तो क्या मुलायम करेंगे बिहार में ‘थर्ड फ्रंट’ की अगुआई..!

‘जनता परिवार’ एक बार फिर बनते-बनते टूट गया। इस बार तो इसके मुखिया ही नाता तोड़ गए। एनसीपी के बाद सपा भी ‘महागठबंधन’ में ‘अपमान’ नहीं सह पाई और कल इसके महासचिव रामगोपाल यादव ने बिहार में अकेले दम चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। आज के हालात में जो सपा अपने बूते बिहार में शायद एक भी सीट ना जीत पाए उसमें अचानक इतना ‘आत्मसम्मान’ जागा तो कैसे..? क्या पिछले दिनों की मुलाकात में प्रधानमंत्री मोदी ने मुलायम से महागठबंधन को लेकर ज्यादा ‘मुलायम’ ना होने का मंत्र दिया..? या फिर भाजपा की यूपी विजय के रणनीतिकार अमित शाह से मिलकर रामगोपाल यादव ने ‘बिहार विजय’ का कोई फार्मूला पा लिया..?

जो भी हो, अब बिहार के ‘महागठबंधन’ में जदयू, राजद और कांग्रेस का ही ‘बंधन’ शेष बचा है। वामदल पहले ही अलग-थलग हैं। तो क्या अब मुलायम बिहार में किसी ‘थर्ड फ्रंट’ की सम्भावना पर काम कर रहे हैं..? देखा जाय तो सैद्धांतिक तौर पर सपा, एनसीपी और वामदलों का कोई खास मतभेद भी नहीं है और इन बेसहारों को किसी ‘सहारे’ की सख्त़ जरूरत भी है। ऐसे में ये तीनों मिलकर चुनाव लड़ें तो कोई आश्चर्य की बात भी नहीं होनी चाहिए। और तो और पप्पू यादव की जनअधिकार पार्टी भी देर-सबेर इस संभावित फ्रंट का हिस्सा हो सकती है। मुलायम और उनकी पार्टी से पप्पू का पुराना ‘प्रेम’ रहा है और ‘जरूरत’ में प्रेम जगने-जगाने का उनका पुराना इतिहास भी है।

बहरहाल, इन सारे प्रकरणों से अभी मजे में कोई पार्टी है तो वो है भाजपा। सपा, एनसीपी, वामदल या पप्पू की जनअधिकार पार्टी – ये सभी अकेले-अकेले लड़ें तो और मिल जायें तो – सेंधमारी हर हाल में महागठबंधन के वोट बैंक में ही करेंगे। फायदा हर हाल में भाजपा को ही होता दिख रहा है। इधर ओवैसी ने भी बिहार में चहलकदमी शुरू कर दी है और उनकी सक्रियता से भी भाजपा की ही सेहत सुधरेगी।

हालांकि, सपा की घोषणा के बाद शरद यादव मुलायम से मिल आए हैं और लालू भी अपने रूठे समधी को मना लेने का दावा कर रहे हैं, लेकिन ये इतना आसान नहीं। रिश्तेदारी एक चीज है और राजनीति दूसरी। राजनीति में रिश्ते ‘अचानक’ बनते हैं और उससे भी ज्यादा ‘अचानक’ टूट जाते हैं। इस ‘अचानक’ की व्याख्या आज तक नहीं की जा सकी है और तब तो हरगिज नहीं की जा सकती जब ‘रिश्तों’ का ताना-बाना सत्ता के सबसे ‘ऊँचे’ शिखर से बुना जा रहा हो।

  • मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें


काश गवर्नमेंट भी चलती गूगल की तरह..!

दिल्ली की अरविन्द केजरीवाल सरकार ने हाल ही में पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम को सम्मान देते हुए नई दिल्ली स्थित औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड करने की घोषणा की। अभी ये घोषणा केवल घोषणा ही है। भारत में सरकारी फाइलें अब भी ‘माउस’ की बजाय ‘हाथी’ की सवारी करती हैं, इसीलिए इस घोषणा को सड़क पर उतरने में वक्त लगे शायद। बहरहाल, सरकार का काम सरकार जाने, गूगल ने अपना काम कर दिया।

जी हाँ, आपको आश्चर्य होगा कि अभी दिल्ली सरकार ने औरंगजेब रोड का बोर्ड भी नहीं हटाया है लेकिन गूगल ने बिना वक्त गंवाये अपने डाटाबेस को संशोधित कर लिया। अब आप गूगल मैप्स पर इस सड़क का नाम एपीजे अब्दुल कलाम रोड पाएंगे। यही नहीं, औरंगजेब रोड सर्च करने पर भी रिजल्ट में एपीजे अब्दुल कलाम रोड ही दिखेगा। विकिपीडिया पर भी इस रोड की मौजूदगी नये नाम के साथ हो गई है।

अरविन्द केजरीवाल की मौजूदगी में नई दिल्ली नगरपालिका (एनडीएमसी) ने ये फैसला 28 अगस्त को लिया था और अभी सप्ताह भर ही बीता है। देखा जाय तो इस फैसले को अमलीजामा पहनाने में दिल्ली सरकार ने इतनी देर नहीं की है कि हम उसे कठघरे में खड़ा कर दें। आज नहीं तो कल इस घोषणा पर अमल हो ही जाएगा। सवाल यहाँ सरकार की नीति और नीयत का नहीं, उस ‘तत्परता’ का है जिससे घोषणाएं जमीन पर उतरती हैं। हम इंडिया को जितना भी ‘डिजिटल’ और सिटी को जितना भी ‘स्मार्ट’ बना दें, फर्क ‘तत्परता’ से ही आना है।

सौ मीटर की दौड़ हो तो जीत-हार तय करने में सेकेंड के दसवें हिस्से की भी भूमिका होती है। देखा जाय तो ग्लोबलाइजोशन के दौर में वही देश दुनिया की अगुआई कर रहे हैं जो ‘मैराथन’ में भी ‘सौ मीटर’ वाली रफ्तार से दौड़ने की ‘क्षमता’ और ‘तत्परता’ रखते हैं। अपने दिल पर हाथ रखिए और बोलिए इस दौड़ में हम कहाँ हैं जबकि सच्चाई ये है कि दिल्ली से जुड़ा जो काम सात समुन्दर पार से संचालित होनेवाला गूगल कर लेता है वो दिल्ली की सरकार अपने समूचे तंत्र के साथ दिल्ली में बैठकर भी नहीं कर पाती है..!

पुनश्च :

औरंगजेब रोड का नाम बदलकर एपीजे अब्दुल कलाम रोड करना भी राजनीति का विषय है अपने यहाँ। जी हाँ, आजकल चर्चा में आए ओवैसी और मैडम मायावती ने इसका विरोध किया है। जिस ‘तत्परता’ की बात मैंने ऊपर की है उसकी जरूरत ये तय करने में भी है कि हमें किन ‘प्रतीकों’ के सहारे आगे बढ़ना है और ये भी कि आने वाली पीढ़ियों को हम किस ‘रोड’ पर चलते देखना चाहेंगे – औरंगजेब ‘रोड’ या एपीजे अब्दुल कलाम ‘रोड’..?

  • मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

सम्बंधित खबरें