शराबबंदी को लेकर काश कायम रहे नीतीश सरकार की ‘इच्छाशक्ति’..!

बिहार सरकार ने शराबबंदी को लेकर अपनी प्रतिबद्धता दिखाते हुए बड़ा कदम उठाया है। राज्य सरकार ने 1915 में बने बिहार उत्पाद विधेयक में संशोधन करते हुए जहरीली शराब बनाने और बेचने वालों के लिए मौत की सजा का प्रावधान किया है। बच्चों एवं महिलाओं को शराब के धंधे में लगाने पर दस लाख रुपये तक के जुर्माने के साथ-साथ दस साल तक की सजा मिल सकती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की योजना इन कड़े प्रतिबंधों के जरिये पहले गांव को शराब से मुक्त करने की है। इसके बाद शहरों की बारी आएगी। नया कानून कल यानि एक अप्रैल से प्रभावी हो जाएगा।

101 साल पुराने अधिनियम को बदलकर लाए गए नए प्रावधान में बच्चों एवं महिलाओं का खास ख्याल रखा गया है। 21 साल से कम उम्र के बच्चों एवं महिलाओं को शराब के कारोबार में लगाने के जुर्म का उल्लेख अलग से किया गया है। शराब के अवैध व्यापार में लिप्त रहने पर कारोबारी की सारी संपत्ति जब्त कर ली जाएगी। मुख्यमंत्री की सख्त हिदायत है कि 31 मार्च को बची हुई सारी देसी और मसालेदार शराब को नष्ट कर दिया जाए।

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने अवैध कारोबारियों पर अंकुश लगाने के लिए पड़ोसी राज्यों से भी सम्पर्क किया है। दूसरे राज्यों से शराब लाकर बिहार में कारोबार की छूट नहीं दी जाएगी। सीमा पर चेकपोस्ट और बैरियर बनाए जा रहे हैं। पड़ोसी राज्यों से शराब या स्प्रिट लेकर बिहार में प्रवेश करने वाले वाहनों को सीमा पर ही लॉक कर दिया जाएगा, जो सीमा पार करने के बाद ही खुलेगा। यही नहीं, अब दूसरे राज्यों के सामान लेकर आने-जाने वाले वाहनों को चौबीस घंटे के भीतर बिहार से बाहर जाना होगा। रेलवे ट्रैक एवं स्टेशनों पर भी पुलिस की पेट्रोलिंग होगी। नदी मार्ग की भी निगरानी की जाएगी। इन सबके साथ-साथ होम्योपैथी दवाओं के नाम पर अवैध शराब और स्प्रिट के धंधे में लगे लोगों पर भी सरकार नज़र रखेगी।

सरकार केवल कड़े नियम बनाकर ही अपने कर्तव्य की इतिश्री नहीं मान रही। वो शराब की लत छुड़ाने के मोर्चे पर भी काम कर रही है। इसके लिए अनवरत जनजागरण के साथ ही हर जिले में दस-दस बेड वाले डी-एडिक्शन सेन्टर भी खोले गए हैं। इन सेन्टरों पर 135 डॉक्टरों को तैनात किया गया है। इन सभी डॉक्टरों को बेंगलुरु में दो सप्ताह की ट्रेनिंग दिलाई गई है। सभी सेन्टरों पर काउंसलिंग की व्यवस्था विशेष तौर पर की गई है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि शराबबंदी को लेकर बिहार सरकार ने अपनी दृढ़ ‘इच्छाशक्ति’ दिखाई है। मुख्यमंत्री इसके लिए बधाई के पात्र हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार की ‘इच्छाशक्ति’ यूँ ही कायम रहेगी और आंध्रप्रदेश, तमिलनाडु, हरियाणा व मिजोरम की तरह बिहार में शराबबंदी का प्रयोग विफल नहीं होगा..!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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लो विलय का मौसम आया

बिहार चुनाव से पहले गठबंधन का दौर चला और अब विलय का मौसम आया है। एक ओर नीतीश रालोद और जेवीएम को लेकर नई पार्टी को आकार देने में लगे हैं तो दूसरी ओर लोजपा, हम और रालोसपा एक झंडे के नीचे आने की तैयारी में हैं। अगर सब कुछ ठीक रहा तो रामविलास पासवान, जीतन राम मांझी और उपेन्द्र कुशवाहा जून तक एक मंच पर दिखेंगे।

बता दें कि लोजपा, हम और रालोसपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष बीते सोमवार को हम के प्रदेश अध्यक्ष वृशिण पटेल के वैशाली स्थित फार्म हाउस पर एकत्रित हुए थे। इस बैठक में लोजपा संसदीय बोर्ड के अध्यक्ष चिराग पासवान समेत तीनों दलों के कई बड़े नेता मौजूद थे। इससे पहले तीनों दलों के राष्ट्रीय अध्यक्ष दिल्ली में भी मंत्रणा कर चुके हैं।

तीनों दलों के इस सम्भावित विलय से एक बात तो स्पष्ट हो ही गई कि एनडीए में सब कुछ ठीक नहीं चल रहा है। एनडीए के ये तीनों घटक दल भाजपा से ‘नाराज’ बताए जाते हैं। इनका मानना है कि बिहार में भाजपा ‘सशक्त विपक्ष’ की भूमिका नहीं निभा रही है। उक्त बैठक में तीनों दलों के नेताओं ने तय किया कि अगर भाजपा राज्य सरकार की नीतियों का जोरदार तरीके से विरोध नहीं करती है तो वे भाजपा को साथ लिए बिना ही सरकार का विरोध करने को सड़क पर उतरेंगे।

ये तीनों दल लाख कह लें कि ‘समान विचारधारा’ वाले दलों का आपस में मिलकर एक बड़े दल के रूप में आना ‘वक्त की मांग’ है, पर सच ये है कि विलय के सारे समीकरण ‘राजनीतिक लाभ’ के गुणा-भाग पर आधारित हैं। वैसे देखा जाय तो इसमें कोई बुराई भी नहीं। छोटे दलों की कौन कहे, बड़े दलों के ‘पैर’ भी तो उनकी ‘चादर’ से बड़े ही होते हैं। सारे दल अपनी ‘ताकत’ बढ़ाने और ‘उपस्थिति’ जताने के लिए कभी गठबंधन तो कभी विलय का सहारा लेते हैं और लेते रहेंगे। नैतिकता और विचार के लिए प्रतिबद्धता अब भाषणों के सिवा कहीं दिखती कहाँ है..!

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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दृष्टि द विजन ने किया छात्रों को पुरस्कृत

नगरपरिषद के लक्ष्मीपुर मुहल्ला (वार्ड न.-17) स्थित दृष्टि द विजन कोचिंग संस्थान के निदेशक पंकज पोद्दार एवं मीनाक्षी पोद्दार के जीवन का यही उद्देश्य रहा है कि कोचिंग के माध्यम से स्थानीय छात्रों को गुणवत्तापूर्ण एवं मानकपूर्ण शिक्षा प्रदान किया जाए | इस संस्थान के माध्यम से शहर के विभिन्न विद्यालयों के कक्षा 6 से 12 तक के छात्र-छात्राओं के बीच बेहतर प्रदर्शन के आधार पर भव्य पुरस्कार वितरण समारोह का आयोजन किया गया |

समारोह की अध्यक्षता करते हुए समाजसेवी-शिक्षाविद डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने अपने सम्बोधन में छात्र-छात्राओं एवं उनके अभिभावकों से भारतरत्न डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम के जीवन को परोसते हुए यही कहा कि आप नींद में आने वाला सपने नहीं देखें बल्कि वैसे सपने देखें जो आपको रात में नींद भी नहीं आने दें | डॉ.मधेपुरी ने छात्र-छात्राओं को भयमुक्त रहने एवं आत्मविश्वास से भरपूर होने के फायदों पर विस्तार से प्रकाश डाला | निदेशक मीनाक्षी ने कहा कि 6 वर्षों से यह कोचिंग शिक्षा के क्षेत्र में अपनी सेवा प्रदान कर रहा है और दर्जनों आईआईटीयन-मेडिकल व इंजीनियरिंग पैदा कर चुका है |

इस अवसर पर छात्र-छात्राओं को सम्बोधित करते हुए प्रो.विजेन्द्र नारायण यादव, प्रो.अशोक कुमार पोद्दार, अधिवक्ता अजय कुमार, सुमन जी एवं ललन यादव सहित जागरण के संवाददातापृथ्वीराज यदुवंशी ने विस्तार से छात्र-छात्राओं को प्रोत्साहित किया |

डॉ.मधेपुरी ने प्रथम आने वाले जिन छात्रों को पुरस्कृत किया वे हैं- रश्मिका रत्न, पीयूष प्रियांशु, जागृति प्रकाश, अंकित कुमार और बिट्टूराज आदि | शेष बेहतर प्रदर्शन वाले छात्र-छात्राओं को निदेशक पंकज पोद्दार एवं मीनाक्षी पोद्दार द्वारा पुरस्कृत किया गया |

सांस्कृतिक कार्यक्रम में गायक रौशन ने खूब तालियाँ बटोरी एवं मीनाक्षी ने मंच संचालन एवं धन्यवाद ज्ञापन किया |

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कोहली और उनके तीन ‘टी’ के रहते ‘कप’ हमारा है..!

कोहली ने भारत को एक और ‘विराट’ जीत दिलाई। इस एक अकेले खिलाड़ी के सामने कभी अजेय कहलाने वाली ऑस्ट्रेलिया की टीम असहाय नज़र आई। जिस महामुकाबले पर पूरे देश की निगाहें टिकी हुई थीं और हर गेंद, हर रन, हर विकेट पर लोगों की धड़कनें तेज हो रही थीं, उसमें टीम इंडिया के हाथों ऑस्ट्रेलिया को करारी हार का सामना करना पड़ा और एक बार फिर जीत के नायक बने टीम इंडिया सबसे भरोसेमंद बल्लेबाज विराट कोहली। 27 साल के विराट आज टीम इंडिया की रीढ़ बन चुके हैं। अकले दम पर किसी भी मैच को विपक्षी टीम के जबड़े से छीन लेने का जुनून ही विराट को तमाम दिग्गज खिलाड़ियों के बीच भी अलग खड़ा कर देता है।

मोहाली में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ करो या मरो के मुकाबले में करोड़ों लोगों की उम्मीदों पर सोने जैसा खरा उतरने वाले विराट की पारी इतनी शानदार थी कि भारत तो भारत, ऑस्ट्रेलियाई मीडिया भी फिदा है उन पर। विराट कोहली ने भले ही ऑस्ट्रेलिया की टी-20 विश्वकप के सेमीफाइनल में पहुँचने की उम्मीद तोड़ दी हो लेकिन इस देश की मीडिया ने अकेले दम पर भारत को अंतिम चार में जगह दिलाने के लिए इस असाधारण बल्लेबाज की जमकर तारीफ की। ऑस्ट्रेलिया ने इस मैच में भारत को 161 रन का लक्ष्य दिया था जो मोहाली की पिच को देखते हुए हरगिज छोटा ना था लेकिन 51 गेंदों पर विराट ने जिस तरह 82 रनों की पारी खेली उससे ये लक्ष्य भी जैसे बौना साबित हुआ और भारत बहुत शान से सेमीफाइनल में पहुँच गया।

भारत की इस ‘विराट’ जीत पर ‘द ऑस्ट्रेलियन’ के गिडोन हेग ने कहा कि “कोहली ने अपनी शानदार बल्लेबाजी से लक्ष्य का पीछा करने को बेहद सामान्य बना दिया।” ‘सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड’ के क्रिस बैरेट ने कहा कि ऑस्ट्रेलियाई कप्तान स्टीवन स्मिथ का ये कहना कि यह ‘विराट शो’ था, बिल्कुल सही है। उन्होंने कहा कि टी-20 अंतर्राष्ट्रीय मैचों की अब तक की सबसे महान पारियों में से एक खेल कर इस दिग्गज भारतीय बल्लेबाज ने अकेले दम पर ऑस्ट्रेलिया को 20 ओवर की विश्व चैम्पियनशिप से बाहर कर दिया। ‘सिडनी मॉर्निंग हेराल्ड’ ने यह भी कहा कि कोहली महान सचिन तेन्दुलकर के उत्तराधिकारी के रूप में उभरे हैं।

‘डेली टेलीग्राफ’ के बेन होर्ने ने विराट की पारी पर लिखा – “एक व्यक्ति ने जीत दिला दी।” होर्ने ने आगे कहा – “मुझे लगता है कि यह कहना सुरक्षित होगा कि फिलहाल विश्व क्रिकेट में विराट कोहली जैसी कोई प्रतिभा नहीं है।” इधर भारत में सुनील गावस्कर के भी यही उद्गार थे। कल के मैच के बाद उन्होंने कहा कि कोहली “मौजूदा दौर के सबसे उम्दा बैट्समैन” हैं। एक न्यूज़ चैनल से बातचीत में उन्होंने कहा कि “इस समय कोहली सीमित ओवरों के खेल में दुनिया के सबसे महान बल्लेबाज हैं। इसके बारे में कोई संदेह ही नहीं है, वह असाधारण और सबसे अलग हैं। मेरे जो थोड़े बाल बचे हैं, वे इस युवा जीनियस की पारी देखकर खड़े हो गए थे।“ इससे पूर्व पाकिस्तान पर भारत की धमाकेदार जीत के बाद इमरान खान ने कहा था कि विराट कोहली में ‘सार्वकालिक महान खिलाड़ी’ बनने की क्षमता है। वहीं पाकिस्तान के पूर्व बल्लेबाज मोहम्मद युसूफ के शब्दों में कोहली क्रिकेट ग्राउंड में विरोधी टीम के लिए किसी ‘बला’ से कम नहीं हैं।

बता दें कि मोहाली में बनाए गए नाबाद 82 रन के बाद इस साल अन्तर्राष्ट्रीय टी-20 में सबसे ज्यादा रन विराट के नाम हो गए हैं। यह पहला मौका है जब किसी बल्लेबाज ने एक सीजन में 500 रनों का आंकड़ा पार किया है। 2016 में 12 मैचों की 11 पारियों में 536 रन बनाकर विराट टॉप पर हैं। उन्होंने इन 12 मैचों में 133.66 की स्ट्राइक रेट से रन बनाते हुए छह हाफ सेंचुरी भी बनाई है। बड़ी बात ये कि इन 12 मैचों में छह दफा वो नॉट आउट रहे।

क्रिकेट के लिए अद्भुत पैशन, रन बनाने की भूख और किसी भी चुनौती से निपटने का हौसला कोहली को क्रिकेट का ‘विराट’ खिलाड़ी बनाता है। वो जब मैदान में उतरते हैं तो पिच और गेंदबाज उनके लिए जैसे मायने ही नहीं रखते। उनकी आँखें तो बस अर्जुन की तरह ‘मछली की आँख’ यानि अपने लक्ष्य को देख रही होती हैं। गेंद को मैदान के हर कोने में पहुँचाने की उनकी चाहत और कभी कम ना होने वाले उनके उत्साह से ही गेंदबाज खौफ खाते हैं। कोहली के टैलेंट, टैम्परामेंट और टाइमिंग को देख कहना ही पड़ेगा कि कोहली जैसा कोई नहीं और ये भी कि कोहली और उनके इन तीन ‘टी’ के रहते ‘कप’ हमारा है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

 

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अश्लीलता की होलिका जलाई गयी

स्थानीय भूपेन्द्र चौक पर होलिकोत्सव के अवसर पर अखिल विश्व गायत्री परिवार की जिला इकाई के तत्वावधान में होलिका दहन को अश्लीलता निवारण दिवस के रूप में मनाया गया जिसकी अध्यक्षता पी.एस.कॉलेज मधेपुरा के प्रो.अजय कुमार ने की |

सम्पूर्ण कार्यक्रम में होलिका को अश्लीलता के प्रतीक के रूप में जलाने के साथ-साथ नयी पीढ़ी के प्रहलाद को बचाने पर जोर दिया ब्रह्मा कुमारी रंजू दीदी एवं शिक्षा प्रेमी डॉ.रामचन्द्र प्रसाद मंडल, डॉ.गोपाल यादव, पूर्व उपप्रमुख विनयवर्द्धन उर्फ़ खोखा बाबू आदि | मौके पर अश्लील पोस्टरों एवं चित्रों का वहिष्कार करने की अपील प्रो.राम सुन्दर साह, प्रो.जयप्रकाश यादव, ओम प्रकाश यादव, डॉ.नागेन्द्र गुप्ता आदि सुधि जनों ने की |

शिक्षक संघ के नेता प्रो.जयप्रकाश यादव ने कहा कि समाज में तेजी से बढ़ रही विकृति को समाप्त करने के लिए सम्मिलित रूप से हमें लोक संस्कृति एवं लोकचार को बढ़ावा देना होगा अन्यथा यह समाज कमजोर होता चला जाएगा |

गायत्री परिवार को समर्पित चेतन वर्मा ने विकासवाद के साथ अश्लीलतावाद के बाजार को तेजी से फैलता हुआ बताया जिसे उन्होंने सामजिक हिंसा का कारण माना तथा इसे दूर करने के लिए सोच में बदलाव लाने पर बल दिया |

अन्त तक संजय यादव, प्रो.अशोक कुमार पोद्दार, दमयंती देवी, रमेश चन्द्र भगत, दयानन्द यादव, शिवकुमार, किरणवाला, नीलम कुमारी, सरिता सिंह आदि उपस्थित रहे |

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बिहार की बदली हुई परिस्थितियों में राजीव गांधी के मंदिर का बनना

बिहार में भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी का मंदिर बनने जा रहा है। जी हाँ, यहाँ के बक्सर जिले के राजपुर प्रखंड के कथराई गांव में भूमि-पूजन के उपरान्त दो दिन पहले इस मंदिर का निर्माण-कार्य भी प्रारम्भ हो चुका है। इस मंदिर में दिवंगत कांग्रेसी नेता राजीव गांधी की मूर्ति स्थापित की जाएगी। राजीव गांधी के लिए बनने जा रहा यह देश का संभवत: पहला मंदिर होगा।

बता दें कि राजीव गांधी का यह मंदिर कांग्रेस खेलकूद प्रकोष्ठ के बक्सर जिला उपाध्यक्ष मृत्युंजय राय बनवा रहे हैं। मृत्युंजय की मानें तो “राष्ट्र के नवनिर्माण में राजीव गांधी के विशेष योगदान” के प्रति यह उनकी श्रद्धा की अभिव्यक्ति है। उनका कहना है कि इस मंदिर के निर्माण में सभी कांग्रेसियों से सहायता मिल रही है।

इसमें कोई दो राय नहीं कि माँ इन्दिरा गांधी की मृत्यु के बाद 1984 में सबसे युवा प्रधानमंत्री के रूप में देश की बागडोर सम्भालने वाले राजीव गांधी आज भी लाखों लोगों के ह्रदय में स्थान रखते हैं। भारत में ‘कम्प्यूटर युग’ लाने में उनकी भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। 21 मई 1991 को तमिलनाडु की एक चुनावी सभा में बम विस्फोट कर उनकी हत्या कर दी गई थी। अब इस घटना के 25 साल बाद श्रद्धा की ये ‘अभिव्यक्ति’ हो रही है।

देखा जाय तो नेता, अभिनेता, क्रिकेटर आदि के लिए सम्मान व्यक्त करने की ऐसी परिपाटी दक्षिण में खूब रही है, लेकिन उत्तर भारत में इस तरह के उदाहरण बिरले ही मिलते हैं। जहाँ तक बिहार की बात है, गठबंधन का हिस्सा बनकर ही सही, लम्बे समय के बाद कांग्रेस सत्ता में आई है। ऐसे में ये बात भी जेहन में आती है कि कहीं ये बदली हुई परिस्थितियों में अपनी ‘उपस्थिति’ दर्ज कराने का बहाना तो नहीं..! अगर इस तरह का काम यहाँ कांग्रेस के ‘संघर्ष’ के दिनों में होता तो बात कुछ अलग होती।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदी ने जीत लिया धुर विरोधियों का दिल, खेली अनोखी ‘होली’

हर गिले-शिकवे को मिटाने का त्योहार है होली। ‘मत’ के और ‘मन’ के सारे भेद भुला कर कटु आलोचकों और धुर विरोधियों को भी गले लगाने का इससे बेहतर कोई दूसरा मौका नहीं। कल प्रधानमंत्री मोदी ने इस बात को सच कर दिखाया। राहुल गांधी, अरविन्द केजरीवाल, शत्रुघ्न सिन्हा… ये वो नाम हैं जो हर दिन मोदी पर हमलावर होते हैं लेकिन कल इनके ‘तरकश’ से एक झटके में सारे ‘तीर’ निकाल लिए मोदी ने, सिवाय ‘शुक्रिया’ कहने के इन सबके पास कुछ बचा ही नहीं कल ।

जी हाँ, प्रधानमंत्री मोदी ने कल अनोखी ‘होली’ खेली और वो भी ट्वीटर पर। होली के दिन उन्होंने अपने निजी अकाउंट @NarendraModi से करीब 150 लोगों को फॉलो किया जिनमें ज्यादातर लोग उनके राजनीतिक प्रतिद्वंद्वि हैं। जिन लोगों को प्रधानमंत्री ने फॉलो किया उनमें कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी और महासचिव दिग्विजय सिंह, दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया, वाईएसआर कांग्रेस चीफ जगन मोहन रेड्डी और पार्टी में रहकर भी मोदी की आलोचना से बाज ना आने वाले शत्रुघ्न सिन्हा शामिल हैं। इन 150 लोगों में उड़ीसा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक, सीनियर कांग्रेस नेता अहमद पटेल और हमेशा चर्चा में रहने वाले पूर्व मंत्री शशि थरूर भी हैं।

अरविन्द केजरीवाल, जिन्होंने मोदी को वाराणसी तक जाकर चुनौती दी थी और हाल में अपने दफ्तर में सीबीआई की छापेमारी के बाद उन्हें ट्वीट कर ‘कायर पागल’ तक कह दिया था, कल मोदी द्वारा फॉलो किए जाने के बाद उन्हें भी अत्यन्त विनम्रता के साथ ट्वीट कर कहना पड़ा – “Sir, thank u for following me. Happy Holi. आज गिले शिकवे भूलने का दिन है। Hope better Centre-Delhi cooperation in future.”

बता दें कि ‘सत्याग्रह’ नाम की एक न्यूज़ वेबसाइट पर दो दिन पहले ही एक स्टोरी आई थी जिसमें कहा गया था कि मोदी मारपीट करने वालों, गांधी को देशद्रोही मानने वालों और महिलाओं को गालियां देने वालों को तो फॉलो करते हैं मगर विपक्ष के नेता को इस लायक नहीं समझते। मोदी ने उन अकाउंट्स को अनफॉलो तो नहीं किया लेकिन विपक्ष के कई नेताओं को फॉलो कर अपने आलोचकों को निरुत्तरित जरूर कर दिया।

वैसे प्रधानमंत्री का ‘होली अभियान’ बुधवार को ही शुरू हो गया था जब उनकी अध्यक्षता में हुई केन्द्रीय मंत्रिमंडल की बैठक में केन्द्रीय कर्मचारियों के महंगाई भत्ते में छह फीसदी इजाफे, प्रधानमंत्री ग्रामीण आवास योजना के तहत तीन साल में एक करोड़ पक्के घर बनाने और किसानों के लिए पोषण आधारित खाद सब्सिडी देने को मंजूरी दी गई थी। इन खुशखबरियों के बाद होली के दिन मोदी ने जो किया उसे ‘मास्टर स्ट्रोक’ ही कहा जाएगा।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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होली है, खुलने दो भेद सारा… जोगीरा सा रा रा रा

जोगीरा ना हो तो होली कैसी..? होली का असली रंग तो जोगीरा के साथ ही चढ़ता है। उत्तर भारत के जिन क्षेत्रों में नाथपंथी योगी (जोगी) सक्रिय रहे वहाँ जोगीरा गाने की परम्परा विशेष रूप से पाई जाती है। सम्भवत: इसकी उत्पत्ति जोगियों की हठ-साधना, वैराग्य और उलटबाँसियों का मजाक उड़ाने के लिए हुई हो। यह मूलत: एक समूह-गान है जिसमें प्रश्नोत्तर शैली में एक समूह सवाल पूछता है तो दूसरा उसका जवाब देता है। जवाब प्राय: चौंकाने वाले होते हैं।

समय बदला तो जोगीरा भी बदलता गया। धीरे-धीरे यह रोजमर्रा की घटनाओं से जुड़ता चला गया। घर का आंगन हो, गांव का चौपाल हो या फिर राजनीति का गलियारा इसने हर जगह अपनी पहुँच बना ली। सम्भ्रान्त और शासक वर्ग पर अपना गुस्सा निकालने या यूँ कहें कि उन्हें ‘गरियाने’ का अनूठा जरिया बन गया जोगीरा।

होली में तो वैसे भी खुलकर और खिलकर कहने की परम्परा है। यह एक तरह से सामूहिक विरेचन का पर्व है। आज इस परम्परा को स्वस्थ रूप देते हुए इसे फिर से व्यक्तिगत और संस्थागत, सामाजिक और राजनीतिक विडम्बनाओं और विद्रूपताओं पर कबीर की तरह तंज कसने और हमले करने के अवसर में बदलने की जरूरत है।

होली की मंगलकामनाओं के साथ प्रस्तुत हैं कबीर की परम्परा के जनकवि आचार्य रामपलट दास के कुछ चुनिंदा जोगीरे। इन जोगीरों के मूल में कौन हैं और क्यों हैं ये कहने की जरूरत नहीं। ना ही ये कहने की जरूरत है कि बुरा ना मानो, होली है। हम तो कहेंगे बुरा मान ही लो, होली है… जोगीरा सा रा रा रा…

आचार्य रामपलट दास के जोगीरे

केकर खातिर पान बनल बा, केकरे खातिर बांस

केकरे खातिर पूड़ी पूआ, केकर सत्यानास

जोगीरा सा रा रा रा………………….

नेतवन खातिर पान बनल बा, पब्लिक खातिर बांस

अफसर काटें पूड़ी पूआ, सिस्टम सत्यानास

जोगीरा सा रा रा रा………………….

आधी टांग क धोती पहिरे, आधी पीठ उघार

पलटू कारन बजट क घाटा, बोल रहल सरकार

जोगीरा सा रा रा रा………………….

चिन्नी चाउर महंग भइल, महंग भइल पिसान

मनरेगा का कारड ले के, चाटा साँझ बिहान

जोगीरा सा रा रा रा………………….

खूब चकाचक जीडीपी बा चर्चा बा भरपूर

चौराहा पर रोज सबेरे बिक जाला मजदूर

जोगीरा सा रा रा रा………………….

दो सौ चालीस दाल हो गई, तेल सवा सौ पार

अच्छे दिन में कमी कहाँ है, पूछ रही सरकार

जोगीरा सा रा रा रा………………….

बाबा मांगे मुँह बा बा के, चेला दाँत चियार

श्री श्री मांगे नाच नाच के, झुकी खड़ी सरकार

जोगीरा सा रा रा रा………………….

पूँछ पटक कर कुक्कुर खाए, चाट-चाट बिल्लार

सफाचट्ट कर माल्या खाया, खोज रही सरकार

जोगीरा सा रा रा रा………………….

कौन दुल्हनिया डोली जाए, कौन दुल्हनिया कार

कौन दुल्हनिया झोंटा नोचे, नाम केकर सरकार

जोगीरा सा रा रा रा………………….

संघ दुल्हनिया डोली जाए, कारपोरेट भरि कार

धरम दुलहनिया झोंटा नोचे, बउरिया सरकार

जोगीरा सा रा रा रा………………….

रंग और गुलाल के साथ –

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार दिवस मनाया मधेपुरा जिला प्रशासन ने

22 मार्च 1912 के दिन ‘बिहार’ को तत्कालीन ‘बंगाल प्रेसिडेंसी ऑफ फोर्ट विलियम’ से अलग स्वतंत्र अस्तित्व प्राप्त हुआ जिसे आज 104 वर्ष हो गये | बिहार दिवस के अवसर पर जिले के डायनेमिक डी.एम. मो.सोहैल एवं अनुभवी आरक्षी अधीक्षक विकास कुमार सहित अन्य पदाधिकारीगण इसकी सफलता के लिए तत्पर देखे गये | जिला मुख्यालय से लेकर प्रखंड स्तर तक बिहार दिवस की धूम रही | यहाँ तक कि पंचायत स्तर के सरकारी भवनों को भी आकर्षक तरीके से सजाया गया |

सुबह में स्कूली बच्चों द्वारा प्रभातफेरी निकाला गया | बिहार गौरव गाथा से सम्बन्धित भाषण प्रतियोगिता, गीत-संगीत प्रतियोगिता तथा क्वीज का भी आयोजन किया गया था | इसके साथ ही साफ़-सफाई, रोशनी एवं खेल-कूद की पूरी व्यवस्था की गयी थी | शाम में बी.एन.मंडल स्टेडियम में सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया गया जिसमें स्थानीय स्कूली बच्चों के साथ-साथ पटना से आये सतीश पप्पू आर्केस्ट्रा टीम ने भाग लिया |

कार्यक्रम का श्रीगणेश हर ओर नजर रखनेवाले डायनेमिक डी.एम. मो.सोहैल, समाजसेवी डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी, आरक्षी अधीक्षक विकास कुमार सहित ए.डी.एम. अबरार अहमद कमर, डी.डी.सी. मिथिलेश कुमार, समाजसेवी शौकत अली, वार्ड पार्षद ध्यानी यादव, माया विद्या निकेतन की प्राचार्या चन्द्रिका यादव आदि ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर बिहार दिवस का उद्घाटन किया |

डी.एम. मो.सोहैल ने अपने संक्षिप्त भाषण में कहा कि माननीय मुख्यमंत्री श्री नीतीश कुमार के सप्त संकल्पों को अमलीजामा पहनाने के लिए जिला प्रशासन के सभी पदाधिकारीगण व कर्मचारीगण तत्पर रहेंगे |

देर रात तक चले सांस्कृतिक कार्यक्रम में शहर के हाली क्रास, माया विद्या निकेतन, केशव कन्या, जगजीवन आश्रम स्कूल, स्वर शोभिता, इप्टा कलाकारों सहित अन्य कई स्कूलों के बच्चे-बच्चियों ने भी बेहतर प्रदर्शन किया | सतीश पप्पू आर्केस्ट्रा टीम तो होली के कुछ गानों पर युवाओं को थिरकने के लिए विवश कर दिया और खूब तालियाँ बटोरी |

कार्यक्रम का आरम्भ श्रीमती रेखा यादव के स्वागतगान से हुआ तथा मंच संचालन किया स्काउट गाइड के आयुक्त जयकृष्ण यादव ने | दस बजे रात्रि में कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा कर दी गई |

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क्या फिर कहलाएगा बिहार का इतिहास समूचे भारतवर्ष का इतिहास..?

भगवान बुद्ध के जन्म यानि ढाई हजार वर्ष पूर्व या बाद या फिर उनके समय में भी सदियों तक ‘बिहार’ नाम का कोई भू-भाग प्रकाश में नहीं आया था। 14वीं शताब्दी यानि 1320 ई. में मौलाना मिनहाजुद्दीन-अबु-उमर-ए—रहमान द्वारा ‘तबकात-ए-नासिरी’ जैसे दस्तावेज में सर्वप्रथम ‘बिहार’ शब्द का उल्लेख मिलता है। आगे इतिहास में उद्धृत तथ्यों के आधार पर कम-से-कम इस आशय को विश्वसनीय और प्रामाणिक माना जा सकता है कि ‘बिहार’ शब्द का उत्स बौद्ध धर्म की ‘विहार’ परम्परा से है। यानि बौद्ध विहारों या मठों की बहुसंख्यकता को देखते हुए ही भारत के एक भू-भाग को ‘बिहार’ की संज्ञा प्रदान की गई है। संक्षेप में ईसा के जन्म के 1200 वर्षों के बाद यानि 13वीं शताब्दी में ‘बिहार’ शब्द का जन्म माना जा सकता है और 15वीं-16वीं शताब्दी में जिस भारतीय भू-भाग को ‘बिहार’ राज्य की संज्ञा मिली वही चलते-चलते आज हमारा और आपका ‘बिहार’ बना है।

ये तो हुई ‘बिहार’ के नामकरण की बात। लगे हाथ इसकी राजधानी पटना के नामकरण की पृष्ठभूमि से भी वाकिफ हो लें। प्रारम्भ में बाग-बगीचे और बड़ी तायदाद में खिलने वाले फूलों के कारण गंगा, सोन और गंडक नदियों के संगम पर बसे नगर (वर्तमान पटना) को लोगों ने ‘कुसुमपुर’ कहा। आगे चलकर ‘पुत्रक’ नामक राजकुमार और ‘पाटलि’ नामक राजकुमारी ने विवाहोपरान्त संतान नहीं होने के कारण संतति के बिना भी अपने नाम को जीवित रखने के लिए ‘कुसुमपुर’ का नाम ‘पाटलिपुत्रक’ रख दिया। कालक्रम में ‘पाटलिपुत्रक’ से ‘पाटलिपुत्र’ बना और फिर ‘पटन देवी’ नाम से जुड़कर इसने ‘पटना’ का रूप धारण कर लिया।

1707 में औरंगजेब की मृत्यु होने के 25 वर्ष बाद तक ‘बिहार’ मुगल साम्राज्य का एक अलग प्रान्त बना रहा पर 1732 ई. में कुछ विशेष प्रशासनिक कारणों से इसका विलय ‘बंगाल प्रेसिडेन्सी ऑफ फोर्ट विलियम’ में कर दिया गया। इसके बाद अगले 180 वर्षों तक बिहार ‘बंगाल प्रेसिडेन्सी’ के अधीन रहा जब तक कि डॉ. सच्चिदानन्द सिन्हा, मजहरूल हक, अली इमाम आदि के अथक प्रयासों के बाद जॉर्ज पंचम ने 12 दिसम्बर 1911 को अलग बिहार राज्य को मंजूरी नहीं दे दी और 22 मार्च 1912 को बंगाल से अलग होकर बिहार, छोटा नागपुर और उड़ीसा एक प्रदेश के रूप में अस्तित्व में नहीं आ गए।

इस नए प्रदेश को अंग्रेजी में ‘बिहार एंड उड़ीसा प्रोविन्स’ कहा जाता रहा परन्तु आम जनता द्वारा इसे ‘बिहारोत्कल’ के रूप में स्वीकार किया गया। अधिसूचित पाँच प्रमंडल वाले ‘बिहारोत्कल’ प्रान्त में कुल 21 जिलों को शामिल किया गया जो इस प्रकार थे – 1. भागलपुर प्रमंडल – भागलपुर, पूर्णिया, मुंगेर और संथाल परगना (कुल चार जिले), 2. पटना प्रमंडल – पटना, गया और शाहाबाद (कुल तीन जिले), 3. तिरहुत प्रमंडल – मुजफ्फरपुर, दरभंगा, सारण और चम्पारण (कुल चार जिले), 4. छोटानागपुर प्रमंडल – हजारीबाग, राँची, पलामू, सिंहभूमि और मानभूमि (कुल पाँच जिले) तथा 5. उड़ीसा प्रमंडल – कटक, बालासोर, अंगुल, पुरी और सम्बलपुर (कुल पाँच जिले)। बिहार के सोलह और उड़ीसा के पाँच जिलों को मिलाकर बने ‘बिहार-उड़ीसा’ नामक इस नए सूबे का शासनाधिकार ब्रिटिश हुकूमत के लेफ्टिनेन्ट गवर्नर को सौंपा गया और राजधानी के रूप में अस्तित्व में आया ‘पाटलिपुत्र’ से बना ‘पटना’।

भारत के पहले सम्राट (चन्द्रगुप्त मौर्य) से लेकर पहले राष्ट्रपति (डॉ. राजेन्द्र प्रसाद) तक की जन्मभूमि है बिहार। एक समय बिहार का इतिहास ही समूचे भारतवर्ष का इतिहास रहा है। शून्य (आर्यभट्ट) से लेकर पहला गणतंत्र (लिच्छवी) तक इसी ने दिया संसार को। माँ सीता का जन्म यहीं हुआ और यहीं महर्षि वाल्मीकि ने ‘रामायण’ की रचना की। बुद्ध और महावीर को यहीं ‘अपने होने का अर्थ’ मिला और यहीं सिक्खों के ‘दसवें गुरु’ गुरु गोविन्द सिंह ने जन्म लिया। महात्मा गांधी ने यहीं के चम्पारण में ‘सत्याग्रह’ का ‘बीज’ बोया और यहीं जयप्रकाश ने सम्पूर्ण क्रान्ति की ‘नींव’ रखी।

वशिष्ठ और विश्वामित्र जैसे मुनि, अशोक और शेरशाह जैसे शासक, विद्यापति और दिनकर जैसे कवि बिहार की मिट्टी की उपज हैं। चाणक्य जैसे गुरु, आर्यभट्ट जैसे खगोलविद्, जीवक जैसे चिकित्सक, पाणिनी जैसे शिक्षाविद्, याज्ञवल्क्य जैसे दार्शनिक, मंडन मिश्र जैसे शास्त्रज्ञ और बाबू कुंवर सिंह जैसे स्वतंत्रता सेनानी की कर्मभूमि बिहार ही है। नालन्दा और विक्रमशिला जैसे ज्ञान के केन्द्र यहीं थे जिनसे कभी सारा संसार प्रकाशित होता था। पर आज हम कहाँ हैं..? बिहार के गौरवशाली इतिहास में हमने क्या और कितना जोड़ा है..? पहले ‘विशिष्टता’ में हमारी कोई सानी नहीं थी और आज हमें ‘विशेष राज्य’ की लड़ाई लड़नी पड़ रही है..?

आज हमारा बिहार 104 साल का हो गया। आज का दिन ‘मील’ के तमाम ‘पत्थरों’ को गिनने और उन्हें सहेजने के साथ-साथ उनमें मील के ‘नए’ पत्थरों को जोड़ने के संकल्प का दिन भी होना चाहिए। आज का दिन आत्ममंथन का होना चाहिए कि हमसे कहाँ और क्या चूक हुई। ‘बिहार दिवस’ पर जब पूरा बिहार रोशनी में नहा रहा होगा तब हमें अपने गौरवशाली अतीत के प्रति पूरी श्रद्धा से सिर झुका कर ये प्रण लेना चाहिए कि बिहार की हर शाम ऐसी ही हो, हमारी रोशनी से एक बार फिर पूरी दुनिया जगमगाए और एक बार फिर बिहार का इतिहास समूचे भारतवर्ष का इतिहास कहलाए..!

Bihar Vidhan Sabha decorated with lights on Bihar Diwas.
Bihar Vidhan Sabha decorated with lights on Bihar Diwas.

[डॉ. भूपेन्द्र मधेपुरी से परिचर्चा के आधार पर मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप]

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