बच्चों के भोजन पर लगे टैक्स का विरोध

भारतीय संसद एवं राज्य एसेम्बलियों के कैंटीनों में प्रतिनिधियों के खाद्य सामग्रियों के रेट हैं – चावल –2.00, दाल –1.50 प्रति प्लेट, चपाती – 1.00 प्रति पीस, चाय = 1.00 प्रति कप, रसगुल्ला – 1.00 प्रति पीस आदि-आदि | यह भी जानें कि उन प्रतिनिधियों की पगार है लगभग – 80,000 रू. प्रतिमाह, और वे भी बिना टैक्स के |

इन्हें देश का वह नर-नारी जो गांवों में 30 से 32 रू. प्रतिदिन पसीना बहा-बहाकर कमाता है वो गरीब नहीं लगता और यह भी जानें कि अब वे गरीब के बच्चों को शिक्षा से दूर करने की साजिश भी रचने लगे हैं |

मधेपुरा जिला के प्राइवेट स्कूल्स के हास्टलों में रहकर पढ़नेवाले गरीब किसान-मजदूर के बच्चों के भोजन पर 13.5% वैट (टैक्स) लगाने के सरकारी निर्णय का प्राइवेट स्कूल्स के संचालकों, निदेशकों एवं प्रचार्यों द्वारा जमकर विरोध किया जा रहा है |

इन शिक्षकों का कहना है कि शराब पर टैक्स लगाना और बढाना तो इसलिए भी अच्छा लगता है कि वह शरीर और आत्मा दोनों का नाश करती है | लेकिन, बच्चों के भोजन पर टैक्स (वैट) लगाना-शिक्षा को नाश करने की साजिश के अलावा और क्या कहा जा सकता है |

प्राइवेट स्कूल्स एंड चिल्ड्रेन वेलफेयर सोसाइटी के जिलाध्यक्ष श्री किशोर कुमार की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में वक्ताओं ने बच्चों के भोजन पर ‘वैट’ लगाने को सरकार का दुर्भाग्यपूर्ण निर्णय कहा | वित्त मंत्री द्वारा दी गई टिपण्णी को आड़े हाथों लेते हुए माया विद्या निकेतन, शहीद चुल्हाय मार्ग की निदेशिका सह जिला सचिव चंद्रिका यादव सहित निक्कू नीरद, नवीन कुमार, बलराम सोनी, योगेन्द्र झा, विलास कुमार, नवीन कुमार, ओम प्रकाश यादव, वरुण कुमार, नफीउर रहमान, प्रदीप शर्मा, चन्दन सिंह, मुकेश झा, एम. के. मुन्ना आदि ने कड़ा विरोध जताया |

यह भी जानें कि संघ के प्रवक्ता मानव कुमार सिंह के अलावे अबु जफ़र, नंदिनी वर्णवाल, रतन कुमार, जे. के. वर्मा, मिलन कुमार, राजेश्वर साह, पवन कुमार अदि आचार्यों, प्राचार्यों ने डॉ. मधेपुरी मार्ग के बगल में एन०एच०-106 के सामने नव स्थापित किरण पब्लिक स्कूल में आयोजित बैठक में सरकार के इस निर्णय को तुगलकी फरमान बताया |

बैठक का संचालन ज्ञानदीप निकेतन के प्राचार्य चिरामणि यादव ने किया और धन्यवाद् ज्ञापित अमन प्रकाश ने |

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भीषण डकैती के बाद जाँच करने पटना से आई फोरेंसिक टीम

दिन दहाड़े डकैती के बाद सकते में हैं मधेपुरा के जयप्रकाश नगर के लोग | तीन बजे दिन में तीन युवक बहुत आराम से आता है शिक्षक राजेश सिंह के निवास का पता पूछता है | नब्बे वर्षीय मकान मालिक पूर्व विधायक जागेश्वर हजरा हाथ उठाकर उपरी मंजिल की ओर इशारा करते हैं | तीनों युवक आराम से सीढियां चढ़ते हुए शिक्षक राजेश के दरवाजे पर देता है दस्तक | घर में प्रवेश कर टी.वी. ऑन कर शिक्षक राजेश की पत्नी एवं बच्चे को पिस्टल दिखाकर हाथ-मुँह बाँध बंधक बना लेता है | और फिर लगभग दो घंटे तक पूरा घर खंघाल कर 25 लाख नगद और पाँच लाख के जेवर व अन्य सामग्रियां बैगों में भरता है | पसीना-पसीना हो जाने के कारण पानी से मुँह धोकर तीनों लुटेरे फ्रेश होते हैं |  फिर इत्मीनान से कन्धे पर रुपयों से भरा बैग लटकाकर तीनों वापस सीढियों के रास्ते बाहर निकल कर न जाने कहाँ चले जाते हैं जिसका अता-पता करने में मधेपुरा की पुलिस पसीना बहा रही है | फिर भी डकैतों का अबतक कोई ठोस सुराग नहीं मिल पाया है |

डकैती की इस घटना ने मधेपुरा शहर वासियों की नींद उड़ा दी है | मधेपुरा समाहरणालय से मात्र दो सौ गज की दूरी पर ऐसी घटना घटी, जहाँ घनी आबादी है, कहीं खाली जमीन नहीं है | बहरहाल प्रशासन की कोशिश जोरों पर है और जाँच के लिए पटना से आई फोरेंसिक टीम काम पर लग चुकी है | ऐसा माना जा रहा है की डकैत पकड़े जायेंगे |

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ये तेरा डीएनए, ये मेरा डीएनए

चुनाव के मुहाने पर खड़े बिहार में बहस छिड़ी है ‘डीएनए’ को लेकर। 25 जुलाई को मुजफ्फरपुर की रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने भोज पर बुलाकर थाली छीन लेने की बात उठाई… उठाकर उसे मांझी प्रकरण से जोड़ा… और यहां से उन्हें सीधा नीतीश कुमार के ‘डीएनए’ का रास्ता मिल गया। राजनीति में एक रास्ते से हमेशा कई और रास्ते जुड़े होते हैं। जाहिर है कि मोदीजी बिहार में अपना रास्ता खोजते हुए ही ‘डीएनए’ तक पहुँचे थे और ‘डीएनए’ के बाद की क्रिया-प्रतिक्रिया देखकर उन्हें बिहार में जल्द ही होनेवाली अपनी एक के बाद एक तीन रैलियों में आगे का रास्ता तय करना था। लेकिन बीच के समय में ‘डीएनए’ की गेंद नीतीश के कोर्ट में थी। नौ-दस दिन के सोच-विचार के बाद उन्होंने ट्वीटर का रास्ता पकड़ा, ‘डीएनए’ को पूरे बिहार से जोड़ा और मोदीजी के नाम खुला पत्र लिख डाला। अब बहस छिड़ी है कि ‘डीएनए’ नीतीश का खराब है या पूरे बिहार का..? मोदी ने नीतीश का अपमान किया या बिहार की गरिमा भंग की..?

“हरि अनंत हरि कथा अनंता”। राजनीति में इस तरह की बहस होती ही रहती है और आम तौर ऐसी बहसें किसी निष्कर्ष पर पहुंचती भी नहीं। या यूं कहें कि बहस करने वाले बहस का कोई निष्कर्ष चाहते ही नहीं। बहसों को येन-केन-प्रकारेण ‘डायलिसिस’ के सहारे वो जिन्दा रखते हैं ताकि राजनीति की उनकी दूकान घोर वैचारिक मंदी में भी चलती रहे। लेकिन यहां मसला ‘डीएनए’ का है और चाहे-अनचाहे बिहार से जुड़ गया है तो इसकी पड़ताल तो होनी ही चाहिए।

डीएनए आखिर है क्या..? डी-ऑक्सीरोईबोन्यूक्लिक एसिड यानि डीएनए अणुओं की उस घुमावदार संरचना को कहते हैं जो हमारी कोशिकाओं के गुणसूत्र में पाए जाते हैं और इन्हीं में हमारा आनुवांशिक कूट मौजूद रहता है। डीएनए की खोज जेम्स वाटसन और फ्रांसिस क्रिक नाम के दो वैज्ञानिकों ने 1953 में की थी और मानव-जाति के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण इस खोज के लिए उन्हें 1962 में नोबेल प्राइज से नवाजा गया था। लेकिन तब शायद ही उन्होंने इस बात की कल्पना की होगी कि आगे चलकर कभी यही डीएनए ‘विशुद्ध’ राजनीतिक बहस का केन्द्र भी बन सकता है।

यहां राजनीति के साथ ‘विशुद्ध’ शब्द का इस्तेमाल मैं बहुत सावधानी से और बहुत जोर देकर कर रहा हूँ क्योंकि ना तो डीएनए तक मोदी के पहुँचने में राजनीति के अलावा कुछ था और ना ही नीतीश द्वारा इसे बिहार से जोड़ देने में। दोनों नेता अपने-अपने तीर-तरकश को संभाले बस विधानसभाई ‘मछली’ की आँख देख रहे हैं। उन्हें इतनी फुरसत कहां कि डीएनए की ‘घुमावदार संरचना’ तक पहुंचे। हाँ, भोली-भाली जनता उनकी इस बहस से जितनी घूम जाय, उनका ‘डीएनए’ उतना ही सफल माना जाएगा।

हमें बहुत सचेत और सावधान होना होगा कि यहाँ ‘डीएनए’ की बहस में उस बिहार को घसीटा जा रहा है जहाँ की मिट्टी ने भारत को पहला सम्राट दिया और पहला राष्ट्रपति भी, जहाँ गांधी और जेपी के संघर्ष ने आकार लिया, जहाँ चाणक्य के राज-धर्म से लेकर कर्पूरी के समाज-धर्म तक मील के अनगिनत पत्थर हैं। और तो और जिस बुद्ध ने अपने ज्ञान से धर्म का और आर्यभट्ट ने ‘शून्य’ से विज्ञान का पूरा का पूरा ‘डीएनए’ ही बदल डाला, वे भी इसी बिहार के थे। ना तो किसी मोदी की सामर्थ्य हो सकती है कि इस बिहार के ‘डीएनए’ पर उँगली उठा दें और ना कोई नीतीश इतने बड़े हो सकते हैं कि इसके ‘डीएनए’ के प्रतीक हो जाएं।

सच तो ये है कि ‘डीएनए’ आज की राजनीति का दूषित हो गया है तभी ये बहस छिड़ी है या इस जैसी कोई भी बहस छिड़ती है। आज राजनीति में वो शुचिता, वो संस्कार, वो साधना ही नहीं रही जो हमें हमारी परम्परा से मिली। हम पड़ताल करें, अगर कर सकें, तो नीतीश हों या मोदी, जदयू हो या भाजपा, राजनीति के स्तर पर इनके ‘डीएनए’ में कोई खास फर्क नहीं दिखेगा। नाम बदल जाते हैं, चेहरे बदल जाते हैं, संदर्भ बदल जाते हैं और सरकार बदल जाती है, अगर कुछ नहीं बदल पाता है तो वो है आजाद भारत में राजनीति का लगातार गिरता स्तर और दिन-ब-दिन और अधिक प्रदूषित होता उसका ‘डीएनए’। मतभेद तो गांधी और अंबेडकर या नेहरू और पटेल में भी थे लेकिन बात कभी ‘डीएनए’ तक नहीं पहुंचती थी। ये तेरा डीएनए, ये मेरा डीएनए करने की जगह क्यों ना हमलोग उस ‘डीएनए’ की तलाश में जुटें जो हमारे इन पुरखों में था। तब शायद इस तरह की किसी बहस की ना तो कोई जरूरत होगी, ना गुंजाइश।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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भीषण डकैती से थर्राया मधेपुरा

कोचिंग सेंटर के शिक्षक के घर नगद 25 लाख की दिन दहारे लूट ! लुटेरे बदमाशों ने शिक्षक राजेश कुमार सिंह उर्फ पप्पू सिंह के भाड़ेवाले घर में कल दिन के तीन बजे बाद घुस गये | शिक्षक पप्पू सिंह की पत्नी सरिता देवी को पिस्टल सटाकर हाथ बाँध दिया | माँ-बेटे को मुँह पर पट्टी लगा दी | टी.वी. ऑन कर रुपए बैग में भरने लगे और जब बैग रुपयों से भर गया तो बच्चे के स्कूल बैग में रुपए कसकर लुटेरे फरार हो गये |

सूचना की जानकारी मिलने पर मधेपुरा सदर डी.एस.पी. कैलाश प्रसाद एवं थानाद्यक्ष मनीष कुमार फ़ोर्स के साथ घटनास्थल पर पहुंचे | बता दें कि पीड़ित पप्पू सिंह पूर्व विधायक जागेश्वर हाजरा के घर किराये पर अपनी पत्नी और बच्चे के साथ रहते हैं | यूँ उनका पैतृक गाँव उदाकिसुनगंज अनुमंडल का मुरली चंदवा गाँव है |

Daylight Robbery at Madhepura

पुलिस द्वारा यह पूछे जाने पर कि आपने 25 लाख की राशि बैंक में क्यों नहीं जमा की, के जबाब में शिक्षक द्वारा यही कहा जाता है कि समयाभाव के कारण बैंक में जमा नहीं हो पाया | ऐसे जबाब को सुनकर लोग चर्चा करने लगे हैं कि क्या इतनी बड़ी राशि दो-चार दिनों की कमाई है, क्योंकि बैंक तो इतने दिनों तक बन्द नहीं रहता |

शहर में इस घटना की चर्चा आम हो गयी है | एक ओर लोग शिक्षक के स्तर की चर्चा कर रहे हैं तो दूसरी ओर पुलिस की वर्दी से दूर होते जा रहे स्वभाव की | जहाँ पूर्व डी.जी.पी. अभयानन्द थानेदारों को निदेश देते थे कि जनमानस को थाने में सम्मान के साथ बैठायें वहीँ जनता द्वारा किये गये एफ.आई.आर. की प्राप्ति के लिए कई डिबिया तेल जलाना पड़ जाता है | बेचारी जनता क्या करे – सभी अपनी जगह से दूर खड़े दिखते हैं |

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कभी नहीं मरेगी कोसी की उड़नपरी गीतांजलि

जन्म लेने के बाद जिसने चलना सीखा ही नहीं बल्कि हमेशा दौड़ती ही रही उसी उड़नपरी का नाम है – गीतांजलि | प्रतिदिन दस किलोमीटर दौड़ना, दो मंजिले घर की सीढियों पर ननस्टॉप सेंचुरी मारना और फिर आगे पटना के गोलघर की सीढ़ियों पर दौड़ते हुए चढ़ते-उतरते चौका-छक्का जिसके लिए आम बात हो वह भला क्यों नहीं जीतेगी – राज्यस्तरीय सौ गोल्ड मेडल और राष्ट्रीय स्तर पर दर्जनों गोल्ड एवं सिल्वर मेडल |

दुनिया को अल्पायु में ही अलविदा कहने वाली उस उड़नपरी, कोसी की बेटी, गीतांजलि को यहाँ के जजवाती धावक-धाविकाएँ मरने नहीं देंगे | सौ से ऊपर धावक एवं पचास से ऊपर धाविकाएँ क्रमशः दस किलोमीटर और तीन किलोमीटर की दौड़ पूरी कर गीतांजलि को श्रद्धांजलि दी और स्वयं वे गीतांजलि फाउंडेशन की ओर से पुरस्कृत भी हुए |

Madhepura DM. L.P.Chauhan paying homage to Geetanjali.
Madhepura DM. L.P.Chauhan paying homage to Geetanjali.

कार्यक्रम का आरम्भ गीतांजलि की तस्वीर पर जिला पदाधिकारी एल.पी.चौहान, जिला परिषद अद्यक्षा मंजू देवी, समाजसेवी डॉ. भूपेन्द्र मधेपुरी सहित अन्य गणमान्य द्वारा पुष्पांजलि अर्पण से किया गया | आगे धावकों को हरी झंडी दिखाकर “गीतांजलि रोड रेस” का श्री गणेश और गणमान्य लोगों द्वारा उद्गार व्यक्त किया गया |

सर्वप्रथम डॉ.मधेपुरी ने गीतांजलि का स्मरण करते हुए नोबेल पुरस्कार प्राप्त रवीन्द्रनाथ टैगोर की गीतांजलि की प्रथम पंक्ति से लोगों को रू-ब-रू कराते हुए यही कहा – हे देव ! बहा दो अहंकार, मेरे ही आँसू जल में !! यही संकल्प हम सभी आज के दिन लें | उन्होंने यह भी कहा कि गीतांजलि जिस मधेपुरा की धूल भरी सड़कों पर दौड़कर ऊंचाई पायी है वह मधेपुरा उसके नक़्शे कदम पर चलकर न जाने कितनी गीतांजलि पैदा करेंगी जो राष्ट्रीय स्तर की धाविकाएँ बनकर उसी की गीत सदा गाती रहेंगी |

अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार निराला, अंचलाधिकारी उदय कृष्ण यादव, हिन्दुस्तान ब्यूरो चीफ अमिताभ, जागरण ब्यूरो चीफ धर्मेन्द्र भारद्वाज, प्राचार्य अशोक कुमार, पूर्व कुलसचिव डॉ.गणेश कुमार एवं जिला परिषद की अद्यक्षा मंजू देवी, प्राचार्या चन्द्रिका यादव, डॉ. अरुण कुमार, परमेश्वरी प्र.यादव, आई.एम.ए.अद्यक्ष डॉ.मिथिलेश कुमार, डॉ.आर.के.पप्पू, डॉ.पी.के.मधुकर, डॉ.अमित कुमार, ललन कुमार अद्री सहित परिवार के लोग अरविन्द कुमार, सुशील कुमार, पृथ्वीराज यदुवंशी एवं खेल से जुड़े संतकुमार, अनिल कुमार राज आदि ने अपने संस्मरण व उद्गार व्यक्त किये तथा गीतांजलि के बहाने नारी सशक्तिकरण की दिशा में कुछ करने का संकल्प दुहराया |

कार्यक्रम के आखिरी दौर में समस्त पुरुष-महिला प्रतिभागियों को “रनिंग शूज़ एवं जर्सी” पुरस्कार स्वरुप दिए गये | मंच संचालन हर्षवर्धन सिंह राठौर एवं डॉ. अलोक कुमार ने किया तथा धन्यवाद ज्ञापन संजीव ने किया |

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पी.जी. शिक्षक भी हड़ताल पर जाने को विवश  !

भू.ना.मंडल वि.वि. के पी.जी. शिक्षकों की कलम बन्द एक दिवसीय हड़ताल दिनांक 7-अगस्त (शुक्रवार) को होगी | मंडल वि.वि. के दर्ज़नों स्नातकोत्तर विभागों के तमाम शिक्षकों ने अखिल भारतीय वि.वि. एवं महाविद्यालय शिक्षक संघ के बैनर तले आयोजित बैठक में ए.आई.फुक्टा के आह्वान पर सात अगस्त को कलम बन्द हड़ताल पर जाने का सर्वसम्मत निर्णय लिया है |

यद्यपि शिक्षक को समाज का सृजनहार ही नहीं बल्कि रक्षक और रखवाला भी कहा जाता है, फिर भी शिक्षकों के रिक्त पदों को भरने एवं उनकी समस्याओं के निदान पर नजर रखने की चेष्टा न तो केन्द्र सरकार कर रही है और न राज्यसरकार |

Dr. Naresh Kumar , Mahasachiv Vishwavidyalaya Sangh and Senate Member BNMU
Dr. Naresh Kumar , Mahasachiv Vishwavidyalaya Sangh and Senate Member BNMU

फिलहाल यह एक दिवसीय सांकेतिक हड़ताल सातवें वेतन पुनरीक्षण आयोग के गठन एवं शिक्षकों की अन्य समस्याओं के प्रति केन्द्र सरकार के मानव संसाधन विभाग की उदासीन रवैये के खिलाफ मनोविज्ञान विभाग के डॉ.कैलाश प्रसाद यादव की अद्यक्षता में की गयी जिसमें सभी विषयों के पी.जी. शिक्षकों के वि.वि. संघ के महासचिव एवं सीनेट सदस्य डॉ. नरेश कुमार के पुरजोर समर्थन को सभी शिक्षक बन्धु महसूसते रहे |

बैठक में वि.वि. के सभी विभागों के शिक्षकों की उपस्थिति बनी रही जिसमें मुख्यरूप से मौजूद रहे- रसायन विभाग के डॉ.कौशलेन्द्र कुमार, वाणिज्य के डॉ.ओमप्रकाश चौधरी, वनस्पति के डॉ. बलराम सिंह, हिन्दी के डॉ.सिद्देश्वर काश्यप एवं दर्शनशास्त्र के डॉ.अनिल कुमार आदि |

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बी.एन.मंडल वि.वि. बी.सी.ए. फर्स्ट सेमेस्टर की परीक्षा की तिथि में परिवर्तन

 भू.ना.मंडल वि.वि. के परीक्षा नियंत्रक डॉ.नवीन कुमार ने मधेपुरा अबतक को बताया कि 7 अगस्त को पी.जी.शिक्षकों के एक दिवसीय कलम बन्द हड़ताल पर जाने के निर्णय के अनुरूप बी.सी.ए. प्रथम सेमेस्टर की 7-अगस्त को होने वाली परीक्षा अब 14-अगस्त को होगी | याद रहे कि परीक्षा केन्द्र एवं परीक्षा आरम्भ का समय पूर्ववत ही रखा गया है |

ज्ञातव्य हो कि द्वितीय सेमेस्टर की बी.सी.ए. परीक्षा कार्यक्रम में कोई परिवर्तन नहीं किया गया है | परीक्षा नियंत्रक डॉ.कुमार ने कहा कि द्वितीय सेमेस्टर की परीक्षा का कार्यक्रम पूर्ववत ही रहेगा |

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भारत तेरी संसद मैली हो गई… सत्ता के पाप धोते-धोते

ललित मोदी और व्यापम के मुद्दे पर सुषमा, वसुंधरा और शिवराज के इस्तीफे को लेकर कांग्रेस अड़ी हुई है। संसद ठप्प है। गतिरोध बढ़ता जा रहा है। संसद के इतिहास में पहली बार स्पीकर ने एक साथ पच्चीस सांसदों को निलंबित किया है। ये सांसद कांग्रेस के हैं। इस निलंबन के विरोध में सोनिया गांधी, राहुल गांधी, मनमोहन सिंह, एके एंटनी समेत कांग्रेस के तमाम नेता संसद के बाहर प्रदर्शन कर रहे हैं।

लोकसभा चुनाव में अपनी ऐतिहासिक पराजय के बाद अस्तित्व की लड़ाई रह रही कांग्रेस अब आक्रामक हो चली है। पहले तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी अपने ‘अज्ञातवास’ के बाद बगावती बयानों और अप्रत्याशित दौरों के साथ एकदम नए अवतार में सामने आए और अब पूरी पार्टी उनके नक्शेकदम पर चल पड़ी है। अपने सांसदों के निलंबन को कांग्रेस लोकतंत्र के लिए काला दिन बता रही है। बताए भी क्यों ना, ये ‘कालिमा’ जितनी बढ़ेगी कांग्रेस के भविष्य पर लगा ‘ग्रहण’ उसी अनुपात में कम जो होगा। उन्हें लोकतंत्र की चिन्ता जितनी भी सता रही हो, अपने हाशिए पर होने की चिन्ता बेहद सता रही है, इसमें कोई दो राय नहीं। सपा, टीएमसी, जदयू, राजद, एनसीपी जैसे दल भी कांग्रेस के सुर में सुर मिला रहे हैं क्योंकि आज इन सबकी नजर में ‘अ-सुर’ है तो केवल भाजपा। शत्रु का शत्रु तो स्वाभाविक रूप से मित्र हो जाता है।

सच तो ये है कि अब राजनीति में नीति, सिद्धांत, विचार जैसे शब्द बेमानी हो चुके हैं। अब इनकी जगह स्वार्थ, सुविधा और अवसर जैसे शब्दों ने ले ली है। आज जिस भाजपा को कांग्रेस की ये हरकत बेतुकी और बचकानी लग रही है, सत्ता में आने से पूर्व वो स्वयं इसी भूमिका में थी। राजनीतिक हित साधने के लिए सदन की कार्रवाई कल भी बाधित होती थी, आज भी हो रही है। लेकिन यहाँ सवाल ये नहीं है कि कल भाजपा गलत थी या आज कांग्रेस गलत है। सवाल ये है कि सदन की गरिमा और जनता के भविष्य के साथ कल भी खिलवाड़ हो रहा था, आज भी हो रहा है।

दूध की धुली कोई पार्टी नहीं है और शायद पूरी तरह हो भी नहीं सकती। शासन और सत्ता के संदर्भ में प्लेटो का कहा आज भी उतना ही सच है कि चुनाव अच्छे और बुरे के बीच नहीं, कम बुरे और अधिक बुरे के बीच होता है। विडंबना तो ये है कि इस कसौटी पर भी आज की तारीख में कोई पार्टी खरी उतरती नहीं दिखती। यहाँ आकर तराजू के पलड़े बराबर हो जाते हैं। ‘जिसकी लाठी उसकी भैंस’ ही जैसे राजनीति का अन्तिम सत्य हो गया हो। और ये सत्य इतना विकराल रूप ले चुका है कि तमाम क्षेत्रीय पार्टियां भी अपने दायरे में बस यही कहानी दुहरा रही हैं।

क्षेत्रीय पार्टियां, जिनका जन्म अलग ‘प्रतिबद्धता’ के साथ होता है, सत्ता के हमाम में आते-आते उतनी ही नंगी दिखने लगती हैं। बिहार को ही लीजिए। जदयू को सत्रह वर्षों तक भाजपा के साथ ‘मलाई’ में ‘भलाई’ दिखी लेकिन अब उनकी पूरी राजनीति भाजपा के विरुद्ध खड़ी है। बात यहीं तक होती तो एक बात थी। हद तो तब हो गई जब जदयू ने उसी राजद के साथ हाथ मिलाया जिसके विरोध में उसका जन्म हुआ था। उधर भाजपा को भी चंद महीनों में ही उस सरकार में कमियां ही कमियां दिखने लगीं जिसका वो हाल तक खुद हिस्सा रही थीं।

बात साफ है कि आज तमाम तर्क बस अपनी सुविधा के लिए गढ़े जाते हैं। कल तक जिस साबिर अली को भाजपा के ही लोग दाउद का साथी बता रहे थे आज वही पार्टी में उनका स्वागत कर रहे हैं। बिहार में होनेवाले चुनाव के किसी समीकरण में वे फिट हो रहे हों तो उनके या किसी के ‘पाक-साफ’ होने में कितनी देर लगती है। उधर कल तक लालू के ‘हनुमान’ कहलाने वाले रामकृपाल यादव महज साल बीतते-बीतते इस कदर भाजपाई हो गए कि जिस लालू में उन्हें राजनीति की सारी खूबियां दिखती थीं, अब वही उनके लिए खामियों के पुतले हैं। ये तो कुछ उदाहरण भर हैं। देश के किसी भी हिस्से में कोई भी दल ऐसे उदाहरणों से अछूता नहीं है।

बहरहाल, सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और शिवराज सिंह चौहान का भविष्य क्या होता है, कांग्रेस के सांसदों के निलंबन को लेकर राजनीति क्या करवट लेती है, संसद की कार्रवाई कब तक बाधित रहती है – इन सवालों के जवाब आज नहीं तो कल मिल जाएंगे लेकिन भारत की संसद सत्ता का पाप धोते-धोते कब तक मैली होती रहेगी, इसका जवाब आज किसी के पास नहीं। पार्टियां अपनी राजनीति में मस्त हैं, मीडिया को मसाला मिल रहा है लेकिन करोड़ों बेबस जनता का क्या..! कब तक कोई ‘ललित मोदी’, कोई ‘व्यापम’ आकर डेढ़ करोड़ भारतीयों के मन्दिर हमारी संसद को मैला करते रहेंगे। ललित मोदी और व्यापम कोई व्यक्तिविशेष या संस्थाविशेष नहीं बल्कि सत्ता के वो पाप हैं जो रहते तो हर युग में हैं लेकिन अब दिखने लगे हैं, ठीक वैसे ही जैसे किसी मरे हुए जानवर की लाश पर ‘कीड़े’ बजबजाते और ‘गिद्ध’ मंडराते दिखते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पर्दे में रहने दो . . . . ! पर्दा ना उठाओ . . . . !!

कभी गरीबों का शिमला व दार्जिलिंग कहलानेवाला मधेपुरा अब यदाकदा राजस्थानी गर्मी का भी अहसास करा देता है | इस दौर से मधेपुरा का मौसम ही नहीं गुजर रहा बल्कि यहाँ की राजनीतिक गतिविधियों में भी स्पष्ट परिवर्तन व बदलाव नजर आने लगा है | जब मधेपुरा की विरासत रासबिहारी-शिवनंदन-भूपेन्द्र . . . की “होत” हुआ करती तबके दिनों में सभी समाजसेवियों की सही-सही पहचान होती | उन्हें भरपूर सामाजिक इज्जत व सम्मान दिया जाता | तब की राजनीतिक गतिविधियों में आज की तरह गर्मी नहीं हुआ करती | सारा वातावरण ठंडा-ठंडा, कूल-कूल हुआ करता | तब के नेतृत्व वैसों को ढूंढ-तलाशकर उम्मीदवार बनाते जो कार्यकर्ता कहीं दूर-दराज के गाँवों-कस्बों में, किसी अल्पसंख्यकों के टोले-टप्परों में या चटाई पर बैठकर किसी दलित बस्ती में – सामाजिक कुरीतियों से लड़ने हेतु योजना बना रहे होते, शिक्षा का अलख जगा रहे होते तथा लोगों को हक़ की खातिर लड़ने की ट्रेनिंग दे रहे होते |

परन्तु, आज मधेपुरा के मौसम के साथ-साथ राजनीतिक मौसम में भी काफी बदलाव आ गया है | चारों ओर गर्मी है और है गरमाहट | विधायकों का चुनाव सामने है | आचार संहिता झाँकने लगी है | कहीं मंत्री नरेन्द्र यादव तो कहीं प्रभारी भूपेन्द्र यादव का आगमन होने लगा है | उनके इर्द-गीर्द बैठनेवालों से सभी पैसेवाले रिश्ते जोड़ने लगे हैं | जिसने गाँव कभी देखा नहीं, जिन्हें किसानों की माली हालत का पता नहीं, फ़सल का ज्ञान नहीं, समस्याओं की जानकारी नहीं. . . . . वे सभी नया-नया कुर्ता-पायजामा सिलाने लगे हैं | इतना ही नहीं महीने दो महीने पहले कहीं और थे लेकिन आज कहीं और दिखने लगे हैं | तुर्रा तो यह है कि चलते-चलते रुक गये और बगल वाले के दरवाजे खटखटाने लगे हैं . . . . क्योंकि वहाँ एक पुराना गाना बज रहा होता है – मेरा घर खुला है, खुला ही रहेगा, तुम्हारे लिए . . . . . !

और जो बापू के गांवों के लोगों की सेवा में लगा है उन्हें वहीँ रहने दो . . . . वहीँ सो जाने दो और गाँधी के गाँवों में ही दफ़न हो जाने दो . . . . और आगे बहुत कुछ ….. लेकिन उन्हें … पर्दे में रहने दो . . . . पर्दा ना उठाओ !!

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मधेपुरा जिले का बेशकीमती मीणा अदृश्य हो गया !

मधेपुरा के जिला पदाधिकारी गोपाल मीणा के स्थानान्तरण से जहाँ एक ओर आम लोगों की जुबान से अनायास यह आवाज निकली कि क्या हो पायेंगी अब मधेपुरा जिला में कदाचार मुक्त परीक्षाएँ एवं प्रतिभाओं का समुचित सम्मान ! वहीं दूसरी उनके स्थानान्तरण के समाचार को सुनते ही किसानों को जैसे सांप सूंघ गया | उनके जाने के बाद धान बिक्री आदि की राशि जो किसानों के बैंक खाते में सीधे जमा होती रही उसका क्या होगा ? क्या फिरसे बिचौलियों की चांदी कटने लगेगी ?

विदाई समारोह में उपस्थित भीड़ को संबोधित करते समय सभी वक्ताओं ने अपनी-अपनी भावनाओं को नियंत्रित करने में किसी तरह सफलता तो पा ली परन्तु डी.डी.सी. मिथिलेश कुमार एवं विजय झा इतने भावुक हो गये कि मुंह से आवाज तक नहीं निकल पाई, लेकिन नयनों से अश्रुकण अवश्य टपक पड़े |

Farewell Party of DM Gopal Meena .
Farewell Party of DM Gopal Meena .

अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार निराला, एन.डी.सी. प्रदीप कुमार झा, अंचलाधिकारी उदय कृष्ण यादव तथा अल्फाजों के ज़ादुगर पंचायत पदाधिकारी मो.खुर्शीद आलम सहित अन्य पदाधिकारियों ने मीणा साहब के निर्देशन में किये गये कार्यों से प्राप्त अनुभवों का बखूबी इजहार किया | समाजसेवियों की ओर से डॉ.मधेपुरी ने कहा कि चन्द रोज कवल डॉ. कलाम दुनिया को छोड़कर चले गये और आज मधेपुरा को छोड़कर गोपाल जा रहा है | डॉ मधेपुरी ने अपनी पंक्तियाँ यूँ कही :- “ दुनिया रंगमंच है अपनी, सभी भूमिका निभा रहे हैं | कोई आकर हँसा गये जी, कोई जाकर रुला रहें हैं || ”

डॉ.मधेपुरी ने यह भी कहा कि यदि हमारी चाहत में ताकत होगी तो सारा कायनात हमें मदद करने में इस तरह जुट जायेगा कि जल्द ही हमारे हर दिल अज़ीज़ मीणा साहब कोसी-कमिश्नर बनकर हमारे बीच आ जायेंगे और आपके साथ काम करेंगे, आपको नेतृत्व प्रदान करेंगे तथा कुशल मार्गदर्शन भी देंगे |

मौके पर उपस्थित आरक्षी अधीक्षक आशीष भारती द्वारा उनके स्थानान्तरण से जिन वर्गों में ख़ुशी हुई, उसे रेखांकित किया गया |

निवर्तमान जिला पदाधिकारी गोपाल मीणा ने अपने संबोधन में कहा कि अच्छी तरह काम करने के लिए अच्छे फिटनेस की जरुरत होती है जो आप समय निकाल कर करते रहेंगे | साथ ही पारदर्शिता के साथ कार्यों के निष्पादन में, गरीबों एवं छात्रों की प्रतिभा को सम्मान देने में तथा औरों के लिए जीने में “आनंद” महसूसते रहेंगे |

अंत में सबों ने फूल मालाओं से उस बेशकीमती मीणा को इस कदर ढँक दिया मानो वे अदृश्य ही हो गये | उस लम्हे को शायर खुर्शीद साहब ने अल्फाजों के जरिये भावनाओं की बारिश से नहला दिया और अन्त में उन्होंने धन्यवाद देते हुए सभा की भी विदाई कर दी |

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