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विश्व-इतिहास की सबसे लंबी मानव-श्रृंखला..! बधाई बिहार..!!

आपने नशे में झूमना तो सुना होगा, लेकिन लोग नशे कि विरोध में झूमें ऐसा केवल बिहार में हो सकता है। जी हाँ, लोग झूमे और सैकड़ों, हजारों, लाखों में नहीं, करोड़ों की संख्या में झूमे… एक साथ झूमे… एक-दूसरे का हाथ पकड़कर झूमे… और ऐसा झूमे कि पूरे तीन करोड़ लोगों की 11, 292 किलोमीटर लंबी श्रृंखला बन गई। जी हाँ, ये विश्व की सबसे लंबी मानव-श्रृंखला है। अद्भुत, अभूतपूर्व, वर्णनातीत।

बिहार ने सचमुच इतिहास रच दिया। यह विश्व का अकेला ऐसा राज्य बन गया जिसने नशे को न कहने के लिए विश्व की सबसे लंबी मानव-श्रृंखला की परिकल्पना की और उसे अमलीजामा पहना दिया। इससे पहले 2004 में बांग्लादेश में प्रतिपक्ष ने सरकार के खिलाफ 1050 किमी मानव-श्रृंखला बनाई थी। देखा जाय तो तीन करोड़ लोगों का एक मकसद से एक दिन और एक समय एकजुट होना लगभग असंभव-सी बात थी, जिसे बिहार ने संभव कर दिखाया और शराबबंदी का ऐसा संदेश दिया जिसे पूरी दुनिया ने आश्चर्यचकित होकर देखा और सराहा।

Human Chain_2
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दिन में 12.15 से 1 बजे के बीच आयोजित इस ऐतिहासिक मानव-श्रृंखला की तस्वीर लेने के लिए तीन उपग्रहों तथा 40 ड्रोनों का इस्तेमाल किया गया। तीन उपग्रहों में एक विदेशी तथा दो भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के थे। इसके अतिरिक्त राज्य सरकार के चार हेलीकॉप्टरों से भी एरियल फोटोग्राफी और विडियोग्राफी की गई। इस श्रृंखला को विश्व रिकॉर्ड में शामिल करने के लिए लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड के लोग भी पटना में मौजूद रहे।

Human Chain_3
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वैसे तो इस मानव-श्रृंखला का आयोजन बिहार सरकार ने किया लेकिन दलगत राजनीति से ऊपर उठकर तमाम दलों ने इसमें जिस तरह बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया वह काबिलेतारीफ है। इसको लेकर जितने उत्साह में जेडीयू, आरजेडी और कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता थे उतने ही भाजपा, लोजपा, रालोसपा समेत अन्य पार्टियों के लोग भी। विभिन्न राजनीतिक दलों के अधिकांश सांसद, विधायक एवं विधानपार्षद इस मौके के गवाह बने। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और विधानसभा अध्यक्ष विजय कुमार चौधरी ने पटना के गांधी मैदान में इस अभियान में हिस्सा लिया।

सरकारी कर्मचारी हों या स्कूली छात्र-छात्रा, विशिष्ट जन हों या आम नागरिक, स्त्री हों या पुरुष, बच्चे हों या बूढ़े सबके चेहरे पर अद्भुत उत्साह, सभी गर्व से ओतप्रोत। सभी जानते थे कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के आह्वान पर वे सभी इतिहास रचने को निकले हैं। अपने मुख्यमंत्री के संकल्प को जिस तरह पूरे राज्य की जनता ने साकार किया वो पूरी दुनिया के लिए मिसाल बन गया।

विश्व-इतिहास के इस महानतम आयोजन के लिए ‘मधेपुरा अबतक’ विकासपुरुष नीतीश कुमार, बिहार की महान जनता और राज्य के मुस्तैद प्रशासन को बधाई और साधुवाद देता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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चलो अपने दर्द को मकसद दें युवराज की तरह!

कटक के बाराबती स्टेडियम में भारत ने इंग्लैंड को तीन मैचों के वनडे सीरीज के दूसरे मैच में 15 रन से हराकर सीरीज अपने नाम कर लिया। इस बेहद खास जीत में सबसे अहम भूमिका निभाई वनडे टीम में तीन साल बाद वापसी कर रहे युवराज सिंह ने। मात्र 25 रन पर तीन विकेट खोकर दबाव में थी टीम इंडिया, तब युवराज ने पूर्व कप्तान महेन्द्र सिंह घोनी के साथ 256 रनों की यादगार साझेदारी की और कभी हार न मानने वाले अपने जज्बे से एक बार फिर करोड़ों दिलों को जीत लिया। बड़ी बात यह कि इस जांबाज खिलाड़ी ने अपने जुझारूपन से जिस तरह टीम इंडिया के हाथों से फिसलते कई मैचों को उसकी झोली में डाला है वैसे ही अपनी ज़िन्दगी का जंग भी जीता है, कैंसर जैसी बीमारी से लड़कर और जीत हासिल कर।

गुरुवार को खेले गए इस मैच में अपने वनडे करियर का 14वां शतक पूरा कर मैदान पर भावुक हो गए थे युवराज। उन्होंने भरी हुई आँखों से आसमान को देखा और भगवान का शुक्रिया अदा किया। इसके बाद बल्ला उठाकर दर्शकों और पैवेलियन में बैठे साथी खिलाड़ियों का अभिवादन किया। कहने की जरूरत नहीं कि उनके सम्मान में पूरी टीम खड़ी थी उस वक्त। यह सेंचुरी इसलिए भी खास थी कि उन्होंने 6 साल बाद यह शतक लगाया था। पर वे इतने पर नहीं रुके। इसके बाद उन्होंने इस पारी को अपने वनडे करियर के सबसे बड़े स्कोर में बदला और 150 रन कूट डाले, जिसमें 21 चौके और 3 छक्के शामिल थे।

याद दिला दें कि युवराज ने इससे पहले 2011 वर्ल्ड कप में सेंचुरी लगाई थी और इसके बाद वे कैंसर के शिकार हो गए। कैंसर से लड़ने के बाद मैदान पर वापसी कतई आसान नहीं थी। इलाज के बाद कमजोर हो चुके शरीर में वह स्टेमिना नहीं रह गई थी, जिसके लिए युवराज जाने जाते थे। पर उन्होंने हार नहीं मानी और न केवल टीम में वापसी की, बल्कि बता दिया कि उनमें काफी क्रिकेट बाकी है अभी और साथ ही बाकी है उनके ‘सर्वश्रेष्ठ’ का आना।

मैच के बाद भी लगातार भावुक दिखे युवराज। उन्होंने कहा भी कि वे जिस लड़ाई को लड़कर आए हैं, उसके बारे में सिर्फ उन्हें ही पता है। अपने उस दर्द को आज भी नहीं भूले युवराज। सच तो यह है कि इस दर्द ने उन्हें जीने का एक नया मकसद दे दिया है। आपको हैरत होगी कि अपनी तूफानी पारी के बाद जश्न मनाने के बदले उन्होंने कटक के ही एक होटल में कैंसर और ऑटिज्म पीड़ित बच्चों के साथ समय बिताया, उनका दर्द बांटा और अपनी खुशी साझा की। इससे पहले भी क्रिसमस के मौके पर उन्होंने मुंबई के परेल में सेंट जूड इंडिया चाइल्ड केयर सेंटर में कैंसर पीड़ित बच्चों के साथ समय बिताया था।

क्रिकेट के इस योद्धा ने अपने दर्द से जीने का नया मकसद पा लिया है। इसे जब और जिस तरह मौका मिलता है, कैंसर से लड़ने वालों को जीने का हौसला देना नहीं भूलता। औरों के दर्द को कम करना ही अब ‘जश्न’ है भारतीय क्रिकेट के ‘युवराज’ का। क्या हम सब अपने-अपने दर्द को कुछ ऐसा ही मकसद नहीं दे सकते? क्या हम भी ‘युवराज’ नहीं बन सकते?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘सलमान कोर्ट में आते हैं जेल में नहीं’

ट्विटर पर बॉलीवुड स्टार सलमान खान को लेकर ट्वीट्स की जैसे बौछार हो रही है। कोई कह रहा है ‘सलमान कोर्ट में आते हैं जेल में नहीं’ तो किसी का कहना है ‘जज घूमया थारे जैसा ना कोई!’ भाई ऐसे कमेंट तो आएंगे ही, बात ही ऐसी है। जोधपुर सेशंस कोर्ट ने बॉलीवुड के इस ‘सुल्तान’ को 18 साल पुराने आर्म्स ऐक्ट केस में बरी जो कर दिया है। जी हाँ, कोर्ट ने सलमान को ‘संदेह’ का फायदा देकर बरी किया है। हालांकि ये अलग बात है कि कोर्ट के इस फैसले के बाद दुख, क्रोध, खीझ और इन सबके कारण उपजे व्यंग्य से भरे ट्वीट की भी कमी नहीं है जिनमें ये कहा जा रहा है कि ‘हिरण खुद ही गोली के सामने आ गया होगा’ या फिर ‘बेचारे ने खुद को ही गोली मार ली होगी!’

बहरहाल, सलमान खान के खिलाफ आर्म्स ऐक्ट के तहत जोधपुर सेशंस कोर्ट में मामला चल रहा था और बुधवार सुबह 10.30 बजे फैसला सुनाने का वक्त मुकर्रर किया गया था। मगर सलमान करीब घंटाभर देरी से पहुँचे। फैसले के मुताबिक सलमान को संदेह का लाभ दिया गया है क्योंकि अभियोजन पक्ष के वकील मामला साबित नहीं कर सके। फैसले के दौरान सलमान की बहन अलवीरा उनके साथ थीं। फैसला सुनाने में जज को महज 5 मिनट लगे, जिसके तत्काल बाद सलमान कोर्ट से चले गए। उधर सरकारी वकील का कहना है कि फैसले के विश्लेषण के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी।

बता दें कि मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट दलपत सिंह राजपुरोहित ने सलमान को फैसला सुनाए जाने के दौरान अदालत में मौजूद रहने का निर्देश दिया था। इस मामले में अंतिम दलीलों पर सुनवाई पिछले साल 9 दिसंबर को शुरू हुई थी। सलमान पर कांकणी गांव में दो काले हिरणों के कथित शिकार के दौरान कथित रूप से उन हथियारों का इस्तेमाल करने और रखने के सिलसिले में मामला दर्ज किया गया था जिनके लाइसेंस की अवधि समाप्त हो चुकी थी। मामला वन विभाग ने दर्ज कराया था।

गौरतलब है कि आर्म्स ऐक्ट का यह मामला जोधपुर में सलमान के खिलाफ दर्ज चार मामलों में एक है। बाकी तीन मामले चिंकारा और काले हिरणों के शिकार से जुड़े हुए हैं। दो मामलों में सलमान को हाईकोर्ट से बरी किया जा चुका है। अब आर्म्स ऐक्ट के मामले में फैसला आने के बाद शिकार से जुड़ा एक ही मामला उनके खिलाफ लंबित है। कानूनी जानकार मानते हैं कि उस मामले में भी सलमान को राहत मिलने की पूरी उम्मीद है क्योंकि बाकी सभी मामले अब खारिज हो चुके हैं। इससे पहले सलमान हिट एंड रन केस में भी बरी हो चुके हैं। लब्बोलुआब ये कि तुलसीदास जिस बात को सैकड़ों साल पहले समझ कर समझा गए, उसे हमें कम से कम अब तो समझ ही लेना चाहिए कि ‘समरथ को नहिं दोष गुसाईं।‘

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सपा-साइकिल अखिलेश की, अब बारी उत्तर प्रदेश की!

पिता मुलायम सिंह यादव से सपा और साइकिल की लड़ाई जीतने के बाद उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने कहा कि उनका अपने पिता से कोई झगड़ा नहीं था। उन्होंने कहा कि वह मेरे पिता हैं, उनसे कभी रिश्ता नहीं टूटेगा। उधर बेटे के हाथों मात खाने के बाद मुलायम भी ‘मुलायम’ दिख रहे हैं। सूत्रों की मानें तो पिता-पुत्र ने समझौते के साथ चुनाव लड़ने की तैयारी भी शुरू कर दी है।

गौरतलब है कि चुनाव आयोग से पार्टी और सिंबल का विधिवत अधिकार मिलने के बाद अखिलेश दो बार पिता से मिल चुके हैं। इसे रिश्तों में जमी बर्फ पिघलने के तौर पर देखा जा रहा है। वैसे यह मानने वालों की भी कमी नहीं है कि इनके रिश्तों पर कभी बर्फ जमी ही नहीं थी। बहरहाल, ख़बर है कि मुलायम ने अखिलेश को अपने 38 उम्मीदवारों की सूची सौंपी है और वे चाहते हैं कि अखिलेश इन सभी को टिकट दें। बदले में वे सपा उम्मीदवारों के खिलाफ अपना कोई प्रत्याशी नहीं उतारेंगे। सूत्रों के मुताबिक इस सूची में शिवपाल यादव का नाम नहीं है लेकिन उनके बेटे आदित्य का नाम इसमें शामिल है। कहा जा रहा है कि बदली परिस्थितियों में शिवपाल चुनाव नहीं लड़ना चाहते।

उधर अखिलेश खेमे से मिल रहे संकेतों के अनुसार मुलायम की सूची पर जल्द ही कोई ‘सकारात्मक’ जवाब मिलेगा। अखिलेश ने सोमवार को चुनाव आयोग से सिंबल मिलने के बाद पिता मुलायम से मिलकर उनका आशीर्वाद लिया था और मंगलवार को अपने सरकारी आवास पर पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए जोर देकर कहा कि पिता मुलायम के साथ कभी उनके मतभेद नहीं थे। उन्होंने कहा, सच तो यह है कि हमारी और उनकी लिस्ट में 90 प्रतिशत उम्मीदवार एक ही हैं।

देखा जाय तो पिछले कई हफ्तों से चल रहे समाजवादी संग्राम का अखिलेश के लिए इससे अच्छा अंत नहीं हो सकता था। इस पूरे घटनाक्रम के बाद न केवल पिता की सींची पार्टी पर उनका एकाधिकार हो गया, बल्कि चुनाव से ठीक पहले के अत्यंत महत्वपूर्ण माने जाने वाले समय में चौक-चौराहे से लेकर तमाम चैनलों की चर्चा के केन्द्र में वे रहे और अपने ‘स्टैंड’ व साफ-सुथरी छवि से आम जनता, जिनमें युवावर्ग को अलग से रेखांकित करना जरूरी है, की सहानुभूति और विश्वास भी अपनी झोली में भर ली। आज अखिलेश न केवल पार्टी के भीतर बल्कि बाहर भी इतनी मजबूत स्थिति में हैं कि कांग्रेस और आरएलडी जैसी पार्टियां उनसे गठबंधन को बांहें पसारे खड़ी हैं।

बता दें कि तेजी से आकार ले रही परिस्थितियों में अखिलेश-डिंपल, राहुल-प्रियंका और अजित सिंह के बेटे जयंत जैसे युवा चेहरों के एक मंच पर आने में अब औपचारिकता भर शेष है। न भूलें कि मुलायम और अजित भी संरक्षक की भूमिका में साथ खड़े होंगे। चुनाव निश्चित तौर पर अनिश्चितताओं का खेल है, पर इन सबके साथ आने पुर कुल मिलाकर जो तस्वीर उभर कर सामने आती है उससे भाजपा और बसपा के माथे पर बल पड़ रहे होंगे, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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ये दुर्घटना नहीं, 25 लोगों की ‘हत्या’ है मेरी सरकार!

अभी-अभी सम्पन्न हुए ऐतिहासिक प्रकाशोत्सव के दौरान अपनी तैयारी और मुस्तैदी से देश और दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींचने वाली बिहार सरकार ने मकर संक्रान्ति की जैसी अनदेखी की, वह हैरान कर देने वाली है। प्रकाशोत्सव के दौरान देश और दुनिया के अलग-अलग कोनों से लगभग 8 लाख लोग पटना आए, पर क्या मजाल कि किसी को कोई चोट तक लगी हो। लेकिन 14 जनवरी को राजधानी पटना से लगे गंगा दियारा में पर्यटन विभाग द्वारा आयोजित पतंग-उत्सव में महज कुछ हजार लोग जुटे और 25 लोग अपनी जान गंवा बैठे और कई लापता हैं! इस हादसे का वायरल हो चुका वीडियो देखें, प्रशासन का कोई आदमी आसपास भी नहीं दिखेगा आपको। क्या हमारा प्रशासन अब तक प्रकाश-पर्व की थकान मिटाने में लगा है और हमारी सरकार उस आयोजन के लिए मिली प्रशंसा के जश्न में खोई है?

जी हाँ, प्रशासनिक लापरवाही इस दुर्घटना की सबसे बड़ी वजह है। गौरतलब है कि प्रकाश-पर्व से जुड़ी तमाम तैयारियों की निगरानी मुख्य सचिव और डीजीपी स्तर के अधिकारियों के अलावा खुद मुख्यमंत्री कर रहे थे, जबकि मकर संक्रान्ति के लिए उसकी चौथाई तत्परता भी न थी। आखिर मकर संक्रान्ति के साथ ऐसा सौतेला व्यवहार क्यों? क्या सरकार का समूचा तंत्र इस दिन मुख्यमंत्री द्वारा आयोजित चूड़ा-दही भोज में व्यस्त था? अगर नहीं, तो प्रकाशोत्सव पर इतनी चुस्ती और पतंगोत्सव पर ऐसी चूक क्यों? कहीं ऐसा तो नहीं कि वो अंतर्राष्ट्रीय आयोजन था और उसमें शामिल होने वाले लोग उसका प्रचार दूर-दूर तक करते, जबकि पतंगोत्सव में शामिल होनेवाले अधिकांश लोग राजधानी पटना और आसपास के थे? ये चिराग तले अंधेरा नहीं तो और क्या है?

बता दें कि आयोजन-स्थल के पास ही बना डॉल्फिन आइलैंड अम्यूजमेंट पार्क इस हादसे की दूसरी बड़ी वजह है। जिस जगह इस पतंगबाजी का आयोजन किया गया था उससे थोड़ी ही दूरी पर ये अम्यूजमेंट पार्क भी है, जहाँ लोग काफी संख्या में जुटे थे। स्थानीय लोगों के मुताबिक जो नाव डूबी, उस पर सवार लोगों में बड़ी संख्या इसी पार्क में घूमने आए लोगों की थी। जबकि आप आश्चर्य करेंगे कि इस अम्यूजमेंट का निर्माण ही अवैध है। इसे बिना किसी सरकारी या प्रशासनिक मंजूरी के ही बनाया गया है।

इस दर्दनाक घटना की तीसरी वजह थी नाव पर क्षमता से अधिक लोगों की मौजूदगी। इस नाव पर 50 से ज्यादा लोग मौजूद थे, जबकि होने चाहिएं थे आधे से भी कम। स्थानीय लोग बताते हैं कि शाम होने पर सब वापस लौटने की जल्दी में थे, पर प्रश्न उठता है कि उन्हें रोकने-टोकने और भीड़ को व्यवस्थित करने की जिम्मेदारी जिनके ऊपर थी, वो कहाँ थे? पर्याप्त संख्या में नाव और स्टीमर क्यों नहीं थे? और ऐसी आपातस्थिति से निबटने के लिए पर्याप्त गोताखोर क्यों नहीं थे?

बहरहाल, अनहोनी तो हो गई। पर क्या इसे दुर्घटना कहेंगे? क्या सरकार और प्रशासन की लापरवाही के कारण, अनजाने में ही हुई, ‘हत्या’ नहीं है ये? राज्य और केन्द्र सरकार अब मृतकों पर मुआवजों की बारिश करेगी। पर इससे होगा क्या? जिन लोगों ने अपनी जानें गंवाईं उनके घरों की ‘मकर संक्रान्ति’ क्या फिर लौटेगी कभी?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘बड़े’ और ‘छोटे’ भाई ने दिया ‘समझदारी’ का परिचय

कहा जा रहा था कि 5 जनवरी को प्रकाश-पर्व के दौरान पटना के गांधी मैदान में हुए कार्यक्रम, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शिरकत की थी, में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार सहित अन्य चुनिंदा हस्तियों के साथ मंच पर नहीं बिठाए जाने से लालू सख्त नाराज हैं और इसकी शिकायत वे नीतीश से करेंगे। पर लालू ने संयम और समझदारी का परिचय देते हुए न केवल इस मसले को तूल नहीं दिया बल्कि यह कह कर सबको उलटा चौंका दिया कि “हमें किसी चीज की शिकायत नहीं है। पूजा-पाठ जमीन पर बैठकर करते हैं… और वह गुरु का दरबार था।“

गौरतलब है कि इस कार्यक्रम में लालू अपने दोनों बेटों के साथ मंच के सामने बिछी दरी पर बैठे थे। राजनीतिक गलियारे में इस बात की जमकर चर्चा हुई। आरजेडी खेमे में तो इस पर खासा हो-हल्ला मचा। पार्टी के उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने यहाँ तक कहा कि ऐसा नहीं लग रहा था कि गुरु गोविन्द सिंह जी के 350वें प्रकाश-पर्व के लिए इंतजाम महागठबंधन की सरकार ने किए थे। बल्कि ऐसा लग रहा था कि सत्ता में शामिल किसी एक पार्टी ने ये इंतजाम किए हों। उन्होंने स्पष्ट कहा कि लालू को मंच पर जगह नहीं देना लोगों को पसंद नहीं आया है। कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और बिहार सरकार में शिक्षा मंत्री अशोक कुमार चौधरी ने भी इसको लेकर विरोध जताया था। पर इन सबके उलट लालू, यहाँ तक कि विरोधियों द्वारा ‘अपरिपक्व’ कहे जाने वाले उनके बेटों तेजप्रताप और तेजस्वी ने भी, कोई तल्ख बयान नहीं दिया। नीतीश के प्रति कोई भी ‘कड़वाहट’ उनकी ओर से तो नहीं ही दिखी, मीडिया को भी इस मुद्दे को हवा देने से उन्होंने रोका।

लालू ने इस पूरे मामले को जिस तरह हैंडल किया और प्रकाशोत्सव को लेकर बिहार सरकार के काम की सराहना की उसका असर नीतीश पर भी दिखा। सोमवार को पटना में लोकसंवाद कार्यक्रम के दौरान उन्होंने कहा कि प्रकाशोत्सव के शानदार आयोजन की चारों ओर चर्चा है, पर कुछ लोग लालू प्रसाद जी के नीचे बैठने की बात उछाल रहे हैं। उनको यह भी पता नहीं कि गांधी मैदान के दरबार हॉल में धार्मिक कार्यक्रम का मूल आयोजनकर्ता कौन था। मूल आयोजनकर्ता गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी थी। सिख समाज में सब लोग जमीन पर ही बैठते हैं। जो लोग मंच पर थे, वे भी कुर्सी पर नहीं बैठे थे। राष्ट्रपति और प्रधानंमत्री के कार्यक्रम में मंच पर कौन बैठेगा, यह दिल्ली से ही तय होता है। बहरहाल, इतना कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि ‘बड़े’ और ‘छोटे’ भाई ने पूरे मामले में अत्यंत समझदारी का परिचय दिया, और ये काबिलेतारीफ है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या मोदी के हाथों में होगी राष्ट्रपति चुनाव की कुंजी?

पाँच राज्यों में होने जा रहे विधानसभा चुनाव से दो बातें साफ हो जाएंगी – पहली, नोटबंदी के बाद भाजपा और प्रधानमंत्री मोदी के प्रति देश का रुख क्या है? और दूसरी, मोदी के हाथों में राष्ट्रपति चुनाव की कुंजी होगी या नहीं? पहली बात से आप चौंके नहीं होंगे, लेकिन दूसरी बात पर आप जरूर ठहर गए होंगे कि इन चुनावों से राष्ट्रपति चुनाव का आखिर क्या कनेक्शन है? यकीन मानिए, कनेक्शन है और ऐसा है कि इन राज्यों, खासकर यूपी और पंजाब, में भाजपा के नहीं जीतने पर मोदी अपने मन का राष्ट्रपति नहीं बना पाएंगे। चलिए, जानते हैं कैसे?

राष्ट्रपति चुनाव के वोटों का समीकरण देखें तो वर्तमान में एनडीए के पास करीब 4.52 लाख वोट हैं और अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए उसे करीब एक लाख और वोटों की जरूरत है। अभी जिन पाँच राज्यों में चुनाव हो रहे हैं उनमें कुल 1, 03, 756 वोट दांव पर हैं। सबसे ज्यादा 83, 824 वोट यूपी के पास हैं और उसके बाद पंजाब की महत्वपूर्ण भूमिका है। जानकारों का मानना है कि भाजपा के यूपी और पंजाब में हारने की स्थिति में भी मोदी सरकार राष्ट्रपति चुनाव में अपना उम्मीदवार जिताने में कामयाब हो जाएगी। बस फर्क यह आएगा कि फिर उसे अपनी पसंद के उम्मीदवार की जगह सर्वस्वीकार्य उम्मीदवार की ओर जाना होगा। यानि ऐसा उम्मीदवार जो सभी दलों को मान्य हो।

राष्ट्रपति पद के अपने उम्मीदवार को जिताने के लिए जरूरी संख्याबल न होने की स्थिति में भाजपा को अन्य क्षेत्रीय दलों से बात करनी होगी। ऐसे में तृणमूल कांग्रेस, एआईएडीएमके, बीजेडी, तेलंगाना राष्ट्र समिति जैसी पार्टियों की भूमिका अहम हो जाएगी और भाजपा उनके रुख की ओर देखने के लिए बाध्य होगी। कहने की जरूरत नहीं कि इस स्थिति में एनडीए को अपने उम्मीदवार का चयन सोच-समझकर करना होगा, ताकि सबकी सहमति मिल सके।

गौरतलब है कि भारत में राष्ट्रपति पद का चुनाव अप्रत्यक्ष रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली के तहत किया जाता है। इसमें लोकसभा-राज्यसभा के चुने हुए सांसद और सभी राज्यों की विधानसभाओं के निर्वाचित विधायक हिस्सा होते हैं। विधायकों के वोट का मूल्य 1971 की आबादी के आधार पर एक निश्चित अनुपात में तय किया जाता है, और सभी राज्यों और दिल्ली-पुडुचेरी विधानसभाओं के कुल मतों के बराबर लोकसभा के 543 और राज्यसभा के 238 सदस्यों के वोटों का मूल्य होता है। फिलहाल एनडीए के पास करीब 4.52 लाख वोट हैं, जिनमें से अकेले भाजपा के पास करीब 3.68 लाख वोट हैं। वहीं, यूपीए के पास लगभग 2.30 वोट हैं, जिनमें से कांग्रेस के पास 1.50 लाख वोट हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदी-नीतीश हुए ‘नजदीक’ तो लालू हुए मंच से ‘दूर’!

पटना में आयोजित प्रकाश-पर्व अपनी अनूठे आतिथ्य और अभूतपूर्व भव्यता के साथ दो और कारणों से चर्चा में है – पहला, मोदी-नीतीश की जुगलबंदी से निकले नए सुर और दूसरा, लालू को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राज्यपाल रामनाथ कोविंद, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, केन्द्रीय मंत्री रविशंकर प्रसाद और मेजबान नीतीश कुमार के साथ मंच पर जगह नहीं मिलना, जबकि लालू अपने दोनों बेटों के साथ मंच के सामने ही विराजमान थे। बात अगर केवल मोदी और नीतीश द्वारा एक-दूसरे की तारीफ करने तक ही सीमित रहती तो थोड़ी देर के लिए कुछ और भी सोचा-समझा जा सकता था। लेकिन एक तरफ वे दोनों एक-दूसरे की प्रशंसा के पुल बांध रहे थे और दूसरी तरफ राज्य के मुख्यमंत्री और केन्द्र में रेलमंत्री रह चुके और वर्तमान में सत्तारूढ़ महागठबंधन के सबसे बड़े दल के सर्वेसर्वा लालू प्रसाद यादव अपने दोनों ‘लाल’ के साथ अपनी ‘असह्य अनदेखी’ से अपमान का दंश झेल रहे थे। जाहिर है, बात करने वाले बात करेंगे ही।

प्रश्न उठता है, ऐसा क्यों हुआ? क्या लालू की शख्सियत इतनी आसानी से नज़रअंदाज कर दी जाने वाली है, और वो भी बिहार में? कायदे से मंच पर उनकी जगह तो बननी ही चाहिए थी, पदानुसार उनके उपमुख्यमंत्री बेटे तेजस्वी को भी वहाँ होना चाहिए था। पर बाप-बेटे दोनों नदारद। मंच से भी और मोदी और नीतीश के संबोधन से भी। हालांकि प्रशासन के लोग ये तर्क दे रहे हैं कि केन्द्र के मंत्रियों को मंच पर जगह मिलनी चाहिए, ये पीएमओ की ओर से कहा गया था। चलिए ये मान लेते हैं। तो क्या ये भी मान लिया जाय कि लालू और तेजस्वी को मंच पर जगह न मिले, इसका भी निर्देश ‘ऊपर’ से ही था? क्या मेजबान नीतीश अपने विवेक का प्रयोग कर कम-से-कम लालू को मंच पर नहीं बुला सकते थे, जबकि मंच पर पर्याप्त जगह थी?

अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं जब मोदी और नीतीश एक-दूसरे को फूटी आँख देखना पसंद नहीं करते थे। 17 साल तक एनडीए के साथ सत्ता का सुख भोग चुके नीतीश ने मोदी को प्रधानंमत्री पद का उम्मीदवार घोषित किए जाने के साथ गठबंधन रिश्ते तोड़ डाले थे। बिहार के चुनाव में एक-दूसरे पर निशाना साधने में दोनों ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी। मोदी ने नीतीश पर अपने सामने से ‘थाली’ खींच लेने का आरोप लगाया तो नीतीश ने ‘डीएनए’ को मुद्दा बनाकर बकायदा हस्ताक्षर अभियान चलाया था। ऐसे में दोनों के बीच रिश्तों में आई ‘गर्माहट’ से अटकलबाजियों का बाज़ार गर्म होना स्वाभाविक है।

गौरतलब है कि आरजेडी और जेडीयू में भले ही गठबंधन हो, लेकिन दागी आरजेडी विधायक राजवल्लभ से लेकर सांसद शहाबुद्दीन तक के मामलों पर दोनों दलों का टकराव सामने आ चुका है। जमानत पर कुछ दिन के लिए बाहर निकले शहाबुद्दीन ने नीतीश को अपना नेता मानने से ही इनकार कर दिया था। वरिष्ठ आरजेडी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह खुलेआम कई बार नीतीश पर निशाना साध चुके हैं। नोटबंदी पर विपक्ष के एकजुट होने के प्रस्ताव पर जेडीयू के अलग होने पर भी आरजेडी सुप्रीमो लालू ने परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए इसे ‘इगो’ की समस्या कहा था।

राजनीति के जानकार मानते हैं कि नीतीश का ताजा रुख लालू पर राजनीतिक दवाब कायम करने की कवायद हो सकती है। नीतीश लालू को मैसेज देना चाहते हैं कि उनके सामने विकल्प खुले हुए हैं। उधर भाजपा को लगता है कि उसे स्वाभाविक तौर पर एक अतिरिक्त सहयोगी मिल जाय तो हर्ज ही क्या है? राज्यसभा में केन्द्र के सत्ताधारी गठबंधन का कम संख्याबल भी भाजपा को जेडीयू से नजदीकी बढ़ाने को प्रेरित करता है। कई अहम बिल वहाँ पास होने हैं। ऐसे में अगर आने वाले समय में मोदी और नीतीश का एक-दूसरे के लिए उपजा ‘प्रेम’ और प्रगाढ़ हो जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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मोदी भी हुए मुरीद, प्रकाश-पर्व पर मेजबानी की मिसाल बना बिहार

और नरेन्द्र मोदी भी मुरीद हो गए बिहार और नीतीश कुमार के। गुरु गोविंद सिंह के 350वें प्रकाश-पर्व पर आज पटना आए प्रधानमंत्री ने दिल खोलकर इस अवसर पर की गई भव्य व्यवस्था और भावपूर्ण आतिथ्य की सराहना की। साथ ही उन्होंने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की मुक्त कंठ से तारीफ की उनके शराबबंदी अभियान को लेकर और कहा कि देश और दुनिया के लिए मिसाल बनेगा बिहार। इससे पहले नीतीश कुमार ने भी शराबबंदी को लेकर गुजरात और इस संदर्भ में वहाँ के मुख्यमंत्री के तौर पर मोदी के योगदान की तारीफ की थी। अब परस्पर की गई ये ‘तारीफ’ कितनी ‘दूर’ तक जाती है, ये तो आने वाला वक्त बताएगा, फिलहाल बात प्रकाश-पर्व की।

देखा जाय तो बिहार के लिए इससे सुंदर नहीं हो सकता था नए साल का आगाज। एक ओर राजधानी पटना में सिक्खों के दसवें गुरु, गुरु गोविंद सिंह की 350वीं जयंती पर प्रकाशोत्सव का आयोजन तो दूसरी ओर बुद्ध की नगरी गया में 34वीं कालचक्र पूजा का अनुष्ठान… पटना में देश-विदेश से आए सिख तो गया में बौद्ध श्रद्धालुओं का सैलाब… यानि अंतर्राष्ट्रीय महत्व के दो विशाल आयोजनों का मेजबान बनना था बिहार को। देश-दुनिया की निगाहें टिकी थीं बिहार पर और बिहार ने इतिहास रच दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में क्या शानदार इंतजाम किया हमारे शासन और प्रशासन ने!

पिछले साल सितंबर में प्रकाशोत्सव की कड़ी में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय सिख कॉनक्लेव ने ही यह संकेत दे दिया था कि बिहार एक नया इतिहास लिखने की राह पर है। इसे महसूस कर ही पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल ने उस समय कहा था कि बिहार जैसा तो पंजाब भी नहीं कर सका। तब और आज प्रकाशोत्सव पर आई विभिन्न क्षेत्र की प्रमुख हस्तियों, श्रद्धालुओं, सेवादारों, जत्थेदारों के सुर एक हैं। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, पंजाब के पूर्व मुख्यमंत्री और पंजाब कांग्रस के अध्यक्ष कैप्टन अमरिंदर सिंह, पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल, केन्द्रीय मंत्री एसएस अहलुवालिया से लेकर पंजाब सहित देश और दुनिया के अलग-अलग कोने से आए अनगिनत श्रद्धालु तक – सब के सब चकित हैं बिहार की व्यवस्था और आतिथ्य देखकर।

पटना स्थित हरमंदिर साहब गुरुद्वारा हो, वहीं स्थित बाललीला साहब हो, भव्य दरबार हॉल हो, गांधी मैदान, पटना बाईपास और पटना सिटी स्थित कंगन घाट पर टेंट सिटी का निर्माण हो, इन स्थलों पर अनवरत चलने वाले लाखों लोगों का लंगर हो, मंगल तालाब का लेजर शो हो, गांधी मैदान से गुरुद्वारे तक लगभग नौ किलोमीटर तक चला नगर-कीर्तन हो, गुरु गोविंद सिंह के चित्रों की प्रदर्शनी हो, हरमंदिर साहब और गांधी मैदान सहित श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल, भारतीय नृत्य कला मंदिर, रविन्द्र भवन आदि के सांस्कृतिक आयोजन हों, शहर के चप्पे-चप्पे की सफाई, सजावट और सुरक्षा हो, स्वागत-द्वार, होर्डिंग व बैनर से पटे चौक-चौराहे हों या फिर कदम-कदम पर बने हेल्प डेस्क – हर चीज अद्भुत, अभूतपूर्व और अविस्मरणीय। मुख्य आयोजन-स्थल पटना के गांधी मैदान में तो जैसे पूरा का पूरा शहर ही बसा दिया गया – हर सुविधा से लैस।

बीते कुछ वर्षों में असहिष्णुता देश में बड़ा सियासी व सामाजिक मुद्दा बनकर सामने आया है। इन्हीं कारणों से बड़े धार्मिक आयोजन भी संवेदनशील बनते गए हैं। ऐसे में इतने बड़े उत्सव का इतना सफल आयोजन कर बिहार ने न केवल देश बल्कि दुनिया भर में मिसाल कायम की है। उम्मीद है कि एक बार  फिर बिहार की धरती से सर्व धर्म समभाव का संदेश दुनिया भर में जाएगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू के सारे सवाल ‘अनर्गल’ नहीं हैं प्रधानमंत्रीजी!

नोटबंदी के 50 दिन बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के राष्ट्र के नाम संदेश को आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने पूरी तरह फ्लॉप शो करार दिया है। नववर्ष की पूर्व संध्या पर दिए गए प्रधानमंत्री के इस संदेश को शून्य अंक देते हुए लालू ने भावहीन, प्रभावहीन, उत्साहहीन और घुटनों के बल रेंगता हुआ प्री-बजट भाषण बताया। भाषण में नोटबंदी की चर्चा नहीं करने पर तंज कसते हुए लालू ने कहा कि प्रधानमंत्री ने भी मान लिया है कि उनका अभियान बुरी तरह फेल हो गया, इसीलिए इसकी कोई चर्चा नहीं की। उपलब्धि होती तो पीट-पीटकर ढोल फाड़ देते।

प्रधानमंत्री मोदी को चुनौती देते हुए आरजेडी के मुखिया ने कहा कि त्याग-बलिदान की कथा और परमार्थ की बातें वे अपने अमीर मित्रों के सुनाकर देखें। दो मिनट में कुर्सी छिन जाएगी। इस ‘शुद्धि यज्ञ’ की ओट में गरीबों की बलि चढ़ाने का अधिकार उन्हें किसने दिया? प्रधानमंत्री पर देश को गुमराह करने का आरोप लगाते हुए लालू ने कहा कि 50-50 दिन चिल्लाने वाले प्रधानमंत्री पर अब कोई भरोसा नहीं करेगा। सैकड़ों लोगों की जान चली गई। 25 करोड़ लोगों का रोजगार छिन गया। इसके बावजूद इतना संवेदनहीन और हृदयहीन भाषण। अफसोस का एक शब्द भी नहीं।

प्रधानमंत्री से सवालों की झड़ी लगाते हुए लालू ने पूछा कि अर्थव्यवस्था का कितना नुकसान हुआ? इसकी भरपाई कैसे होगी? जीडीपी में कितनी गिरावट आई? नए नोट छापने पर कितना खर्च हुआ? कितना कालाधन आया? बैंकों में कितना जमा हुआ? कितनी नौकरी गई? लालू ने कहा कि मोदी को बताना चाहिए था कि आम लोगों की इतनी फजीहत के बाद कितना कालाधन आया? कितने भ्रष्टाचारियों पर कार्रवाई हुई? जो लोग कतारों में खड़े रहकर मर गए, उनके परिजनों को कितना मुआवजा दिया जाएगा? फैक्ट्रियों के बंद होने से बेरोजगार होने वाले लाखों युवाओं को सरकार कितनी राशि देगी?

इसमें कोई दो राय नहीं कि नोटबंदी मोदी सरकार का साहसिक और कई मायनों में ऐतिहासिक निर्णय था। इसके दूरगामी परिणाम भी प्रधानमंत्री के वादे के मुताबिक होंगे, ये भी मान लेते हैं। लालू का इस तरह सवालों की बौछार करना भी उनकी राजनीति का हिस्सा हो सकता है। लेकिन एक बार अपने हृदय पर हाथ रखें और कहें कि क्या सचमुच लालू के सारे सवाल तथ्यहीन और अनर्गल हैं? क्या नववर्ष की पूर्व संध्या पर प्रधानमंत्री मोदी सचमुच उस ‘रंग’ में थे, जिसके लिए वे जाने जाते हैं? उनके बहुप्रतीक्षित संबोधन में कुछ लुभावनी घोषणाएं तो थीं, लेकिन क्या हमारे-आपके मन में उमड़ते-घुमड़ते कई प्रश्न अनुत्तरित नहीं रह गए?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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