मधेपुरा और भारतीय रेल यानि एक और ‘कोसी’ की गाथा

वर्ष 2008 का अगस्त माह। कुसहा बाँध टूटने से बाढ़ की त्रासदी ने ऐसी धूम मचाई कि कोसी अंचल के जल-प्रलय को तत्कालीन केन्द्र सरकार द्वारा राष्ट्रीय आपदा घोषित कर दिया गया। चारों ओर सड़कें टूटीं, बड़े-बड़े पुल बह गए एवं रेल की पटरियाँ ध्वस्त हो गईं। हाल तक मधेपुरा से रेल द्वारा यात्रा करना सपना बना रहा, जबकि यहाँ पर दो दिग्गज सांसद हैं – एक शरद यादव और दूसरे राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव और जनता बापू के बन्दर जैसे मुख बन्द किए बैठी है।

हाल में एक ट्रेन चलने लगी है – कोसी एक्सप्रेस। मुरलीगंज से मधेपुरा पहुँचती है सुबह के साढ़े तीन बजे। अब इसे सुबह कहा जाय कि रात, कहना मुश्किल है। बहरहाल, इस ट्रेन में ए.सी. का एक ही डब्बा होता है। मधेपुरा के लोग अपने परिवार के साथ उस ट्रेन से यात्रा करने हेतु कन्फर्म टिकट तो ले लेते हैं परन्तु स्टेशन पर गाड़ी उतनी देर (दो मिनट) भी नहीं ठहरती कि यात्री सपरिवार डब्बे में चढ़ सके। एक ही परिवार के कुछ लोग चढ़ जाते हैं और कुछ देखते हुए रह जाते हैं। कारण यह भी कि ट्रेन बड़ी लाईन वाली और प्लेटफॉर्म छोटी लाईन वाला। ट्रेन और प्लेटफॉर्म में अंतर इतना कि चढाई एवरेस्ट पर चढ़ने जैसी और उस पर तुर्रा यह कि रेल कर्मचारी एक-डेढ़ मिनट लगा देते हैं ए.सी. डब्बे के दोनों गेट खोलने में। तब तक ए.सी. के अधिकांश पैसेंजर को छोड़ गाड़ी सहरसा के लिए खुल जाती है। ऐसे में कुछ लोग तो किसी तरह अगल-बगल के नॉन ए.सी. डब्बे में चढ़ जाते हैं पर चढ़ने में असफल साबित हुए लोगों के सामने अब चुनौती होती है ट्रेन को सहरसा जाकर पकड़ने की।

खैर, कुछ लोग निजी मोटर गाड़ी से तो कुछ भाड़े के टैम्पू से सहरसा पहुँचकर उसी कोसी एक्सप्रेस पर सवार होते हैं परन्तु यहाँ पर उन्हे ट्रेन खुलने का इंतजार करना पड़ता है और वो भी दो-चार मिनट नहीं, लगभग घंटे भर और कई बार उससे भी अधिक। जरा सोचिए, उन यात्रियों को इस परिस्थिति में कैसा लगता होगा जो दौड़ते-हाँफते इस ट्रेन को पकड़ने सहरसा पहुँचे होंगे। कई बार तो सहरसा जाकर कोसी एक्सप्रेस पकड़ने की आपाधापी में यात्री अपनी अंतिम यात्रा पर भी चले गए हैं और सांसद-विधायक उनकी मातमपुर्सी करने और आर्थिक सहयोग देने पहुँचे हैं। पर क्या इन प्रतिनिधियों का कर्तव्य केवल इतना ही है..?

बहरहाल, इस ‘कोसी’ की ‘त्रासदी’ यहीं खत्म नहीं होती। आगे राजेन्द्र नगर टर्मिनल पर इस ट्रेन को दो मिनट से अधिक रुकना मंजूर नहीं लेकिन यहाँ से पटना जंक्शन की ढाई कि.मी. की दूरी ये आधे घंटे में तय करेगी..! तीन मिनट की दूरी ये तीस मिनट में क्यों तय करती है इसका जवाब कौन देगा..? यदि राजेन्द्र नगर में यह ट्रेन पाँच मिनट रुक जाती तो ज्यादातर यात्री यहीं उतर जाते और पटना जंक्शन पर यात्रियों और मोटर गाड़ियों का लोड स्वत: घट जाता। आखिर इसे कौन देखेगा..? क्या यात्रियों के लिए सब कुछ ‘प्रभु’ भरोसे ही छोड़ दिया जाएगा या हमारे जनप्रतिनिधि भी कुछ करेंगे..?

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. मधेपुरी से साभार

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‘अंधेरे’ से लड़कर ‘रोशनी’ की नई इबारत लिख रहा बिहार..!

अगले दो साल में बिहार का कोई गांव अंधेरे में नहीं रहेगा। ग्रामीण विद्युतीकरण के क्षेत्र में बिहार सरकार ने जैसी तत्परता दिखाई है उसकी सराहना देश भर में हो रही है। 2015-16 में बिहार को 1632 गांवों में बिजली पहुँचाने का लक्ष्य दिया गया था और बिजली पहुँचाई गई 1754 गांवों में। ग्रामीण विद्युतीकरण के मामले में बिहार ने सभी राज्यों को पीछे छोड़ दिया है। अभी हाल ही में बिहार आए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस उपलब्धि के लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की दिल खोलकर तरीफ की थी।

ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव सह बिहार स्टेट पावर होल्डिंग कम्पनी के सीएमडी प्रत्यय अमृत ने बीते शनिवार को पटना में आयोजित बिहार-झारखंड राज्य विद्युत परिषद फील्ड कामगार यूनियन के 39वें स्थापना दिवस समारोह में बिहार की इस उपलब्धि को कुछ महत्वपूर्ण आँकड़ों से स्पष्ट किया। उन्होंने बताया कि 2005 में राज्य में महज 700 मेगावाट बिजली की सप्लाई होती थी जो वर्तमान में 3531 मेगावाट है और 2017 में इसे बढ़ाकर 4500 मेगावाट करने का लक्ष्य रखा गया है। इसी तरह ग्रीड सब स्टेशनों की बात करें तो 2005 में 45 ग्रीड सब स्टेशनों से बिजली सप्लाई की जाती थी जो वर्तमान में 98 है और 2017 तक इनकी संख्या 140 हो जाएगी। नि:संदेह ये आँकड़े उत्साह बढ़ाने के साथ-साथ उम्मीद भी बंधाते हैं।

बता दें कि वर्तमान में बिहार में 1415 गांव अविद्युतीकृत हैं और इनमें से 750 गांव अकेले कटिहार जिले में हैं। अब इन गांवों की तस्वीर भी बहुत जल्द बदलने वाली है। ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव ने बताया कि बिहार के पूर्ण विद्युतीकरण का लक्ष्य तय समय से पहले पूरा करने के लिए योजना तैयार की जा रही है। 2017 में बिहार पूर्ण विद्युतीकृत राज्य हो जाएगा।

बिहार के कदम उजाले की ओर बढ़ चुके हैं। ‘अंधरे’ से लड़कर यह राज्य ‘रोशनी’ की नई इबारत लिख रहा है। ‘मधेपुरा अबतक’ इसके लिए मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, ऊर्जा मंत्री बिजेन्द्र प्रसाद यादव और ऊर्जा विभाग के प्रधान सचिव प्रत्यय अमृत को साधुवाद देता है।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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काश कि इस मामले में हम भी पाकिस्तान की राह पर चलें..!

शादियों पर बेलगाम होते खर्च से जितने हम परेशान हैं उतने ही हमारे पड़ोसी पाकिस्तान के लोग भी। ‘प्रतिष्ठा के पीछे प्राण गंवाने’ की कहावत जितनी भारत में लागू होती है उतनी ही पाकिस्तान में भी। लेकिन पाकिस्तान के पंजाब प्रांत ने इससे निजात पाने के लिए एक कड़ा और बड़ा कदम उठाया है। शादियों में अनावश्यक शाहखर्ची पर रोक लगाने के लिए वहाँ की सरकार ने शादी में एक से ज्यादा तरह के भोजन, आतिशबाजी और दहेज का सामान सार्वजनिक रूप से दिखाने पर रोक लगाने के लिए कानून पारित किया है। इस कानून का उल्लंघन करने पर एक महीने की जेल और 20 लाख रुपये तक के जुर्माने की सजा हो सकती है।

वहाँ के पंजाब प्रांत के मुख्यमंत्री शहबाज शरीफ ने इस कानून को सख्ती से लागू करने का संकल्प लेते हुए कहा कि इस कानून से शादियों में सादगी को बढ़ावा देने और अनावश्यक दिखावे को हतोत्साहित करने में मदद मिलेगी। बता दें कि राज्य की विधानसभा में बीते गुरुवार को ये कानून बहुमत के साथ पारित किया गया। इस कानून के तहत होटल, रेस्तरां और कैटरर्स को निर्देश दिया गया है कि शादी में वे एक से अधिक तरह का भोजन ना परोसें। यही नहीं, इस निर्देश में यह भी सुनिश्चित करने को कहा गया है कि शादी से जुड़ी तमाम रस्में रात 10 बजे से पहले पूरी कर ली जाएं।

भले ही इस कानून से राज्य में शादी पर होने वाली सारी फिजूलखर्ची एकदम से बन्द ना हो लेकिन उसमें कमी तो आएगी ही। ठीक वैसे ही जैसे बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू होने के बाद भी ‘पक्के’ शराबी भांति-भांति के उपायों से भले ही शराब का सेवन कर लेते हों लेकिन इस कानून के व्यापक असर से इनकार नहीं किया जा सकता। ऐसे कानूनों से समाज में एक सार्थक संदेश तो जाता ही है।

कुरीतियां समाज में हमेशा रही हैं और रहेंगी भी। लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि उसे हम अपनी नियति मान लें। मनुष्य ने अपनी लगातार की गई कोशिशों की बदौलत ही इस दुनिया को रहने के लायक बनाया है। पाकिस्तान के पंजाब में शादी में शाहखर्ची को लेकर बनाया गया कानून हो या हमारे बिहार में शराबबंदी का कानून, ये ऐसी ही कोशिशें हैं।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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जी हाँ, न्यूयार्क ने 14 अप्रैल को मनाया ‘बिन्देश्वर पाठक डे’

भारतीय सामाजिक कार्यकर्ता और सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिन्देश्वर पाठक को न्यूयार्क शहर ने अनूठा सम्मान दिया। एक असाधारण कदम के तहत न्यूयार्क के मेयर बिल डी ब्लासियो ने 14 अप्रैल 2016 को ‘बिन्देश्वर पाठक डे’ घोषित किया। पाठक को अमानवीय स्थिति में काम करने वाले लाखों लोगों के जीवन-स्तर को सुधारने के लिए यह सम्मान दिया गया। सार्वजनिक स्वास्थ्य और स्वच्छता के क्षेत्र में पाठक के अभूतपूर्व योगदान से पूरी दुनिया वाकिफ है।

न्यूयार्क में आयोजित समारोह में 73 वर्षीय पाठक स्वयं उपस्थित थे। उन्हें ‘न्यूयार्क ग्लोबल लीडर्स ह्यूमैनिटेरियन अवार्ड’ प्रदान किया गया। इस अवसर पर मेयर ब्लासियो ने कहा कि “पाठक एक ऐसे व्यक्ति हैं जिसने समाज में घोर अन्याय देखा, ऐसी चीज देखी जो बहुत सारे लोगों के लिए अव्यावहारिक एवं स्थायी है और जिसमें बदलाव लाने के लिए रचनात्मकता, ऊर्जा, प्रेरणा तथा उम्मीद थी।” आगे उन्होंने कहा कि “पाठक ने अपनी दृष्टि से शोषित वर्ग की मदद की और अपने काम एवं संगठन के जरिए नई प्रौद्योगिकी का निर्माण किया जिसने सार्वजनिक स्वास्थ्य तथा पर्यावरण में सुधार किया और कई समुदायों के लिए मूल रूप में वास्तविकता बदल दी।”

बता दें कि डॉ. बिन्देश्वर पाठक का जन्म 2 अप्रैल 1943 को बिहार में हुआ था। सुलभ इंटरनेशनल की नींव इन्होंने 1970 में रखी थी जिसकी आज ना केवल भारत बल्कि विश्व भर में प्रतिष्ठा है। सुलभ इंटरनेशनल मानव अधिकार, पर्यावरणीय स्वच्छता, ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्रोतों और शिक्षा द्वारा सामाजिक परिवर्तन जैसे क्षेत्रों में काम करने वाली अग्रणी संस्था है। अपने विशिष्ट कार्यों के लिए ‘पद्मभूषण’ डॉ. पाठक 60 से ज्यादा राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सम्मान से नवाजे जा चुके हैं। 2003 में उनका नाम विश्व के 500 उत्कृष्ट सामाजिक कार्य करने वाले व्यक्तियों की सूची में प्रकाशित किया गया था।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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बान की मून, नरेन्द्र मोदी, शी जिनपिंग और नीतीश होंगे एक मंच पर

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के काम और कद को अब अंतर्राष्ट्रीयता स्वीकार्यता मिल रही है। इसका अंदाजा नेपाल सरकार से उन्हें अभी-अभी मिले एक न्योते से लगाया जा सकता है। जी हाँ, नेपाल सरकार की ओर से भगवान बुद्ध की 2560वीं जयंती पर अन्तर्राष्ट्रीय बौद्ध सेमिनार का आयोजन किया जा रहा है जिसमें शामिल होने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ के महासचिव बान की मून, भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और चीन के राषट्रपति शी जिनपिंग के साथ-साथ नीतीश कुमार को भी न्योता भेजा गया है। नीतीश इस खास मौके पर विशिष्ट अतिथि के तौर पर शामिल होंगे।

बता दें कि इस सेमिनार का आयोजन 19 और 20 मई को राजधानी काठमांडू में किया जा रहा है, जबकि 21 मई को लुंबनी में बुद्ध जयंती समारोह मनाया जाएगा। जेडीयू के राष्ट्रीय प्रवक्ता व राज्यसभा सांसद केसी त्यागी ने इस आमंत्रण के लिए नेपाल के प्रधानमंत्री का आभार जताया है।

बिहार के मुख्यमंत्री को मिले इस न्योते को किसी सरकार या पार्टीविशेष की उपलब्धि के रूप में ना देखकर सम्पूर्ण राज्य की उपलब्धि के तौर पर देखा जाना चाहिए। राजनीति की अपनी जगह है और रहेगी। पर बिहार की जनता इसे राजनीति से ऊपर उठकर देखेगी तो निश्चित रूप से उसे गौरव और आनंद की अनुभूति होगी।

चलते-चलते बता दें कि नीतीश इस वर्ष मार्च में नेपाल के दौरे पर गए थे। वे वहाँ राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के साथ-साथ माओवादी, नेपाली कांग्रेस और मधेसी नेताओं से मिले थे।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदीजी, महू से उठाएं अंबेडकर के सपनों को पूरा करने की कसम

अंबेडकर का जितना नाम आज मायावती (बसपा), रामविलास पासवान (लोजपा) और रामदास अठावले (आरपीआई) लेते हैं उतना ही कांग्रेस, वामदल, आम आदमी पार्टी और यहाँ तक कि भाजपा और आरएसएस भी। आज भाषण और नारे उनके बिना पूरे नहीं होते, हर कोई अपने को उनका सच्चा और अच्छा ‘वारिस’ बता रहा है। कारण स्पष्ट है कि भारत की कुल आबादी का एक चौथाई वोट ‘अंबेडकर’ नाम से जुड़ा है। ये अलग बात है कि वोटों के गुणा-भाग में दल और नेता उन वजहों को ही भूल जाते हैं जिन्होंने अंबेडकर को ‘अंबेडकर’ बनाया।

बहरहाल, आज बाबा साहब की 125वीं जयंती है। आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ‘भारतीय संविधान के जनक’ को श्रद्धांजलि देने उनके जन्म-स्थान महू (मध्यप्रदेश) पहुँचे और आज से 24 अप्रैल तक ‘ग्राम उदय से भारत उदय’ आंदोलन चलाने की घोषणा की। शायद आपको आश्चर्य हो कि मोदी महू स्थित अंबेडकर स्मारक जाने वाले पहले प्रधानमंत्री हैं। उनसे पहले जवाहरलाल नेहरू महू गए जरूर थे लेकिन तब स्मारक नहीं बना था।

प्रधानमंत्री मोदी ने आज महू में आयोजित बड़ी सभा में कहा कि बाबा साहब एक व्यक्ति नहीं थे बल्कि एक ‘संकल्प’ का नाम थे। उन्होंने स्वयं को भाग्यशाली बताया कि उन्हें उस धरती को नमन करने का मौका मिला जहाँ बाबा साहब का जन्म हुआ। प्रधानमंत्री ने कहा कि एक ऐसा व्यक्ति जिसकी माँ बचपन में बर्तन साफ करती हो उसका बेटा प्रधानमंत्री बन जाए तो इसका श्रेय बाबा साहब को जाता है। उन्होंने कहा कि अंबेडकर की लड़ाई सामाजिक अन्याय के खिलाफ और समानता और बराबरी की स्थापना के लिए थी। लगे हाथ उन्होंने कांग्रेस पर भी निशाना साध लिया कि छह दशकों तक गरीबी-गरीबी करने वालों ने गरीबों के लिए कुछ नहीं किया।

अंबेडकर ने बहुत पहले कह दिया था कि जब तक आप सामाजिक स्वतंत्रता नहीं हासिल कर लेते, कानून आपको जो भी स्वतंत्रता देता है, वो आपके लिए बेमानी है। आज अक्षरश: यही हो रहा है। दलितों के हित के नाम पर आज कई कानून और अधिनियम हैं, पर उनका दमन बदस्तूर जारी है। आज ये महत्वपूर्ण नहीं है कि उनकी इस स्थिति के लिए कल जिम्मेदार कौन था? महत्वपूर्ण ये है कि इस स्थिति को हल करने के लिए हम आज क्या कर रहे हैं? स्वाभाविक है कि आज ये अपेक्षा देशवासियों को अपने प्रधानमंत्री से होगी।

नरेन्द्र मोदी ने ‘ग्राम उदय से भारत उदय’ आंदोलन को शुरू करने के लिए बहुत सही दिन और बहुत सही जगह का चयन किया। पर ये उदय ‘पूर्णोदय’ तब तक नहीं होगा जब तक करोड़ों दलित बच्चे स्कूल जाने की उम्र में मजदूरी करेंगे, जब तक उनके पिता सिर पर मैला ढोएंगे और फिर बांधकर पीटे भी जाएंगे और जब तक उनकी माँओं का गैंगरैप कर उन्हें नंगा घुमाया जाता रहेगा..! मोदीजी, आज आप महू गए, वहीं से उठाएं अंबेडकर के सपनों को पूरा करने की कसम।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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स्मृतिजी, आपके यूजीसी ने ‘मरहम’ लगाते-लगाते बहुत देर कर दी..!

एमफिल या पीएचडी में 11 जुलाई 2009 से पहले रजिस्ट्रेशन कराने वाले उम्मीदवारों को अब सहायक प्रोफेसर पद के आवेदन में राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा (नेट) पास करने से छूट दी जाएगी। हालांकि इसके लिए कुछ शर्तें रखी गई हैं। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के इस फैसले से उन हजारों पीएचडी डिग्री धारकों को लाभ होगा जो यूजीसी के 2009 के दिशानिर्देशों से प्रभावित हुए थे। इसके तहत कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में सहायक प्रोफेसर पद के आवेदन के लिए नेट और पीएचडी न्यूनतम योग्यता निर्धारित की गई थी।

मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी ने कहा कि 11 जुलाई 2009 से पूर्व एमफिल या पीएचडी में रजिस्ट्रेशन कराने वाले उम्मीदवारों के लिए शिक्षक नियुक्ति के पुराने नियम ही लागू होंगे। उन्हें नेट या समकक्ष राज्य की परीक्षा पास करने की जरूरत नहीं होगी। विश्वविद्यालय इसके बगैर भी सहायक प्रोफेसर नियुक्त कर सकेंगे।

सरकार के इस निर्णय से हजारों उम्मीदवारों को बड़ी राहत मिलेगी लेकिन इसके लिए कुछ शर्तें भी लगाई गई हैं। इन शर्तों के अनुसार सहायक प्रोफेसर की नियुक्ति के लिए पीएचडी डिग्री रेगुलर मोड में मिली होनी चाहिए। थीसिस के मूल्यांकन में दो बाहरी परीक्षकों को शामिल होना चाहिए। पीएचडी के लिए ओपन वायवा हुआ होना चाहिए। उम्मीदवार के दो शोधपत्र प्रस्तुत होने चाहिएं जिनमें से एक किसी जर्नल में प्रकाशित हो। इसके अलावा उम्मीदवार को कम से कम दो सेमीनार या कांफ्रेंस में प्रस्तुति (प्रेजेंटेशन) देने का अनुभव होना चाहिए। यही नहीं, उपरोक्त उपलब्धियां तभी मान्य होंगी जब कुलपति, प्रतिकुलपति या डीन उन्हें अभिप्रमाणित करेंगे।

यूजीसी के चेयरमैन वेद प्रकाश ने माना कि उच्च शिक्षण संस्थानों में शिक्षकों की बेहद कमी है। यूजीसी के इस नए कदम से शैक्षिक पदों पर काफी संख्या में उम्मीदवारों को आवेदन का मौका मिलेगा। निश्चित तौर पर यूजीसी के इस निर्णय के लिए भारत की शिक्षा मंत्री और यूजीसी के चेयरमैन बधाई के पात्र हैं लेकिन क्या ये एक तरीके का भूल-सुधार नहीं है..? जुलाई 2009 के दिशा-निर्देशों में अगर कोई कमी नहीं रही होती तो क्या आज का ये निर्णय लिया जाता..? और सबसे बड़ा सवाल ये कि जो उम्मीदवार जुलाई 2009 के विवादास्पद दिशा-निर्देशों के कारण साक्षात्कार देने या नियुक्ति पाने से वंचित रह गए उनके भविष्य का क्या होगा..?

ताजा उदाहरण बिहार का ही लें। वर्षों के इन्तजार के बाद यहाँ सहायक प्रोफेसरों की नियुक्ति-प्रक्रिया शुरू हुई लेकिन हजारों उम्मीदवार जुलाई 2009 के अपरिपक्व और अव्यावहारिक दिशा-निर्देशों की बलि चढ़ गए। इन दिशा-निर्देशों में ये सोचा ही नहीं गया कि उन छात्रों का क्या होगा जो देश के विभिन्न विश्वविद्यालयों से यूजीसी गाइडलाइन के अनुसार ही एमफिल या पीएचडी की डिग्री ले चुके थे..? इस तरह के दिशा-निर्देश आगे के उम्मीदवारों के लिए तो हो सकते थे लेकिन पूर्व के उम्मीदवारों को इनके दायरे में लाना समझ से परे था। सच तो ये है कि यूजीसी को आज किया जा रहा भूल-सुधार और पहले करना चाहिए था। खैर, देर से ही सही, अब जब ये सुधार किया ही जा रहा है तो क्या वैसे तमाम अभ्यर्थियों के लिए भावी नियुक्तियों में कोई वैकल्पिक व्यवस्था भी नहीं होनी चाहिए..?

मधेपुरा’ अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मधेपुरा कॉलेज स्थापना दिवस समारोहपूर्वक मनाया गया

मधेपुरा कॉलेज परिवार द्वारा 10 अप्रैल को कॉलेज का 27वाँ स्थापना दिवस समारोह उत्सवी माहौल में मनाया गया | आरम्भ में तीन दिवसीय वार्षिक खेल-कूद प्रतियोगिता में छात्र-छात्राओं ने अपने इल्म व अभ्यास के प्रदर्शन से दर्शकों को इतना प्रभावित किया कि वि.वि. क्रीड़ा पदाधिकारी डॉ.शैलेन्द्र कुमार ने प्राचार्य डॉ.अशोक कुमार-डॉ.पूनम यादव सहित कार्यक्रम संचालक गौतम कुमार व अन्य की भूरि-भूरि प्रशंसा की |

स्थापना दिवस समारोह का उद्घाटन मंडल वि.वि. के प्रति कुलपति डॉ.जे.पी.एन.झा, प्राचार्य डॉ.अशोक कुमार, प्राचार्य डॉ.माधवेन्द्र झा, समाजसेवी-साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी, कुलानुशासक डॉ.बी.एन.विवेका, डॉ.पूनम व अन्य ने संयुक्त रूप से दीप प्रज्वलित कर किया | कॉलेज परिवार द्वारा ‘अतिथि देवो भव:’ को चरितार्थ किया गया |

इस अवसर पर उद्घाटनकर्ता डॉ.झा ने छात्रों एवं शिक्षकों के लिए विशेष निर्देश देते हुए कहा कि शैक्षणिक माहौल को बनाये रखना हमारी प्राथमिकता है | इसके लिए सबों को मिलकर काम करना होगा | प्रभारी कुलसचिव डॉ.शैलेन्द्र कुमार, कुलानुशासक डॉ.बी.एन.विवेका, पूर्व कुलानुशासक डॉ.शिवनारायण यादव, यू.वी.के.कॉलेज के प्राचार्य डॉ.माधवेन्द्र झा ने कॉलेज स्थापना से अबतक के विकास की गाथा सुना-सुनाकर दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया |

दिनभर के उत्सवी माहौल के अन्त में अविस्मरणीय साँस्कृतिक कार्यक्रमों में महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं के बेहतरीन प्रदर्शन को चार चाँद लगाने वाले ख्याति प्राप्त गजल गायक संजीव, आगा खां सहित मनोज झा की पूरी टीम दर्शकों की तालियों की गड़गड़ाहट में खो गयी… विलीन हो गई….. गुम हो गयी | थोड़ी देर के लिए सबकुछ ठहर सा गया…….लोगों की भूख भी मिट गई…….|

Lokarpan of College Magazine 'Rachnashree' by Guests- From LtoR- Dr.Poonam Yadav, Dr.Madhepuri, Dr.B.N.Viveka, PVC Dr.J.P.N.Jha, Dr.S.N.Yadav, Dr.Shailendra Kumar, Pr.Madhavendra, Dr.Ashok Kumar & others .
Lokarpan of College Magazine ‘Rachnashree’ by Guests- From LtoR- Dr.Poonam Yadav, Dr.Madhepuri, Dr.B.N.Viveka, PVC Dr.J.P.N.Jha, Dr.S.N.Yadav, Dr.Shailendra Kumar, Pr.Madhavendra, Dr.Ashok Kumar & others .

इस सम्पूर्ण उत्सवी माहौल को ऊँचाई प्रदान करने के लिए कॉलेज द्वारा प्रकाशित वार्षिक पत्रिका- ‘रचनाश्री’ का विमोचन अतिथियों ने एक साथ मिलकर किया | स्थापना दिवस समारोह को जीवन्त करने वालों में डॉ.पूनम यादव, डॉ.भगवान मिश्रा, प्रो.मनोज भटनागर, डॉ.अभय कुमार, प्रो.मुस्ताक, रत्नाकर भारती, आरती झा, स्वाती, रानी सहित डॉ.सिद्धेश्वर कश्यप, डॉ.विनय कुमार चौधरी, प्रो.श्रीकान्त यादव, प्रो.रवि रंजन, अरविन्द कुमार, विजेंद्र मेहता आदि साधुवाद के पात्र हैं जो अन्त तक सतर्क रहे और मौजूद रहे |

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जेडीयू अध्यक्ष के तौर पर नीतीश की ताजपोशी के निहितार्थ

मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जेडीयू के नए अध्यक्ष चुन लिए गए। कल दिल्ली में सम्पन्न हुई पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में स्वयं शरद यादव ने उनके नाम का प्रस्ताव रखा जिसे सर्वसम्मति से पारित कर दिया गया। लगातार तीन कार्यकाल तक पार्टी के अध्यक्ष रहे शरद यादव ने वक्त की ‘नजाकत’ देख चौथी बार अध्यक्ष का चुनाव लड़ने से मना कर दिया गया था। हालांकि पार्टी के संविधान में संशोधन कर ऐसा हो सकता था लेकिन नीतीश की ताजपोशी की ‘पटकथा’ पहले ही लिखी जा चुकी थी। वैसे अध्यक्ष बनने के पूर्व भी सरकार और संगठन पर ‘निर्णायक’ पकड़ नीतीश की थी लेकिन अब वे दोनों के ‘विधिवत’ सर्वेसर्वा हो गए।

नीतीश के कमान सम्भालते ही जेडीयू के नए युग की शुरुआत हो गई। अध्यक्ष पद छोड़ते हुए बेहद ‘भावुक’ हो रहे शरद के लिए नए ‘उत्साह’ से लबरेज नीतीश ने कहा कि शरद पार्टी के सबसे बड़े ‘मार्गदर्शक’ बने रहेंगे लेकिन नीतीश आज जिस मुकाम पर हैं और आगे जो ‘मुकाम’ पाना चाहते हैं उसे देखते हुए आने वाले दिनों में उनका अपना ‘मार्ग’ और अपना ‘दर्शन’ हो जाय तो कोई आश्चर्य की बात नहीं। नीतीश अब बिना देर किए राष्ट्रीय लोकदल, झारखंड विकास मोर्चा और समाजवादी जनता पार्टी (राष्ट्रीय) के जेडीयू में विलय की प्रक्रिया में लगेंगे और यहीं से जेडीयू और शरद के आने वाले कल की झलक भी मिलनी शुरू हो जाएगी।

पाँचवीं बार बिहार की गद्दी सम्भाल रहे नीतीश अब अपनी राजनीति का ‘कैनवास’ बड़ा करना चाहते हैं। वे अच्छी तरह जानते थे कि मोदी और भाजपाविरोधी राजनीति की ‘धुरी’ बनने के लिए उनका अध्यक्ष पद पर काबिज होना जरूरी है। नीतीश उत्तर प्रदेश चुनाव में भी बेवजह दिलचस्पी नहीं ले रहे। वहाँ जिस तरह के समीकरण वे बिठा रहे हैं उसमें थोड़ी सफलता भी उनके लिए बड़ा रास्ता खोल सकती है और वो रास्ता 2019 के लोकसभा चुनाव में मोदी के बरक्स खुद को प्रधानमंत्री पद के लिए एक मजबूत विकल्प के तौर पर पेश करने का है।

चलते-चलते बता दें कि चुनाव आयोग के निर्देशानुसार नए अध्यक्ष के चयन के लिए राष्ट्रीय कार्यकारिणी का फैसला काफी नहीं है, इस पर राष्ट्रीय परिषद का अनुमोदन भी आवश्यक है। 23 अप्रैल को पटना में ये ‘औपचारिकता’ भी पूरी कर ली जाएगी।

‘मधेपुरा अबतक’ के लिए डॉ. ए. दीप

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डॉ.रवि ने किया त्रि-दिवसीय भारतीय संस्कृति के महाकुम्भ का उद्घाटन

25 मई 1943 को आम लोगों के बीच जनवादी विचारों को ले जाने के लिए देश के कुछ कलाकारों, रंगकर्मियों एवं वैज्ञानिकों ने जिस संस्था की स्थापना की उसे नाम दिया विश्व प्रसिद्द वैज्ञानिक डॉ.होमी जहाँगीर भाभा ने- I.P.T.A यानी Indian Peoples’ Theatre Association . ie’ भारतीय जन नाट्य संघ |

मधेपुरा इप्टा द्वारा बी.एन.मंडल स्टेडियम में आयोजित त्रि-दिवसीय भारतीय संस्कृति के महाकुम्भ का उद्घाटन पूर्व सांसद व मंडल वि.वि. के संस्थापक कुलपति डॉ.रमेन्द्र कुमार यादव रवि, विधान पार्षद विजय कुमार वर्मा, डी.एम. मो.सोहैल, डी.डी.सी. मिथिलेश कुमार, प्रो.श्यामल किशोर यादव, प्रो.योगेन्द्र नारायण यादव, समाज-सेवी साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी एवं अभिषद सदस्य डॉ.नरेश कुमार आदि ने दीप प्रज्वलित कर संयुक्तरूप से किया |

अपने उद्घाटन भाषण में डॉ.रवि ने विस्तार से शिक्षा मनीषी कीर्ति नारायण मंडल के त्याग एवं शिक्षा के प्रति ललक का आँखों देखा हाल दर्शकों के समक्ष परोसा जिन्हें इप्टा ने यह मंच उनके जन्मशती पर समर्पित कर दिया है | विधान पार्षद श्री वर्मा ने पूर्ण नशाबंदी के लिए सरकार की सराहना की तथा इप्टाकर्मियों द्वारा नशाबन्दी के फायदों को घर-घर तक ले जाने के लिए उन्हें साधुवाद दिया |

मुख्य अतिथि डी.एम. मो.सोहैल ने कहा की इप्टा अपने रास्ते पर अभी भी चल रहा है और जनवादी विचारों को लोगों तक पहुंचा रहा है | मौके पर डी.डी.सी. मिथिलेश कुमार डॉ.विनय कुमार चौधरी, डॉ.नायडू, प्रो.सचिन्द्र और डॉ.आलोक ने विचार व्यक्त करते हुए कार्यक्रम के आयोजकों का स्वागत भी किया |

समाजसेवी डॉ.मधेपुरी ने कहा कि कीर्ति बाबू को जानने के लिए महात्मा कबीर को जानना होगा और महात्मा गाँधी को भी जानना होगा | इस शिक्षा मनीषी को जानना हो तो गुरु नानक और पं.मदन मोहन मालवीय को जानना होगा | डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने विश्वविख्यात परमाणु ऊर्जा के वैज्ञानिक डॉ.भाभा के ज्ञान-विज्ञानं तथा इप्टा के प्रति समर्पण की विस्तार से चर्चा की |

असम के बिहू एवं बंगाल के ‘कृष्णा’ सहित ज्ञान विज्ञान के सचिव मुरलीधर द्वारा मधनिषेध पर आधारित नाट्य ‘सबक’ का मंचन किया गया | अंत में मो. नौशाद एवं प्रो. योगेन्द्र ना. यादव की पुस्तकों का विमोचन किया गया |

अध्यक्षीय भाषण में कार्यकारी आध्यक्ष डॉ. नरेश कुमार ने कहा कि इप्टा के कार्यक्रमों के माध्यम से इसके लाभकारी विचारों को आम जन तक ले जायेंगे | प्रशान्त कुमार ने धन्यवाद ज्ञापित किया |

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