मधेपुरा विधानसभा क्षेत्र-73 के निर्वाचन पदाधिकारी सह अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार निराला ने मधेपुरा अबतक से कहा कि मधेपुरा नगर परिषद् के मुख्य पार्षद डॉ.विशाल कुमार बबलू ने विशाल कुमार नाम से स्वतंत्र अभ्यर्थी के रूप में पहला नामांकन दाखिल कर चुनावी संग्राम में उतरने का बिगुल फूंका है | उन्होंने यह भी कहा कि तीन दिनों में दो नामांकन के पर्चे ही भरे गये हैं | दूसरा नामांकन सी.पी.आई.(एम.) पार्टी उम्मीदवार के रूप में पार्टी के वर्तमान जिला अद्यक्ष गणेश मानव द्वारा दिया गया है |
अन्त में उन्होंने यही कहा कि अगले चार दिनों में यानी 15अक्टूबर तक नामांकन के पर्चे भरने की गति में बढ़ोतरी से इन्कार नहीं किया जा सकता |
हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी / जिसको भी देखना हो कई बार देखना – निदा फ़ाज़ली ने ये पंक्तियां आज के आदमी के लिए कही हैं पर ये आज के समाज और पूरे समय के लिए भी उतनी ही मौजू हैं और सबसे अधिक मौजू हैं आज की राजनीति के लिए। आज राजनीति ऐसी हो चुकी है कि आप जो चेहरा लेकर सुबह निकलते हैं, शाम उसी चेहरे के साथ वापस नहीं आते। आपके कितने चेहरे हैं और कितने हो सकते हैं ये स्वयं आप भी नहीं जान रहे होते। ये स्थिति सचमुच बहुत खतरनाक है। आज हम मुखौटों के युग में रह रहे हैं और मुखौटे ही हमारा चेहरा हैं। बस जरूरत के अनुसार आप अपना मुखौटा बदलते रहिए, गिनने की क्या जरूरत है कि आपके भीतर आदमी दस-बीस हैं या उससे भी ज्यादा।
बहरहाल, मुद्दे पर आते हैं और बिहार चलते हैं जहाँ ‘मुखौटों’ के लिए सबसे माकूल मौसम चल रहा है अभी। कहने की जरूरत नहीं कि मुखौटों की फसल चुनाव के मौसम में लहलहाने लगती है। क्या पार्टी, क्या नेता, क्या कार्यकर्ता सभी ताबड़तोड़ मुखौटा उपजाते दिख जाएंगे आपको। पर मजे की बात तो ये है कि मुखौटों की भीड़ में सबसे बड़ा मुखौटा ये होता है कि मैं तो बिना मुखौटे के खड़ा हूँ, आप तो बस सामनेवाले को पकड़िए जिसने फलां मुखौटा पहना हुआ है।
अगर कहा जाय कि बिहार में असली लड़ाई ‘मुखौटे’ को लेकर है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। इधर महागठबंधन शोर मचा रहा है कि भाजपा पार्टी नहीं, आरएसएस का मुखौटा है केवल तो उधर एनडीए चिल्ला-चिल्ला कर बोल रहा है कि नीतीश तो मुखौटा हैं केवल, पीछे लालू का जंगलराज पार्ट-2 है। अब ये जनता पर है कि वो किसके मुखौटे को उतारेगी। जिसका मुखौटा उतरेगा वो मैदान से बाहर।
लालू लम्बे समय से भाजपा पर संघ का मुखौटा होने का आरोप लगाते रहे हैं। और अब भाजपा से रिश्ता टूटने के बाद नीतीश भी उनके सुर में सुर मिलाने लगे हैं। संघप्रमुख मोहन भागवत ने बीच चुनाव में आरक्षण की ‘समीक्षा’ की बात कहकर इन दोनों को और ताल ठोकने का मौका दे दिया। अब दोनों ललकार कर कह रहे हैं कि हिम्मत है तो आरक्षण खत्म करके दिखाएं। वे लोगों को समझा रहे हैं कि भाजपा आरएसएस का राजनीतिक संगठन है, जो आरएसएस का विचार है वही भाजपा का विचार है। भाजपा अगर बिहार में सत्ता में आई तो आरक्षण खत्म कर देगी। शुरू में भाजपा इस मुद्दे पर बैकफुट पर जाते दिखी लेकिन जल्द ही उसके सारे नेता ये विश्वास दिलाने में जुट गए कि भाजपा भी आरक्षण का समर्थन करती है और इसमें कोई बदलाव नहीं होगा। भाजपा ने एक तरफ ‘डैमेज कंट्रोल’ तो दूसरी तरफ हमला तेज करने की नीति बनाई। अमित शाह गरजकर कहने लगे कि नीतीश के मुखौटे के पीछे लालू का ‘जंगलराज’ खड़ा है। नीतीश विकास की बात कर लोगों को गुमराह कर रहे हैं। बोलते-बोलते वो यहाँ तक बोल गए कि अब नीतीश के लिए बिहार में कोई जगह नहीं है। साथ में ये भी कि 8 नवंबर यानि मतगणना के दिन वो अपना इस्तीफा तैयार रखें। अपने राष्ट्रीय अध्यक्ष के नक्शेकदम पर सुशील मोदी समेत बिहार के बाकी नेता भी अपने-अपने तरीके से मुखौटे की बात दोहराते हैं। और इस तरह, ‘मंच’ हो कोई भी, दोनों गठबंधन बस ‘मुखौटे’ का गीत गाते हैं।
कहने की जरूरत नहीं कि मुखौटे की माया बहुत बड़ी है। इस माया से सर्वथा मुक्त होना सम्भव भी नहीं। चुनाव में चाहे जो जीते, राज तो कोई ‘मुखौटा’ ही करेगा। मुखौटे का ही ‘राज’ और मुखौटे का ही ‘धर्म’। (पत्रकार से पॉलिटिशियन बने आशुतोष ने अपनी किताब का नाम ‘मुखौटे का राजधर्म’ बहुत सोचकर रखा होगा..!) लेकिन अपने-अपने मुखौटे पर इतराते नेताओं और कार्यकर्ताओं को एकबारगी ये भी सोच लेना चाहिए कि जिस जनता के बीच वो मुखौटा पहने घूम रहे हैं वो भी मुखौटे में हो सकती है और जिस दिन जनता मुखौटा पहन लेगी वो कहीं के नहीं रहेंगे। फिर तो करोड़ों मुखौटे मिलकर उनके चेहरे पर एक पर एक चढ़े मुखौटों को उतारेंगे जैसे प्याज को उघेरते हैं परत-दर-परत।
कोसी के तीन जिले मधेपुरा, सहरसा, सुपौल तथा सीमांचल के चार जिले पूर्णिया, कटिहार, किशनगंज और अररिया यानी इन सातो जिलों के 37 सीटों पर विधानसभा चुनाव-2015 के लिए अधिसूचना जारी कर दी गई है | प्रत्येक सीट के लिए 8 अक्टूबर से 15 अक्टूबर तक रविवार सहित छुट्टी के दिनों को छोडकर प्रतिकार्य दिवस 11 बजे पूर्वाह्न से 3 बजे अपराह्न तक नामांकन होगा तथा 16 अक्टूबर को स्क्रूटनी होगी | नाम वापसी की अंतिम तिथि 19 अक्टूबर होगी | इन सभी 37 सीटों पर मतदान 5 नवम्बर (गुरूवार) के दिन सवेरे 7 बजे से शाम 5 बजे तक होगा | और 8 नवम्बर को होगा जनतंत्र के नायकों के भाग्य का फैसला यानी सवेरे 8 बजे से मतगणना का कार्यारम्भ होगा |
चुनाव आयोग ने कहा है कि निर्भीक होकर सभी मतदाता अपने मताधिकार का प्रयोग करें | याद रहे- पहली बार इ.वी.एम. में रहेंगे उम्मीदवारों के फोटो, सभी बूथों पर रहेंगे अर्धसैनिक बल और हेलीकाप्टर से होगी बूथों की निगरानी |
Returning Officer cum S.D.M. Madhepura, Sanjay Kumar Nirala ready to receive nomination papers
मधेपुरा विधानसभा- 73 के रिटर्निंग आफिसर सह अनुमंडल पदाधिकारी श्री निराला ने मधेपुरा अबतक को बताया कि हमारे सभी मतदाता जागरूक होकर मतदान करेंगे एवं सभी अभ्यर्थी आचारसंहिता का पालन करेंगे | उन्होंने बताया कि नामांकन के प्रथम दिन एक भी अभ्यर्थी अपना पर्चा दाखिल नहीं किया है | मौके पर एक वृद्ध नागरिक ने कहा कि कदाचित् सभी अभ्यर्थी लोकनायक जयप्रकाश नारायण की पुण्यतिथि (8 अक्टूबर) पर उन्हें याद करने एवं शोकोदगार व्यक्त करने में लगे होने के कारण ही नहीं आये होंगे |
बिहार के कुल 243 सीटों में से अंतिम यानी पांचवें चरण में जिन 37 सीटों पर 5 नवम्बर को मतदान होना है उनमें 7 सुरक्षित क्षेत्र हैं- सिंहेश्वर, सोनवर्षा, त्रिवेणीगंज, बनमनखी, कोढा, मनिहारी और रानीगंज |
लगता है दिल्ली भेजे गए लाखों डीएनए सैंपल नीतीश के काम नहीं आ रहे। बिहार की जनता नीतीश के ‘स्वाभिमान’ के मुकाबले ‘छीनी गई थाली’ को लेकर प्रधामनंत्री मोदी की ‘शिकायत’ को ज्यादा तरजीह दे रही है शायद। इतनी ज्यादा कि अब थाली के बदले मोदी को पूरा बिहार मिलने जा रहा है। जी हाँ, ताजा सर्वे की मानें तो बिहार में एनडीए की सरकार बन रही है और वो भी दो तिहाई बहुमत से। जी न्यूज ने बीते 29 और 30 सितंबर को बिहार की सभी 243 सीटों पर ‘जनता का मूड’ जानने के लिए सर्वे किया। सर्वे का नाम भी ‘जनता का मूड’ ही था। इस सर्वे के अनुसार भाजपा के नेतृत्व वाले एनडीए को स्पष्ट रूप से 147 सीटें मिलती दिख रही हैं, जबकि जदयू, राजद और कांग्रेस का महागठबंधन मात्र 64 सीटों पर सिमट रहा है। शेष 32 सीटों पर कांटे का मुकाबला है। इन सीटों पर पलड़ा किसी ओर झुक सकता है। बता दें कि इससे पहले जी न्यूज का सर्वे 18 सितंबर को आया था जिसमें एनडीए को 140 सीटें दिखाई गई थीं और महागठबंधन को 70 सीटें दी गई थीं।
12 अक्टूबर को 10 जिलों की 49 सीटों पर होने जा रहे पहले चरण के चुनाव की बात करें तो एनडीए को 53.8 प्रतिशत, महागठबंधन को 40.2 प्रतिशत और अन्य को 6 प्रतिशत वोट मिलने का अनुमान है। सर्वे में एक दिलचस्प अनुमान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों को लेकर है। एनडीए को सबसे अधिक फायदा इन्हीं क्षेत्रों में होने जा रहा है। खास तौर से आरा से सीतामढ़ी तक पड़ने वाले इलाके में एनडीए को 54.6 प्रतिशत, जबकि महागठबंधन को 39.7 प्रतिशत वोट मिलने की सम्भावना बताई गई है।
सितम्बर के आखिरी हफ्ते में ही ‘लोकनीति सीएसडीएस’ ने भी सर्वे किया। सीएसडीएस सर्वे भी एनडीए की स्पष्ट बढ़त बता रहा है। इस सर्वे के मुताबिक एनडीए 42 प्रतिशत वोट हासिल करता दिख रहा है। नीतीश-लालू-कांग्रेस के महागठबंधन को 38 प्रतिशत वोट मिलने के आसार हैं और वो एनडीए से 4 प्रतिशत पीछे है। 4 प्रतिशत का ये अन्तर सीटों के बड़े अन्तर का कारण बन सकता है। हालांकि सर्वे के मुताबिक नीतीश कुमार अभी भी बिहार के सर्वाधिक लोकप्रिय नेता हैं और ग्रामीण इलाकों में महागठबंधन को अधिक वोट भी मिल रहे हैं लेकिन कुल मिलाकर बाजी एनडीए मार ले जा रहा है।
अब तक हुए सारे सर्वे पर गौर करें तो हम पाएंगे कि पहले बढ़त महागठबंधन को हासिल थी। बिहार में लोगों की आम राय थी कि केन्द्र के लिए मोदी और बिहार के लिए नीतीश ठीक हैं। लेकिन चुनाव ज्यों-ज्यों परवान चढ़ रहा है, त्यों-त्यों नरेन्द्र मोदी बिहार में भी अपनी जगह बनाते और फैलाते जा रहे हैं। इसे एक अन्य सर्वे के उदाहरण से समझें। एबीपी न्यूज/नीलसन के अब तक तीन सर्वे आए हैं। पहला सर्वे 24 जुलाई को आया था जिसमें महागठबंधन को 129 और एनडीए को 112 सीटें मिली थीं। 15 सितंबर को आए उनके दूसरे सर्वे में कांटे की टक्कर थी जिसमें महागठबंधन के हिस्से में 122 और एनडीए के हिस्से में 118 सीटें आई थीं। लेकिन 7 अक्टूबर तक आते-आते परिदृश्य बदल गया। उनके तीसरे सर्वे में एनडीए को 128 सीटें मिल रही हैं और महागठबंधन को 112 सीटें। अन्य के खाते में 3 सीटें गई हैं। यानि एनडीए की सरकार पूर्ण बहुमत से बन रही है। वोटों के प्रतिशत की बात करें तो एनडीए को 42, महागठबंधन को 40 और अन्य को 18 प्रतिशत वोट मिल रहे हैं।
कह सकते हैं कि सर्वे सम्भावनाओं का खेल है और आँख मूंदकर किसी सर्वे पर ऐतबार नहीं करना चाहिए। फिर भी राजनीति में अगर आप रुचि रखते हों और चुनाव परिणाम को लेकर आपके भीतर उत्सुकता हो तो एक बार आप बारी-बारी से बिहार के चार मुख्य दलों जदयू, राजद, कांग्रेस और भाजपा के पटना स्थित पार्टी कार्यालय जाएं। इन कार्यालयों का नजारा देख आप स्वयं किसी निष्कर्ष पर पहुँचना चाहेंगे। पहले तीन दलों के कार्यालय में आपको थोड़े विश्वास, थोड़ी आशंका के साथ ‘परीक्षा ठीक से गुजर जाय’ वाला भाव दिखेगा लेकिन भाजपा के कार्यालय की चहल-पहल देख आपको लगेगा कि वहाँ ‘अच्छे दिन’ की प्रतीक्षा हो रही है।
बिहार के चार कोने में चार परिवर्तन रैली के बाद चुनाव के दौरान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की योजना एक के बाद एक कई रैलियों की है। उनका अभियान जितना आक्रामक दिख रहा है उतना ही व्यवस्थित भी। मोदी के कद का प्रधानमंत्री लगभग हर जिले में खुद पहुँच रहा हो तो ये सचमुच एक बड़ी बात है। हालांकि देखा जाय तो पोस्टर से लेकर प्रचार तक नीतीश कुमार कहीं भाजपा से पीछे नहीं हैं। लेकिन उन्हें कदम-कदम पर जिस तरह लालू और उनके तथाकथित ‘जंगलराज’ को डिफेंड करना पड़ रहा है उसे उनके ‘हार्डकोर’ समर्थक भी पूरी तरह पचा नहीं पा रहे हैं। नीतीश की ‘विकासपुरुष’ वाली छवि अब भी कायम है, लोगों ने उन्हें बिल्कुल भुला दिया हो ऐसी बात भी नहीं, ‘मांझी’ समेत बाकी परेशानियों का हल भी नीतीश शायद निकाल लें लेकिन दो विपरीत हो चुके ‘ध्रुव’ जिन परिस्थितियों में और जिस तरह साथ आए हैं वो उनके कार्यकर्ताओं और महागठबंधन के नाम पर ‘कुर्बान’ हुए नेताओं को ‘सहज’ नहीं होने दे रहा है। ऊपर से लालू कभी खुद को ‘नक्सली’ कहकर, कभी ‘गौमांस’ पर बयान देकर तो कभी अपने बड़े बेटे के छोटे और छोटे के बड़े हो जाने को लेकर रोज नई मुसीबतें खड़ी कर रहे हैं सो अलग।
एक समय नरेन्द्र मोदी समेत अन्य भाजपा नेताओं को भोज पर आमंत्रित कर नीतीश ने अचानक वो कार्यक्रम स्थगित कर दिया था। हालांकि अब जाकर नीतीश इसके मूल में सुशील मोदी को बता रहे हैं लेकिन अगर ये सच भी हो तो बताने में शायद देर कर दी है उन्होंने। अब तो वो बीच रणभूमि में हैं और सर्वे अगर सच साबित हुए तो इसका मतलब ये होगा कि नरेन्द्र मोदी उनसे ‘छीनी गई थाली’ के बदले पूरा बिहार लेने जा रहे हैं।
जिले के मुरलीगंज प्रखंड का एक गाँव है तमोठ परसा | उसी गाँव में शिक्षा एवं स्वास्थ्य से जुड़ा एक परिवार का मुखिया है- बद्री प्रसाद एवं मूलवती देवी | इसी दम्पति के ज्येष्ठ पुत्र पन्ना लाल पटेल, जो सम्प्रति सिंहेश्वर में टाउन लैब चलाते हैं, के बेटे हैं- प्रवीण कुमार |
ग्रामीण पृष्ठ भूमि से पढाई शुरू करने वाले प्रवीण सैनिक स्कूल रीवा(मध्य प्रदेश) से हायर सेकेंडरी प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण होता है | वाटर मैनेजमेंट एंड एनवैरामेन्टल साइंस में पुर्तगाल वि.वि. से बी.टेक. करने के बाद रक्षा विभाग एवं इनकम टैक्स विभाग की नौकरियों को भी तिलांजलि दे देता है | फिर उच्च शिक्षा प्राप्ति हेतु पी.जी. में एडमिशन लेने का मन बनाने लगता है | इसी क्रम में यूरोपीय देश हंगरी के पंचवर्षीय पी.जी.कोर्स वाले एनवायरामेन्टल सायंस, एग्रीकल्चरल मैनेजमेंट एंड इंजीनियरिंग के लिए अपना स्थान सुरक्षित करा लेता है |
Praveen Kumar with his Parents at Patna Airport while leaving for Hungary .
ज्ञातव्य हो कि सम्पूर्ण भारत के मेधावी छात्रों द्वारा विभिन्न विषयों में भिन्न-भिन्न यूरोपीय देशों के लिए 115 चयनित छात्रों की सूची में एक स्थान पाना आसान बात नहीं | तभी तो कहा जाता है कि प्रतिभा किसी की मोहताज नहीं होती और कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती | प्रवीण अपनी राह तलाशने में प्रवीण निकला | उसे पढाई का सम्पूर्ण खर्च हंगरी सरकार देगी और प्रत्येक वर्ष भारत आकर एक बार अपनी माँ मनोरमा, चाचाश्री बुद्धा डेंटल कॉलेज के असिस्टेंट प्रोफेसर(वायो केमिस्ट्री) शैलेन्द्र कुमार, वायोकेम सुपौल के रविन्द्र कुमार तथा मधेपुरा हाली क्रास स्कूल के सचिव गजेन्द्र कुमार एवं चाचीश्री प्राचार्या वन्दना कुमारी सहित एन.आई.टी. पटना के नरेश कुमार आदि से मिलने हेतु आने-जाने का हवाई खर्च भारत सरकार के यू.जी.सी. द्वारा दी जायेगी |
वोट के वैल्यु को गंभीरतापूर्वक चिन्तन करना और आपका वैल्युएबल वोट आपके क्षेत्र के जनप्रतिनिधि बनने के लिए खड़े हुए किस प्रत्याशी को मिले – इस पर गंभीर होकर सोचना सर्वाधिक महत्वपूर्ण विषय है | प्रत्येक मतदाता के वोट में वह शक्ति है जो देश और प्रदेश की दिशा और दशा को बदल सकती है |
आज जरुरत इस बात की है कि प्रत्येक वोटर अपने वोट के वैल्यु को महसूसें तथा हर प्रकार के चुनाव में अपने-अपने मताधिकार का प्रयोग करें और याद रखें –
चुनाव के दिन रखें यह ध्यान !
जलपान से पूर्व करें मतदान !!
सभी करें अपना मतदान !!!
सभी मतदाता चुनाव केन्द्र तक चलकर जाएँ | इतनी कम दूरी तक चलना ही आपके भविष्य के सुखमय संसार को लम्बी दूरी तक ले जाएगा वरना अगले पाँच वर्षों तक असुविधाओं एवं अभावों में ही जीना होगा, रहना होगा तथा हर पल जलना होगा |
वोट के वैल्यु के बाबत जब मधेपुरा अबतक ने डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी से प्रतिक्रिया लेना चाहा तो डॉ. मधेपुरी कुछ देर के लिए मौन हो गये | फिर विश्व के महान समाजवादी चिन्तक डॉ.लोहिया के हमसफर समाजवादी मनीषी भूपेन्द्र नारायण मंडल का नाम लेते हुए उन्होंने कहा कि बंगाल के नक्श्ली आन्दोलन के समय जब कुछ समाजवादियों ने उनसे यह पूछा था कि आप अपने लोगों को हिंसक क्रांति में भाग लेने के लिए क्यों नहीं कहते हैं– के जवाब में उन्होंने यही कहा था – हाँ ! आजकल प्राय: लोग हिंसक क्रांति की बातें करने आते हैं, परन्तु उन्हें पता नहीं कि हमारे लोग हिंसक क्रांति में भाग नहीं ले सकते | जो गरीब अपने वोट का निर्भीकतापूर्वक प्रयोग नहीं कर सकता, वह भला हथियार का प्रयोग कैसे करेगा ? उसका सबसे बड़ा हथियार तो उसका वोट है | उसका सही इस्तेमाल करना अगर वह सीख गया होता तो अधिकांश समस्याओं का अबतक निदान भी हो गया होता |
और हमारे समाज, देश और प्रदेश को अबतक भरपूर ओज एवं तेज़ मिल गया होता, पौरुष एवं पुरुषार्थ हासिल हो गया होता | आज देश की राजनीति का स्वरुप ही कुछ और होता | व्यक्तिगत जीवन जीने वाले लीडर की जगह सार्वजनिक जीवन जीनेवाले की पूछ बढ़ गई होती- जो अंतिम व्यक्ति को ध्यान में रखकर कानून बनाता …….! अभी भी समय है, वोट अवश्य डालें, वोट को हथियार बनावें तथा वोट के वैल्यु को अंतर्मन की गहराई से महसूसने की कोशिश करें |
आमतौर पर चुनाव में सभी पार्टियां अपने वोटबैंक को बनाए रखने के साथ-साथ विपक्षी पार्टी (या पार्टियों) के वोटबैंक में सेंध लगाने की कोशिश करती हैं। आज के ‘तथाकथित’ लोकतंत्र में ये ‘तथ्य’ अब ‘अखंड सत्य’ की तरह स्वीकार्य है। इसका अपवाद ढूँढ़ने की कोशिश करना भी बेमानी हो चुका है। इसीलिए ये कहने में कुछ भी नया नहीं कि बिहार चुनाव में भी यही हो रहा है। नया ये है कि अब अपने वोटबैंक को जोड़ने की जगह दूसरे के वोटबैंक को तोड़ने की कोशिश ज्यादा हो रही है। केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह का ये कहना कि भाजपा का अगला मुख्यमंत्री यादव, पिछड़ा या अतिपिछड़ा होगा, इस बात का स्पष्ट प्रमाण है।
अभी हाल ही में भाजपा के वरिष्ठ नेता और केन्द्रीय मंत्री गिरिराज सिंह ने बयान दिया कि भाजपा की ओर से राज्य का अगला मुख्यमंत्री यादव, पिछड़ा या अतिपिछड़ा होगा। कोई सवर्ण मुख्यमंत्री नहीं बनेगा। गिरिराज सिंह बहुत बड़े ‘बयानवीर’ हैं और कई मौकों पर अपने बयानों से भाजपा को असहज स्थिति में डाल चुके हैं। कई बार उन्हें केन्द्रीय नेतृत्व की ‘फटकार’ भी लग चुकी है। लेकिन इस बार इतने बड़े मौके पर उन्होंने इतना बड़ा बयान दिया और पार्टी ने इसका आधिकारिक खंडन नहीं किया, इसका सीधा मतलब ये है कि उन्होंने ये बयान दिया नहीं, बल्कि उनसे दिलवाया गया है।
बिहार में मुकाबला नीतीश के नेतृत्व वाले महागठबंधन और भाजपा की अगुआई वाले एनडीए के बीच है। हालांकि कुछ पार्टियों ने ऐन चुनाव के मौके पर ‘थर्ड फ्रंट’ बनाकर और तारिक अनवर का चेहरा आगे कर मुकाबले को त्रिकोणात्मक बनाने की कोशिश की है लेकिन ऐसा कुछ होता नहीं दिख रहा। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ये थर्ड फ्रंट भाजपा के ‘पॉलिटिकल मैनेजमेंट’ और ‘सोशल इंजीनियरिंग’ का कमाल है और ऐसा नहीं है तब भी इससे सीधा फायदा उसी को हो रहा है। लेकिन इतने के बावजूद भाजपा संतुष्ट नहीं हुई और गिरिराज से इतना अहम बयान दिलवाया। भाजपा के रणनीतिकारों ने इस बयान से जुड़े तमाम पहलुओं पर शायद विचार ही नहीं किया।
यहाँ एक साथ कई सवाल उठते हैं। पहला ये कि भाजपा अगड़ों के अपने वोटबैंक को जोड़ने से ज्यादा यादव, पिछड़े या अतिपिछड़े यानि लालू-नीतीश के वोटबैंक को तोड़ने की कोशिश क्यों कर रही है..? दूसरा, क्या भाजपा का पिछड़ा मुख्यमंत्री अगड़ों को स्वीकार्य होगा..? तीसरा, अगर स्वीकार्य होगा तो क्या इसका मतलब ये है कि अगड़ों का एकमात्र विकल्प भाजपा है..? चौथा, अगर ऐसा नहीं है तो भाजपा सवर्णों को ‘टेकेन फॉर ग्रान्टेड’ क्यों मान रही है..? और पाँचवाँ, अगर मुख्यमंत्री अगड़ा, पिछड़ा या अतिपिछड़ा होगा तो सवर्णों को क्या देगी भाजपा..?
टिकट बंटवारे को देखें तो भाजपा ने दो दर्जन से ज्यादा यादव उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है। महागठबंधन से नाराज लोगों को खास तरजीह दी है। महादलितों पर तो वो मेहरबान है ही। और अब यादव, पिछड़ा या अतिपिछड़ा मुख्यमंत्री। क्या सवर्णों को लेकर भाजपा ‘ओवरकॉन्फिडेन्ट’ है..? सुशील कुमार मोदी, प्रेम कुमार (और मुस्लिम उम्मीदवार शाहनवाज हुसैन) को छोड़ मुख्यमंत्री पद के ज्यादातर उम्मीदवार – राधामोहन सिंह, राजीव प्रताप रूडी, मंगल पांडेय, सीपी ठाकुर, अश्विनी चौबे और स्वयं गिरिराज सिंह – अगड़ी जाति से आते हैं। ऐसे में भाजपा का ये दांव कहीं उलटा ना पड़ जाय। इसकी सम्भावना तब और ज्यादा हो जाती है जबकि संघ प्रमुख मोहन भागवत के ‘आरक्षण की समीक्षा’ वाले बयान को ‘अपने’ लोगों के बीच ले जाने और भुनाने में लालू और नीतीश कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं।
भाजपा के तमाम वरिष्ठ नेता बयान देते रहे हैं कि पार्टी का संसदीय बोर्ड मुख्यमंत्री पद का फैसला करेगा। तमाम व्यंग्य और उकसावों के बावजूद भाजपा ने किसी चेहरे को आगे करने की जगह चुप्पी बनाए रखी थी अब तक। कारण साफ है, वहाँ कोई ऐसा है ही नहीं जिसकी भाजपा और एनडीए में वैसी स्वीकार्यता हो जैसी महागठबंधन में नीतीश कुमार की है। ऐसे में गिरिराज से बयान दिलवाकर भाजपा का संयम तोड़ना समझ से परे है। मुख्यमंत्री किस जाति का होगा, इसमें उलझने और उलझाने से बेहतर है कि भाजपा अपने अभियान के केन्द्र में नरेन्द्र मोदी को रखकर ही आगे बढ़े।
इक्कीसवीं सदी में भी तुम नौवीं पास क्यों रह गए तेजस्वी..? जो वैसी सुविधाओं में पला हो जिनकी कल्पना तक सबके बस की बात नहीं… राज्य से लेकर केन्द्र तक जिसके परिवार की तूती बोलती हो… जिसके घर में पिता ही नहीं माँ के भी मुख्यमंत्री होने का बिरला संयोग हो… जिसमें एक बड़ी राजनीतिक पार्टी अपना भविष्य देख रही हो… जिसे आज के युवा-सपनों का प्रतीक बनाकर लाखों लोगों के बीच मंच पर खड़ा किया जा रहा हो, वो केवल नौवीं पास होकर रह जाय, तो सवाल उठेंगे ही। यहाँ बात लालू प्रसाद यादव के छोटे बेटे तेजस्वी यादव की हो रही है जिनकी सम्पत्ति तो करोड़ों में है लेकिन जाने किस मजबूरी में वो नौवीं पास हैं केवल..!
कम पढ़ा होना गुनाह नहीं। ऐसे सैकड़ों उदाहरण हैं जब कम पढ़े-लिखे और यहाँ तक कि अनपढ़ लोगों ने भी इतिहास में अपना नाम दर्ज कराया है। अनपढ़ होने के बावजूद अकबर बादशाह हुए और कागज ना छूने के बावजूद कबीर ने घर-घर में जगह बनाई। लेकिन उनके साथ क्या परिस्थितियां रहीं और उनके सामने कैसी चुनौतियां थीं, ये भी इतिहास में दर्ज है। आज हम इक्कीसवीं सदी में हैं और ग्वोवलाइजेशन के दौर में दुनिया जहाँ छोटी हुई है वहीं जीवन और जटिल हो गया है। ऐसे में तेजस्वी जैसे युवा का केवल नौवीं पास होना हैरान करता है।
आरजेडी सुप्रीमो ने इस बार अपने दोनों बेटों को चुनाव-मैदान में उतारा है। छोटे बेटे तेजस्वी राघोपुर से भाग्य आजमा रहे हैं जहाँ से लालू और राबड़ी दो-दो बार एमएलए रह चुके हैं। शनिवार, 3 अक्टूबर को उन्होंने अपना नामांकन भरा। नामांकन-पत्र के साथ दायर हलफनामे के अनुसार वे दिल्ली के जाने-माने स्कूल डीपीएस से केवल नौवीं पास हैं और पेशे से समाजसेवी और व्यवसायी हैं। मैट्रिक करने में वो भले ही सफल ना हो पाए हों लेकिन ‘व्यवसाय’ में उन्होंने जरूर सफलता पाई है। 2014-15 के सालाना आयकर रिटर्न में उनकी आमदनी 5 लाख से ज्यादा बताई गई है और उनकी कुल सम्पत्ति है 1 करोड़ 40 लाख रुपये। हलफनामे के अनुसार अलग-अलग बैंकों में तेजस्वी के सात अकाउंट हैं और उन्होंने कई कम्पनियों में निवेश कर रखा है। उनके पास दस तोले सोने की ज्वेलरी और 1 लाख बीस हजार नकद हैं। 34 लाख रुपये का बैंक लोन भी है उनके ऊपर।
दुनिया जानती है कि तेजस्वी के पिता लालू प्रसाद यादव अत्यन्त साधारण परिवार से आते हैं। उनका बचपन संघर्षों में बीता। मुख्यमंत्री होने तक वो अपने बड़े भाई के चपरासी क्वार्टर में रहे और उनके ज्यादातर बच्चे वहीं हुए। तमाम विपरीत परिस्थितियों और छात्र-जीवन में ही राजनीति में कूद पड़ने के बावजूद वो ना केवल पटना यूनिवर्सिटी से पॉलिटिकल साइंस में एमए हैं बल्कि एलएलबी की डिग्री भी है उनके पास। रेलमंत्री के रूप में उनके सफल प्रयोगों के बाद बड़ी-बड़ी जगहों से उन्हें मैनेजमेंट के छात्रों को ‘पढ़ाने’ के बुलावे आए और बाकायदा जाकर उन्होंने ‘पढ़ाया’ भी। ऐसे में उनकी अगली पीढ़ी से उनके आगे नहीं तो उनके बराबर या कम-से-कम उनके आसपास होने की उम्मीद तो होगी ही।
एक तर्क हो सकता है कि तेजस्वी क्रिकेटर रहे हैं और इस कारण पढ़ाई पर कम ध्यान दे पाए। अगर उन्होंने क्रिकेट में ही करियर बनाया होता तो ये तर्क स्वीकार सहज स्वीकार्य होता। आज 12वीं पास तेन्दुलकर से भला कौन पूछेगा कि उन्होंने आगे की पढ़ाई क्यों नहीं की। लेकिन जब क्रिकेट में तेजस्वी का करियर नहीं बना और राजनीति में भी उन्हें संघर्ष करना पड़ा हो अब तक, ऐसा नहीं कहा जा सकता, तब घर का ऐसा कौन-सा भार था उनके ऊपर कि वे पढ़ाई की जगह तथाकथित ‘व्यवसाय’ में लग गए और पिता लालू या माँ राबड़ी ने उन्हें डाँटा नहीं..?
अक्सर किसी का पढ़ना, कम पढ़ना या ना पढ़ना सामाजिक स्थितियों पर निर्भर करता है। शिक्षा या ज्ञान के स्तर के अनुपात में ही कोई समाज ऊँचा उठता है और जब आप समाज के सबसे ऊँचे पायदान पर हों तब पढ़ना बहुत हद तक आपकी सामाजिक जिम्मेदारी हो जाती है क्योंकि तब आप हजारों-लाखों के ‘रोल मॉडल’ हो जाते हैं। इसीलिए ये सवाल उठेगा भी और गूँजेगा भी कि इक्कीसवीं सदी में भी तुम नौवीं पास क्यों रह गए तेजस्वी..?
प्री.पी-एच.डी. हेतु हिन्दी, उर्दू, गणित सहित कुल 19 विषयों में 2011-2012 की 3 अक्टूबर 2015 से होने वाली परीक्षा अपरिहार्य कारणवश स्थगित कर दी गयी है |
आगे परीक्षा नियंत्रक डॉ.नवीन कुमार ने मधेपुरा अबतक को बताया कि कुलपति डॉ.विनोद कुमार के निदेशानुसार इस परीक्षा के प्रारंभ किये जाने की अब नई तिथि 23 नवम्बर 2015 से होगी तथा परीक्षा का प्रोग्राम सम्बन्धित विभागाध्यक्ष से प्राप्त किया जा सकता है | उन्होंने बताया कि इन परीक्षाओं का आयोजन विभागाध्यक्षों के अधीन होगा तथा जो छात्र फार्म नहीं भर सके हैं वे विलम्ब शुल्क के साथ 10 अक्टूबर तक परीक्षा प्रपत्र भर सकते हैं |
राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी जयन्ती के अवसर पर तुलसी पब्लिक स्कूल द्वारा भव्य समारोह का आयोजन कर अभयानंद मैथेमेटिक्स आलम्पियाड-2015 में शरीक हुए जिले के 60 पब्लिक स्कूल के लगभग तीन हजार प्रतिभागी छात्रों में से 96 से 100 फीसदी अंक प्राप्त कर सर्वाधिक गोल्ड मैडल जीतनेवाले इसी स्कूल के 28 छात्रों को मधेपुरा के प्रखर शिक्षाविद एवं समाजसेवी डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी द्वारा पुरस्कृत किया गया | निदेशक श्यामल कुमार सुमित्र द्वारा यह जानकारी दी गई कि सौ फीसदी अंक लाने वाले वर्ग दो के ललन एवं सुजल तथा वर्ग चार के सुमन एवं सोनू के भविष्य निर्माण की दिशा में जिले के प्रथम एस.पी. रहे अभयानन्द ने कुछ विशेष मदद की बातें कही हैं |
Dr.Madhepuri bestowing rewards to the winners of Abhayanand Mathematics Olympiad 2015.
छात्रों को पुरस्कृत करने के बाद अपने संबोधन में डॉ. मधेपुरी ने कहा कि भगवान् बुद्ध एवं ईसा मसीह के बाद यदि संसार के मनावजाति को कोई महामानव सर्वाधिक प्रभावित किया है तो वह हैं हमारे पूज्य बापू महात्मा गाँधी एवं उनके द्वारा विश्व को दिया गया सत्य-अहिंसा और शांति का संदेश | गांधीयन विचार पर विस्तार से बोलने के बाद अन्त में उन्होंने कहा कि आज ही के दिन ‘जय जवान जय किसान’ के उद्घोषक प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का भी जन्मदिन है | आज देश उन्हें भी नमन करता है |
समारोह की अद्यक्षता निदेशक श्यामल कुमार सुमित्र ने किया | इस अवसर पर शिक्षक विभीषण कुमार, वरुण कुमार, मनोज कुमार एवं निर्मल कुमार सहित रेणु कुमारी, रोजी-मनीषा, रिया, मन्नू जी, गजाला प्रवीण, प्रियंका कुमारी आदि उपस्थित थी | तुलसी पब्लिक स्कूल के प्राचार्य डॉ.हरिनंदन यादव ने विचार व्यक्त करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया |