जी हां, भारत की ऋणी है 5जी तकनीक

टेक्नोलॉजी दिन-ब-दिन बदल रही है। अभी हम 3जी से 4जी की ओर कदम बढ़ा ही रहे थे कि 5जी ने दस्तक दे दी। वह दिन दूर नहीं जब 5जी के जरिए सुपरफास्ट इंटरनेट इस्तेमाल किया जा सकेगा। मगर क्या आप जानते हैं कि ये 5जी तकनीक भारत की ऋणी है? जी हां, ये भारत के अमर वैज्ञानिक जगदीश चंद्र बोस थे, जिनके 100 साल से भी पहले किए प्रयोगों के कारण दुनिया 5जी से रू-ब-रू हो सकेगी।

30 नवंबर 1858 को मयमन सिंह (अब बांगलादेश में) में जन्मे सर जगदीश चंद्र बोस कलकत्ता यूनिवर्सिटी में भौतिकी की पढ़ाई करने के बाद कैब्रिज यूनिवर्सिटी गए थे। आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि बोस मिलीमीटर वेवलेंग्थ (30 GHz से 300 GHz स्पेक्ट्रम) के जरिए रेडियो का प्रदर्शन करने वाले पहले शख्स थे। उन्होंने 5mm की इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगे पैदा की थीं जिसकी फ्रिक्वेंसी 60GHz थी। यह उपलब्धि उन्होंने उस वक्त हासिल की थी जब इतनी लो फ्रिक्वेंसी को मापने वाले उपकरण भी ईजाद नहीं हुए थे। बहरहाल, जिन मिलीमीटर तरंगों पर जगदीश चंद्र बोस ने काम किया था, वही आज 5जी तकनीक को विकसित करने में मददगार साबित हो रही है।

बोस की ये मिलीमीटर तरंगें और भी कई रूपों में इस्तेमाल हो रही हैं। रेडियो टेलिस्कोप से लेकर रडार तक में इसका इस्तेमाल किया जाता है। कारों के कोलिजन वॉर्निंग सिस्टम या क्रूज कंट्रोल में भी इसका प्रयोग होता है। इस महान वैज्ञानिक ने क्रिस्टल रेडियो डिटेक्टर, वेवगाइड, हॉर्न एंटीना जैसे कई उपकरणों का आविष्कार किया था, जिनका इस्तेमाल माइक्रोवेव फ्रिक्वेंसीज में होता है।

JC Bose
JC Bose

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मधेपुरा में होगा ‘बिहार दिवस’ पर दो दिवसीय आयोजन- डीएम

डायनेमिक डीएम मो.सोहैल (भा.प्र.से.) के निर्देशानुसार ‘बिहार दिवस’ पर दो दिवसीय (22-23मार्च को) उत्सवी कार्यक्रमों के विभिन्न आयोजनों के क्रियान्वयन का निर्णय विगत दिनों समाहरणालय सभागार में लिया गया।

यह भी बता दें कि उन आयोजनों में दीप प्रज्वलन, खेलकूद, वृक्षारोपण एवं रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों को भी शामिल किया गया है।

जहाँ एक ओर 22 मार्च की सुबह स्कूली बच्चों एवं स्काउट एंड गाइड के कैडेटों द्वारा बी.एन.मंडल स्टेडियम से निकलकर शहर के मुख्य मार्गों पर प्रभात फेरी निकाली जायेगी, सरकारी कार्यालयों में पौध-रोपण किया जायेगा और दोपहर में स्टेडियम मैदान में खेल-कूद व विकास मेले का आयोजन किया जायेगा- जिसमें कृषि विभाग सहित अन्य विभागों के स्टॉल होंगे, वहीं बिहार दिवस के उपलक्ष में शहर व गाँव के लोग अपने-अपने घर-द्वार की सफाई कर शाम में यथाशक्ति दीप जलाकर संध्या 6:00 बजे से स्टेडियम मैदान में स्थानीय स्कूली बच्चे एवं स्थापित कलाकारों द्वारा प्रदर्शित किये जानेवाले सांस्कृतिक कार्यक्रमों के उत्सवी माहौल में रसास्वादन करेंगे, वहीं दूसरी ओर 23 मार्च को स्थानीय कलाकारों द्वारा रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रमों के आयोजन के बाद प्रिया राज एंड पार्टी द्वारा भव्य कार्यक्रम पेश किया जायेगा।

यूँ तो संगीत की दुनिया में प्रियाराज अब किसी परिचय का मोहताज नहीं, फिर भी बाल कलाकारों को ये जानकारी दे देना सर्वथा उचित है कि बिहार की बेटी यह ‘प्रियाराज’ पद्मश्री शारदा सिन्हा के साथ मंच शेयर करती हुई रियल्टी शो में ‘सुर-संग्राम’ सेलिब्रिटी एवं ‘भारत की शान’ सेलिब्रिटी बनकर मुंबई में भी अपना परचम लहरा चुकी है।

विकासोन्मुखी डायनेमिक डीएम मो.सोहैल ने जिले के तेरहों प्रखंड मुख्यालयों में बिहार दिवस के बाबत भव्य आयोजन करने हेतु सभी  बीडीओ को निर्देशित किया है। डीएम ने प्रत्येक प्रखंड के भवनों को नीली रोशनी से सजाने का निर्देश देते हुए यह भी कहा है कि इसके लिए प्रत्येक प्रखंड को राशि भी निर्गत की जा रही है।

बैठक में उपविकास आयुक्त मिथिलेश कुमार, अनुमंडल पदाधिकारी संजय कुमार निराला सहित डॉ.रविरंजन, प्रो.रीता कुमारी, प्रियाराज, प्रो.प्रदीप कुमार झा, उपेन्द्र प्रसाद यादव, रेखा यादव आदि अन्य उपस्थित थे।

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यूपी में विधिवत शुरू हुआ ‘योगीराज’

यूपी में योगीराज की विधिवत शुरुआत हो गई। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में नई कैबिनेट ने शपथ ले ली। राज्यपाल राम नाईक ने मुख्यमंत्री और उनके कैबिनेट व राज्य मंत्रियों को पद और गोपनीयता की शपथ दिलाई। भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और लखनऊ के पूर्व मेयर दिनेश शर्मा ने उपमुख्यमंत्री पद की शपथ ली। लखनऊ के कांशीराम स्मृति उपवन में आयोजित शपथग्रहण समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह समेत 13 राज्यों के मुख्यमंत्री, 15 केंद्रीय मंत्री और दर्जनों सांसद मौजूद रहे। परंपरा निभाते हुए प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और उनके पिता मुलायम सिंह यादव भी शपथग्रहण समारोह में शामिल हुए।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री समेत कुल 49 सदस्यीय मंत्रिमंडल में कुल 17 ओबीसी, 8 ब्राह्मण, 8 कायस्थ-वैश्य, 7 ठाकुर, 6 अनुसूचित जाति और 2 जाट को जगह मिली है। 403 में से एक भी सीट पर किसी मुस्लिम को उम्मीदवारी न देने वाली भाजपा ने मंत्रिमंडल में एक मुस्लिम चेहरे को भी रखा है। वहीं, ओबीसी मंत्रियों में एक यादव को जगह मिली है। यादव और मुस्लिम के इन सांकेतिक चेहरों को राज्यमंत्री के तौर पर शपथ दिलाई गई। गृहमंत्री राजनाथ सिंह के बेटे पंकज सिंह का नाम आश्चर्यजनक रूप से मंत्रियों की सूची में नहीं है। हां, लालजी टंडन के बेटे आशुतोष टंडन अपना स्थान बनाने में जरूर सफल रहे। महिलाओं में कांग्रेस से आईं रीता बहुगुणा जोशी ने कैबिनेट मंत्री के तौर पर तो महज कुछ महीने पहले और वो भी आकस्मिक रूप से राजनीति में आईं स्वाति सिंह ने स्वतंत्र प्रभार वाली राज्य मंत्री के तौर पर अपनी जगह बनाई।

बहरहाल, योगी कैबिनेट में स्थान पाने वाले कैबिनेट मंत्रियों के नाम इस प्रकार हैं – सूर्य प्रताप शाही, सुरेश खन्ना, स्वामी प्रसाद मौर्य, सतीश महाना, राजेश अग्रवाल, रीता बहुगुणा जोशी, दारा सिंह चौहान, धर्मपाल सिंह, एस. पी. सिंह बघेल, सत्यदेव पचौरी, रमापति शास्त्री, जय प्रकाश सिंह, बृजेश पाठक, ओम प्रकाश राजभर, लक्ष्मी नारायण चौधरी, चेतन चौहान, श्रीकांत शर्मा, राजेन्द्र प्रताप सिंह (मोती सिंह), सिद्धार्थ नाथ सिंह, मुकुट बिहारी वर्मा, आशुतोष टंडन और नंद गोपाल गुप्ता ‘नंदी’।

स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री के तौर पर जिन लोगों को स्थान मिला, वे हैं – अनुपमा जायसवाल, सुरेश राणा, उपेंद्र तिवारी, महेंद्र सिंह, स्वतंत्रदेव सिंह, भूपेंद्र सिंह चौधरी, धरम सिंह सैनी, स्वाति सिंह और अनिल राजभर। वहीं राज्य मंत्री के रूप में गुलाब देवी, बलदेव औलख, अतुल गर्ग, संदीप सिंह, मोहसिन रजा, अर्चना पाण्डे, रणवेंद्र प्रताप सिंह (घुन्नी सिंह), मन्नु कोरी, ज्ञानेंद्र सिंह, जय प्रकाश निषाद, गिरीश यादव, संगीता बलवंत, नीलकंठ तिवारी, जयकुमार सिंह जैकी और सुरेश पासी को जगह मिली।

                                                                                ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ.ए. दीप

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योगी को मिला यूपी, साथ में दो ‘डिप्टी’ भी

हवा में तैर रहे कई नामों को एक झटके में किनारे कर भाजपा आलाकमान ने ‘फायरब्रांड’ सांसद योगी आदित्यनाथ को यूपी की कमान सौंप दी। शनिवार को विधायक दल की बैठक में उन्हें औपचारिक तौर पर नेता चुन लिया गया। बतौर मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के चयन के साथ ही यूपी भाजपा के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य और लखनऊ के पूर्व मेयर दिनेश शर्मा के रूप में दो उपमुख्यमंत्री बनाने की घोषणा भी की गई। सत्ता के शीर्ष पर दो अगड़ों (योगी राजपूत हैं और शर्मा ब्राह्मण) के साथ एक पिछड़े (ओबीसी मौर्य) को आगे कर जातिगत समीकरण साधने की भी भरसक कोशिश की गई है।

उत्तराखंड में त्रिवेन्द्र सिंह रावत के रूप में राजपूत चेहरा चुनने के बाद ऐसे कयास लगाए जा रहे थे कि यूपी में गैर सवर्ण सीएम चुना जाएगा। इस लिहाज से केशव प्रसाद मौर्य रेस में आगे निकलते दिख रहे थे, लेकिन यूपी में हिन्दुत्ववादी राजनीति का चेहरा होना योगी आदित्यनाथ के पक्ष में गया। पार्टी आलाकमान ने शनिवार सुबह अचानक योगी को दिल्ली बुला लिया। इसके बाद राज्य भर में ये ख़बर फैलते देर न लगी कि योगी ही प्रदेश के मुखिया होने जा रहे हैं।

गौरतलब है कि योगी आदित्यनाथ का मूल नाम अजय सिंह है। उनका जन्म 5 जून 1972 को वर्तमान उत्तराखंड के गढ़वाल में हुआ था। उन्होंने 22 साल की उम्र में संन्यास लिया और 26 साल की उम्र में गोरखपुर से सांसद बने। 1998 से 2014 के बीच वे इस सीट से लगातार पांच बार लोकसभा पहुंचे। लव जिहाद और धर्मांतरण जैसे मुद्दों से चर्चा में रहने वाले गोरखपुर मंदिर के महंत योगी का पूर्वांचल में अच्छा प्रभाव माना जाता है। इसके अतिरिक्त भाजपा केन्द्रीय नेतृत्व में पहुंच का भी उन्हें लाभ मिला।

अब बात करें केशव प्रसाद मौर्य की। 7 मई 1969 को कौशांबी जिले में जन्मे मौर्य वर्तमान में फूलपुर से सांसद हैं। विश्व हिन्दू परिषद के दिवंगत नेता अशोक सिंघल के करीबी रहे मौर्य ने एक समय चाय और अखबार भी बेचा है। कार्यकर्ताओं में उनकी अच्छी पहुंच मानी जाती है और संघ से उनके अच्छे रिश्ते हैं। उन्हें जातिगत समीकरणों और प्रमुख पिछड़ा चेहरा होने का अतिरिक्त लाभ भी मिला। इससे भी इनकार नहीं किया जा सकता कि उनके नेतृत्व में ही पार्टी ने यूपी की सत्ता में वापसी की है।

दूसरे उपमुख्यमंत्री दिनेश शर्मा का जन्म 12 फरवरी 1964 को हुआ था। वे लखनऊ विश्वविद्यालय में प्रोफेसर और पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। 2008 और 2012 में वे लखनऊ के मेयर रहे। 2014 में उऩ्हें भाजपा का राष्ट्रीय सदस्यता प्रभारी बनाया गया। भाजपा सदस्यों की संख्या 1 करोड़ से 11 करोड़ तक पहुंचाने में उनका बड़ा योगदान माना जाता है। उनकी छवि साफ-सुथरी और मिलनसार है और नरेन्द्र मोदी व अमित शाह दोनों के वे करीबी माने जाते हैं। संघ से भी उनका जुड़ाव रहा है और पार्टी के ब्राह्मण चेहरे तो वो हैं ही।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सुषमा अगली राष्ट्रपति होंगी और जेटली उपराष्ट्रपति !

उत्तर प्रदेश के भावी मुख्यमंत्री की तरह ही राजनीतिक गलियारों में देश के अगले राष्ट्रपति को लेकर भी अटकलें हैं। वैसे तो भाजपा के सक्रिय नेताओं में वरिष्ठतम और कद में अटल बिहारी वाजपेयी के समकक्ष भूतपूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को देश के सर्वोच्च पद का सबसे बड़ा दावेदार माना जा रहा है और उनके साथ-साथ वाजपेयी-आडवाणी के साथ त्रिमूर्ति के तौर पर शुमार भूतपूर्व मानव संसाधन विकास मंत्री मुरली मनोहर जोशी का नाम भी चर्चा में था, पर इन दोनों नेताओं के अतिरिक्त इस पद के लिए अचानक एक और नाम हवा में तैरने लगा है, और वो नाम है विदेश मंत्री सुषमा स्वराज का। कहा यह भी जा रहा है कि वित्तमंत्री अरुण जेटली देश के अगले उपराष्ट्रपति हो सकते हैं।

सुषमा स्वराज का नाम सामने आने के पीछे दो बड़े कारण बताए जा रहे हैं। पहला, उनका महिला होना और दूसरा मार्गदर्शक मंडल में शामिल नेताओं को सांकेतिक महत्व तक ही सीमित रखने की मोदी की रणनीति। सबको हैरान करने की राजनीति में यकीन रखने वाले मोदी अगर ये दांव भी चल दें तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। वैसे भी सुषमा की योग्यता पर प्रश्नचिह्न उठाना संभव नहीं, महिला सशक्तिकरण का नारा भी उनसे बुलंद होगा ही और रही बात वरिष्ठता की तो आडवाणी-जोशी के ठीक बाद वाले पायदान पर तो वो खड़ी हो ही सकती हैं।

सूत्रों के मुताबिक एक और चौंकाने वाली ख़बर यह भी है कि देश के वित्त मंत्री (और अब रक्षामंत्री भी) अरुण जेटली को अगला उपराष्ट्रपति बनाया जा सकता है। कहने की जरूरत नहीं कि जेटली केन्द्र सरकार के ताकतवर और मोदी के भरोसेमंद मंत्रियों में एक हैं।

गौरतलब है कि अगले राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति पद के लिए चुनाव जुलाई-अगस्त में संभावित है। अगर ऊपर दी गई जानकारियां सही साबित होती हैं तो मोदी मंत्रिमंडल का पूरा चेहरा ही बदल जाएगा। रक्षामंत्री मनोहर पर्रिकर पहले ही गोवा जा चुके हैं और गृहमंत्री राजनाथ सिंह को यूपी भेजे जाने की चर्चा जोरों पर है। यानि मोदी मंत्रिमंडल में मोदी के कद के आसपास भी कोई नहीं होगा। दूसरे शब्दों में मोदी मंत्रिमंडल को मोदीमय करने की तैयारी है ये।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जेडीयू का ‘गर्दा उड़ाने’ को क्यों उतारू हैं रघुवंश?

आरजेडी के वरिष्ठ नेता व उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने एक बार फिर जेडीयू और नीतीश कुमार पर आपत्तिजनक टिप्पणी की है। इस टिप्पणी के बाद बिहार महागठबंधन में दरार पड़ने की आशंकाओं को भी बल मिलने लगा है। हालांकि पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने रघुवंश के बयान को फूहड़ बताते हुए आपत्ति जताई है और उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी चेतावनी के लहजे में कहा है कि इसकी पुनरावृत्ति होने पर वे आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव से शिकायत करेंगे।

गौरतलब है कि रघुवंश प्रसाद सिंह ने यूपी विधानसभा चुनाव परिणाम को लेकर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर उंगली उठाई थी। उन्होंने आरोप लगाया था कि नीतीश द्वारा नोटबंदी का समर्थन करने और यूपी चुनाव के दौरान इस विषय पर चुप्पी साधने से भाजपा को चुनाव में फायदा हुआ। उन्होंने यह भी कहा था कि नीतीश के यूपी में सपा और कांग्रेस गठबंधन के लिए चुनाव-प्रचार नहीं करने से महागठबंधन कमजोर हुआ है। ध्यान रहे कि नीतीश के स्टैंड से एकदम अलग लालू ने यूपी में सपा-कांग्रेस के समर्थन में जमकर प्रचार किया था।

बहरहाल, जेडीयू ने रघुवंश के आरोप पर तीखी प्रतिक्रिया की। पार्टी के प्रवक्ता और विधान परिषद सदस्य संजय सिंह ने लालू से रघुवंश के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। यहां तक कि उन्होंने रघुवंश को ‘शिखंड’ तक कह डाला। बताया जाता है कि जेडीयू के दो वरिष्ठ मंत्रियों –  बिजेन्द्र प्रसाद यादव एवं राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन सिंह – ने भी आरजेडी नेतृत्व से रघवंश प्रसाद सिंह को बेतुकी बयानबाजी से रोकने को कहा। इस पर रघुवंश ने बुधवार को एक बार फिर नीतीश कुमार पर हमला बोल दिया। उन्होंने कहा, ‘बिहार के मुख्यमंत्री अपने लोगों को मेरे खिलाफ गाली-गलौज करने के लिए उकसा रहे हैं। अगर पार्टी अलाकमान आदेश दे तो मारकर गर्दा उड़ा देंगे।‘

जाहिर है कि रघुवंश प्रसाद सिंह ने संजय सिंह की आपत्तिजनक टिप्पणी (शिखंडी) का जवाब भी उतने ही आपत्तिजनक तरीके से दिया। वैसे भी इन दिनों वे लगातार नीतीश और जेडीयू के खिलाफ हमलावर रुख दिखाते रहे हैं। यूपी चुनाव में भी उन्होंने नीतीश कुमार पर हमला बोलते हुए उनपर बीजेपी के साथ मैच‘फिक्स’करने का आरोप लगाया था। इसके अलावा नीतीश कुमार ने जब नोटबंदी के कदम की सराहना की थी तब भी रघुवंश प्रसाद सिंह ने उन्हें खरीखोटी सुनाने में कोई कसर नहीं रखी थी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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डॉ.संजीव की रिकार्ड तोड़ जीत

बिहार विधान परिषद की 4 सीटें-कोसी शिक्षक, सारण स्नातक एवं गया के दोनों यानि ये चारों सीटें 8 मई को रिक्त हो रही हैं | जिनके कार्यकाल पूरे हो रहे हैं- वे हैं गया स्नातक से विधान परिषद के सभापति अवधेश नारायण सिंह, कोसी शिक्षक से संजीव कुमार सिंह, गया शिक्षक से संजीव श्याम सिंह और सारण स्नातक सीट से महाचंद्र सिंह जिनके इस्तीफे से सीट पूर्व से ही रिक्त है |

यह भी जानिये कि  सारण स्नातक से 18, गया स्नातक से 17, गया शिक्षक से 10 और कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से मात्र 3 प्रत्याशियों के भाग्य का फैसला आज देर शाम तक होगा |

Dr.Indubala Singh , former Vice Chancellor of BN Mandal University & Principal of Purnea Mahila College Purnea & others celebrating the grand victory of MLC Dr.Sanjeev Kumar Singh.
Dr.Indubala Singh , former Vice Chancellor of BN Mandal University & Principal of Purnea Mahila College Purnea & others celebrating the grand victory of MLC Dr.Sanjeev Kumar Singh.

कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र में 14 जिले शामिल हैं | कुल 157 मतदान केंद्रों पर 14040 मतदाताओं ने 3 उम्मीदवारों के बीच 87% (यानि 12,015 वोट डाले | यह भी जानिए कि किये गये मतदान के बाबत इन चौदहों जिलों में प्रथम आया किशनगंज (89.62%) और न्यूनतम लाया मधेपुरा (79.42%) |

जब इन आंकड़ों के साथ डॉ.भूपेन्द्र नारायण यादव मधेपुरी से टिप्पणी करने को कहा गया तो डॉ.मधेपुरी ने कहा कि “डॉ.संजीव कुमार सिंह अपने पिताश्री की तरह ही चुनाव जीतने के दूसरे दिन से अगले चुनाव की तैयारी में मौन तपस्वी की तरह साधनारत हो जाता है | वह कभी नहीं सोचता कि अगला चुनाव कई वर्षों के बाद होगा बल्कि हर रोज वह यही सोचा करता है कि अगले चुनाव में केवल……. इतने ही दिन शेष रह गए हैं | पिता-पुत्र के जीवन का मूल-मंत्र भी यही रहा है ……….जो सुख में सुमिरन करे, दुख काहे को होय ||”

…….तो लीजिए रिजल्ट सुना ही दिया रिटर्निंग ऑफिसर ने | कुल मतदाताओं की  संख्या- 14,040 ; कुल वैध मत 11029

डॉ.संजीव कुमार सिंह को मिला- 8309 मत

डॉ.जगदीश चन्द्रा को मिला- 2296 मत

श्री नीतेश कुमार को मिला- 424 मत

कुल तीन प्रत्याशियों में से एक ने तो अपनी जमानत गवां दी और दूसरे ने जमानत किसी तरह बचा ली | महागठबंधन ने शानदार तरीके से कोसी में अपना परचम लहराया |

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यूपी में सबको फिर चौंकाने की तैयारी में मोदी !

यूपी में भाजपा की अभूतपूर्व जीत के बाद मोदी एक बार फिर सबको चौंका सकते हैं, और इस बार मुख्यमंत्री के रूप में अप्रत्याशित चेहरा सामने लाकर। वैसे संभावित मुख्यमंत्री के तौर पर अभी कई नाम हवा में हैं, जिनमें गृहमंत्री राजनाथ सिंह, यूपी भाजपा के अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य, गोरखपुर के सांसद योगी आदित्यनाथ और रेल राज्यमंत्री मनोज सिन्हा के नाम प्रमुख हैं। लेकिन इन नामों में अचानक एक नया नाम जुड़ गया है, और वो नाम है सतीश महाना का। महाना को भाजपा अध्यक्ष अमित शाह का करीबी बताया जाता है।

बता दें कि इस बीच कोयंबटूर में आरएसएस की बैठक हो रही है जिसमें यूपी के अगले सीएम पर चर्चा हो सकती है। बैठक में संघ प्रमुख मोहन भागवत समेत तमाम वरिष्ठ अधिकारी हिस्सा ले रहे हैं। ख़बरों के मुताबिक भाजपा सीएम का चेहरा वहां के परिणाम की तरह ही चौंकाने वाला हो सकता है। सूत्र ये भी बताते हैं कि भाजपा का शीर्ष नेतृत्व यूपी के लिए दो डिप्टी सीएम के फॉर्मूले पर भी चर्चा कर रहा है ताकि अधिक-से-अधिक लोगों और वर्गों को ‘संतुष्ट’ किया जा सके।

बहरहाल, बात करते हैं अचानक रेस में आए और फिलहाल सबसे आगे दिख रहे सतीश महाना की। सरकार बनने पर उनका मंत्री बनना वैसे भी तय माना जा रहा था। लेकिन अब उनका नाम संभावित मुख्यमंत्री के प्रबल दावेदार के तौर पर सामने आ रहा है। कानपुर की महाराजगंज से चुने गए महाना 1991 से लगातार छठी बार विधायक बने हैं। इस बार उन्होंने रिकॉर्ड 56 प्रतिशत वोट हासिल कर बसपा के मनोज शुक्ला को 91,826 वोटों के बड़े अंतर से हराया है। 14 अक्टूबर 1960 को जन्मे महाना कानपुर में खासे मशहूर हैं। खासकर वहां के छोटे दुकानदारों में वे काफी लोकप्रिय हैं। बता दें कि लोकसभा चुनाव के दौरान मुरली मनोहर जोशी को टिकट नहीं मिलने पर उनको टिकट मिलना और जीतना तय माना जा रहा था। महाना की सक्रियता सोशल मीडिया पर भी देखी जा सकती है। चुनाव के दिनों में उनकी हर गतिविधि अपलोड होती थी।

ख़बरों के मुताबिक महाना संघ के दिनों में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के साथ काम कर चुके हैं और यह बात उनके पक्ष में जा रही है। भाजपा संसदीय दल की बैठक के दौरान मोदी ने कहा था कि कुछ ऐसे लोग भी होते हैं जो लाइम लाइट में नहीं रहते, लेकिन काम अच्छा करते हैं। प्रधानमंत्री के इस बयान को महाना से जोड़कर देखा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक रविवार को महाना को अचानक दिल्ली बुलाया गया था। यह भी गौरतलब है कि पंजाबी होने के कारण वे वित्तमंत्री अरुण जेटली के भी करीबी हैं और जोशी के साथ उनका छत्तीस का आंकड़ा है। ये बातें भी उनकी दावेदारी को मजबूत करती हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जोगीरा सा रा रा रा

केकर खातिर पान बनन बा, केकरे खातिर बांस

केकरे खातिर पूड़ी पूआ, केकर सत्यानास

जोगीरा सा रा रा रा

नेतवन खातिर पान बनल बा, पब्लिक खातिर बांस

अफसर काटें पूड़ी पूआ, सिस्टम सत्यानास

जोगीरा सा रा रा रा

ये है जोगीरा की एक बानगी, जिसे लिखा है कबीर की परम्परा के जनकवि आचार्य रामपलट दास ने। आप भारत में हों, होली के रंगों को पहचानते हों और आपके कानों में जोगीरा की थाप न पहुँची हो, ऐसा हो ही नहीं सकता। जोगीरा ना हो तो होली कैसी..? होली का असली रंग तो जोगीरा के साथ ही चढ़ता है। आखिर दिल में उत्साह और दिमाग में सवाल उतार देने वाला, हमारी रग-रग में तैर जाने वाला ये जोगीरा है क्या?  चलिए, आज इसी पर बात करते हैं।

उत्तर भारत के जिन क्षेत्रों में नाथपंथी योगी (जोगी) सक्रिय रहे वहाँ जोगीरा गाने की परम्परा विशेष रूप से पाई जाती है। सम्भवत: इसकी उत्पत्ति जोगियों की हठ-साधना, वैराग्य और उलटबाँसियों का मजाक उड़ाने के लिए हुई हो। यह मूलत: एक समूह-गान है जिसमें प्रश्नोत्तर शैली में एक समूह सवाल पूछता है तो दूसरा उसका जवाब देता है। जवाब प्राय: चौंकाने वाले होते हैं।

समय बदला तो जोगीरा भी बदलता गया। धीरे-धीरे यह रोजमर्रा की घटनाओं से जुड़ता चला गया। घर का आंगन हो, गांव का चौपाल हो या फिर राजनीति का गलियारा इसने हर जगह अपनी पहुँच बना ली। सम्भ्रान्त और शासक वर्ग पर अपना गुस्सा निकालने या यूँ कहें कि उन्हें ‘गरियाने’ का अनूठा जरिया बन गया जोगीरा।

होली में तो वैसे भी खुलकर और खिलकर कहने की परम्परा है। यह एक तरह से सामूहिक विरेचन का पर्व है। आज इस परम्परा को स्वस्थ रूप देते हुए इसे फिर से व्यक्तिगत और संस्थागत, सामाजिक और राजनीतिक विडम्बनाओं और विद्रूपताओं पर कबीर की तरह तंज कसने और हमले करने के अवसर में बदलने की जरूरत है। आचार्य रामपलट दास के ही शब्दों में कुछ इस तरह –

चिन्नी चाउर महंग भइल, महंग भइल पिसान

मनरेगा का कारड ले के, चाटा साँझ बिहान

जोगीरा सा रा रा रा

या फिर कुछ ऐसे –

खूब चकाचक जीडीपी बा चर्चा बा भरपूर

चौराहा पर रोज सबेरे बिक जाला मजदूर

जोगीरा सा रा रा रा।

चलने से पहले हम ये न कहेंगे कि ‘बुरा न मानो होली है’। हम तो कहेंगे ‘अब बुरा मान भी लो होली है’… जोगीरा सा रा रा रा…

रंग और गुलाल के साथ –

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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यूपी में भाजपा की प्रचंड जीत के पांच बड़े कारण

पांच राज्यों के चुनाव परिणामों के साथ लोकतंत्र में लोकप्रियता की नई इबारत लिख गए मोदी। किसने सोचा था कि ‘साइकिल’ की हवा इस कदर निकल जाएगी, ‘हाथ’ के हाथ में उंगलियों के बराबर भी सीटें नहीं आएंगी और ‘हाथी’ चलने से पहले ही हांफ जाएगा। यहां तक कि भाजपा के बड़े से बड़े भक्त ने भी नहीं सोचा होगा कि 1991 की राम-लहर पर भी भारी पड़ जाएगी 2017 की मोदी-लहर। तब भाजपा ने 221 सीटें जीती थीं जबकि उस वक्त उत्तराखंड भी उत्तर प्रदेश का ही हिस्सा था और इस बार भाजपा ने 312 सीटें जीती हैं। इसमें सहयोगियों की सीटें जोड़ दें तो आंकड़ा 325 का हो जाता है। एक यूपी (और बोनस के तौर पर उत्तराखंड भी) में भाजपा ने इतने जोर से ठहाका लगाया कि कांग्रेस की पंजाब (और साथ में मणिपुर और गोवा भी) की मुस्कान फीकी पड़ गई।

तमाम समीकरणों और एग्जिट पोल के सारे अनुमानों को ध्वस्त करते हुए भाजपा ने उत्तर प्रदेश में 2012 के मुकाबले इस बार छह गुना अधिक सीटें हासिल कीं। आखिर वे कौन से कारण हैं कि इस बार की होली के सारे अबीर केसरिया और सारे रंग मोदीमय हो गए? चलिए, जानने की कोशिश करते हैं कि क्या हैं भाजपा की इस प्रचंड जीत के पांच बड़े कारण?

  1. मोदी का मैजिक: महज तीन साल पहले गुजरात से राष्ट्रीय राजनीति में आए मोदी महज तीन साल में न केवल भाजपा के पर्याय बन गए हैं, बल्कि ने आम भारतीय जनता की ‘आस्था’ के नए केन्द्र बनकर उभरे हैं। आज की तारीख में वो जो कह रहे हैं, समाज का हर तबका (सामाजिक और आर्थिक दोनों) उसे गौर से सुन रहा है और बहुत हद तक मान भी रहा है। नोटबंदी का मुद्दा इस बात का जीता-जागता सबूत है। तमाम पार्टियों ने एटीएम के आगे लंबी-लंबी लाइनों की बात कर उनका विरोध किया और जनता ने उन्हें वोट देने को उससे भी बड़ी लाइन लगा दी।
  1. तिकोना मुकाबला: ये बात समझ से परे है कि बिहार में महागठबंधन के ताजा प्रयोग और उसकी सफलता को देखकर भी सपा, बसपा और कांग्रेस ने सीख क्यों न ली। सपा और कांग्रेस का गठबंधन वहां वैसा ही था जैसे बिहार में जेडीयू या आरजेडी में से किसी एक के साथ कांग्रेस का गठबंधन होता। अगर इस बार सपा, बसपा और कांग्रेस को मिले वोटों को एक जगह कर दें तो कोई आश्चर्य नहीं कि भाजपा की जगह इस गठबंधन के पास सवा तीन सौ सीटें होतीं।
  1. यादव-परिवार का गृहयुद्ध: यूपी में चुनाव से पहले जिस समय यादव-परिवार में गृहयुद्ध छिड़ा था, उस समय भाजपा पूरे राज्य में एक के बाद एक परिवर्तन रैली कर रही थी। उसे उसके सुनियोजित और क्रमबद्ध प्रचार का फायदा मिला। उधर सपा-कांग्रेस का गठबंधन एकदम आखिरी समय में हुआ। दोनों पार्टियों को साझा रणनीति और ग्रासरूट लेवल पर कार्यकर्ताओं का साझा मानस तैयार करने का वक्त ही नहीं मिला।
  1. अपने वोटबैंक पर फोकस: भाजपा ने पहले दिन से गैर-यादव ओबीसी और गैर-जाटव दलित पर फोकस किया। ऊंची जातियों का वोट तो वैसे भी कांग्रेस से शिफ्ट होकर कमोबेश उसके पास आ ही चुका है। बचे मुसलमान, तो 403 में एक भी सीट मुसलमान को न देकर उसने नि:संकोच ‘हिन्दुत्व’ के एजेंडे आगे बढ़ाया।
  1. अमित शाह की व्यूह-रचना: यूपी की जीत में मोदी के चेहरे के बाद जिस चीज ने सबसे बड़ी भूमिका निभाई वो थी भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह की सधी हुई रणनीति। इस चुनाव में उनके सारे दांव सही पड़े। एक ओर उन्होंने स्वामी प्रसाद मौर्य और सुखदेव राजभर जैसे नेताओं को जोड़कर यह संकेत दिया कि भाजपा सबको साथ लेकर चल सकती है, तो दूसरी ओर कई सीटों पर कार्यकर्ताओं की नाराजगी मोल लेकर भी बाहर से आए जिताऊ नेताओं को टिकट दिया। इनमें से अधिकतर नेताओं को जीत मिली। सच यह है कि इन पांच राज्यों के चुनाव के बाद शाह ने पार्टी के हर स्तर पर नेताओं की नई कतार खड़ी कर ली है और भाजपा को पूरी तरह मोदी-शाह-मय कर दिया है। बड़ी बात यह कि उनके किए पर जनता ने भी मुहर लगाई है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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