आगे बढ़ने के लिए पढ़ना पड़ता है और………..!

हॉली क्रॉस स्कूल द्वारा वार्षिक खेलकूद समारोह- 2016 को ऐसा उत्सवी माहौल का स्वरूप सचिव गजेन्द्र कुमार एवं प्राचार्या डॉ.वन्दना कुमारी द्वारा दिया गया जैसा यह स्कूल पूरे साल भर बच्चों के पठन-पाठन हेतु नित्य नये-नये उत्साहवर्धक व्यवहारिक प्रयोगों को जुटाने में लगा रहता है |

यह भी बता दें कि उद्घाटन सत्र के आरम्भ में जहां स्कूली बच्चे-बच्चियों द्वारा पुष्प-पंखुड़ियों व पुष्पांजलियों द्वारा उद्घाटनकर्ता के रूप में जिले के डायनेमिक डी.एम. मो.सोहैल, मुख्य अतिथि की भूमिका में समाजसेवी साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र नारायण मधेपुरी एवं स्पेशल गेस्ट के रुप में सिविल जज श्री नीरज कुमार का भाव-भीनी स्वागत किया गया वहीं मंचासीन होने पर स्कूल-परिवार की ओर से अंगवस्त्रम व पुष्पगुच्छादि के साथ “अतिथि देवोभव” की तरह सुस्वागतम गीत अर्पित किया गया | लगे हाथ प्राचार्या डॉ.वन्दना कुमारी ने स्वागत भाषण के दरमियान कहा कि बच्चे-बच्चियों के बेहतरीन भविष्य के लिए यह विद्यालय अहर्निश काम करता है |

From LtoR Judge Sri Neeraj Kumar, DM Md.Sohail and Samajsevi Dr.Bhupendra Narayan Madhepuri inaugurating annual function at Holy Cross School Madhepura.
From LtoR Judge Sri Neeraj Kumar, DM Md.Sohail and Samajsevi Dr.Bhupendra Narayan Madhepuri inaugurating annual function at Holy Cross School Madhepura.

उद्घाटन भाषण देते हुए डीएम मो.सोहैल (भा.प्र.से.) ने कहा कि हॉली क्रॉस जिले के सर्वश्रेष्ठ स्कूल कहलाने योग्य है | यहां के छात्र मेडिकल व इंजीनिरिंग में कम्पीट करने लगे है | इसके लिए उन्होंने स्कूल के शिक्षकों एवं प्रबंधन को बधाई दी |

डॉ.मधेपुरी ने अपने सम्बोधन में कहा कि आगे बढ़ने के लिए पढ़ना पड़ता है और स्वस्थ रहने के लिए खेलकूद में भाग लेते रहना पड़ता है | उन्होंने डॉ.कलाम की चर्चा करते हुए कहा कि सूरज की तरह चमकने के लिए सूरज की तरह जलना पड़ता है |

खेलकूद प्रतियोगिता में दौड़, लम्बी कूद, शॉट पुट, जेबलीन थ्रो, कबड्डी आदि में विभिन्न वर्गों की छात्र-छात्राओं ने भाग लिया | 50 मीटर दौड़ में प्रथम-द्वितीय एवं तृतीय स्थान पर रही- अन्नु-संध्या रानी एवं रत्ना भारती……….|

मौके पर एएसपी राजेश कुमार, स्काउट गाइड के आयुक्त जयकृष्ण यादव, टेबल टेनिस के प्रदीप श्रीवास्तव, क्रिकेट के त्रिदीप गांगुली, खेलगुरु संत कुमार, संजीव कुमार, व्यावसायिक प्रकोष्ठ के अध्यक्ष अशोक चौधरी, माया विद्या निकेतन की प्राचार्या चन्द्रिका यादव, पत्रकार पृथ्वीराज यदुवंशी, ब्यूरोचीफ जागरण धर्मेन्द्र भारद्वाज, ब्यूरोचीफ प्रभात खबर रुपेश कुमार, दिलखुश, प्रवीर आशीष कुमार आदि सहित छात्र-छात्राएं शिक्षक-अभिभावक उपस्थित देखे गये |

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वैशाली राज्यस्तरीय युवा उत्सव में मधेपुरा की धमक !

जहां कुछ ही महीने पूर्व मधेपुरा के डायनेमिक डी.एम. मो.सोहैल की टीम ने बी.एन.मंडल स्टेडियम में राज्यस्तरीय कबड्डी प्रतियोगिता को राष्ट्रीय स्तर की ऊंचाई प्रदान करने में सफलता पाई और बालक-बालिका दोनों वर्गों के खिलाड़ियों की दमदार प्रदर्शन कर फाइनल में भी अपना जगह बनाई- वहीं वैशाली जिले में आयोजित हो रहे त्रिदिवसीय राज्यस्तरीय युवा उत्सव में मधेपुरा जिले की धमाकेदार उपस्थिति दर्ज कराने डी.एम. मो.सोहैल (भा.प्र.से.) ने कला स्थायी समिति के सदस्य डॉ.भूपेन्द्र नारायण मधेपुरी एवं मो.शौकत अली की उपस्थिति में हरी झंडी दिखाकर (15-35 वर्ष वाले) सभी प्रतिभागी कलाकारों को यह कहते हुए विदा किया कि सभी कलाकार पूरे अनुशासन में रहकर मधेपुरा जिला का नाम रोशन करेंगे और कोई किसी तरह की परेशानी महसूसेंगे तो समाधान के लिए सीधे हमसे बात करेंगे |

यह भी बता दें कि शास्त्रीय नृत्य व संगीत में श्रेष्ठता प्राप्त स्वर शोभिता महाविद्यालय की हेम-लता की टीम से लेकर नाटक में मो.शहंशाह की टीम सहित वाद्य-वादन एवं सुगम संगीत आदि अन्य विधाओं में अपनी धमाकेदार उपस्थिति तथा प्रस्तुति देने हेतु दो बसों में तक़रीबन सौ के लगभग कलाकार सवार हुए | एक बस में महिला कलाकारों ने जगह ली इसका नेतृत्व स्थाई समिति की सदस्या श्रीमती रेखा यादव एवं दूसरी बस पुरुष दल के लिए जिसका नेतृत्व नवोदय विद्यालय के आचार्य डॉ.रवि रंजन के हाथों सौंपा गया | मौके पर कलाकारों के उत्साह वर्धन के लिए मधेपुरा के दर्जनों कलाप्रेमी लोग उपस्थित थे |

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आर्ट्स टीचिंग प्वाइंट का शुभारम्भ

सदर प्रखंड के भर्राही बाजार के आस-पास के साधारण एवं गरीब परिवार के छात्र-छात्राओं में शिक्षा के प्रति जागरूकता लाने और नियमितरुप से कम खर्च में सोशल सायन्स के विषयों को सुव्यवस्थित ढंग से पढ़ाने के लिए गुलशन कुमार, अंशुमन कुमार, मुकेश कुमार आदि का यह सोच समाज को आगे ले जाने में सहयोग करता रहेगा |

इस नायाब कार्यक्रम में समाजसेवी-शिक्षाविद डॉ.भूपेन्द्र नारायण मधेपुरी द्वारा मुख्यअतिथि व शिक्षानुरागी सूर्य नारायण मंडल की उपस्थिति में उद्घाटन करते हुए उपस्थित बच्चे-बच्चियों व अभिभावकों को बिहार के प्रथम विधि मंत्री शिवनन्दन प्रसाद मंडल के अन्तर्मन में सदा पलते रहे विचारों से अवगत कराया और कहा-

Educate your children, Educate all of your children and Educate everyone of your children.       

इसके अतिरिक्त उद्घाटन कर्ता डॉ.मधेपुरी ने शिवनंदन बाबू के जीवन के सर्वश्रेष्ठ दर्शन को दर्शकों के सामने परोसते हुए कहा-

No soul should remain uneducated on the Earth.     

मुख्य अतिथि के रुप में सूर्य नारायण मंडल ने यही कहा कि शिक्षा के विकास के प्रति हम सजग रहे हैं और ताजिन्दगी सजग रहेंगे |

इस अवसर पर स्थानीय विद्यालयों में सर्वाधिक अंक प्राप्त करने वाली छात्राओं को उद्घाटनकर्ता डॉ.मधेपुरी द्वारा मेडल व मोमेंटो देकर सम्मानित किया गया | सम्मानित होने वाली छात्राएं- लूसी-सोनी-पूजा भारती-रुपम-मनीषा-कल्पना आदि रही | अंत में निदेशक गुलशन कुमार द्वारा उपस्थित अभिभावकों सुरेंन्द्र प्रसाद गुप्ता, उपेन्द्र साह, मृत्युंजय कुमार, विवेक सिंह आदि से सहयोग की कामना करते हुए धन्यवाद ज्ञापित किया गया |

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मधेपुरा में अंबेडकर की पुण्यतिथि पर महोत्सवी धूम

एक ओर जहाँ डायनेमिक डी.एम. मो. सोहैल एवं डीडीसी मिथिलेश कुमार की टीम ने समाहरणालय स्थित बाबा साहब डॉ. भीम राव अंबेडकर की प्रतिमा पर माल्यार्पण करते हुए कहा कि डॉ. अंबेडकर भारत के संविधान निर्माता के रूप में सदा याद किए जाएंगे वहीं दूसरी ओर अंबेडकर की पुण्यतिथि पर टी.पी. कॉलेज के अंबेडकर कल्याण छात्रावास में प्रधानाचार्य डॉ. एच.एल.एस. जौहरी, छात्रावास अधीक्षक डॉ. जवाहर पासवान, प्रो. दयानंद यादव सहित प्राध्यापकों एवं छात्रों ने विस्तार से उनके जीवन-संघर्ष की चर्चा कीं तथा समाज की बेहतरी के लिए उनके जीवन-दर्शन को सामाजिक धरातल पर उतारने की सीख दी।

यह भी बता दें कि जहाँ एक ओर विभिन्न संगठनों सहित जनाधिकार पार्टी से लेकर पी.एस. कॉलेज में एबीवीपी द्वारा अंबेडकर के विचारों को जन-जन तक ले जाने के लिए मधेपुरा में कार्यक्रमों की झड़ी लगा दी गई, वहीं स्थानीय शिवनंदन प्रसाद मंडल विधि महाविद्यालय में जदयू के बैनर तले जदयू के जिलाध्यक्ष प्रो. विजेन्द्र नारायण यादव की अध्यक्षता में कार्यक्रम का आयोजन किया गया।

जदयू के उक्त कार्यक्रम के मुख्य वक्ता के रूप में समाजसेवी-साहित्यकार डॉ. भूपेन्द्र मधेपुरी ने डॉ. अंबेडकर के जीवन-दर्शन पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि बिना संघर्ष के कोई भी परिवर्तन संभव नहीं है। डॉ. मधेपुरी ने जिला महिला सेल की अध्यक्षा मीना, डॉ. रत्नदीप, मंच संचालक डॉ. नीलाकांत, जिला संगठन प्रभारी भगवान चौधरी सहित विधायक रमेश ऋषिदेव, नरेश पासवान, कमल राम, हरिनंदन यादव, अशोक चौधरी एवं शिवनारायण-अमलेश-प्रदीप सरीखे उपस्थित जुझारू कार्यकर्ताओं एवं वक्ताओं को संबोधित करते हुए मधेपुरा के अतीत की विस्तार से चर्चा की और कहा कि बिना अतीत को जाने हम ना तो अपने भविष्य को गढ़ सकते हैं और ना वर्तमान में एक कदम आगे बढ़ सकते हैं। उन्होंने अंबेडकर के साथ-साथ रासबिहारी लाल मंडल, शिवनंदन प्रसाद मंडल, भूपेन्द्र नारायण मंडल, बी.पी. मंडल, संविधान सभा सदस्य कमलेश्वरी प्रसाद यादव आदि महापुरुषों द्वारा सामाजिक उत्थान में किए गए कार्यों की भी विस्तार से चर्चा की। अंत में देश की एकता एवं अखंडता के संकल्प के साथ डॉ. नीलाकांत ने धन्यवाद ज्ञापित किया।

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बिग बी ने बताई सोशल मीडिया पर आने की ‘शर्त’

“अगर आप लोगों का गुस्सा, गालियां और तंज झेलने के लिए तैयार नहीं हैं तो आपको सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर नहीं आना चाहिए।” यह कहना है बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्चन का। बकौल अमिताभ आलोचना से अपना मूल्यांकन करने का अवसर मिलता है, इसीलिए वे आलोचना को सकारात्मक तरीके से लेते हैं।
गौरतलब है कि बिग बी सोशल मीडिया के जरिए अपने फैंस से लगातार सम्पर्क बनाए रखते हैं। फेसबुक, ट्विटर और ब्लॉग के माध्यम से अपने प्रशंसकों को लगातार अपडेट करते रहते हैं। सोशल मीडिया को लेकर उम्र के 75वें पड़ाव पर वे जितने उत्सुक, उत्साहित, सजग और सक्रिय हैं उतना आज की पीढ़ी के कलाकार भी नहीं। हाल ही में एक कार्यक्रम के दौरान वे और करन जौहर प्रशंसकों और मीडिया से बातचीत कर रहे थे। उस दौरान बॉलीवुड के शहंशाह ने मीडिया, सोशल मीडिया और फिल्मों में अपनी भूमिका को लेकर खुलकर बात की। उन्होंने कहा कि अगर आप लोगों का गुस्सा झेलने और ‘ट्रॉल’ किए जाने के लिए तैयार नहीं हैं तो आपको सोशल मीडिया पर नहीं आना चाहिए।
फिल्म को हिट बनाने के फॉर्मूले पर अमिताभ बच्चन का कहना है कि इतने साल काम करने के बाद भी मैं यह नहीं समझ पाया हूँ कि कौन-सी फिल्म दर्शकों को पसंद आएगी और कौन-सी नहीं। इसलिए मैं सिर्फ अपने काम को बेहतर करने का प्रयास करता हूँ। जरूरी होता है तो लेखक-निर्देशक से सलाह-मशविरा कर लेता हूँ।
अपने भीतर झाँकते रहना और जरूरी परिवर्तन करना यानि समय के साथ चलना, थोड़ा उसमें ढलना और थोड़ा उसे अपने अनुसार ढाल लेना – अमिताभ बच्चन या उन जैसी किसी भी सफल शख्सियत की सफलता की ये सबसे बड़ी कुंजी रही है। अमिताभ अपने जीवन में आने-वाले तमाम उतार-चढ़ाव के बीच इस एक कुंजी को थामे रहे हैं, इसीलिए आज वे अपने जैसे अकेले हैं, सदी के सैकड़ों नायकों के बीच अकेले महानायक हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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‘द नेशन हैज लॉस्ट एन आइकन’

तमिलनाडु की मुख्यमंत्री और वहाँ की सबसे लोकप्रिय नेता जे जयललिता का सोमवार रात 11.30 बजे निधन हो गया। रविवार को उनकी हृदयगति रुक जाने के बाद से विशेषज्ञ डॉक्टरों की एक बड़ी टीम उनके इलाज में जुटी हुई थी, लेकिन हर संभव कोशिश और लाखों लोगों की दुआओं के बावजूद उनकी जान नहीं बचाई जा सकी। बता दें कि जयललिता बुखार और डिहाइड्रेशन की शिकायत के बाद 22 सितंबर से ही चेन्नई स्थित अपोलो अस्पताल में भर्ती थीं।
तमिलनाडु की राजनीति में ‘अम्मा’ के नाम से मशहूर जयललिता का जन्म 24 फरवरी 1948 को एक रूढ़िवादी तमिल ब्राह्मण परिवार में हुआ था। छह बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री रहीं जयललिता को शुरुआती लोकप्रियता एक नेता के तौर पर नहीं बल्कि अभिनेत्री के तौर पर मिली थी। दक्षिण भारतीय सिनेमा की अत्यन्त सफल अभिनेत्रियों में शुमार जयललिता का राजनीतिक करियर 1982 में शुरू हुआ। सिनेमा से लेकर राजनीति तक में लोकप्रियता का नया मापदंड रचने वाले और एआईएडीएमके के संस्थापक एमजी रामचंद्रन इस खूबसूरत अभिनेत्री को राज्य की राजनीति में लेकर आए थे।
1987 में एमजीआर की मृत्यु ने तमिलनाडु की राजनीति के साथ-साथ एआईएडीएमके की राजनीति में भी भूचाल ला दिया। पार्टी जयललिता और एमजीआर की पत्नी जानकी रामचंद्रन के बीच दो हिस्सों में टूट गई। वर्चस्व की लंबी लड़ाई और एआईएडीएमके में कई उतार-चढ़ाव के बाद जयललिता एमजीआर की राजनीतिक वारिस और तमिलनाडु की कद्दावर नेता बनकर उभरीं और 1991 में पहली बार कांग्रेस की मदद से राज्य की सबसे कम उम्र की मुख्यमंत्री बनीं। इसके बाद उन्होंने फिर पीछे मुड़कर नहीं देखा। 2016 के विधानसभा चुनाव में सारे अनुमानों को धता बताते हुए उन्होंने तमिलनाडु में सत्ता परिवर्तन की परिपाटी को भी ध्वस्त कर दिया। इस जीत के बाद वो छठी बार राज्य की मुख्यमंत्री बनी थीं।
जयललिता के निधन के बाद हमारे राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने गलत नहीं कहा कि ‘नेशन हैज लॉस्ट एन आइकन’। सच तो यह है कि जयललिता एक नहीं, कई लिहाज से आइकन थीं। पहले तो बहुत छोटी उम्र में वो सिनेमा की आइकन बनीं। वो भी ऐसी कि दक्षिण के सिनेमा का सबसे बड़ा नाम एमजीआर भी उनके बिना अधूरा है। एमजीआर ने एक नहीं, दो नहीं, पूरी अट्ठाइस फिल्में जयललिता के साथ कीं। और जब वही जयललिता राजनीति में आईं तब तमाम अवरोधों और विरोधों के बावजूद वो राजनीति की आइकन बनीं। वो भी ऐसी कि एमजीआर की मृत्यु से लेकर अपनी मृत्यु तक तमिलनाडु की राजनीति की धुरी रहीं। सिनेमा और राजनीति की आइकन होने के साथ-साथ वो तमिलनाडु की महिलाओं की आइकन भी थीं। वो भी ऐसी कि वहाँ की महिलाएं उन्हें भगवान मानती थीं और हजारों की संख्या में ऐसे पुरुष भी मिलेंगे आपको जो विमान से उनके उड़ जाने तक पूरी श्रद्धा से दंडवत किए रहते थे।
अपने समर्थकों के लिए जयललिता एक ऐसी महिला थीं, जिन्हें उनके विरोधियों ने खूब परेशान किया। खासकर विरोधी दल डीएमके के नेता करुणानिधि ने। जयललिता के लिए उनके समर्थकों की चाहत हर तर्क से परे थी और उसी अनुपात में ‘अम्मा’ उन पर लुभावनी योजनाओं की बौछार करती थीं। मिक्सी, ग्राइंडर, सिलाई मशीन, बकरी, बच्चों के लिए साइकिल, लैपटॉप जैसी चीजें उनके लिए आसानी से उपलब्ध थीं, उन्हें राशन की दुकानों से बीस किलो चावल के बैग मुफ्त मिलते थे और ‘अम्मा कैंटीन’ से वे रियायती दर पर मन भर खाना खा सकते थे।
देखा जाय तो जयललिता एक साधारण महिला ही थीं, लेकिन उनकी ज़िन्दगी असाधारण बन गई। उनके करिश्मे और पार्टी की उन पर निर्भरता ने एक ऐसा रिश्ता बना दिया जिसे बाहरी लोगों के लिए समझना मुश्किल है। बड़े-से-बड़े निर्णय वे बिना देर किए लेती थीं और अपने निकटतम लोगों से भी एक निश्चित दूरी बना कर रखती थीं। उनका आभामंडल कुछ ऐसा था कि शासन के दौरान सत्ता के गलियारों में डर का माहौल रहता था। मंत्री और उच्चाधिकारी चुप्पी साधे रहते थे। उनकी मर्जी के बिना कोई शब्द भी बोलने का साहस नहीं कर सकता था।
जयललिता का नाता कर्नाटक से था, उन्होंने एक ब्राह्ण परिवार में जन्म लिया और वो एक अभिनेत्री रह चुकी थीं। यानि उनके साथ तमाम ऐसी चीजें थीं जो उन्हें कामयाब होने से रोक सकती थीं, लेकिन वो एक द्रविड़ पार्टी की प्रमुख बनीं, जिसकी नींव ब्राह्मणों के विरोध के लिए पड़ी थी और वो अपने मेंटर एमजीआर की जगह लेने में कामयाब रहीं जिन्हें ‘देवतुल्य’ माना जाता था।
जयललिता पर भ्रष्टाचार के आरोपों में कई अदालती मामले थे। आय से अधिक सम्पत्ति मामले में उन्हें कुछ देर के लिए ही सही, जेल भी जाना पड़ा। लेकिन वो अपनी पार्टी और राज्य के लिए किंवदंती थीं, इसमें कोई दो राय नहीं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

The Last Journey of Jayalalitha
The Last Journey of Jayalalitha

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ओबामा, ट्रम्प और असांजे मिलकर भी मोदी से पीछे

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने प्रतिष्ठित अंतर्राष्ट्रीय पत्रिका ‘टाइम’ के ‘पर्सन ऑफ द इयर’ खिताब के लिए ऑनलाइन रीडर्स पोल जीत लिया है। इस खिताब के लिए उनका मुकाबला दुनिया भर के कई राजनेताओं, कलाकारों और अन्य क्षेत्रों की बड़ी हस्तियों के साथ है। गौरतलब है कि पाठकों द्वारा दिए जाने वाले वोटों के हिसाब से मोदी पहले नंबर पर जरूर हैं लेकिन यह खिताब किसे दिया जाए, इसका अंतिम निर्णय पत्रिका के संपादकों द्वारा किया जाता है। विजेता के नाम की घोषणा 7 दिसंबर को की जाएगी।

बहरहाल, रविवार रात को बंद की गई वोटिंग में मोदी को 18 प्रतिशत पाठकों के वोट मिले। दिलचस्प बात यह कि भारतीय प्रधानंमंत्री का नजदीकी मुकाबला जिन तीन महारथियों – बराक ओबामा, डोनाल्ड ट्रम्प और जूलियन असांजे – से रहा, वे तीनों एक साथ मिलकर भी महज 7 प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाए। इस खिताब की दावेदारी में हिलेरी क्लिंटन (4 प्रतिशत) और मार्क जुकरबर्ग (2 प्रतिशत) भी थे। लेकिन मोदी ने लोकप्रियता में सबको बहुत पीछे छोड़ दिया। मोदी को मिले वोटों का विश्लेषण करने पर पाया गया कि उन्हें न केवल भारत से बल्कि अमेरिका के कैलिफोर्निया और न्यू जर्सी जैसे शहरों से भी काफी वोट मिले।

बता दें कि हर वर्ष ‘टाइम’ पत्रिका साल के सबसे प्रभावशाली शख्स का चुनाव करती है। इस खिताब के लिए चुनी गई हस्ती को सकारात्मक और नकारात्मक दोनों ही कारणों से चुना जा सकता है। किस शख्स का प्रभाव इस साल पूरी दुनिया में सबसे ज्यादा रहा, इस आधार पर विजेता के नाम का चुनाव किया जाता है। वैसे यह लगातार चौथा साल है, जब इस खिताब के दावेदारों में मोदी को शुमार किया गया है। इससे पहले साल 2014 में भी मोदी को ‘टाइम पर्सन ऑफ द इयर’ के ऑनलाइन पोल में जीत मिली थी, लेकिन पत्रिका के संपादकों द्वारा इस खिताब के लिए चुने गए आठ लोगों की सूची में वे जगह नहीं बना सके थे। चलते-चलते यह भी बता दें कि साल 2012 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा, 2013 में पोप फ्रांसिस, 2014 में इबोला फाइटर्स और 2015 में जर्मन चांसलर एंजेला मार्केल को ‘टाइम पर्सन ऑफ द इयर’ घोषित किया गया था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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डॉ. राजेन्द्र प्रसाद से जुड़े पाँच अनछुए प्रसंग

कल स्वतंत्र भारत के प्रथम राष्ट्रपति देशरत्न डॉ. राजेन्द्र प्रसाद की 132वीं जयंती थी। बिहार के जीरादेई में 3 दिसम्बर 1884 को जन्मे राजेन्द्र बाबू ने अपनी अन्तिम सांस भी बिहार में ही पटना स्थित सदाकत आश्रम में 28 फरवरी 1963 को ली। वे विलक्षण छात्र, आदर्श शिक्षक, सफल अधिवक्ता, प्रभावशाली लेखक, समर्पित गांधीवादी और स्वतंत्रता आन्दोलन में अपना सर्वस्व झोंक देने वाले सेनानी थे। ‘सादा जीवन उच्च विचार’ क्या होता है, ये समझने के लिए उनसे बेहतर उदाहरण हमें ढूंढ़े नहीं मिलेगा। 1950 से 1962 तक वे देश के ‘प्रथम नागरिक’ की भूमिका में रहे। अवकाश ग्रहण करने के बाद 1962 में ही उन्हें ‘भारतरत्न’ से नवाजा गया। कहने की जरूरत नहीं कि उनका सारा जीवन ही अनमोल धरोहर है और उनकी जयंती पर कृतज्ञ राष्ट्र ने उन्हें कई-कई तरह से याद किया। चलिए, आज बिहार को अखंड गौरव देने वाले इस सपूत से जुड़े कुछ ऐसे रोचक प्रसंग से रू-ब-रू होते हैं, जिनसे बहुत कम लोग वाकिफ हैं।

उत्तर प्रदेश से बिहार आए थे राजेन्द्र बाबू के पूर्वज

राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वज मूलरूप से कुआं गांव, अमोढ़ा (उत्तर प्रदेश) के निवासी थे। इनका कायस्थ परिवार था। यहाँ के कुछ कायस्थ परिवार इस स्थान को छोड़ बलिया जा बसे थे। कुछ परिवारों को बलिया भी रास नहीं आया और वे वहाँ से बिहार के सारन जिले के एक गांव जीरादेई में जा बसे। इन्हीं परिवारों में राजेन्द्र प्रसाद के पूर्वजों का परिवार भी था। जीरादेई के पास ही एक छोटी-सी रियासत थी – हथुआ। राजेन्द्र बाबू के दादा को पढ़े-लिखे होने के कारण इस हथिया रियासत की दीवानी मिल गई। वे 25-30 साल तक इस रियासत के दीवान रहे। धीरे-धीरे उन्होंने स्वयं भी कुछ जमीन खरीद ली। राजेन्द्र बाबू के पिता महादेव सहाय इस जमींदारी की देखभाल करते थे।

बारात के वधू के घर पहुँचने पर पालकी में सोए मिले वर राजेन्द्र प्रसाद

राजेन्द्र प्रसाद का विवाह 12 साल की उम्र में हुआ था। घोडों, बैलगाड़ियों और हाथी के साथ चली उनकी बारात को वधू राजवंशी देवी के घर पहुँचने में दो दिन लगे थे। वर राजेन्द्र प्रसाद चांदी की पालकी में सज-धज कर बैठे थे। लम्बी यात्रा के बाद बारात मध्य रात्रि को वधू के घर पहुँची। उस वक्त राजेन्द्र बाबू पालकी में सोए मिले। बड़ी कठिनाई से उन्हें विवाह की रस्म के लिए उठाया गया।

पत्नी के संग बहुत कम बिता पाते थे समय

राजेन्द्र बाबू की धर्मपत्नी उन दिनों के रिवाज के अनुसार ज्यादातर पर्दे में ही रहती थीं। छुट्टियों में घर जाने पर अपनी पत्नी को देखने या उनसे बोलने का उन्हें बहुत ही कम अवसर मिलता था। बाद में जब राजेन्द्र प्रसाद राष्ट्रीय आन्दोलन में शामिल हो गए, तब पत्नी से मिलना और भी कम हो गया। वास्तव में विवाह के प्रथम पचास वर्षों में दोनों पति-पत्नी मुश्किल से पचास महीने साथ रहे होंगे।

धरी रह गई इंग्लैण्ड जाने की तैयारी

छात्रजीवन के दौरान राजेन्द्र प्रसाद आई.सी.एस. की परीक्षा देने के लिए इंग्लैण्ड जाना चाहते थे, पर उन्हें डर था कि परिवार के लोग इतनी दूर जाने की अनुमति कभी नहीं देंगे। इसीलिए उन्होंने बड़े ही गुप्त तरीके से जहाज से इंग्लैण्ड जाने के लिए सीट का आरक्षण करवाया और बाकी प्रबंध भी कर लिया। यहाँ तक कि इंग्लैण्ड में पहनने के लिए दो सूट भी सिलवा लिए। लेकिन जिसका उन्हें डर था वही हुआ। उनके पिता ने उन्हें अनुमति नहीं दी और उन्हें बड़ी अनिच्छा से इंग्लैण्ड जाने का विचार छोड़ना पड़ा।

आज भी चालू है उनका खाता

राजेन्द्र प्रसाद के देहावसान के 50 वर्ष से ज्यादा गुजर गए, लेकिन उनका बैंक खाता उनके सम्मान में आज भी चालू है। राजेन्द्र बाबू ने मृत्यु से कुछ समय पहले ही सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक ‘पंजाब नेशनल बैंक’ में अपना खोता खोला था। यह खाता बैंक की पटना स्थित एग्जीबिशन रोड शाखा में 24 अक्टूबर 1962 को खोला गया था। बैंक उन्हें गर्व से अपना प्रथम ग्राहक कहता है। प्राप्त जानकारी के मुताबिक फिलहाल उनके खाते में 1,213 से कुछ अधिक रुपए हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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मधेपुरा कॉलेज में मना भव्य एनसीसी दिवस

एक ओर जहां जिले के विभिन्न शैक्षणिक संस्थाओं में एनसीसी दिवस के अवसर पर पोस्टर निर्माण से लेकर पौध रोपण एवं वाद-विवाद प्रतियोगिता सहित भिन्न-भिन्न प्रकार के आयोजन किये गये वहीं मधेपुरा कॉलेज में प्राचार्य डॉ.अशोक कुमार द्वारा आयोजित दो दिवसीय आयोजन का उद्घाटन समाजसेवी-साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र नारायण मधेपुरी ने दीप प्रज्वलित कर किया |

The audience enjoying N.C.C. Day celebrations- 2016 in the Hall of Madhepura College , Madhepura
The audience enjoying N.C.C. Day celebrations- 2016 in the Hall of Madhepura College , Madhepura.

यह भी बता दें कि एनसीसी दिवस की पूर्व संध्या पर कॉलेज के एनसीसी कैडेटों की साइकिल रैली को प्राचार्य डॉ.अशोक कुमार ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया जो भूपेन्द्र चौक, बी.पी. मंडल चौक, कर्पूरी चौक, सुभाष चौक होते हुए पूरे शहर का परिभ्रमण किया |

और जहां एनसीसी दिवस पर स्वागताध्यक्ष की भूमिका का निर्वहन करते हुए प्राचार्य ने उद्घाटनकर्ता डॉ.मधेपुरी, अध्यक्ष ओमप्रकाश भारती सहित विशिष्ट अतिथिद्वय डॉ.विनय कुमार चौधरी, डॉ.सिद्देश्वर काश्यप के साथ-साथ लेफ्टिनेंट प्रो.गौतम कुमार व रंगकर्मी विकास कुमार को यथायोग्य संबोधन के साथ स्वागत करते हुए कहा कि एनसीसी कैडेट सदैव समर्पण व कर्मठता के साथ समाज निर्माण से लेकर राष्ट्र की सेवा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते रहे हैं, वहीं कार्यक्रम का आरंभ करते हुए डॉ.काश्यप ने “माँ तुम्हें हर सलाम है” गजल को तरन्नुम में गाकर समा बांध दिया और लगे हाथ डॉ.चौधरी ने अपने संबोधन में यही कहा कि देश की अस्मिता युवा पीढ़ी से ही सुरक्षित है |

उद्घाटनकर्ता डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने एनसीसी दिवस के अवसर पर अपने संबोधन में विस्तार से चर्चा करते हुए कहा कि आज 1 दिसंबर को 3 दिवसों का संगम है- पहला एनसीसी दिवस, दूसरा बीएसएफ स्थापना दिवस और तीसरा विश्व एड्स दिवस | डॉ.मधेपुरी ने तीनों दिवस के मूलमंत्र के बाबत संक्षेप में यही कहा- “जागरूकता ही एड्स का इलाज है” और बीएसएफ का सर्वमान्य कठिन मंत्र है- “Duty Unto Death” तथा एनसीसी का आधुनिक गीत है- “हम सब भारतीय हैं”- यदि युवावर्ग इन मंत्रों को अपने मन-प्राणों में उतार लें तो भारतीय सेना में भर्ती होने के लिए एनसीसी से बेहतर कोई रास्ता नहीं |

Best performers and small kids "Misty & Danish" along with Udghatankarta Dr.Bhupendra Madhepuri, Pr.Dr. Ashok Kumar, Rangkarmi Vikash, Om Prakash Bharti & others.
Best performers and small kids “Misty & Danish” along with Udghatankarta Dr.Bhupendra Madhepuri, Pr.Dr. Ashok Kumar, Rangkarmi Vikash, Om Prakash Bharti & others.

समारोह के दूसरे सत्र में सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झड़ी लगा दी निर्देशक-रंगकर्मी विकास कुमार ने | मो.ए.वजाहत लिखित एकांकी- “देश को आगे बढ़ाओ” के सराहनीय मंचन के अतिरिक्त रिकॉर्डिंग पर अनेक देशभक्ति गीतों के साथ-साथ नृत्य करते छोटे-बड़े कलाकार- ‘मिस्टी’, ‘दानिश’, ‘समर’ आदि ने घंटो दर्शकों को बांधे रखा तथा खूब तालियां बटोरी |

और अंत में डॉ.मुस्ताक मोहम्मद, कुमार राम अवध, सत्यप्रकाश, राजकुमार, एनसीसी के सभी कलाकारों व जवानों की चर्चा करते हुए कौशल्या ग्राम में आयोजित इस दो दिवसीय एनसीसी दिवस समारोह में उपस्थित अतिथियों एवं सभी सुधी श्रोताओं को धन्यवाद व साधुवाद देते हुए अध्यक्ष के निर्देशानुसार उद्घोषक द्वारा कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा की गयी |

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क्या सिनेमाहॉल में बजने से बढ़ जाएगा राष्ट्रगान का सम्मान ?

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को अपने एक अहम फैसले में देश के सभी सिनेमाघरों में फिल्म शुरू होने से पहले राष्ट्रीय गान ‘जन गण मन’ को बजाना अनिवार्य कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि  राष्ट्रीय गान बजाते समय सिनेमाहॉल के पर्दे पर राष्ट्रीय ध्वज भी दिखाना होगा और हॉल में मौजूद सभी लोगों को राष्ट्रगान के सम्मान में खड़ा होना पड़ेगा। सर्वोच्च न्यायालय का यह आदेश एक जनहित याचिका पर आया है जिसे मध्यप्रदेश निवासी श्याम नारायण चौकसे ने दायर की थी।

गौरतलब है कि इससे पूर्व सिनेमाहॉल संचालक अपने विवेकानुसार राष्ट्रगान बजाने या न बजाने का फैसला करते थे। कहीं राष्ट्रगान फिल्म शुरू होने से पहले बजाया जाता था तो कहीं खत्म होने के बाद और कई हॉल ऐसे भी थे जहाँ इसे बजाया ही नहीं जाता था। अब सुप्रीम कोर्ट न केवल इसे बजाना अनिवार्य करने के साथ-साथ इसका वक्त भी निर्धारित कर दिया है, बल्कि इससे संबंधित अन्य दिशा-निर्देश भी जारी किए हैं। मसलन, राष्ट्रगान के दौरान सिनेमाहॉल के दरवाजे पूरी तरह बंद रखे जाएंगे ताकि लोगों का हॉल में आना-जाना न चलता रहे। एक अन्य निर्देश के मुताबिक राष्ट्रगान के दौरान खड़ा होना अनिवार्य है लेकिन जो लोग शारीरिक या किसी अन्य मजबूरी के चलते खड़े होने की स्थिति में न हों, वे बैठकर भी राष्ट्रगान में हिस्सा ले सकते हैं।

व्यावहारिक तौर पर देखा जाय तो इससे पूर्व कई जगहों और अवसरों पर राष्ट्रगान या राष्ट्रीय ध्वज के प्रति यथोचित सम्मान न प्रदर्शित करने और उसके बाद उपजी अप्रिय स्थितियों की ख़बरें आती रही हैं। ऐसे में राष्ट्रगान को लेकर सुप्रीम कोर्ट के इस नए और स्पष्ट फैसले के बाद क्या यह उम्मीद की जानी चाहिए कि राष्ट्रगान के समय किसी तरह की अव्यवस्था या असमंजस की स्थिति नहीं बनेगी? सिनेमाहॉल के संचालक और कर्मचारी ही नहीं, दर्शक भी (जिनमें बच्चे भी शामिल होंगे) राष्ट्रगान के लिए मानसिक रूप से सजग और सतर्क रहेंगे?

यह सच है कि राष्ट्रगान या राष्ट्रीय ध्वज जैसे प्रतीकों के प्रति सम्मान सुनिश्चित करना हमारे राष्ट्रीय दायित्व का हिस्सा है, लेकिन हमें इन पर जरूरत से ज्यादा जोर देने को लेकर सचेत रहना चाहिए। देशभक्ति हमारे अन्दर से उपजती है। यह कोई ऐसी चीज नहीं है जिसे जबरन किसी पर थोपा जा सके। हमारे रोजमर्रा की ज़िन्दगी में यह अनेक रूपों में प्रकट होती रहती है, ठीक वैसे ही जैसे मन्दिर-मस्जिद-चर्च-गुरुद्वारे जैसे धार्मिक प्रतीकों के प्रति या माता-पिता-गुरु जैसे श्रद्धेय जनों के प्रति। यह व्यवहार से ज्यादा संस्कार की चीज है। हाँ, राष्ट्रीय संकट की स्थिति में इसके रूप अलग जरूर हो सकते हैं।

एक बात और, राष्ट्रीय प्रतीकों के लिए सम्मान दर्शाना अगर मजबूरी हो जाए तो वह धीरे-धीरे रस्म-अदायगी का रूप ले सकता है। सिनेमाहॉल में राष्ट्रगान बजने की व्यवस्था अतीत में छोड़ी भी इसीलिए गई थी। बेहतर होगा कि एक विकसित समाज बनने की प्रक्रिया में हम प्रतीकात्मकता से ऊपर उठकर देशभक्ति को एक आंतरिक मूल्य के रूप में जिएं। वैसे भी जिन फिल्मों को आप परिवार के साथ देखने की स्थिति में नहीं होते, और आजकल सौ में से नब्बे फिल्में ऐसी ही होती हैं, उन फिल्मों से पहले राष्ट्रगान का बजना उसका सम्मान होगा या अपमान..? सर्वोच्च न्यायालय ने इस पहलू पर क्यों नहीं सोचा, ये समझ से परे है..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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