भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के कुलपति के पद पर पदासीन रहते हुए डॉ.महावीर प्रसाद यादव ने 13 अगस्त 1997 के दिन दुनिया को अलविदा कहा था। उनकी प्रतिमा पर सर्वप्रथम माल्यार्पण व पुष्पांजलि अर्पित करते हुए कुलपति प्रो.(डॉ.)ज्ञानांजय द्विवेदी एवं मुख्य अतिथि प्रो.(डॉ.)भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी सहित बीएन मुस्टा के महासचिव व सीनेेेटर प्रो.(डॉ.)नरेश कुमार, FA एससी दास, स्नातकोत्तर जंतु विभागाध्यक्ष प्रो.(डॉ.)अरुण कुमार, कुलसचिव डॉ.कपिलदेव प्रसाद, विकास पदाधिकारी डाॅ.ललन अद्री, नवीन कुमार, पीआरओ सुधांशु शेखर, एनएसएस पदाधिकारी डॉ.अभय कुमार, डीन आरकेपी रमण, डॉ.शंकर कुमार मिश्रा आदि अन्य विश्वविद्यालय कर्मियों ने।
फिलहाल कोरोना के कहर के कारण सोशल डिस्टेंसिंग मेंटेन करते हुए कम से कम समय में विश्वविद्यालय के एक शैक्षिक हाल में अतिथियों का स्वागत किया गया। डाॅ.महावीर बाबू के प्रति सबों ने दो-दो मिनट में अपने उद्गार व्यक्त किए। वित्त परामर्शी एससी दास, डीन आरके रमण एवं कुलसचिव डॉ.कपिलदेव प्रसाद ने अपने संस्मरण सुनाए।

इस अवसर पर मुख्य अतिथि प्रो.(डॉ.)भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी ने डॉ.महावीर बाबू के साथ बिताए 25 वर्षों को समेटते हुए बस यही कहा-
अच्छी पुस्तकें गुरुओं के गुरु हुआ करती हैं। गुरु के दर्शन से भाव बदल जाते हैं, स्वभाव बदल जाते हैं और खुद के अंदर खुदा के दर्शन होने लगते हैं तथा हर किसी के अंतर्मन में प्रकाश का प्रादुर्भाव होने लगता है।
इसके अलावा डॉ.मधेपुरी ने वर्षवार महावीर बाबू के विधायक, शिक्षा मंत्री, प्रति कुलपति, सांसद और अंतिम बीएनएमयू के कुलपति बनने सहित शेक्सपियर, डेल कार्नेगी, टालस्टाय आदि को कोट करते हुए उन्हें टीपी कॉलेज का विश्वकर्मा कहकर श्रोताओं की तालियां भी बटोरी।
संक्षिप्त उद्घाटन भाषण के क्रम में कुलपति प्रो.(डॉ.)ज्ञानांजय द्विवेदी ने दिवंगत कुलपति डॉ.महावीर प्रसाद यादव को निष्काम कर्मयोगी बताते हुए उपस्थित विश्वविद्यालय के शिक्षकों व कर्मचारियों से यही कहा कि उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि यही होगी कि हम सब अपने-अपने हिस्से का आवंटित काम तो मनोयोग से पूरा करते रहें। डॉ.द्विवेदी ने मंच संचालक प्रो.(डॉ.)नरेश कुमार से कहा कि तीन व्यक्तियों की एक कमिटी बना लें जो विश्वविद्यालय से जुड़े महापुरुषों के बाबत ऐसी दुर्लभ जानकारियां प्राप्त करने हेतु डॉ.मधेपुरी जैसे विद्वान को आमंत्रित कर विभिन्न अवसरों पर कार्यक्रम आयोजित करती रहे।
अंत में विश्वविद्यालय की गतिविधियों में सर्वाधिक समय देने वाले प्रो.(डॉ.)नरेश कुमार ने डॉ.ललन सहनी सहित कुछ अन्य कर्मियों से उद्गार व्यक्त करने हेतु समय नहीं दे पाने के लिए क्षमा मांगते हुए सबों को धन्यवाद ज्ञापित किया और कार्यक्रम समापन की घोषणा भी की।


