आज संसद में ‘असहिष्णुता’ का मुद्दा गूंजेगा। माकपा सांसद पी करुणाकरण और कांग्रेस सांसद केसी वेणुगोपाल ने ‘असहिष्णुता’ के मुद्दे पर लोकसभा में चर्चा के लिए नोटिस दिया था जिसे लोकसभा अध्यक्ष सुमित्रा महाजन ने स्वीकार कर लिया। ये विषय आज की सूची में है। बता दें कि दोनों विपक्षी सांसदों ने नियम 193 के तहत नोटिस दिया था। इस नियम के तहत वोटिंग का प्रावधान नहीं होता।
कन्नड़ लेखक एमएम कलबुर्गी की हत्या के बाद से ‘असहिष्णुता’ का मुद्दा प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में छाया हुआ है। आशंका जताई गई कि उनकी हत्या के पीछे स्थानीय दक्षिणपंथी समूहों का हाथ है क्योंकि वे कलबुर्गी के मूर्तिपूजा और ‘अंधविश्वास’ विरोधी रुख से भड़के हुए थे। इस ‘असहिष्णुता’ के खिलाफ दर्जनों साहित्यकारों, कलाकारों और फिल्मकारों ने अपने पुरस्कार लौटा दिए। पुरस्कार वापसी का जैसे दौर ही चल पड़ा। इन बुद्धिजीवियों का कहना था कि देश का माहौल बिगड़ रहा है पर सरकार ने ‘चुप्पी’ साध रखी है। उनके हिसाब से देश की ‘नई’ सरकार ‘असहिष्णुता’ को मौन समर्थन दे रही है। ऐसे में सरकार के दिए पुरस्कार को रखना उन्हें सरकार से सहमति जताना प्रतीत हुआ और उसे लौटा देने में विरोध का नया रास्ता दिखा।
बुद्धिजीवियों का एक खेमा पुरस्कार वापस कर सुर्खियां बटोर रहा था तो दूसरा खेमा पुरस्कारवापसी के विरोध में सामने आया। इस खेमे ने पुरस्कारवापसी को ‘छद्म’ विरोध कहा और तर्क दिया कि देश इससे पहले भी और अभी से कहीं ज्यादा बुरे दौर से गुजरा है, तब ये विरोध करने वाले कहाँ थे? 1977 के आपातकाल और 1984 के सिख विरोधी दंगे के समय उन्हें ‘असहिष्णुता’ क्यों नहीं दिखी? इस खेमे का एक तर्क ये भी है कि जो पुरस्कार लौटाए जा रहे हैं वो किसी सरकारविशेष से नहीं बल्कि देश से मिला ‘सम्मान’ है जो उन्हें उनकी ‘प्रतिभा’ और ‘योगदान’ के कारण मिला है। किसी पुरस्कार का ‘प्रशस्ति-पत्र’ लौटाया जा सकता है लेकिन उससे जुड़ी ‘पहचान’ और ‘प्रसिद्धि’ भी क्या लौटायी जा सकती है?
प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को इस ‘असहिष्णुता’ में ‘मसला’ और ‘मसाला’ दोनों दिखा। अखबार, पत्रिकाएं और चैनल इससे जुड़ी खबरों से पट गए। राजनीतिक मंचों पर भी इस मुद्दे ने बड़ी तेजी से अपनी जगह बनाई। ‘दल’ और ‘नेता’ इससे जुड़े तो माहौल और भी तल्ख हो चला। इन्हीं सब के बीच 24 नवम्बर को बॉलीवुड के बड़े स्टार आमिर खान का देश छोड़ने वाला बयान आया और ‘असहिष्णुता’ के मुद्दे ने नए सिरे से तूल पकड़ लिया। आमिर के बयान की आलोचना, निंदा और समर्थन की बाढ़ आ गई। गृहमंत्री राजनाथ सिंह को भी संसद में इसका जिक्र (बिना आमिर का नाम लिए) छेड़ना पड़ा। जाहिर है कि उनकी या केन्द्र सरकार की सहमति आमिर से या इस ‘असिहष्णुता’ से नहीं हो सकती।
आमिर ने कहा था कि “पिछले छह से आठ महीने में असुरक्षा और भय की भावना बढ़ी है। कई घटनाओं ने उन्हें चिन्तित किया है। यहाँ तक कि उनकी पत्नी किरण राव को प्रतिदिन समाचारपत्र खोलने से डर लगता है और वो कहती हैं कि क्या हमें भारत से बाहर चले जाना चाहिए? उन्हें अपने बच्चे की चिन्ता है।” इस बयान पर शत्रुघन सिन्हा ने बहुत महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कि अगर भारत में ‘असहिष्णुता’ होती तो आमिर की ‘पीके’ जैसी फिल्म इतनी बड़ी हिट नहीं होती। खैर, आमिर के इस बयान का असर 25 नवम्बर को हुई संसद की सर्वदलीय बैठक में भी दिखा। विपक्षी दलों ने कहा कि इस मुद्दे पर जल्द से जल्द चर्चा होनी चाहिए। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने भी कहा था कि उनकी पार्टी देश में बढ़ रही ‘असहिष्णुता’ का मुद्दा उठाएगी। उनका कहना था कि देश में होने वाली घटनाएं शांति खत्म कर रही हैं लेकिन प्रधानमंत्री मोदी फिर भी चुप हैं।
‘असहिष्णुता’ पर आज बस बयानबाजी और खेमेबाजी हो रही है। हर कोई अपने-अपने ‘पैमाने’ से इसे मापने में लगा हुआ है और विडंबना ये है कि कोई भी ‘पैमाना’ सौ फीसदी भरोसे के लायक नहीं है। साहित्यकार, कलाकार, फिल्मकार से लेकर सरकार तक अपने-अपने ‘समय’ और ‘संस्कार’ को बस जाया कर रहे हैं। देश की बेहतरी के लिए ऐसे हजार मुद्दे पड़े हैं जिन पर चर्चा और बहस होनी चाहिए लेकिन हो नहीं रही। सच तो ये है कि इस ‘असहिष्णुता’ पर अपनी ‘रोटी’ सेकना ही सबसे बड़ी ‘असहिष्णुता’ है।
महात्मा गांधी ने सफाई को परिभाषित करते हुए कहा था कि सभी चीजों का अपनी-अपनी जगह पर रहना ही सफाई है। ठीक इसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि देशहित में सभी का अपने-अपने काम में लगे रहना ही ‘सहिष्णुता’ है। अगर सभी ‘ईमानदारी’ से अपना काम कर रहे हों तो कभी किसी ‘कलबुर्गी’ को अमानवीयता का शिकार नहीं होना पड़ेगा और ना ही किसी ‘असहिष्णुता’ का प्रश्न उठेगा। जब तक हम स्वार्थ और संकीर्णता से जकड़े रहेंगे, तब तक ‘असहिष्णुता’ जैसा कोई मुद्दा संसद में आता रहेगा।
मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप


























