प्रेमचंद का ‘गोदान’ समझना हो तो होरी संग जरूरी है धनिया

हर बड़े रचनाकार के साथ मुख्यत: उसकी एक कृति का नाम जुड़ा होता है। वह कृति एक तरह से उस रचनाकार की, उसकी संवेदना, उसके विचार, उसके सम्पूर्ण कृतित्व की प्रतिनिधि, या यूँ कहें, पर्याय हो जाती है। तुलसीदास के साथ ‘रामचरितमानस’, कालिदास के साथ ‘अभिज्ञान शाकुन्तलम्’, शेक्सपियर के साथ ‘हैमलेट’, टॉलस्टॉय के साथ ‘कामायनी’, टैगोर के साथ ‘गीतांजली’, प्रसाद के साथ ‘कामायनी’ और प्रेमचंद के साथ ‘गोदान’ का नाम इसी तरह से जुड़ा है। ‘गोदान’ प्रेमचंद की सर्वोत्तम कृति और हिन्दी के उपन्यास-साहित्य के विकास का उज्जवलतम प्रकाश-स्तंभ है। सच्चे अर्थों में यह उपन्यास भारतीय ग्राम्यजीवन और कृषि संस्कृति का ‘महाकाव्य’ है जिसका नायक है होरी और धनिया इसकी नायिका।

इसमें कोई दो राय नहीं कि होरी ‘गोदान’ की ‘आत्मा’ है लेकिन प्रेमचंद ने उस ‘आत्मा’ की ‘काया’ धनिया के सहारे ही गढ़ी है। ‘गोदान’ में प्रेमचंद जो होरी के माध्यम से नहीं कह पाए उसे उन्होंने धनिया के द्वारा अभिव्यक्ति दी है। अगर कहा जाय कि धनिया गोदान की ‘पूर्णता’ है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। स्वयं होरी के शब्दों में “धनिया सेवा और त्याग की देवी ; जबान की तेज पर मोम जैसा हृदय ; पैसे-पैसे के पीछे प्राण देने वाली, पर मर्यादारक्षा के लिए अपना सर्वस्व होम कर देने को तैयार” रहने वाली नारी है।

धनिया सच्चे अर्थों में ‘अर्द्धांगिनी’ है। चाहे जो कुछ हो जाय, वह होरी का साथ छोड़ने के लिए तैयार नहीं है। उसमें ना तो होरी जैसी व्यवहारकुशलता है और ना वह लल्लो-चप्पो ही करना जानती है, पर अपने संकल्पित आचरण द्वारा वह होरी की सहायता करती है, उसे डगमगाने से बचाती है, ढाढ़स देती है। हाँ, सुनाती भी खूब है। आवेग में वह कभी-कभी अदूरदर्शितापूर्ण कार्य कर जाती है, पर तत्कालीन सामंती परिवेश में भी वह निर्भीक और निडर है, ये बड़ी बात है। उसमें प्रतिशोध-भावना है, जो होरी में नहीं है, पर कोमल भी वह उतनी ही है। तभी तो किसी की पीड़ा देख उसका आक्रोश दब जाता है।

‘गोदान’ में भारतीय किसान के संपूर्ण जीवन का जीता-जागता चित्र उपस्थित किया गया है। उसकी गर्दन जिस पैर के नीचे दबी है उसे सहलाता, क्लेश और वेदना को झुठलाता,  ‘मरजाद’ की झूठी भावना पर गर्व करता, ऋणग्रस्तता के अभिशाप में पिसता,  तिल-तिल शूलों भरे पथ पर आगे बढ़ता,  भारतीय समाज का मेरुदंड यह किसान कितना विवश और जर्जर हो चुका है, यह गोदान में प्रत्यक्ष देखने को मिलता है। होरी उसी भारतीय किसान का प्रतिनिधि चरित्र है। उसे हम पग-पग पर परिस्थितियों से दबते और समझौतों में ढलते देख सकते हैं लेकिन धनिया ऐसी कतई नहीं। वह जिस बात को ठीक समझती है, उसे जात-बिरादरी, समाज, कानून आदि की परवाह किए बिना करती है। कभी-कभी तो वह अपने आचरण द्वारा गाँव की ‘नाक’ तक रख लेती है।

एक नारी की भाँति धनिया मातृ-भावना और स्नेह से परिपूर्ण है। वह होरी की ऐसी ‘परछाई’ है जो उसकी ‘रिक्तता’ को भर देती है। होरी अगर भारतीय किसान का प्रतीक है तो धनिया कृषक-पत्नी की प्रतिनिधि। सच तो ये है कि धनिया के बिना ना तो किसी ‘होरी’ की परिकल्पना की जा सकती है, ना किसी किसान के घर की और ना ही भारत के ग्रामीण जीवन की। कुल मिलाकर, अगर धनिया नहीं होती तो प्रेमचंद को पूर्णता देनेवाला ‘गोदान’ भी ना होता। अगर होता भी तो वो नहीं होता जो अब है। इस तरह कहना गलत ना होगा कि प्रेमचंद, गोदान और होरी – तीनों की ‘पूर्णता’ है धनिया।

मधेपुरा अबतक के लिए रूपम भारती से साभार

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लालू, मांझी और यूपी का हासिल

यूपी चुनाव को लेकर बिहार के दो बड़े नेताओं ने अपना-अपना ‘स्टैंड’ स्पष्ट कर दिया। राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने जहाँ महागठबंधन के शेष दो साथियों – जेडीयू और कांग्रेस – से अपना रास्ता अलग करते हुए यूपी चुनाव से दूर रहने का फैसला किया (और फिर तेजस्वी ने अखिलेश यादव के काम की सराहना करते हुए सपा को समर्थन देने की बात कही), वहीं ‘हम’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष जीतन राम मांझी ने भी अपने गठबंधन (एनडीए) से अलग रास्ता अख्तियार किया, यूपी में अकेले लड़ने का फैसला कर।

कहने वाले भले ही कहें कि लालू ने यूपी में चुनाव ना लड़ने का फैसला कर मुलायम से अपनी रिश्तेदारी निभाई, लेकिन सच यह है कि उन्होंने बड़ा ही परिपक्व निर्णय लिया है। उन्हें पता था कि यूपी में उनकी ‘हैसियत’ उससे अधिक नहीं जितनी मुलायम की बिहार में है। ऐसे में वो अधिक-से-अधिक ‘वोटकटवा’ की भूमिका ही निभा सकते थे वहाँ। यूपी की मृग-मरीचिका में बिना भटके ही उन्हें यह कहने का मौका भी मिल गया कि भाजपा-विराधी वोटों के ध्रुवीकरण के लिए उन्होंने ये फैसला किया। अच्छा है कि लालू नीतीश की तरह किसी ‘मुगालते’ के शिकार नहीं हुए। अपने कद को अखिल भारतीय करने के ‘मद’ में नीतीश ये मानने को तैयार ही नहीं कि यूपी में उनकी ‘बंद मुट्ठी लाख की, खुल गई तो खाक की’।

बहरहाल, नीतीश के लड़ने और लालू के ना लड़ने की बात तो समझ में आती है लेकिन मांझी ने किस गलतफहमी का शिकार हो यूपी जाने की सोची, ये समझ के परे है। बिहार में तो बमुश्किल अपनी सीट बचा पाए वो, यूपी में जाने क्या मिलने वाला है उन्हें! हाँ, यूपी के बिहार से सटे कुछ इलाकों में दलित वोटों के मामले में उनकी स्थिति कुछ-कुछ वैसी जरूर मानी जा सकती है जैसी कोसी के इलाके में यादव वोटों के मामले में जन अधिकार पार्टी के पप्पू यादव की। तो क्या यूपी में वो भाजपा के हक में उसके साथ दोस्ताना मैच खेल रहे हैं, जैसे पप्पू ने खेला था बिहार में?

वैसे मांझी का ये दोस्ताना मैच मुलायम के लिए भी हो सकता है और इसके दो बड़े स्पष्ट कारण हैं। पहला ये कि यूपी को जीतने के लिए मायावती के वोटबैंक में सेंध लगाने की जरूरत भाजपा से कहीं अधिक सपा को है और दूसरा ये कि उन्हें इस ‘मैच’ के लिए तैयार करने की खातिर मुलायम के समधी लालू हैं यहाँ। मांझी के लिए लालू का ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ महागठबंधन के जन्मकाल से ही जगजाहिर है।

खैर, बिहार के इन नेताओं को यूपी से क्या हासिल होगा, ये तो वक्त ही बताएगा लेकिन यूपी के चुनाव ने बिहार के दो बड़े गठबंधनों की गांठ ढीली कर दी है, इससे इनकार नहीं किया जा सकता।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या रसूखवालों के लिए ही बना है न्याय ?

“समरथ को नहिं दोष गोसाईं” – तुलसीदासजी की कही ये बात आज अगर सबसे ज्यादा लागू होती है तो हमारी न्यायपालिका पर। सामर्थ्यवान लोग आए दिन हमारी न्याय-व्यवस्था का मखौल उड़ाते हैं और हम मूकदर्शक बने रहते हैं। अब सलमान खान का चिंकारा मामला ही लीजिए। बॉलीवुड का ये सुपर स्टार आखिरकार चिंकारा मामले में भी बरी हो ही गया। राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले से सलमान को बड़ी राहत दी है। अदालत ने अपने फैसले में कहा कि चिंकारा के शिकार में बरामद गोलियां उनकी लाइसेंसी बंदूक से नहीं चलाई गई थी। शिकार के लिए जिस जीप का इस्तेमाल किया गया था उसके ड्राईवर के ‘लापता’ होने की वजह से भी अभियोजन के पक्ष को कमजोर माना गया।

बता दें कि सलमान खान के खिलाफ 26-27 सितम्बर को 1998 को भवाद गांव में दो चिंकारा और 28-29 सितम्बर 1998 में मथानिया (घोड़ा फॉर्म) में एक चिंकारा के शिकार के संबंध में वन्य जीव संरक्षण की धारा 51 के तहत मामले दर्ज किए गए थे। निचली अदालत (सीजेएम) ने उन्हें दोनों मामलों में दोषी ठहराते हुए 17 फरवरी 2006 को एक साल और 10 अप्रैल 2006 को पांच साल के कारावास की सजा सुनाई थी। सजा के खिलाफ सलमान खान ने हाईकोर्ट में अपील की थी। गौर करने की बात है कि जिस ‘संदेह’ के आधार पर निचली अदालत ने सलमान को सजा सुनाई थी, उसी ‘संदेह’ का लाभ हाईकोर्ट ने सलमान को देते हुए उन्हें मामले में बरी कर दिया।

हिरण के शिकार में इस्तेमाल की गई जिप्सी के ड्राईवर ने मजिस्ट्रेट के सामने सीआरपीसी की धारा 164 में अपना बयान भी दर्ज करवाया था। लेकिन, इसका क्रॉस एग्जामिनेशन नहीं होने पर अदालत ने उस बयान को खारिज कर दिया। पुलिस के छापे में सलमान खान के कमरे में पहले तो कोई हथियार नहीं मिला और बाद में बरामदगी में एयरगन को दिखाकर खुलेआम कानून के साथ आंखमिचौली खेली गई। हद तो तब हो गई जब बरामदगी में एक ऐसे चाकू को दिखाया गया जिससे हिरण का गला काटा जाना संभव ही नहीं था। ऊपर से सलमान खान के हथियार के लाइसेंस को एक्सपायर्ड बताते हुए उन पर मामूली आर्म्स एक्ट का मुकदमा किया गया।

चिंकारा मामले में फैसले के आते ही लोगों के बीच ये सवाल फिर से उठने लगा है कि क्या न्याय ऊंची रसूख और पहुंच वाले लोगों के लिए ही बना है? जबकि गरीबों को इसके लिए बार-बार पैर घसीटने होते हैं। अदालतों के चक्कर लगा-लगाकर उनकी जिंदगी बीत जाती है। सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस वी. एन. खरे ने खुद स्वीकार किया था कि हमारे देश में गरीबों के लिए न्याय के रास्ते करीब-करीब बंद हो चुके हैं। उन्होंने कहा था कि बिना पैसों के अदालत की ओर देखना भी गुनाह है।

सलमान खान के केस में जिस तरह से सबूतों के साथ छेड़छाड़ की गई और उन्हें तोड़ा-मरोड़ा गया वो पूर्व जस्टिस के बयान की पुष्टि करता है। इस मामले में जिस तरह न्याय का मजाक उड़ाया गया उस पर सोशल मीडिया में खुलकर सवाल उठाये जा रहे हैं। ऊंची पहुंच वाले लोगों के मामले में आज जिस प्रकार न्यायपालिका अपना काम कर रही है वो आम लोगों के मन में उसकी प्रतिष्ठा को तो कम करता ही है, निष्पक्ष न्याय को लेकर आशंका और अविश्वास को भी बल देता है। अगर समय रहते हम नहीं संभले तो इसके दूरगामी परिणाम निश्चित तौर पर बहुत घातक होंगे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

 

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तेरी उड़ान में कभी विराम न हो…..!

कवि, साहित्यकार, संगीतकार के साथ-साथ बेमिसाल शिक्षक एवं महान वैज्ञानिक डॉ.ए.पी.जे अब्दुल कलाम का निधन 27 जुलाई, 2015 को तब हुआ जब उन्होंने शिलांग में- “पृथ्वी को रहने लायक कैसे बनाया जाय” विषय पर बोलते हुए अचानक पृथ्वी को ही अलविदा कह दिया |

उसी भारतरत्न डॉ.कलाम की पुण्यतिथि के अवसर पर मधेपुरा कॉलेज मधेपुरा के प्रधानाचार्य डॉ.अशोक कुमार की अध्यक्षता में एक सेमिनार का आयोजन किया गया जिसका विषय था- ‘ग्रामीण क्षेत्र के विकास में तकनीकी शिक्षा का योगदान’ तथा आयोजनकर्ता थे इसी कॉलेज के बी.सी.ए. एवं बी.बी.ए. के छात्रगण एवं बी.सी.ए. के शिक्षक प्रो.संदीप शांडिल्य |

गणमान्यों का परिचय कराते हुए प्रधानाचार्य डॉ.अशोक कुमार ने छात्र-छात्राओं से कहा कि इस कार्यक्रम का उद्घाटन डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी करेंगे जिन्होंने महामहिम राष्ट्रपति डॉ.कलाम की जीवनी तो लिखी ही है साथ ही राष्ट्रनिर्माता शिक्षक के रूप में उनका सानिध्य भी पाया है | मुख्य अतिथि उपकुलसचिव डॉ.नरेंद्र श्रीवास्तव व विशिष्ट अतिथि डॉ.शैलेश्वर प्रसाद, प्राचार्य डॉ.पूनम यादव आदि द्वारा उद्घाटनकर्ता डॉ.मधेपुरी व अध्यक्ष डॉ.अशोक कुमार के साथ सम्मिलित रूप से दीप प्रज्वलित कर कार्यक्रम का श्रीगणेश किया गया |

Udghatankarta Dr.Bhupendra Madhepuri paying tribute to Bharatratna Dr APJ Abdul Kalam at Madhepura College Madhepura .
Udghatankarta Dr.Bhupendra Madhepuri paying tribute to Bharatratna Dr APJ Abdul Kalam at Madhepura College Madhepura .

यह भी बता दें कि सर्वप्रथम डॉ.कलाम के तैलचित्र पर माल्यार्पण करते हुए उद्घाटनकर्ता डॉ.मधेपुरी ने अपने संबोधन में कहा कि प्रतिदिन शाम में रामेश्वरम के गली वाली मस्जिद में नमाज पढ़ने के बाद वह नन्हा बालक कलाम रामेश्वरम की शिव मंदिर की परिक्रमा करता और लगे हाथ समुद्र के किनारे जाकर बालू के ढेर पर बैठकर आकाश में उड़ते पंछियों से यही कहता- ऐ पंछियों ! तेरी उड़ान में कभी विराम नहीं हो तुम झील के पानी की तरह रूकना नहीं….! डॉ.मधेपुरी ने उनके साथ बिताए अविस्मरणीय क्षणों का विस्तार से चर्चा करते हुए छात्रों को ढेर सारे संदेश दिए |

मुख्य अतिथि डॉ.श्रीवास्तव, विशिष्ट अतिथि डॉ.प्रसाद, प्राचार्य डॉ.अशोक कुमार एवं प्राचार्या डॉ.पूनम यादव, प्रो.संदीप शांडिल्य ने छात्र-छात्राओं को कलाम के बताए गए मार्ग पर चलने के बहुतेरे संदेश दिये | सबों ने एक स्वर से यही कहा कि जब तक युवजन मानसिक रुप से विकसित नहीं होंगे तब तक गांव- शहर, प्रदेश और देश विकसित नहीं होगा |

सेमिनार में प्रो.विभाष चंद्र, प्रो.मनोज भटनागर, प्रो.मुस्ताक अहमद सहित गरिमा, उर्वशी व अन्य कई छात्र-छात्राओं ने भी अपना उद्गार व्यक्त किया | अंत में डॉ.कलाम की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन भी रखा गया |

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मुमकिन नहीं कलाम के ‘कद’ और ‘हद’ की कल्पना

महान वैज्ञानिक… बेमिसाल शिक्षक… मिसाईलमैन… पोखरण के नायक… भारतरत्न… भारतीय गणतंत्र के भूतपूर्व राष्ट्रपति… ईमानदारी से बतायें, क्या ये सारे विशेषण मिलकर भी एक कलाम को पूरा परिभाषित कर पाएंगे..? नहीं… बिल्कुल नहीं। सच तो यह है कि इनमें से कोई एक विशेषण भी किसी को गौरवान्वित करने के लिए काफी है, और जब ये सारे विशेषण मिलकर भी किसी एक व्यक्ति को परिभाषित ना कर पा रहे हों तो उसके ‘कद’ और उसकी ‘हद’ की कल्पना क्या की जा सकती है..?

“पृथ्वी को रहने लायक कैसे बनाया जाय” विषय पर बोलते-सोचते इस महामानव ने आज ही के दिन ये पृथ्वी छोड़ दी थी। उनके जाने से बना शून्य शायद ही भर पाए। बुद्ध, गांधी, मार्क्स, आईंस्टाईन और कलाम जैसे महामानव रोज-रोज नहीं आते। इन रत्नों को ईश्वर सहेज कर रखते हैं और बड़े मौके पर इन्हें धरती पर भेजते हैं। ऐसे लोग आते हैं और सदियों का अंधेरा दूर कर जाते हैं। बल्कि कहना तो ये चाहिए कि कलाम जैसे लोग रोशनी को भी रोशनी दिखा जाते हैं। आज जहाँ ‘मनुष्यता’ दिन-ब-दिन अपनी शर्मिन्दगी के बोझ तले दबती जा रही है वहाँ किसी ‘कलाम’ की ही बदौलत एक मनुष्य के रूप में हम सिर उठा पाते हैं।

कलाम आज बेशक सशरीर हमारे बीच नहीं हैं लेकिन हमारी सोच, हमारे सपनों से उन्हें भला कौन दूर कर सकता है! हमारी आनेवाली पीढ़ियां जब अपना लक्ष्य तय करेंगी, तब कलाम ही टोक रहे होंगे कि “छोटा लक्ष्य एक अपराध है”… और जब-जब हम आँखें बन्द कर सपने देखेंगे, तब कलाम ही हमें बता रहे होंगे कि “सपने वो नहीं जो हम बंद आँखों से देखते हैं, सपने तो वो हैं जो हमें सोने नहीं देते”। फेल (FAIL) को फर्स्ट अटेम्प्ट इन लर्निंग, एंड (END) को एफर्ट नेवर डाइज और नो (NO) को नेक्स्ट अपॉर्चुनिटी कहने का जीवन-दर्शन हमें कलाम से ही मिल सकता है और सफलता की गूढ़ पहेली कलाम ही इतनी आसानी से सुलझा सकते हैं कि “सफलता का रहस्य सही निर्णय है, सही निर्णय अनुभव से आता है और अनुभव गलत निर्णय से मिलता है।”

कलाम को किसी भी कोण से देख लें, देखने वाले का धन्य हो जाना तय है। गीता का कर्मयोग समझना हो तो कलाम के जीवन में एक बार झांक लेना काफी होगा। ‘स्थितप्रज्ञ’ होना क्या होता है इसे समझने के लिए कलाम से बेहतर उदाहरण हो नहीं सकता। सादगी और सहजता कितनी बड़ी पूंजी है गांधी के बाद किसी ने समझाया तो वो कलाम ही थे। जीवन का हर पल कैसे साधना का पर्याय हो सकता है इसकी गवाही तो उनके जीवन का आखिरी पल भी दे गया था।

कलाम जैसों के जीवन का हर पल संदेश है मानव-जाति के लिए। उन्होंने सिर्फ कहा नहीं कि “आप सूर्य की तरह चमकना चाहते हैं, तो आपको पहले सूर्य की तरह ही जलना भी होगा“, बल्कि सूर्य की तरह जलकर, फिर चमककर दिखाया भी। जिस सत्य को कलाम ने जिया नहीं, उसे उन्होंने कहा नहीं। फिर भी पूरे जीवन में उन्होंने एक झूठ जरूर बोला और वो ये कि “किसी को हरा देना बेहद आसान है, लेकिन जीतना बेहद मुश्किल”। आप ही बताएं, जिस शख्स ने बिना किसी को हराए पूरी कायनात जीत ली हो, उसकी ये बात सच मानी भी जाए तो कैसे?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘वेश्या’ कहने के जवाब में ‘बेटी को पेश करो’ का नारा

पिछले कुछ दशकों में राजनीति में किस कदर गिरावट आई है, अब ये चर्चा का विषय नहीं रहा। अब तो आलम यह है कि राजनीति के दंगल में उतरने वाला हर खिलाड़ी और अधिक ‘गिरने’ का कोई नया फार्मूला साथ लाता है, तभी उसकी ‘दूकान’ चल पाती है। पहले राजनीति को धर्म माना जाता था। राजनीतिज्ञ नीति-सिद्धांतों का सहारा लेकर मुद्दों पर तकरार करते थे, लेकिन हाल के वर्षों में ये धर्म, संप्रदाय, जाति से व्यक्ति स्तर पर उतर चुका है। नेता जनहित के मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए व्यक्तिगत आरोप-प्रत्यारोप का सहारा लेने से जरा भी गुरेज नहीं करते। व्यक्तिगत टिप्पणी के साथ-साथ बड़ी बेशर्मी से परिवार को भी निशाना बनाया जा रहा है। इसी का ताजा नतीजा मायावती-दयाशंकर सिंह विवाद है।

दरअसल, हाल के दिनों में जिन नेताओं ने बसपा छोड़ी थी, उन्होंने मायावती पर टिकट बेचने के आरोप लगाए थे। इसी मुद्दे पर मायावती को घेरने की कोशिश में उत्तर प्रदेश भाजपा के उपाध्यक्ष दयाशंकर सिंह ने उनकी तुलना ‘वेश्या’ से कर दी। अगर वो मायावती पर केवल भ्रष्टाचार के आरोप लगाते तो बात कुछ और थी, लेकिन ‘अपशब्द’ का प्रयोग कर उन्होंने राजनीतिक मर्यादा की जिस तरह धज्जी उड़ाई उसकी निंदा पूरे देश ने की। हाल की चुनावी सफलताओं से उत्साहित भाजपा की गर्दन अपने एक वरिष्ठ पदाधिकारी की करतूत से झुक गई। दयाशंकर सिंह को पार्टी से निकाल देने के बावजूद उसकी गर्दन उठती नज़र ना आ रही थी। यूपी में उसकी भावी संभावनाओं पर ग्रहण-सा लगता दिखने लगा।

मायावती ने इस जलते तवे पर रोटी सेकने में जरा भी देर नहीं की। उन्होंने संसद में ललकार कर कहा कि यदि लोग (यानि उनके समर्थक और कार्यकर्ता) सड़कों पर उतर आएं तो ये उनकी जिम्मेदारी नहीं होगी। लोग सचमुच सड़कों पर उतरने भी लगे थे। मायावती के लिए ये मुद्दा किसी ‘संजीवनी’ से कम नहीं था। लेकिन हाय री मर्यादा, दयाशंकर सिंह ने तो उसे तार-तार किया ही था, मायावती की पार्टी ने तो उसका रेशा-रेशा निकाल कर रख दिया। बसपा महासचिव नसीमुद्दीन सिद्दिकी ने बड़ी निर्लज्जता से इस पूरे मामले में दयाशंकर सिंह की पत्नी और बेटी को घसीट लिया। पार्टी के लोग “दयाशंकर की बेटी को पेश करो” जैसे अभद्र नारे तक लगाने में नहीं हिचके।

अपने लोगों की इस शर्मनाक हरकत के बाद की स्थिति को जब तक मायावती समझ और सम्भाल पातीं तब तक बहुत देर हो चुकी थी। अब दयाशंकर सिंह की पत्नी स्वाति सिंह उनसे पूछ रही थीं कि उन्हें उनके पति के शब्दों पर आपत्ति हुई तो क्या उनकी बेटी को पेश करने का नारा गलत नहीं था? मायावती और उनकी पार्टी के नेता बताएं कि मैं अपनी बेटी कहाँ पेश करूँ? स्वाति के इन सवालों का जवाब मायावती दें भी तो क्या? राजनीति की माहिर खिलाड़ी ‘बहनजी’ को दयाशंकर सिंह की गृहिणी पत्नी पटखनी दे चुकी थीं। कल तो जो लोग बसपा सुप्रीमो के पक्ष में खड़े नजर आ रहे थे, अब वही दयाशंकर सिंह की पत्नी और बेटी के खेमे में दिख रहे थे। अपने प्रति जिस ‘सहानुभूति’ को मायावती वोट में तब्दील करने की जुगत में थीं वो उनसे छिटक कर स्वाति के आँचल से जा लगी थी।

दरअसल, स्वाति सिंह ने पूरे मामले को नारी अस्मिता से जोड़कर मायावती को उन्हीं की चाल से मात दे दी है। स्वाति सिंह पॉक्सो एक्ट के तहत अपने पति दयाशंकर सिंह, मायावती और नसीमुद्दीन सिद्दिकी पर एक जैसी कार्रवाई की मांग कर रही हैं। ऐसा नहीं होने पर उन्होंने धरने पर बैठने की चेतावनी दी है। स्वाति सिंह के इस कदम ने मायावती के सारे गणित को धता बता दिया है। कभी अपने बड़बोले बयानों और राजनीतिक तिकड़मों से विरोधियों के नाक में दम कर देने वाली मायावती आज स्वाति सिंह के इस पत्ते के आगे बेबस नजर आ रही हैं।

हमदर्दी का सैलाब जिस तरह स्वाति सिंह की ओर बह रहा है उसे देख मायावती की बौखलाहट बढ़ना स्वाभाविक है। आनन-फानन में लखनऊ पहुंचकर उन्होंने अपने कार्यकर्ताओं की क्लास लगाई है। मामले में कुछ नेताओं पर बिजली गिरने के भी संकेत मिल रहे हैं और पार्टी अब बचाव के लिए नई रणनीति तैयार कर रही है। इधर, भाजपा भी अब अपने ‘निर्वासित’ नेता के बचाव में खुलकर सामने आ गई है। यूपी भाजपा ने हाईकमान से दयाशंकर सिंह के निष्कासन को रद्द करने की मांग की है।

आने वाले वक्त में इस राजनीतिक उठा-पटक के कई और रंग देखने को मिलने वाले हैं। लेकिन, फिलहाल एक बात तो साफ हो गई है कि घर संभालने वाली साधारण सी महिला स्वाति सिंह ने कई बार यूपी को संभाल चुकीं मायावती को चारो खाने चित कर दिया है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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जारी है कोसी-गंगा व महानंदा का कहर

कोसी, पूर्णिया और पूर्वी इलाकों में कोसी-गंगा व महानंदा के बढ़ते जलस्तरों के कारण बाढ़ की भयावह स्थिति हो गई है | हर तरफ डूबने से लोगों की मौत हो रही है |

यह भी बता दें कि कोसी में पानी बढ़ने से इंडो-नेपाल सीमा बांध लगभग 30 मीटर तक बह गया है | इस सीमा बांध के टूटने से भारतीय भूमि पर 100 एकड़ में लगी धान की फसल बर्बाद हो गई है | साथ ही कोसी के कटाव से सहरसा-मानसी रेलखंड पर ट्रेन का परिचालन बंद हो गया है |

यह भी जान लें कि मधेपुरा के चौसा और आलमनगर प्रखंड की क्रमशः छह एवं तीन पंचायतें बाढ़ की चपेट में है | हर ओर एसडीआरएफ एवं मेडिकल-टीम को तैनात कर दिया गया है |

सहरसा जिले के नवहट्टा प्रखंड के डरहरा गांव में तेज कटाव के चलते गांव पर खतरा मंडरा रहा है | अररिया जिलें में ढाई सौ से अधिक गांव बाढ़ की चपेट में आ गए हैं | हजारों एकड़ की फसलें बर्बाद हो गई है | सड़कों पर 3 फीट तक पानी बह रहा है | विगत 24 घंटे के दौरान पूर्णिया-कटिहार जिले में 8 लोगों के मरने की खबर है |

एक तरफ जहां बाढ़ प्रभावित इलाकों में सबसे ज्यादा संकट शौचालय और पशुओं की चारा को लेकर है वहीं दूसरी तरफ लोग जान-जोखिम में डालकर पुराने नाव की सवारी करते हैं | और इस सबके बावजूद सरकार द्वारा बाढ़ प्रभावित इलाकों में 24 घंटे नजर रखने के निर्देश सभी अधिकारियों एवं विभागीय कर्मियों को दिये जा रहे हैं |

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जरा सोचिए क्या होता अगर अमिताभ ना होते !

अमिताभ बच्चन के ‘होने’ पर ना जाने कितनी बातें हुई हैं और कितनी होंगी, पर क्या आपने कभी सोचा कि अमिताभ बच्चन ना होते तो क्या होता..? चलिए जरा सोच कर देखते हैं। अमिताभ अगर ना होते तो शायद हिन्दुस्तान संवादों में बात नहीं करता। डायलागबॉजी एक पूर्णत: विकसित कला नहीं होती। चार यार-दोस्तों या अजनबियों के सामने अपनी बात रखते वक्त हमारी आवाज भारी होकर ‘बैरीटोन’ नहीं होती। आलोचनाओं के परे भी जाया जा सकता है, यह सिखाने के लिए कोई नहीं होता। अगर अमिताभ बच्चन नहीं होते तो हमारे पास, हमारी फिल्मों के पास, हमारे देश के पास सचमुच बहुत कुछ नहीं होता।
सबसे पहले तो शायद यह होता कि किसी कवि या लेखक का लड़का हीरो बनने का सपना नहीं देखता। या उससे पहले यह होता कि कोई साधारण नैन-नक्श वाला हद से ज्यादा लंबा और पतला एक नौकरीपेशा नौजवान फिल्मों में हीरो बनने के बारे में सोचकर खुद पर हंसता और फिर इसे भूल जाता। जी हाँ, बच्चन नहीं होते, तो रेडियो में आवाज का रिजेक्ट होना ‘कूल’ नहीं होता। राजेश खन्ना के बाद अगला सुपरस्टार सीधे शाहरुख खान को होना होता। चालीस सालों तक कोई कमर्शियल इंटरटेनमेंट की विधा को रॉकस्टार अंदाज में इतना नहीं साध पाता। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ और ‘क्या आप पांचवी पास से तेज हैं’, में कोई अंतर नहीं होता।

हॉलीवुड के रॉबर्ट डि नीरो, अल पचीनो, मार्लन ब्रांडो, क्लिंट ईस्टवुड, शॉन कॉनरी, हैरीसन फोर्ड का जवाब देने के लिए हमारे पास कोई अभिनेता नहीं होता। अमिताभ बच्चन नहीं होते, तो हीरो की बेहतरीन कॉमिक टाइमिंग से हमारी पहली मुलाकात गोविंदा ही कराते और हम कभी भी आईने के सामने खड़े होकर शराबी की तरह नहीं बहक पाते। बच्चन नहीं होते, तो तमाम तरह के आरोप लगाने के बावजूद हर निर्देशक का सपना उनके साथ काम करना नहीं होता। अभिनय ‘मेथड’ है या ‘नेचुरल’, हम इसी फेर में पड़े रह जाते।

बच्चन नहीं होते, तो नाम की तरह लिखे जाने वाले हमारे कुछ गिने-चुने सरनेमों में से एक कम हो जाता। हमारे पिता की पीढ़ी सफेद फ्रैंच कट दाढ़ी को नहीं अपनाती। सफेद शॉल फैशन नहीं बन पाती। तीन-चार पीढ़ियों को मिमिक्री का शौक नहीं लगता और हर शहर में बच्चन के बहरूपिये नहीं होते।

अगर बच्चन नहीं होते, तो हर बदलते वक्त में खुद को बदलने की अद्भुत क्षमता रखने वाले कलाकार से हमारा परिचय कभी नहीं हो पाता। री-इनवेंट कैसे किया जाता है अभिनय में, एक्टिंग क्लासों में नहीं सिखाया जा पाता, क्योंकि संदर्भ देने के लिए बच्चन नहीं होते। ‘मधुशाला’ महान ग्रंथ होता, लेकिन जनमानस में वैसे अंकित नहीं होता, जैसे अब है। एक कवि और उसकी कविताओं को नई टेक नहीं मिलती, नया आयाम नहीं मिलता, अगर उन कविताओं के साथ अमिताभ बच्चन नहीं होते।

अगर बच्चन नहीं होते तो हमें शाहरुख खान का इंतजार करना पड़ता यह समझने के लिए कि हर अभिनेता केवल फिल्मों में नहीं, हर वक्त अभिनय करता है। जहां कहीं भी जीवित मनुष्य पाया जाता है, अभिनेता अपनी ‘भूमिका’ में आ जाता है।

अगर बच्चन नहीं होते, हमें यह भी कम समझ आता कि राजनीति क्यूं हर किसी के बस की नहीं है। गांधी परिवार और बच्चन परिवार के बीच क्या बचा है और कितना टूट गया है, हमें कभी पूरा पता नहीं चलेगा, यह भी समझ नहीं आता। उत्तर प्रदेश में अपराध होते रहते, लेकिन वे विज्ञापन नहीं होते जो मुस्कुराते हुए बच्चन को अपराध कम हैं, कहने को मजबूर करते।

अमिताभ बच्चन ना होते तो ‘जुम्मा चुम्मा दे दे’ अश्लील हो जाता और हमारी होली ‘रंग बरसे’ बिना ही बीत जाती। कुछ लोग इस कदर निराले हो जाते हैं अपने काम से, कि फिर वे भले ही खराब फिल्में करें और दर्जनों घटिया विज्ञापन, हमें फर्क नहीं पड़ता, ये भी हम नहीं सीख पाते, अगर बच्चन नहीं होते।

अगर अमिताभ बच्चन नहीं होते, हमारा सिनेमा अभिनय के उस अनोखे मिजाज से महरूम रह जाता, जो किसी भी देश के सिनेमा की पहचान बनता है। वह घटना हिन्दुस्तान के इतिहास में नहीं होती, जिसमें किसी अभिनेता की सेट पर हुई दुर्घटना के बाद पूरा देश मिलकर उसके लिए प्रार्थना कर रहा था। बच्चन नहीं होते, तो गरिमा से बोली जाने वाली हिंदी अपने अस्तित्व को खोने के डर में जीती और फिल्मों में अंग्रेजी भाषा के रिक्त स्थानों को भरने वाली भाषा बनकर रह जाती।

वे अफवाहें और गॉसिप नहीं होतीं, जिसमें बच्चन होते। अमिताभ बच्चन रिटायर कब होंगे? क्या बच्चन विग पहनते हैं? सलमान खान को वे पसंद करते हैं या नहीं? रेखा से अभी भी बात-मुलाकात होती होगी क्या? बच्चन नहीं होते, तो हम यह भी नहीं सोचते कि सत्तर का हो जाने पर कौन-सा ‘खान’ उनके स्तर को छू पाएगा। कोई भी नहीं, हम यह भी नहीं कह पाते। ‘लिविंग लिजेंड’ जैसे शब्द को तमगा बनकर टंगने के लिए आदमी नहीं मिलता। देश को इकलौता ‘एंग्री यंग मैन’ नहीं मिलता। अमिताभ बच्चन नहीं होते, तो फिल्में थोड़ी कम अपनी लगतीं। हमें यह सब लिखने के लिए उपयुक्त इंसान नहीं मिलता। हम और हमारा देश, जितने हैं उतने, फिल्मी नहीं होते।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 [‘सत्याग्रह में प्रकाशित शुभम उपाध्याय के एक आलेख पर आधारित] 

 

 

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भारतीय क्रिकेट का ‘विराट’ इतिहास रचते कोहली

विराट दिन-ब-दिन और विराट होते जा रहे हैं। कल भारतीय क्रिकेट के इस धूमकेतु ने वेस्टइंडीज की धरती पर 200 रन बनाने के साथ ही कई रिकॉर्ड अपने नाम कर लिए। 1932 में भारतीय टीम को टेस्ट का दर्जा मिलने के बाद विदेशी धरती पर किसी भारतीय कप्तान का ये पहला दोहरा शतक है। इस शतक के साथ ही भारत ने 41 साल बाद वेस्टइंडीज के बेमिसाल खिलाड़ी और कप्तान क्लाइव लॉयड के उस दोहरे शतक का जवाब भी दे दिया जो उन्होंने साल 1975 में भारत में लगाया था।

विराट कोहली की ये पारी कई मायनों में खास है। उनकी इस पारी ने विदेश में 19 साल के उस सूखे को समाप्त कर दिया जो 1997 में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ सचिन तेन्दुलकर द्वारा बनाए गए 169 रनों के बाद से ही चला आ रहा था। सचिन के बाद कोई भी भारतीय कप्तान विदेशी धरती पर 150 के आंकड़े को पार नहीं कर पाया था। विराट कोहली ने अपने इस दोहरे शतक से कप्तान के तौर पर भी अपने दम-खम को साबित किया है। उनसे पहले साल 1990 में मोहम्मद अजहरूद्दीन ने कप्तान के रूप में ऑकलैंड में 192 रनों की शानदार पारी खेली थी।

दोहरे शतक की बात करें तो विराट कोहली से पहले भारतीय टीम के चार कप्तान दोहरा शतक जमा चुके हैं। नवाब पटौदी, सुनील गावस्कर, सचिन तेंदुलकर और महेन्द्र सिंह धोनी ने सैंकड़ा तो पार किया था लेकिन उन्होंने ये दोहरे शतक भारतीय धरती पर ही लगाये थे। एक कप्तान के तौर पर विराट कोहली वो पहले क्रिकेट खिलाड़ी हैं जिन्होंने ये कमाल विदेशी धरती पर कर दिखाया है। इसी के साथ विराट कोहली ने पूर्व भारतीय बल्लेबाज वीरेन्द्र सहवाग का एक बड़ा रिकॉर्ड भी अपने नाम कर लिया। इस पारी के बाद विराट भारत के लिए 12 टेस्ट शतक पूरे करने वाले दूसरे सबसे तेज बल्लेबाज बन गए हैं। वो सहवाग की 77 पारियों में 12 शतकों के रिकॉर्ड को तोड़कर उनसे आगे निकल गए हैं। कोहली ने ये उपलब्धि महज 72 पारियों में अपने नाम कर ली है।

इस शतक के साथ ही विराट कोहली ने अंतर्राष्ट्रीय क्रिकेट में 12 हजार रन भी पूरे कर लिए। ऐसा करने वाले वो आठवें भारतीय कप्तान बन गए हैं। विराट का ये 8वां शतक एशिया के बाहर है। वैसे अभी तक एशिया से बाहर सबसे ज्यादा शतक तेंदुलकर ने लगाया है। उन्होंने 18 शतक विदेशी धरती पर जड़े हैं। ये भी बता दें कि विराट कोहली ने कप्तान के रूप में विदेशी सरजमीं पर अब तक 12 पारियों में 76.27 की औसत से 839 रन बनाये हैं। उनसे बेहतर औसत सिर्फ महान बल्लेबाज सर डॉन ब्रैडमैन का है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

 

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हुनरमंद बनाये जायेंगे एक करोड़ युवा

वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिये गुरुवार को जिला मुख्यालय स्थित वि.वि. प्रेक्षागृह में एक दिवसीय प्रशिक्षण के तहत सीएम नीतीश कुमार ने नवनिर्वाचित ( सरपंच एवं पंचो को छोड़ ) सभी पंचायत प्रतिनिधियों को विकास योजनाओं की जानकारी देने हेतु संवाद किया | बापू के सपनों को साकार करने हेतु C.M. ने अपने सात निश्चयों की विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि पंचायती राज को सशक्त बनाने हेतु सत्ता का विकेंद्रीकरण आवश्यक है | तभी तो पंचायत प्रतिनिधियों को अब लोक सेवक का दर्जा दिया जा चुका है | साथ ही कानून में संशोधन करते हुए महिलाओं के लिए एक तिहाई स्थान आरक्षित कर दिया गया है |

यह भी बता दें कि मुख्यमंत्री ने एक करोड़ युवाओं को प्रोत्साहित कर दशरथ मांझी कौशल विकास योजनाओं के तहत हुनरमंद बनाये जाने तथा राज्य सरकार की सेवाओं में महिलाओं को 35% आरक्षण दिये जाने की चर्चा की | उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने से सामाजिक परिवर्तन की गति तेज होने का अहसास हम सभी महसूसने लगे हैं |

इससे पहले मधेपुरा के डायनेमिक डी.एम. मो.सोहैल, दूसरी बार निर्वाचित जिप अध्यक्ष मंजू देवी, विधायक प्रोफेसर रमेश ऋषि देव आदि ने दीप प्रज्वलित कर एक दिवसीय उन्मुखीकरण कार्यशाला का शुभारंभ किया | प्रशिक्षण का शुभारंभ करते हुए डीएम ने कहा कि सीएम द्वारा अब वार्ड सदस्य तक को भी योजनाओं की स्वीकृति का अधिकार दे दिया गया है | विकास को गति देने के लिए हम सबको प्रतिबद्धता के साथ काम करना होगा |

जिला परिषद अध्यक्ष मंजू देवी ने पंचायती राज प्रतिनिधियों को ग्रामीण विकास की सभी योजनाओं को शीघ्रातिशीघ्र कार्यांवित करने का आह्वान किया | उन्होंने शराबबंदी को सफल बनाने की पुरजोर अपील की |

विधायक प्रो.रमेश ऋषिदेव एवं विधायक निरंजन कुमार मेहता ने कहा कि मुख्यमंत्री के विकास कार्यक्रमों को गति देने के लिए पंचायत प्रतिनिधियों को आगे बढ़कर सहयोग करना होगा |

कार्यक्रम का संचालन करते हुए विकास आयुक्त मिथिलेश कुमार ने पंचायती राज प्रतिनिधियों को अपने विकास कार्यों में तेजी लाने की सलाह दी | मौके पर प्रबंधक नौशाद अहमद खां, डीपीआरओ क्यूम अंसारी, डीपीओ राखी कुमारी, डीईओ बद्री प्रसाद मंडल, जिला परिषद उपाध्यक्ष रघुनंदन दास, डीआईओ सुनील कुमार आदि उपस्थित थे |

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