समाजवादी चिन्तक भूपेन्द्र नारायण मंडल की 42वीं पुण्यतिथि मनी

जिला मुख्यालय के भूपेन्द्र चौक पर प्रखर स्वतंत्रता सेनानी एवं समाजवादी चिन्तक भूपेन्द्र नारायण मंडल की 42वीं पुण्यतिथि श्रद्धापूर्वक भूपेन्द्र विचार मंच के बैनर तले प्रो. श्यामल किशोर यादव की अध्यक्षता में मनाई गई। शहर के समाजसेवियों एवं समाजवादी सोच के पूर्व विधायकों राधाकान्त यादव एवं परमेश्वरी प्रसाद निराला की उपस्थिति में बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन मंत्री प्रो. चन्द्रशेखर ने उनकी प्रतिमा पर सर्वप्रथम माल्यार्पण किया और फिर उपस्थित गणमान्यों प्रो. सच्चिदानन्द यादव, डॉ. आलोक कुमार, गणेश मानव, समाजसेवी शौकत अली आदि ने भी पुष्पांजली अर्पित कर संक्षेप में अपने-अपने विचार व्यक्त किए।

इस अवसर पर आपदा प्रबंधन मंत्री प्रो. चन्द्रशेखर ने कहा कि भूपेन्द्र बाबू जैसे समाजवादी नेता केवल सैद्धांतिक रूप में गरीबों के हक की लड़ाई नहीं लड़ते थे बल्कि अपने जीवन की कार्यशैली में भी इसका बखूबी पालन करते थे। वे विधायक व सांसद रहते हुए सोशलिस्ट पार्टी को मजबूत आधार देने के लिए बैलगाड़ी की सवारी कर गांव-गांव में लोगों के बीच अलख जगाते रहे।

अन्त में विचार मंच के सचिव डॉ. आलोक कुमार द्वारा विशेष रूप से आनंद, विकास, दिलखुश, धीरेन्द्र कुमार आदि युवाओं सहित सभी अतिथियों को धन्यवाद ज्ञापित किया गया।

बता दें कि इस अवसर पर जिला मुख्यालय की कई संस्थाओं द्वारा कार्यक्रम आयोजित किए गए। इसके साथ ही विभिन्न प्रखंडों में भी भूपेन्द्र बाबू की पुण्यतिथि पर उन्हें याद किया गया।

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शरद, मीसा समेत महागठबंधन के सभी उम्मीदवारों ने किया नामांकन

तय कार्यक्रम के मुताबिक राज्य सभा के लिए महागठबंधन के चारों उम्मीदवारों ने आज नामांकन कर दिया। जेडीयू की ओर से शरद यादव और रामचन्द्र प्रसाद सिंह तो आरजेडी की ओर से मीसा भारती और राम जेठमलानी ने विधान सभा जाकर नामांकन-पत्र दाखिल किया। नामांकन के दौरान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव और पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी विशेष रूप से मौजूद रहे।

अपनी बड़ी बहन मीसा के नामांकन के बाद उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा कि उनके राज्य सभा जाने से पार्टी और मजबूत होगी। तेजस्वी और तेजप्रताप को लालू बिहार की विरासत सौंप ही चुके थे। बच गई थी दिल्ली, तो इसके लिए मीसा का विकल्प था ही उनके पास। देखा जाय तो मीसा को राज्य सभा भेजकर लालू ने अपने हिसाब से अपनी राजनीतिक विरासत का एकदम सही बंटवारा किया है।

बहरहाल, राज्य सभा उम्मीदवारों के साथ-साथ महागठबंधन के विधान परिषद उम्मीदवारों ने भी आज नामांकन कर दिया। जेडीयू की ओर से गुलाम रसूल बलियावी और सीपी सिन्हा, आरजेडी की ओर से एस एम कमर आलम और रणविजय सिंह तथा कांग्रेस की ओर से तनवीर अख्तर ने नामांकन दाखिल किया।

बता दें कि भाजपा के राज्य सभा उम्मीदवार गोपाल नारायण सिंह और विधान परिषद उम्मीदवार अर्जुन सहनी कल यानि 31 मई को नामांकन दाखिल करेंगे।

अब ये देखना दिलचस्प होगा कि इन तमाम पार्टियों के वे नेता जिनकी निष्ठा और वरिष्ठता असंदिग्ध रही लेकिन उम्मीदवारी में पीछे रह गए, उन्हें ये पार्टियां कैसे समझा और मना पाती हैं। वे नेता जो केवल नाम से नहीं काम से भी बड़े थे लेकिन फिर भी अपनी जगह नहीं बना पाए, उन्हें ये बात अच्छी तरह समझ में आ गई होगी कि राजनीति विशुद्ध रूप से ‘अवसर’ का खेल है और ये भी कि ‘स्वार्थ’ के साँचे में अगर आप फिट नहीं बैठ रहे तो आज की राजनीति में आपके संघर्ष की कोई कीमत नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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राजद कोटे से राबड़ी की जगह मीसा जाएंगी राज्य सभा

राज्य सभा के लिए राजद कोटे से वरिष्ठ वकील राम जेठमलानी और बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी के नाम तय माने जा रहे थे लेकिन राजनीति के माहिर खिलाड़ी लालू ने नामांकन के महज दो दिन पहले मीसा का नाम आगे बढ़ा दिया है। राम जेठमलानी को लेकर कोई दुविधा नहीं है लेकिन राबड़ी की जगह अब मीसा राजद की राज्य सभा उम्मीदवार हो रही हैं। ख़बर है कि महागठबंधन के सभी प्रत्याशी 30 मई को एक साथ नामांकन करेंगे।

मीडिया में काफी दिनों से कहा जा रहा था कि लालू को राष्ट्रीय राजनीति में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के लिए दिल्ली में एक बड़ा आशियाना चाहिए, जो राबड़ी के राज्य सभा जाने पर ही सम्भव हो सकता था। पूर्व मुख्यमंत्री होने के कारण उन्हें स्वाभाविक रूप से बड़ी कोठी मिलती। जबकि मीसा पहली बार किसी सदन जाएंगी और उन्हें बड़ा आवास मिलना सामान्यतया कठिन होगा। बहरहाल, लालू ने राज्य सभा में अपनी और पार्टी की दमदार उपस्थिति दर्ज कराने के लिए मीसा के पक्ष में फैसला लिया। वैसे भी दिल्ली में राष्ट्रीय स्तर के ज्यादातर नेताओं की अगली पीढ़ी पहले से ही सक्रिय है। उन सबको देखते हुए मीसा को लाना राजनीतिक रूप से बेहतर विकल्प था लालू के लिए।

तेजस्वी और तेजप्रताप के सक्रिय होने के बहुत पहले से मीसा राजनीति में हाथ आजमाने लगी थीं। पिछले कुछ चुनावों में आरजेडी की स्टार प्रचारक भी रहीं वो। बिहार और देश के महत्वपूर्ण मुद्दों पर सोशल मीडिया में भी उनकी सक्रियता लगातार देखी जा सकती है। अगर लालू ने उनसे उम्मीदें बांधी हैं तो ये अकारण हरगिज नहीं। हाँ, अब लालू राज्य सभा की उम्मीद रखने वाले रघुवंश प्रसाद सिंह, प्रभुनाथ सिंह और जगदानंद सिंह जैसे पार्टी के सीनियर नेताओं को कैसे समझाते और मनाते हैं, ये देखना दिलचस्प होगा।

चलते-चलते बता दें कि भाजपा ने भी अपने कोटे की एक सीट के लिए उम्मीदवार तय कर लिया है। पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष गोपाल नारायण सिंह भाजपा की ओर से राज्य सभा के उम्मीदवार होंगे। वैसे इस एक सीट के लिए पूर्व उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी की खूब चर्चा थी, पर आलाकमान ने गोपाल नारायण के नाम पर मुहर लगाई।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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अच्छी ख़बर, 10 सालों में बाल विवाह में आई 14 प्रतिशत की कमी

आज जबकि भ्रष्टाचार, अपराध, हिंसा और राजनीति की उठापटक से जुड़ी ख़बरों से ही मीडिया को फुरसत ना मिलती हो और अच्छी ख़बरों के लिए कान तरस जाते हों, ऐसे में कोई सकारात्मक और प्रगतिमूलक ख़बर सुनने को मिले तो कहना ही क्या..! जी हाँ, ऐसी ही एक ख़बर है देश में बाल विवाह के आँकड़ों में कमी आना। हमारे समाज में व्याप्त यह कुरीति विभिन्न धार्मिक समुदायों और यहाँ तक कि अल्प शिक्षित वर्गों में भी तेजी से समाप्त हो रही है। बता दें कि कल जारी की गई 2011 की जनगणना के मुताबिक बीते 10 सालों में बाल विवाह में 14 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई। 18 साल से पहले ब्याह दी जाने वाली लड़कियों का आँकड़ा 2001 में 44 प्रतिशत था जो 2011 में घटकर 30 प्रतिशत रह गया।

बाल विवाह के मामले में हिन्दू और मुस्लिम समुदाय की स्थिति कमोबेश एक जैसी है। दोनों समुदायों में 31 प्रतिशत लड़कियों की शादी 18 साल की उम्र से पहले कर दी जाती है। एक दशक पहले यह आँकड़ा 43 से 45 प्रतिशत था। सिख और ईसाई समुदायों की बात करें तो इनमे बाल विवाह की दर मात्र 11-12 प्रतिशत है, जबकि जैन समाज में 16 प्रतिशत लड़कियों की शादी व्यस्क होने से पहले कर दी जाती है। बौद्धों में यह आँकड़ा 28 प्रतिशत है और पारसी समेत अन्य धार्मिक समूहों में 24 प्रतिशत।

समाज में आए इस बदलाव की बड़ी वजह विभिन्न समुदायों का मिलकर रहना और उनमें आधुनिक शिक्षा का प्रसार है। आँकड़ों के मुताबिक जिन लड़कियों को पढ़ाई का अवसर मिला, उनकी शादी भी अमूमन देर से हुई। दूसरी ओर अशिक्षित लड़कियों में से करीब 38 प्रतिशत की शादी 18 साल की उम्र से पहले हो गई। हालांकि 2001 में यह आँकड़ा 51 प्रतिशत का था। वहीं, ग्रैजुएट या उससे ऊपर की पढ़ाई करने वाली लड़कियों में से महज 5 प्रतिशत की शादी ही 18 साल की उम्र से पहले हुई।

जनगणना के ताजा आँकड़ों से पता चलता है कि शादी, बच्चे और ऐसे तमाम मसलों पर विभिन्न धार्मिक समुदायों की सोच कमोबेश एक जैसी है। शादी की औसत उम्र में बढ़ोतरी, दो बच्चों के पैदा होने के बीच अंतर आदि मसलों पर एक जैसा रुझान देखा जा सकता है। पर यहाँ इस बात का उल्लेख भी जरूरी है कि बाल विवाह की कुरीति भले ही कम हो रही हो लेकिन दहेज प्रथा, बेटे की चाह और कन्या भ्रूण हत्या जैसी बुराइयां अभी भी हमारे समाज में पहले की तरह व्याप्त हैं। काश कि हम आपको इनके आँकड़ो में कमी की ख़बर भी दे पाते..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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और लालू ने ममता से पहली बंगाली प्रधानमंत्री बनने को कहा..!

विधान सभा चुनाव में शानदार जीत दर्ज करने वाली ममता बनर्जी ने आज दूसरी बार पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री के रूप में शपथ लिया। उनके शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और आरजेडी सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव साथ-साथ कोलकाता पहुँचे। इस अवसर पर लालू ने ममता से कुछ ऐसा पूछ लिया जो कहने को था तो मजाक लेकिन उसके राजनीतिक मायने भी लगा लिए जाएं तो कोई बड़ी बात ना होगी।

वाक्या कुछ यों है कि लालू ने ममता से पूछा कि “क्या वह पहली बंगाली प्रधानमंत्री बनेंगी..?” इस पर ममता ने कहा कि “आप ही लोग बन जाओ।“ लालू ने बाद में ये भी कहा कि साम्प्रदायिक ताकतों के खिलाफ आवाज़ बुलंद करने के लिए ममता बनर्जी और भाजपाविरोधी बाकी नेताओं के साथ जल्द ही एक बड़ी बैठक होगी।

बता दें कि एक इंटरव्यू के दौरान जब ममता से प्रधानमंत्री बनने का सवाल पूछा गया तो उन्होंने कहा था कि वो एक आम इंसान हैं और वीआईपी की जगह एक सामान्य इंसान की तरह पहचानी जाना चाहती हैं। हालांकि उन्होंने साथ में ये भी कहा था कि उनके कई ऐसे दोस्त हैं जिनके साथ वो भाजपाविरोधी गठबंधन के बारे में बात कर सकती हैं। इस संदर्भ में पूछे जाने पर उन्होंने नीतीश कुमार, नवीन पटनायक और अरविन्द केजरीवाल का नाम भी लिया था। पर कांग्रेस के नाम पर उन्होंने कुछ खास प्रतिक्रिया नहीं दी थी।

अब जरा असल मुद्दे पर लौटें। ये सच है कि लालू मजाकिया स्वभाव के हैं और इससे सारी दुनिया वाकिफ भी है। पर कई बार वो मजाक-मजाक में कुछ ऐसा कह और कर जाते हैं जिसका निहितार्थ लोग बाद में समझते हैं। आज ममता से लालू ने जो पूछा उसे लोग भले ही मजाक समझें लेकिन क्या ऐसा कह कर ‘बड़े भाई’ ने ‘छोटे भाई’ के बरक्स ममता को खड़ा नहीं कर दिया..? कहीं आज का ये ‘मजाक’ कल होकर नीतीश के ‘अखिल भारतीय’ सपने पर ‘ग्रहण’ ना लगा दे..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप   

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शरद यादव और आरसीपी सिन्हा होंगे जेडीयू के राज्य सभा प्रत्याशी

जेडीयू के राज्य सभा प्रत्याशियों का सस्पेंस खत्म हो गया। पार्टी के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष शरद यादव को ‘सम्मान’ देते हुए उन्हें एक बार फिर राज्य सभा भेजा जा रहा है। वहीं नीतीश के करीबी आरसीपी सिन्हा पार्टी के दूसरे प्रत्याशी होंगे। हालांकि चर्चा केसी त्यागी की भी थी लेकिन दो ही सीट होने के कारण उनकी जगह ना बन सकी।

बहरहाल, आज पार्टी ने राज्य सभा के साथ-साथ विधान परिषद प्रत्याशियों की घोषणा भी कर दी। गुलाम रसूल बलियावी और सीपी सिन्हा जेडीयू कोटे से विधान परिषद जाएंगे। आज पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष वशिष्ठ नारायण सिंह ने राज्य सभा और विधान परिषद के सभी प्रत्याशियों की सूची जारी करते हुए बताया कि ये सभी 30 मई को नामांकन दाखिल करेंगे।

बता दें कि 1999 में मधेपुरा से लोक सभा के सदस्य रहे शरद यादव 2004 में लालू प्रसाद यादव के हाथों ये सीट गंवा बैठे, तब पार्टी ने उन्हें राज्य सभा भेजा था। इसके बाद 2009 में उन्होंने मधेपुरा से ही लोक सभा का चुनाव जीता। पर आगे 2014 में उन्हें एक बार फिर हार का सामना करना पड़ा और पार्टी ने उन्हें इस बार भी राज्य सभा भेजा। लेकिन उनका कार्यकाल दो साल का ही था। इसीलिए उन्हें 2016 में भी राज्य सभा प्रत्याशी बनाया जा रहा है।

शरद यादव को फिर से राज्य सभा भेजा जाना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पार्टी के बाहर और भीतर भी ऐसा मानने वालों की कमी ना थी कि नीतीश के पार्टी और संगठन दोनों का ‘सर्वेसर्वा’ होने के बाद कहीं शरद यादव का हश्र भी जॉर्ज फर्नांडिस जैसा ना हो जाय। पर मानना पड़ेगा कि नीतीश ने यहाँ नैतिक और राजनीतिक मर्यादा का ख्याल रखा।

चलते-चलते ये भी बता दें कि इस साल जेडीयू के पाँच सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो रहा है, पर विधायकों के संख्या बल को देखते हुए पार्टी इस बार दो लोगों को ही राज्य सभा भेज सकती थी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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लालू के कोटे से जेठमलानी जाएंगे राज्य सभा, दूसरा नाम राबड़ी का..!

देश के जाने-माने वकील राम जेठमलानी राजद के कोटे से राज्य सभा के उम्मीदवार होंगे। पिछले कई दिनों से जेठमलानी के नाम की चर्चा थी। आज राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव ने उनके नाम पर विधिवत मुहर लगा दी। गौरतलब है कि जेठमलानी चारा घोटाला मामले में लालू के वकील हैं और कहना गलत ना होगा कि उन्हें राज्य सभा में भेजा जाना ‘अघोषित अनुबंध’ के तहत लिया गया निर्णय है। बहरहाल, पार्टी ने शनिवार को ही राज्य सभा के लिए नाम चयन करने का अधिकार लालू को देने की ‘औपचारिकता’ पूरी कर दी थी और अब जबकि आधिकारिक तौर पर जेठमलानी का नाम सामने आ गया है, वे 30 मई को नामांकन दाखिल करने जा रहे हैं।

राजद कोटे से जेठमलानी के साथ ही बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी का भी राज्य सभा जाना तय है। हालांकि पहले राबड़ी के साथ शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब का नाम राज्य सभा के लिए लिया जा रहा था, लेकिन सीवान में पत्रकार राजदेव रंजन की हत्या और जेल में दरबार लगाने जैसे मामलों में शहाबुद्दीन का नाम संदेह के घेरे में आने के बाद हिना दौड़ में पिछड़ गईं। अब उन्हें राजद कोटे से विधान परिषद भेजने की बात हो रही है।

अब जबकि राजद कोटे से राज्यसभा के लिए दो नाम स्पष्ट हो चुके हैं, ये देखना दिलचस्प होगा कि पार्टी अपने वरिष्ठ व अनुभवी नेता रघुवंश प्रसाद सिंह को कैसे संतुष्ट करती है। बता दें कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री रघुवंश राज्य सभा के प्रबल दावेदार थे।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप 

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क्या व्याख्याता नियुक्ति परिनियम में बदलाव करेगी बिहार सरकार..?

भारत सरकार ने यूजीसी के 2009 के पीएचडी रेगुलेशन में संशोधन कर दिया है। इस संशोधन से बिहार के 2009 से पहले के 40 हजार पीएचडीधारकों को लाभ होगा। रेगुलेशन के संशोधन से यह स्पष्ट हो गया है कि 11 जुलाई 2009 से पूर्व पीएचडी करने वालों को राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) और राज्य स्तरीय पात्रता परीक्षा (स्लेट) से छूट मिलेगी।

ये बताना जरूरी है कि यूजीसी ने इस संशोधन के माध्यम से राहत तो दी है लेकिन पाँच शर्तों के साथ। वे पाँच शर्तें हैं – 1. अभ्यर्थी को केवल नियमित पद्धति से पीएचडी उपाधि दी गई हो, 2. कम-से-कम दो बाह्य परीक्षकों ने शोधप्रबंध का मूल्यांकन किया हो, 3. पीएचडी शोधकार्य में से दो शोधपत्र प्रकाशित हों और कम-से-कम एक पत्र संदर्भित जर्नल में प्रकाशित हो, 4. पीएचडी शोधकार्य में से दो शोधपत्र संगोष्ठी या सम्मेलन में प्रस्तुत किए गए हों और 5. अभ्यर्थी का मौखिक साक्षात्कार लिया गया हो।

ध्यातव्य है कि बिहार में अभी बीपीएससी व्याख्याताओं की नियुक्ति कर रहा है। केन्द्र सरकार के संशोधन के मुताबिक अगर नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव हुआ तो हजारों पीएचडीधारक लाभान्वित होंगे। लेकिन इसके लिए बिहार के व्याख्याता नियुक्ति परिनियम 2014 में अविलंब संशोधन आवश्यक होगा। यहाँ एक प्रश्न ये भी उठता है कि जिन विषयों का साक्षात्कार बीपीएससी ने पूरा कर लिया है और सफल अभ्यर्थियों की नियुक्ति भी हो गई है उन विषयों के लिए सरकार क्या निर्णय लेगी..?

यूजीसी की भूल-सुधार में केन्द्र सरकार ने बेवजह बहुत वक्त लगा दिया। अब जो भी होना है वो बिहार सरकार की इच्छाशक्ति और तत्परता पर निर्भर करता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और शिक्षा मंत्री अशोक चौधरी उन अभ्यर्थियों के साथ अन्याय नहीं होने देंगे जो वर्षों से नियुक्ति की आस में थे..!

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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कोसी त्रासदी 2008 के बाद भी अब तक क्यों नहीं बना ध्वस्त पुल- बापू के गांवों का

2008 के इस कुसहा जल-प्रलय में ध्वस्त हुए हजारों-हजार घर, सड़कों के अनेक पुल एवं वह गई रेल की पटरियों में कुछ-कुछ सुधार व कार्य तो हुए हैं- फिर भी केंद्र सरकार द्वारा घोषित इस राष्ट्रीय आपदा में पुनर्वास के लिए हजारों लोग प्रखंड की ओर, कई गाँवों के लोग पुल के लिए प्रतिनिधियों की ओर तथा क्षेत्रीय जनता मधेपुरा से पूर्णिया रेल की सवारी करने के लिए केंद्र सरकार की ओर टकटकी लगाकर देख रही है|

जल-प्रलय के 8 वर्ष बीत गए | आज की तारीख में भी यदि आप किसी पार्क आदि सार्वजनिक स्थल पर जाएंगे तो आपको सुलझे सोच वाले व्यक्तियों से यही सुनने को मिलेगा –

यह कि जापान भी तो एक छोटा सा देश है जो क्षेत्रफल में अमूमन हमारे राजस्थान जैसा और जनसंख्या में लगभग यू.पी. जैसा माना जा सकता है | वहीं के हिरोशिमा एवं नागाशाकी को 6 एवं 9 अगस्त 1945 को अमेरिका द्वारा परमाणु बम से ध्वस्त ही नहीं बल्कि राख में तब्दील कर दिया गया | जब उसी राख पर एक महिला कुछ बच्चों को पढ़ाती हुई नजर आई तो दुनिया ने जापान एवं जापानियों के हौसलों को सलाम किया |

आखिर हमारे भारत को, भारतीय प्रदेशों को तथा विधायक, सांसद व जनप्रतिनिधियों को हो क्या गया है ? राष्ट्रवाद की भावना कहां खो गई है ?  हमारे भारत में जापान की तरह सूरज की प्रथम किरण कब आएगी जो यहां के नर-नारियों व बच्चे-बूढ़ों को जगाती रहेगी |

सोचिए तो सही, राष्ट्रीय आपदा घोषित किए जाने के बावजूद आज भी 20% लोग पुनर्वास के लिए भटक रहे हैं |

मुरलीगंज प्रखंड के रघुनाथ-भेलाही स्थित बेंगा नदी का यह ध्वस्त पुल 8 साल बाद भी विधायक-सांसद द्वारा कोई पहल नहीं किए जाने पर आंसू बहा रहा है | और गांव के लोगों को प्रखंड मुख्यालय तक जाने के लिए आज तक कई किलोमीटर का चक्कर लगाना पड़ता है |

मधेपुरा के लोग तो 8 साल में रेल से मुरलीगंज ही पहुंच पाए हैं | पता नहीं कब तक पूर्णिया पहुंच पाएंगे | एक अकेला क्या करेगा ? पार होने के लिए कोटि करों में जबतक नहीं होगा पतवार  !

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पुडुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर बनीं किरण बेदी

भारत की पहली महिला आईपीएस अधिकारी किरण बेदी पुडुचेरी की लेफ्टिनेंट गवर्नर (एलजी) होंगी। केन्द्र के प्रस्ताव पर मुहर लगाते हुए राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने आज उन्हें पुडुचेरी का एलजी नियुक्त किया। किरण 2015 में दिल्ली में भाजपा की ओर से मुख्यमंत्री पद की उम्मीदवार थीं। इस चुनाव में भाजपा को तो हार का सामना करना ही पड़ा, स्वयं किरण बेदी भी भाजपा का गढ़ मानी जाने वाली कृष्णानगर सीट से चुनाव हार गई थीं।

किरण बेदी को पुडुचेरी का एलजी बनाए जाने के पीछे कई कयास लगाए जा रहे हैं। इसे उन्हें दिल्ली की राजनीति से दूर रखने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है। सूत्रों के मुताबिक दिल्ली भाजपा में बड़ा फेरबदल होने वाला है। संभव है कि पार्टी यहाँ जल्द ही किसी नए और चर्चित चेहरे को दिल्ली भाजपा का अध्यक्ष बनाए। इसके लिए नॉर्थ-ईस्ट दिल्ली से भाजपा सांसद मनोज तिवारी का नाम सबसे आगे चल रहा है। याद दिला दें कि दिल्ली चुनाव के दौरान मनोज तिवारी द्वारा किरण बेदी की ‘कार्यशैली’ पर की गई ‘टिप्पणी’ काफी चर्चा में रही थी।

बहरहाल, एलजी बनाए जाने पर किरण ने सरकार का आभार जताया। वो पुडुचेरी की 24वीं लेफ्टिनेंट गवर्नर होंगी। वो अजय कुमार सिंह की जगह लेंगी। 1972 में देश की पहली महिला आईपीएस बनने वाली किरण ने 35 सालों तक पुलिस में अपनी सेवा दी। इस दौरान वो तिहाड़ जेल की आईजी भी रहीं। उनकी कर्तव्यनिष्ठता और ईमानदारी की आज भी मिसाल दी जाती है।

दिल्ली के मुख्यमंत्री और अन्ना आन्दोलन के दौरान उनके साथी रहे अरविन्द केजरीवाल ने उन्हें इस नई जिम्मेदारी के लिए जहाँ बधाई दी, वहीं चर्चित कवि और केजरीवाल के करीबी कुमार विश्वास उन पर तंज कसने से नहीं चूके। उन्होंने ट्वीट किया – “वो जो फिरता था लिए हाथ में सूरज कल तक, आज खैरात में जुगनू बटोर कर खुश है।”

भाजपा चाहे जिस भी वजह से किरण बेदी को पुडुचेरी भेज रही हो पर कहना पड़ेगा कि किरण बेदी जैसी शख़्सियत के लिए ‘खैरात’ जैसे शब्द का प्रयोग कर कुमार विश्वास ने मर्यादा का उल्लंघन किया है। किरण में खुद की ‘इतनी’ रोशनी जरूर थी और है कि वो ‘जुगनू’ से भी जग को रोशन कर दे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

 

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