदी के बाद एक ओर देश भर में अफरातफरी मची है, बैंक और एटीएम में लोगों की कतार छोटी होने का नाम नहीं ले रही, तमाम विपक्षी दल संसद में सरकार को घेरने की रणनीति बना रहे हैं तो दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी कालेधन के खिलाफ जारी अपनी जंग को आगे भी जारी रखने की बात कह  रहे हैं और बेनामी सम्पत्ति उनका अगला निशाना होगी। नोटबंदी के बाद चाहे आमलोगों की परेशानी हो या फिर सियासी तकरार, बिहार में भी चरम पर है। सोमवार को इसको लेकर भाकपा, माले, आइसा और इनौस कार्यकर्ताओं ने राज्यव्यापी विरोध दिवस मनाया। राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी महासचिव और सांसद तारिक अनवर ने भी विमुद्रीकरण को बिना सोचे समझे जल्दबाजी में उठाया कदम करार दिया। सत्तारूढ़ महागठबंधन भी अपने तरीके से राज्य से लेकर केन्द्र तक इस मुद्दे को उठाने में जुटा हुआ है।

इन सारी गहमागहमी के बीच आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने एक के बाद एक कई ट्वीट कर माहौल को और गरमा दिया है। उन्होंने 500 और 1000 बड़े नोट बंद करने पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से बड़े तल्ख अंदाज में पूछा है कि किसानों को किन पापों की सजा और पूंजीपति मित्रों को किन कर्मों का पुण्य दे रहे हैं? अपने ट्विटर हैंडल पर एक के बाद एक कई पोस्ट कर उन्होंने प्रधानमंत्री पर जमकर निशाना साधा और कहा कि गांवों में बैंक नहीं हैं और हैं भी तो उनमें पैसे नहीं हैं। किसानों की खरीफ पैदावार पड़ी है। कोई खरीदने वाला नहीं है। रबी की बुआई के लिए पैसा नहीं है। एसी कमरों में नीति बनाने वालों को किसानी का ‘क’ भी नहीं पता है। किसान मर रहे हैं। इन हालात में जनता को भाषण नहीं राशन चाहिए।

नोटबंदी को लेकर लालू पहले भी मोदी पर भड़ास निकाल चुके हैं। अपने एक बयान में उन्होंने नोटबंदी को मोदी का फर्जिकल स्ट्राइक बताया है। उन्होंने कहा कि इतनी परेशानी के बाद भी अगर जनता के खातों में 15-15 लाख नहीं आए तो इसका मतलब साफ होगा कि नरेन्द्र मोदी का यह फर्जिकल स्ट्राइक था। इसी के साथ आम जनता का फेक एनकाउंटर भी। लालू का कहना है कि वह खुद कालाधन के खिलाफ हैं, लकिन प्रधानमंत्री के काम में दूरदर्शिता का पूरा अभाव दिख रहा है। उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि अगर मोदी कालाधन को समाप्त करना चाहते हैं तो फिर दो हजार का नोट क्यों ला रहे हैं?

बिहार के उपमुख्यमंत्री और लालू के छोटे बेटे तेजस्वी भी ट्वीट-युद्ध और मोदी पर तंज कसने में अपने पिता से पीछे नहीं। उन्होंने ट्वीट कर प्रधानमंत्री से कहा है कि जनता की परेशानी पर अगर दिल पसीज जाए तो थोड़ी रहम कर देंगे। बैंक में पैसा रहते पति का इलाज पैसे के अभाव में नहीं करा सकने के एक महिला के ट्वीट को रिट्वीट कर तेजस्वी ने कहा कि कहीं इससे पीएम का दिल पसीज जाए। इसी तरह इलाज न कराने का दर्द बयां करते एक विडियो भी उन्होंने ट्वीट किया और कहा कि पीएम इन पीड़ितों के लिए कुछ करें।

बहरहाल, अभी न तो बैंक और एटीएम की कतार छोटी हो रही, न ही नेताओं के बयान की तल्खियां। लेकिन प्रधानमंत्री ने जिस विश्वास और संकल्प के साथ नोटबंदी का इतना बड़ा कदम उठाया, अगर वो सच साबित हो जाए तो स्थिति एकदम भिन्न होगी। तब शायद अभी की परेशानियां याद न रहें – आमलोगों के साथ-साथ नेताओं को भी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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हम क्यों मनाते हैं बाल दिवस ?

14 नवंबर यानि चाचा नेहरू का जन्मदिन जिसे हम बाल दिवस के रूप में मनाते हैं। अगर पूछा जाय कि क्यों मनाते हैं तो आपका जवाब होगा कि ऐसा इसलिए क्योंकि पं जवाहरलाल नेहरू बच्चों से बहुत स्नेह करते थे। आपकी ये बात सही तो होगी लेकिन अधूरी होगी क्योंकि पं. नेहरू बच्चों से केवल स्नेह ही नहीं करते थे, प्रौढ़ों और युवाओं की तुलना में उन्हें अधिक महत्व भी देते थे।

पं. नेहरू का स्पष्ट मानना था कि आज जन्मा शिशु भविष्य में राजनीतिज्ञ, शिक्षक, लेखक, डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक या फिर किसान और मजदूर ही क्यों न बने, राष्ट्र निर्माण का दायित्व उन्हीं के कंधों पर होता है। कहने का तात्पर्य यह कि पं. नेहरू बच्चों को देश का भविष्य मानते थे और यही इस दिन को बाल दिवस के रूप में मनाने का औचित्य है। बल्कि और बेहतर तरीके से यह कहा जाना चाहिए कि 14 नवंबर केवल स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री को याद करने का दिन ही नहीं, उनके बहाने बच्चों में विश्वास जताने का दिन भी है।

वैसे जब हम बाल दिवस की बात कर ही रहे हैं तो हमें यह जरूर जानना चाहिए कि बाल दिवस केवल भारत में ही नहीं दुनिया भर में मनाया जाता है लेकिन अलग-अलग तारीखों में। चलिए जानते हैं कैसे हुई इसकी शुरुआत?

असल में बाल दिवस की नींव 1925 में रखी गई थी, जब बच्चों के कल्याण पर विश्व-कांफ्रेंस में बाल दिवस मनाने की घोषणा हुई। 1954 में इसे दुनिया भर में मान्यता मिली। संयुक्त राष्ट्र ने यह दिन 20 नवंबर के लिए तय किया लेकिन अलग-अलग देशों में यह अलग दिन मनाया जाता है। हालांकि कुछ देश 20 नवंबर को भी बाल दिवस मनाते हैं। 1950 से बाल संरक्षण दिवस यानि 1 जून भी कई देशों में बाल दिवस के रूप में मनाया जाता है।

खैर, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि बाल दिवस हम 14 नवंबर को मनाते हैं, 20 नवंबर को मनाते हैं, 1 जून को मनाते हैं या किसी और दिन। महत्वपूर्ण यह है कि हम इस दिन पं. नेहरू के बच्चों में जताए विश्वास को याद करें। हम जानें और मानें कि हर बच्चा खास है और देश के बेहतर भविष्य के लिए उन्हें बेहतर जीवन देना बेहद जरूरी है। इन बच्चों का शरीर, मस्तिष्क या संस्कार जितना कुपोषित होगा, हमारे समाज, देश और दुनिया को भी उसी अनुपात में कुपोषण झेलना पड़ेगा, इस सच से नज़र चुराने की भूल हमें हरगिज नहीं करनी चाहिए। यही इस दिन का संदेश है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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अमिताभ और प्रियंका नहीं मोदी होंगे अतुल्य भारत अभियान का चेहरा

पर्यटन को बढ़ावा देने वाले अतुल्य भारत (इन्क्रेडिबल इंडिया) अभियान का चेहरा अब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी होंगे। पर्यटन मंत्रालय ने अमिताभ बच्चन समेत बॉलीवुड के अन्य सितारों को अभियान का ब्रांड एंबेसडर बनाने का विचार छोड़ दिया है। गौरतलब है कि इस साल की शुरुआत में अभिनेता आमिर खान को हटाए जाने के बाद ब्रांड एंबेसडर के रूप में सदी के महानायक अमिताभ बच्चन और अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा को लाए जाने के कयास लगाए जा रहे थे।

पर्यटन मंत्रालय के सूत्रों के अनुसार पिछले ढाई वर्षों के दौरान देश और विदेश में पर्यटन को लेकर प्रधानमंत्री मोदी ने कई महत्वपूर्ण बातें कही हैं। उन्होंने देश के विभिन्न स्थानों की विशेषता और विविधता का वर्णन बड़े ही प्रभावशाली तरीके से किया है। पर्यटन मंत्रालय प्रधानमंत्री द्वारा अलग-अलग स्थानों और अवसरों पर कही गईं ऐसी तमाम बातों एवं वक्तव्यों के विडियो फुटेज को जुटाने में लगा हुआ है। इन्हीं फुटेजों का इस्तेमाल अतुल्य भारत अभियान में किया जाएगा।

भारत के पर्यटन मंत्री महेश शर्मा इससे पूर्व कह चुके हैं कि अतुल्य भारत अभियान को बढ़ाने के लिए प्रधानमंत्री सबसे उपयुक्त चेहरा हैं। जिन देशों का उन्होंने दौरा किया है, वहाँ से पर्यटकों के आगमन में उछाल देखा गया है। बकौल शर्मा पिछले दो वर्षों में प्रधानमंत्री के कई देशों के दौरे से भारत को लेकर धारणा में उल्लेखनीय बदलाव आया है। ऐसे में भारतीय पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए उनसे बेहतर चेहरा और कौन हो सकता है!

पर्यटन मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को लेकर जो राय रखी है उससे इनकार नहीं किया जा सकता। अपने सघन और प्रभावशाली विदेशी दौरों से मोदी सम्पूर्ण विश्व में भारत के ब्रांड एंबेसडर के तौर पर उभरे हैं। अपनी वक्रता और कुशल कूटनीति से भारतीय संस्कार और संभावनाओं का उन्होंने एक नया आयाम रच दिया है। विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए सचमुच अब बॉलीवुड के किसी चेहरे की आवश्यकता हमें नहीं है। देर से लिए गए इस दुरुस्त निर्णय के लिए पर्यटन मंत्रालय को बधाई!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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