मधेपुरा ने कहा महर्षि वेदव्यास के नाम पर हो केन्द्रीय विश्वविद्यालय

समाजवाद की धरती कहे जाने वाले मधेपुरा से गीता के रचयिता महर्षि वेदव्यास के नाम पर विश्वविद्यालय की स्थापना की मांग उठी है। अवसर था महर्षि की जयंती का, जिसका आयोजन मंगलवार को स्थानीय वेदव्यास कॉलेज में किया गया। कार्यक्रम का शुभारंभ विधान मंडल में विरोधी दल के नेता डॉ. प्रेम कुमार ने किया और मुख्य अतिथि थे मधेपुरा स्थित भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति व पूर्व सांसद डॉ. रमेन्द्र कुमार यादव रवि।

अत्यन्त गरिमापूर्ण कार्यक्रम में बोलते हुए नेता प्रतिपक्ष ने कहा कि देश के अन्दर कुछ ऐसी शक्तियां हैं जो राम की जगह रावण और कृष्ण की जगह कंस को आदर्श बनाना चाहती हैं। यह प्रयास जघन्य और नकारात्मक है। राष्ट्र और राष्ट्रीयता की मजबूती के लिए हमें पुन: अपने संस्कार और संस्कृति को जगाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि महर्षि वेदव्यास भविष्यद्रष्टा थे और अपनी कृतियों के जरिए उन्होंने भारतीय संस्कृति की जो नींव रखी, वह सदा स्तुत्य रहेगा।

मुख्य अतिथि के रूप में शिक्षा, साहित्य और राजनीति में एक समान पैठ रखने वाले डॉ. रमेन्द्र कुमार यादव रवि ने कहा कि महर्षि वेदव्यास ने महाभारत एवं गीता की रचना कर जहाँ मानव-जाति का कल्याण किया, वहीं भारतीय धर्म और संस्कृति को वैश्विक पटल पर स्थापित किया। उन्होंने कहा कि गीता कृष्ण की चिन्तना की अभिव्यक्ति है, जिसके माध्यम व्यास हैं। अगर व्यास ना होते तो हमें समाज की जाग्रत चेतना का बोध ना होता और ना ही हम सत्य और असत्य, नीति और अनीति, न्याय और अन्याय, अधिकार और कर्तव्य की सही और सच्ची व्याख्या कर पाते।

इस अवसर पर बोलते हुए पूर्व विधायक किशोर कुमार मुन्ना ने कहा कि महर्षि वेदव्यास के नाम पर शिक्षण-संस्थान की स्थापना किया जाना सराहना योग्य है। पूर्व विधायक संजीव झा ने कहा कि महाभारत और गीता को भूलने का घातक परिणाम सांस्कृतिक अवमूल्यन और देशद्रोह के रूप में देखने को मिल रहा है। बीएनएमयू के पूर्व प्रतिकुलपति डॉ. रामदेव प्रसाद ने कहा कि महर्षि-रचित महाभारत सिर्फ महाकाव्य ही नहीं बल्कि विश्व साहित्य का अमरकोष है। वेदव्यास कॉलेज के प्राचार्य डॉ. आलोक कुमार ने कहा कि महर्षि का कृतित्व आज भी प्रासंगिक है। वहीं अतिपिछड़ा आयोग के पूर्व सदस्य सूर्यनारायण कामत ने कहा कि वेदव्यास भारतीय संस्कृति के संस्थापक पुरुषों में थे। इन्हीं विचारों को आगे बढ़ाते हुए संस्थापक सचिव डॉ. रामचन्द्र प्रसाद मंडल ने कहा कि हम पूर्वजों से प्रेरणा लेकर ही वर्तमान और भविष्य का खाका तैयार करते हैं। व्यास और वाल्मीकि हमारे ऐसे ही पूर्वज हैं और ये दोनों भारतीय संस्कृति की जीवनधारा रहे हैं।

महर्षि वेदव्यास के नाम पर केन्द्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की मांग इस जयंती समारोह की खास बात रही। नेता प्रतिपक्ष प्रेम कुमार ने महर्षि के  नाम पर विश्वविद्यालय की स्थापना के साथ ही उनकी जयंती के दिन राजकीय अवकाश की मांग भी की। मुख्य अतिथि डॉ. रवि ने कहा कि महर्षि वेदव्यास जैसे ‘प्रतीकपुरुष’ हमारी समस्त पीढ़ियों के लिए धरोहर हैं। उनके नाम पर विश्वविद्यालय की स्थापना कर हम उनकी ‘थाती’ को सही स्वरूप में सहेज पाएंगे। मंच पर मौजूद गणमान्य अतिथियों एवं उपस्थित विशाल जनसमूह ने इस विचार का पुरजोर समर्थन किया।

उक्त जयंती समारोह में पूर्व प्रतिकुलपति डॉ. रामदेव प्रसाद और वरिष्ठ चिकिसक डॉ. सीताराम यादव को ‘व्यास शिखर पदक’ एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया गया। जयंती के मौके पर महाविद्यालय परिसर में महर्षि वेदव्यास की प्रतिमा की प्राण-प्रतिष्ठा की गई और शहर में ‘व्यास रथ यात्रा’ भी निकाली गई।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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नीतीश सरकार में स्कूली छात्र-छात्राएं शैक्षिक परिभ्रमण पर

बिहार में शैक्षिक माहौल कायम करने के लिए नीतीश सरकार द्वारा स्कूली छात्र-छात्राओं को बिहार दर्शन के लिए शैक्षिक परिभ्रमण को अनिवार्य कर दिया गया है | मुख्यमंत्री बिहार दर्शन योजना के तहत वर्ग 9 एवं 10 के छात्र-छात्राओं को पर्यटक स्थलों के परिभ्रमण का अवसर प्रतिवर्ष दिया जाता है | इसके लिए प्रत्येक जिले को स्कूल की संख्या के अनुसार लगभग 25 से 50 लाख तक की राशि आवंटित की जाती है |

Member of Managing Committee- SNPM High School Madhepura Dr. Bhupendra Madhepuri with green flag , departing students on excursions under under "Mukhyamantri Bihar Darsham" Programme along with Principal Dr.Niranjan Kumar.
Member of Managing Committee- SNPM High School Madhepura Dr. Bhupendra Madhepuri with green flag , departing students on excursion under “Mukhyamantri Bihar Darshan” Programme along with Principal Dr.Niranjan Kumar.

यह भी बता दें कि बिहार में विक्रमशिला, नालंदा, राजगीर, मंदार पहाड़, वीरपुर का बैरेज……आदि-आदि दर्शनीय स्थलों के परिभ्रमण से छात्रों के सामान्य ज्ञान में और अभिवृद्धि होती है |

आज प्रातः मधेपुरा के शिवनंदन प्रसाद मंडल उच्च माध्यमिक विद्यालय के प्राचार्य डॉ.निरंजन कुमार- श्रीमती निर्मला देवी, निरुपमा व शिक्षिका मिंटू देवी सहित शिक्षक संतोष कुमार, रमेश कुमार, आनंद कुमार एवं गौतम कुमार के साथ लगभग 45 छात्र-छात्राएं शैक्षिक परिभ्रमण पर धार्मिक स्थल सिंघेश्वर स्थान, गणपतगंज के भव्य मंदिर और वीरपुर बैरेज आदि के लिए प्रस्थान किये |

मौके पर स्कूल प्रबंधन समिति के सदस्य व समाजसेवी डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने बस पर सवार परिभ्रमण दल को (विक्ट्री साइन/ हरी झंडी) दिखाकर विदा किया | साथ ही छात्र-छात्राओं को शिक्षकों एवं शिक्षिकाओं से सामान्य ज्ञान की बातें सीखने की बातें भी कहीं |

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मधेपुरा रेल इंजन फैक्ट्री में पहले साल बनेगा 5 इलेक्ट्रिक इंजन

ग्रीनफ़ील्ड विद्युत रेल इंजन कारखाना, मधेपुरा के लिए श्रीपुर चकला गांव के आस-पास अधिग्रहित 300 एकड़ जमीन पर जी इ एल एफ  के डिप्टीचीफ इंजीनियर के.के.भार्गव द्वारा मई के प्रथम सप्ताह में भूमि पूजन किया गया | मौके पर मधेपुरा के डायनेमिक डीएम मो.सोहैल ने कारखाने के विद्युतीकरण कार्यों में सहयोग करने के लिए विद्युत विभाग के अधिकारियों को निर्देश दिये |

बता दें कि 2 साल बाद यानी 2019 में इस कारखाने में विद्युत रेल इंजन निर्माण का काम शुरू हो जायेगा | प्रथम वर्ष में फैक्ट्री द्वारा पांच इंजन तैयार होगा और 2022 तक यह कारखाना सेंचुरी बना लेगा यानी चौथे साल से 100 विद्युत रेल इंजन तैयार करने का सिलसिला प्रारंभ हो जाएगा |

यह भी जान लें कि एक विद्युत रेल इंजन की कीमत होगी 28 करोड़ रुपये | 12 साल लगते-लगते 12000 हार्स पावर (HP)  के 800 विद्युत रेल इंजन इस कारखाने द्वारा तैयार कर लिया जायेगा | और इसी के साथ अब ‘मधेपुरा’ राष्ट्रीय ही नहीं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए जी.के. के रूप में याद किया जायेगा |

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क्या प्रियंका हैं कांग्रेस की ‘संजीवनी’..?

मोतीलाल नेहरू, जवाहरलाल नेहरू, इन्दिरा गांधी, राजीव गांधी, सोनिया गांधी और अब राहुल गांधी – ये सभी एक परिवार से जरूर हैं पर ‘परिवारवाद’ के तमाम आरोपों व आलोचनाओं के बावजूद सच यही है कि ये सारे नाम मिलकर कांग्रेस का ‘पर्याय’ लगते है। आप भले ही इसे आज की कांग्रेस की सबसे बड़ी कमजोरी कहें लेकिन इस बात से इनकार नहीं कर सकते कि उसे अब भी सांस, सम्बल और स्वीकार्यता मिलती है तो नेहरू-गांधी परिवार से ही।

बहरहाल, मोतीलाल नेहरू जिस समय अध्यक्ष थे उस समय कांग्रेस अपने मूल स्वरूप में थी और ‘परिवारवाद’ की कम-से-कम आज की तरह नग्न उपस्थिति तब नहीं थी। नेहरू के प्रधानमंत्री रहते कांग्रेस में ‘संकुचन’ जरूर आने लगा लेकिन नेहरू का व्यक्तित्व इतना विराट था कि कमियां उसमें खो जाती थीं। इन्दिराजी के समय हालांकि कांग्रेस में ‘ई’ को चस्पां किया गया और असमय मृत्यु से पहले संजय गांधी ने इसे अपने तरीके से चलाना चाहा। फिर भी इन्दिराजी जो थीं अपने बूते थीं और अपने पिता के नाम और काम में उन्होंने कुछ जोड़ा ही, घटाया नहीं। उनके होने में ‘परिवार’ था लेकिन एक ‘विशेषण’ की तरह। हाँ, उनके बाद राजीव गांधी आए, फिर सोनिया गांधी आईं और अब अध्यक्ष के तौर पर राहुल गांधी आने वाले हैं, तो मूल में (इन सबकी तमाम ‘योग्यताओं’ के बावजूद) परिवार ही था। बावजूद इसके समय-समय पर कांग्रेस को ‘संजीवनी’ इन्हीं से मिली है।

अब बात कांग्रेस के वर्तमान परिदृश्य की। कहने की जरूरत नहीं कि भाजपा की उठान से कांग्रेस अपनी ढलान पर तेजी से चल पड़ी है। तमाम तैयारी और तत्परता के बावजूद उपाध्यक्ष राहुल गांधी में वो परिपक्वता नहीं दिखती जो कांग्रेस को नए सिरे से खड़ा करने के लिए अपेक्षित है। यही कारण है कि  कांग्रेस का एक बड़ा तबका, जो राहुल की सम्भावनाओं के साथ-साथ सीमाओं को भी जानता है, प्रियंका गांधी को सक्रिय भूमिका में लाने की वकालत कर रहा है। हालांकि ये तयप्राय है कि कांग्रेस के अगले अध्यक्ष राहुल ही होंगे, लेकिन इस तबके की सोच यह है कि राहुल के साथ प्रियंका के आ जाने से कांग्रेस को उसका खोया ‘एक्स’ फैक्टर मिल जाएगा।

हालांकि प्रियंका के लिए उठ रही मांग के बीच कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जयराम रमेश ने कहा है कि पार्टी को पुनर्जीवित करने के लिए किसी एक व्यक्ति के पास जादुई छड़ी नहीं है। इसके लिए सम्मिलित प्रयास ही एकमात्र रास्ता है। सैद्धांतिक तौर पर जयराम रमेश गलत नहीं बोल रहे हैं लेकिन व्यावहारिक तौर पर सच्चाई क्या है, ये वो भी जानते हैं।

चलते-चलते बता दें कि यूपी के आगामी चुनाव के लिए कांग्रेस ने भले ही शीला दीक्षित पर दांव खेला है लेकिन वो चुनावी बिसात अपनी दादी की याद दिलाती प्रियंका के इर्द-गिर्द ही बिछाएगी, राजनीति के जानकार ये मानकर चल रहे हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप  

 

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पदयात्रा पर जाते शिक्षा मंत्री से चंद सवाल

बिहार के शिक्षा मंत्री डॉ. अशोक चौधरी 17 जुलाई से राज्य भर की पदयात्रा करेंगे। उद्देश्य है लोगों में शिक्षा की भूख जगाना, आजादी के इतने वर्षों बाद भी ‘अक्षर’ की ताकत से अनजान परिवारों को जागरुक बनाना, सरकारी विद्यालयों की ‘गुणवत्ता’ और ‘अनियमितता’ की पड़ताल करना और शिक्षण संस्थाओं पर ‘सामाजिक अंकुश’ लगाना। यह विशुद्ध रूप से शिक्षा जागरुकता पदयात्रा होगी जिसमें महागठबंधन के तीनों दलों के संबंधित जिलाध्यक्ष, स्थानीय विधायक, जन प्रतिनिधि व शिक्षा महकमे के डीईओ, डीपीओ, बीईओ समेत अन्य पदाधिकारी भी शामिल होंगे।

बता दें कि पहले चरण में शिक्षा मंत्री सीमांचल और कोसी अंचल के पाँच जिलों कटिहार, किशनगंज, पूर्णिया, सहरसा और सुपौल की पदयात्रा करेंगे। पदयात्रा में मंत्री लोगों से पूछेंगे कि आपके इलाके में कहीं शिक्षा का फर्जी कारोबार चल रहा है तो जानकारी दीजिए, उस पर कार्रवाई की जाएगी। यह जानने की कोशिश भी की जाएगी कि जिस कॉलेज की क्षमता 500 विद्यार्थियों की है, वहाँ 2000 बच्चे कैसे  एडमिशन करा लेते हैं? और ये भी कि किसी विद्यालय में पाँच शिक्षक हैं और तीन ही क्यों आ रहे हैं?

हमारे शिक्षा मंत्री अपनी इस यात्रा में जानना चाहते हैं कि बच्चों के मिड डे मील की चोरी क्यों और कैसे हो रही है? वो बड़ी शिद्दत से जानना चाहते हैं कि पोशाक, साइकिल, किताब, मिड डे मील समेत तमाम प्रोत्साहन योजनाओं के बावजूद शिक्षा की रोशनी हर घर तक क्यों नहीं पहुँच पा रही है? और उतनी ही शिद्दत से इस यात्रा में वो सरकार के मुखिया नीतीश कुमार के शराबबंदी अभियान की बातें भी करना चाहते हैं।

ये तमाम बातें सुनकर शिक्षा मंत्री जी के प्रति आभार जताना लाजिमी है। हम आभार जताते भी हैं लेकिन कुछ सवाल भीतर कुलबुला रहे हैं जो उनसे पूछे बिना मन नहीं मान रहा। उनसे पहला सवाल ये कि क्या शिक्षा मंत्री समेत पूरी सरकार के ‘ज्ञान-चक्षु’ लालकेश्वर प्रसाद और बच्चा राय ने ही खोले हैं? क्या इन दो ‘महापुरुषों’ से पहले सब के सब ‘सावन के अंधे’ थे? दूसरा सवाल, क्या उन तक ‘बिहार की राजधानी दिल्ली’ कहने वाले और अपनी कक्षा ठेके पर देने वाले शिक्षकों की ‘महागाथा’ भी अब तक नहीं पहुँची है? तीसरा सवाल, सरकार की नाक के ठीक नीचे स्कूल और कॉलेज के नाम पर परीक्षा दिलाने और पास कराने की हजारों ‘फैक्ट्रियां’ दशकों से चल रही हैं और ‘पदयात्रा’ की जरूरत आज महसूस हुई है? क्या अब से पहले सरकार गांधीजी के तीन बंदरों का अनुसरण किए बैठी थी?

शिक्षा मंत्रीजी, सच तो यह है कि जो जानने के लिए आप पदयात्रा करने जा रहे हैं वो आप और आपकी सरकार के मुखिया पहले से जान रहे हैं। वो तो भला हो लालकेश्वर प्रसाद और बच्चा राय के ‘कुकृत्य’ का कि आप ‘लोकलाज’ से अपना आसन छोड़ लोगों के बीच जा रहे हैं। खैर, बहुत देर से सही, हम मान लेते हैं कि आपको अपनी जिम्मेदारी का अहसास हो गया। लेकिन शिक्षा मंत्रीजी, आप समाज को उसकी जिम्मेदारी का अहसास दिलाने की बात नाहक ही कर रहे हैं, क्योंकि आप अच्छी तरह जानते हैं कि इस समाज की चमड़ी में थोड़ी भी ‘सिहरन’ बची होती तो यहाँ शिक्षा या राजनीति के ‘सौदागर’ पैदा ही नहीं होते।

वैसे शिक्षामंत्रीजी, आपकी पदयात्रा की ये सोच बड़ी अच्छी है। ये तब और ज्यादा अच्छी लगती जब आपके साथ ‘विकास-पुरुष’ भी होते। लेकिन क्या ‘दिल्ली’ पर नज़र टिकाए आपकी सरकार के मुखिया ‘शराबबंदी’ से थोड़ा वक्त निकालकर आपके साथ इस पदयात्रा में चार कदम चलने की जहमत नहीं उठाएंगे?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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दूसरी नहीं, पहली महिला प्रधानमंत्री बनना चाहती थीं टेरीज़ा मे

आम मध्यवर्गीय परिवार से आने वाली टेरीज़ा मे, जो पहले टेरीजा ब्रेजियर थीं, जिनकी पढ़ाई सरकारी प्राथमिक स्कूल से शुरू हुई थी, जो गांव में रहती थीं, मूक नाटकों में हिस्सा लेती थीं और जेबखर्च के लिए शनिवार को बेकरी में काम करती थीं, की दिनचर्या भले ही छोटे-छोटे कामों से पूरी होती हो लेकिन उनके सपने हमेशा बड़े रहे। उनके दोस्त बताते हैं कि शुरुआत से ही वो काफी फैशनेबल थीं और कम उम्र में ही ब्रिटेन की पहली महिला प्रधानमंत्री बनने का सपना देखा करती थीं। आज, मारग्रेट थैचर के बाद ही सही, उस ‘महत्वाकांक्षी’ लड़की ने अपना सपना पूरा कर ही लिया।

महारानी एलिजाबेथ ने टेरीज़ा मे को मुश्किल दौर से गुजर रहे ब्रिटेन की प्रधानमंत्री नियुक्त किया है। 59 साल की टेरीज़ा मे मारग्रेट थैचर के बाद ब्रिटेन की प्रधानमंत्री बनने वाली दूसरी महिला हैं। टेरीज़ा डेविड कैमरन सरकार में गृहमंत्री थीं। गौरतलब है कि यूरोपीय संघ के मुद्दे पर हुए जनमत संग्रह के बाद डेविड कैमरन को इस्तीफा देना पड़ा था। कैमरन ने पिछले साल हुए चुनावों में कंजरवेटिव पार्टी को चुनावी जीत दिलाई थी। लेकिन उम्मीद के विपरीत ब्रिटेन की जनता ने यूरोपीय संघ का सदस्य बने रहने के सवाल पर हुए जनमत संग्रह में उनका साथ नहीं दिया था।

बहरहाल, अपने स्टाइल स्टेटमेंट और स्पष्ट नीतियों के कारण अलग पहचान रखने वाली टेरीज़ा 1997 से लगातार ब्रिटिश संसद की सदस्य हैं। ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने वाली टेरीज़ा के पिता चर्च में पादरी थे। जब टेरीज़ा 25 साल की थीं, उनके पिता की कार दुर्घटना में मौत हो गई।

टेरीज़ा के पॉलिटिकल करियर में सबसे अहम मोड़ 2009 में आया जब वो गृह मंत्री बनीं। ब्रिटेन का गृह मंत्रालय कई राजनेताओं के लिए ‘कब्रगाह’ रहा है लेकिन दृढ़ संकल्प की धनी टेरीज़ा ने इस धारणा को गलत साबित किया। उनकी नीतियां जितनी साफ रही हैं उनके पालन के लिए वो उतनी ही सख्त हैं, बहुत हद तक मारग्रेट थैचर की तरह। ब्रिटिश राजनीति के जानकार उन्हें एक ‘कठिन’ महिला मानते हैं।

ब्रेक्जिट की बात करें तो टेरीज़ा इस पर हुए फैसले के साथ हैं और इस मुद्दे पर दूसरा जनमत संग्रह नहीं कराना चाहतीं। हालांकि उन्होंने ये जरूर कहा है कि यूरोपीय संघ को छोड़ने के मसले पर आधिकारिक फैसला 2016 के समाप्त होने से पहले संभव नहीं होगा।

ये देखना दिलचस्प होगा कि टेरीज़ा मे का भारत के प्रति क्या रुख रहता है। उनके पूर्ववर्ती कैमरन भारत के साथ बेहतर संबंधों के हिमायती थे। उम्मीद की जा रही है कि टेरीज़ा उसी रास्ते को अपनाएंगी। हालांकि ये टेरीज़ा ही थीं जिन्होंने अप्रैल 2012 में पोस्ट स्टडी वर्क वीजा समाप्त कर दिया था, जिसका भारतीय छात्रों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था।

 ‘मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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एम.एल.सी. डॉ.संजीव कुमार सिंह के क्षेत्र में निवेदन समिति की नाराजगी

विधान परिषद की 4 सदस्यीय निवेदन समिति की टीम गुरुवार को मंडल विश्वविद्यालय में पहुंची | विभिन्न मामलों की प्रगति की समीक्षा के क्रम में टीम के चारों विधान परिषद सदस्यों श्री केदार पांडे, डॉ.संजीव कुमार सिंह, प्रो.संजय कुमार सिंह एवं प्रो.संजीव श्याम सिंह ने विश्वविद्यालय के काम-काज की स्थिति को दुखद बताया | टीम का नेतृत्व कर रहे शिक्षा-जगत के अनुभवी विधान पार्षद केदार पांडे ने कहा कि विश्वविद्यालय में कोई कार्यप्रणाली ही नहीं है |

यह भी जान लें कि टीम के एक सदस्य डॉ.संजीव कुमार सिंह भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय सिंडिकेट के मेंबर भी हैं तथा इसी मधेपुरा शिक्षक कोसी निर्वाचन क्षेत्र से एम.एल.सी. चुने गये हैं | बता दें कि आजीवन इसी कोसी शिक्षक निर्वाचन क्षेत्र से विधान पार्षद रहे स्व. डॉ.शारदा प्रसाद सिंह के सुपुत्र हैं विधान पार्षद डॉ.संजीव कुमार सिंह | जहाँ शारदा बाबू को विद्यालय, महाविद्यालय एवं विश्वविद्यालय शिक्षकों की सेवा नियमावली  का इनसाइक्लोपीडिया कहा जाता रहा वही उनके सुपुत्र डॉ.संजीव कुमार सिंह भी शिक्षकों के हित में अहर्निश अपनी सेवा व समर्पण के कारण लोकप्रिय बनते जा रहे हैं |

बता दें कि निवेदन समिति की टीम ने सभी निर्देशित मामलों पर अद्यतन रिपोर्ट लेकर विश्वविद्यालय प्रशासन की ओर से उपस्थित प्रोवीसी  डॉ.जे.पी.एन झा एवं कुलसचिव डॉ.के.पी. सिंह से कहा कि 11 अगस्त को बिहार विधान परिषद मैं उपस्थित हों |

निवेदन समिति ने छात्र संगठन द्वारा लगाये गये कतिपय आरोपों को सही ठहराया जब एफ.ओ. एवं एफ.ए. बिना छुट्टी के आवेदन दिए ही अनुपस्थित पाए गये | समिति ने बीएड प्रवेश परीक्षा का जिम्मा बिना सिंडीकेट के अनुमोदन के ही आउटसोर्सिंग को सौंप दिये जाने पर आपत्ति जताई तथा यह सारी शिकायतें राज भवन एवं शिक्षा विभाग को भी भेज दिए जाने की चेतावनी दी | यूँ बैठक में मुख्यरूप से संबद्ध कॉलेजों में कार्यरत शिक्षकों एवं कर्मचारियों की सेवा नियमितीकरण का मुद्दा छाया रहा | एक्सपर्ट टीम गठित कर इसे 31 मार्च 2017 तक समायोजित कर लिया जाएगा |

स्थानीय शिक्षक प्रतिनिधि होने के कारण डॉ.संजीव कुमार एमएलसी को अवकाश प्राप्त शिक्षकों द्वारा प्रतिशत में पेंशन भुगतान किए जाने के बाबत आवेदन दिया गया | कई शिक्षकों को हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद भी भुगतान नहीं किए जाने जैसे शिक्षक-समस्याओं पर समिति ने नाराजगी जताई |

विश्वविद्यालय परिसर के बाहर परिसदन में निवेदन समिति द्वारा शिक्षा विभाग के पदाधिकारियों को बुलाकर शिक्षा में सुधार के बाबत जमकर क्लास लिया गया |

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मधेपुरा इप्टा की रीढ है सुभाष

वर्तमान में इप्टा के प्रदेश सचिव सुभाष चंद्र द्वारा मधेपुरा में राष्ट्रीय ग्रामीण नाट्य महोत्सव-2016 के कार्यक्रम संयोजक होने के नाते महोत्सव के आय-व्यय का लेखा-जोखा प्रस्तुत किया गया | आय-व्यय की समीक्षा के साथ-साथ इप्टा मधेपुरा के शाखा सम्मलेन की तिथि पर, कार्यकारी अध्यक्ष डॉ.नरेश कुमार की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में उपस्थित सदस्यों के बीच, विचार-विमर्श किया गया |

यह भी बता दें कि विश्व विख्यात उपन्यासकार एवं साहित्य शिल्पी मुंशी प्रेमचंद की जयंती के मौके पर 31 जुलाई को स्थानीय भूपेन्द्र कला भवन में इप्टा शाखा सम्मेलन करने का फैसला लिया गया | इस अवसर पर स्थानीय कलाकारों द्वारा सांस्कृतिक संध्या आयोजित कर प्रेमचंद के नाटकों के मंचन करने का फैसला भी लिया गया |

साथ ही इप्टा के संरक्षक डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी, डॉ.आलोक कुमार, डॉ.विनय कुमार चौधरी, डॉ.सिद्धेश्वर कश्यप, तुर्वसु उर्फ़ बंटी आदि ने 2016 के त्रि-दिवसीय राष्ट्रीय ग्रामीण नाट्य महोत्सव को एक सफल आयोजन बताया और उसकी सफलता का श्रेय सबों ने सुभाषचंद्र को दिया जिन्होंने बिहार-यूपी सहित देश के दर्जनों राज्यों में ‘नारदीगायन’ कार्यक्रम का परचम लहराया है |

यहां यह भी बता देना मौजूँ है कि हाल ही में 18-20 जून के दरमियान सुभाषचंद्र को नाट्य निर्देशन के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने के लिए इप्टा कोलकाता द्वारा विशेष सम्मान से सम्मानित किया गया | जिसके लिए सभी सदस्यों ने सुभाषचंद्र को साधुवाद दिया तथा संरक्षक डॉ.मधेपुरी ने कहा कि मधेपुरा इप्टा की रीढ है सुभाषचंद्र | सुभाष चन्द्र को  मोमेंटो, प्रमाण-पत्र एवं अंग-वस्त्र से सम्मानित किया-  के बैनर तले- एन.एस.डी. के अध्यक्ष रतनथियम, संगीत नाटक एकेडमी के उपसचिव सुमन कुमार, बंगाल सरकार के आईटी मंत्री बी.बसु तथा इप्टा कोलकाता के सचिव डी.दत्ता आदि ने |

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केजरीवाल के बहाने ‘ठुल्ला’ की पड़ताल

दिल्ली हाईकोर्ट ने बुधवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविन्द केजरीवाल से ‘ठुल्ला’ शब्द का अर्थ समझाने को कहा। बता दें कि केजरीवाल ने एक टेलीविजन चैनल पर चर्चा के दौरान दिल्ली पुलिस के लिए ठुल्ला शब्द का इस्तेमाल किया था। पुलिसकर्मी अजय कुमार तनेजा को ये संबोधन नागवार गुजरा और उन्होंने ‘आप’ नेता पर मानहानि का आपराधिक मुकदमा दायर कर दिया, जिस पर सुनवाई करते हुए निचली अदालत ने केजरीवाल के लिए सम्मन जारी किया था।

सम्मन जारी करते हुए अदालत ने कहा था कि केजरीवाल का बयान प्रथमदृष्टया मानहानि का है और उन्हें 14 जुलाई को अदालत में पेश होने का निर्देश दिया था। केजरीवाल ने इसी संदर्भ में दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। आज इसी याचिका पर सुनवाई करते हुए मुक्ता गुप्ता ने दिल्ली के मुख्यमंत्री को निचली अदालत में व्यक्तिगत रूप से पेशी से छूट तो दे दी लेकिन साथ में यह भी कहा कि केजरीवाल को ‘ठुल्ला’ शब्द का अर्थ समझाना चाहिए, क्योंकि हिन्दी शब्दकोष में इस शब्द का उल्लेख नहीं है।

कोर्ट ने कहा कि “यदि आप (केजरीवाल) किसी के लिए यह शब्द (ठुल्ला) इस्तेमाल करते हैं तो आपको इसका मतलब पता होना चाहिए। आपको न्यायालय को इस शब्द का अर्थ समझाना चाहिए।” इस मामले पर अगली सुनवाई अब 21 अगस्त को होगी।

केजरीवाल की तरफ से पेश हुए वरिष्ठ वकील एन. हरिहरण ने कहा कि ‘ठुल्ला’ शब्द का इस्तेमाल सभी पुलिसकर्मियों के लिए नहीं, बल्कि गलत काम करने वाले पुलिसकर्मियों के लिए किया गया था। उन्होंने यह भी कहा कि इस शब्द का कोई मतलब नहीं है, इसलिए यह मानहानि से संबंधित नहीं है। लेकिन केजरीवाल के काबिल वकील ने यह बताने की जहमत नहीं उठाई कि जब इस शब्द का कोई मतलब ही नहीं है तो फिर इस ‘निरर्थक’ शब्द का संबंध गलत काम करने वाले पुलिसकर्मियों से जोड़ने का क्या मतलब है?

बहरहाल, जब ‘ठुल्ला’ शब्द पर बहस दिल्ली हाईकोर्ट तक पहुँच गई है तो क्यों ना इस शब्द की थोड़ी पड़ताल कर ली जाय। दरअसल ‘ठुल्ला’ एक तरह की कठबोली या स्लैंग (Slang) है। कठबोली किसी भाषा या बोली के उन अनौपचारिक शब्दों या वाक्यांशों को कहते हैं जो बोलने की भाषा या बोली में मानक तो नहीं माने जाते लेकिन बोलचाल में स्वीकार्य होते हैं। उदाहरण के लिए दिल्ली में पुलिसवालों को कठबोली में ‘ठुल्ला’ बोलते हैं और मुंबई में ‘मामा’। सिगरेट को ‘सुट्टा’ कहना, गाड़ी के मिस्त्री का गीयर के दाँत वाले पहियों को ‘गरारी’ कहना, बिना काम वाले को ‘निठल्ला’ कहना या फिर किसी के मरने पर कहना कि ‘टपक गया’ – कठबोली के ही उदाहरण हैं।

समाज या संगठन में ऊँचा दर्जा रखने वाले लोग खुली बातचीत में कठबोली का प्रयोग करने से कतराते हैं क्योंकि ये आमतौर पर संभ्रांत नहीं होती। लेकिन केजरीवाल तो केजरीवाल ठहरे। मुख्यमंत्री होकर जब वो धरने पर बैठ सकते हैं और पुलिसवालों को ‘ठुल्ला’ भी कह ही सकते हैं।

चलते-चलते:

इस क्रम में ये जानना दिलचस्प होगा कि पंजाब-हरियाणा के कुछ समुदायों में थानेदार या दारोगा के लिए ‘ठुल्ला’ शब्द का प्रयोग चार दशक पहले भी प्रचलित पाया गया था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अंतरिक्ष की नई महाशक्ति भारत

22 जून 2016 को सुबह करीब 9.15 बजे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केन्द्र से पोलर सेटेलाइट लॉन्च व्हीकल (पीएसएलवी-सी 34) को सत्रह विदेशी उपग्रहों समेत कुल 20 सेटेलाइट के साथ अंतरिक्ष में भेजा। पीएसएलवी-सी 34 ने 26 मिनट 30 सेकेंड में सभी सेटेलाइट सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिए। प्रक्षेपित उपग्रहों में कॉर्टोसैट-2 सीरीज का पृथ्वी संबंधी सूचनाएं एकत्र करने वाला भारत का नया उपग्रह भी शामिल है। इसके अलावा दो उपग्रह भारतीय विश्वविद्यालयों के हैं। इनमें एक चेन्नई स्थित निजी विश्वविद्यालय का उपग्रह ‘सत्यभामा’ और दूसरा पुणे स्थित इंजीनियरिंग कॉलेज का उपग्रह ‘स्वयम्’ है। शेष सत्रह उपग्रह अमेरिका, कनाडा, जर्मनी और इंडोनेशिया के हैं। ये सारे विदेशी उपग्रह व्यावसायिक हैं और इनसे इसरो को कमाई होगी।

इसरो ने इससे पहले वर्ष 2008 में 10 उपग्रहों को पृथ्वी की विभिन्न कक्षाओं में एक साथ प्रक्षेपित किया था। इस बार 20 उपग्रहों को एक साथ प्रक्षेपित करके वो ऐसा करने वाले तीन देशों के विशिष्ट क्लब में शामिल हो गया है। इससे पहले ऐसा केवल अमेरिका और रूस ही कर पाए हैं।

बहरहाल, एक साथ 20 उपग्रह प्रक्षेपित करने और हाल में ही स्वदेशी स्पेस शटल के प्रक्षेपण के बाद दुनिया भर में भारतीय अंतरिक्ष एजेंसी इसरो की धूम मची है। एक समय ऐसा भी था जब अमेरिका ने भारत के उपग्रहों को प्रक्षेपित करने से मना कर दिया था। आज स्थिति यह है कि अमेरिका सहित तमाम देश खुद भारत के साथ व्यावसायिक समझौता करने को इच्छुक हैं। बता दें कि अमेरिका 20वां देश है जो कॉमर्शियल लॉन्च के लिए इसरो से जुड़ा है।

आज की तारीख में पूरी दुनिया में उपग्रहों के माध्यम से टेलीविजन प्रसारण, मौसम की भविष्यवाणी और दूरसंचार क्षेत्र बहुत तेज गति से बढ़ रहा है और चूंकि ये सभी सुविधाएं उपग्रहों के माध्यम से संचालित होती हैं, इसलिए संचार उपग्रहों को अंतरिक्ष में स्थापित करने की मांग में तेज बढ़ोतरी हो रही है। हालांकि इस क्षेत्र में चीन, रूस, जापान आदि देश प्रतिस्पर्द्धा में हैं, लेकिन यह बाजार इतनी तेजी से बढ़ रहा है कि यह मांग उनके सहारे पूरी नहीं की जा सकती। ऐसे में व्यावसायिक तौर पर यहां भारत के लिए बहुत संभावनाएं हैं क्योंकि कम लागत और सफलता की गारंटी इसरो की ताकत है। बता दें कि भारतीय प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत ऐसे ही विदेशी प्रक्षेपण रॉकेटों की विकास लागत की एक तिहाई भर है। बेहद कम लागत की वजह से अधिकांश देश स्वाभाविक तौर पर अपने उपग्रहों का प्रक्षेपण करने के लिए भारत का रुख करेंगे। ऐसे परिदृश्य में अंतरिक्ष के क्षेत्र में आने वाला समय भारत के एकाधिकार का होगा।

वैसे भी मंगलयान और चंद्रयान -1 की बड़ी सफलता के साथ-साथ अंतरिक्ष में प्रक्षेपण का शतक लगाने के बाद इसरो का लोहा पूरी दुनिया मान ही चुकी है। चंद्रयान-1 को ही चांद पर पानी की खोज का श्रेय भी मिला। भविष्य में इसरो उन सभी ताकतों को और भी टक्कर देने जा रहा है, जो साधनों की बहुलता के चलते प्रगति कर रही हैं। भारत के पास साधन भले ही कम हों लेकिन प्रतिभाओं की बहुलता है। भारत द्वारा प्रक्षेपित उपग्रहों से मिलने वाली सूचनाओं के आधार पर हम अब संचार, मौसम संबंधित जानकारी, शिक्षा, चिकित्सा में टेली मेडिसिन, आपदा प्रबंधन एवं कृषि के क्षेत्र में फसल अनुमान, भूमिगत जल के स्रोतों की खोज, संभावित मत्स्य क्षेत्र की खोज के साथ पर्यावरण पर भी नजर रख रहे हैं। भारत यदि इसी प्रकार अंतरिक्ष क्षेत्र में सफलता प्राप्त करता रहा तो वह दिन दूर नहीं जब भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक महाशक्ति के रूप में उभरेगा।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

 

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