क्या कहते हैं पाँच राज्यों के परिणाम..?

पाँच राज्यों में हुए विधानसभा के नतीजों में पश्चिम बंगाल में ‘दीदी’ और तमिलनाडु में ‘अम्मा’ का डंका एक बार फिर बजा तो असम में सर्वानंद ने भाजपा को ‘आनंद’ से भर दिया। वहीं केरल ‘लाल’ होकर लेफ्ट के हाथों में चला गया। रहा पुडुचेरी तो वहाँ डीएमके और कांग्रेस की सरकार बनने जा रही है।

पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी ने बता दिया कि वो अकेले सब पर भारी हैं। वहाँ ना तो लेफ्ट और कांग्रेस का ‘अस्वाभाविक’ गठबंधन उनके सामने टिका, ना ही मोदी और उनके रणनीतिकारों की ‘मेहनत’ काम आई। यहाँ ममता अकेले 294 में से 211 सीटें ले उड़ीं और मुकाबले को एकतरफा कर दिया। कांग्रेस को 44, लेफ्ट को 32, भाजपा को 3 और अन्य को 4 सीटों पर संतोष करना पड़ा।

असम में सत्ता की दौड़ भाजपा ने जीती और अब उत्तर-पूर्व में पहली बार उसकी सरकार बनने जा रही है। यहाँ कांग्रेस को 15 साल के शासन से बेदखल करना उसकी बड़ी उपलब्धि है। भाजपा को यहाँ अपने मुख्यमंत्री पद के घोषित उम्मीदवार सर्वानंद सोनोवाल की साफ-सुथरी छवि का बड़ा लाभ मिला। यहाँ की 126 सीटों में से उसके गठबंधन ने 86 सीटें अपने नाम कर लीं, जबकि कल तक यहाँ शासन में रही कांग्रेस अपने साथियों के साथ महज 26 सीटों पर सिमट गई। आईयूडीएफ को 13 और अन्य को 1 सीट मिली।

तमिलनाडु में जयललिता ने जबरदस्त वापसी की। 27 सालों में यहाँ पहली बार ऐसा हुआ कि एक पार्टी सरकार लगातार दूसरी बार बनने जा रही है। यहाँ की 234 में से 134 सीटें एआईएडीएमके के खाते में गईं। डीएमके और कांग्रेस मिलकर भी एआईडीएमके का सामना नहीं कर पाईं। तमाम कोशिशों के बावजूद करुणानिधि की पार्टी को जहाँ 89 सीटें ही मिलीं, वहीं कांग्रेस किसी तरह 8 सीटों पर काबिज हो पाई। अन्य के खाते में 1 सीट गई।

बुरे वक्त से गुजर रही कांग्रेस को केरल में भी निराश होना पड़ा। यहाँ की 140 सीटों में से 91 सीटें लेफ्ट गठबंधन के हिस्से में गईं। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ 47 सीटें ही मिल पाईं। 1 सीट के साथ भाजपा ने यहाँ अपना खाता खोला। बची 1 सीट अन्य को मिली।

30 सीटों वाले पुडुचेरी ने डीएमके और कांग्रेस के जख्म पर थोड़ा मरहम जरूर लगाया। इन दोनों ने मिलकर यहाँ 17 सीटें अपने नाम कीं। एआईएनआरसी को 9, एआईएडीएमके को 4 और अन्य को 1 सीट मिली।

इन राज्यों के परिणाम आने के बाद स्वाभाविक रूप से कांग्रेस खेमे में मायूसी है और भाजपा उत्साहित दिख रही है। देखा जाय तो भाजपा का उत्साह अकारण भी नहीं है। अगर इन पाँच राज्यों की सीटों को मिलाकर देखें तो भाजपा ने 670 सीटों पर चुनाव लड़ा और 65 सीटों पर दर्ज की, जबकि 2011 में पार्टी ने 771 सीटों पर चुनाव लड़ा था और उसे बस 5 सीटों पर जीत मिली थी। इस बार उसकी सीटों में जहाँ 13 गुना इजाफा हुआ वहीं असम भी झोली में आ गिरा। लेकिन इन परिणामों ने यह भी स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय दलों का युग अभी समाप्त होने वाला नहीं। दिन-ब-दिन कमजोर होती कांग्रेस से देश भर में भाजपा को जितना भी लाभ मिला हो, सच यही है कि उससे कहीँ अधिक फायदे में क्षेत्रीय दल रहे हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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