भू.ना.मंडल वि.वि की 12 सितम्बर की पी.जी. परीक्षाएं स्थगित

पी.जी.पार्ट-1 (प्रीवियस) परीक्षा-2014 एवं पी.जी.पार्ट-2 (फाइनल) परीक्षा-2014 की 12 सितम्बर (शनिवार) 2015 को होने वाली दोनों केन्द्रों के दोनों सिटींग की सभी परीक्षाएं स्थगित कर दी गई हैं |

मंडल वि.वि. के परीक्षा नियंत्रक डॉ.नवीन कुमार ने मधेपुरा अबतक को बताया कि माननीय कुलपति डॉ.विनोद कुमार के निदेशानुसार ये परीक्षाएं अब 29 सितम्बर, 2015 को पूर्व निर्धारित केन्द्रों एवं समय पर होंगी | डॉ कुमार ने यह भी कहा कि बैंक एवं अन्य विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं को लेकर छात्रों की मांग पर यह परीक्षा तिथि 29 सितम्बर को करने की स्वीकृति प्राप्त कर ली गई है |

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वित्तरहित शिक्षाकर्मियों के प्रति सरकार संवेदन शून्य क्यों ?

विगत कई वर्षों से लगातार एवं पिछले कई महीनों में बारम्बार जहाँ एक ओर वित्तरहित शिक्षाकर्मियों द्वारा बिहार के तमाम समाहरणालयों के गेटों पर आठ सूत्री मांगों को लेकर कभी मशाल जुलूस तो कभी पुतला दहन, कभी धरना प्रदर्शन तो कभी आमरण अनशन होता रहा, वहीँ दूसरी ओर सम्पूर्ण सूबे में सेविकाओं-सहायिकाओं द्वारा नारी शक्ति का अदभुत प्रदर्शन यह सिद्ध कर दिया है कि नारी अब अबला नहीं रही. . . . ! बावजूद ऐसे जोरदार उग्र प्रदर्शनों के सरकार में स्थापित जनप्रतिनिधिगण इस कदर संवेदन शून्य नजर क्यों आते हैं  ?

जब इस बाबत मधेपुरा अबतक के प्रतिनिधि संवाददाता ने समाजसेवी साहित्कार डॉ.मधेपुरी से प्रतिक्रिया जानना चाहा तो उन्होंने कुछ ऐसा ही कहा –

जब भारत के संविधान में ही समानता के अधिकार को मौलिक अधिकारों में सुमार किया गया है तो फिर एक समान काम करनेवालों को एक समान वेतन व समान सुविधाएँ मुहैया कराने में सरकार जजवाती क्यों नहीं दीखती | सरकार संवेदनशून्य नजर क्यों आती है ? जिन जनों के वोट से जनप्रतिनिधि चुनकर सरकार में आते हैं, वे आते ही अपने लिए 2.00 रु. प्लेट चावल और 1.50 रु. प्लेट दाल . . . एक रुपए पीस रसगुल्ला और एक रुपए  प्रति कप चाय वाले वातानुकूलित कैंटीन की व्यवस्था कर लेते हैं और उन जनों को पेट भर भोजन के लिए उग्र प्रदर्शन करने एवं पसीना बहाने के लिए छोड़ देते हैं |

एक अंगीभूत कॉलेज के शिक्षक को लाख रुपये के लगभग वेतन व वेतन वृद्धि के साथ-साथ महंगाई भत्ता –पेंशन आदि और बगल वाले वित्तरहित कॉलेज के शिक्षकों को समान काम के लिए परीक्षाफल यानी उत्तीर्ण छात्रों की संख्या के आधार पर अनुदान राशि देने की नीति – समता के सिद्धांत एवं न्याय के प्रतिकूल ही तो है |

Educationist Dr.Bhupendra Madhepuri
Educationist Dr.Bhupendra Madhepuri

यह भी जानें कि इस नीति के आधार पर विभिन्न वित्तरहित महाविद्यालयों को दी जाने वाली अनुदान की राशि भी तो भिन्न-भिन्न हो जाती है | बावजूद इसके वह राशि प्रबंधन के बन्दरबांट का शिकार भी बन जाती है | तुर्रा तो यह है कि उन्हीं कॉलेजों के छात्रों को विभिन्न योजनाओं के तहत दी जाने वाली राशि को सरकार सीधे उनके बैंक खातों में जमा करवाती है, लेकिन इन्हीं छात्रों को ज्ञानवान बनाने वाले शिक्षकों के लिए सरकार ऐसा कुछ क्यों नहीं सोचती | सरकार इतना भी तो सोचे कि स्किल्ड लेबर के लिए निर्धारित पारिश्रमिक राशि भी तो उन शिक्षकों के बैंक खाते में प्रतिमाह अवश्य पहुंचे |

सरकार के सभी विभागों में नियोजन की बाढ़ आई हुई है | संविदा पर बहाल कर्मियों की मृत्यु हो जाने पर उनके परिजनों को एक मुस्त चार लाख रुपये दिए जायेंगे लेकिन अधिक दिनों तक जिंदा रहने के लिए उन्हें पेंशन नहीं दिए जायेंगे, जबकि जनप्रतिनिधि यदि चंद महीने के लिए चुनकर सरकार में प्रवेश पा लेते हैं तो जीवन पर्यन्त वे पेंशन के हक़दार तो हो ही जाते हैं – साथ ही मुफ्त दवा से लेकर मुफ्त रेलयात्रा आदि के भी हकदार हो जाते हैं |

डॉ.मधेपुरी भू.ना.मंडल वि.वि. में भौतिकी के प्राध्यापक, विकास पदाधिकारी, परीक्षा नियंत्रक के अतिरिक्त विभिन्न पदों पर रह चुके हैं | संविधान निर्माताओं द्वारा निर्मित समता के अधिकार की ऐसी व्याख्या डॉ.मधेपुरी सदृश सुलझे सोच का कोई जिन्दादिल नेक इंसान ही करेगा | संभव है इस चुनावी वर्ष में यह खबर सरकार पर असर डाले और सरकार के हाथों वित्तरहित शिक्षकों का कल्याण हो जाये |

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एनडीए माइनस मांझी यानि महागठबंधन माइनस लालू यानि बिहार में मुकाबला चौतरफा

जी हाँ, ऊपर का समीकरण चौंकाने वाला जरूर है लेकिन एनडीए में पासवान और मांझी के बीच चल रही ‘दलितों का नेता कौन’ की लड़ाई और महागठबंधन में मुलायम के ‘आफ्टर इफेक्ट’ से ऐसा कुछ हो जाय तो आश्चर्य की बात नहीं। कल तक एनडीए और महागठबंधन के बीच सीधा दिखने वाले मुकाबले के अब चौतरफा होने के पूरे आसार हैं। चलिए समझने की कोशिश करते हैं कैसे।

शुरू करते हैं रामविलास पासवान और जीतन राम मांझी की ‘लड़ाई’ से जिसमें संभावित चौतरफा मुकाबले के ‘बीज’ छिपे हैं। कल तक दलित नेता के तौर पर पासवान बिहार के इकलौते चेहरे थे। रमई राम, श्याम रजक टाईप लोगों का कद उनके सामने बहुत छोटा था। लेकिन इस बीच नीतीश कुमार ने मांझी को मुख्यमंत्री बनाने की ‘ऐतिहासिक भूल’ की और मांझी इस मौके को भुना ले गए। एक मुख्यमंत्री के तौर पर अपने संक्षिप्त कार्यकाल में मांझी ने महादलितों में इतनी पैठ तो बना ही ली कि पासवान को चुनौती दे दें। हुआ यों कि पासवान ने कह दिया कि एनडीए में मांझी ‘ट्रायल’ पर हैं। साथ में ये भी कि वे यानि पासवान राष्ट्रीय स्तर के एकमात्र दलित नेता हैं जबकि मांझी से लेकर मायावती तक राज्यस्तरीय नेता हैं। बस फिर क्या था मांझी ने तो उनके दलितों का नेता होने पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिया। उनके हिसाब से पासवान केवल परिवार की राजनीति करते हैं, उन्होंने दलितों-पिछड़ों के लिए किया ही क्या है। मांझी टिकट बंटवारे में पासवान से ज्यादा नहीं तो बराबर का हिस्सा तो चाहते ही हैं।

इनके ‘मैं बड़ा तो मैं बड़ा’ की तनातनी में पसीने छूट रहे हैं भाजपा नेतृत्व के। पासवान फिलहाल ‘स्थिर’ हैं क्योंकि एक तो वो एनडीए में मांझी से पहले आए और उम्मीद से ज्यादा ‘पाए’ हैं, दूसरे उन्हें इतना  भरोसा है कि उनका सीट शेयर मांझी से ज्यादा जरूर होगा। हालांकि मांझी ये जताने से बिल्कुल नहीं चूक रहे कि पासवान के पास कोई विधायक नहीं है जबकि उनके साथ जेडीयू से आया धड़ा है। यही नहीं, गहरे जाकर देखें तो इस पेंच के भीतर एक पेंच और है। मांझी के साथ आए विधायकों में कुछ वैसे विधायक भी हैं जो 2005 में पासवान की पार्टी से जीते थे और बाद में नीतीश के पाले में चले गए थे। अब पासवान कह रहे हैं कि इन विधायकों को टिकट ना मिले जबकि मांझी उनके टिकट के लिए अड़े हुए हैं। परेशानी का एक सबब ये भी है कि पासवान और मांझी दोनों की निगाह ‘सुरक्षित’ सीटों पर है और यहाँ भी दोनों को संतुष्ट कर पाना एनडीए के लिए टेढ़ी खीर है। इस उठापटक को देख मांझी लालू के साथ भी अपनी सम्भावना पर ‘काम’ कर रहे हैं।

देखा जाय तो ये धुआँ बिना आग के नहीं है। लालू पहले भी मांझी को बीजेपी के खिलाफ लड़ाई में महागठबंधन के साथ आने का निमंत्रण दे चुके हैं। लेकिन वास्तविकता ये है कि नीतीश के रहते ऐसा सम्भव नहीं। अब मुलायम के अलग होने के बाद महागठबंधन का भीतरी ‘असंतोष’ बाहर आने लगा है। सीटों को लेकर ‘तनाव’ वहाँ भी जबरदस्त है। ऐसे में मांझी नीतीश-लालू की दोस्ती टूटने और लालू के साथ अपना समीकरण जोड़ने का विकल्प क्यों ना देखें।

बहरहाल, बनते-बिगड़ते और बिगड़ने के बाद बनते समीकरणों को एक जगह करके देखें तो बिहार चुनाव में मुकाबला चौतरफा हो सकता है और ऐसे में वे चार कोण कुछ इस तरह होंगे – 1. भाजपा की अगुआई में रामविलास पासवान की लोजपा और उपेन्द्र कुशवाहा की रालोसपा, 2. नीतीश की जेडीयू और कांग्रेस, 3. लालू की राजद और मांझी की पार्टी ‘हम’ तथा 4. सपा के साथ एनसीपी, वामदल और पप्पू की जनअधिकार पार्टी।

गौर से देखें तो ऐसा होने पर कमोबेश लाभ में भाजपा ही होगी क्योंकि उसे जो भी नुकसान होगा वो मांझी की अनुपस्थिति में महादलित वोटों का होगा लेकिन उधर भाजपा विरोधी मत तीन अलग-अलग दिशाओं में बंट जाएंगे। इतना होने के बाद भी ये तय जान पड़ता है कि जो मुकाबला चुनाव से पहले दोतरफा नहीं हो सकेगा वो चुनाव के बाद घूम-फिरकर दोतरफा हो ही जाएगा क्योंकि 122 के जादुई आंकड़े तक पहुँचने के लिए इन चार कोणों में दो कोणों को और उन्हें रोकने के लिए शेष दो कोणों को एक होना ही होगा। जय हो राजनीति..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार चुनाव की घोषणा, पाँच चरणों में मतदान, आचारसंहिता लागू

बिहार विधानसभा चुनाव 12 अक्टूबर से 5 नवंबर के बीच पाँच चरणों में होंगे। वोटों की गिनती 8 नवंबर को होगी। 12 नवंबर तक सारी प्रक्रिया पूरी कर ली जाएगी। बुधवार को मुख्य चुनाव आयुक्त नसीम ज़ैदी ने नई दिल्ली में इसकी घोषणा की। घोषणा के साथ ही तत्काल प्रभाव से चुनाव आचार संहिता लागू हो गई है। बिहार में कुल 243 विधानसभा सीटें हैं तथा मतदाताओं की कुल संख्या 6 करोड़ 98 लाख है। वर्तमान विधानसभा का कार्यकाल 29 नवंबर को खत्म हो रहा है।

ये विधानसभा चुनाव कई मायनों में ख़ास होगा। मतदान के चरणों के बीच ओपिनियन पोल की इजाजत नहीं होगी। अन्तिम चरण का मतदान खत्म होने के आधे घंटे बाद तक एक्ज़िट पोल पर भी पाबंदी लगी रहेगी। इस बार चुनाव में प्रत्येक ईवीएम में उम्मीदवारों की तस्वीर भी लगी होगी।

चुनाव का विस्तृत कार्यक्रम इस प्रकार है –

पहला चरण  :

कुल सीटें – 49, दस जिलों (समस्तीपुर, बेगुसराय, खगड़िया, भागलपुर, बांका, मुंगेर, लखीसराय, शेखपुरा, नवादा, जमुई) में चुनाव, नोटिफिकेशन की तिथि – 16 सितंबर, नामांकन की अंतिम तिथि – 23 सितंबर, स्क्रूटनी – 24 सितंबर, नाम वापस लेने की अंतिम तिथि – 26 सितंबर, मतदान – 12 अक्टूबर।

दूसरा चरण  :

कुल सीटें – 32, छह जिलों (रोहतास, जहानाबाद, कैमूर, अरवल, औरंगाबाद, गया) में चुनाव, नोटिफिकेशन की तिथि – 21 सितंबर, नामांकन की अंतिम तिथि – 28 सितंबर, स्क्रूटनी – 29 सितंबर, नाम वापस लेने की अंतिम तिथि – 1 अक्टूबर, मतदान – 16 अक्टूबर।

तीसरा चरण  :

कुल सीटें – 50, छह जिलों (सारण, वैशाली, नालंदा, पटना, भोजपुर, बक्सर) में चुनाव, नोटिफिकेशन की तिथि – 1 अक्टूबर, नामांकन की अंतिम तिथि – 8 अक्टूबर, स्क्रूटनी – 9 अक्टूबर, नाम वापस लेने की अंतिम तिथि – 12 अक्टूबर, मतदान – 28 अक्टूबर।

चौथा चरण  :

कुल सीटें – 55, सात जिलों (पश्चिमी एवं पूर्वी चम्पारण, शिवहर, सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर, सीवान, गोपालगंज) में चुनाव, नोटिफिकेशन की तिथि – 7 अक्टूबर, नामांकन की अंतिम तिथि – 14 अक्टूबर, स्क्रूटनी – 15 अक्टूबर, नाम वापस लेने की अंतिम तिथि – 17 अक्टूबर, मतदान – 1 नवम्बर।

पाँचवां चरण  :

कुल सीटें – 57, नौ जिलों (मधुबनी, सुपौल, पूर्णिया, कटिहार, अररिया, किशनगंज, मधेपुरा, सहरसा, दरभंगा) में चुनाव, नोटिफिकेशन की तिथि – 8 अक्टूबर, नामांकन की अंतिम तिथि – 16 अक्टूबर, स्क्रूटनी – 17 अक्टूबर, नाम वापस लेने की अंतिम तिथि – 19 अक्टूबर, मतदान – 5 नवम्बर।

मतगणना  : 8 नवंबर

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‘साइकिल’ ढोएगी ‘कमल’, ‘किराया’ होगा डबल..!

राजनीति के रंग भी कितने निराले हैं..! महागठबंधन से अलग होना एक बात थी, अब तो मुलायम बोलने भी लगे हैं बीजेपी की तरह। कल तक महागठबंधन के मुखिया कहलाने वाले ‘मुलायम’ की इतनी ‘कठोर’ करवट ने एक बार फिर ये बता दिया कि राजनीति की ‘माया’ से बड़े-से-बड़े ‘संत’ भी डोल जाते हैं। इस समाजवादी ‘संत’ के यू टर्न से ऐसा ही हुआ जान पड़ता है।

कल तक बीजेपी को रोकने के लिए जनता परिवार की एकता को वक्त की मांग बताने वाले मुलायम आज नीतीश की ‘धर्मनिरपेक्षता’ पर सवाल उठा रहे हैं। आज उन्हें ये कहने में जरा भी हिचक नहीं कि सालों तक बीजेपी के साथ सरकार चलाने वाले नीतीश काहे के सेक्युलर। नीतीश क्या हैं और क्या नहीं, इस पर हमारी कोई टिप्पणी नहीं, लेकिन नेताजी से ये ‘अलौकिक’ सच पहले छिपा क्यों था..?

सपा के उपाध्यक्ष और राज्यसभा सांसद किरणमय नंदा के अनुसार महागठबंधन में कांग्रेस के शामिल होने के कारण सपा ने अलग होने का फैसला किया। वो कहते हैं कि सपा प्रमुख ने बीजेपी को रोकने के लिए ‘केवल’ जनता परिवार के विलय की बात की थी और साथ में ये भी कि अब सपा अकेले दम रोकेगी बीजेपी को। यहाँ तक कि रोकने की लिस्ट में अब नीतीश और ‘समधी’ लालू का का नाम भी जुड़ गया है। ये जानते हुए भी कि बीजेपी को रोकने के लिए महागठबंधन में कांग्रेस का होना निहायत जरूरी था और ये भी कि सपा की अपनी कोई हैसियत नहीं है बिहार में, बचकानी बयानबाजी की जा रही है।

और तो और, सपा ने सभी 243 सीटों पर चुनाव लड़ने की घोषणा की है जबकि उसे पता है कि कहीं कुछ सौ तो कहीं कुछ हजार, वोट काटने के अलावा उसकी कोई भूमिका नहीं होने जा रही है इस चुनाव में। जिस भाजपा को तथाकथित तौर पर रोकने के लिए सपा ऐसा करने जा रही है, उसका एक भी वोट काटने की स्थिति में नहीं है  वो। सपा जो भी नुकसान करेगी, महागठबंधन का करेगी।

खैर, अब ये ‘ओपेन सीक्रेट’ है कि ये सारे गुल मोदी-मुलायम और शाह-रामगोपाल की मुलाकात के बाद खिल रहे हैं और ‘साइकिल’ से ‘कमल’ को ढोने का ‘किराया’ भी तय हुआ है..!

पुनश्च:

सभी 243 सीटों पर लड़ने की घोषणा के दौरान सपा के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व विधायक रामचंद्र सिंह यादव ने एक बात बड़े मजे की कही कि बिहार में एक ओर ‘सम्प्रदायवाद’ है और दूसरी ओर ‘धोखावाद’। पार्टी ने इन दोनों से मुकाबले का निर्णय ले लिया है। अब उनसे कौन पूछे कि महागठबंधन से अलग होकर और भाजपा का पथ ‘प्रशस्त’ कर कौन-सा नया ‘वाद’ पैदा कर दिया उनकी पार्टी ने..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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जीतना है बिहार, भाजपा ‘यादव’ की ताजपोशी को तैयार..!

दिल्ली से सबक लेकर भाजपा बिहार में केवल नरेन्द्र मोदी का चेहरा आगे कर चुनाव की तैयारी में जुटी थी। एक ‘अनार’ के लिए भाजपा में इतने बीमार हैं कि पार्टी के लिए किसी निष्कर्ष पर पहुँचना सचमुच मुश्किल था। उधर इस मामले को महागठबंधन ने समय रहते समझदारी से सुलझा लिया। वहाँ नीतीश कुमार जैसा सर्वमान्य चेहरा था भी। आज जबकि बाकी समीकरण कमोबेश भाजपा के पक्ष में दिख रहे हैं, केवल यही उसके लिए कमजोर नस साबित हो रहा है। महागठबंधन के नेता हुंकार रहे हैं कि दम है तो भाजपा किसी को आगे करे क्योंकि उन्हें पता है कि भाजपा के लिए ऐसा करना मधुमक्खी के छत्ते में हाथ डालने जैसा होगा। भाजपा ने जरा भी चूक की नहीं कि डर है कि कहीं ‘दिल्ली’ ना दुहरा जाय।

प्रधानमंत्री मोदी ने बिहार में ताबड़तोड़ रैलियां कीं, दोनों हाथों से पैकेज लुटाया, बाकी नेताओं ने भी दिल्ली-पटना एक कर दिया लेकिन इसी एक ‘कमजोरी’ से भाजपा बैकफुट पर चली जाती है। इसका एक नजारा भागलपुर में दिखा जब मोदी की चौथी परिवर्तन रैली में उनके बाद की सारी तालियां जीतन राम मांझी बटोर ले गए। तब उन्होंने जरूर इस बात को शिद्दत से महसूस किया होगा कि इसका कारण भाजपा के पास बिहार में किसी एक ‘चेहरे’ का ना होना है।

बहरहाल, मोदी और उनके रणनीतिकार लगता है इसका तोड़ निकालने के बहुत करीब पहुँच चुके हैं। भाजपा की कोशिश यहाँ एक तीर से दो निशाना साधने की है। पार्टी चाहती है कि ‘चेहरा’ ऐसा हो कि भाजपा का वोटबैंक बिखरे नहीं और महागठबंधन के वोटबैंक में सेंध लग जाय सो अलग।

चुनाव के लिहाज से बिहार के जातिगत समीकरणों को देखते हुए भाजपा की मुख्यमंत्री पद के लिए चेहरे की तलाश किसी ‘यादव’ पर जाकर खत्म होती दिखती है। इसका सबसे बड़ा कारण है लालू का ‘माय’ समीकरण। नीतीश के वोटबैंक का तोड़ उपेन्द्र कुशवाहा और जीतन राम मांझी के रूप में भाजपा के पास है। मुस्लिम का वोट उसे मिलना नहीं है। रह गए यादव जिनकी तादाद बिहार में 14 प्रतिशत है और जो तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद बहुतायत में लालू के पीछे लामबंद हैं इस बार। इस बड़े वोटबैंक में सेंध लगाए बिना भाजपा आश्वस्त नहीं हो सकती है।

हालांकि भाजपा ने यादवों को तोड़ने की तैयारी पहले ही शुरू कर दी थी। धर्मेन्द्र प्रधान की जगह भूपेन्द्र यादव को बिहार का प्रभारी बनाना, लालू के ‘हनुमान’ रामकृपाल को मंत्रीमंडल में लेना और स्वयं मोदी का बिहार आकर गुजरात का संबंध ‘यदुवंश’ से जोड़ना इसके उदाहरण हैं। पप्पू की पीठ पर हाथ रखना भी भाजपा की इसी कोशिश का हिस्सा है। इतना सब कुछ कर लेने के बाद शायद अब भाजपा आखिरी बचा ‘ब्रह्मास्त्र’ भी छोड़ देने का मन बना रही है। जी हाँ, चौंकिए नहीं। बहुत सम्भव है कि पार्टी किसी ‘यादव’ को अपना ‘चेहरा’ बनाकर पेश करे।

वैसे अगर जातिगत समीकरणों को किनारे कर दें तो सुशील कुमार मोदी शायद मुख्यमंत्री पद के लिए पार्टी की पहली और स्वाभाविक पसंद होते। केन्द्र में पैठ रखनेवाले रविशंकर प्रसाद, शालीनता से समीकरण बिठानेवाले राधामोहन सिंह, तेजतर्रार महासचिव राजीवप्रताप रूडी, बिहार में पार्टी के मुस्लिम चेहरे शाहनवाज हुसैन और बिहार भाजपा के अध्यक्ष मंगल पांडेय का भी अपने-अपने हिसाब से दावा है। रेस में सीपी ठाकुर, अश्विनी चौबे, गिरिराज सिंह और प्रेम कुमार भी हैं लेकिन बहुत पीछे।

यादव चेहरे की बात आती है तो सामने सबसे पहले नंदकिशोर यादव दिखते हैं जो सदन में भाजपा के नेता हैं। पूर्व में मंत्री, नेता विरोधी दल और बिहार में पार्टी के अध्यक्ष रह चुके हैं। उनकी वरिष्ठता पर कोई संदेह नहीं लेकिन सुशील कुमार मोदी खेमे को वो शायद ही रास आएं। दूसरा नाम रामकृपाल यादव का है। लेकिन पार्टी में पैर रखते ही सीधा केन्द्र में उनके मंत्री बन जाने को ही कई लोग पचा नहीं पाए हैं। ऐसे में उनके विरोध में सभी ‘खांटी’ भाजपाई एकजुट हो जाएं तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। इन समस्याओं से निजात पाने के लिए भाजपा ऐसे चेहरे को लाना चाहेगी जो किसी ‘खास’ खेमे का ना हो, पार्टी में पुराना हो, छवि अच्छी हो, ‘केन्द्र’ के निर्देश पर काम करे, ज्यादा महत्वाकांक्षी ना हो और यादव तो हो ही। ऐसा एक नाम हुकुमदेव नारायण यादव का हो सकता है जो अभी मधुबनी से सांसद हैं और केन्द्र में मंत्री भी रह चुके हैं।

बहरहाल, भाजपा किस चेहरे को आगे करती है, ये कहना  भले ही मुश्किल हो, ताजपोशी किसी ‘यादव’ की होगी इसकी सम्भावना प्रबल है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पुनः ग्रहण की चपेट में आ गई – बीएड की परीक्षा तिथि

भू.ना.मंडल वि.वि. के विभिन्न महाविद्यालयों के 8 सितम्बर से निर्धारित 2015 की बीएड. परीक्षाओं को माननीय कुलपति डॉ.विनोद कुमार के निदेशानुसार स्थगित कर दी गई है |

वि.वि. परीक्षा नियंत्रक डॉ.नवीन कुमार ने मधेपुरा अबतक को बताया कि कुछ अपरिहार्य कारणों से 8 सितम्बर 2015 से होने वाली बीएड की परीक्षाएं अब पूर्व से निर्धारित दोनों केन्द्रों पर दिनांक 23 सितम्बर 2015 से होगी |

ज्ञातव्य हो कि पूर्व निर्धारित दोनों परीक्षा केन्द्रों में से एक कोसी प्रमंडल में और दूसरा पूर्णिया प्रमंडल में सुनिश्चित किया गया था | कोसी प्रमंडल के परीक्षार्थियों का केन्द्र भू.ना.मंडल वाणिज्य महाविद्यालय साहुगढ़-मधेपुरा और पूर्णिया प्रमंडल के परीक्षार्थियों के लिए पूर्णिया कॉलेज, पूर्णिया निर्धारित किया गया था |

अब 23 सितम्बर 2015 से बी.एड. की परीक्षाएं उन्हीं दोनों परीक्षा केन्द्रों पर आयोजित की जायेगी | परीक्षा का विस्तृत प्रोग्राम सम्बन्धित केन्द्राधीक्षकों एवं महाविद्यालयों को यथासमय भेज दिया जाएगा |

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श्री कृष्ण मंदिर में शिक्षक दिवस एवं जन्माष्टमी साथ-साथ संपन्न

यह एक अदभुत संयोग है कि शिक्षक दिवस और जन्माष्टमी साथ-साथ | यह दोनों महोत्सव श्री कृष्ण मंदिर में आज संपन्न हो रहा है | संसार की जितनी भी माताएं हैं चाहे वो हिन्दू-मुस्लिम, सिक्ख-ईसाई, जैन-पारसी किसी भी धर्म को मानने वाली हो- वह माँ दस मास तक अपना रुधिर पिलाकर तथा जीवन का अंश खिलाकर बच्चे को जन्म देती है, पालती व बड़ा करती है | फिर गुरु उन बच्चों को पसीना बहा-बहाकर संस्कारित करता है, आगे बढाता है और ऊंचाई प्रदान करता है – ये बातें डॉ. भूपेन्द्र मधेपुरी ने नव निर्माणाधीन विशाल श्री कृष्ण मंदिर में शिक्षकों एवं श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए कही |

Devotees, Students and Teachers celebrating Shri Krishna Janmashatmi and Teachers' Day collectively at under-construction site of Sri Krishna Mandir Madhepura .
Devotees, Students and Teachers celebrating Shri Krishna Janmashatmi and Teachers’ Day collectively at under-construction site of Sri Krishna Mandir Madhepura .

डॉ.मधेपुरी ने गुरु-शिष्य परम्परा की सर्वश्रेष्ठ जोड़ी के रूप में कृष्ण के ज्ञान और अर्जुन के कर्म को सर्वोत्कृष्ट कहा | साथ ही विक्रमशीला, नालंदा विश्वविद्यालयों की चर्चा की और अपने गुरु जलधर झा जलदेव को याद करते हुए कहा- “सीख-सीख कर गये विदेशी अपने घर में, फैली भारत की विद्याएँ दुनियाँ भर में ” ! आजाद भारत में तीन ऐसे महान शिक्षक हुए- जो कालान्तर में भारत के राष्ट्रपति भी बने, लेकिन शिक्षक रहते हुए वे “भारतरत्न” से सम्मानित हुए | उस त्रिमूर्ति डॉ.सर्वपल्ली राधाकृष्णन, डॉ.जाकिर हुसैन, डॉ.ए.पी.जे.अब्दुल कलाम को स्मरण करते हुए डॉ.मधेपुरी ने कहा कि 5 सितम्बर 1888 को जन्मे राधाकृष्णन के जन्म दिन को भारत में 5 सितम्बर 1958से “शिक्षक दिवस” के रूप में मनाया जाने लगा | आरम्भ में डॉ.जाकिर हुसैन जामिया मिलिया के शिक्षक और डॉ.कलाम अन्ना वि.वि. के शिक्षक रहे | डॉ.कलाम तो राष्ट्रपति की जगह खुद को शिक्षक कहलाना ही सर्वाधिक पसंद करते रहे |

वहीँ प्राचार्य डॉ.सुरेश प्रसाद यादव ने अपने संबोधन में कहा कि डॉ.राधाकृष्णन विदेशों में भी गीता का ज्ञान लोगों में बांटते रहे और भारतीय दर्शन का पताका लहराते रहे | उन्होंने सबों से अनुरोध किया कि इस मंदिर को पूरा करने में अपना सहयोग दें | अद्यक्ष परमेश्वरी प्रसाद यादव, अजय कुमार आदि ने भी अपने विचार व्यक्त किये | कार्यक्रम में मुख्यरूप से उपस्थित रहे- प्रो.सच्चीदानंद, कमलेश्वर प्रसाद यादव, अमरेन्द्र प्रसाद यादव, राकेश कुमार, विशेश्वर यादव, दिनेश प्रसाद यादव आदि | एक सप्ताह से व्यास गद्दी के प्रवचनकर्ता श्री श्री 108 श्री राजेंद्र महाराज की सबों ने सराहना की |

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कृष्ण से कलाम तक वाया गांधी, टैगोर, राधाकृष्णन

जन्माष्टमी यानि कृष्ण का जन्मदिवस और शिक्षक दिवस… दोनों एक दिन… इससे अधिक सुखद संयोग हो ही नहीं सकता। कृष्ण सभी गुणों, सारी कलाओं और समस्त लीलाओं में पूर्ण हैं। विष्णु के जितने भी अवतार हैं, उनमें ‘पूर्ण’ केवल कृष्ण हैं। लेकिन जब ‘पूर्णता’ की बात आती है तब उनके ‘प्रेमी’, ‘सखा’ या ‘सारथी’ रूपों की चर्चा तो होती है, उनके शिक्षक रूप की नहीं। जबकि सच तो ये है कि कृष्ण से बड़ा ‘शिक्षक’ सम्पूर्ण मानव-सभ्यता में हुआ ही नहीं। गीता से बड़ा अवदान और उससे बड़ा ज्ञान ना तो किसी शिक्षक ने दिया है, ना देगा। अर्जुन तो निमित्त मात्र थे, वास्तव में उन्हें सम्पूर्ण मानव-सभ्यता को ‘कर्मयोग’ का ज्ञान देना था। तब भले ही द्वापर हो और सामने महाभारत का युद्ध, उन्हें पता था कि आनेवाले समस्त युगों में जीवन का हर ‘युद्ध’ इसी ‘कर्मयोग’ से लड़ा जाना है।

आधुनिक युग में इस ‘कर्मयोग’ के कई ‘व्याख्याता’ हुए। लेकिन व्याख्या वही पूर्ण है जो कलम के साथ-साथ कर्म से भी की गई हो। इस कसौटी पर भी कई नाम खरे उतरते हैं लेकिन एक आखिरी कसौटी भी है जिस पर बिरले ही खरे उतर पाते हैं और वो है अपने कर्म को मानवमात्र के कल्याण से जोड़ देने की नैसर्गिक कला। ये कला सिर्फ एक सच्चे शिक्षक में हो सकती है। सिर्फ वही ‘शिक्षक’ कृष्ण की गौरवशाली परम्परा से जुड़ सकता है। इस कसौटी पर मैं चार नाम लूंगा और वो नाम हैं – महात्मा गांधी, रवीन्द्रनाथ टैगोर, सर्वपल्ली राधाकृष्णन और एपीजे अब्दुल कलाम। इन चारों ने अपने जीवन का हर क्षण ‘कर्म’ के योग, जीवन में उसके प्रयोग और मानवजाति के लिए उसके उपयोग में बिताया था। इन सबने आदर्श ‘शिक्षक’ का धर्म आजीवन निभाया था।

शिक्षक होने के लिए किसी स्कूल-कॉलेज-यूनिवर्सिटी का होना जरूरी नहीं। इस तरह तो कृष्ण भी शिक्षक नहीं कहलाएंगे। देखा जाय तो, महात्मा गांधी पेशे से वकील थे, टैगोर साहित्य और कला के साधक और कलाम ‘मिसाइलमैन’। इन सबमें राधाकृष्णन जरूर पेशे से शिक्षक थे। लेकिन ये सब जो भी रहे हों, जिस भी रूप में रहे हों, जहाँ भी रहे हों, सबसे पहले ‘शिक्षक’ थे क्योंकि इन सभी में अपने कर्म को मानवमात्र के कल्याण से जोड़ देने की नैसर्गिक कला थी। गांधी और टैगोर की बात करें तो ‘साबरमती आश्रम’ और ‘शांति निकेतन’ अपने-अपने उद्देश्यों के साथ अपने समय में ‘शिक्षा’ के सबसे बड़े केन्द्र थे। उधर राधाकृष्णन और कलाम राष्ट्रपति भवन में रहते हुए भी अपनी असल भूमिका नहीं भूले बल्कि और बड़े मंच से उसे विस्तार ही दिया।

कृष्ण से कलाम को और इनके बीच की कड़ियों गांधी, टैगोर, राधाकृष्णन को कुछ जोड़ता है तो वो है केवल और केवल इनका ‘कर्म’, जो इतना पारदर्शी है कि कोई भी उसमें अपनी छवि देख ले। ‘व्यष्टि’ लीन हो जाय ‘समष्टि’ में और आपको पता भी ना चले। आज टीवी, मोबाइल और इंटरनेट जैसे जोड़ने और जुड़ने के बहुतेरे साधन हैं जिनकी पहले कल्पना भी सम्भव नहीं थी लेकिन क्या ऐसा कोई साधन है जो आपको स्वयं से और आपके कर्म को मानव-मर्म से जोड़ दे..? और  इस तरह जुड़-जुड़कर एक दिन इतने विराट हो जायें आप कि पूरी सृष्टि ही अपनी परछाई लगे..? ऐसा हो सकता है, अगर आपको कर्मयोग तक ले जानेवाला कोई कृष्ण या उनकी राह पर चलनेवाला कोई कर्मयोगी शिक्षक मिल जाय।

आपने कभी सोचा कि राधाकृष्णन का जन्मदिवस ही शिक्षक दिवस क्यों है..? राधाकृष्णन को चाहनेवाले उनके जन्मदिन को खास तौर पर मनाना चाहते थे और राधाकृष्णन ये सम्मान अपने ‘शिक्षक’ को देना चाहते थे। उन्होंने अपने जीवन को शिक्षक-धर्म से एकाकार कर लिया था, इसीलिए उनका जन्मदिवस शिक्षक दिवस है। उस कर्मयोगी को पता था कि जब-जब दुनिया राह भटकेगी तब-तब किसी ‘शिक्षक’ को ही राह दिखाने आना होगा। इसी सत्य को शाश्वत रखने का पर्व है ‘शिक्षक दिवस’ और इसके सबसे बड़े प्रतीक हैं संसार को ‘गीता’ की शिक्षा देनेवाले ‘कर्मयोगी कृष्ण’।

  • मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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ओ कृष्ण..! ओ कन्हैया..!!

नोट : डॉ. रवि की यह कविता 1994 में प्रकाशित उनके चर्चित काव्य-संग्रह ओ समय !’ से ली गई है। कृष्ण के बहाने इस कविता में आज के समय, समाज और सियासत पर बड़ी महत्वपूर्ण टिप्पणी की है कवि ने।

 डॉ. रवि  : पूरा नाम डॉ. रमेन्द्र कुमार यादव रवि। जन्म  : 3 जनवरी 1943 को मधेपुरा जिला के चतरा गाँव में। कुल बारह पुस्तकें प्रकाशित। भारत के लगभग तमाम प्रतिष्ठित पुस्तकालयों के साथ-साथ संसार के एक सौ दस देशों में रचनाएं मौजूद। विधानसभा, लोकसभा और राज्यसभा के सदस्य तथा भूपेन्द्र नारायण मंडल विश्वविद्यालय, मधेपुरा के संस्थापक कुलपति रहे। साहित्यिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों में लगातार सक्रिय।

ओ कृष्ण ..!

ओ कन्हैया ..!!

ओ काले ..!!!

सुना है तुम

बार-बार

हर बार

घुप्प अंधेरे में ही

जन्म लेते हो !

 

हम जो नाशवान हैं

एक बार जन्म लेते हैं

पाप और पुण्यों के बीच

मथित, पीड़ित

अपरिभाषित ही

दम तोड़ देते हैं।

 

सुना है

राहें पनाली

रेतीली थीं

हाथ को हाथ

नहीं सूझता था

ऐसी अंधियारी थी।

 

ओ कन्हैया ..!

विगत कष्टों

हिंसाओं

के दौर में

अधर्म

अनीति

और

अन्याय से बचाने

तुम अवतरित हुए।

इतनी बार

सृष्टि ने

तुम्हें जना

फिर क्यों

ओ काले..!

यह कुत्सा है

कुबास है

कड़वाहट है..?

 

तेरे जन्मकाल में

हाथ को हाथ

नहीं दिखता था

अब तो

श्वेत भी निशा है

स्नेह भी शनि है

और

दिव्यदृष्टि से

अन्तर

चर्म चक्षु से बाहर

शायद

तब दिखता हो –

अब तो आंखें ही नहीं रहीं

विवेक बिक गया

यह भारत

यह माता

अब

बांझ और बोझिल है

नहीं तो

इतनी बार

जन्म लेने पर भी

यह घुप्प अंधेरा क्यों ..?

 

ओ कृष्ण ..!

ओ कर्ता.. !!

ओ अष्टकारक ..!!!

क्यों यह अरिष्ट है

क्यों यह अष्टग्रह

शस्य श्यामला धरती

क्यों आज उदास

स्याह और सर्द है ..?

निशीथ की आजादी

जन्म तेरा निशीथ का

सीलन से भरा समाज

यह स्याह सियासती जंग

इन सर्द जिजीविषाओं से

नासमझ समझौतों को

क्या

तेरा सुदर्शन

चीर नहीं सकता ..?

लील नहीं सकता ..?

[मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. रवि से साभार]

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