डॉ.मधेपुरी ने नेशनल टे.टे. खिलाड़ियों को ‘विजयी भव:’ का आशीर्वाद दिया  !!

बिहार राज्य सरकार में जहाँ पाँचवीं बार नीतीश कुमार का राजतिलक होने जा रहा है वहीँ कई बार नेशनल खेल चुके छह टे.टे. खिलाड़ी- रियांशी, पायल, मास्टर शिवम्, सहित हर्षवर्धन भदौरिया, विपुल राज एवं हिमांशु सर्राफ को राज्य का प्रतिनिधित्व करने हेतु (24 से 29 नवम्बर तक) हिमाचल प्रदेश, कोलकाता और मध्यप्रदेश के लिए जिला टेबुल टेनिस संघ के अद्यक्ष डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी, सचिव प्रदीप कुमार श्रीवास्तव, कोषाध्यक्ष संतोष कुमार झा, मुकेश कुमार सहित श्यामनंदन कुमार केशरी ने हरी झंडी दिखाकर रवाना किया |

National Level T.T. Players at Town Hall Madhepura .
National Level T.T. Players at Town Hall Madhepura .

आप यह भी जानिये कि इसी मधेपुरा की मिट्टी के लाल व समाजवादी चिन्तक भूपेन्द्र नारायण मंडल ने कभी अखिल भारतीय सोशलिस्ट पार्टी का राष्ट्रीय अद्यक्ष बनकर और बी.पी.मंडल साहब ने राष्ट्रस्तरीय ‘मंडल कमीशन’ का अद्यक्ष बनकर जिस तरह मधेपुरा का नाम पूरे देश में रोशन किया है उसी तरह निकट भविष्य में ही ये छह टी.टी.स्टार राष्ट्रीय स्तर के टी.टी.प्रतियोगिता में मधेपुरा के नाम को रोशन करने के साथ-साथ बिहार का परचम लहरायेंगे और तब माननीय मुख्यमंत्री नीतीश कुमार द्वारा सम्मानित किये जायेंगे |

खिलाड़ियों के मनोबल को हमेशा ऊँचा बनाये रखने के लिए सतत प्रयत्नशील तुलसी पब्लिक स्कूल के निदेशक श्यामल कुमार सुमित्र साधुवाद के पात्र हैं |

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क्या है इस्लामिक स्टेट (आईएस) और कौन है अबू बकर अल बगदादी ?

‘फैशन’ और ‘फैंटेसी’ का पर्याय फ्रांस आज लहूलुहान है। मुंबई के 26/11 हमलों की तर्ज पर बीते शुक्रवार को पेरिस में सात अलग-अलग स्थानों पर हुए सिलसिलेवार हमले के बाद पूरे देश में आपातकाल लागू है। इन हमलों में 158 लोग मारे गए और 300 से ज्यादा घायल हुए जिनमें 100 की हालत अत्यंत गंभीर बताई जाती है। द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद फ्रांस पर ये सबसे बड़ा हमला है। 1940 के बाद पहली बार ‘फैशन की राजधानी’ कर्फ्यू में कराह रही है। इस नृशंस घटना को ‘आईएस’ के आत्मघाती हमलावरों ने अंजाम दिया।

आतंक का पर्याय बन चुका ‘आईएस’ यानि ‘इस्लामिक स्टेट’ आज की तारीख में दुनिया का सबसे खतरनाक आतंकी संगठन है। इस चरमपंथी इस्लामिक संगठन को इससे पूर्व ‘आईएसआईएस’ यानि ‘इस्लामिक स्टेट ऑफ इराक एंड सीरिया’ के नाम से जाना जाता था। अरबी भाषा में इस संगठन का नाम है “अल दौलतुल इस्लामिया फिल इराक वल शाम”। हिन्दी में इसका अर्थ होगा – “इराक एवं शाम का इस्लामी गणराज्य”। शाम सीरिया का प्राचीन नाम है।

आईएसआईएस ने सबसे पहले 2014 में इराक के मोसूल और तिकरीत शहरों समेत बड़े हिस्से पर कब्जा कर दुनिया भर का ध्यान अपनी ओर खींचा था। इराक और सीरिया में सक्रिय इस जेहादी समूह का गठन अप्रैल 2013 में हुआ। इस संगठन की अगुआई अबू बकर अल बगदादी कर रहा है। 29 जून 2014 को उसने खुद को समूचे इस्लामिक जगत का ‘खलीफा’ घोषित किया और मुस्लिम आबादी वाले विश्व के ज्यादा से ज्यादा क्षेत्रों को सीधे अपने राजनीतिक नियंत्रण में लेना उसके संगठन का लक्ष्य बन गया। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए बगदादी ने सबसे पहले ‘लेवेन्त’ कहे जाने वाले इलाके को अपने अधिकार में लेने का अभियान चलाया जिसके तहत जॉर्डन, इजरायल, फिलिस्तीन, लेबनान, कुवैत, साइप्रस और दक्षिणी तुर्की का कुछ भाग आता है।

माना जाता है कि बगदादी का जन्म उत्तरी बगदाद के समारा में 1971 में हुआ। 2003 में अमेरिका की अगुआई में हुए आक्रमण के बाद इराक में भड़के विद्रोह में वह शामिल हुआ और 2010 में इराकी अल कायदा के नेता के तौर पर उभरा। बगदादी युद्ध का अत्यंत कुशल रणनीतिकार और जेहादियों को अपने व्यक्तित्व से प्रभावित करने वाला कमांडर माना जाता है। प्रारम्भ में इस्लामिक स्टेट अल कायदा का ही एक घटक था लेकिन बगदादी के कारण धीरे-धीरे वह उससे ज्यादा आकर्षक, उससे ज्यादा प्रभावी और उससे ज्यादा खतरनाक हो गया। आज बगदादी के इशारे पर काम करने वाले लड़ाकों की संख्या दस हजार से ज्यादा है।

आईएस की गुरिल्ला फौज में इराक और अरब जगत के इस्लामिक कट्टरपंथियों के अलावे चेचेन्या, पाकिस्तान और यूरोपीय देशों ब्रिटेन, फ्रांस, जर्मनी आदि के इस्लामिक कट्टरपंथी लड़ाके हैं। भारत के कुछ मुस्लिम युवाओं के भी आईएस में शामिल होने की खबरें आई हैं। इराक में इतनी तेजी से आईएस का प्रभुत्व बढ़ने के पीछे एक बड़ा कारण अमेरिकी आक्रमण के बाद इराकी सेना की ताकत और उसके मनोबल में भारी गिरावट भी रहा। वहाँ की सेना की कमर इस कदर टूट चुकी थी कि आईएस के लड़ाकों के सामने वो बेबस नजर आई। आईएस ने बड़ी आसानी से इराकी शहरों पर कब्जा किया, इराकी सेना के हथियारों से अपनी ताकत बढ़ाई और लूटपाट से अकूत दौलत भी अर्जित की। वहाँ के तेल के कुओं पर कब्जा करने से उसकी आर्थिक ताकत में बेहिसाब इजाफा हुआ। आज यह दुनिया का सबसे अमीर आतंकी संगठन है और एक अनुमान के मुताबिक इसका बजट दो अरब डॉलर का है।

फ्रांस की इस घटना से पहले भी आईएस के आतंक और उसकी बर्बरता के कई दृश्य दुनिया के सामने आ चुके हैं। आज दुनिया के ज्यादातर देश आईएस और उसके जैसे अन्य आतंकी संगठनों की जद में हैं। लेकिन ये सिक्के का केवल एक पहलू है। इस सिक्के का दूसरा पहलू अमेरिका जैसे पूंजीवादी देशों की दोहरी नीतियां हैं। आप इतिहास पलट कर देखें तो पाएंगे कि अपने आर्थिक साम्राज्य के विस्तार के लिए अमेरिका जैसे देशों ने ऐसे आतंकी संगठनों को कई बार शह दी है। जब तक उनका स्वार्थ सधता रहा तब तक आईएस जैसे संगठन और अबू बकर अल बगदादी जैसे नेता उनके लिए ‘अच्छे’ जेहादी रहे और जब ऐसे संगठनों की मह्त्वाकांक्षा उनके रास्ते आ गई तो वे ‘बुरे’ हो गए।  अभी हाल तक इस्लामिक स्टेट के जेहादी लड़ाके अमेरिकी, ब्रिटिश, फ्रांसीसी साम्राज्यवादियों और अरब देशों में सउदी अरब और कुवैत जैसे उनके टट्टुओं की शह पर सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद का तख्तापलट करने की खातिर वहाँ जारी गृहयुद्ध में भाग ले रहे थे। आज अगर आईएस इतना ‘खराब’ है तो कल तक उसमें ये देश कौन सी ‘खूबी’ देख रहे थे..?

पूंजी का आतंक हथियार के आतंक से हरगिज कम नहीं। आज दुनिया इन दोनों आतंकों के बीच पिस रही है। ईस्ट इंडिया कम्पनी भारत में पहले पहल हथियार लेकर नहीं आई थी। उसका उद्देश्य शुरू में केवल व्यापार था। ज्यों-ज्यों उसका स्वार्थ बढ़ता गया, व्यापार के साथ हथियार जुड़ता गया। आईएस जैसे संगठनों को हम जरूर जड़ से खत्म करें लेकिन दुनिया भर में अलग-अलग चेहरों के साथ और पहले से ज्यादा फैल चुकी ‘ईस्ट इंडिया कम्पनी’ को ढूँढ़कर उनकी नापाक नीतियों का भी हिसाब करें। तभी ये दुनिया रहने लायक बन सकेगी और बनी रहेगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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… इसीलिए छठ ‘महापर्व’ है..!

समय के साथ सब कुछ बदलता है। आपके तौर-तरीके ही नहीं, त्योहार तक बदल जाते हैं। तकनीक ने हमें बाहर जितना विस्तार दिया, भीतर उसी अनुपात में सिमटते गए हम और इस ‘संकुचन’ को बड़ी बेशर्मी से ‘आधुनिकता’ का नाम दिया हमने। आयातित बोली, आयातित शिक्षा, आयातित परिधान, आयातित संगीत, आयातित नृत्य, आयातित साहित्य, आयातित सिनेमा, आयातित उपकरण… इस आधुनिकता में सब कुछ आयातित था। आयात-आधारित इस आधुनिकता में हम विचारधारा भी आयात करने लगे और अब तो त्योहार आयात करने में भी संकोच नहीं होता हमें। इसे हम समय के साथ बदलना कहने लगे हैं।

इस ‘आधुनिकता’ की होड़ में गांव बड़ी तेजी से शहरों में खोते जा रहे हैं। डिब्बाबंद दूध, ‘डेलिवर’ किए गए फास्ट फूड और बोतलबंद पानी पर बड़ी हुई पीढ़ी ‘ईएमआई’ चुकाना भले सीख ले, मिट्टी का ‘कर्ज’ चुकाने के संस्कार से वो कोसों दूर रहेगी। हम गौर से देखें, जड़ तक जाकर पड़ताल करें तो पाएंगे कि हमारे सारे व्रत और त्योहार हमारी मिट्टी से जुड़े हैं। हम आजीवन अपनी मिट्टी से जो लेते हैं दरअसल व्रत रखकर और त्योहार मनाकर उसी का आभार जताते हैं हम। पर लानत है हम पर कि अब हम अपनी मिट्टी तक में ‘मिलावट’ करने लगे हैं। इसी का परिणाम है कि होली, दीपावाली जैसे त्योहारों का बड़ी तेजी से ‘शहरीकरण’ होने लगा है। या यूँ कहें कि अब इन त्योहारों को हम ‘आधुनिक’ तरीके से मनाने लगे हैं।

आधुनिकता की इस चकाचौंध में भी अगर हमारी आँखें पूरी तरह चुंधिया नहीं गई हैं तो इसका बहुत बड़ा श्रेय छठ को जाता है। अपनी जड़ों से कटकर महानगरों के आसमान में उड़ना सीख गए बच्चे होली-दीपावली चाहे जहाँ मना लें पर छठ के लिए वे अपने ‘घोंसले’ को लौट आते हैं। उन बच्चों के बच्चे जान पाते हैं कि ‘टू बेडरूम फ्लैट’ से बाहर की दुनिया कितनी बड़ी होती है और दो इकाईयों के साथ रहने से बने परिवार और कई परिवारों के जुड़ने से बने परिवार में क्या फर्क होता है। वे समझ पाते हैं कि ‘डिस्कवरी’ पर नदियों को देखना और उसे छूकर महसूसना कितना अलग होता है। वे जान पाते हैं कि क्या होता है सूप, कैसा होता है दौउरा, कौन बनाते हैं इन चीजों को और समाज के कितने अभिन्न अंग हैं वे। छठ ही बताता है उन्हें डाभ, चकोतरा (टाब नींबू), सिंघाड़ा, अल्हुआ और सुथनी जैसे फलों का अस्तित्व।

छठ धर्म से ज्यादा समाज का, सामूहिकता का और समानता का त्योहार है। समाजवाद का सबसे जीवंत दृश्य आपको छठ घाट पर दिखेगा। मालिक और मजदूर दोनों एक समान सिर पर प्रसाद का दौउरा ढोते मिलेंगे आपको। सबके सूप का मोल-महत्व एक समान होगा। कोई आडम्बर नहीं। किसी को भी पुरोहित की ‘मध्यस्थता’ नहीं चाहिए होती। बस आस्था होनी चाहिए, आपकी पूजा सीधे छठी मईया तक पहुँच जाती है। हिन्दू-मुसलमान के बीच खड़ी ‘दीवार’ भी इस आस्था के आगे सिर झुकाती है। ऐसा कोई बाज़ार नहीं जिसमें छठ की पूजन सामग्री बेचने वालों में मुस्लिम समाज के लोग ना हों। उनकी श्रद्धा और उत्साह में रत्ती भर भी कमी निकाल कर दिखा दें आप। और तो और आप शिद्दत से ढूँढेंगे तो कुछ घाट ऐसे भी होंगे जहाँ अर्ध्य देतीं मुस्लिम माताएं और बहनें भी दिख जाएंगी आपको।

अगर छठ ना हो तो आज के युग में ‘डूबते सूरज’ को प्रणाम करना हम सीख ही नहीं पाएंगे। बेटियों को कोख में ही मार देने वाले कभी नहीं जान पाएंगे कि किसी पर्व में बेटियों की भी मन्नत मांगी जाती है। हिन्दू समाज का ये सम्भवत: एकमात्र पर्व है जिसमें अराधना के लिए किसी ‘मूर्ति’ की जरूरत नहीं पड़ती। व्रत करने वाली हर नारी छठी मईया का रूप होती है और उम्र में आपसे छोटी ही क्यों ना हों उनके पैर छूकर ही प्रसाद ग्रहण करना होता है आपको। नारी-सशक्तिकरण के किसी नारे में इतनी ताकत हो तो बताएं।

कोई पर्व एक साथ इतनी विलक्षण खूबियों को अपने में नहीं समा सकता, इसीलिए छठ ‘महापर्व’ है। हमारी आस्था का, हमारे संस्कार का, हमारी पवित्रता का, हमारे विस्तार का ‘महापर्व’। मिट्टी के सोंधेपन से सने छठ के गीत सुनकर जब तक आपके रोम-रोम झंकृत होते रहेंगे तब तक समझिए अपनी जड़ से जुड़े हैं आप और तथाकथित ‘आधुनिकता’ की कैसी भी आंधी क्यों ना हो बहुत मजबूती से टिके हैं आप।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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तीन करोड़ युवाओं को दुल्हन की दरकार, आखिर झुकी चीन की सरकार

चीन में तीन करोड़ युवाओं को अगले पाँच सालों में दुल्हन नहीं मिलेगी… अगले दस सालों में वहाँ काम करने के लिए युवा नहीं होंगे… और अगले पन्द्रह सालों में वहाँ की 75 प्रतिशत आबादी बूढ़ी होगी… हैरतअंगेज आंकड़े हैं ये, लेकिन सच हैं। इन्हीं वजहों से 37 साल के बाद चीन की कम्युनिस्ट सरकार ने ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ को खत्म कर दिया है। अब वहाँ भी भारत की तरह ‘हम दो, हमारे दो’ का सिद्धांत लागू होगा। हमारा देश इस सिद्धांत के प्रति कितना ‘गम्भीर’ है ये बहस का विषय है लेकिन चीन की जैसी ‘विस्फोटक’ स्थिति हो गई है, उसे देखते हुए कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी अगर वहाँ की सरकार दो बच्चों की नीति भी वैसी ही सख्ती से लागू करे जैसी सख्ती से ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ को लागू किया गया था। ये भी सम्भव है कि सरकार आने वाले दिनों में कुछ और ‘उदारता’ दिखाते हुए ‘दो से आगे’ जाने की छूट भी दे दे।

वर्तमान में 140 करोड़ की आबादी के साथ चीन दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। इस देश की ये आबादी तब है जब 1979 से वहाँ ‘वन चाइल्ड पॉलिसी’ बहुत कड़ाई के साथ लागू है और पिछले 37 साल में 40 करोड़ बच्चों का जन्म रोका गया। इस नीति के तहत ज्यादातर शहरी दम्पतियों को एक बच्चे और ज्यादातर ग्रामीण दम्पतियों को दो बच्चे तक सीमित कर दिया गया था। दूसरे बच्चे की इजाजत तभी थी जब पहला बच्चा लड़की हो। ये नीति शुरू से ही विवादास्पद थी क्योंकि इसके चलते हजारों की संख्या में गर्भपात होते थे। कुछ मूलभूत खामियों के बावजूद चीन की जनसंख्या जिस रफ्तार से बढ़ रही थी उसे देखते हुए तत्कालीन रुदोंग सरकार की ये नीति पूरी तरह गलत भी नहीं कही जा सकती। दुनिया जानती है कि चीन को इसका फायदा भी मिला। लेकिन समय-समय पर इसकी समीक्षा जरूरी थी। पर ऐसा नहीं हुआ और स्थिति बिगड़ती चली गई। हालात बद से बदतर होते देख वर्तमान सरकार ने लगातार चार दिन तक बैठक की और ये बड़ा निर्णय लिया।

चीन में प्रति 117 पुरुषों पर मात्र 100 महिलाएं हैं। लिंगानुपात बिगड़ने से सामाजिक ढाँचा किस हद तक चरमरा चुका है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि वहाँ एक लड़की से दो से ज्यादा लड़के शादी कर रहे हैं। अविवाहित युवकों की बढ़ती संख्या देख चीनी इकोनॉमिस्ट शी जुओशी ने सुझाव दिया कि दो पुरुषों की एक महिला से शादी कानूनी करार देनी चाहिए। दूर-दराज इलाके में लोग बाकायदा ऐसा कर भी रहे हैं क्योंकि लड़कियों की बोली लग रही है।

ये तो हुई लिंगानुपात से जुड़ी समस्या। अब चीन की ‘असंतुलित’ जनसंख्या को कुछ और कोणों से समझें। 1960 के दशक में चीन में ‘बेबी बूम’ की वजह से श्रमिकों की संख्या बढ़ी थी। ये आबादी 2021 तक रिटायर हो जाएगी। बाद के दिनों में आबादी पर अंकुश था इसलिए रिटायर हो रहे श्रमिकों की जगह लेने के लिए अब पर्याप्त आबादी ही नहीं है। बहुत जल्द दिहाड़ी मजदूरों का वहाँ ‘अकाल’ पड़ने वाला है। कहने का अर्थ ये है कि 2025 तक चीन की अर्थव्यवस्था धाराशायी हो सकती है।

2014 में चीन की 21.2 करोड़ की आबादी 60 साल पार कर चुकी थी। 2013 में यह संख्या करीब 17.5 करोड़ थी। इतनी तेजी से दुनिया के किसी देश में बुजुर्गों की संख्या नहीं बढ़ी। ऐसा ही रहा तो 2030 तक चीन की 75 प्रतिशत आबादी बूढ़ी होगी। दरअसल चीन में जन्म दर 1.18 बच्चा प्रति दम्पति है जबकि वैश्विक आँकड़ा 2.5 है। यही कारण है कि यहाँ युवा होने की दर सबसे धीमी है।

2014 में सरकार को उम्मीद थी कि 2 करोड़ बच्चे पैदा होंगे। लेकिन 1.69 करोड़ बच्चे ही जन्मे। एक दिलचस्प आंकड़ा यह भी है कि 2014 में योग्य 1.1 करोड़ दम्पति में से 14.5 लाख ने ही दूसरे बच्चे के लिए आवेदन दिया। और इस साल सितम्बर तक यह आँकड़ा आश्चर्यजनक रूप से मात्र 55 हजार है। स्थिति यह है कि पिछले 15 सालों में देश के आधे से ज्यादा स्कूल बंद हो गए हैं। यानि ये समस्या दोतरफा है। सरकार की नीति ही केवल इसके लिए जिम्मेदार नहीं है बल्कि लोगों की दिलचस्पी भी दूसरे बच्चे में खत्म हो गई है।

खैर, देर से ही सही चीन की सरकार जागी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि वहाँ के लोग भी अब जागेंगे और ‘असंतुलित’ जनसंख्या की भीषण समस्या धीरे-धीरे सुलझ जाएगी। जरूरी है कि चीन में फिर बच्चों की ‘बहार’ हो पर ये भी देखना होगा कि ‘पुरानी गलती’ फिर ना इस बार हो।

 मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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क्या मीसा उपमुख्यमंत्री, तेजप्रताप कैबिनेट मंत्री और तेजस्वी होंगे राजद के कार्यकारी अध्यक्ष..?

बिहार चुनाव सम्पन्न हो चुके हैं। “महागठबंधन या एनडीए” का सस्पेंस खत्म हो चुका है। महागठबंधन के जीतने पर नीतीश का मुख्यमंत्री होना तय था और अब तो उनके शपथ-ग्रहण का दिन और समय भी निश्चित हो चुका है। 20 नवम्बर को दोपहर दो बजे नीतीश पाँचवीं बार बिहार के मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। अब सबकी निगाहें इस बात पर लगी हैं कि नीतीश के ठीक बाद शपथ लेने कौन जाएगा यानि कौन होगा बिहार का उपमुख्यमंत्री..? ये सवाल कितना मुश्किल है, कोई जाकर लालू से पूछे… जिन्हें यह ‘यक्षप्रश्न’ सुलझाना है।

बिहार में इस वक्त केवल यही चर्चा है कि लालू किसे और किस वजह से चुनेंगे..? मजे की बात तो यह है कि लोग इसी सवाल के जवाब में दूसरे बड़े सवाल का जवाब भी ढूँढ़ लेते हैं कि कौन होगा लालू का उत्तराधिकारी..? यानि लोग ये मानकर चल रहे हैं कि जो उपमुख्यमंत्री होगा, वही लालू का उत्तराधिकारी भी होगा। लेकिन देखा जाय तो दूसरा सवाल पहले सवाल से भी ज्यादा कठिन है और मौजूदा हालात में अधिक सम्भावना इसी बात की है कि लालू उपमुख्यमंत्री और उत्तराधिकारी दो अलग लोगों को बनाएं और वे दोनों उन्हीं के परिवार से हों।

लालू की पार्टी में पुराने और वफादार लोग कई हैं लेकिन उनमें खुद को उपमुख्यमंत्री पद का ‘दावेदार’ कहने की स्थिति में कोई भी नहीं। महागठबंधन की इतनी बड़ी जीत और उस जीत में लालू की बड़ी भूमिका के बाद तो हरगिज नहीं। हालांकि इस पद के लिए पार्टी से एक नाम की खूब चर्चा है और वो नाम अब्दुल बारी सिद्दीकी का है। सिद्दीकी वरिष्ठ हैं, लालू के विश्वासपात्र हैं और उनके ‘माय’ समीकरण को पूरा भी करते हैं। लेकिन लालू उन्हें उपमुख्यमंत्री बनाने की ‘उदारता’ दिखा पाएंगे इसकी उम्मीद कम है। हाँ, ‘भरपाई’ के लिए लालू उन्हें विधान सभा का अध्यक्ष जरूर बनवा सकते हैं। उदय नारायण चौधरी के चुनाव हार जाने के बाद जेडीयू को भी इसमें विशेष कठिनाई नहीं होनी चाहिए।

अब सवाल उठता है कि सिद्दीकी नहीं तो कौन..? सिद्दीकी के अलावे उपमुख्यमंत्री के तौर पर तीन और नाम चर्चा में हैं और वे तीनों लालू के परिवार से हैं। राघोपुर से विधायक बने तेजस्वी, महुआ से चुने गए तेजप्रताप और राजनीति में पहले से ‘सक्रिय’ लालू की बड़ी बेटी मीसा भारती। रही बात उत्तराधिकारी की तो ये तय है कि वो उनके परिवार से होगा और उनका बेटा होगा। पप्पू यादव द्वारा उठाए गए ‘उत्तराधिकार’ के मुद्दे पर लालू यह पहले ही साफ कर चुके हैं।

उपमुख्यमंत्री पद के लिए मीसा का नाम आना ‘अकारण’ नहीं है। मीसा को इस पद पर बिठाकर लालू के एक पंथ कई काज हो जाएंगे। पहला कि ये कुर्सी उनके परिवार में आ जाएगी, दूसरा उनके दोनों बेटों के बीच अघोषित पर सम्भावित ‘टकराव’ टल जाएगा और तीसरा महिलाओं में एक बड़ा संदेश दिया जा सकेगा जिन्होंने जी खोलकर महागठबंधन को वोट दिया है। लालू ये बहुत अच्छी तरह जानते हैं कि महिलाओं ने नीतीश को देखकर वोट दिया है। मीसा को आगे कर वो राजद की पैठ भी महिलाओं में बना सकते हैं और उनसे चिपका ‘जंगलराज’ का दाग भी बहुत हद तक धुल सकता है। हालांकि मीसा अभी किसी सदन की सदस्य नहीं हैं लेकिन विधान परिषद् जाते उन्हें कितनी देर लगेगी भला।

रही बात तेजप्रताप और तेजस्वी की तो यह स्पष्ट हो चुका है कि तेजस्वी में लालू और उनकी पार्टी दोनों ही सम्भावना देख रहे हैं। चुनाव के दौरान राघोपुर में तेजस्वी के लिए वोट मांगने के क्रम में लालू ने इसका संकेत भी दे दिया है। तेजस्वी राजद के युवा चेहरे के तौर पर उभरे हैं और तेजप्रताप की तुलना में राजनीतिक रूप से अधिक ‘परिपक्व’ भी दिखते हैं। अगर तेजस्वी लालू के एकमात्र बेटे होते तो उनका उपमुख्यमंत्री और उत्तराधिकारी दोनों होना तय होता। लेकिन तेजप्रताप ना केवल उनसे बड़े हैं और उन्हीं की तरह बाकायदा चुनाव जीतकर आए हैं बल्कि माँ राबड़ी के चहेते भी हैं। लालू के नजदीकी लोग अच्छी तरह जानते हैं कि लालू का ‘सॉफ्ट कॉर्नर’ छोटे बेटे तेजस्वी के लिए है तो राबड़ी का बड़े बेटे तेजप्रताप के लिए। दोनों भाईयों के बीच लालू के सालों साधु और सुभाष वाली ‘प्रतिद्वंद्विता’ टालने के लिए भी मीसा को आगे किया जा सकता है।

ऊपर के विश्लेषण के बाद जरा देखें कि लालू के पास मीसा, तेजप्रताप और तेजस्वी को लेकर कौन-कौन से विकल्प हैं..? पहला, मीसा को उपमुख्यमंत्री बनाया जाय और तेजप्रताप-तेजस्वी दोनों को कैबिनेट में जगह दी जाय। इस पर शायद नीतीश आपत्ति करें। दूसरा, तेजस्वी को उपमुख्यमंत्री बनाया जाय और तेजप्रताप को कैबिनेट में लिया जाय। इस पर तेजप्रताप और मीसा दोनों ‘रूठ’ जाएंगे। तीसरा, मीसा को उपमुख्यमंत्री बनाया जाय, तेजप्रताप को कैबिनेट में भेजा जाय और पार्टी की बागडोर तेजस्वी के हाथ में सौंपी जाय उन्हें कार्यकारी अध्यक्ष बनाकर। यानि उत्तराधिकार तेजस्वी को मिले, उपमुख्यमंत्री का पद भाई-बहनों में सबसे बड़ी मीसा को और तेजप्रताप भी असंतुष्ट ना रहे।

ये भी सम्भव है कि मीसा-तेजप्रताप-तेजस्वी की भूमिका आपस में बदल जाय लेकिन इतना तय है कि लालू और राबड़ी ना तो इन तीनों में से किसी को किनारे कर सकते हैं और ना ही तीनों को एक साथ सरकार या संगठन में जगह दे सकते हैं। ऐसे में किन्हीं दो को सरकार में और एक को पार्टी में बड़ा यानि ‘नेक्स्ट टू लालू’ का पद देकर ‘परिवार’ की समस्या हल की जा सकती है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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20 नवम्बर को गाँधी मैदान में, पाँचवीं बार मुख्यमंत्री की शपथ लेंगे नीतीश कुमार

सर्वप्रथम नीतीश मंत्रिपरिषद की बैठक होती है | फिर मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के सरकारी आवास 7, सर्कुलर रोड में आयोजित जद(यू) विधान मंडल दल की बैठक होती है जिसमें 16वीं विधान सभा के जदयू के 71 विधायकों एवं 26 विधान पार्षदों की मौजूदगी में सर्वसम्मति से नीतीश कुमार को नेता चुना जाता है |

आगे जब नीतीश कुमार को महागठबंधन का नेता चुना जाता है तब राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद एवं नीतीश कुमार दोनों एक ही कार में बठकर राज्यपाल रामनाथ कोविंद से मिलकर इस्तीफा देने, 15वीं विधानसभा भंग करने एवं 16वीं विधानसभा के लिए नया मंत्रिमंडल बनाने का दावा पेश करने हेतु राजभवन की ओर कूच करते हैं | काफिले के आगे-आगे प्रमुख नेता होते हैं- जदयू के राष्ट्रीय अद्यक्ष शरद यादव, पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी, कांग्रेस नेता सी.पी.जोशी, जदयू अद्यक्ष वशिस्ठ नारायण सिंह, राष्ट्रीय प्रवक्ता के.सी.त्यागी आदि |

नयी सरकार गठन हेतु राज्यपाल द्वारा 20 नवम्बर की तिथि निर्धारित की जाती है | तब तक के लिए केयर टेकर मुख्यमंत्री का दायित्व नीतीश कुमार को सौंपा जाता है | और जानिये, जहाँ नीतीश कुमार ने अपने संबोधन में कहा कि कोई जीत के गुमान में न रहें, निष्ठापूर्वक काम करें | वहीं लालू प्रसाद ने कहा कि सरकार चलाने की अधिक जिम्मेवारी राजद पर है | और अन्त में महागठबंधन के सूत्रधार राष्ट्रीय नेता शरद यादव ने कहा कि महागठबंधन के तीनों घटक दलों को सदा एक-दूसरे का सम्मान करना चाहिए |

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मधेपुरा को दिया मोदी सरकार ने 20 हजार करोड़ का दीपावली उपहार……..!

लालू प्रसाद के रेल मंत्रित्व काल के दरमियान 2007 में ही रेल मंत्रालय द्वारा मधेपुरा में रेल विधुत इंजन कारखाना निर्माण हेतु श्रीपुर चकला गाँव के निकट तीन सौ एकड़ जमीन अधिग्रहण की गई लेकिन उनके रेल मंत्री से हटते ही कारखाना निर्माण की गति धीमी पड़ गई | विलम्ब का कारण रेलवे द्वारा राशि के अभाव का रोना ही सामने आता रहा |

बहरहाल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की सरकार ने मधेपुरा और मढोरा को दिया दीपावली का बम्पर उपहार ! मधेपुरा को रेल विधुत इंजन कारखाना निर्माण हेतु 20 हजार करोड़ और मढोरा (छपरा) को डीजल इंजन कारखाना निर्माण हेतु 15 हजार करोड़ |

यह भी जानें कि मधेपुरा का रेल विधुत इंजन कारखाना बनाएगी फ़्रांस की ट्रांसपोर्ट कंपनी आल्सटाम और मढोरा का रेल डीजल इंजन कारखाना बनायेगा- जेनरल इलेक्ट्रिक कंपनी ऑफ अमेरिका |

फिलहाल इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ‘मेक इन इंडिया’ की अब तक की सर्वाधिक बड़ी सफलता मानी जा रही है |

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गाँधी मैदान में 20 नवम्बर को नीतीश सरकार का होगा शपथ-ग्रहण

बिहार विधानसभा चुनाव-2015 में भारी बहुमत मिलने के बाद पटना के गाँधी मैदान में महागठबंधन की सरकार शपथ लेगी जिसमें पाँचवीं बार मुख्यमंत्री बनेंगे नीतीश कुमार | शपथ-ग्रहण समारोह में मुख्यरूप से जो राजनेतागण उपस्थित होंगे उनमें प्रमुख हैं- जदयू अद्यक्ष शरद यादव, राजद अद्यक्ष लालू प्रसाद, कांग्रेस अद्यक्ष सोनिया गाँधी, उपाध्यक्ष राहुल गाँधी सहित दिल्ली के सी.एम.अरविन्द केजरीवाल, वेस्ट बंगाल से ममता बनर्जी, असम के सी.एम.तरुण गोगई, उडीसा के सी.एम.नवीन पटनायक एवं आंध्रप्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू आदि |

मधेपुरा अबतक द्वारा जब समाजसेवी एवं जदयू के वरिष्ठ नेता डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी से नीतीश सरकार के शपथ-ग्रहण समारोह में सम्मिलित होने हेतु पटना जाने तथा मधेपुरा जिला से जीते हुए महागठबंधन के विधायकों को मंत्रिमंडल में शामिल किये जाने के बाबत पूछा गया तो उन्होंने कहा कि मुझे यह सूट नहीं करता है क्योंकि 2010 के 27 नवम्बर को पटना गाँधी मैदान के शपथ-ग्रहण समारोह से लौटते ही मुझे दो बार वॉयपास सर्जरी से गुजरना पड़ा था | मैं मधेपुरा अबतक के माध्यम से ही सभी राजनेताओं को शुभकामनाएं अर्पित करता हूँ | साथ ही इस जिले से तीन मंत्रियों द्वारा शपथ लेने की कामना करता हूँ | वे तीन होंगे- श्री नरेन्द्र नारायण यादव जद(यू), तीन बार विधायक बनने वाले जद(यू) के दलित कोटा से प्रो.रमेश ऋषिदेव एवं सबसे अधिक मत प्राप्त करने वाले राजद से दो बार विधायक बनने वाले प्रो.चन्द्रशेखर |

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मधेपुरा के जयपालपट्टी चौक के रौशन कुमार हुए पुरस्कृत

यदि समाज में रहनेवाला हर एक सचेतन व्यक्ति अपने इर्द-गिर्द बसने या रहनेवाले किसी भी धर्म या सम्प्रदाय के कम-से-कम एक भी व्यक्ति को साक्षर करने या फिर सत्य एवं शुचिता के पथ से भटक रहे एक भी युवा को सुधारने में किसी भी रूप में अपना कुछ भी न्योछावर करता है या लोकहित में महज एक दीप जलाकर उसे अँधेरे से मुक्ति दिलाता है- तो उसकी चर्चा अवश्य होनी चाहिए |

ऐसे ही सचेतन व्यक्तियों में एक है- साहुगढ़ गाँव के सिहपुर टोले का भूतपूर्व सैनिक- दिलीप यादव | वही दिलीप जो बी.एस.एफ.का जवान बनकर कश्मीर से कन्याकुमारी और राजस्थान से बंगाल की खाड़ी तक सीमा-सुरक्षा के साथ-साथ नक्सलियों से टकराता रहा और बहादुरी का पुरस्कार पाता रहा |

सेवानिवृति के बाद वह सैनिक  Madhepura  के बी.पी.मंडल पथ (जयपालपट्टी चौक) पर जब विगत दीपावली के दिन “श्री राधा कृष्ण स्वीट्स कार्नर” का श्री गणेश करता है तो कुछ लोग उन्हें यह कहकर डराते हैं कि यहाँ की आवोहवा आपको ना तो टिकने देगा……ना जीने देगा |  लेकिन वह सैनिक डरने के बजाय आवोहवा को बदलने की सोचने लगता है | और धीरे-धीरे वह हवा में यह मेसेज देने लगता है कि दुकान के वार्षिकोत्सव के दिन जयपालपट्टी चौक के इर्द-गिर्द रहने वाले शांत-सुशील….एवं व्यवहारकुशल युवा को पुरस्कृत किया जाएगा | इस आशय का अच्छा असर देखा गया |

और आज पुन: दीपावली के दिन इसी जयपालपट्टी चौक के एक युवा रौशन कुमार, जो फोटोस्टेट आदि ठीक-ठाक करता है और चलाता भी है, के कुशल व्यवहार एवं सहयोगी विचार को एक वर्ष से आंकते रहने के बाद वही सैनिक  Madhepura  के प्रखर समाजसेवी व साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी के हाथों रौशन कुमार को पुरस्कृत कराकर सर्वाधिक प्रसन्नता का अनुभव कर रहा है | इस सादे पुरस्कार वितरण समारोह में मुख्यरूप से सम्मिलित हुए हैं- जिला कांग्रेस आई. के अद्यक्ष सत्येन्द्र कुमार सिंह, प्रवीण कुमार उर्फ पारो जी, वार्ड पार्षद ध्यानी यादव, डॉ.कामेश्वर कुमार, प्रो.चन्द्रशेखर प्रसाद, फर्जी हास्य कवि डॉ.अरुण कुमार आदि |

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मधेपुरा के डॉ.असीम प्रकाश कलकत्ता में हुए सम्मानित …..!

शहर की चमचमाती रोशनी में ही केवल प्रतिभा नहीं चमकती बल्कि गाँवों की गलियों के अंधेरे में भी प्रतिभा अपनी रोशनी बिखेरती है | तभी तो मुरलीगंज प्रखंड के जीतापुर गांव से सटे द्वारिका टोला के आदर्श दंपति श्रीमती अनिता-डॉ.जयप्रकाश के घर जन्मे डॉ. असीम प्रकाश कोलकाता में आयोजित दो दिवसीय (31Oct – 1Nov) ऑल इंडिया एशोसिएशन ऑफ़ ग्रस्ट्रालॉजी– 2015 के कांन्फ्रेंस में आमंत्रित किये गये |

डॉ.असीम प्रकाश ने Madhepura अबतक को बताया कि इस दो दिवसीय गेस्टोकान सम्मलेन में देश-विदेश से लगभग 500 डॉक्टर भाग लेने आये थे जिसमें गेस्ट्रोइनटेसटाइन एंड लीवर डिजीज पर विस्तार से चर्चाएँ हुईं | एम.बी.बी.एस एवं एम.डी. की डिग्री के अतिरिक्त रूस और अमेरिका से डिग्रीयाँ प्राप्त करनेवाले डॉ.असीम भला किससे पीछे रहने वाले थे | कानफ्रेंस के एकेडेमिक सेशन में हेपेटाइटिस पर सर्वोत्कृष्ट व्याख्यान देने के उपलक्ष्य में डॉ.प्रकाश को प्रथम पुरस्कार से सम्मानित किया गया | इस धरती पुत्र डॉ.असीम के इस सम्मान से Madhepura  ही नहीं सम्पूर्ण बिहार सम्मानित एवं गौरवान्वित हुआ है |

मॉडर्न एप्रोच टू हेपेटाइटिस बी पर विचार व्यक्त करते हुए ख्यातिप्राप्त डॉ.विजय प्रकाश के सहयोगी डॉ.असीम प्रकाश ने कहा- यह बीमारी एड्स से भी अधिक खतरनाक है | इसके भयावह फैलाव का अंदाजा तो इसी से लगाया जा सकता है कि हर बीस लोगों में से एक इसी बीमारी की चपेट में है | उन्होंने कहा कि इस बीमारी का लम्बा इलाज है जिसे पूर्णत: ठीक होने में लगभग पाँच साल तक लग सकता है |

अन्त में अपनी नवविवाहिता डॉक्टर धर्मपत्नी डॉ.नेहा की उपस्थिति में डॉ.असीम प्रकाश ने मधेपुरा ( Madhepura ) अबतक से कहा कि लोग इस बीमारी के बारे में अभी भी अनभिज्ञ हैं | लोगों को पूरी तरह सजग करने की जरुरत है | जागरूक करने के बाबत उन्होंने लोगों से इस बीमारी के मूल कारणों को यूँ गिनाया- गलत निडिल का प्रयोग, संक्रमित ब्लड चढ़ाना एवं असुरक्षित प्रसव के साथ-साथ संक्रमित लोगों से यौन सम्बन्ध बनाना आदि | डॉ.असीम प्रकाश ने पुरुष से अधिक महिलाओं पर इस बीमारी के खतरे की चर्चा की और यह भी कहा कि अब छोटे-छोटे शहरों में भी इस बीमारी का फैलाव तेजी से होने लगा है |

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