नासा ने नहीं, लुजेन्द्र ओझा ने खोजा मंगल पर पानी

अमेरिकी स्पेस एजेंसी नासा ने 28 सितम्बर को एक बड़ा खुलासा किया। नासा ने कहा कि मंगल ग्रह पर बहते पानी के सबूत मिले हैं। इस खोज के बाद मंगल पर जीवन की सम्भावना बढ़ गई है। जब सोमवार को नासा अमेरिकी समय के हिसाब से दिन के 11.30 बजे अपने मुख्यालय के ‘जेम्स वेब ऑडिटोरियम’ में आयोजित प्रेस कांफ्रेस में ये ऐतिहासिक घोषणा कर रहा था तब नासा के ग्रह-विज्ञान निदेशक जिम ग्रीन, मंगल अन्वेषण कार्यक्रम के प्रमुख वैज्ञानिक माइकल मेयेर, नासा के एमेस अनुसंधान केन्द्र की मैरी बेथ विल्हेल्म और एरिजोना यूनिवर्सिटी में प्लैनेटरी जियोलॉजी के प्रोफेसर एल्फ्रेड माकईवेन के साथ पीएचडी का एक छात्र भी मौजूद था। उस ‘असाधारण’ छात्र का नाम है लुजेन्द्र ओझा। ‘असाधारण’ इसलिए कि मंगल पर बहते पानी को नासा से पहले इस छात्र ने देखा था।

मात्र 21 साल के लुजेन्द्र ओझा मूल रूप से काठमांडू (नेपाल) के हैं और अटलांटा के जॉर्जिया इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी में प्लैनेटरी साइंस में पीएचडी कर रहे हैं। इस युवा वैज्ञानिक ने माकईवेन के साथ मंगल ग्रह पर जल सक्रियता की सम्भावना का अध्ययन किया है। मंगल ग्रह पर देखी गई जिन गहरी लकीरों (मंगल की सतह पर दिखने वाले गड्ढ़ों की ढलान पर बनी उँगली जैसी रेखाएँ) को अब तरल पानी के सामयिक बहाव से जोड़कर देखा जा रहा है, उन्हें साल 2011 में डिग्री कोर्स के दौरान लुजेन्द्र द्वारा किए गए शोध से ही पहचाना गया था। विज्ञान और प्राविधि की साइट inverse.com ने अगर लुजेन्द्र को नासा के प्रेस-कांफ्रेस में मौजूद ‘अनोखा’ व्यक्ति कहा तो यह अकारण नहीं है।

बहरहाल, आप लुजेन्द्र ओझा के वेबसाइट www.lujendraojha.net  पर जाएं तो होम पेज पर आपको हाथ में गिटार लिए लंबे बालों वाला ‘रॉकस्टार’ दिखेगा। पहली नज़र में आपको लगेगा कि शायद आपने कोई गलत साइट लॉग इन कर दिया है। लेकिन जब थोड़ी देर ठहरकर आप होम पेज के बीचोंबीच लिखा ‘स्टेटमेंट’ पढ़ेंगे और बारी-बारी से बाकी पन्नों को खोलेंगे तब आप नैसर्गिक प्रतिभा के धनी एक युवा वैज्ञानिक के ‘अद्भुत संसार’ को देख रहे होंगे।

लुजेन्द्र ओझा उर्फ लुजु को एरिजोना यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान ‘संयोगवश’ इस बात के सबूत मिले थे कि मंगल पर पानी तरल रूप में मौजूद है। उन्हें मंगल की सतह की तस्वीरों के अध्ययन के बाद इस बात के सबूत मिले थे। इस खोज को ‘भाग्यशाली संयोग’ मानने वाले लुजेन्द्र शुरुआत में इसे समझ नहीं पाए। मंगल की सतह पर बने गड्ढ़ों का कई साल तक अध्ययन करने के बाद वे इस निष्कर्ष पर पहुँचे कि इनकी ढलान पर बनी गहरी लकीरें बहते खारे पानी के कारण बनी हैं। ये ‘लकीरें’ गर्मियों में बढ़ जाती थीं और सर्दियां आते-आते गायब हो जाती थीं। सावधानीपूर्वक अध्ययन और विशलेषण के बाद अब वैज्ञानिक यह कहने को तैयार हैं कि ये लकीरें वास्तव में जलधाराएं हैं। इस तरह नासा ने लुजेन्द्र की बात पर ही मुहर लगाई है।

मंगल पर तरल पानी की मौजूदगी की पुष्टि होने के बाद ये तय हो गया है कि यह ग्रह भौगोलिक रूप से अब भी सक्रिय है। यही नहीं अब तो वहाँ माइक्रोब्स पाए जाने की सम्भावना भी जग गई है। साथ ही सतह के नजदीक पानी के स्रोतों की पहचान होने से भविष्य में मंगल ग्रह पर जाने वाले अंतरिक्ष यात्रियों का वहाँ रहना भी आसान हो सकता है। क्या पता कल होकर वहाँ मानव अपनी बस्तियाँ ही बसा ले।

साइंस फिक्शन में गहरी रुचि रखने वाले लुजेन्द्र ओझा स्ट्रिंग थ्योरी, मल्टीपल यूनिवर्स और टाइम ट्रेवल जैसे विचारों से खासा प्रभावित रहे हैं। अपने हाई स्कूल के दिनों में वे आगे चलकर ‘टाइम-मशीन’ का आविष्कार करने के बारे में सोचते थे। उनका ऐसा कोई आविष्कार तो अब तक सामने नहीं आया है लेकिन मंगल पर पानी की खोज में उन्होंने जो भूमिका निभाई है उसने विज्ञान की दुनिया में उनका सम्मानित स्थान तो सुरक्षित कर ही दिया है। सम्भावनाओं के इस उदीयमान पुंज को मधेपुरा अबतक की शुभकामनाएं।

  मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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केजरीवालजी..! मोदी ‘गिड़गिड़ाने’ नहीं गए थे अमेरिका

अरविन्द केजरीवाल… भारतीय राजनीति में इस नाम ने जैसा स्थान बनाया और जितनी तेजी से बनाया वो अपने आप में अनूठा है। पारदर्शी और जवाबदेह प्रशासन के लिए जब सन् 2000 में केजरीवाल ने दिल्ली में ‘परिवर्तन’ नाम से नागरिक आन्दोलन शुरू किया तब उन्होंने हरगिज ना सोचा होगा कि इस ‘परिवर्तन’ से एक दिन पूरी ‘दिल्ली’ परिवर्तित हो जाएगी। सूचना के अधिकार के लिए अपने संघर्ष और 2006 में ‘रमन मैग्सेसे’ मिलने के बाद वो चर्चा में आए, और छाए अन्ना हजारे के साथ जनलोकपाल आन्दोलन से। आगे चलकर 2012 में आम आदमी पार्टी के गठन से लेकर 2013 में दिल्ली के मुख्यमंत्री पद तक का उनका सफर किसी स्वप्न जैसा है। इतिहास में ‘संघर्ष’ होते रहे हैं और होते रहेंगे लेकिन ‘संघर्ष’ का इस तरह से ‘मुकाम’ पाना बार-बार होने की चीज नहीं है।

‘जंतर-मंतर’ से दिल्ली के मुख्यमंत्री के ‘दफ्तर’ का सफर अरविन्द केजरीवाल ने इतनी जल्दी तय किया था कि वे ‘शासन’ और ‘आन्दोलन’ में फर्क ही नहीं कर पाए। नतीजा यह हुआ कि दिल्ली का मुख्यमंत्री खुद बात-बात पर धरने पर बैठ जाता था। अपने वादों को भी वो आन्दोलन की तरह ही पूरा करना चाहता था, जो व्यवहार में सम्भव ना था। अंतत:  महज 49 दिनों में उन्होंने अपने पद से इस्तीफा दे दिया। दिल्ली की जनता ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया की और उन्हें अपने ‘भगोड़ेपन’ का अहसास हो गया। बिना देर किए ‘प्रायश्चित’ में उन्होंने पूरी ताकत झोंक दी और दिल्ली ने उन्हें माफ भी कर दिया। उदार और दिलदार दिल्ली ने 2015 में उन्हें 70 में से 67 सीटें दे दीं।

ऐसे मेनडेट के बाद दिल्ली और देश को भी केजरीवाल से कुछ अलग और कुछ ज्यादा अपेक्षा है तो ये अत्यन्त स्वाभाविक है। खुद से जुड़ी अपेक्षाओं पर खरा उतरने के लिए उन्हें ना केवल अतिरिक्त मेहनत करनी होगी बल्कि अतिरिक्त गम्भीरता भी बरतनी होगी। लेकिन इस गम्भीरता की कमी केजरीवाल में ‘गम्भीर’ रूप से है। आए दिन अपने ‘अगम्भीर’ बयानों से केजरीवाल अपने चाहनेवालों को निराश करते रहते हैं। दिल्ली के एलजी नजीब जंग और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्ववाली सरकार को लेकर उनके ज्यादातर बयान ऐसे ही होते हैं। चलिए मान लेते हैं कि नजीब जंग से उनकी ‘तनातनी’ दिल्ली सरकार के कामकाज या अधिकार-क्षेत्र को लेकर है और दिल्ली की सवा करोड़ जनता का प्रतिनिधि होने के नाते उन्हें बहुत हद तक बोलने का हक भी मिल जाता है। लेकिन सवा करोड़ जनता के प्रतिनिधि का सवा सौ करोड़ लोगों के प्रतिनिधि को लेकर अमर्यादित बयान देना सचमुच निराश करता है।

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अभी अमेरिका के दौरे पर थे। वहाँ 25 सितम्बर को उन्होंने सतत विकास शिखर सम्मेलन में विश्व भर के राष्ट्राध्यक्षों को संबोधित किया, जिसकी मेजबानी संयुक्त राष्ट्र के महासचिव बान की-मून ने की। इस महत्वपूर्ण दौरे के अन्तिम दिन यानि 28 सितम्बर को अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ उनकी एक साल के भीतर तीसरी शिखर बैठक हुई। इस बैठक के अतिरिक्त संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में उच्च स्तरीय शांतिरक्षा शिखर सम्मेलन और विश्व के कई नेताओं – ब्रिटेन के प्रधानमंत्री डेविड कैमरन, फ्रांस के राष्ट्रपति फ्रांसुआ ओलांद, कतर के अमीर शेख हमद बिन खलीफा अल थानी, मेक्सिको के राष्ट्रपति एनरीक पेना नीटो और फिलीस्तीन के राष्ट्रपति महमूद अब्बास – से मोदी की द्विपक्षीय मुलाकातों का व्यस्त कार्यक्रम था। पर उनकी इस यात्रा में जो बात सबसे अधिक सुर्खियों में रही वो थी फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग, एप्पल के सीईओ टिम कुक, गूगल के सीईओ सुन्दर पिचाई और माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्य नडेला से उनकी मुलाकात। विश्व के इन शीर्षस्थ ‘कार्यकारी अधिकारियों’ के साथ मोदी की मुलाकात ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘मेक इन इंडिया’ की सम्भावनाओं के लिहाज से कितनी महत्वपूर्ण थी, ये कहने की जरूरत नहीं। मोदी ने इन दिग्गज कम्पनियों को भारत में निवेश के लिए आमंत्रित किया।

बहरहाल, पूरा देश इन मुलाकातों को लेकर उत्सुक था और उत्साहित भी कि इसी दरम्यान 27 सितम्बर को केजरीवाल का बयान आता है कि मोदी विदेश में ‘गिड़गिड़ा’ रहे हैं। उन्होंने बाकायदा ट्वीट करके कहा कि अगर हम मेक इंडिया कर लेंगे तो मेक इन इंडिया ऑटोमेटिक हो जाएगा। उन्होंने कहा कि अगर हम अपने देश को विकसित कर लेंगे तो दूसरे देश यहाँ खुद निवेश करने आएंगे। हमें उनके दरवाजों पर जाकर निवेश के लिए ‘गिड़गिड़ाना’ नहीं पड़ेगा।

सबसे पहली बात तो ये कि ‘मेक इंडिया’ को ‘मेक इन इंडिया’ से अलग करके देखा ही नहीं जा सकता। दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दूसरे, नई सम्भावनाओं को तलाशना, अपने आयाम को बढ़ाना कहीं से भी गिड़गिड़ाना नहीं कहा जा सकता। तीसरे, मोदी वहाँ ‘व्यक्ति मोदी’ या ‘भाजपाई मोदी’ नहीं बल्कि ‘भारत के प्रधानमंत्री’ मोदी थे और यहाँ के सवा सौ करोड़ लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहे थे। ऐसे में शब्दों के चयन में गरिमा और गम्भीरता निहायत जरूरी था।

केजरीवालजी को कुछ कहने से पहले ‘सिलिकॉन वैली’ से ‘सैप सेन्टर’ तक ‘मोदी-मोदी’ की गूंज जरूर सुननी चाहिए थी। ये गूंज किसी ‘गिड़गिड़ाने’ वाले के लिए नहीं, करोड़ों आँखों में 21वीं सदी के भारत के लिए उम्मीद और विश्वास जगाने वाले के लिए थी। उन्हें सुनना चाहिए था कि मोदी ‘उपनिषद’ से ‘उपग्रह’ की यात्रा को किस नजरिए से देखते हैं और अपनी तमाम ‘यात्राओं’ से उसे कैसा विस्तार देना चाहते हैं। ‘हाशिए’ पर खड़े भारत को ‘केन्द्रबिन्दु’ में लाना हो तो बात केवल ‘दिल्ली’ से नहीं बनेगी। पूरी दुनिया का भरोसा आपको जीतना होगा। मोदी नाम के इस शख्स ने अपने विज़न, अपने आत्मविश्वास, अपनी ऊर्जा से सात समुन्दर पार भी अपने लिए भरोसा पैदा किया है तो ये बड़ी बात है। देखा जाय दुनिया का ये भरोसा मोदी के बहाने (और मोदी के मुताबिक) उस भारत के लिए है जिसकी 65 प्रतिशत आबादी 35 साल से कम की है और जिसे अभी बहुत लम्बा सफर तय करना है।

अन्त में, बहुत विनम्रता से कहना चाहूँगा केजरीवालजी से कि कमेंट करने से कद बड़ा नहीं होता। कद केवल और केवल काम से बड़ा होता है। मोदी अपना काम कर रहे हैं और केजरीवाल अपना काम करें। कमेंट करने का काम ‘समय’ पर छोड़ दें। वो हर किसी पर और हर दम सही ‘कमेंट’ करता है।

पुनश्च :

आज से लगभग साल भर पहले मोदी अमेरिका गए थे। प्रधानमंत्री के रूप में यह उनकी अमेरिका की  पहली यात्रा थी। पाँच दिन की उस यात्रा के अंतिम दिन उपराष्ट्रपति जो बिडेन की तरफ से मोदी के सम्मान में लंच का आयोजन किया गया। उस मौके पर अमेरिकी विदेश मंत्री जॉन कैरी ने कहा था कि हम चाहते हैं कि भारत के विकास में प्रधानमंत्री मोदी के योगदान और भारत की आजादी में महात्मा गांधी के योगदान को एक तरह से याद किया जाय। यहाँ इस वाकये को सुनाने का यह मतलब कतई नहीं कि मोदी को महात्मा गांधी के बराबर में खड़ा किया जाय या कैरी ने मोदी के लिए जो कहा वैसा ही कुछ केजरीवाल भी कहें लेकिन इतना कहना तो जरूर बनता है कि जब घर के ‘मुखिया’ को ‘बाहरवाले’ इज्जत दे रहे हों तो ‘घरवालों’ की भी इज्जत (और साख भी) बढ़ती है, किसी भी सूरत में घटती तो हरगिज नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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कोसी में हो गया कांग्रेस का बंटाधार रसिया !

मधेपुरा; सहरसा, मधेपुरा और सुपौल जिले के इलाके को कोसी का इलाका कहा जाता है | यही वह इलाका है जहाँ आज की तारीख में विधानसभा के कुल 13 क्षेत्रों में से एक भी सीट कांग्रेस को नसीब नहीं हुई जबकि आज़ादी के बाद के वर्षों-वर्षों तक केवल और केवल कांग्रेस का ही सिक्का सम्पूर्ण कोसी में चलता रहा |

प्रखर कांग्रेसियों में आलमनगर के विद्याकर कवि, संविधानसभा के सदस्य रहे चतरा के कमलेश्वरी प्रसाद यादव, डॉ. रमेन्द्र कुमार यादव रवि, मधेपुरा के प्रथम विधि मंत्री शिवनंदन प्रसाद मंडल, बी.पी.मंडल, भोली प्रसाद मंडल, बलुआ के रेल मंत्री ललित नारायण मिश्र, डॉ.जगन्नाथ मिश्र, अमरेन्द्र मिश्र, सहरसा के लहटन चौधरी, चन्द्रकिशोर पाठक आदि-आदि को आज भी कांग्रेसी खेमे के लोग याद करते हुए नाम लेते हैं |

बहरहाल कोसी के दो संसदीय क्षेत्रों में से एक तो आज भी कांग्रेसी सांसद रंजीत रंजन के कब्जे में है | बावजूद इसके जदयू, राजद व कांग्रेस महागठबंधन के 13 सीटों में एक भी सीट कांग्रेस के खाते में नहीं ! क्या अंग्रेजों के अशुभ व अन्धविश्वासी 13 वाली संख्या अंग्रेजों के भारत छोड़ने के बाद कांग्रेसियों के ही अन्दर जगह बना ली है ? कहीं इसीलिए तो कांग्रेस के आलाकमानों को तेरह के फेर में पड़ना उचित नहीं लगा | कोसी में एक भी सीट पर कांग्रेसी प्रत्याशी होने से सम्पूर्ण कोसी क्षेत्र के सभी कांग्रेसी कार्यकर्ताओं को महागठबंधन-धर्म निभाने के साथ-साथ पार्टी-धर्म निभाने का भी एक मौका अवश्य मिलता |

अब तो स्थिति ऐसी बन गई है कि कोसी में महागठबंधन के प्रचार में लालू-नीतीश के साथ सोनिया गाँधी यहाँ जब-जब आएगी तो केवल और केवल औरों के लिए ही नाचने आएगी | यदि एक भी सीट कांग्रेस के लिए ली गई होती तो लोग यही कहते –

तोरा बियाह में हम नटुआ !
हमरा बियाह में तू नटुआ !!

बजाय इसके, अब कोसी में केवल यही पंक्तियाँ हर जुबान पर होगी –

कोसी में हो गया कांग्रेस का बंटाधार रसिया !
चाहे नाचे राहुल-सोनिया बारम्बार रसिया !!

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जी हाँ, मुकेश अंबानी से अधिक ‘अमीर’ हैं केरल के सनी वर्की..!

सनी वर्की, क्या आपने सुना है ये नाम..? अगर सुना भी हो तब भी ये जरूर मानेंगे कि भारत में सौ में से निन्यानवे आदमी इस नाम को नहीं जानते होंगे। दूसरी ओर मुकेश अंबानी हैं जिनका नाम भारत में बोलना सीख रहा बच्चा भी जानता है। जानने की वजह भी है। दुनिया की जानी-मानी पत्रिका ‘फोर्ब्स’ ने रिलायंस इंडस्ट्रीज़ के चेयरमैन मुकेश अंबानी को लगातार नौवें साल दुनिया का सबसे अमीर भारतीय घोषित किया है। ‘फोर्ब्स’ द्वारा जारी की गई दुनिया के सौ सबसे अमीर भारतीयों की सूची में 18.9 अरब डॉलर यानि 1255 अरब रुपये के साथ मुकेश पहले नंबर पर हैं। इस सूची में 18 अरब डॉलर यानि 1190 अरब रुपये के साथ सन फ़ार्मास्यूटिकल इंडस्ट्रीज़ के दिलीप सांघवी को दूसरा और 15.9 अरब डॉलर यानि 1052 अरब रुपये के साथ विप्रो के अज़ीम प्रेमजी को तीसरा स्थान मिला है। आप सोच रहे होंगे कि इन धनकुबेरों के सामने भला इस अनाम से शख्स सनी वर्की की क्या औकात..!

मुकेश अंबानी… जो ना केवल भारत बल्कि दुनिया के गिने-चुने अमीरों में एक हैं… जो 4 लाख वर्गफुट और 27 मंजिलों वाले दुनिया के सबसे महंगे मकान ‘अंतिलिया’ में रहते हैं… जिनकी सैलरी 15 करोड़ रुपये है और जिनकी कम्पनी रिलायंस इंडस्ट्रीज का मार्केट कैप 290,245.66 करोड़ है…. उनकी तुलना मैं सनी वर्की से कर रहा हूँ..! जी हाँ, कर रहा हूँ और पूरे होशोहवास में कर रहा हूँ। तुलना ही नहीं कर रहा बल्कि इस सनी वर्की को उनसे अधिक ‘अमीर’ बता रहा हूँ। पूरी बात जानकर शायद आप भी यही बोलेंगे।

जिस मशहूर पत्रिका ‘फोर्ब्स’ ने दुनिया के सौ सबसे अमीर भारतीयों की सूची प्रकाशित की है, उसी ने एशिया प्रशांत के 13 देशों के दानदाताओं की सूची भी प्रकाशित की है जिसमें सात भारतीय हैं। इन ‘दानवीर’ भारतीयों में पहला स्थान सनी वर्की का है। सनी वर्की केरल में जन्मे उद्योगपति हैं और दुबई स्थित जीईएमएस कम्पनी के संस्थापक हैं। यह कम्पनी 14 देशों में 70 निजी स्कूल चलाती है। वर्की ने इसी साल जून में अपनी 2.25 अरब डॉलर यानि लगभग 15 हजार करोड़ की सम्पत्ति का आधा हिस्सा दान में देने की घोषणा की। आपको बता दें कि ‘फोर्ब्स’ ने दानवीरों की यह सूची शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में योगदान के लिए बनाई है जिसमें वर्की के अलावे भारतीय आईटी कम्पनी इंफोसिस के तीन सहसंस्थापक सेनापथे गोपालकृष्णन, नंदन नीलकेणी और एसडी शिबूलाल, इंफोसिस के एक और सहसंस्थापक एन नारायणमूर्ति के पुत्र रोहन और लंदन में रहने वाले उद्योगपतियों सुरेश रामकृष्णन और रमेश रामकृष्णन के नाम शामिल हैं।

आप कहेंगे, सनी वर्की की सम्पत्ति 2.25 अरब डॉलर है और मुकेश अंबानी की 18.9 अरब डॉलर यानि 8 गुने से भी अधिक, तो फिर वर्की अंबानी से अधिक अमीर कैसे हो गए..? मेरे दोस्त, आज के इस भौतिकवादी युग में पैसे का ‘मोल’ किस हद तक बढ़ चुका है ये ना आपसे छिपा है ना मुझसे। पैसा आज हर चीज की परिभाषा तय कर रहा है। आज ‘अर्थ’ चाहे जो ‘अनर्थ’ करा दे, हम-आप मूक दर्शक बने रह जाएंगे। ऐसे में कोई वर्की आगे आता है और अपनी आधी सम्पत्ति यानि 1.25 अरब डॉलर यानि साढ़े सात हजार करोड़ रुपये शिक्षा और स्वास्थ्य के लिए दान कर देता है..! जरा सोचिए, ऐसा करके क्या हासिल हुआ होगा उसे..? सड़क के किनारे या चलती ट्रेन में कितना भी लाचार भिखारी आ जाय, अगर हमारी जेब में एक या दो का सिक्का ना हो तो तमाम दया-धर्म के बावजूद दस का नोट तो दूर पाँच का सिक्का निकालने से पहले भी हम पाँच बार सोचते हैं। ऐसे में साढ़े सात हजार करोड़ रुपये दान करना कितनी बड़ी बात है ये शायद हम ठीक से सोच भी ना सकें। अब मैं आपसे पूछूँ कि मुकेश अंबानी अधिक अमीर हैं या सनी वर्की, तो आप क्या कहेंगे..?

आज जबकि मनुष्यता के पहले पायदान पर ही हम फिसल रहे हों, हर दिन एक नए तरीके से मानव-मूल्यों का अवमूल्यन हो रहा हो, ‘बाहर’ के चकाचौंध से ‘भीतर’ के विवेक और नैतिकता की अकाल मृत्यु हो रही हो और हर तरफ केवल ‘अनास्था’ का बोलबाला हो, ऐसे में सनी वर्की का ‘दान’ उसे इतना ‘धनवान’ तो बना ही देता है कि मुकेश अंबानी की अकूत सम्पत्ति भी कम पर जाय उसके सामने।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदी के सामने चेहरा नीतीश का, पर मुकाबले में लालू

महागठबंधन ने 243 में से 242 सीटों पर उम्मीदवारों की घोषणा कर दी। 23 सितम्बर को जदयू, राजद और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्षों की मौजूदगी में नीतीश कुमार ने महागठबंधन की सूची जारी की। इस मामले में महागठबंधन ने निश्चित रूप से एनडीए की तुलना में अधिक ‘समझदारी’ और ‘एकजुटता’ का परिचय दिया। इन तीनों दलों का तालमेल सीट बांटने और सूची जारी करने में ही नहीं उम्मीदवारों के चयन में भी दिखा। महागठबंधन के उम्मीवारों की सूची से एक बात साफ हो गई कि ‘इंजीनियरिंग’ की डिग्री भले ही नीतीश के पास हो लेकिन इसमें ‘सोशल इंजीनियरिंग’ लालू की चली है। केवल यही नहीं, सीट-दर-सीट विश्लेषण करें तो ये भी स्पष्ट हो जाएगा कि नरेन्द्र मोदी के सामने चेहरा भले ही नीतीश का हो पर मुकाबले में लालू हैं।

आप निश्चित तौर पर जानना चाहेंगे कि ऊपर कही गई बात का आधार क्या है..? इस ‘आधार’ को जानने के लिए हमें उस ‘आधार’ तक पहुँचना होगा जिसके बूते महागठबंधन बिहार के महासमर को जीतने उतरा है। मजे की बात तो ये है कि महागठबंधन की सूची पर निगाह डालते ही हम उस ‘आधार’ तक पहुँच जाएंगे और वो भी बिना मशक्कत के। आप भले ही अचरज करें लेकिन सच ये है कि लालू के ‘आधार’ को ही महागठबंधन ने अपना ‘आधार’ बनाया है। जी हाँ, 242 उम्मीदवारों में 64 यादव और 33 मुसलमान उम्मीदवारों का होना महज संयोग नहीं है। 64 यादव उम्मीदवारों में 48 लालू के, 14 नीतीश के और 2 कांग्रेस के उम्मीदवार हैं। मुस्लिम उम्मीदवारों की बात करें तो राजद के 16, जदयू के 7 और कांग्रेस के 10 उम्मीदवार मैदान में हैं। इस तरह ‘माय’ समीकरण के तहत महागठबंधन ने 64 + 33 = 97 उम्मीदवार मैदान में उतारे हैं जो कुल उम्मीदवारों का 40% है।

ये तो हुई यादव और मुस्लिम उम्मीदवारों की बात। अब महागठबंधन के 242 उम्मीदवारों का विश्लेषण कुछ अलग तरह से करें। ये जानना दिलचस्प होगा कि इन 242 उम्मीदवारों में 164 यानि 68% उम्मीदवार पिछड़े, अति पिछड़े तथा मुस्लिम हैं। सवर्ण तथा एससी-एसटी उम्मीदवारों की बात करें तो उन्हें 16-16% हिस्सेदारी मिली है। कुल मिलाकर, ये कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि नीतीश और कांग्रेस ने लालू की ‘सोशल इंजीनियरिंग’ को ही फॉलो किया है।

महागठबंधन के उम्मीदवारों को एक और कोण से देखने के बाद इस बात में कोई संदेह नहीं रह जाएगा कि मोदी से असली टक्कर लालू ले रहे हैं। 2010 में नीतीश के विजय-रथ पर भाजपा भी सवार थी और उसे 91 सीटें मिली थीं। इस बार भाजपा के कब्जे वाली इन 91 सीटों में से 41 पर नीतीश और कांग्रेस के उम्मीदवार भाजपा के सामने होंगे जबकि शेष 50 सीटों पर अकेले लालू के उम्मीदवार भाजपा से लोहा ले रहे होंगे। इन सीटों पर राजद दूसरे नंबर पर था। लालू को भरोसा है कि पिछली बार जेडीयू-भाजपा साथ थी तब उनकी पार्टी दूसरे नंबर पर थी। इस बार जेडीयू और राजद साथ हैं तो इसका सीधा फायदा उन्हें मिलेगा। देखा जाय तो लालू के इस ‘विश्वास’ को नकारना बहुत मुश्किल है। एनडीए के मार्ग में जितनी कठिनाई नीतीश के ‘सुशासन’ को लेकर है, उससे कहीं ज्यादा मुश्किल लालू खड़ी कर रहे हैं, यादव-मुस्लिम के साथ-साथ पिछड़ों में भी अपनी पैठ के कारण।

वैसे भी महागठबंधन के अस्तित्व में आने के बाद से लेकर अब तक एनडीए के हमले का केन्द्र-बिन्दु लालू रहे हैं। भाजपा के घोषित उम्मीदवारों की सूची में 26 यादवों की मौजूदगी भी इसी तथ्य की पुष्टि करती है। भाजपा और उसके साथी दलों ने लालू पर जितना निशाना साधा है उतना ही लालू का ‘वोटबैंक’ उनके लिए एकजुट हुआ है, ऐसा राजद खेमा मानता है। खैर, लालू का वोटबैंक उनके लिए कितना एकजुट रहेगा ये तो 8 नवंबर को मतगणना के बाद ही पता चलेगा लेकिन फिलहाल इतना तो कहा ही जा सकता है कि बिहार के इस महामुकाबले में अगर नरेन्द्र मोदी पिछड़ते हैं और ताज फिर नीतीश के सिर होता है तो ऐसा ‘किंगमेकर’ कहलाना पसंद करने वाले लालू प्रसाद यादव के कारण ही होगा, वरना नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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आदमी !

दिन में सूरज की रौशनी

रात में बिजली की चकाचौंध

आखिर अँधेरा………..!

जाए तो जाए किधर ?

सिमटकर दुबक गया अँधेरा

आदमी के अन्दर |

और

आहिस्ता….! आहिस्ता…..!!

दीमक बनकर

शख्सियत व इन्सानियत को

निगलता जा रहा है

आदमी !

अब आदमी नहीं…….

बस ! लाश बनता जा रहा है |

डॉ.मधेपुरी

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बिहार में भाजपा की ‘बढ़त’ पर भारी ‘दो भूल’..!

बिहार में चुनाव धीरे-धीरे परवान चढ़ रहा है। पहले चरण के लिए नामांकन हो चुके हैं और दूसरे चरण की नामांकन-प्रक्रिया चल रही है। जद्दोजहद के बाद एनडीए और महागठबंधन ने लगभग सारी सीटों के लिए उम्मीदवारों के नाम भी तय कर लिए हैं। अब तक के प्रचार-अभियान में भाजपा बाकी दलों से ज्यादा आक्रामक दिखी है। ‘सर्वे’ और ‘समीकरण’ से भी उसकी बढ़त दिख रही है और एनडीए खेमे में ‘फील गुड’ का माहौल साफ तौर पर देखा जा सकता है। इन ‘अच्छी-अच्छी’ बातों पर ‘दो भूल’ भाजपा को भारी पड़ सकती है।

आखिर वो ‘दो भूल’ है क्या..? ये जानने से पहले ये जानें कि जिन दो लोगों से ये ‘दो भूल’ हुई है वो हैं कौन..? आप सुनकर हैरान होंगे कि इनमें एक भाजपा के वरिष्ठ नेता और देश के गृहमंत्री राजनाथ सिंह हैं तो दूसरे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत। ऐसे कद के लोगों से भाजपा ने ऐसी उम्मीद हरगिज ना की होगी। दिल्ली विधान सभा चुनाव में हुई भाजपा की ऐतिहासिक पराजय में नरेन्द्र मोदी के उस एक भाषण का बड़ा योगदान है जिसमें उन्होंने कहा था कि “मेरे ‘अच्छे भाग्य’ से पेट्रोल और डीजल की कीमतें कम हो गई हैं और आम आदमी अधिक बचत करता है तो ‘बदकिस्मत’ व्यक्ति को लाने की क्या जरूरत है।“ उनके इस कथन का ‘संदर्भ’ चाहे जो रहा हो लेकिन उनकी जुबान ‘थोड़ी’ फिसली और भाजपा की किस्मत वहाँ ‘पूरी’ पलट गई। अगर सावधानी ना बरती गई तो बिहार में भी ऐसा होते देर नहीं लगेगी।

बहरहाल, जानते हैं कि बात क्या थी। पहले राजनाथ सिंह की बात। दिल्ली से सबक लेकर भाजपा ने बिहार में मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित ना कर नरेन्द्र मोदी के ‘चेहरे’ के सहारे ही आगे बढ़ने का फैसला किया। जदयू, राजद समेत तमाम पार्टियों ने इस पर तंज कसने में कोई कसर ना छोड़ी। भाजपा को ललकारा गया कि दम है तो अपना उम्मीदवार घोषित करे। सारी पार्टियां जानती थीं कि ये भाजपा की ‘कमजोर नस’ है और भाजपा चुपचाप सारे ‘हमले’ झेलती रही। इतने दावेदार थे यहाँ कि उसे डर था कि किसी एक चेहरे को आगे करना दिल्ली को दुहराने जैसा होगा। भाजपा “एक चुप, सौ सुख” के फार्मूले पर थी और यही ठीक भी था उसके लिए। सारी पार्टियां भी समझ गईं कि ये ‘चुप्पी’ उसकी रणनीति का हिस्सा है। ये मुद्दा अपनी धार खो ही रहा था कि अचानक 6 सितम्बर को राजनाथ सिंह का बयान आया कि भाजपा जल्द ही मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार का चुनाव कर लेगी। उन्होंने जोर देकर कहा कि भाजपा का संसदीय बोर्ड जल्द इस बात का निर्णय कर लेगा कि बिहार चुनाव में किसे सीएम पद का प्रत्याशी बनाना है। राजनाथ के इस बयान को आए 19 दिन हो गए लेकिन आज तक प्रत्याशी तय करना तो दूर इस बात को लेकर कोई सुगबुगाहट तक नहीं हुई। लोग अब पूछने लगे कि राजनाथ सरीखे नेता ने ये बयान आखिर किस आधार पर दिया था..? इससे बिहार में भाजपा के पास कोई ‘प्रतिनिधि’ चेहरा ना होने की ‘कमजोरी’ एक बार फिर उजागर हुई और कुछ नहीं। महागठबंधन को भी दोबारा ‘व्यंग्य-बाण’ छोड़ने का मौका मिल गया सो अलग।

खैर, राजनाथ के बयान से तो बात ‘व्यंग्य-बाण’ के आस-पास थी। मोहन भागवत के बयान से तो पूरा खेल ही बिगड़ जाने का डर है। जी हाँ, आरएसएस प्रमुख ने आरएसएस के मुखपत्र ‘ऑर्गेनाइज़र’ में बयान दिया है कि आरक्षण को हमेशा राजनीतिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया गया है। आगे उन्होंने कहा कि एक गैर राजनीतिक समिति का गठन होना चाहिए जो समीक्षा करे कि किसे आरक्षण की जरूरत है और कब तक..? भागवत के इस बयान के आते ही आरक्षण का जिन्न बाहर निकल चुका था और भाजपा बचाव की मुद्रा में थी। पार्टी ने तुरत कहा कि वह आरक्षण की समर्थक है और भागवत के बयान को गलत तरीके से पेश किया गया है। लेकिन तब तक ये मुद्दा बन चुका था। नीतीश कुमार ने कहने में जरा भी देर ना की कि आरएसएस का जो विचार है वही भाजपा का विचार है और ये भी कि भाजपा बिहार चुनाव के कारण अपने को इस बयान से अलग कर रही है। अब जिस किसी ने उसे वोट किया वो अपने पांव पर कुल्हाड़ी मारेगा। उधर लालू अपने अंदाज में दहाड़ रहे थे कि माँ का दूध पिया है तो आरक्षण खत्म करके दिखाओ। तुम आरक्षण खत्म करने की बात कहते हो, हम इसे आबादी के अनुपात में बढ़ाएंगे। लगे हाथ उन्होंने ये भी पूछ लिया कि हाल ही में ‘पिछड़ा’ बने मोदी बताएं कि अपने आका मोहन भागवत के कहने से आरक्षण खत्म करेंगे या नहीं..?

मोहन भागवत ने गलत कहा या सही कहा, ये यहाँ विचारणीय नहीं है। यहाँ बात बिहार में भाजपा की संभावनाओं को लेकर हो रही है। इस लिहाज से देखा जाय तो भागवत ने आरक्षण की समीक्षा की बात गलत समय उठाई है। कम या ज्यादा इसका खामियाजा भाजपा को भुगतना पड़ सकता है। इसी तरह राजनाथ ने सीएम प्रत्याशी की घोषणा जल्द करने की बात हो सकता है केन्द्रीय नेतृत्व स्तर पर हुए किसी विमर्श के आधार पर कही हो लेकिन व्यावहारिक तौर पर भाजपा के लिए जो ‘उचित’ या ‘सम्भव’ ना हो उसे मीडिया में कहने की जरूरत क्या थी..?

समीकरण, समय और संवाद के संयोग से ही सियासत में सफलता मिलती है। समीकरण पक्ष में हो, समय भी साथ दे रहा हो लेकिन संवाद में जरा भी चूक हो जाय तो संयोग बिगड़ने में देर नहीं लगती। इस संवाद के कारण भाजपा ने सफलता और असफलता दोनों का स्वाद चखा है। इस चुनाव में उसे क्या मिलेगा ये उसके द्वारा बरती गई सावधानी से ही तय होगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नया संविधान : नया नेपाल

20 सितम्बर हमारे पड़ोसी नेपाल के लिए नया सूर्योदय लेकर आया। इस दिन 239 साल के राजतंत्र (शाहवंश का शासन) और 7 साल के अंतरिम संविधान (2008 से नया संविधान लागू होने तक) के बाद नेपाल का पहला लिखित संविधान लागू हुआ। इस संविधान के लागू होते ही दुनिया का एकमात्र ‘हिन्दू राष्ट्र’ नेपाल ‘धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य’ में तब्दील हो गया। इस ऐतिहासिक संविधान को नेपाल के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. रामबरन यादव ने बीते रविवार को आधिकारिक तौर पर राष्ट्र को समर्पित किया।

कुछ विश्व-नागरिक होने के नाते तो कुछ इस कारण कि नेपाल ना केवल ‘सीमा’ से बल्कि ‘स्वभाव’ और ‘संस्कृति’ से भी भारत के बेहद करीब है, हमें नेपाल को बधाई देते हुए ये जानने की कोशिश करनी चाहिए कि उसके संविधान में खास क्या है। राजतंत्र के ‘अवशेष’ पर ‘लोकतंत्र’ की नींव रखना कतई आसान नहीं था लेकिन नेपाल बड़े धैर्य के साथ ‘परिवर्तन’ के लम्बे दौर से गुजरा है। तो चलिए, जानते हैं नेपाल के संविधान से जुड़ी 21 जरूरी बातें।

एक, “नेपाल का संविधान – 2072 बीएस” लागू होने की घोषणा से पहले राष्ट्रपति ने इसकी पाँच प्रतियों पर हस्ताक्षर किए। उन्होंने कहा कि नए संविधान ने गणराज्य को अब एक संस्थाबद्ध रूप दे दिया है।

दो, बीएस का अर्थ विक्रम संवत् है। ईसवी सन में मौजूदा वर्ष 2015 है लेकिन नेपाल में विक्रम संवत् लागू है। विक्रम संवत् में वर्ष 2072 चल रहा है।

तीन, नेपाल के इस नए संविधान में 37 संभाग, 304 अनुच्छेद और 7 उपबंध हैं।

चार, 601 सदस्यों वाली संविधान सभा में 507 सदस्यों ने इसके पक्ष में और 25 सदस्यों ने विरोध में मतदान किया। तराई क्षेत्र के 69 सदस्य संविधान बनाने की प्रक्रिया का बहिष्कार करते हुए गैरमौजूद रहे। इस संविधान सभा के अध्यक्ष सुभाषचंद्र नेमवांग थे।

पाँच, नए संविधान के लागू होने के साथ ही अंतरिम संविधान रद्द हो गया है और संविधान सभा नियमित संसद में बदल गई है।

छह, संविधान लागू होते ही नेपाल की राजशाही अब इतिहास की बात हो गई। नेपाल अब संघीय गणराज्य होगा और संघवाद इसका मूल सिद्धांत।

सात, भारत की तरह नेपाल में भी राष्ट्रपति देश के संवैधानिक राष्ट्राध्यक्ष होंगे और कार्यकारी शक्तियां प्रधानमंत्री के पास होंगी।

आठ, धर्मनिरपेक्षता संविधान का दूसरा मूल सिद्धांत होगा। नेपाल के ‘धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र’ में सभी धर्मों को स्वतंत्रता तो होगी लेकिन राष्ट्र का कर्तव्य सनातन धर्म और उसकी संस्कृति को बचाना होगा।

नौ, नए धर्मनिरपेक्ष संविधान में गाय को नेपाल का राष्ट्रीय पशु घोषित किया गया है। गाय को अब संवैधानिक संरक्षण मिल गया है यानि गोहत्या पर पाबंदी होगी।

दस, एक समुदाय के प्रभुत्व वाले पुराने ढांचे से निकलकर नेपाल में ‘इन्क्लूसिवनेस’ यानि आर्थिक समानता पर आधारित समतामूलक समाज की स्थापना होगी।

ग्यारह, आरक्षण और कोटा व्यवस्था के जरिए वंचित, क्षेत्रीय और जातीय समुदायों के सशक्तिकरण की व्यवस्था संविधान में की गई है।

बारह, संविधान में तीसरे लिंग यानि थर्ड जेंडर को भी मान्यता दी गई है।

तेरह, नेपाल में अब सात नए राज्य होंगे। संघवाद की भावना के अनुरूप इन राज्यों, केन्द्र और स्थानीय शासन की अपनी-अपनी शक्तियां होंगी। इन राज्यों के नाम और सीमाएं अभी तय नहीं हैं।

चौदह, नेपाल में अब संसदीय सरकार होगी। यहाँ दो सदनों वाली संसद, एक सदन वाली विधान सभा और जिला, प्रांतीय तथा संघीय स्तरों पर अर्थात् तीन स्तरीय न्यायपालिका होगी।

पन्द्रह, नए संविधान के तहत संविधान परिषद् मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति करेगी। सुप्रीम कोर्ट, हाईकोर्ट और जिला जजों की नियुक्ति न्यायिक परिषद् करेगी।

सोलह, नेपाली देश की राष्ट्रीय भाषा बनी रहेगी। हालांकि नए संविधान में सभी जातीय भाषाओं को मान्यता दी गई है और प्रांतीय सभाओं को अपनी आधिकारिक भाषा चुनने का अधिकार दिया गया है।

सत्रह, आर्थिक, सामाजिक और सांस्कृतिक मूल अधिकारों की लम्बी सूची बनाई गई है। इनकी अवहेलना पर अदालत में सुनवाई हो सकेगी।

अठारह, नेपाली महिलाओं को विदेशी पुरुष से शादी करने पर अपनी संतान को नेपाली नागरिकता देने का अधिकार होगा।

उन्नीस, संविधान की मूल भावना नेपाल के शासन में हर नेपाली नागरिक की बराबर की भागीदारी सुनिश्चित करना है। चुनाव में ‘आनुपातिक प्रतिनिधित्व प्रणाली’ इसी दिशा में उठाया गया कदम है।

बीस, संविधान की प्रस्तावना में बहुदलीय लोकतांत्रिक प्रणाली, मानवाधिकार, वोट देने का अधिकार, प्रेस की आजादी और कानून आधारित सामाजवाद की बात कही गई है।

इक्कीस, नए संविधान के लागू होने के बाद राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, संसद अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष के पदों के लिए नए सिरे से चुनाव होंगे। ये चुनाव एक महीने के अन्दर कराने होंगे।

बता दें कि साल 2008 में माओवादियों न संविधान सभा का चुनाव जीतकर देश से राजशाही को समाप्त किया था लेकिन संविधान सभा नया संविधान बनाने में नाकाम रही थी। 2012 में पहली संविधान सभा को भंग कर दिया गया था। दूसरी संविधान सभा का गठन 2013 में हुआ था।

इस संविधान को लेकर नेपाल में जहाँ एक ओर जश्न है वहीं देश के कुछ हिस्सों में तनाव और हिंसा का माहौल भी है। मधेसी, थारू, राजशाही में आस्था रखनेवाले, नेपाल को हिन्दू राष्ट्र बनाने के समर्थक और युनाइटेड कम्युनिस्ट पार्टी नेपाल (माओवादी) से अलग हुआ गुट इसका विरोध कर रहे हैं। भारत की सीमा और संस्कृति से सीधे तौर पर जुड़े मधेसियों को सात प्रांतों वाले संघीय ढांचे पर ऐतराज है। महिला अधिकार कार्यकर्ता महिलाओं के लिए अधिक अधिकार की मांग कर रहे हैं। कुल मिलाकर कुछ चिन्ताएं, कुछ आशंकाएं, कुछ आपत्तियां जरूर हैं लेकिन इससे इस अवसर की ऐतिहासिकता कम नहीं हो जाती। सृजन के समय ‘पीड़ा’ स्वाभाविक है और सृजन एक ही बार में ‘पूर्ण’ हो जाय, ये भी जरूरी नहीं। तमाम अवरोधों के बाबजूद जब नेपाल यहाँ तक पहुँच गया है तो आगे का सफर भी वो कर ही लेगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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याद किये गये साहित्यकार श्रीकान्त वर्मा

बिहार प्रदेश श्रीकान्त वर्मा साहित्य समिति के संस्थापक संतोष सिन्हा द्वारा श्री वर्मा की 85वीं जयन्ती कौशिकी भवन मधेपुरा के अम्बिका सभागार में धूमधाम से मनाई गई | साथ में मधेपुरा के जनसेवी नवल किशोर को भी याद किया गया और साहित्यकारों द्वारा इनकी तस्वीरों पर पुष्पांजलि अर्पित की गई |

इस अवसर पर कौशिकी क्षेत्र हिन्दी साहित्य सम्मेलन के संरक्षक व पूर्व सांसद डॉ.रमेन्द्र कुमार यादव रवि, कार्यकारी अद्यक्ष व पूर्व प्राचार्य प्रो.श्यामल किशोर यादव एवं सम्मलेन के सचिव डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी सरीखे साहित्यकार त्रय को सम्मानित किया गया |

सर्वप्रथम सचिव डॉ.मधेपुरी ने मंच संचालन करते हुए समारोह को सम्बोधित किया और कहा कि मध्यप्रदेश में जन्मे श्रीकान्त वर्मा जैसे साहित्यकार, कथाकार, कवि व पत्रकार को बिहार के मधेपुरा में साहित्यकारों द्वारा याद किया जाना सम्पूर्ण भारत में एकता एवं समन्वय का संदेश प्रेषित करता है | ख्यातिप्राप्त चित्रकार मकबूल फ़िदा हुसैन के अभिन्न मित्र रहे श्रीकान्त वर्मा चिड़िया की तरह कभी मंदिर के त्रिशूल पर तो कभी मस्जिद के गुंबद पर निर्भीक होकर फुदकते रहे और देश की बेहतरीन सेवा करते रहे तभी तो उनके निधनोपरांत उनकी धर्मपत्नी श्रीमती वीणा वर्मा को भी राज्यसभा सदस्य बनाया गया |

आगे मंडल वि.वि. के संस्थापक कुलपति एवं दर्जनों पुस्तकों के रचनाकार डॉ.रवि द्वारा श्रीकान्त वर्मा के साहित्यिक अवदानों की चर्चाएँ की गई तथा उनके साथ-साथ नब्बे के दशक में राज्यसभा सदस्या रहीं श्रीमती वीणा वर्मा (धर्मपत्नी श्रीकान्त वर्मा) के कई रोचक संस्मरणों को भी उद्धृत किया गया | उन्होंने प्रो.मणिभूषण वर्मा की रचना “धूएँ के देश में” का लोकार्पण किया और विस्तार से काव्य-संग्रह की मीमांसा प्रस्तुत की | अंत में प्राचार्य श्यामल किशोर द्वारा अपने अध्यक्षीय भाषण में श्रीकांत वर्मा की अदभुत पत्रकारिता , अद्वितीय सम्पादकीय क्षमता तथा काव्य-ग्रंथों एव कथा-संग्रहों सहित अन्य साहित्यिक उपलब्धियों का विस्तार से वर्णन किया गया |

Honourable Guests and Students attending function at Ambika Sabhagar .
Honourable Guests and Students attending function at Ambika Sabhagar .

दूसरे सत्र में श्रीकान्त वर्मा एवं नवल किशोर की स्मृति में एक काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमे रचनाकार राजू भैया, रघुनाथ प्र.यादव, उल्लास मुखर्जी, सियाराम यादव मयंक, संतोष सिन्हा, सियाशरण भारती, कृषणदेव यादव, आशीष कुमार, प्रो.मणिभूषण वर्मा, डॉ. मधेपुरी ने अपनी-अपनी एक-एक प्रतिनिधि कविता का पाठ किया | सुधि श्रोता के रूप में महामहिम राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित वैधराज शम्भु शरण भारतीय, सुकवि अभय कुमार एवं समाजसेवी प्रवीन कुमार उर्फ़ पारोजी आदि मुख्यरूप से उपस्थित रहे | धन्यवाद ज्ञापन तुलसी पब्लिक स्कूल के निदेशक श्यामल कुमार सुमित्र ने किया |

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एक नहीं पाँच सर्वे का सार, ‘घिर’ गए नीतीश कुमार

इस बार के चुनाव में नीतीश कुमार ने अपने पॉलिटिकल करियर का सबसे बड़ा दांव खेला है। बीजेपी से संबंध तोड़ने और मांझी को मुख्यमंत्री बनाने से भी बड़ा दांव है लालू और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाना। लालू से अलग होकर समता पार्टी की नींव रखना उनके लिए सबसे बड़ा (और सबसे पॉजिटिव भी) टर्निंग प्वाइंट था। जेपी के घोषित ‘चेले’ होने के कारण कांग्रेस-विरोध भी समझ में आता था। लेकिन अपनी जिन ‘भूलों’ की भरपाई के लिए इन्होंने फिर से लालू (और साथ में कांग्रेस) से संबंध जोड़ा है, वो कहीं और बड़ी भूल ना साबित हो जाए। कम-से-कम अब तक आए पाँच सर्वे, जिनमें देश के चार बड़े चैनल/एजेंसियों के साथ-साथ बीजेपी का आंतरिक सर्वे भी शामिल है, का सार तो यही है।

2010 में जेडीयू ने 141 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और 115 सीटों पर उसे जीत मिली थी। तब बीजेपी के साथ गठबंधन था नीतीश का। दूसरी ओर लालू के राजद का गठबंधन रामविलास पासवान की लोजपा से था। तब लालू ने 168 सीटों पर उम्मीदवार उतारे थे और केवल 22 पर उन्हें जीत मिली थी। कांग्रेस 2010 में एकमात्र ऐसी पार्टी थी जिसने सारी 243 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे जीत मिली थी मात्र 4 सीटों पर। अब इस बार का समीकरण देखिए। इस बार ये तीनों एक साथ हैं और इनका सीट शेयर इस तरह है – जेडीयू 101 + राजद 101 + कांग्रेस 41 = 243 सीटें। यानि पिछले चुनाव में 115 सीटें जीतने वाली जेडीयू इस बार लड़ ही रही है 100 सीटों पर। कहने का मतलब ये है कि अगर 100 की 100 सीटें भी जीत जाय जेडीयू तब भी 15 सीटों का तो सीधा नुकसान हो ही रहा है नीतीश को। पर नीतीश ने इतनी ही ‘कुर्बानी’ दी होती तो एक बात थी। महागठबंधन के लिए उन्होंने अपनी 25 जीती हुई सीटें राजद को और 10 जीती हुई सीटें कांग्रेस को दी हैं। यानि 35 सीटिंग विधायकों की बलि नीतीश को चढ़ानी पड़ी और बदले में मिली राजद की केवल एक सीट। महागठबंधन को नीतीश भले ही वक्त की ‘जरूरत’ और उनकी पार्टी ‘मास्टर स्ट्रोक’ कह ले लेकिन वास्तव में ये ‘कमजोर’ और ‘हताश’ हो चुके नीतीश का ‘अक्श’ मात्र है।

अब एक नज़र अब तक के सर्वे पर डालें। सबसे पहले 9 सितंबर को इंडिया टीवी/सी वोटर्स का सर्वे आया। इस सर्वे के मुताबिक एनडीए को 94-110 सीटें, महागठबंधन को 116-132 सीटें और अन्य को 13-21 सीटें मिलनी चाहिएं। अगले ही दिन यानि 10 सितंबर को आए इंडिया टीवी/सिसरो के सर्वे में एनडीए को 120-130 सीटें, महागठबंधन को 102-103 सीटें और अन्य को 10-14 सीटें दी गई थीं। इसके बाद 15 सितंबर को एबीपी न्यूज/नीलसन का सर्वे सामने आया जिसमें एनडीए को 118, महागठबंधन को 122 और अन्य को 3 सीटें मिलने का अनुमान है। यहाँ तक मुकाबला कांटे का दिखता है। पहले सर्वे में महागठबंधन को बढ़त मिली थी, दूसरे में एनडीए को और तीसरे में दोनों लगभग बराबरी पर थे। कहानी में मोड़ इसके बाद हुए सर्वेक्षणों से आया।

18 सितंबर को आए जी न्यूज के सर्वे के मुताबिक 243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में एनडीए को 140 सीटें मिलने जा रही हैं जबकि महागठबंधन महज 70 सीटों पर सिमट सकता है। शेष 33 सीटों पर कड़ा मुकाबला है। इस सर्वे के मुताबिक 50.8 फीसदी मतदाता भगवा रंग में रंगे हैं और नीतीश-लालू के साथ 42.5 प्रतिशत मतदाता ही हैं।

बीजेपी के आंतरिक सर्वे के अनुसार भी वो ‘आसानी’ से बहुमत हासिल करती दिख रही है। बीजेपी के अपने आकलन के मुताबिक एनडीए को 160 से 170 सीटें मिलनी चाहिएं। इस सर्वे के अनुसार महागठबंधन महज 70 सीटों पर सिमट रहा है और इन 70 सीटों में भी ज्यादातर सीटें लालू की होने जा रही हैं। इसका अर्थ ये है कि नीतीश कुमार हर तरह से ‘घिर’ गए हैं। यहाँ यह बताना जरूरी है कि बीजेपी ने इससे पहले भी आंतरिक सर्वे कराए थे जिनमें एनडीए पिछड़ा हुआ था। बीजेपी के अपने ‘ग्राफ’ के मुताबिक भी ज्यों-ज्यों चुनाव नजदीक आता गया है, त्यों-त्यों बीजेपी बढ़त बनाने में सफल हुई है।

देखा जाय तो बीजेपी को बढ़त मिलने के कारण भी स्पष्ट हैं। मुलायम सिंह ने महागठबंधन से नाता तोड़कर और अब ‘थर्ड फ्रंट’ को आकार देकर बीजेपी को स्पष्ट तौर पर फायदा पहुँचाया है। इस थर्ड फ्रंट में पप्पू यादव के शामिल होने तथा तारिक अनवर को मुख्यमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में सामने लाने से भी महागठबंधन को नुकसान होगा। मांझी महादलितों के वोट में सेंध लगा ही चुके थे और अब ओवैसी ने सीमांचल में चहलकदमी कर महागठबंधन की ही चिन्ता बढ़ाई है। वामदलों को भी थोड़ा-बहुत जो मिलेगा, महागठबंधन के हिस्से का ही। इसीलिए सारे सर्वे को किनारे भी कर दें तो भी एनडीए बेहतर स्थिति में तो है ही।

जिस तरह रंगों से रंग निकलते चले जाते हैं और उनकी गिनती सम्भव नहीं, वैसे ही राजनीति में एक समीकरण से कितने समीकरण जुड़े होते हैं और उन समीकरणों से कितने नए समीकरण बन जाएंगे इसका आकलन पूरी तरह सम्भव नहीं। लेकिन इन पंक्तियों के लिखने तक बिहार में मुकाबला कांटे का  है और इस कांटे के मुकाबले में बढ़त फिलहाल एनडीए को है यानि उसकी राह के ‘कांटे’ दूर होते दिख रहे हैं। यहाँ तक कि नीतीश के साथी लालू और कांग्रेस के हिस्से में भी ‘कांटे’ अपेक्षाकृत कम हैं लेकिन नीतीश हर तरह से ‘कांटों’ में घिरे दिख रहे हैं, इसमें कोई दो राय नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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