लोकतंत्र के पर्व में ‘परिवार’ सबसे बड़ा ‘उम्मीदवार’..!

‘परिवारवाद’ पर ताने सुनते-सुनते बेचारी कांग्रेस के कान तो सुन्न हो चले होंगे… पर ये क्या, जो दल अस्तित्व में ही आए ‘कांग्रेसवाद’ के विरोध में, वे इस ‘दलदल’ में ज्यादा गहरे उतर चले हैं..! आज कोई दल इस ‘रोग’ से अछूता नहीं। पर मजे की बात तो ये है कि कोई इसे ‘रोग’ मानने को ही तैयार नहीं। अब तो राजनीति के गलियारे में परिवारवाद पर बातें करना वक्त बर्बाद करना है। “हमाम में सब नंगे” वाली बात अब पुरानी ही नहीं अर्थहीन भी हो चली है। अब तो कहना पड़ेगा कि हमाम में सब नंगे हैं और सारे हमाम शीशे के हैं सो अलग। ऐसे में कौन, किससे और क्या कहे..? किसी के ‘हमाम’ पर पत्थर फेंकने का नैतिक बल रहा ही नहीं किसी के पास। सारे दल और दलों के सारे नेता इस मामले में मूक समझौता कर चुके हैं, वैसे ही जैसे संसद में करते हैं, जब-जब सांसदों का वेतन-भत्ता बढ़ना हो।

बहरहाल, जरा रुख करते हैं बिहार का, जहाँ लोकतंत्र के पर्व में विरासत की वंशबेलि लहलहाकर बढ़ रही है। बात सबसे पहले लालू प्रसाद यादव की। अपने दोनों सालों से चोट खाए लालू को बेसब्री से इंतजार था अपने बेटों के 25 की उमर पार करने का। 2010 में उनकी ये मुराद पूरी ना हो पाई थी, इस बार हो रही है। उनके दोनों बेटों की उम्र चुनाव लड़ने के लायक हो गई है, सो दोनों-के-दोनों मैदान में होंगे इस बार। बड़े बेटे तेजप्रताप का महुआ से तो छोटे तेजस्वी का राघोपुर से लड़ना तय है। अब ख़बर ये आ रही है कि ओबरा से लड़ने को मीसा भारती भी कमर कस चुकी हैं। वहीं अपनी पार्टी के सांसद जयप्रकाश नारायण यादव के भाई विजय प्रकाश को लालू जमुई से राजद का उम्मीदवार बनाने जा रहे हैं।

उधर ‘मौसम वैज्ञानिक’ रामविलास ने तो सारी हदें पार कर दीं। लोकसभा में उनके छह में से तीन सांसद उन्हीं के परिवार से हैं। वे स्वयं, सुपुत्र चिराग और भाई रामचंद्र पासवान। उनके एक और भाई पशुपति कुमार पारस बिहार में पार्टी की कमान सम्भालते हैं और अलौली से चुनाव लड़ते आ रहे हैं। जाहिर है, इस बार भी वे लड़ेंगे। पर बात यहीं खत्म नहीं होती। रामविलास पासवान ने अपने भतीजे और रामचंद्र पासवान के बेटे प्रिंस राज को कल्याणपुर से उम्मीदवार बनाया है। सोनबरसा से उनकी भगीन पतोहू सरिता पासवान लड़ रही हैं और राजापाकर से दामाद मृणाल। दूसरे दामाद कुटुंबा सीट ‘हम’ के खाते में जाने के बाद सिकंदरा से लड़ने को बेताब हैं सो अलग। उनकी सूची की शोभा केवल उनके परिवार के लोग ही नहीं बढ़ा रहे। उनके बाकी उम्मीदवारों में भी ज्यादातर ‘किसी ने किसी’ के ‘कोई न कोई’ हैं। उदाहरण के तौर पर सिमरी बख्तियारपुर से सांसद महबूब अली कैसर के बेटे युसूफ खान तो विभूतिपुर से पूर्व सांसद सूरजभान सिंह के बहनोई रमेश सिंह।

अब निगाह महदलितों के नए ‘मसीहा’ जीतनराम मांझी की पार्टी ‘हम’ पर डालें। उनकी सूची में मखदुमपुर से वे स्वयं उम्मीदवार हैं तो कुटुंबा से उनके पुत्र संतोष कुमार सुमन। उनकी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष शकुनी चौधरी तारापुर से लड़ रहे हैं तो उनके छोटे बेटे राजेश कुमार उर्फ रोहित खगड़िया से। शकुनी के बड़े बेटे सम्राट चौधरी तो विधान परिषद् में हैं ही।

बीजेपी भी किसी से रत्ती भर कम नहीं। वहाँ भी ‘विरासत’ आगे बढ़ाने वालों की लम्बी फेहरिस्त है। बक्सर के सांसद अश्विनी चौबे के बेटे अजित शाश्वत को भागलपुर से, राज्यसभा सदस्य डॉ. सीपी ठाकुर के बेटे विवेक ठाकुर को ब्रह्मपुर से तो पूर्व विधान पार्षद गंगा प्रसाद चौरसिया के बेटे संजीव चौरसिया को दीघा से पार्टी ने अपना उम्मीदवार बनाया है। नंदकिशोर यादव अपने बेटे के लिए फतुहा से टिकट चाह रहे थे लेकिन ये सीट लोजपा के खाते में चली गई। झंझारपुर से जगन्नाथ मिश्र के पुत्र नीतीश मिश्र और जमुई से नरेन्द्र सिंह के बेटे अजय प्रताप सिंह इस बार बीजेपी के उम्मीदवार हैं लेकिन ‘हम’ के कोटे से। नरेन्द्र सिंह के दूसरे बेटे सुमित सिंह भी ‘हम’ की ओर से भाजपा के उम्मीदवार होंगे, बस सीट की घोषणा बाकी है।

अभी तक की सारी चर्चा तमाम पार्टियों के घोषित उम्मीदवारों को लेकर है। किसी पार्टी की पूरी सूची अभी तक आई नहीं है। कांग्रेस की तो पहली सूची भी अभी आनी है। सारी पार्टियों की सारी सूची आने के बाद ‘परिवार’ के उम्मीदवारों की कतार और लम्बी होगी, इसमें कोई संदेह नहीं।

देखा जाय तो समस्या परिवार को लेकर नहीं, समस्या उसमें ‘वाद’ के लग जाने से है। अगर आप योग्य हैं, समाज से जुड़े हैं, राजनीति में सक्रिय हैं, कुछ करने का जज्बा रखते हैं और किसी कार्यकर्ता का हक नहीं मार रहे हैं तो किसी का बेटा, बेटी, पत्नी या भाई-भतीजा होना गुनाह नहीं। लेकिन अगर ऐसा नहीं है तो ‘लोकतंत्र’ के ‘परिवारतंत्र’ में तब्दील होते देर नहीं लगेगी। फिर हमें कोई हक नहीं होगा कि इतिहास के पन्नों में दबे उस ‘राजतंत्र’ को हम बुरा-भला कहें जिसके ‘परिवार’ से निकलने की कल्पना भी तब के लोग नहीं करते थे और एक ‘परिवार’ को पराजित या अपदस्थ कर दूसरा ‘परिवार’ ही हम पर शासन करने आता था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मधेपुरा के ‘तन’ ही नहीं, ‘मन’ के भी चिकित्सक थे ‘मेजर साहब’

कुछ लोग होते हैं जिन्हें ईश्वर विशेष तौर पर हमारे बीच भेजते हैं… हमें सींचने… हमें संस्कारित करने… हमें और हमारी कई पीढ़ियों को सम्हालने। ऐसे लोगों के भी होते और दिखते दो ही हाथ हैं हमारी तरह लेकिन जब वे नहीं रहते हमारे बीच तब हम उनके ‘अवदान’ को गिनने बैठते हैं और जब गिनते-गिनते थक जाते हैं तो सोचते हैं, पता नहीं ना दिखने वाले कितने हाथ थे उनके। जी हाँ, ऐसे लोग हमें कई-कई हाथों से, कई-कई रूपों में देते हैं और जीवन-पर्यन्त देते ही रहते हैं। ऐसे ही थे डॉ. (मेजर) उपेन्द्र नारायण मंडल… हम सबके ‘मेजर साहब’, जिन्होंने मधेपुरा की एक नहीं, दो नहीं, पूरी पाँच पीढ़ियों को दिया और ‘बहुत कुछ’ दिया। 17 सितंबर… भगवान विश्वकर्मा का दिन… इसी दिन मधेपुरा को भले ही अपनी सीमा में लेकिन अपनी तरह गढ़ने वाले इस ‘विश्वकर्मा’ का जन्मदिन था… कुल मिलाकर 90वां और हमारे बीच उनके ना रहने के बाद पहला जन्मदिन।

पेशे से चिकित्सक, व्यक्तित्व से मेजर, व्यवहार से समाजसेवी और संस्कार से संत – ये थे डॉ. (मेजर) उपेन्द्र नारायण मंडल, जिन्हें मधेपुरा ने उनकी जयंती पर बड़ी शिद्दत और श्रद्धा से याद किया। इसी वर्ष 29 जनवरी को 89 वर्ष की उम्र में उनका देहावसान हुआ था।

मेजर साहब का जन्म 17 सितम्बर 1926 को मधेपुरा के तुनियाही गाँव में हुआ था। अपने जमाने के प्रसिद्ध व अनुशासनप्रिय अधिवक्ता बाबू रघुनंदन प्रसाद मंडल के वे बड़े पुत्र थे। एमबीबीएस करने के बाद 1955 से 1960 तक वे बिहार सरकार की सेवा में रहे। 1961 में उन्होंने मेडिकल ऑफिसर के तौर पर इंडियन आर्मी ज्वाइन की। इस इलाके से ‘मेजर’ होने वाले वे पहले शख़्स थे। 1975 में जब वे सेना से सेवानिवृत्त हुए, उनके पास भारत-चीन और भारत-पाकिस्तान युद्ध समेत कई बड़े अवसरों के गौरवशाली संस्मरण थे।

आर्मी में उनका काम पूरा हो गया था लेकिन ‘युद्ध’ के लिए नई भूमि तैयार थी उनके लिए। 1975 में मधेपुरा आकर उन्होंने ‘जयश्री क्लिनिक’ (जयश्री उनकी धर्मपत्नी का नाम था) की शुरुआत की। वैसे गरीब और असहाय जो अब तक चिकित्सा के लिए भगवान भरोसे थे, उनके बीच सचमुच का ‘भगवान’ आ गया था। ऐसे लोगों से उन्होंने ‘फीस’ कभी मांगी नहीं और किसी ने दी तो गिनी नहीं। अहले सुबह से देर रात तक लोगों की कतार लगी रहती थी और ये सैनिक अपनी ‘युद्धभूमि’ में डटा रहता था। ये सिलसिला अनवरत 40 वर्षों तक चलता रहा, 89 वर्ष की उम्र में बाथरूम में फिसलने पर पेल्विक बोन टूट जाने तक।

मेजर साहब जहाँ एक ओर लाजवाब चिकित्सक और आईएमए, मधेपुरा के अध्यक्ष थे, वहीं दूसरी ओर परमहंस महर्षि मेंहीदास के अनन्य शिष्य और अखिल भारतीय संत मत के उपाध्यक्ष भी। अध्यात्म की जैसी सर्वग्राह्य व्याख्या उनके पास थी, वो अन्यत्र दुर्लभ है। ईश्वर-भक्ति और शिक्षा की ‘लौ’ वो एक साथ जलाते रहे। रघुनंदन प्रसाद मंडल इंटर व डिग्री कॉलेज की स्थापना इसी का परिणाम थी। वो इन दोनों कॉलेजों के संस्थापक सचिव थे। तुनियाही में माध्यमिक विद्यालय की स्थापना भी उन्होंने की। यही नहीं, इस इलाके की शायद ही कोई सांस्कृतिक या सामाजिक गतिविधि ऐसी होती हो जिससे उनका प्रत्यक्ष या परोक्ष जुड़ाव ना रहता हो। बता दें कि मेजर साहब विश्व हिन्दू परिषद्, मधेपुरा के अध्यक्ष और बिहार के उपाध्यक्ष भी थे।

अनुशासनप्रिय वे अपने पिता के समान थे। कर्तव्यनिष्ठ ऐसे कि उनकी कसमें खाते थे लोग। जीवन में किसी भी चीज का ‘अपव्यय’ करते उन्हें ना किसी ने देखा ना सुना। एक बहुत खास बात और, सत्संग उनकी दिनचर्या ही नहीं, उनके पूरे व्यक्तित्व का अनिवार्य अंग था। इतना अनिवार्य कि जन्मदिन हो या पुण्यतिथि, सत्संग के बिना कोई ‘अवसर’ पूरा नहीं होता था उनके लिए। अपना हर जन्मदिन वो सत्संग करके मनाते थे और उनकी इच्छा के मुताबिक उनके ना रहने पर भी सत्संग करके ही उनकी जयंती मनाई गई। उन्हीं के आवास पर और वो भी बहुत सादगी से। उनके परिवार के तमाम लोगों के साथ-साथ उनके चाहने वालों का तांता लगा रहा दिन भर। सबको विश्वास था मानो कि सत्संग है तो मेजर साहब भी होंगे ही, और रहेंगे ही ‘ना रहकर’ भी। मधेपुरा के ‘तन’ और ‘मन’ की एक साथ चिकित्सा करनेवाले उस कर्मयोगी सैनिक-संत को मधेपुरा अबतक का शत् शत् नमन।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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प्रोफेसर राय बसंत कुमार सिन्हा हुए सम्मानित

एस.के.पी.वाई.मेमोरियल ट्रस्ट के बैनर तले शिक्षक शिवकुमार बाबू की 78वीं जयन्ती मनाई गई जिसमें शहर के दिग्गज शिक्षाविदों एवं समाजसेवियों की जमघट हुई |

मुख्य अतिथि के रूप में भू.ना.मंडल वि.वि. के संस्थापक कुलपति, लोकसभा एवं राज्यसभा के सांसद रह चुके डॉ.रमेन्द्र कुमार यादव रवि ने शिक्षक शिवकुमार बाबू के प्रति उद्गार व्यक्त करते हुए अपने बारे में कहा कि मैं कुछ भी कहलाने से बेहतर ‘शिक्षक’ कहलाना ही पसन्द करूँगा | डॉ.रवि ने कहा- मैं शिक्षक था, शिक्षक हूँ और आगे भी शिवकुमार बाबू की तरह शिक्षक रहकर बच्चों में शील व संस्कार का भंडार देना चाहूँगा……!

आरम्भ में दीप जलाकर समारोह का उद्घाटन करते हुए मंडल वि.वि. के प्रतिकुलपति, डॉ.जे.पी.एन.झा ने शिक्षक और समाज के सम्बन्धों को उजागर करते हुए खेद प्रकट किया कि चाहने के बावजूद भी विश्वविद्यालीय शिक्षा में अपेक्षित सुधार इसलिए नहीं हो पा रहा है कि सेवानिवृत शिक्षकों के पदों पर अर्से से नियुक्ति नहीं हो पा रही है |

टी.पी.कॉलेज में अंग्रेजी के सफल प्रोफ़ेसर एवं मंडल वि.वि. में सी.सी.डी.सी. रहे राय वसंत कुमार सिन्हा साहब की अद्वितीय सेवा के लिए संस्थापक कुलपति डॉ.रवि, दो प्रतिकुलपति डॉ.के.के.मंडल व डॉ.जे.पी.एन.झा एवं समाजसेवी डॉ.मधेपुरी सहित स्वागताध्यक्ष दशरथ प्र.सिंह सभी ने एस.के.पी.वाई.मेमोरियल ट्रस्ट की ओर से अंगवस्त्रम एवं प्रशस्ति पत्र देकर सम्मानित किया |प्रशस्ति पत्र का वाचन डॉ.आलोक कुमार ने किया | जहाँ सचिव प्रो.रीता कुमारी द्वारा वार्षिक प्रतिवेदन पेश किया गया वहीँ अतिथियों का अभिनन्दन स्वागताध्यक्ष दशरथ प्र.सिंह ने किया |

समाजसेवी डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने गुरु ‘शिव’ की तुलना पर्वत पुरुष दशरथ मांझी से करते हुए कहा कि साठ के दशक में जब दशरथ मांझी ने छैनी-हथोड़ी लेकर पहाड़ को काटकर रास्ता बनाने का नन्हा सा संकल्प लिया होगा तब दुनिया सो रही होगी लेकिन आज वही माउंटेन मैन बनकर बरगद के वृक्ष की तरह सम्पूर्ण संसार में फैलता जा रहा है जैसे अनुशासन के लिए शिक्षक ‘शिव’ चर्चित हुए |

अद्यक्षीय भाषण में तिलका मांझी वि.वि. में प्रतिकुलपति रहे डॉ.के.के.मंडल ने कहा कि शिक्षक शिवकुमार बाबू ने कठोर अनुशासन का पालन करते हुए अनेक अनगढ़ पत्थरों को गढ़कर उसमे शिवत्व प्रदान किया है | वहीँ ट्रस्ट की अद्यक्षा करुणा कुमारी यादव द्वारा क्विज प्रतियोगिता में चयनित तीन प्रतिभागियों को पुरस्कृत किया गया |

Honorable Guests attending the function .
Honourable Guests attending the function .

मौके पर सेवानिवृत कुलसचिव शचीन्द्र, प्रधानाचार्य श्यामल किशोर यादव, शिवदत्त मंडल, धनञ्जय प्रसाद सिंह, प्रसिद्ध चिकित्सक डॉ.अरुण कुमार मंडल, सिंडीकेट सदस्य डॉ.अजय कुमार, क्रीड़ा पदाधिकारी डॉ.शैलेन्द्र कुमार, फर्जी हास्य कवि डॉ.अरुण कुमार, डॉ.अशोक कुमार, डॉ.नरेश कुमार, पत्रकार देवेन्द्र कुमार, मेडम सीता देवी, प्रो.चंद्रशेखर सहित छात्रों की अच्छी खासी उपस्थिति रही | मंचसंचालन डॉ.विनय कुमार चौधरी ने किया | अंत में सांस्कृतिक कार्यक्रमों के बाद अद्यक्ष के निदेशानुसार कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा की गई |

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पप्पू या ओवैसी, बिहार चुनाव का ‘एक्स’ फैक्टर कौन..?

एक ओर लालू-नीतीश-कांग्रेस का महागठबंधन, दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी की अगुआई में एनडीए, तीसरी ओर मुलायम की ‘थर्ड फ्रंट’ को लेकर कोशिशें… लेकिन बिहार चुनाव का ‘एक्स’ फैक्टर पप्पू या ओवैसी होने जा रहे हैं। मत होइए हैरान, समीकरण कुछ ऐसा ही कह रहे हैं। इस बार के चुनाव में ये दोनों ‘निर्णायक’ प्रभाव डाल सकते हैं और वो भी कोसी-पूर्णिया के इलाके से। कोसी और पूर्णिया प्रमंडल की सीटों पर एनडीए और महागठबंधन की नज़र जितनी अपने प्रदर्शन पर होगी, उससे कहीं अधिक पप्पू और ओवैसी पर होगी। ये दोनों मतदाताओं पर जितना असर छोड़ेंगे, उतनी ही बीजेपी की बांछें खिलेंगी और इन ‘सूरमाओं’ के धाराशायी होने पर जश्न महागठबंधन के खेमे में होगा। चलिए, समझने की कोशिश करते हैं कैसे..?

पप्पू यादव का राजनीतिक करियर बिहार में लगभग ढाई दशक पुराना है। इस अवधि में वे कई पार्टियों में आते-जाते रहे… विवादों से घिरते, केस झेलते और जेल जाते रहे… इन सबके बीच कुछ मौकों को छोड़ ज्यादातर चुनावों में स्वयं जीतते और पत्नी रंजीत रंजन को जिताते रहे… समानान्तर रूप से संगठन ‘युवा-शक्ति’ चलाते रहे… और अब ‘जनअधिकार’ नाम से उन्होंने अपनी पार्टी भी बना ली है। पार्टी बनाने से पहले भी वो खुद को समूचे बिहार के राजनीतिक पटल पर रखने की पुरजोर कोशिश करते रहे हैं। अब तो इस मामले में इतने ‘कांसस’ हो गए हैं वो कि ‘छोटे’ मसले पर भी ‘बड़ी’ बात बोलना उनकी आदत बनती जा रही है। उनकी तमाम कोशिशें अपनी जगह हैं और ये सच अपनी जगह कि उनकी पार्टी का ‘जन’ और ‘अधिकार’ दोनों बिहार में अगर कहीं है, तो फिलहाल कोसी और पूर्णिया के इलाके में ही। अभी पप्पू मधेपुरा से सांसद हैं और पत्नी रंजीत सुपौल से। पूर्णिया का प्रतिनिधित्व वो कई बार कर चुके हैं और अच्छी पैठ रखते हैं। कटिहार, अररिया, किशनगंज में भी उनकी चहलकदमी रही है। कुल मिलाकर वर्तमान पूर्णिया और कोसी कमिश्नरी पर उनका असर है, इसमें कोई दो राय नहीं।

अब बात ओवैसी की करें। कौन हैं ये ओवैसी जिनकी चर्चा बिहार में और वो भी पूर्णिया और कोसी के ‘सीमांचल’ कहलाने वाले इलाके में हो रही है और इसी इलाके से आनेवाले तस्लीमुद्दीन, तारिक अनवर और शाहनवाज जैसे मुस्लिम नेताओं की मौजूदगी के बावजूद और उनसे ज्यादा हो रही है..? देश के राजनीतिक फलक पर भले ही इस शख्स़ का ख़ास वज़ूद अभी ना दिखता हो लेकिन बहुत कम समय में मुस्लिम राजनीति का ‘चेहरा’ बनने में कामयाब तो ये हो ही गया है। फिलहाल आंध्रप्रदेश के हैदराबाद से सांसद असदउद्दीन ओवैसी ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहादुल मुस्लिमीन यानि एआईएमआईएम के प्रमुख हैं। आंध्र में इनका परिवार कुछ-कुछ वैसा ही है जैसा महाराष्ट्र में ठाकरे परिवार। इतने कम दिनों में मुसलमान इन्हें अपना ‘मोदी’ कहने लगे हैं तो ये अकारण नहीं है। कहने की जरूरत नहीं कि दिल्ली के औरंगजेब रोड का नाम डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम के नाम पर रखे जाने का विरोध करने वाले ओवैसी मुस्लिम कट्टरपंथ के हिमायती हैं। अपने बयानों और भाषणों से ‘उन्माद’ पैदा करने में फिलहाल इनकी कोई सानी नहीं है। अपनी इसी ‘काबिलियत’ और सुर्खियों में बने रहने की ‘कला’ को ओवैसी बिहार में भुनाना चाहते हैं। यही कारण है कि एनडीए जहाँ इनसे ‘उम्मीद’ लगाए बैठा है वहीं महागठबंधन इनमें अपनी ‘नाउम्मीदी’ की झलक देख रहा है।

कहने की जरूरत नहीं कि पप्पू और ओवैसी दोनों को बीजेपी का ‘मौन समर्थन’ है जो अब चीख-चीख कर ‘बोलने’ लगा है। कुशवाहा के अलग होने के बाद नीतीश लगभग उस झटके से उबर गए थे लेकिन मांझी का दिया जख़्म अभी ताजा है। ऐसे में उन्हें लालू के ‘माय’ समीकरण से बड़ी उम्मीद थी लेकिन पप्पू और ओवैसी उसी वोटबैंक में बहुत ‘घातक’ सेंध लगा रहे हैं। वैसे भी बीजेपी की सारी चिन्ता इस चुनाव में लालू के इर्द-गिर्द ही टिकी हुई है। नीतीश के साथ ‘विकास’ का जो टैग है उसका हल बीजेपी को मोदी के ‘विकास’ टैग से निकल जाने की उम्मीद है लेकिन लालू के ‘माय’ का किला उसे अभेद्य दिख रहा था। अब इसका हल पप्पू और ओवैसी से निकलता उसे दिख रहा है।

पप्पू का ताल्लुक कभी सपा, कभी एनसीपी तो कभी राजद से रहा है। अपने पूरे करियर में वे किसी दलविशेष के प्रति समर्पित नहीं रहे। या यूँ कहें कि उनकी महत्वाकांक्षा ने उन्हें समर्पित होने नहीं दिया। जिस लालू से वे राजद का ‘उत्तराधिकार’ मांग रहे थे उसकी सफलता या संघर्ष में कभी उनका याद रखने लायक कोई योगदान नहीं रहा। सब दिन अपनी राजनीति के केन्द्र में वो स्वयं रहे। पप्पू भी जानते थे कि जो चीज वो मांग रहे हैं वो उनकी है ही नहीं। उन्हें तो बस किसी बहाने लालू से ‘लड़ना’ था और जितना उन्हें लड़ना था उससे कहीं अधिक बीजेपी को उन्हें ‘लड़वाना’ था। ऐसा ही कुछ ओवैसी के साथ है। आरएसएस और बीजेपी को अपना दुश्मन नंबर वन बताने वाले ओवैसी बिहार में अपने आने का उद्देश्य बीजेपी को कमजोर करना बताते हैं। लेकिन ये बात बड़ी हास्यास्पद लगती है कि उनके आने से कोसी और पूर्णिया के ‘सीमांचल’ में बीजेपी को होनेवाले फायदे का जो गणित कोई बच्चा भी बता सकता है, उसे वो ख़ुद नहीं जान रहे हैं..!

अररिया, कटिहार, पूर्णिया और किशनगंज – इन चार जिलों से मिलकर बने ‘सीमांचल’ की आबादी तकरीबन एक करोड़ है जिसमें मुस्लिम आबादी 40 प्रतिशत है।  किशनगंज में तो 69 फीसदी आबादी मुस्लिमों की है। एक आकलन के मुताबिक सीमांचल की 21 सीटों पर ओवैसी स्पष्ट प्रभाव डाल सकते हैं। सीमांचल में आर्टिकल 371 के तहत रिजनल डेवलपमेंट काउंसिल की मांग वो यूँ ही नहीं उठा रहे हैं। जानकार तो यहाँ तक बता रहे हैं कि सीमांचल यानि कोसी-पूर्णिया डिविजन की 21 सीटों के अलावे  भागलपुर-मुंगेर डिविजन की 15 सीटों पर भी ओवैसी प्रभाव डाल सकते हैं। बताना जरूरी होगा कि बिहार की 10.50 करोड़ आबादी में 17 फीसदी मुस्लिम हैं और बिहार की कुल 243 विधान सभा सीटों में लगभग 50 सीटों के चुनाव परिणाम को प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। ऐसे में बीजेपी से जो भी ‘डील’ हुई हो ओवैसी की, आंध्र और महाराष्ट्र में पैर पसार चुकने के बाद बिहार के इस चुनाव से  मुसलमानों का ‘बड़ा’ नेता बनने का अवसर भी वो खोना नहीं चाहते।

मुसलमानों के बाद इस इलाके में यादव बड़ी तादाद में हैं। सीमांचल के चार जिलों को छोड़ दें तो शेष जिलों – मधेपुरा, सहरसा और सुपौल – में यादव मुसलमान से कहीं ज्यादा हैं और हर लिहाज से प्रभावशाली हैं। सीमांचल में भी यादवों की भूमिका को नकारा नहीं जा सकता। यादवों के इसी वोट बैंक पर पप्पू निगाह गड़ाए बैठे हैं। देखा जाय तो उनका दायरा एक अर्थ में ओवैसी से अधिक बड़ा हो जाता है कि ओवैसी जहाँ मुस्लिम बहुल सीटों पर ही छाप छोड़ेंगे वहीं पप्पू कमोबेश इस इलाके की हर सीट पर कुछ-ना-कुछ बटोर लेंगे। यादव के साथ ही कुछ मुस्लिम और कुछ अन्य जातियों के वोट भी उन्हें मिल सकते हैं। मुसलमान मुख्यमंत्री की बात पप्पू सोची-समझी रणनीति के तहत ही कर रहे हैं। लालू के ‘माय’ के समानान्तर वो अपना ‘माय’ खड़ा करना चाहते हैं।

ये भी सच है और तमाम दावों के बावजूद पप्पू और ओवैसी दोनों जानते हैं कि इन्हें सीटें इक्की-दुक्की ही मिल पाएंगी। यहाँ तक कि ना भी मिले। लेकिन ‘कोसी’ और ‘पूर्णिया’ की ‘कुंजी’ कमोबेश इन्हीं दोनों के हाथों में होगी। ‘प्रतीकात्मक’ असर ओवैसी का ज्यादा दिख रहा है तो ‘व्यावहारिक’ असर पप्पू का। लेकिन राजनीति दोनों में से किसी की ‘सार्थक’ और ‘सकारात्मक’ दिशा में नहीं है, ये कहने में कोई गुरेज़ नहीं होना चाहिए किसी को।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘बधाई’ तो बनती है नरेन्द्र मोदी के लिए और वो भी नेहरू के बराबर

आपका नाम क्या है, मुझे नहीं पूछना… आप किस दल से जुड़े हैं, कोई फर्क नहीं पड़ता… आप किस जाति के हैं, किस प्रांत से आते हैं, कौन-सी भाषा बोलते हैं, कुछ भी जानना जरूरी नहीं… लेकिन अगर आप भारतीय हैं तो आज आपको उस व्यक्ति को बधाई जरूर देनी चाहिए जिसका नाम नरेन्द्र मोदी है। बधाई इसलिए कि आज उनका जन्मदिन है। आप असहमत हो सकते हैं उनसे, राजनीतिक तौर पर विरोध कर सकते हैं उनका लेकिन अगर आपको धरती के उस विशाल टुकड़े, जिसका नाम भारत है, की पहचान और सम्मान की चिन्ता है तो आपको इस व्यक्ति के स्वस्थ और दीर्घायु होने की कामना जरूर करनी चाहिए।

मुझे पता है, संविधान का कोई पन्ना और कानून की कोई किताब किसी को बधाई और शुभकामना देने के लिए आपको बाध्य नहीं कर सकती। आप एक लोकतांत्रिक देश में रह रहे हैं और अपना विचार रखने और व्यक्त करने की पूरी आज़ादी है आपको। फिर मैं ऐसा क्यों लिख रहा हूँ..? क्या इसलिए कि मोदी प्रधानमंत्री हैं… बहुत ‘शक्तिशाली’ प्रधानमंत्री..? या इसलिए कि कमाल का बोलता है ये आदमी और इसी के दम पर भाजपा अपने स्वर्णिम दौर में है और दुनिया की ‘सबसे बड़ी’ पार्टी बन गई है..? या फिर इसलिए कि मीडिया आज मोदीमय है और तमाम सुर्खियां ये एक शख्स़ उड़ा ले जाता है और मैं चमत्कृत हूँ इस बात से..?  नहीं… बिल्कुल नहीं।

गुजरात जैसे किसी बड़े प्रांत का मुख्यमंत्री बनने और एक बार नहीं, दो बार नहीं, लगातार तीन बार बनने के बाद किसी की भी महत्वाकांक्षा हो सकती है प्रधानमंत्री बनने की। मान लेते हैं मोदी की भी यही महत्वाकांक्षा थी, परिस्थितियों ने साथ दिया उनका और बन भी गए वो। बने और प्रचंड बहुमत के साथ बने। तो फिर अब भी बेचैन क्यों हैं वो। उन्हें तो अभी ‘इंज्वाय’ करना चाहिए था अपना ‘पद’ और ‘रुतबा’। जाहिर है कोई भी ऐसा कहकर नहीं करेगा। तो फिर कम-से-कम चेहरे पर तो ‘आत्मसंतोष’ या ‘मुग्धता’ दिख ही सकती थी। लेकिन ये क्या..! इतना कुछ पाकर और बेचैन क्यों हो गया ये शख्स़..? क्या वजह है इस बेचैनी की..? यही वो ‘बिन्दु’ है जहाँ मैं आपको लाना चाहता था। जी हाँ, यही वो बिन्दु है जहाँ आकर आप नरेन्द्र मोदी को बधाई और शुभकामना दिए बिना नहीं रहेंगे।

‘प्रधानमंत्री कार्यालय’ में पैर रखते ही मोदी ने बता दिया कि ये तो बस एक ‘रनवे’ है उनके लिए। अभी तो बहुत लम्बी उड़ान भरनी है उनको। चुनाव के दौरान पूरे भारत का तूफानी दौरा कर चुके थे वो। प्रधानमंत्री बनने के बाद उनकी निगाह सबसे पहले ‘पड़ोसी’ मुल्कों पर गई और कुछ इस तरह गई कि लगा कि सारा ‘शेड्यूल’ तय था पहले से। ‘छोटे’ भूटान और नेपाल से लेकर ‘बड़े’ चीन और जापान तक और दूसरी ओर श्रीलंका से पाकिस्तान तक – तमाम पड़ोसियों से हमारे सम्बन्ध नए सिरे से ‘परिभाषित’ होने लग गए। ‘महाशक्तिशाली’ अमेरिका को उन्होंने बहुत सलीके से साधा। पहली बार लगा कि अमेरिका बराबरी पर बात कर रहा है हमसे। 28 साल तक जिस ऑस्ट्रेलिया को बिसराए रहे हम, सम्भावनाओं की तलाश में मोदी वहाँ भी पहुँचे। मॉरीशस, सिंगापुर, फ्रांस, जर्मनी, कनाडा, दक्षिण कोरिया – हर जगह मोदी दिखे और मोदी से अधिक भारत दिखा, विश्व-पटल पर अपने अस्तित्व को नए सिरे से तलाशता। कहीं हम संबंध बना रहे थे, कहीं समझौता कर रहे थे, कहीं व्यापार की संभावनाएं तलाशी जा रही थीं तो फिजी और मंगोलिया जैसे देशों को हम दिल खोलकर ‘दे’ भी रहे थे। हर जगह चर्चा में था भारत।

उनके विदेश दौरों पर टिप्णियां हुईं, काला धन के मुद्दे पर घेरने की कोशिश की गई, उन्हें ‘सूट-बूट’ की सरकार कहा गया, ललित मोदी और व्यापम को लेकर संसद भवन गूंजता रहा – वे खामोशी से सुनते रहे। उन्हें पता था कि समस्याएं हैं और केवल और केवल काम करके ही ‘जवाब’ दिया जा सकता है। चुनाव से पूर्व उन्होंने जो कहा वो सब ‘कर दिया’, ऐसा नहीं है लेकिन ‘कर देंगे’ का विश्वास उन्होंने जरूर हासिल किया है और ये बड़ी बात है। ये सचमुच बड़ी बात है कि भारत का प्रधानमंत्री ‘मन की बात’ कर रहा हो और पूरा देश उसे ‘मन’ से सुन रहा हो।

नेहरू के बाद लालबहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, वीपी सिंह, अटल बिहारी वाजपेयी, नरसिम्हा राव, मनमोहन सिंह जैसे प्रधानमंत्री हुए। सबके कार्यकाल की अपनी-अपनी उपलब्धियां रहीं। इन सबमें इंदिरा गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी नेहरू के बाद और मोदी के पहले के दो ऐसे नाम हैं जिनकी स्वीकार्यता दलगत सीमा से ऊपर और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर की थी। आज मोदी का कद भी दल और देश की सीमा को पार कर चुका है लेकिन ये जितने कम समय में और जितनी गहराई और जितने विस्तार से हुआ है, वो सचमुच अविश्वसनीय लगता है। आज उनकी उपस्थिति पूरे देश में एक समान है… राष्ट्रीय ही नहीं, राज्य स्तर के भी हर दल उन्हें देखकर अपनी रणनीति बना या बदल रहे हैं… भारत के भविष्य का ‘रूप’ गढ़ने में वो केवल मौजूद ही नहीं रहते, अपने ‘विज़न’ के साथ मौजूद रहते हैं… और देश के बाहर कहीं भी जाने पर वो भारत के प्रधानमंत्री कम और हमारे ‘प्रतिनिधि’ ज्यादा लगते हैं। हमारा सोचा हुआ हमें उनके मुँह से सुनने को मिल जाता है, ऐसा पहले या तो बहुत कम होता था या फिर होता ही नहीं था।

ये स्पष्ट हो चुका है कि मोदी की राजनीति केवल प्रधानमंत्री बनने या बने रहने के लिए नहीं है। वो अपना ‘कैनवास’ अपनी तरह से रच रहे हैं। अपने ‘कार्यकाल’ पर नहीं अपने ‘युग’ पर अपनी छाप छोड़ रहे हैं वो। जिस गुजरात से आते हैं मोदी वहाँ से सीख कर आए हैं वो कि ‘राष्ट्रपिता’ और ‘लौहपुरुष’ का कद किसी भी पद से बड़ा होता है और ये भी कि ऐसी ‘विरासत’ को संजोने और उस ‘कड़ी’ से जुड़ने का ‘व्रत’ कितना कठिन होता है। मोदी को पता है कि ‘राज’ से बड़ी चीज है ‘नीति’ और ‘नीति’ से बड़ा होता है ‘विचार’। विचारों से ‘संस्कार’ बनता है और संस्कार से बनती है ‘संस्कृति’। उन्हें ये भी पता है कि इन सबको एक साथ साधने के लिए उन्हें थोड़ा विवेकानन्द, थोड़ा पटेल और थोड़ा अटल बनना होगा। उन्हें अपनी संस्कृति के तारों से ‘डिजिटल’ इंडिया को बुनना होगा। बहरहाल, आज़ाद भारत के लिए जो नेहरू ने किया था वही मोदी कर रहे हैं इक्कीसवीं सदी के भारत के लिए। इसीलिए बधाई तो बनती है उनके लिए और वो भी नेहरू के बराबर।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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नरेन्द्र मोदी और नीतीश नहीं, अब भी लालू हैं बिहार की राजनीति की धुरी..!

बिहार चुनाव की घोषणा के बाद सारे दल अपनी-अपनी रणनीति को अन्तिम रूप देने में जी-जान से जुटे हैं। प्रथम चरण के नोटिफिकेशन के साथ-साथ ही भाजपा के 43 प्रत्याशियों की पहली सूची भी आ गई। अब कहाँ दिन का चैन और कहाँ रातों की नींद..! मतगणना तक सबके मन के तार कितने सुरों में बजेंगे, क्या मजाल कि कोई उसकी गिनती कर दे। बहरहाल, ऊपरी तौर पर सीटों का बंटवारा भले ही हो गया हो, अन्दरूनी तौर पर अभी भी दोनों ‘गठबंधन’ सीटों की समस्या सुलझाने में उलझे हुए हैं। जब तक ये तमाम दल अन्तिम रूप से किसी निष्कर्ष पर पहुँचें, क्यों ना हमलोग ये पड़ताल करें कि इस चुनाव में बिहार की राजनीति की धुरी कौन हैं – ‘केन्द्र’ के शीर्ष पर बैठे नरेन्द्र मोदी, ‘विकास’ की अग्निपरीक्षा दे रहे ‘(विकास ?)पुरुष’ नीतीश कुमार या अपने (और अपनी अगली पीढ़ी की भी) ‘अस्तित्व’ की अब तक की सबसे बड़ी लड़ाई लड़ रहे लालू प्रसाद यादव..? ये सवाल सुनने में शायद आसान लगा हो आपको, लेकिन इसका जवाब एक झटके में दे दें तो मान जाऊँ मैं। अगर इस सवाल का जवाब ढूँढ़ लें तो हम बिहार में होने जा रहे चुनाव ही नहीं, बिहार को भी समझ लेंगे।

इसमें कोई दो राय नहीं कि बिहार की राजनीति को पिछले दस वर्षों से नीतीश कुमार ने डोमिनेट किया है। राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी के उदय से पहले तक बिहार में सब कुछ ‘नीतीशमय’ दिख रहा था। उनका ‘विकासपुरुष’ वाला टैग आमलोगों से लेकर देश-विदेश के मीडिया तक में खूब चला और ऐसा चला कि नीतीश ने पहले ‘विकास’ के नाम पर नरेन्द्र मोदी के ‘वैकल्पिक’ (याद कीजिए समग्र विकास के लिए ‘गुजरात मॉडल’ अच्छा कि ‘बिहार मॉडल’ की लड़ाई) और फिर ‘साम्प्रदायिकता’ के नाम पर ‘विपरीत’ ध्रुव के रूप में खुद को स्थापित करना चाहा। ये बताने और जताने की कोशिश भी हुई कि एनडीए में अटल के बाद की पीढ़ी में उनके जैसी स्वीकार्यता किसी की हो सकती है तो नीतीश की। यहाँ तक नीतीश और मोदी लगभग बराबर पर चल रहे थे कि अचानक तमाम अटकलों को खारिज करते हुए नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर दिया गया और फिर तो उनकी ‘सुनामी’ ही चल पड़ी। हाँ, सुनामी ही कहना ठीक होगा क्योंकि मोदी जिस रफ्तार से आए और छाए वो लगभग कल्पनातीत था।

राष्ट्रीय राजनीति में नरेन्द्र मोदी के उदय और उनके साथ नीतीश के ‘अहं’ के टकराव की परिणति दो रूपों में हुई। पहली तो ये कि एनडीए से वे अलग हुए और बिहार में उनकी अकेले की सरकार बनी और दूसरी 2014 के लोकसभा चुनाव में उनकी भयानक हार हुई और अपनी ‘झेंप’ छिपाने के लिए उन्हें मांझी का चेहरा आगे करना पड़ा। यही वो बिन्दु है जहाँ से बिहार की राजनीति में एक के बाद एक कई परिवर्तन हुए।

लोकसभा चुनाव ने जहाँ बिहार में बीजेपी को सबसे बड़ी पार्टी होने का मौका दे दिया, वहीं रामविलास पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा के लिए इसने ‘संजीवनी’ का काम किया। वे अचानक नीतीश को ‘ललकारने’ की स्थिति में आ गए। यही नहीं, लोकसभा चुनाव में जो मांझी अपने क्षेत्र तक में ठीक से मुकाबले में नहीं थे, वे नीतीश की ‘अचानक’ हुई ‘कृपा’ से मुख्यमंत्री बन बैठे और कुछ दिनों तक ‘औपचारिक’ अहसान मानने के बाद उन्हें ही आँख दिखाने लगे। ये सचमुच बुरा वक्त था नीतीश के लिए। इतना बुरा कि उन्हें अन्तत: उसी लालू के पास जाना पड़ा जिनके विरोध में कभी उन्होंने अपनी समता पार्टी खड़ी की थी। बाद में जेडीयू के बनने और एनडीए से अलग होने तक उनकी पूरी राजनीति इसी ‘लालूविरोध’ पर टिकी रही। अब अपना अस्तित्व बचाने के लिए उसी लालू से हाथ मिलाना विकल्प रह गया था उनके लिए। खैर, लोकसभा चुनाव के बाद हुए विधानसभा के उपचुनाव में इसका उन्हें फायदा भी मिला और नीतीश-लालू फिर से ‘छोटे भाई-बड़े भाई’ की भूमिका में आ गए।

नीतीश अब लालू की ‘शरण’ में थे। बदले परिदृश्य में नीतीश के लालू की ‘गोद’ में बैठने की बात हो रही थी और लालू मीडिया में और मंच से ‘लाड़’ जताते हुए ये बोलने से नहीं चूक रहे थे कि गोद में छोटा भाई नहीं बैठेगा को कौन बैठेगा। जरूरत लालू की भी कम नहीं थी। ‘जहर’ पीकर भी तेजप्रताप और तेजस्वी का ‘कैरियर’ बनाने के लिए उन्हें नीतीश को मुख्यमंत्री के रूप में स्वीकारना ही पड़ा। लेकिन जब आप सत्ता में रहते हुए किसी की मदद लेने को हाथ बढ़ाते हैं तो आपका हाथ अपने आप नीचे हो जाता है। यही नीतीश के साथ हुआ।

जो लालू और नीतीश को करीब से नहीं जानते हैं, वे भी वक्त की इस करवट को इन दोनों के चेहरे पर देख सकते हैं और फर्क समझ सकते हैं। नीतीश के चेहरे से जहाँ उनके बैकफुट पर होने का भाव झाँकता है वहीं लालू के चेहरे की पुरानी चमक बहुत हद तक लौट गई दिखती है। ‘स्वाभिमान रैली’ ने रही-सही कसर भी पूरी कर दी। वहाँ ना केवल लालू अन्तिम वक्ता थे बल्कि मौजूद भीड़ ने भी बता दिया कि ‘असर’ जो भी हो नीतीश का लेकिन ‘जादू’ तो लालू का ही चलता है बिहार में। वैसे भी तमाम उतार-चढ़ाव के बावजूद लालू का वोटबैंक उनके लिए जितना समर्पित है, उतना नीतीश का बनाया वोटबैंक नीतीश के लिए नहीं। यहाँ तक कि जिन महादलितों को सामाजिक और राजनीतिक ‘सुविधा’ देकर ‘अपना’ बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी नीतीश ने, उनके नेता भी अब मांझी बन बैठे हैं।

नरेन्द्र मोदी एक नहीं चार बार आए बिहार और ‘रोजाना जंगलराज का डर’ दिखा गए और साथ में गुजरात का संबंध ‘यदुवंश’ से जोड़ गए, सुशील मोदी समेत बिहार भाजपा के तमाम नेता अगर नीतीश को घेर रहे हैं तो सबसे अधिक लालू से हाथ मिलाने को ही लेकर, सोनिया बिहार आती हैं और नीतीश के ‘नेतृत्व’ के साथ लालू के ‘सराहनीय योगदान’ को चिह्नित करना नहीं भूलतीं, पप्पू को अगर राजनीतिक विरासत चाहिए तो लालू की ही, बीजेपी अगर पप्पू की पीठ पर हाथ रखती है तो लालू का ही वोट काटने, ‘मुलायम’ को ‘कठोर’ बनाया जाता है तो समधी लालू से दूर करने, रामकृपाल यादव मंत्री और भूपेन्द्र यादव बिहार भाजपा के प्रभारी बनते हैं तो लालू को ही कमजोर करने, पासवान को ‘मौसम वैज्ञानिक’ कहे जाने की खीझ है तो लालू से ही, एनडीए में मनमाफिक सीटें ना मिलने पर मांझी के लिए जिनसे हाथ मिलाने की चर्चा होती है तो वो भी लालू ही हैं – क्या अब भी इसमें कोई संदेह है कि 1990 से लेकर अब तक यानि पच्चीस साल बाद भी लालू ही बिहार की राजनीति की धुरी हैं..?

लालू का ठेठ बिहारी अंदाज उन्हें औरों से अलग करता है। साधारण तबके से आनेवाला बिहारी खुद को उनके अधिक करीब पाता है। वे बिहार में पिछड़ों को राजनीति की मुख्यधारा में लाए इस सच्चाई को नकारना मुश्किल है। ये भूलना भी मुश्किल है कि रेल मंत्रालय को ज्यादातर मंत्री भले ही बिहार से मिले हों लेकिन उस रूप में भी किसी ने अलग छाप छोड़ी है तो वो लालू ही हैं। तमाम विसंगतियों और विरोधाभासों के बावजूद लालू की प्रासंगिकता बनी हुई है। रिक्शे पर जाकर और हाथी पर आकर वो ‘जेलयात्रा’ को भी महिमामंडित कर देंगे और आप ये पूछना भूल जाएंगे उनसे कि आखिर जेल गए क्यों थे। वैसे भी, इतिहास गवाह है कि बिहार की जनता ‘भूलने’ की ‘भूल’ करती रही है और इस बार भी वो कुछ लालू का भूलेगी, कुछ नीतीश का तो कुछ नरेन्द्र मोदी का। और अन्त में जो परिणाम आएगा उसे भी वो पाँच साल तक झेलेगी सब कुछ भूलकर।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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आखिर एनडीए के सीटों का बँटवारा तो निबट गया लेकिन महागठबंधन का. . . . !!

मधेपुरा; आखिर एन.डी.ए. की सीटों का बँटवारा कुछ इस तरह निबट गया या कहिये कि कुछ इस प्रकार मैनेज हो गया कि न तो लोजपा सुप्रीमो रामविलास, न रालोसपा प्रधान उपेन्द्र कुशवाहा या न तो हिन्दुस्तानी आवाम मोर्चा (हम) के हमदम जीतन राम मांझी खुद को हारा महसूस कर रहे हैं और न ही राजनीति के ऐसे खेल के माहिर खिलाड़ी भाजपा के राष्ट्रीय अद्यक्ष अमित शाह खुद को जीता हुआ महसूस कर रहे हैं |

बीते सप्ताह के हलचल भरे गतिरोध, उठा-पटक और मान-मनौव्वल के पटाक्षेप होते ही भाजपाई राजनीति के बादशाह अमित शाह द्वारा नई दिल्ली के भाजपा मुख्यालय में एनडीए के बीच सीटों के बंटवारे की घोषणा त्रिमूर्ति रामविलास, उपेन्द्र कुशवाहा और जीतनराम मांझी की उपस्थिति में यूँ कर दी गई :- भाजपा- 160, लोजपा- 40, रालोसपा- 23 और हम 20 सीटों पर अपने-अपने प्रत्याशियों को खड़ा करेगा | हम के कुछ प्रत्याशी यानी दो-तीन ही सही वे भाजपा के चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ेंगे | यह भी कयास लगाया जा रहा है कि मांझी के 25 सीटों को पूरा करने के लिए ही ऐसी अदभुत व्यवस्था राजनीति के शहंशाह अमित शाह द्वारा दी गई जिस पर हम की नैया के खेबनहार मांझी द्वारा सहमति में सिर हिला दिया गया है | फिर भी हम के एक वरिष्ठ नेता देवेन्द्र प्रसाद यादव, जो केन्द्रीय मंत्री भी रहे हैं, नाराज हो रहे दिखने लगे हैं | यूँ राजनीति में हर क्षण असंतोष की गुडगुडी उठती और फूटती ही रहती है |

एनडीए ने यह भी तय कर लिया कि चुनावी मुद्दा विकास होगा | स्टार-प्रचारक नरेन्द्र मोदी होंगे जो भाजपा सहित सभी सहयोगी दलों के बीच प्रचार करेंगे तथा जितनी सभाएं आयोजित की जायेंगी सभी में नरेन्द्र मोदी आते रहेंगे |

Mahagathbandhan Meetings Round
Mahagathbandhan Meetings Round

जबकि विरोध में ताल ठोकने वाली पार्टियों – जदयू, राजद एवं कांग्रेस के महागठबंधन के बीच सीटों को लेकर अभी भी उठा-पटक जारी है | मान-मनौव्वल का दौर चालू है | डाक्टरी दवा की तरह सुबह-दोपहर-शाम बैठकें बुलाई जा रही हैं | ऐसा लगता है कि फिलहाल ये सिलसिला चलता ही रहेगा | भला क्यों नहीं, लालू जहाँ लोकसभा चुनाव में मिले सीटों का हवाला दे रहे हैं वहीँ शरद-नीतीश जदयू के सीटिंग सीटों को छोड़ने को तैयार नहीं | वहीँ गुरु वशिष्ठ की डुगडुगी से आवाज आती है कि जदयू और राजद दोनों सेक्रिफाइस करने को तैयार रहें |

परन्तु इन दोनों का हाल फिलहाल बेहाल है | जदयू 118 सीटिंग सीटों में से 100 पर अपना उम्मीदवार उतरना चाह रही है जबकि उसके पास भरोसे के 96 विधायक ही बचे हैं, शेष तो बागी हो चुके हैं | तुर्रा तो यह है कि इस 96 में से 18 सीटों पर लालू अपना दावा ठोंक रहे हैं | यदि उठा-पटक में ऐसा कुछ हुआ तो जदयू के उन समर्पित विधायकों को बेवजह राम की तरह वनवासी बनना पड़ेगा | क्या समर्पित होकर पार्टी एवं जनता की सेवा करने की यही सजा उन्हें दी जायेगी और सचेतन मतदातागण समर्पण की सजा पर मौन धारण कर कब तक बैठे रहेंगे . . . ?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ.पूजा अनुपम

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इंगलिश स्पेलिंग बी. चैंपियनशिप पुरस्कार वितरण समारोह में जमकर प्रोत्साहित किया बच्चों को एस.पी. कुमार आशीष एवं डॉ.मधेपुरी ने

बच्चो में प्रतियोगिता की भावना जाग्रत करने के लिए सर्वप्रथम इंगलिश स्पेलिंग बी.एसोसिएशन की स्थापना समाजसेवी-संरक्षक डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी, अद्यक्ष-कुलानुशासक डॉ.विश्वनाथ विवेका एवं सचिव सावंत कुमार, सोनी राज आदि द्वारा की गई | छह विभिन्न ग्रुपों के लगभग पाँच सौ बच्चों के बीच प्राइमरी, सेमीफाइनल और फाइनल परीक्षाएं आयोजित कर प्रत्येक ग्रुप से टॉप टेन यानी साठ सर्वश्रेष्ठ प्रतिभागियों को चयनित कर पुरस्कृत करने हेतु आयोजकों द्वारा युवा आरक्षी अधीक्षक कुमार आशीष को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया गया |

सर्वप्रथम बच्चों एवं उनके माता-पिता व अभिभावकों को संबोधित करते हुए संरक्षक डॉ.मधेपुरी ने कहा कि बच्चे भारत के भविष्य हैं | कल आप में से ही कोई डी.एम. मो.सोहैल तो कोई एस.पी. कुमार आशीष बनेंगे | इसलिए आप मन लगाकर पढ़ें, आगे बढें और सदा आगे बढ़ते रहें | चलते रहना ही जीवन है | आप कभी निराश न हों | आप सदा उड़ान भरते रहें | आप में दैवीय शक्ति छिपी है उसमें पंख लगाते रहें और चारों ओर अच्छाइयों का प्रकाश फैलाते रहें |

अन्त में डॉ.मधेपुरी ने बच्चों को मिसाइल मैन डॉ.कलाम से मिलनेवाले उन ऐतिहासिक क्षणों की चर्चा करते हुए कहा कि हमारी महानता कभी न हारने में नहीं, बल्कि कई बार हारने के बाद भी जीत के लिए लगातार कोशिश करते रहने में निहित है | डॉ. मधेपुरी ने जोर देकर कलाम के विचारों को कुछ इस तरह कहा- भारत को भ्रष्ट्राचार से मुक्ति दिलाने के लिए पी.एम., सी.एम.और डी.एम.से भी अधिक बढ़-चढ़कर बच्चों के माता, पिता एवं एलेमेंट्री स्कूल के शिक्षकों को लौह संकल्प के साथ आगे आना होगा |

Dr.Madhepuri distributing prizes to the Champions at Madhepura P.S College .
Dr.Madhepuri distributing prizes to the Champions .

वहीँ इस मौके पर आरक्षी अधीक्षक कुमार आशीष ने बच्चों से पढाई के प्रति समर्पित होने की बात तो कही ही और संदेश के रूप में यह भी कहा- “मैं भी बिहार का ही बेटा हूँ | प्रारम्भिक पढाई गाँव के स्कूल में बोरा बिछाकर ही शुरू किया था |” आप में भी परेशानियों से जूझने का ज़ज्बा और बुलंद हौसला चाहिए तभी आप अपनी मंजिल को पा सकते हैं | सच्ची लगन हो तो सफलता आपके चरण चूमेगी |

अन्त में कुशल पुलिस प्रशासक कुमार आशीष ने यह भी कहा कि इस तरह की स्पेलिंग बी.प्रतियोगिता बड़े-बड़े शहरों में ही आयोजित की जाती है | उन्होंने यहाँ के आयोजकों को इसके लिए बधाई देते हुए अनुरोध भी किया कि हिन्दी साहित्य में भी ऐसी प्रतियोगिता आयोजित की जानी चाहिए |

अध्यक्षीय भाषण में डॉ.विश्वनाथ विवेका ने अपने गुरु डॉ.मधेपुरी एवं कर्मशील पुलिस कप्तान कुमार आशीष सहित उपस्थित शिक्षकों व अभिभावकों का स्वागत करते हुए मुख्य अतिथि को आश्वस्त किया कि अब हिन्दी में भी ऐसी ही हिन्दी स्पेलिंग बी. चैंपियनशिप प्रतियोगिता का आयोजन किया जाएगा | फिलहाल चयनित साठ बच्चों को पुरस्कृत किया गया जिसमें हॉली क्रास के जयंत कुमार को सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया |

अन्त में सचिव सावंत कुमार ने धन्यवाद ज्ञापित किया और आयोजन की सफलता के लिए विशेष रूप से संचालक मास्टर शिवम्, सोनीराज, कुंदन कुमार, वंदना कुमारी, शंहशाह, रवि, मनीष, विजय, अमित, रजाउल, आशिफ व अन्य को भी धन्यवाद ज्ञापित किया गया |

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भू.ना.मंडल वि.वि. की बी.टेक. एवं प्री.पी-एच.डी. कोर्स वर्क की परीक्षा तिथियाँ घोषित

22 सितम्बर से बी.टेक. की परीक्षा

मंडल वि.वि. के तीन संस्थानों में बी.टेक. की पढाई होती है | पूर्णिया में दो संस्थानों एम.आई.टी.पूर्णिया एवं विद्या विहार पूर्णिया तथा तीसरा संस्थान के.आई.टी. किशनगंज है |

मंडल वि.वि. में बी.टेक. पार्ट वन, पार्ट टू, पार्ट थ्री एवं पार्ट फोर 2015 की परीक्षाएं पूर्णिया महिला कॉलेज, पूर्णिया परीक्षा केन्द्र पर 22 सितम्बर 2015 (मंगलवार) से आयोजित की गई है |

परीक्षा नियंत्रक डॉ.नवीन कुमार ने मधेपुरा अबतक को बताया कि माननीय कुलपति डॉ.विनोद कुमार के निदेशानुसार उक्त तीनों संस्थानों के परीक्षार्थियों के आवागमन की सुविधाओं के मद्देनजर पूर्णिया महिला महाविद्यालय, पूर्णिया को केन्द्र बनाया गया है |

परीक्षा संचलान हेतु विस्तृत कार्यक्रम शीघ्रातिशीघ्र संस्था-प्रधानों एवं केन्द्राधीक्षक को भेजा जा रहा है |

 

 3 अक्टूबर 2015 से प्री.पी-एच.डी. की परीक्षा

मधेपुरा; प्री.पी-एच.डी. हेतु हिन्दी, उर्दू, गणित सहित कुल 19 विषयों में 2011-2012 का परीक्षा प्रपत्र बिना बिलम्ब शुल्क के 18 सितम्बर से 24 सितम्बर तक तथा 500/- पाँच सौ रु. बिलम्ब शुल्क के साथ 28 सितम्बर से 30 सितम्बर तक स्वीकार किया जायेगा |

आगे परीक्षा नियंत्रक डॉ.नवीन कुमार ने मधेपुरा अबतक को बताया कि कुलपति महोदय के निदेशानुसार इस परीक्षा के प्रारंभ किये जाने की तिथि 03 अक्टूबर से होगी तथा परीक्षा का प्रोग्राम सम्बन्धित विभागाध्यक्ष से प्राप्त किया जा सकता है | उन्होंने बताया कि इन परीक्षाओं का आयोजन विभागाध्यक्षों के अधीन होगा |

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मन हार गया तुम हार गये ….. !!

समय ! समय की महिमा ! उसकी मार्यादाएं ! बस यही कि प्रत्येक क्षण बेशकीमती होता है | क्षण का महत्व समझने के लिए हमें हर क्षण यह बात याद रखनी होती है कि वह कोई ‘क्षण’ ही था जिसने जीवन दिया है | जन्म के क्षण से ही सबों ने जिंदगी का अनुराग पाया है |

तब से लेकर आज तक क्षण-क्षण की बूंदों से बनीं हुई धारा में सभी निरंतर बहते आये हैं….और आगे… भविष्य की ओर बहते चले जा रहे हैं | यदि हमें जिन्दगी को सँवारना और सुधारना है तो अभी – इन पंक्तियों को पढ़ने के क्षणों – से ही हम चेतें | बड़े-बड़े सपने देखने शुरू करें | वे सपने नहीं जो नींद में आते हैं बल्कि सपने वे जो नींद को उड़ा देते हैं |

आप अंतर्मन से जीवन के आनन्द गीत गाते चलें | मन के अन्दर संकल्प के रंग-बिरंगे फुल खिलाते चलें | मन को ऊंचाई के साथ फैलने दें | सुबह से शाम तक मन को कभी गुमनाम नहीं होने दें | जगे रहें, लगे रहें और नेक कर्मों से जुड़े रहें |

बहुत सोये अब और न सोयें | भ्रम में बहुत समय गवाएं, अब तो भ्रम का परित्याग करें | उन्हें प्राप्त करें जिन्हें श्रेष्ठ जनों ने प्राप्त किया है | ज़िन्दगी के बर्बादी का दर्द, आज नहीं तो कल, हम सभी को सालता है | हमेशा याद रहे –

मन हार गया तुम हार गये, मन जीते तब तुम जीते हो !

पहले मन को तैयार करो, यूँ बैठ अश्रु क्यूँ पीते हो !!

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