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और शशिकला से छिन गई परोसी थाली

जयललिता के बाद पार्टी और सरकार की सर्वेसर्वा बनने जा रही शशिकला के आगे से ‘परोसी थाली’ छिन गई। आय से अधिक संपत्ति के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दोषी करार दिया है। कोर्ट ने उन्हें चार वर्ष की सजा सुनाई है और साथ ही 10 करोड़ का जुर्माना भी लगाया है। माना जा रहा है कि कोर्ट के इस फैसले के बाद तमिलनाडु की सत्ता की कमान अब पन्नीरसेल्वम के हाथों में ही रहेगी। हालांकि शशिकला ने अभी हथियार नहीं डाले हैं। उन्होंने आनन-फानन में अपने समर्थकों के साथ मीटिंग की और पन्नीरस्वामी की पार्टी की प्राथमिक सदस्यता खत्म करने का ऐलान कर ई पलनिसामी को विधायक दल का नेता घोषित कर दिया। वो किसी भी कीमत पर पन्नीरसेल्वम के हाथों मे सत्ता जाने देना नहीं चाहतीं। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि सदन में कौन अपना बहुमत साबित करता है – ओ पन्नीरसेल्वम या ई पलनिसामी।

बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में एआईएडीएमके की मौजूदा महसचिव वीके शशिकला को तुरंत सरेंडर करने को कहा है। इस फैसले के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि उनका मुख्यमंत्री बनने का सपना न केवल अभी के लिए बल्कि अगले 10 वर्षों के लिए टूट गया। गौरतलब है कि उन्हें चार वर्षों की सजा मिली है और नियमानुसार इस सजा के छह वर्ष बाद तक वो चुनाव नहीं लड़ सकतीं। इस तरह शशिकला का यह ‘वनवास’ कम-से-कम 10 वर्षों का है। कहने की जरूरत नहीं कि राजनीति में 10 वर्ष कितनी बड़ी अवधि होती है।

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले पर पूरे देश की निगाह लगी थी। इसी फैसले से तय होना था कि तमिलनाडु की राजनीति का ऊँट किस करवट बैठेगा। माना जा रहा था कि राज्यपाल भी इस संभावित फैसले को ध्यान में रखकर ही शशिकला को सरकार बनाने के लिए आमंत्रित नहीं कर रहे थे। अब जबकि देश की सबसे बड़ी अदालत ने फैसला सुना दिया है, तमिलनाडु का राजनीतिक तापमान बहुत तेजी से बढ़ेगा। एक ओर ई पलनिसामी अपनी रणनीति बनाएंगे, दूसरी ओर पन्नीरसेल्वम नई ऊर्जा के साथ अपनी दावेदारी पेश करेंगे। शशिकला की अनुपस्थिति में उनके समर्थक ई पलनिसामी के साथ खड़े होंगे या पन्नीरसेल्वम के, यह देखने की बात होगी।

चलते-चलते बता दें कि सुप्रीम कोर्ट की बेंच के दो जजों ने अपने आदेश से पूर्व में दिए हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त कर दिया है और ट्रायल कोर्ट के फैसले को बरकरार रखा है। आय से अधिक संपत्ति के इस मामले में जयललिता को मुख्य आरोपी और शशिकला को सह आरोपी बनाया गया था। ट्रायल कोर्ट ने इस मामले में दोनों को दोषी करार देते हुए सजा का ऐलान किया था और जयललिता को कैद के साथ 100 करोड़ जुर्माने की सजा सुनाई थी, जिसे हाईकोर्ट ने पूरी तरह पलट दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब हाईकोर्ट के फैसले को निरस्त करते हुए पुन: ट्रायल कोर्ट के फैसले को ही मान्य ठहराया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या हम खिमजी प्रजापति नहीं बन सकते?

गुजरात के मेहसाना में रहने वाले खिमजी प्रजापति को रोटरी क्लब ऑफ इंडिया ‘लिट्रेसी हीरो अवार्ड’ से सम्मानित करेगी। आप सोच रहे होंगे कि ये कौन-सी बड़ी ख़बर है जो ‘मधेपुरा अबतक’ वाले परोस रहे हैं! जरा ठहरिए, आप खुद कहेंगे कि ये कितनी बड़ी ख़बर है जब मैं बोलूंगा कि खिमजी प्रजापति एक भिखारी हैं। जी हाँ, भिखारी। धन से गरीब पर मन से इतने अमीर कि आप और हम झेंप जाएं। क्या आप यकीन करेंगे कि 68 साल के प्रजापति लड़कियों को शिक्षा देने के लिए प्रेरित करने हेतु सोने के कुंडल देते हैं। उनकी इस अनोखी समाजसेवा के लिए रोटरी क्लब उन्हें पुरस्कृत कर रहा है। उन्हें 1 लाख रुपये की इनामी राशि के साथ-साथ परोपकार के कार्यों के लिए प्रशंसापत्र भी दिया जाएगा।

बता दें कि रोटरी क्लब ने इस पुरस्कार के लिए खिमजी प्रजापति के अलावा तीन अन्य लोगों और एक संस्थान को भी चुना है। जिन चार लोगों को इस सम्मान के लिए चुना गया है, वे सभी जाने-माने सामाजिक कार्यकर्ता हैं। अकेले प्रजापति हैं जिनके पास कोई संपत्ति नहीं है। उन्हें तो बस देकर खुशी मिलती है। वे कहते हैं कि मैं जब किसी जरूरतमंद को कुछ दे पाता हूं, तब ज्यादा खुश और संतुष्ट महसूस करता हूं।

फरवरी 2016 में प्रजापति का नाम तब सुर्खियों में आया था जब मेहसाना के मागपारा गांव स्थित आंगनबाड़ी स्कूल में पढ़ने वाली 10 लड़कियों को उन्होंने सोने के कुंडल दिए थे। इसके लिए उन्होंने इलाके में स्थित एक जैन मंदिर के बाहर भीख मांगकर पैसे जमा किए थे। समाज के लिए कुछ करने का उनका जुनून यहां रुक नहीं जाता। लड़कियों को स्कूल यूनिफॉर्म देने से लेकर उनका कन्यादान करने तक कई काम करते हैं वे, और बड़ी बात ये कि बिना किसी शोर, बिना किसी प्रचार के। उनकी एकमात्र इच्छा और अपने जीवन से एकमात्र उम्मीद यही है कि बच्चे पढ़ें, युवा पीढ़ी सशक्त बने और सब खुश रहें। कोई जरूरतमंद मिले तो खुले हाथों से वे मदद कर सकें।

खुद को मिल रहे पुरस्कार से उत्साहित खिमजी प्रजापति कहते हैं कि मैं ज़िन्दगी में कभी मेहसाना से बाहर नहीं गया। मैं एक साथ बहुत खुश भी हूं और घबराया हुआ भी। जिस ईश्वर ने मुझे औरों की मदद करने का हौसला दिया, वह मेरी मदद आगे भी करता रहेगा। गौरतलब है कि रोटरी क्लब ऑफ इंडिया का पुरस्कार ग्रहण करने के लिए उन्हें 3 मार्च को चेन्नई जाना है। हवाई जहाज से आने-जाने से लेकर होटल में उनके ठहरने व अन्य सुविधाओं का ध्यान क्लब की ओर से रखा जाएगा।

बहरहाल, खिमजी प्रजापति अपनी अद्भुत समाजसेवा के लिए अपने आसपास के इलाके में पहले से मशहूर थे। आज उनकी कीर्ति की खुशबू बाहर फैलने लगी है और हम-आप उनके बारे में पढ़ और लिख रहे हैं। यहां तक तो ठीक है, लेकिन एक बात मन-मस्तिष्क को लगातार कुरेद रही है और वो ये कि क्या हम खिमजी प्रजापति नहीं बन सकते? क्या आपके पास जवाब है इस सवाल का?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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क्या पहले चरण से शुरू हो जाएगी अखिलेश-राहुल की ‘होली’?

यूपी के चुनावी समर के लिए पहला चरण बहुत खास है। अगर कहें कि इस चरण में बाजी मारने वाली पार्टी या गठबंधन के हाथ में देश के सबसे बड़े राज्य की सत्ता की चाबी होगी तो गलत न होगा। इस चरण में यह तय हो जाएगा कि भाजपा अपने 2014 के लोकसभा चुनावों के प्रदर्शन को दुहराती है या सपा-कांग्रेस गठबंधन को निर्णायक बढ़त मिल जाती है? वैसे त्रिकोण बना रहीं मायावती को भी हम नज़रअंदाज नहीं कर सकते, जो अपने परंपरागत वोटों के साथ-साथ इस चुनाव में मुस्लिम वोटरों की पहली पसंद बनकर रेस में आगे निकलने का दावा कर रही हैं।

गौरतलब है कि पहले चरण में जिन 73 सीटों पर मतदान हो रहा है, 2012 के विधानसभा चुनाव में भाजपा ने उनमें से मात्र 11 सीटें जीती थी, पर 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने सबको चौंकाते हुए 68 सीटों पर बढ़त बनाई थी। 2012 में भाजपा को जहाँ 16.2 प्रतिशत मत मिले थे, वहीं 2014 में उसका वोट प्रतिशत बढ़कर 50.4 हो गया। इस आलोक में अगर हम अबकी हो रहे चुनाव का विश्लेषण करें तो कहा जा सकता है कि अगर पार्टी इस चुनाव में 15 से 20 प्रतिशत वोट गंवा देती है, तब भी उसकी झोली में 30 से 35 प्रतिशत वोट आएंगे, जो 2012 में उसे मिले वोटों से लगभग दोगुना होंगे।

इसमें कोई दो राय नहीं कि इस बार भाजपा कुछ ऐसा ही मानकर चल भी रही थी लेकिन आज अगर पार्टी अपने प्रदर्शन को लेकर आश्वस्त नहीं हो पा रही तो उसकी वजह है अखिलेश और राहुल का एक साथ आ जाना। हालांकि सपा के लिए यह इलाका राज्य के बाकी हिस्सों के मुकाबले कमजोर रहा है। 2012 में जब उसे बहुमत मिला था तब भी इस इलाके की 73 में से 24 सीटें ही उसके हिस्से में आई थीं और उसका वोट प्रतिशत बसपा से 5.5 प्रतिशत कम था। पर इस बार सपा के साथ कांग्रेस का वोट बैंक जुड़ जाने के कारण भाजपा और बसपा को अपना-अपना खेल बिगड़ने का डर सता रहा है। बता दें कि कांग्रेस ने 2012 और 2014 का चुनाव अजित सिंह की आरएलडी के साथ लड़ा था, पर इस बार सपा के साथ होने से जाहिर है कि उसकी ‘प्रासंगिकता’ बढ़ गई है।

वैसे मायावती की पार्टी बसपा का पश्चिमी यूपी में खासा असर रहा है। पार्टी इस इलाके में राज्य के बाकी हिस्सों से ज्यादा मजबूत रही है। 2012 में उसे इन 73 सीटों पर सबसे ज्यादा वोट भी मिले थे। हालांकि सीटें उसे सपा के लगभग बराबर ही मिली थीं, पर बड़ी बात यह थी कि लगभग सारी सीटों पर बसपा मुख्य मुकाबले में थी। इसके बाद 2014 के लोकसभा चुनाव में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के कारण पार्टी तीसरे नंबर पर चली गई थी। लेकिन इस बार के चुनाव में सांप्रदायिक तनाव काफी हद तक कम हो चुका है और ऐसे में मायावती को अपने दलित-मुस्लिम गठजोड़ के चल निकलने की उम्मीद थी। पर सपा और कांग्रेस ने एक साथ आकर मुस्लिमों को पहले से अधिक मजबूत विकल्प दे दिया है। जाहिर है कि इन परिस्थितियों में मायावती चैन से नहीं बैठ पा रहीं।

कुल मिलाकर यह कि पहले चरण के नतीजे जो भी हों, इस चरण को छूकर जो ‘हवा’ निकलेगी वो सत्ता के गलियारे की दिशा बता देगी, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

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लगातार चौथे टेस्ट सीरीज में दोहरे शतक का ‘विराट’ कारनामा

दिन-ब-दिन और विराट होते जा रहे भारतीय क्रिकेट टीम के कप्तान विराट कोहली ने शुक्रवार को इतिहास रच दिया। उन्होंने बांग्लादेश के खिलाफ हैदराबाद में खेले जा रहे टेस्ट मैच के दूसरे दिन दोहरा शतक जड़कर वो कारनामा कर दिखाया जो क्रिकेट इतिहास में अब तक कोई नहीं कर पाया था। जी हाँ, कोहली अब दुनिया के अकेले ऐसे बल्लेबाज हैं जिसने लगातार चार टेस्ट सीरीज में दोहरे शतक बनाए हों। अपनी इस ऐतिहासिक पारी में कोहली ने 204 रन ठोके और और उनकी इस पारी की बदौलत भारत ने मात्र छह विकेट पर 687 रनों का पहाड़ खड़ा कर दिया। गौरतलब है कि टेस्ट क्रिकेट में भारत का यह पांचवां सर्वोच्च स्कोर है और इस स्कोर के साथ भारतीय टीम लगातार तीन पारियों में 600 से ज्यादा रन बनाने वाली दुनिया की इकलौती टीम बन गई है।

फिलहाल बात विराट कोहली के डबल सेंचुरी के अद्भुत ‘चौके’ की। शुक्रवार को बांगलादेश के खिलाफ खेले जा रहे एकमात्र टेस्ट के दूसरे दिन कोहली ने अपने ओवरनाइट स्कोर 111 से आगे खेलना शुरू किया और लंच के बाद अपना चौथा शतक पूरा किया। इस दौरान क्रिकेट के इस 28 वर्षीय ‘करिश्मे’ ने कई रिकॉर्ड अपने नाम किए। 204 रनों के साथ ही कोहली होम सीजन में सबसे ज्यादा रन बनाने वाले बल्लेबाज भी बन गए। ऐसा करते हुए उन्होंने वीरेन्द्र सहवाग का रिकॉर्ड तोड़ा।

बहरहाल, कोहली का यह दोहरा शतक क्या मायने रखता है इसका अंदाजा हम इसी से लगा सकते हैं कि अपनी इस उपलब्धि के साथ उन्होंने सर डॉन ब्रैडमैन और राहुल द्रविड़ का रिकॉर्ड तोड़ दिया जिन्होंने लगातार तीन टेस्ट सीरीज में तीन दोहरे शतक लगाए थे।

याद दिला दें कि कोहली ने अपना पहला दोहरा शतक वेस्टइंडीज के खिलाफ पहले टेस्ट में बनाया था। इस मैच में उन्होंने 200 रन बनाए थे। इसके बाद न्यूजीलैंड के खिलाफ इंदौर में उन्होंने 211 रन बनाए। उनका तीसरा दोहरा शतक (235 रन) इंग्लैंड के खिलाफ था और अब बांग्लादेश के खिलाफ 204 रनों की ये यादगार पारी।

टेस्ट क्रिकेट में चार दोहरे शतक के साथ कोहली ने सुनील गावस्कर की चार डबल सेंचुरी की बराबरी भी कर ली। वैसे भारत की ओर से सचिन और सहवाग ने सर्वाधिक 6-6 दोहरे शतक बनाए हैं, जबकि अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में सबसे ज्यादा 12 दोहरे शतक डॉन ब्रैडमैन के नाम हैं। पर महज 28 साल के कोहली के रनों का जैसा तूफानी सिलसिला चल रहा है, कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर ये धाकड़ बल्लेबाज सर डॉन ब्रैडमैन के दोहरे शतकों का रिकॉर्ड भी तोड़ दे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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प्रवासियों के बिना आप अमेरिका को नहीं पहचानेंगे !

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सात मुस्लिमबहुल देशों – सीरिया, सूडान, इराक, ईरान, सोमालिया, यमन और लीबिया – के प्रवासियों और शरणार्थियों के अमेरिका में प्रवेश पर रोक लगा दी है। ट्रंप की ओर से जारी आदेश के अनुसार सीरियाई शरणार्थियों के अमेरिका आने पर अनिश्चित काल के लिए रोक लग गई है, जबकि अन्य छह देशों के शरणार्थियों पर 120 दिनों तक रोक रहेगी। और तो और इन देशों के सामान्य नागरिकों को भी 90 दिनों तक अमेरिकी वीजा नहीं मिलेगा। उनके इस फैसले का अमेरिका समेत दुनिया भर में विरोध हो रहा है।

ट्रंप का यह फैसला निहायत हैरतअंगेज है। साथ ही हास्यास्पद और आत्मघाती भी। कारण यह कि जिस अमेरिका के तथाकथित हित के लिए उन्होंने यह विवादास्पद कदम उठाया है, वो अमेरिका आज महाशक्ति न कहलाता अगर वहां प्रवासी न होते। आपको आश्चर्य होगा कि अमेरिका की जो हस्तियां आज वहां की पहचान बन चुके हैं, उनमें से अधिकतर प्रवासी ही हैं। ऐसी हस्तियों की फेहरिस्त खासी लंबी है। फिलहाल यहां चर्चा कुछ चुनिंदा लोगों की।

शुरुआत करते हैं ऐपल के स्टीव जॉब्स से। स्टीव जॉब्स मूलत: सीरिया के रहने वाले मुसलमान अब्दुल फतह जंदाली और जर्मन प्रवासी महिला कैरोले शिबेल की संतान थे। यही नहीं, ऐपल की स्थापना में एक और स्टीव – स्टीव वोज्नियाक – का योगदान था और वे भी जॉब्स की तरह यूक्रेनी प्रवासी के बेटे थे। इसी तरह दिग्गज अमेरिकी कम्प्यूटर टेक्नोलॉजी कंपनी ओरेकल के सह-संस्थापक लैरी इलिससन इटली के एक प्रवासी के जैविक बेटे थे। उन्हें अविवाहित यहूदी महिला ने जन्म दिया था।

अब बात करते हैं गूगल की। रूस में जन्मे सेरगे ब्रिन ने लैरी पेज के साथ मिलकर दुनिया के इस सबसे बड़े सर्च इंजन की स्थापना की थी। वे फिलहाल गूगल की पैरंट कंपनी अल्फाबेट के प्रेसिडेंट हैं। और जनाब, गूगल के मौजूदा सीईओ सुंदर पिचाई को तो आप जान ही रहे होंगे। भारतीय मूल के पिचाई ने आईआईटी खड़गपुर से बीटेक किया था और 2015 में वे गूगल के सीईओ बने थे।

अगर आप सोच रहे हैं कि ये सूची खत्म हो गई है तो ऐसा बिल्कुल भी नहीं है। अभी तो कई महारथी बाकी हैं। अब अमेरिका की दिग्गज ऑटोमेकर और एनर्जी स्टोरेज कंपनी टेस्ला के फाउंडर एलन मस्क को ही लीजिए। मस्क दक्षिण अफ्रीका में जन्मे थे और कनाडा से अमेरिका प्रवासी के तौर पर आए थे। इसी तरह विश्वप्रसिद्ध ई-कॉमर्स और ऑक्शन साइट ई-बे के संस्थापक पियरे ओमिड्यार मूलत: ईरान के थे और यू-ट्यूब के सह-संस्थापक स्टीव चेन का जन्म ताइवान में हुआ था। फेसबुक के सह-संस्थापकों में एक एडुअर्डो सेवरिन भी ब्राजीली प्रवासी हैं।

थोड़ा पीछे चलकर देखें तो बैंक ऑफ अमेरिका के संस्थापक एमेडियो गियान्निनी के माता-पिता इटली के प्रवासी नागरिक थे। इसी तरह दुनिया की दिग्गज विमानन कंपनियों में से एक बोइंग एयरोस्पेस की स्थापना करने वाले विलियम बोइंग ऑस्ट्रिया और जर्मनी से आए प्रवासियों की संतान थे। दुनिया की दिग्गज कंप्यूटिंग कंपनियों में एक इंटल के संस्थापक एंड्रयू ग्रो, जिनका पिछले साल देहांत हुआ, हंगरी से आकर अमेरिका में बसे थे।

सबसे दिलचस्प बात तो यह है कि प्रवासियों पर रोक लगाने का फैसला सुनाने वाले ट्रंप स्वयं स्कॉटिश महिला और जर्मन मूल के पिता की संतान हैं। उऩके ग्रैंडपैरेंट्स जर्मनी के कालस्टैड शहर से अमेरिका गए थे। यही नहीं, बराक ओबामा – ट्रंप से ठीक पहले लगातार आठ वर्षों तक व्हाइट हाउस जिनका पता रहा था – के पिता भी केन्याई मूल के मुस्लिम थे, जबकि उनकी मां अमेरिकी ईसाई थीं।

अब आप ही बतायें, क्या इन प्रवासियों के बिना अमेरिका की कल्पना भी की जा सकती है? कहने की जरूरत नहीं कि ट्रंप ने अगर समय रहते अपनी भूल नहीं सुधारी तो अमेरिका की पहचान ही संकट में पड़ जाएगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार का कसूर बताएं, जेटलीजी!

2017-18 के केन्द्रीय बजट में आश्चर्यजनक ढंग से बिहार की अनदेखी हुई है। इस बार भी बिहार का हाथ खाली का खाली रह गया। क्या ये बिहार विधानसभा चुनाव में मनोनुकूल परिणाम न मिलने की सजा है? अगर नहीं, तो जेटलीजी बिहार का कसूर बताएं। वे बताएं कि इस बार के बजट में अगर झारखंड और गुजरात में एम्स दिया जा सकता है, तो फिर बिहार की उपेक्षा का क्या आधार है? क्या ये महज संयोग है कि इन दो राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं और बिहार में नहीं?

कम-से-कम वित्तमंत्री अपने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के वादे की लाज ही रख लेते, जिन्होंने अपनी चुनावी सभाओं में बिहार को विशेष पैकेज और विशेष दर्जा देने की बात कही थी। मगर, दूसरी बार भी बिहारवासियों के हिस्से में निराशा ही क्यों? क्या बिहार को महाराष्ट्र, गुजरात जैसे विकसित राज्य के समकक्ष लाने के लिए केन्द्रीय बजट में यहाँ के लिए अतिरिक्त राशि का प्रावधान जरूरी नहीं?

सड़क, पुल और परिवहन के मामले में भी बिहार की उपेक्षा हुई है। बजट में राज्य के लिए इस क्षेत्र में कोई नई योजना नहीं दिखी। यहाँ तक कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा घोषित सवा लाख करोड़ पैकेज में पहले से चल रही जिन योजानाओं की चर्चा थी, उनकी भी गति तेज करने का कोई प्रयास नहीं दिखा।

किसी से छिपा नहीं है कि बिहार को हर साल नेपाल से आने वाली नदियों से भारी तबाही झेलनी पड़ती है और साथ ही सूखे का प्रकोप भी झेलना पड़ता है। फिर भी इस बजट में नदियों को जोड़ने की परियोजना, गाद प्रबंधन नीति और फरक्का बराज से पैदा हुए संकट से उबरने के उपाय नहीं किए गए।

और तो और, इस बजट में बिहार को बीआरजीएफ (Backward Regions Grant Fund) मद की बकाया राशि केन्द्र से मिलने की उम्मीद थी, मगर वो भी नहीं मिली। क्या ये बिहार के साथ भेदभाव नही? आश्चर्य तो ये है कि प्रधानमंत्री तो प्रधानमंत्री, केन्द्र में बैठे बिहार के आधा दर्जन मंत्री भी इस मसले पर चुप हैं।

ये तो हुई बिहार की बात। वैसे भी इस बजट में आर्थिक सुधार के लिए कोई रणनीतिक तैयारी की झलक नहीं मिलती है, जबकि यह निजी निवेश में बढ़ोतरी की अनिवार्य शर्त है। सार्वजनिक निवेश में बढ़ोतरी के लिए भी खास नीति का जिक्र नहीं है। जो भी इन्सेंटिव दिया गया है, वह कुछ मायनों में हाउसिंग सेक्टर के लिए है। पर क्या देश का विकास सिर्फ इसी से हो जाएगा?

विकास के दो मुख्य आधार हैं – कृषि और उद्योग। लेकिन न तो कृषि को बढ़ावा देने की रणनीति पर कोई काम हुआ है, न ही उद्योग के नए क्षेत्रों के विकास पर बजट में कुछ खास कहा गया है। बजट में वैश्विक आधारभूत आय का जिक्र नहीं है, जबकि आर्थिक सर्वेक्षण में इसका उल्लेख है। आमतौर पर बजट और आर्थिक सर्वेक्षण में तालमेल रहता है, मगर इस बार इसका ख्याल नहीं रखा गया है। क्या वित्तमंत्री इस पर रोशनी डालने की जहमत उठाएंगे?

अंत में माननीय वित्तमंत्री से एक सवाल और। उन्होंने अपने दो घंटे से भी ज्यादा लंबे भाषण में ये क्यों नहीं बताया कि नोटबंदी के क्या-क्या फायदे हुए? उन्होंने इससे भविष्य में बेहतर परिणाम की बात तो कही, लेकिन नोटबंदी से जिनका रोजगार छिन गया उनकी क्षतिपूर्ति के लिए सरकार वर्तमान में क्या कर रही है, इस पर क्या उन्हें कुछ बोलना नहीं चाहिए?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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किसी में हिम्मत हो तो ‘उनके’ धर्मगुरु पर फिल्म बनाए : गिरिराज

अपने विवादास्पद बयानों के लिए चर्चा में रहने वाले भाजपा नेता एवं केन्द्र सरकार में मंत्री गिरिराज सिंह ने एक बार फिर गैरजिम्मेदाराना बयान दिया है। इस बार उनका बयान फिल्म ‘पद्मावती’ को लेकर आया है। गिरिराज का कहना है कि फिल्म में रानी पद्मावती को इस तरह दिखाने का मूल कारण यही है कि वो हिन्दू थीं। पद्मावती अगर हिन्दू नहीं होतीं तो शायद ही कोई इस तरह की हिम्मत दिखा पाता।

गौरतलब है कि 27 जनवरी को जयपुर के जयगढ़ किले में फिल्म ‘पद्मावती’ की शूटिंग के दौरान राजपूत संगठन करणी सेना के कार्यकर्ताओं ने अचानक हमला बोल दिया था। उन्होंने सेट पर जमकर तोड़-फोड़ की, यूनिट के लोगों को मारा-पीटा और अभद्रता की पराकाष्ठा ये कि हिन्दी सिनेमा को कई यादगार फिल्में देने वाले इस फिल्म के निर्देशक संजय लीला भंसाली को थप्पड़ मारने से भी वे नहीं झिझके। उनका आरोप था कि इस फिल्म के लिए अलाउद्दीन खिलजी (रणवीर सिंह) और रानी पद्मावती (दीपिका पादुकोण) के बीच कथित तौर पर ‘लव सीन’ फिल्माया जा रहा था, जिस पर उन्हें सख्त आपत्ति थी। हालांकि भंसाली फिल्म ऐसे किसी आपत्तिजनक प्रसंग से इनकार कर चुके हैं।

बहरहाल, करणी सेना को इस घटना से पूर्व राजस्थान से बाहर के लोग शायद ही जानते हों। इस तरह के कई संगठन विभिन्न राज्यों में हैं जो संकीर्ण विचारधारा से प्रेरित होते हैं और ‘तात्कालिक लाभ’ के लिए इस तरह के कार्य करते हैं। लेकिन केन्द्रीय कैबिनेट में बैठे किसी मंत्री से ऐसे बयान की आशा नहीं की जा सकती थी। हद तो तब हो गई, जब उन्होंने उक्त घटना का समर्थन तक कर दिया। बकौल गिरिराज, ‘जनता ने भारतीय इतिहास के साथ छेड़छाड़ करने वालों को सजा’ दी है। उन्होंने कहा कि इतिहास गवाह है कि रानी पद्मावती ने अपने आपको मिटा दिया लेकिन मुगलों के आगे धुटना नहीं टेका, लेकिन इस देश में औरंगजेब और टीपू सुल्तान को आदर्श मानने वाले लोग इतिहास के साथ लगातार खिलवाड़ कर रहे हैं।

गिरिराज इतने पर भी रुक जाते तो एक बात थी। पर वे तो अपनी आदत (या राजनीति) से लाचार ठहरे। आगे उन्होंने तंज कसते हुए कहा कि हिन्दू देवी-देवताओं पर कोई भी फिल्म बना देता है। फिर एक खास समुदाय की ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि किसी में हिम्मत हो तो उनके धर्मगुरु पर कोई फिल्म बनाकर दिखाए। क्या गांधी के इस देश में नेताओं का काम बस ‘आग’ में ‘घी’ डालना रह गया है?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्यों न जगेगी आस, जब डीएम लेंगे क्लास

पटना के डीएम कल स्थानीय बांकीपुर गर्ल्स हाई स्कूल में थे। आप सोचेंगे वे स्कूल के प्रशासनिक दौरे पर गए होंगे, किसी सभा-सेमिनार का आयोजन होगा वहाँ, किसी चीज का शिलान्यास करना होगा उन्हें या फिर किसी कार्यक्रम का उद्घाटन कर रहे होंगे वे। आमतौर पर प्रशासन-तंत्र का सबसे व्यस्त अधिकारी स्कूल जाता भी इन्हीं कारणों से है। लेकिन अगर कहा जाय कि पटना के डीएम स्कूल में क्लास ले रहे थे, तो क्या यकीन करेंगे आप? और अगर कहा जाय कि डीएम समेत तमाम बड़े अधिकारी अब ऐसा नियमित रूप से करेंगे, तब तो आप पक्के तौर पर यकीन नहीं करेंगे। लेकिन जनाब, बिहार में पटना से ये अनूठी पहल हो चुकी है और यहाँ के डीएम संजय कुमार अग्रवाल समेत तमाम बड़े अधिकारी आपको राजधानी के विभिन्न स्कूलों में नियमित रूप से क्लास लेते हुए दिखा करेंगे।

गौरतलब है कि पटना के डीएम संजय कुमार अग्रवाल ने अपने ढंग की अनोखी मिसाल कायम करते हुए तमाम बड़े अधिकारियों को सप्ताह में एक दिन एक घंटा किसी एक सरकारी स्कूल में बच्चों को पढ़ाने का निर्देश दिया और शुक्रवार को पटना के बांकीपुर गर्ल्स हाई स्कूल में खुद शिक्षक की भूमिका निभाकर इसकी शुरुआत भी कर दी। बकौल डीएम जिले के सब डिविजन और ब्लॉक स्तर के अधिकारी अपने-अपने क्षेत्र के सरकारी विद्यालयों में सप्ताह में एक घंटे के लिए अब इसी तरह शिक्षक की भूमिका में नज़र आएंगे। उन्होंने कहा कि इससे न केवल छात्र-छात्राओं में आत्मविश्वास का संचार होगा, बल्कि करियर काउंसलिंग भी हो पाएगी। इस पहल से सभी विद्यालयों में गुणात्मक सुधार आएगा। अधिकारीगण करंट अफेयर एवं एक्स्ट्राकरिक्युलर ऐक्टिविटी भी बच्चों को बताएंगे।

बता दें कि अब जिले के सभी स्कूलों में एक निरीक्षण पंजी रखी जाएगी, जिस पर अधिकारी रिमार्क लिखेंगे और उन चीजों को भी अंकित करेंगे जो वहाँ के बच्चों के लिए जरूरी हैं। स्कूलों में अधिकारियों के लगातार दौरा करने से छात्रों की उपस्थिति, शिक्षकों की उपलब्धता और मिड-डे मील समेत तमाम मूलभूत सुविधाओं की गुणवत्ता में इजाफा होगा, इसमें कोई दो राय नहीं।

पटना के डीएम संजय कुमार अग्रवाल को उनकी अनूठी पहल के लिए जितनी बधाई दी जाय कम है। बिहार में चिन्ता का सबब बन चुकी शिक्षा के सांचे और ढांचे में सुधार के लिए उन्होंने जो अलख जगाई है, उम्मीद है आने वाले समय में बाकी जिलों में भी इसकी लौ जलती दिखाई दे। ऐसे प्रयत्नों से ही बिहार बढ़ेगा और उस गौरव को फिर से हासिल करेगा जिसका वो हकदार है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अबु धाबी के शहजादे ने कहा भारत जैसा कोई नहीं

गणतंत्र दिवस के मौके पर मुख्य अतिथि के रूप में भारत आए अबु धाबी के शहजादे शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान भारत के मुरीद हो गए। गणतंत्र दिवस परेड की भव्यता, भारत का समृद्ध अतीत और वर्तमान की उपलब्धियां, भारत की मेहमाननवाजी और भारतीय संस्कारों में बसे हमारे मूल्य – अल नाहयान कहने को बाध्य हो गए कि भारत जैसा कोई नहीं। गौरतलब है कि अल नाहयान राजपथ पर राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और अन्य गणमान्य हस्तियों के साथ मुख्य परेड के गवाह बने थे। उन्होंने गणतंत्र दिवस समारोह को ‘विविधता में एकता का जश्न’ की संज्ञा दी और कहा कि भारत ने इसके माध्यम से दुनिया को मानवता का संदेश दिया है।

अबु धाबी के शहजादे ने अपने औपचारिक ट्विटर अकाउंट एमबीज़ेड न्यूज पर कहा है कि मैं भारतीय लोगों के साथ गणतंत्र दिवस समारोह में शरीक होकर बहुत खुश हूँ और सम्मानित महसूस कर रहा हूँ। उन्होंने कहा कि गणतंत्र दिवस समारोह में यूएई की भागीदारी हमारे रिश्तों की गहराई को दर्शाती है जो आपसी सम्मान और समान हितों पर आधारित है। बता दें कि भारत के इस 68वें गणतंत्र दिवस परेड के मौके पर यूएई सेना की टुकड़ी ने भी अपने देश के ध्वज के साथ हिस्सा लिया जिसमें उनका संगीत बैंड शामिल था। इस टुकड़ी में कुल 149 जवान थे जिनमें 35 संगीतकार हैं।

बता दें कि अबु धाबी के शहजादे अल नाहयान दुनिया के उन गिने-चुने नेताओं में शामिल हो गए हैं जिन्हें भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि का दर्जा दिया गया है। पिछले साल गणतंत्र दिवस समारोह के मुख्य अतिथि फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांस्वा ओलांद थे, जबकि साल 2015 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा मुख्य अतिथि थे। इसी तरह साल 2014 में जापान के प्रधानमंत्री शिंजो एबे और 2013 में भूटान के राजा जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक मुख्य अतिथि थे। भारत के गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर शामिल होने वाले नेताओं में निकोलस सरकोजी, ब्लादीमिर पुतिन, नेल्सन मंडेला, जॉन मेजर, मोहम्मद खातमी, याक शिराक आदि प्रमुख रहे हैं।

इस साल गणतंत्र दिवस का एक बड़ा आकर्षण यह भी रहा कि इस अवसर पर दुनिया की सबसे ऊँची इमारत बुर्ज खलीफा को एलईडी प्रकाश के माध्यम से तिरंगे के रंग से रंगा गया। भारत-यूएई के प्रगाढ़ संबंधों के साथ-साथ इसे विश्व-मंच पर भारत के बढ़ते कद की स्वीकृति कहना भी अनुचित नहीं होगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नीतीश भी लालू की राह पर, जेडीयू नहीं लड़ेगी यूपी का चुनाव

कल तक यूपी में चुनावी जमीन तलाश रही जेडीयू ने अचानक यू-टर्न लिया है। पहले वहाँ ‘महागठबंधन’, फिर ‘गठबंधन’ की तमाम कोशिशों के नाकाम रहने के बाद पार्टी ने मौजूदा विधानसभा चुनाव से दूर रहने का फैसला किया है। नीतीश कुमार के नेतृत्व में पटना में सोमवार को हुई पार्टी नेताओं की बैठक में तय किया गया कि जेडीयू यूपी में सेक्युलर वोटों का बिखराव नहीं करेगी और सेक्युलर ताकतों की जीत के लिए अपील करेगी।

जेडीयू के यूपी चुनाव में ताल ठोकने की दो बड़ी वजहें थीं – पहली, बिहार में महागठबंधन के प्रयोग को मिली बड़ी सफलता और दूसरी, यहाँ लागू की गई शराबबंदी को मिला राष्ट्रव्यापी समर्थन। जेडीयू को लगा कि यूपी में हाथ आजमाने का ये सही वक्त है। लेकिन सारी जद्दोजहद के बावजूद पार्टी वहाँ के समीकरण में खुद को फिट नहीं कर पाई। जो भी हो, जेडीयू ने देर से सही लेकिन दुरुस्त निर्णय लिया है। वैसे भी जेडीयू की कमोबेश वहाँ वैसी ही स्थिति रहती जैसी समाजवादी पार्टी की बिहार में रही है या रह सकती है। ऐसे में चुनाव से दूर रहकर नीतीश ने अपनी साख को बट्टा लगने से तो बचा ही लिया, साथ ही सपा-कांग्रेस की जीत की स्थिति में सेक्युलर वोटों के नहीं बिखरने का श्रेय भी लेंगे वो अलग।

हालांकि सच यह है कि पार्टी ने किसी ‘चमत्कार’ की प्रतीक्षा अंतिम क्षण तक की। पार्टी के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव, प्रधान महासचिव केसी त्यागी, नीतीश के करीबी आरसीपी सिंह और रणनीतिकार प्रशांत किशोर की मदद से कोशिश की गई कि सपा-कांग्रेस गठबंधन में अजित सिंह के राष्ट्रीय लोकदल के शामिल होने की स्थिति में जेडीयू को भी कुछ सीटें मिल जाएं, लेकिन जब इस गठबंधन में यूपी के कुछ हिस्सों में अस्तित्व रखने वाली रालोद की जगह ही नहीं बन पाई तो फिर जेडीयू की बात ही क्या थी।

बहरहाल, नीतीश और उनकी पार्टी ने सूझ-बूझ वाला निर्णय लिया है। राजनीति के जानकार बताते हैं कि इस निर्णय के पीछे आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के यूपी चुनाव को लेकर लिए गए स्टैंड की भूमिका भी है। लालू ने पहले ही अपनी स्थिति भांप कर राजनीतिक परिपक्वता का परिचय दिया था और चुनाव न लड़ने व सपा को साथ देने की बात की थी। अब जेडीयू भी कमोबेश उन्हीं के नक्शेकदम पर है। अच्छी बात है कि यूपी चुनाव के कारण बिहार के जेडीयू-आरजेडी-कांग्रेस गठबंधन में जो दूरी-सी आ गई थी, वो अब नहीं रहेगी। बिहार की राजनीतिक स्थिरता के लिए जहाँ ये अच्छा संकेत है, वहीं भाजपा इससे निराश हुई होगी – यूपी और बिहार दोनों के मद्देनज़र।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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