सचिन के लिए झुके ‘विराट’ सिर को सलाम..!

बीते शनिवार को कोलकाता के ईडन गार्डन्स में पाकिस्तान के खिलाफ भारत की जीत की इबारत लिखने वाले विराट कोहली हर जगह छाए हुए हैं। टी20 वर्ल्ड कप के इस हाइ वोल्टेज मुकाबले में यादगार 55 रन बनाकर उन्होंने टीम इंडिया को 6 विकेट से जीत दिलाई। मीडिया के हर फॉर्मेट में बस जीत के इस ‘नायक’ की बात हो रही है। सोशल मीडिया पर तो उनकी तारीफों वाले ट्वीट्स की जैसे बाढ़ ही आ गई। उनकी इस पारी के बाद पाकिस्तान के महानतम क्रिकेटर इमरान खान ने कहा कि विराट जिस तरह से बल्लेबाजी कर रहे हैं अगर आगे भी करते रहें तो वो दिन दूर नहीं जब वो विश्व क्रिकेट का हर बड़ा रिकॉर्ड तोड़ देंगे।

भारत की जीत और विराट की बल्लेबाजी ने हर भारतीय की होली और रंगीन कर दी। पूरा देश जश्न में डूबा हुआ है। ईडन गार्डन्स पर हासिल की गई ये जीत क्रिकेटप्रेमियों के दिल पर हमेशा के लिए अंकित हो गई। होनी भी चाहिए। पर इस जीत के अलावे भी उस दिन ऐसा कुछ हुआ जिसे आप बहुत प्यार, बहुत आदर के साथ ताज़िन्दगी अपनी यादों में सहेजकर रखना चाहेंगे। जी हाँ, उस दिन ईडन गार्डन्स भारत की ऐतिहासिक जीत के अलावे उस लम्हे का भी साक्षी बना जिसे भारतीय क्रिकेट के सबसे खूबसूरत लम्हों में शुमार किया जा सकता है। इतना खूबसूरत कि आँखों के रास्ते बस दिल में उतरे और घर बना ले हमेशा के लिए।

Virat & Sachin
Virat & Sachin

जब पूरे देश की नजरें पाकिस्तान से जीत छीनकर टीम इंडिया की झोली में डाल रहे विराट कोहली पर टिकी थीं तब इस लाजवाब बल्लेबाज ने अपनी हाफ सेंचुरी बनाई और अपना सिर उस खिलाड़ी के आगे झुका दिया जिसे इस खेल का ‘भगवान’ कहा जाता है। जिस सचिन को विराट बचपन से अपना आदर्श मानते रहे हैं उन्हें उसी सचिन के सामने ‘इतिहास’ रचने का मौका मिला इससे बड़ी बात उनके लिए हो भी क्या सकती थी। अपने ‘अघोषित गुरु’ को ‘सम्मान की दक्षिणा’ देने का सचमुच बड़ा अवसर था उनके पास जिसे उन्होंने हाथ से जाने ना दिया। विराट ने पहले हाफ सेंचुरी पूरी की और फिर बेहद विनम्रता और अगाध सम्मान के साथ टीम इंडिया को कई बेहतरीन और यादगार जीत दिलाने वाले अपने ‘हीरो’ के आगे सिर झुका दिया। नि:संदेह ये खूबसूरत लम्हा भारतीय क्रिकेट के महान होने और बने रहने के प्रति आश्वस्त करता है।

विराट ने जो किया उससे यह भी साबित हुआ कि वो महान बल्लेबाज के साथ-साथ कितने बेहतरीन इंसान भी हैं। भारतीय क्रिकेट के ‘शिखर पुरुष’ के आगे ‘वर्तमान शिखर’ अपना सिर झुका रहा था। क्रिकेट की दो पीढ़ियों के लिए आदर्श का इससे बड़ा क्षण हो ही नहीं सकता। विराट ने तो उदाहरण पेश किया ही, टीम के बाकी सदस्य भी पीछे नहीं रहे। जीत के बाद पूरी की पूरी टीम ने स्टैंड में मौजूद सचिन के प्रति जिस तरह सम्मान व्यक्त किया उससे सचिन भाव-विभोर हो गए। उन्होंने ट्वीटर पर लिखा – “महान जीत, टीम इंडिया। पारी और इस अभिव्यक्ति के लिए शुक्रिया।“ विराट और पूरी टीम के सम्मान से अभिभूत सचिन को कहना पड़ा कि उन्हें ऐसा लगा कि वो कभी रिटायर ही नहीं हुए।

Virat with Sachin on his shoulders & other Teammates after winning 2011 world cup.
Virat with Sachin on his shoulders & other Teammates after winning 2011 world cup.

सचिन भारतीय क्रिकेट की वर्तमान पीढ़ी के आदर्श हैं और इस ‘लिटिल मास्टर’ का कद इतना बड़ा है कि वे आने वाली तमाम पीढ़ियों के आदर्श रहेंगे। ‘सचिन तेन्दुलकर’ होने का मतलब क्रिकेट और इस देश के लिए क्या है अब इसे जानना और मानना बड़ी बात नहीं। लेकिन ये विराट ही थे जिन्होंने 2011 में वर्ल्ड कप जीतने के बाद कहा था कि “तेन्दुलकर ने 21 सालों तक देश की उम्मीदों का भार अपने कंधों पर उठाया है, अब ये भार उठाने की बारी मेरी है।“ ये कहना सबके बूते की बात नहीं थी। ये विराट ही कह सकते थे और उन्होंने केवल कहा ही नहीं अपने कहे को आज निभा भी रहे हैं। धोनी नि:संदेह एक महान कप्तान हैं लेकिन बल्लेबाज के तौर पर सचिन की जगह और जिम्मेदारी किसी ने ली है तो वो विराट ही हैं। पाकिस्तान पर जीत के बाद उन्होंने बिल्कुल सही कहा कि “अपने बचपन में मैंने उन्हें भारत के लिए ऐसा (मैच जिताते) करते हुए देखा है और अब मेरे पास उनके सामने ऐसा करने का अवसर है, इसलिए ये एक एहसास है जिसे बयां नहीं किया जा सकता है।“

रन के लिए विराट की ‘भूख’ को आज हर कोई सलाम करता है और अभी उन्हें रिकॉर्डों का अंबार लगाना है। लेकिन ईडन गार्डन्स में विराट ने अपने ‘आदर्श’ के लिए जिस अंदाज में सिर झुकाया उसने ये बता दिया कि वो केवल ‘रन’ से नहीं ‘मन’ से भी ‘विराट’ हैं और ये भी कि सचिन की वैभवशाली विरासत ‘विराट’ हाथों में है और बहुत महफूज़ है।

Virat Kohli giving flying kiss to his fans
Virat Kohli giving flying kiss to his fans

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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यूपी में अपनी जीत के लिए आश्वस्त हैं मायावती

पहले पंचायत चुनाव में जबरदस्त वापसी और अब विधानसभा चुनाव से पहले आए ओपिनियन पोल में बाकी पार्टियों पर बसपा की स्पष्ट बढ़त… यूपी में अपनी जीत के लिए मायावती का आश्वस्त दिखना अकारण नहीं है। कल दिल्ली में पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने दावा किया कि अगले साल होने वाले यूपी विधानसभा चुनाव में बसपा बड़े बहुमत के साथ सत्ता में आएगी।

बता दें कि हाल ही में एबीपी-नीलसन सर्वे में बसपा को आगामी चुनाव में 185 सीट मिलने की बात कही गई थी। इससे पूर्व पिछले साल नवम्बर में बसपा ने पंचायत चुनाव में भी जीत का परचम लहराया था। पंचायत स्तर पर पार्टी की कामयाबी का आलम यह था कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और सपा प्रमुख मुलायम सिंह यादव के गोद लिए गांवों में भी बसपा ने जीत दर्ज की थी।

हाल की सफलता और आगे की संभावना से उत्साहित बसपा सुप्रीमो मायावती ने स्पष्ट कर दिया कि विधानसभा चुनाव में वो किसी पार्टी से गठबंधन नहीं करेंगी। एक ओर सत्ताधारी समाजवादी पार्टी तो दूसरी ओर भाजपा और कांग्रेस पर एक समान हमला बोलने की रणनीति अपनाई जाएगी। कार्यकारिणी की बैठक में उन्होंने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं को अगले एक साल का रोडमैप बताया।

कहने की जरूरत नहीं कि यूपी का चुनाव महज एक राज्य का चुनाव नहीं। इसका परिणाम राष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। सपा अगर इस चुनाव में पिछड़ती है तो इसके दूरगामी परिणाम होंगे। केन्द्र में तीसरे विकल्प की संभावना और समीकरण पर इसका सीधा असर पड़ेगा। भाजपा की बात करें तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और गृहमंत्री राजनाथ सिंह लोकसभा में इसी राज्य का प्रतिनिधित्व करते हैं और पार्टी अध्यक्ष अमित शाह की मौजूदा साख और हैसियत के मूल में भी बहुत हद तक लोकसभा चुनाव के दौरान इसी राज्य में मिली सफलता है। ऐसे में इन तीनों दिग्गजों की साख यहाँ दांव पर लगी होगी। जहाँ तक बात कांग्रेस और राहुल की है तो यूपी में खोई जमीन हासिल किए बिना इनके पुराने दिन लौटने की गुंजाइश नहीं दिखती। इन सबके बीच यूपी के कुछ हिस्सों में प्रभाव रखने वाली पार्टियां रालोद, अपना दल और पीस पार्टी का वजूद भी इस चुनाव पर निर्भर करता है। जेडीयू भी इन्हीं पार्टियों के साथ यूपी में अपनी नैया पार करना चाहती है।

फिलहाल यूपी में सभी पार्टियां अपनी-अपनी रणनीति को अन्तिम रूप देने में लगी हैं। हालांकि अभी बढ़त बसपा की दिख रही है लेकिन चुनाव नजदीक आते-आते ऊँट के करवट लेने की संभावना खारिज नहीं की जा सकती।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जी हाँ, अमेरिका में हो रहा रिसर्च कि मोदी कैसे बने ‘ग्लोबल लीडर’..!

अन्तर्राष्ट्रीय राजनीति में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का बढ़ता प्रभाव और उनकी लोकप्रियता का दिन-ब-दिन बड़ा होता कैनवास अब शोध का विषय है और ये शोध विश्व की महाशक्ति कहे जाने वाले अमेरिका में हो रहा है। जी हाँ, अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में मोदी की वैश्विक छवि को लेकर एक शोध किया गया और इस शोध से प्राप्त निष्कर्ष में कहा गया कि उनकी अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के नेता की छवि बनाने में सोशल मीडिया ने बहुत बड़ा योगदान दिया है।

बता दें कि मिशिगन यूनिवर्सिटी में भारतीय मूल के प्रोफेसर जोयोजीत पाल मोदी द्वारा पिछले छह सालों में सोशल मीडिया पर किए गए ट्वीट का अध्ययन कर रहे हैं। गहन अध्ययन और विश्लेषण के बाद उन्होंने पाया कि सोशल मीडिया पर व्यक्त किए गए मोदी के विचार और उनके रचनात्मक ट्वीट ने विश्व के सबसे प्रभावशाली नेताओं में उनके शुमार होने में बड़ी भूमिका निभाई है।

शोध में कहा गया कि प्रधानमंत्री मोदी ने पारंपरिक मीडिया के तरीकों को पूरी तरह नकारते हुए अपने समर्थकों से सीधे तौर पर सम्पर्क बनाया जिससे उनकी छवि में जबरदस्त सुधार आया। यही नहीं, ट्वीटर पर लगातार सक्रिय रहकर उन्होंने खुद को एक शक्तिशाली ब्रांड के रूप में विकसित किया।

प्रोफेसर पाल के मुताबिक मोदी भारत के अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों में सबसे ज्यादा संवाद करने वाले पीएम हैं। उन्होंने कहा कि अगर प्रधानमंत्री के विचार जानने हैं तो आप ट्वीटर के जरिये हर मुद्दे पर उनके विचार जान सकते हैं और यही वजह है कि मोदी आज विश्व के सबसे प्रभावशाली प्रधानमंत्रियों की सूची में शामिल हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री मोदी ने आम जनता से संवाद करने से लेकर सरकार चलाने तक में जिस तरह सूचना प्रौद्योगिकी का उपयोग किया है उससे सम्पर्क के नए माध्यमों को नया आयाम मिला है। ना केवल व्यक्तिगत स्तर पर बल्कि अपनी सरकार के कामकाज में पारदर्शिता लाने तथा योजनाओं में त्वरित कार्रवाई के साथ लोगों को जोड़ने में आधुनिक संचार प्रौद्योगिकी के इस्तेमाल पर वो लगातार जोर देते हैं। इस दिशा में मोदी की सक्रियता का इससे बड़ा सबूत क्या हो सकता है कि सोशल मीडिया पर उन्हें चाहने वालों की संख्या दो करोड़ को छूने लगी है।

एक तरफ जहाँ मोदी सोशल मीडिया पर हर दिन नया इतिहास रचने को तत्पर हैं वहीं इसके बरक्स एक सच्चाई यह भी है कि स्वयं उनके कार्यालय में राज्य मंत्री डॉ. जितेन्द्र सिंह समेत उनकी सरकार के एक दर्जन से अधिक मंत्रियों की इसमें कोई रुचि नहीं है। ऐसे मंत्रियों में अनंत कुमार, बंडारु दत्तात्रेय, उमा भारती, मेनका गांधी, मनोज सिन्हा, हंसराज अहीर, संजीव बालियान, कृष्णपाल गूजर आदि के नाम शामिल हैं। इनमें कई मंत्रियों का तो सोशल मीडिया पर अकाउंट तक नहीं है।

बहरहाल, मोदी उन चन्द नेताओं नें शुमार हैं जो केवल निर्देश नहीं देते बल्कि आगे बढ़कर उदाहरण पेश करते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि उनकी सरकार के मंत्री भी उनके साथ कदमताल करेंगे और सोशल मीडिया को विकास और परिवर्तन का नया औजार बनाएंगे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मधेपुरा में शुरू होगी महादलितों को साक्षर बनाने की मुहिम

मधेपुरा जिले का कोई महादलित अब निरक्षर नहीं रहेगा। जिले के सभी महादलितों तक शिक्षा की किरण पहुँचाई जाएगी। जिला प्रशासन तीन माह के अन्दर ऐसे महादलितों का चयन कर उन्हें साक्षर बनाएगा जो अब तक शिक्षा के मैलिक अधिकार से वंचित हैं। महादलित साक्षरता कार्यक्रम के तहत इस काम का शुभारम्भ दो अप्रैल से होगा।

मधेपुरा के सर्वांगीण विकास के लिए तत्पर जिलाधिकारी मो. सोहैल ने कहा कि यह कार्यक्रम ‘बिग पुश’ के साथ शुरू किया जाना है। ‘बिग पुश’ अर्थात जोरदार धक्के के लिए उन्होंने तालिमी मरकज से लेकर टोला सेवक, विकास मित्र आदि सभी का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि जब तक प्रशासन के साथ सभी जी-जान से नहीं जुटेंगे तब तक जिले के सभी महादलित टोलों को शत प्रतिशत साक्षर बनाने का लक्ष्य हासिल नहीं किया जा सकता।

बता दें कि उपरोक्त कार्यक्रम का क्रियान्वयन जिला साक्षरता समिति, मधेपुरा द्वारा किया जाएगा। इस कार्यक्रम की पूरी रूपरेखा तैयार की जा रही है।

मधेपुरा जिला प्रशासन ने नि:संदेह एक बड़े कार्य का बीड़ा उठाया है जो मुश्किल तो है लेकिन नामुमकिन नहीं। जिलाधिकारी मो. सोहैल की कार्यशैली और उनके अब तक के ट्रैक रिकॉर्ड को देखते हुए इस पुनीत कार्य के सफलतापूर्वक और समय पर पूरा होने की उम्मीद मधेपुरावासियों को है। अभी-अभी उनकी देखरेख में मैट्रिक की परीक्षा जितने शांतिपूर्ण वातावरण में और कदाचारमुक्त तरीके से सम्पन्न हुई है उसे देखकर हमारी अपेक्षा को और बल मिलता है।

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जावेद को सुनकर भी ‘भारत माता की जय’ नहीं बोलोगे ओवैसी..?

जाने माने गीतकार जावेद अख़्तर छह साल के कार्यकाल के बाद राज्यसभा से रिटायर हो गए। इस मौके पर अपने विदाई भाषण में उन्होंने जो कुछ कहा उसे पूरे देश को सुनना चाहिए। इस लाजवाब शायर ने अपने लाजवाब भाषण से वैसे तमाम लोगों को लाजवाब कर दिया जो खुद को ‘इस्लाम’ और ‘मुसलमान’ का हिमायती कहते हैं लेकिन वास्तव में वो इन शब्दों का अर्थ तक नहीं जान रहे होते। ऐसे चन्द लोगों के कारण पूरी कौम को अलग चश्मे से देखने और दिखाने की कोशिशें होने लगती हैं और इस कारण एक ओर ‘असदउद्दीन ओवैसी’ और ‘आजम खान’ तो दूसरी ओर ‘योगी आदित्यनाथ’ और ‘साक्षी महाराज’ जैसे नेता चर्चा में बने रहते हैं।

ऐसी कई बातें थीं जावेद अख़्तर के भाषण में जिन्हें बहुत गहराई से सुना और समझा जाना चाहिए। लेकिन जिस मुद्दे पर बोलकर उन्होंने अपनी तकरीर को मील का पत्थर बना दिया वो है भारत माता की जय बोलने और नहीं बोलने का मुद्दा जिसको लेकर पूरे देश में कोहराम मचा हुआ है। बता दें कि एमआईएम के नेता असदउद्दीन ओवैसी ने कहा था कि गर्दन पर छुरी रख दो लेकिन ‘भारत माता की जय’ नहीं बोलेंगे। इस पर कई तीखी प्रतिक्रियाएं हुईं। भाजपा के एक नेता ने तो ओवैसी की जुबान काटने वाले को एक करोड़ रुपये का इनाम देने की बात तक कह दी। लेकिन असल और निरुत्तरित कर देने वाला जवाब जावेद ने दिया।

जावेद अख़्तर ने कहा – “आए दिन ऐसी बातें सुनाई देती हैं जो ना सुनाई देतीं तो अच्छा था। एक साहब हैं जिन्हें ये ख़्याल हो गया है कि वो नेशनल लीडर हैं। हालाँकि, हकीकत ये है कि वो हिन्दुस्तान की एक स्टेट आन्ध्रा के एक शहर हैदराबाद के एक मुहल्ले के लीडर हैं। उन्होंने ये कहा है कि वो ‘भारत माता की जय’ नहीं कहना चाहते, नहीं कहेंगे। इसलिए कि संविधान उन्हें नहीं कहता है। संविधान तो उन्हें शेरवानी पहनने को भी नहीं कहता और टोपी लगाने को भी नहीं कहता। मैं ये जानने में इंटरेस्टेड नहीं हूँ कि ‘भारत माता की जय’ कहना मेरा कर्तव्य है कि नहीं। ये मैं जानना भी नहीं चाहता। इसलिए कि ये मेरा कर्तव्य नहीं, मेरा अधिकार है। और मैं कहता हूँ, ‘भारत माता की जय’, ‘भारत माता की जय’, ‘भारत माता की जय’। मैं इनकी बात को जितने सख़्त शब्दों में हो सके कंडेम (Condemn) करता हूँ और मैं इतने ही सख़्त लहजे में उस नारे को भी कंडेम (Condemn) करता हूँ, जो कहता है कि मुसलमान के दो स्थान – कब्रिस्तान या पाकिस्तान। मैं इसे भी कंडेम (Condemn) करता हूँ।“

आगे किसी का नाम लिए बगैर जावेद ने कहा कि “अक्लमन्द वो है जो तज़ुर्बों से सीखे, और उससे भी ज्यादा अक्लमन्द वो है जो दूसरों के तज़ुर्बों से सीखे। देख लीजिए, जिन समाजों में, जिन मुल्कों में धर्म का बड़ा बोलबाला है, जिन मुल्कों में ये यकीन है कि गुजरा हुआ जमाना बड़ा अच्छा था… जहाँ बात पर ज़ुबान कटती है, जहाँ आप एक लफ़्ज बोल दें जो धर्म के खिलाफ हो, मज़हब के खिलाफ हो तो फाँसी दे दी जाती है वो मुल्क हमारी मिसाल बनने चाहिए कि वो जहाँ हर तरह की आज़ादी है ?”

डेमोक्रेसी के लिए सेक्यूलरिज्म को अनिवार्य बताते हुए जावेद ने कहा कि “संविधान हमें डेमोक्रेसी देता है, लेकिन याद रखिए, डेमोक्रेसी, सेक्यूलरिज्म के बिना हो ही नहीं सकती।… हम यदि सेक्यूलरिज्म को बचाने की बात करें तो किसी एक वर्ग या दूसरे वर्ग पर अहसान नहीं कर रहे। हमको सेक्यूलरिज्म इसलिए बचाना होगा कि इसके बगैर डेमोक्रेसी बच ही नहीं सकती।“

जावेद अख़्तर की बेहद महत्वपूर्ण तकरीर के ये कुछ अंश हैं केवल पर ‘भारत माता की जय’ को लेकर उठे विवाद से जुड़े हर सवाल के जवाब के लिए काफी हैं। फिर भी अगर कुछ बच रहा हो तो पाकिस्तान के मशहूर इस्लामिक स्कॉलर और राजनेता ताहिर इल कादरी के इस बयान को सुनना चाहिए जिसमें उन्होंने कहा है कि वतन को माँ का दर्जा देना इस्लाम की तालीम और उसके इतिहास का हिस्सा हैं। उन्होंने बड़ा स्पष्ट कहा कि “वतन की सरजमीन को माँ का दर्जा देना, वतन की सरजमीन से मोहब्बत करना, वतन की सरजमीन से प्यार करना, वतन की सरजमीन के लिए जान भी दे देना, ये हरगिज इस्लाम के खिलाफ नहीं है। ये इस्लामी तालीम में शामिल है। जो वतन से प्यार की बात करता है उसे चाहिए कि कुरान को पढ़े। इस्लामी इतिहास को पढ़े।“

और साहब, जब आप कुरान और इस्लामी इतिहास ना पढ़ सकें और ना ही जावेद और ताहिर जैसों की सुन सकें तो कम-से-कम एपीजे अब्दुल कलाम जैसे शख़्स के जीवन में झाँक तो लें ही। जी हाँ, मिसाइलमैन, भारत के पूर्व राष्ट्रपति, भारतरत्न कलाम… रामेश्वरम में जिनकी मस्जिद की ‘नमाज’ तब तक पूरी ना होती थी जब तक वो वहाँ के शिव मंदिर की ‘परिक्रमा’ नहीं कर लेते थे।

क्या अब भी किसी ‘ओवैसी’ को ‘भारत माता की जय’ बोलने से एतराज होना चाहिए..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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लालू-मुलायम के बिना नई पार्टी का ‘पेड़’ लगाकर क्या पाएंगे नीतीश..?

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने राजनीति के राष्ट्रीय फलक पर अपनी चहलकदमी तेज कर दी है। आगामी यूपी विधानसभा चुनाव को देखते हुए कल दिल्ली में उन्होंने अजित सिंह के राष्ट्रीय लोक दल के साथ विलय के मुद्दे पर महत्वपूर्ण बैठक की। जेडीयू और रालोद के विलय के बाद एक नई पार्टी सामने आ सकती है जिसका नाम होगा ‘जन विकास पार्टी’ और चुनाव-चिह्न होगा ‘पेड़’। इस नई पार्टी में एचडी देवगौड़ा, ओमप्रकाश चौटाला और बाबूलाल मरांडी के भी शामिल होने की सम्भावना है। सूत्रों की मानें तो इस पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष अजित सिंह होंगे।

नीतीश के साथ इस महत्वपूर्ण ‘मिशन’ पर जेडीयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव और महासचिव केसी त्यागी के अलावे बिहार जेडीयू के अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह और नीतीश के रणनीतिक सलाहकार प्रशांत किशोर भी दिल्ली में हैं। ख़बर ये भी है कि अगर यूपी में जेडीयू और रालोद का विलय हो जाता है तो अजित सिंह को बिहार से राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया जा सकता है।

नई पार्टी के ‘संभावित’ अध्यक्ष शरद यादव ने स्वयं विलय की बात की पुष्टि करते हुए कहा कि कुछ ही दिनों में विलय की तारीख की घोषणा हो जाएगी। यूपी चुनाव में प्रभावशाली उपस्थिति दर्ज करने के लिए ‘अपना दल’ और ‘पीस पार्टी’ के नेताओं से भी जेडीयू की बातचीत लगातार जारी है।

बहरहाल, राष्ट्रीय राजनीति में अपनी धमक पैदा करने के लिए नीतीश अनवरत ‘प्रयोग’ में लगे हैं। यूपी के अलावे असम और बंगाल चुनाव के लिए भी वे अपनी कार्ययोजना बना रहे हैं। पर इन सारी कवायद से लालू और मुलायम को दूर रखा जा रहा है। यहाँ एक साथ कई प्रश्न उठते हैं। पहला, क्या लालू से ‘दूरी’ बनाकर बिहार की राजनीतिक ‘स्थिरता’ को खतरे में नहीं डाल रहे नीतीश..? दूसरा, क्या मुलायम के बिना यूपी में किसी बड़ी ‘सम्भावना’ पर काम किया जा सकता है..? तीसरा, समाजवाद की बात करें तो नीतीश की तुलना में मुलायम और लालू समाजवाद के अधिक बड़े ‘प्रतीक’ ठहरेंगे, ऐसे में इन दोनों के बिना क्या ‘जन विकास पार्टी’ की स्वीकार्यता समाजवादियों के लिए बन पाएगी..? चौथा और सबसे बड़ा सवाल ये कि यूपी में (विशेष स्थिति में बंगाल और असम में भी) भाजपाविरोधी मतों में सेंध लगाकर क्या अप्रत्यक्ष रूप से नीतीश भाजपा को ही लाभ नहीं पहुँचा रहे होंगे..?

इसमें कोई दो राय नहीं कि नीतीश राजनीति में प्रारम्भ से ही ‘प्रयोगधर्मी’ रहे हैं और ‘प्रयोग’ से उन्होंने पाया भी है बहुत कुछ। लेकिन प्रयोग का ये अर्थ कतई नहीं कि हर नए राज्य में नए तर्क के साथ साथी तलाशे जाएं। ऐसे में तात्कालिक लाभ भले ही हो जाए, विश्वसनीयता और नैतिकता पर प्रश्नचिह्न भी लगने लगते हैं। एक बात और, मुलायम ने जो गलती बिहार चुनाव में की, क्या वही गलती अब नीतीश भी (खासतौर पर यूपी में) नहीं कर रहे..? अगर नीतीश राष्ट्रीय राजनीति में तीसरे विकल्प की सम्भावना को लेकर सचमुच गम्भीर हैं तो उन्हें सारे ‘स्वाभाविक’ साथियों को साथ लाने और जोड़े रखने के लिए किसी ‘फेविकोल’ के फार्मूले पर काम करना होगा। अन्यथा उनकी सारी कोशिश ‘पॉलिटिकल स्टंट’ से अधिक कुछ भी ना होगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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4 सितंबर को ‘संत’ घोषित होंगी ‘संतों की संत’ मदर टेरेसा..!

मानवता की अनमोल धरोहर मदर टेरेसा को ‘संत’ की उपाधि दिए जाने पर आखिरी मुहर लग गई। पोप फ्रांसिस ने आज कार्डिनल्स की बैठक के बाद नोबेल पुरस्कार से सम्मानित मदर टेरेसा को रोमन कैथोलिक संत का दर्जा दिए जाने को स्वीकृति दे दी। वेटिकन सिटी में रोमन कैथोलिक चर्च 4 सितंबर को इसकी औपचारिक घोषणा करेगा।

बता दें कि कैथोलिक परम्परा के मुताबिक ‘संत’ बनने के लिए दो चमत्कार जरूरी हैं। 2002 में वेटिकन ने मदर टेरेसा के चमत्कार के तौर पर मोनिका बेसरा के केस को स्वीकार किया था। बंगाली आदिवासी महिला मोनिका पेट के ट्यूमर से पीड़ित थीं। मदर टेरेसा के निधन के बाद 1998 में वो ठीक हो गईं और इसका श्रेय मदर टेरेसा को दिया गया। दूसरा चमत्कार ब्राजील का है। 2008 में मस्तिष्क में कई ट्यूमर की समस्या से ग्रसित ब्राजील का एक युवक ठीक हो गया था। पिछले साल वेटिकन ने इसका श्रेय भी मदर को दिया। कहा गया कि वह युवक मदर की प्रार्थनाओं और उनकी तस्वीर देखने से ठीक हुआ।

पहले चमत्कार की पुष्टि के बाद 2003 में तत्कालीन पोप जॉन पॉल द्वितीय ने मदर को ‘बियाटिफाइड’ (धन्य) घोषित किया था। ‘बियैटिफिकेशन’ ‘संत’ की उपाधि की तरफ पहला कदम होता है। वहीं मदर के दूसरे चमत्कार को पिछले साल पोप फ्रांसिस ने मान्यता दी थी। दूसरे चमत्कार को मान्यता मिलने के साथ ही मदर टेरेसा को ‘संत’ घोषित करने का रास्ता साफ हो गया था।

अपना पूरा जीवन गरीबों और असहायों की सेवा में न्योछावर कर देने वाली मदर टेरेसा का जन्म मेसोडोनिया गणराज्य में हुआ था। करुणा और दया की ये प्रतिमूर्ति 1948 में भारत आई और फिर यहीं की होकर रह गई। उन्होंने कोलकाता में ‘मिशनरीज ऑफ चैरिटी’ की स्थापना की। 1997 में मदर टेरेसा का निधन हो गया पर यह संस्था आज भी दुनिया भर में मानवता की सेवा के पर्याय के तौर पर जानी जाती है।

मदर टेरेसा को लोग ‘गटरों की संत’ कहते हैं। जिनका कोई नहीं होता था उन्हें मदर गले लगाती थीं। वेटिकन ने भले ही ‘संत’ घोषित करने की प्रक्रिया के तहत उनके दो चमत्कारों को मान्यता दी हो, लेकिन सच यह है कि मदर के जीवन में कोई एक बार झाँक भर ले तो उसे असंख्य ‘चमत्कार’ दिखेंगे। पर वो चमत्कार ‘सेवा का’ और ‘सेवा से’ था। मदर टेरेसा स्वयं किसी ‘चमत्कार’ में विश्वास नहीं करती थीं। रोग तन का हो या मन का, उन्होंने उसका समाधान केवल और केवल ‘सेवा’ में ढूंढ़ा। झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र जैसी चीजों के लिए ना तो उनके ‘कर्म’ में कोई जगह थी, ना उनके ‘धर्म’ में।

कोलकाता की सड़कों पर गरीबों, रोगियों और अनाथों की सेवा में जीवन के 45 साल लगा देने वाली इस ‘मदर’ ने स्वार्थ में जकड़ी दुनिया को आत्मा के उत्थान की राह दिखाई। उनका अवदान इतना बड़ा है कि मानो ‘मदर’ शब्द का सृजन ही उनके लिए हुआ हो। काश कि रोमन कैथोलिक चर्च केवल उनकी मानव-सेवा के आधार पर उन्हें ‘संत’ घोषित करता ! ऐसा कर पोप फ्रांसिस ना केवल ‘संतों की संत’ मदर टेरेसा को सच्चा सम्मान दे पाते बल्कि इस नई परम्परा की नींव रख वे धर्म की वास्तविक और व्यावहारिक परिभाषा भी गढ़ पाते जिसकी आज के समय में कितनी जरूरत है ये कहने की बात नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सिंहेश्वर स्थान में अखिल भारतीय त्रि-दिवसीय सर्वधर्म महासम्मेलन सम्पन्न

ऋष्य श्रृंग की पावन धरती सिंहेश्वर स्थान के मवेशी हाट मैदान में त्रिदिवसीय सर्वधर्म महासम्मेलन का शुभारम्भ शुक्रवार के दिन दीप-प्रज्जवलित कर भू.ना.मंडल वि.वि. के प्रतिकुलपति डॉ.जे.पी.एन.झा, समाजसेवी डॉ. भूपेन्द्र मधेपुरी, डॉ.रामचन्द्र मंडल, डॉ.के.एन.ठाकुर, डॉ.बी.एन.विवेका, प्रो.श्यामल किशोर यादव, प्रो.शचीन्द्र एवं राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ.अनिल कुमार सहित प्रजापिता ब्रह्मा कुमारी के रामनाथ भाई, जैन धर्म के विवेक मुनि, इस्लाम धर्म के मिर्जा दिलदार हुसैन वेग, सिक्ख धर्म गुरु कुलमोहन सिंह, आनंद मार्ग के प्रवक्ता एवं महर्षि मेंहीं के स्थानीय संस्थापक स्वामी विमलानंद महाराज, ईसाई धर्म के फिलिप्स क्राइस्ट, कबीर पंथ के उमा साहब आदि सभी ने सम्मिलित रूप से किया |

BK Ranju Addressing Sarv Dharma Maha Sammelan at Singheshwar Madhepura.
BK Ranju Addressing Sarv Dharma Maha Sammelan at Singheshwar Madhepura.

इस अवसर पर समाज एवं दूसरों की भलाई करने वाले संत-मुनियों की उपस्थिति सर्वाधिक देखी गयी | वैसे खुदा के बंदे तथा ईश्वर के बच्चों के रूप में मधुर वाणी से लैस प्रमुख आत्माएँ जो सदा मंच पर विराजमान रहीं- जैनधर्म अशोक भंत जी, फादर ऑफ़ सैंट, राम सिंह भाईजी, कोडिनेटर हरीश भाईजी, सुमन बहनजी, भाई जगदीश जी, सृजना दीदी, नीरा दीदी, दीदी मंगलवा, भगवती दीदी सहित मधेपुरा की ब्रह्मा कुमारी रंजू दीदी आदि |

Devoted Audience in Lacks from different Districts & States too.
Devoted Audience in Lacks from different Districts & States too.

समाज में सदभाव बनाने हेतु आयोजित इस त्रि-दिवसीय सर्वधर्म महासम्मेलन का आयोजन सिंहेश्वर मेंही आश्रम के संस्थापक स्वामी विमलानन्द महराज, संचालन राष्ट्रीय प्रवक्ता डॉ.अनिल कुमार व छात्र नेता राहुल कुमार ने किया | सम्मेलन में नेपाल सहित कोसी प्रमंडल के अररिया, पूर्णिया एवं सहरसा, मधेपुरा, सुपौल सहित अन्य जिले के लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ी थी | इस धर्म सम्मेलन में स्वास्थ शिविर, नि:शुल्क जांच शिविर सहित धार्मिक पुस्तकों का स्टाल भी लगाया गया है |

उद्घाटन भाषण में प्रतिकुलपति डॉ. झा ने कहा कि गीता के दर्शन के सामने विश्व सिर झुकाता है | गीता ज्ञान से भरा विश्व का प्रथम धर्मग्रन्थ माना जाता है | ज्ञान सर्वाधिक पवित्र विद्या है जो हमारे हृदय को विशालता से भर देता है | उन्होंने कहा कि जब सभी धर्मों का मत एक है तो विभेद कैसा ?

अन्य सभी विद्वान वक्ताओं ने अपने उदगार में ज्ञान प्राप्ति से आत्म तत्व के बोध होने की बातें कहीं तथा शांति एवं संतोष को सर्वश्रेष्ठ मानव धन बताते हुए मानव को मानव होने पर बल दिया | राष्ट्रीय मुस्लिम एकता मंच के मिर्जा बेग ने मुस्लिम धर्म सहित किसी भी धर्म में हिंसा (गो-हत्या) को जायज नहीं कहा | उन्होंने पैगम्बर साहब को उद्धृत करते हुए वृक्ष नहीं काटने की बात कही |

Dr.Bhupendra Madhepuri Addressing Sarv Dharma Sammelan and Sneh Milan Samaroh at Singheshwar, Madhepura
Dr.Bhupendra Madhepuri Addressing Sarv Dharma Sammelan and Sneh Milan Samaroh at Singheshwar, Madhepura

उसी कड़ी में डॉ.मधेपुरी ने राम-रावण संवाद को परोसते हुए श्रद्धालुओं से यूँ कहा कि रावण सबकुछ में राम से श्रेष्ठ होने के बावजूद युद्ध में इसलिए हार गया कि राम का भाई राम का साथ दिया और रावण का भाई उससे अलग रहा | डॉ.मधेपुरी ने खुशियों का इजहार करते हुए कहा कि आज जब सभी धर्मों के लोग एक साथ, एक मंच पर हैं तो हम आतंकवादियों-देश द्रोहियों को सबक सिखाने एवं भारत को विश्व गुरु बनाने में सक्षम सिद्ध होंगे | लम्बे तकरीर के अंत में उन्होंने सर्वधर्म सम्मेलन के जयकारा के साथ लाखों लाख श्रद्धालुओं को अपनी चार पंक्तियाँ भेंट की-

धन आदमी की नींद को हरपल हराम करता ,
जो बांटता दिल खोल उसे युग सलाम करता |
मरने के बाद मसीहा बनता वही मधेपुरी,
जो जिंदगी में अपना सबकुछ नीलाम करता ||

उद्घाटन सत्र के अंत में सभी शिक्षकों एवं संतों के साथ ‘धर्मामृत’ स्मारिका का लोकार्पण किया गया और प्रतिकुलपति डॉ.झा ने कहा कि पुस्तक से बड़ा मित्र संसार में कोई नहीं होता | सम्पादक डॉ.अनिल कुमार ने कहा कि स्मारिका को पढ़ने पर ज्ञान के कपाट खुल जायेंगे |

SP Vikas Kumar giving directions to Police persons from Vihar Hotel Singheshwar sitting with Pro. VC Dr. J.P.N. Jha, Sinior Professor Dr. K.N Thakur & Samaaj Sevi Dr. Madhepuri and others.
SP Vikas Kumar giving directions to Police persons from Vihar Hotel Singheshwar sitting with Pro. VC Dr. J.P.N. Jha, Sinior Professor Dr. K.N Thakur & Samaaj Sevi Dr. Madhepuri .

कार्यक्रम स्थल पर पेयजल, स्वास्थ्य एवं पुलिस शिविर के साथ एस.पी. विकास कुमार को भी क्रियाशील देखा गया | विभिन्न धर्मों के बुक स्टाल पर भीड़ देखी गयी | विभिन्न प्रदेशों के श्रद्धालु भी सम्मेलन में शामिल हुए | सबों को आयोजकों की ओर से डॉ.अनिल ने धन्यवाद ज्ञापित किया |

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मोदी और नीतीश : विकास के दो प्रतीकपुरुष कब तक एक मंच पर..?

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कल की बिहार-यात्रा ना केवल बिहार के विकास बल्कि केन्द्र-राज्य-संबंध के लिहाज से भी ऐतिहासिक कही जा सकती है। वर्तमान भारतीय राजनीति के दो अलग ध्रुवों पर खड़े नरेन्द्र मोदी और नीतीश कुमार के हाथ ही नहीं दिल भी कल मिलते दिखे, ये सुखद आश्चर्य से कम नहीं। विकास के इन दोनों प्रतीकपुरुषों ने तमाम ‘राजनीति’ से ऊपर उठकर बिहार की बाबत कल जिस तरह और जैसे माहौल में उम्मीद बंधाई है, उसे दोनों कायम रख पाएं तो बिहार के स्वर्णिम अतीत को लौटने से कोई नहीं रोक सकता।

नरेन्द्र मोदी इससे पहले जब भी बिहार आए, उनके और नीतीश कुमार के राजनैतिक और वैचारिक मतभेद ही सुर्खियों में रहे। मौका चाहे 2010 के भाजपा अधिवेशन का हो या गठबंधन टूटने के बाद का, लोकसभा चुनाव हो या हाल का बिहार चुनाव, एक-दूसरे पर निशाना साधने का कोई मौका दोनों कभी नहीं चूके। दोनों के बीच की तल्खी बिहार की सियासी आबोहवा पर लगातार हावी रही। पर कल जैसे कोई चमत्कार हो गया हो। दोनों नेताओं में ना मतभेद दिखा कल, ना मनभेद।

कल प्रधानमंत्री ने ना केवल ये कहा कि बिहार का भाग्य बदलेगा तभी देश का भाग्य बदलेगा बल्कि गाँवों में बिजली पहुँचाने को लेकर नीतीश की तारीफ भी की उन्होंने। उधर नीतीश भी पीछे नहीं रहे। हवाई अड्डे पर अगवानी करने से लेकर विदा करने तक प्रधानमंत्री के साथ रहे वे। बिहार आने के लिए उन्होंने दिल से आभार जताया उनका और अनुरोध किया कि इस राज्य के विकास के लिए बार-बार आएं। दोनों के बीच किसी दुराव या अलगाव, हिचक या झिझक के लिए जैसे कोई जगह ही ना हो।

मोदी बिहार आकर जा चुके हैं। पटना हाईकोर्ट के शताब्दी समारोह के समापन पर आयोजित कार्यक्रम में शामिल होने के साथ-साथ दीघा में गंगा नदी पर रेल पुल, पाटलिपुत्र से लखनऊ के लिए ट्रेन चलना, मुंगेर में नवनिर्मित पुल का उद्घाटन, मोकामा में राजेन्द्र पुल के समानान्तर पुल का शिलान्यास जैसी सौगातें दे गए वे। तरक्की के कई रास्ते खुले बिहार के लिए। कई उपलब्धियां जुड़ीं बिहार के खाते में। पर सबसे बड़ी उपलब्धि रही इन दो दिग्गजों का एक मंच पर आना और बिहार के विकास के लिए साझे तौर पर संकल्प और प्रतिबद्धता जताना। ना केवल बिहार बल्कि देश की करोड़ों जनता की निगाह अब इस पर लगी रहेगी कि कब तक ‘राजनीति’ फिर बीच में नहीं आएगी और विकास के ये दो ‘प्रतीकपुरुष’ यूँ ही एक मंच पर रहेंगे..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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भारत में एड्स के पसरते पाँव, सरकार के आँकड़े और हम

केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कल लोकसभा में जानकारी दी कि भारत में 21 लाख 70 हजार लोग एचआईवी संक्रमित हैं। एचआईवी संक्रमित लोगों की ये आबादी दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी आबादी है। नड्डा द्वारा पेश किए गए आंकड़े के मुताबिक दक्षिण अफ्रीका में 68 लाख और नाईजीरिया में 34 लाख लोग इसके शिकार हैं। इन दो देशों के बाद भारत का नंबर आता है।

स्वास्थ्य मंत्री ने लोकसभा में दिए गए अपने एक लिखित जवाब में बताया कि भारत में एचआईवी से पीड़ित मरीज एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) के सहारे जी रहे हैं। उन्होंने यह भी बताया कि मौजूदा समय में देश में कुल 524 एआरटी सेंटर्स हैं जो मुफ्त में यह थेरेपी उपलब्ध करवा रहे हैं।

इसमें कोई दो राय नहीं कि सरकार एचआईवी नाम की इस चुनौती का सामना करने की भरसक कोशिश कर रही है और उम्मीद बंधाने वाले कुछ नतीजे भी देखने को मिले हैं लेकिन जितनी भयावह यह समस्या है क्या उतनी ही तैयारी के साथ हम इससे लड़ पा रहे हैं..?

एचआईवी यानि “ह्यूमन इम्यूनो डिफिसिएंसी वायरस” से संक्रमण के बाद की स्थिति है एड्स यानि “एक्वायर्ड इम्यून डिफिसिएंसी सिन्ड्रोम”। एड्स स्वयं में कोई बीमारी नहीं है पर एड्स से पीड़ित मानव-शरीर जीवाणु-विषाणु आदि से होने वाली संक्रामक बीमारियों से लड़ने की प्राकृतिक प्रतिरक्षण क्षमता खो बैठता है। ऐसे में सर्दी-जुकाम से लेकर क्षय रोग जैसे रोग तक सहजता से हो जाते हैं और उनका इलाज करना मुश्किल से नामुमकिन होता चला जाता है। एचआईवी संक्रमण को एड्स की स्थिति तक पहुँचने में आठ से दस साल या कभी-कभी इससे भी अधिक वक्त लग सकता है लेकिन एक बार इसकी चपेट में आने के बाद जीवन की ओर जाने वाले सारे रास्ते एकदम से बन्द दिखने लगते हैं।

आज जो एड्स महामारी का रूप ले चुका है उसे 1980 से पहले लोग जानते तक नहीं थे। भारत की बात करें तो यहाँ एड्स का पहला मामला 1996 में दर्ज किया गया था और महज दो दशकों में इसके मरीजों की संख्या 21 लाख को पार कर चुकी है। एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में केवल 2011 से 2014 के बीच ही डेढ़ लाख लोग इसके कारण मौत का शिकार हुए।

एचआईवी को लेकर एक चौंकाने वाला तथ्य यह भी सामने आया है कि विश्व में एचआईवी से पीड़ित होने वालों में सबसे अधिक संख्या किशोरों की है। यह संख्या 20 लाख से ऊपर है। यूनिसेफ की ताजा रिपोर्ट में बताया गया है कि वर्ष 2000 से अब तक किशोरों के एड्स से पीड़ित होने के मामलों में तीन गुना इजाफा हुआ है जो कि अत्यंत चिन्ता का विषय है। ये चिन्ता तब और भी बढ़ जाती है जब ये जानने को मिलता है कि एड्स से पीड़ित दस लाख से अधिक किशोर सिर्फ छह देशों में रह रहे हैं और भारत उनमें एक है। शेष पाँच देश दक्षिण अफ्रीका, नाईजीरिया, केन्या, मोजांबिक और तंजानिया हैं।

देखा जाय तो एचआईवी एड्स महज स्वास्थ्य की समस्या नहीं बल्कि सामाजिक संकट भी है। एक समय लोग सोचते थे कि भारत जैसे देश में यह रोग तेजी से नहीं फैलेगा क्योंकि यहाँ सामाजिक नियम बड़े कड़े हैं। बहुत जल्द ये धारणा गलत साबित हुई। आज ना केवल शहरों में रहने वाले बल्कि गाँवों के लोग भी इसकी गिरफ्त में आ रहे हैं। इसका सीधा मतलब यह है कि समाज के ऐसे कई पहलू हैं जिन्हें हमने या तो समझा नहीं है या समझना नहीं चाहते।

एड्स की भयावह समस्या का एक पहलू यह भी है कि इसको लेकर हम अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझते ही नहीं। भूकम्प और सुनामी आए तो मदद के लिए कई हाथ बढ़ते हैं लेकिन एड्स से पीड़ित व्यक्ति के प्रति हमारा रवैया ऐसा होता है जैसे वो समाज का अंग हो ही नहीं। यही वजह है कि 74 प्रतिशत एचआईवी पॉजिटिव व्यक्ति कामकाज की जगह पर अपनी बीमीरी की बात छिपाकर रखते हैं। क्या करुणा भी सोच-समझकर उपजनी चाहिए..? कम-से-कम एड्स के मामले में हमारा व्यवहार कुछ ऐसा ही कहता है। और तो और, इस भेदभाव में लिंग भी अपनी भूमिका निभाता है। पुरुषों की तुलना में स्त्रियाँ इसका कहर अधिक झेलती हैं। ज्यादातर मामलों मे एचआईवी संक्रमण होने पर उन्हें घर छोड़ने को कह दिया जाता है। पत्नियों से अपेक्षा की जाती है कि वे अपने एचआईवी पॉजिटिव पति का साथ निभाएं लेकिन पति कम ही मामलों में वफादार साबित होते हैं।

सरकारी विज्ञापनों से हम ये तो जान गए हैं कि एड्स असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित सुई, संक्रमित खून चढ़ाने और गर्भवती माँ से होने वाले बच्चों को होता है लेकिन हमारा ये जानना अधिक जरूरी है कि एचआईवी अपने आप में कोई रोग नहीं है। यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें हमारे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम हो जाती है। अगर इससे पीड़ित लोग अपनी जीवन-ऊर्जा और सामान्य जीवन जीने की ललक को कायम रख पाएं तो रोगों से लड़ने की उनकी क्षमता भले ही पूरी तरह वापस ना आए उसे काफी हद तक बढ़ाया जरूर जा सकता है। और ये हमारे-आपके सकारात्मक सहयोग के बिना सम्भव नहीं। बस हम अपनी सोच बदलें, फिर देखें कि सरकार का काम कितना आसान हो जाता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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