जब सौ फीट की सड़क सिमटकर सात फीट की रह जाय..!

क्या गाँव क्या शहर सड़कों का अतिक्रमण अब सामान्य-सी बात हो गई है। लोग खुद तो ऐसा कर ही रहे हैं, बड़ी तकलीफ होती है जब वे अपने स्वार्थ में कई बार देवी-देवताओं को ढाल बना लेते हैं ताकि मन्दिर की आड़ में उनका कारोबार चलता रहे। यहाँ तक कि कई जगहों पर सौ फीट की सड़क सिमटकर सात फीट की रह गई है। चलिये बतायें कैसे..!

सबसे पहले तो हवाई चप्पल से लेकर रूई तक की दूकानवाले फुटपाथ छेककर दस फीट तक अपना सामान बिछा देते हैं। उनके आगे तिरपाल व प्लास्टिक आदि से बनाई गईं फल-सब्जी की दूकानें लगभग बीस फीट तक पहुँच जाती हैं। शाम होते-होते ठेलावाले दूकानदार अपनी-अपनी चीजों के साथ विराजमान हो जाते हैं। अब बारी होती है क्रेताओं की। वे जैसे-तैसे बाईक व गाड़ी खड़ी कर दूकानदारी करते हैं। बुजुर्गों और महिलाओं के लिए तो शाम में दो कदम चलना भी खतरे से खाली नहीं होता क्योंकि सड़क पर मवेशियों की हिस्सेदारी भी तो होती है और दूसरी ओर आज के युवक इन सिकुड़ती सड़कों पर भी धीमी रफ्तार में बाईक चलाना अपनी तौहीन समझते हैं। आश्चर्य तो ये होता है कि ये हाल मधेपुरा की मुख्य सड़कों का है और सड़क की ये कहानी प्रत्येक दिन दुहराई जाती है। फिर भी प्रशासन की ओर से कोई ठोस पहल नहीं दीखती..! क्या अब जाग जाने की जरूरत नहीं है..!

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रसीद के अभाव में अब किसान आत्महत्या करेंगे..!

रजिस्ट्री ऑफिस में हर होज लाखों रुपये निबन्धन शुल्क के रूप में जमा होते हैं। सालाना करोड़ों रुपये का टारगेट सरकार निर्धारित करती है लेकिन खरीद की गई जमीन का दाखिल-खारिज मालगुजारी रसीद के अभाव में पिछले छह महीने से ठप्प है। राजस्व रसीद नहीं कटने से किसानों को कई तरह के कष्ट और नुकसान से गुजरना पड़ रहा है। रसीद के अभाव में किसानों को आपदा नुकसान व खाद-बीज सब्सिडी एवं फसल-बीमा आदि से वंचित रहने की मजबूरी बनी रहती है। किसान क्रेडिट कार्ड तो सपना बनता जा रहा है। स्पेशल मेसेन्जर भी सरकारी तंत्र के पास से खाली हाथ लौट आते हैं तो ऐसी स्थिति में मालगुजारी रसीद के अभाव में क्या अब यहाँ के किसान भी आत्महत्या करेंगे..!

अंचलाधिकारी श्री उदयकृष्ण यादव ने कहा कि कई माह से राजस्व रसीद उपलब्ध नहीं होने पर जिला कार्यालय में पड़े सड़े-गले रसीद से ही फिलहाल काम चलाए जाने का आदेश दिया गया है।

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सांसद की बेटी, सड़क किनारे बेच रही हैं आम

आम बेचने वाली यह महिला आम नहीं है। लगातार आठ बार सांसद व लोकसभा के डिप्टी स्पीकर रह चुके कड़िया मुंडा की बेटी हैं। नाम है चंद्रावती सारू, ये पेशे से शिक्षिका हैं। बगीचे में जरूरत से ज्यादा आम हुए हैं तो उन्हें सड़क किनारे बैठकर बेचने में यह बात आड़े नहीं आई कि वे झारखंड के बड़े नेता की बेटी हैं।
आठ बार सांसद, चार बार केंद्रीय मंत्री और दो बार विधायक रहे कड़िया का जीवन आज के राजनेताओं के लिए एक मिसाल है। व्यक्तिगत जीवन बिल्कुल वैसा ही जैसा अब से चार दशक पहले था, जब वह पहली बार सांसद चुने गए थे। झारखंड के आदिवासियों के संसद में अकेले प्रतिनिधि। आज भी गांव आते हैं तो वैसे ही खेतों में हल-कुदाल चलाते हैं, तालाब में नहाते हैं। नक्सली हिंसा के लिए देश के सबसे खतरनाक खूंटी जिले में मामूली सुरक्षा के साथ घूमते हैं।

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