मधेपुरा ने रखा बापू की शहादत पर दो मिनट का मौन !

बापू की शहादत के बाद स्थानीय स्वतंत्रता सेनानियों द्वारा डाक बंगला परिसर में स्थापित बापू की प्रतिमा के समक्ष जिला परिषद अध्यक्षा मंजू देवी की अध्यक्षता में डी.एम. मो.सोहैल, एस.पी. कुमार आशीष, डी.डी.सी. मिथिलेश कुमार, एस.डी.एम. संजय कुमार निराला सहित डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी, प्रो.श्यामल किशोर यादव, प्रो.शचीन्द्र, नरेश पासवान, जिला प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष किशोर कुमार, स्काउट के जिला प्रशिक्षण आयुक्त जयकृष्ण यादव सहित इप्टा के डॉ.नरेश कुमार, बंटी, सुभाष चंद्रा, सुनीत साना, शनिउल्लाह, शशिभूषण आदि ने सर्वप्रथम दो मिनट का मौन रखा | शशिप्रभा एवं तनुजा द्वारा बापू के प्रिय भजन- बैष्णव जनतें……. का गायन एवं स्कूली बच्चों की उपस्थिति में सुधिजनों द्वारा बापू की प्रतिमा पर पुष्पांजलि किया गया |

उदगार व्यक्त करते हुए डायनेमिक डी.एम. मो. सोहैल एवं एस.पी. आशीष कुमार ने बापू के सत्य-अहिंसा को बेमिसाल बताते हुए ऐसे अवसर पर विचार गोष्ठी के आयोजन पर बल दिया तथा गाँधी के विचार को आज भी प्रासांगिक बताया | डॉ.मधेपुरी ने शहीद चुल्हाय की शहादत को भी याद किया |

From Left to Right - Pro. S.K. Yadav , Dr.Madhepuri, Adyaksha Manju Devi, D.M. Md. Sohail, S.P. Kumar Ashish, SDM Sanjay Kumar Nirala, DDC Mithilesh Kumar and others observing two minutes silence at Shahid Chulhay Marg Ghandhi Park Madhepura
From Left to Right – Prof. S.K. Yadav , Dr.Madhepuri, Adyaksha Manju Devi, D.M. Md. Sohail, S.P. Kumar Ashish, SDM Sanjay Kumar Nirala, DDC Mithilesh Kumar and others observing two minutes silence at Shahid Chulhay Marg Ghandhi Park Madhepura

इस अवसर पर मधेपुरा अबतक द्वारा डॉ.मधेपुरी से यह पूछे जाने पर कि जब बापू पर बिरला मन्दिर में 30 जनवरी को प्रार्थना के समय तीन गोलियाँ दागी गयी तो उनके तीनों बन्दर कहाँ गये, किधर गये ? – के जवाब में उन्होंने कहा कि पहली गोली की आवाज सुनकर जो बन्दर कान मूंदे हुए था- वह संसद की ओर भागा और सरकार में सम्मिलित हो गया | तबसे भारत की सरकार बहरी हो गयी | दूसरा आँखें बन्द वाला बन्दर सुप्रीम कोर्ट जाकर कानून को अँधा बना दिया | और तीसरा मुँह मूंदे हुए यमुना पार कर भारत के गाँवों में बस गया- जो भारत की गूंगी जनता बन गयी | बापू उन्हीं बेजुबान ग्रामीणों की आवाज बनने की जवाबदेही हम सबों के कन्धों पर सौंप कर सुकून के साथ- हे राम ! कहकर संसार को अलविदा कह गये |

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नीतीश कुमार को पेरियार इंटरनेशनल का सोशल जस्टिस अवार्ड   

अगर आप काम करेंगे तो तय है कि आपको पहचान मिलेगी और अगर आपका काम समाज को समर्पित है तो आप वास्तव में बड़े सम्मान के हकदार हैं। हम यहाँ बात कर रहे हैं बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जिन्हें ‘पेरियार इंटरनेशनल’ ने सामाजिक न्याय के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य करने के लिए ‘के. वीरमणि सोशल जस्टिस अवार्ड’ से सम्मानित करने का निर्णय लिया है। नीतीश को यह सम्मान वर्ष 2015 के लिए दिया जाएगा। बता दें कि यह पुरस्कार महान समाज सुधारक और दलित आदर्श पेरियार ई.वी. रामासामी के अनिवासी भारतीय अनुयायियों द्वारा ‘द्रविड़ कड़गम’ के अध्यक्ष व तमिलनाडु स्थित पी.एम. यूनिवर्सिटी (Periyar Maniammai University) के चांसलर डॉ. के. वीरमणि के नाम पर शुरू किया गया है।

अमेरिका स्थित ‘पेरियार इंटरनेशनल’ सामाजिक न्याय के क्षेत्र में कार्य करने वाला विश्वस्तरीय संगठन है। इस संगठन द्वारा इससे पूर्व यह सम्मान पूर्व प्रधानमंत्री वीपी सिंह, एम करुणानिधि, सीताराम केसरी और मायावती जैसी 16 हस्तियों को दिया जा चुका है। चन्द्रजीत यादव, जीके मूपनार, वी. हनुमंत राव और छगन भुजबल भी यह पुरस्कार पा चुके हैं। अवार्ड समिति के अध्यक्ष लक्ष्मण तमिल ने कहा कि पेरियार इंटरनेशनल नीतीश को यह सम्मान पटना में देने की योजना बना रहा है।

अपने लम्बे राजनीतिक जीवन में नीतीश ने कई उतार-चढ़ाव देखे हैं। उनके कुछ निर्णयों की आलोचना भी हुई है। लेकिन न्याय के साथ विकास के लिए उन्होंने जो प्रतिबद्धता दिखाई है उसके कायल उनके विरोधी भी रहे हैं। बिहार चुनाव में महागठबंधन को मिली ऐतिहासिक सफलता ने प्रमाणित किया कि नीतीश की व्यक्तिगत छवि बिहार के तमाम राजनीतिक समीकरणों पर भारी है। बिहार जैसे जटिल सामाजिक व राजनीतिक संरचना वाले राज्य में ‘सुशासन’ की धाक जमा कर नीतीश ने ना केवल राष्ट्रीय स्तर पर ख्याति अर्जित की बल्कि अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर भी उन्होंने अपनी छाप छोड़ी है। नीतीश को दिया जाने वाला उपरोक्त पुरस्कार इसी बात की तस्दीक है।

बिहार और देश के हित में निरन्तर कार्य कर भविष्य में ऐसी अनेक उपलब्धियां हासिल करने के निमित्त ‘मधेपुरा अबतक’ सामाजिक न्याय के इस पुरोधा को अपनी शुभकामनाएं देता है।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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वैश्विक भ्रष्टाचार सूचकांक में भारत का 76वां स्थान और आगे का सफर

भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली संस्था ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल ने बुधवार को 2015 का वैश्विक भ्रष्टाचार सूचकांक (इन्टरनेशनल करप्शन परसेप्शन इंडेक्स) पेश किया जिसमें भारत 76वें स्थान पर है। 100 के ग्रेड स्केल में भारत का स्कोर 38 है। सर्वाधिक 91 स्कोर के साथ डेनमार्क इस सूची में लगातार दूसरे साल शीर्ष पर है। उत्तर कोरिया और सोमालिया न्यूनतम 8 स्कोर के साथ सबसे निचले पायदान पर हैं। बता दें कि बर्लिन स्थित ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल विश्वस्तर पर प्रतिष्ठित संस्था है जो विश्व बैंक आदि स्रोतों से प्राप्त डेटा के आधार पर भ्रष्टाचार सूचकांक तैयार करती है। इस सूचकांक से शून्य (अत्यधिक भ्रष्ट) से 100 (बहुत साफ-सुथरा) के स्केल पर विभिन्न देशों के सार्वजनिक क्षेत्र में भ्रष्टाचार के स्तर का पता चलता है।

ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल ने इस साल कुल 168 देशों की सूची जारी की है। 2014 में इस संस्था ने 174 देशों का मूल्यांकन किया था जिसमें भारत का 85वां स्थान था। कहने का अर्थ यह है कि भारत ने 2015 में अपनी रैंकिंग में 9 स्थान की छलांग लगाई है। यह ख़बर राहत तो देती है लेकिन आंशिक रूप से, क्योंकि भारत के स्कोर में कोई सुधार नहीं हुआ। भारत का स्कोर पिछले साल भी 38 ही था।

यह बता देना भी जरूरी है कि भारत उक्त सूचकांक में 76वें स्थान पर अकेला नहीं है। इस पायदान पर उसके साथ थाइलैंड, ब्राजील, ट्यूनीशिया, जांबिया और बुर्किनाफासो भी खड़े हैं। भारत के पड़ोसियों की बात करें तो भूटान 65 स्कोर के साथ 27वें स्थान पर है। चीन का स्कोर 37 है और वह 83वें स्थान पर है। पाकिस्तान और बांग्लादेश की हालत दयनीय है। पाकिस्तान जहाँ 30 स्कोर के साथ 117वें स्थान पर है वहीं बांग्लादेश 25 स्कोर के साथ 139वें स्थान पर।

ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल के इस सूचकांक के अनुसार डेनमार्क जैसे कुछ देश भ्रष्टाचार के मामले में भले ही बहुत हद तक साफ-सुथरे हों लेकिन दुनिया में एक भी देश ऐसा नहीं जिसे भ्रष्टाचार से मुक्त कहा जा सके। दुनिया के 68 प्रतिशत देशों में भ्रष्टाचार की समस्या अत्यन्त गंभीर रूप में व्याप्त है। ऐसे देशों में जी-20 समूह के आधे सदस्य देश भी शामिल हैं।

यह कहने में कोई गुरेज नहीं होना चाहिए कि समूचे विश्व में भ्रष्टाचार एकमात्र ऐसा मुद्दा है जिसे ‘सर्वव्यापी’ कहा जा सकता है। संसार का शायद ही कोई व्यक्ति हो जिसका सामना जीवन के किसी ना किसी मोड़ पर किसी ना किसी रूप में भ्रष्टाचार नाम की इस चीज से ना हुआ हो। जब ‘महामारी’ इस कदर फैल जाय तो जाहिर है कि उससे उबरने की कोशिश भी होगी। भ्रष्टाचार पर निगरानी रखने वाली इस संस्था ने इस ओर भी इशारा किया और कहा कि बदलाव की ‘जन आकांक्षा’ के कारण ही भारत और श्रीलंका जैसे देशों में नई सरकारें आईं।

अगर ट्रांसपेरेंसी इन्टरनेशनल की निगाह और टिप्पणी सरकारों के भ्रष्टाचाररोधी मंचों के जरिये सत्ता में आने पर है तो इस बात पर भी है कि भारत (और श्रीलंका) के नेताओं ने इस समस्या को लेकर लम्बे-चौड़े वादे तो किए लेकिन पूरा करने में नाकाम रहे। क्या हम ये उम्मीद करें कि हमारे हुक्मरान इस प्रतिष्ठित संस्था की ‘टिप्पणी’ को गम्भीरता से लेंगे और कुछ ऐसा जतन करेंगे कि अगले साल के सूचकांक में हम डेनमार्क जैसे देशों के करीब जाने के लिए कुछ और ऊपर का सफर तय कर लेंगे..?

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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‘ज्ञानभूमि’ Madhepura में यू.के. इन्टरनेशनल स्कूल का वार्षिकोत्सव

नववर्ष का उत्सवी माहौल… गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या… और नन्हे-मुन्ने बच्चों का रंगारंग कार्यक्रम। अवसर है ‘ज्ञानभूमि’ मधेपुरा में यू.के. इन्टरनेशनल स्कूल के वार्षिकोत्सव का। समारोह का उद्घाटन मंडल वि.वि. के संस्थापक कुलपति व पूर्व सांसद डॉ. रमेन्द्र कुमार यादव रवि द्वारा समाजसेवी-साहित्यकार डॉ. भूपेन्द्र मधेपुरी एवं मंडल वि.वि. के सिंडिकेट सदस्य द्वय डॉ. परमानंद यादव व डॉ. जवाहर पासवान की गरिमामय उपस्थिति में दीप प्रजज्वलित कर सम्मिलित रूप से किया गया।

अपने उद्घाटन भाषण में डॉ. रवि ने कहा कि इस स्कूल के छात्र-छात्राओं द्वारा विभिन्न विधाओं में किए गए प्रदर्शनों को देख ऐसा लगता है जैसे इस ‘ज्ञानभूमि’ पर बच्चों में ज्ञान का अद्भुत ‘उदय’ हो रहा है और यह इसके संस्थापक डॉ. उदय कृष्ण की लगन, मेहनत और समर्पण का फल है। मंडल वि.वि. के संस्थापक कुलपति ने अपने कार्यकाल को याद करते हुए कहा कि ये मेरे लिए बड़ा भावुक क्षण है। इस समारोह में बोलते हुए ऐसा लग रहा जैसे मैं किसी ‘दीक्षांत समारोह’ में बोल रहा हूँ। डॉ. रवि ने अपने प्रदर्शन से मन मोह लेने वाले बाल कलाकारों के गुरु ‘वाहा सर’ से अभिभूत होकर उन्हें पाँच हजार रुपये की सम्मान राशि भी दी।

समारोह को सम्बोधित करते हुए डॉ. मधेपुरी ने कहा कि अतीत को जाने बिना ना तो हम अपने भविष्य को गढ़ सकते हैं और ना वर्तमान में आगे बढ़ सकते हैं। डॉ. मधेपुरी ने इस ‘ज्ञानभूमि’ को सूफी संत दौरम शाह का ‘सिद्ध पीठ’ कहा और बताया कि इन्हीं ‘दौरम’ के नाम पर मधेपुरा रेलवे स्टेशन का नाम ‘दौरम मधेपुरा’ रखा गया।

सिंडिकेट सदस्य द्वय डॉ. परमानंद यादव एवं डॉ. जवाहर पासवान ने समारोह को सम्बोधित करते हुए संस्थापक डॉ. उदय कृष्ण द्वारा स्थापित इस स्कूल को दिन दूनी रात चौगुनी उन्नति करने की शुभकामनाएं दीं और कहा कि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए अभिवावक बेहिचक अपने बच्चों का नामांकन यहाँ कराएं।

उक्त कार्यक्रम में छात्र-छात्राओं ने मनभावन कार्यक्रमों की जैसे झड़ी लगा दी। मंच संचालक ने भी खूब तालियां बटोरीं। समारोह के आरम्भ में अतिथियों का स्वागत तथा अन्त में धन्यवाद ज्ञापन डॉ. उदय कृष्ण ने किया।

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अंधविश्वास मिटाए बिना समाज का कल्याण नहीं

परतंत्र भारत के स्वतंत्र विचारक राजा राममोहन राय ताजिन्दगी एक साथ दो लड़ाईयाँ लड़ते रहे | पहली अंग्रेजों के खिलाफ ‘आजादी की लड़ाई’ और दूसरी बाल-विवाह, सती-प्रथा, कर्मकाण्ड, पर्दा-प्रथा आदि के खिलाफ वाली लड़ाई |

परन्तु, अभी भी समाज में कुंडली मारकर बैठे ऐसे कर्मकांडों का पूर्ण परित्याग कर डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी सरीखे राजा राममोहन राय के अवशेष अवतार द्वारा अपने माता-पिता के देहावसान पर भोज के नाम पर होनेवाले खर्च को बन्द करके समाज का कोपभाजन बनना स्वीकार किया गया और 1998 से अब तक बिना किसी भेद-भाव के समाज के निर्धन लोगों के बीच टी.एन.बी.ट्रस्ट के बैनर तले अत्यंत गरीब बच्चों की पढाई में सहयोग करते रहने एवं ठंड से बचाव के लिए निर्धन नर-नारियों के बीच कपड़े बांटते रहने की व्यवस्थाएं की जाती रहीं |

मधेपुरा अबतक द्वारा इस संदर्भ में डॉ.मधेपुरी से जब चर्चा की गयी तो उन्होंने कहा कि जब पूर्व लोक अभियोजक शिवनेश्वरी प्रसाद, बिहार विधान पार्षद विजय कुमार वर्मा आदि जैसे समाजसेवी इस कार्यक्रम की चतुर्दिक चर्चा करते हों- और मधेपुरा के ख्यातिप्राप्त शिव मिस्ठान भंडार के मालिक अर्जुन साह सरीखे सक्षम लोग इस कार्यक्रम का अनुसरण करते हों- तो सुखद अनुभूति का अहसास होना स्वाभाविक हो जाता है |

Dr.Bhupendra Madhepuri with Wife Renu Choudhary distributing blankets .
Dr.Bhupendra Madhepuri with his Wife Renu Choudhary distributing blankets at Singheshwar Temple Trust Campus .

27 जनवरी को डॉ.मधेपुरी एवं उनकी धर्मपत्नी रेणु चौधरी द्वारा सिंहेश्वर टेम्पुल ट्रस्ट में कार्यरत निर्धन चतुर्थ वर्गीय कर्मचारियों के बीच भीषण ठंढ में  कम्बल बांटा गया | डॉ.मधेपुरी ने कहा कि इस कार्यक्रम से उन्हें सर्वाधिक सुकून मिलता है क्योंकि अंधविश्वास मिटाए बिना समाज का कल्याण संभव नहीं |

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मधेपुरा के भूपेन्द्र चौक पर फहराया तिरंगा डॉ.मधेपुरी ने

समाजवादी चिन्तक भूपेन्द्र नारायण मंडल के नाम वाले ‘भूपेन्द्र चौक’ पर डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने स्कूली बच्चों एवं समाज सेवियों की उपस्थिति में भारतीय तिरंगा फहराया तथा गणतंत्र दिवस को भारत का सबसे बड़ा राष्ट्रीय त्योहार बताया | उन्होंने राष्ट्रीय धरोहरों व विरासतों को भी याद किया |

डॉ.मधेपुरी ने कहा कि आज ही के दिन यानी 26 जनवरी 1950 को देश का संविधान लागू हुआ था और भारत एक संप्रभुताशाली समाजवादी लोकतांत्रिक गणतंत्र के रूप में जन्म ग्रहण कर दुनिया के सामने आया था | तब से ही 26 जनवरी को प्रत्येक वर्ष ‘भारतीय गणतंत्र दिवस’ सर्वाधिक हर्सोल्लास एवं उत्साह के साथ मनाया जाता है |

उन्होंने बच्चों को यह भी जानकारी दी कि गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर महामहिम राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्र के नाम संदेश प्रसारित किया जाता है | अगले दिन 26 जनवरी को प्रात: आजादी की लड़ाई में शहीद हुए जवानों की याद में ‘इंडिया गेट’ पर ‘अमर ज्योति’ प्रज्वलित कर 21 तोपों की सलामी दी जाती है | फिर महामहिम राष्ट्रपति द्वारा राष्ट्रीय ध्वोजोतोलन के साथ राष्ट्रगान होता है | इस गणतंत्र समारोह में महामहिम राष्ट्रपति के साथ एक विशिष्ठ विदेशी राष्ट्रप्रमुख आते हैं जिन्हें मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किये जाते हैं |

Dr.Bhupendra Madhepuri garlanding the Great Samajwadi Freedom Fighter Bhupendra Narayan Mandal before Flag Hoisting .
Dr.Bhupendra Madhepuri garlanding the Great Samajwadi Freedom Fighter Bhupendra Narayan Mandal before Flag Hoisting .

डॉ.मधेपुरी ने कहा कि आज के दिन प्रत्येक भारतीय के मन में देशभक्ति की लहर और मातृभूमि के प्रति अपार स्नेह भर उठता है जो ढेर सारी ऐतिहासिक स्मृतियों को बाहर निकालने के लिए बेताव व व्याकुल हो उठता है |

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हिन्दी को उसका मान और स्थान देने के लिए केन्द्र का बड़ा कदम

‘अच्छे दिन’ को लेकर केन्द्र की मोदी सरकार ने कई वादे किए हैं। उनमें कितने पूरे हुए, कितने पूरे होंगे और कितने केवल कागजों में रह जाएंगे ये बहस का विषय हो सकता है लेकिन राष्ट्रभाषा हिन्दी को उसका मान और स्थान देने के लिए वर्तमान सरकार जो कुछ कर रही है वह स्वागतयोग्य है। देश और विदेश के मंचों से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हिन्दी को लेकर अपनी जैसी सोच और अपनी सरकार की जैसी इच्छाशक्ति दिखाई है उससे हिन्दी के भविष्य को लेकर एक उम्मीद जरूर बंधती है।

केन्द्र सरकार ने वरिष्ठ अधिकारियों को निर्देश दिया है कि कार्यालय में पत्राचार के दौरान सरल और बोली जाने वाली हिन्दी ही लिखी जाए। अधिकारियों को निर्देश दिया गया है कि जरूरत पड़ने पर ट्रांसलेशन टूल का भी इस्तेमाल करें। सरकारी भाषा सचिव गिरीश शंकर ने केन्द्रीय मंत्रालयों के सचिवों समेत वरिष्ठ अधिकारियों को इस संबंध में एक महत्वपूर्ण पत्र भेजा है। इसमें लिखा गया है कि सभी पत्र और आदेश सरल और बोली जाने वाली हिन्दी में लिखें और छोटे वाक्यों का इस्तेमाल करें।

भाषा सचिव ने पत्र में लिखा है कि अगर जरूरत पड़े तो हिन्दी में लिखने के लिए गूगल वॉइस टाइपिंग एप्लिकेशन का भी प्रयोग करें। केन्द्र जल्द ही पाँच लाख शब्दों का ऑनलाइन ट्रांसलेशन टूल लाने जा रहा है। इसका इस्तेमाल भी हिन्दी सीखने के लिए किया जा सकता है।

बता दें कि आधिकारिक भाषा के मसले पर 8 जनवरी को गिरीश शंकर की अध्यक्षता में 20 मंत्रालयों की एक रिव्यू मीटिंग हुई। इसमें पता चला कि लगभग सभी मंत्रालयों में करीब-करीब सौ प्रतिशत लोग हिन्दी बोल और समझ सकते हैं। लेकिन कई मामलों में आधिकारिक पत्राचार में हिन्दी का प्रयोग 12 प्रतिशत से भी कम है। शंकर ने मीटिंग में इस बात पर बल दिया कि वरिष्ठ अधिकारियों को हिन्दी में बातचीत या काम करना चाहिए ताकि नीचे के अधिकारियों को प्रोत्साहन मिले। उन्होंने हिन्दी के इस्तेमाल को संवैधानिक दायित्व बताते हुए अधिकारियों से रोज के काम में हिन्दी का प्रयोग करने को कहा था और अब इसी आलोक में पत्र भी भेजा है।

हिन्दी को लेकर अब तक की सभी सरकारों ने कुछ-ना-कुछ किया है। हिन्दी को बढ़ावा देने के लिए ‘दिवस’, ‘सप्ताह’ या ‘पखवाड़ा’ मनाना कोई नई बात नहीं। लेकिन हिन्दी के लिए केन्द्र ने जो नए निर्देश दिए हैं उसमें एक अलग किस्म की ‘गंभीरता’ है। अब से पहले इतने ‘व्यावहारिक’ निर्देश नहीं दिए गए थे। जब तक हम कार्यालयी हिन्दी को उबा देने की हद तक लम्बे व जटिल वाक्यों और अनावश्यक ‘शास्त्रीयता’ से मुक्त नहीं करेंगे तब तक वह सर्वग्राह्य नहीं बन पाएगी। इसे देखते हुए केन्द्र के वर्तमान निर्देश में बोलचाल की और सरल हिन्दी के साथ छोटे वाक्यों के प्रयोग पर बल देना वाकई सुखद है।

हिन्दी या किसी भी भाषा के विकास के लिए जरूरी है कि वह बदलते समय के साथ कदमताल करे और हर दिन नई होती तकनीक के साथ सहज रहे। इसी जरूरत को ध्यान में रखकर आवश्यकतानुसार गूगल वॉइस टाइपिंग एप्लिकेशन और ट्रांसलेशन टूल का प्रयोग करने की सलाह भी केन्द्र ने दी है। इसी कड़ी में पाँच लाख शब्दों का ऑनलाइन ट्रांसलेशन टूल एक बड़ा और सराहनीय प्रयास है। भाषा सचिव और केन्द्र सरकार अपने इन प्रयत्नों के लिए सचमुच बधाई के पात्र हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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सुशांत स्मृति प्रतियोगिता में शामिल हुए मेधावी छात्र

आज 29वीं सुशांत स्मृति युवा प्रतियोगिता के प्रथम चरण की प्रतियोगिता पार्वती विज्ञान महाविद्यालय, कीर्ति नगर में संपन्न हुई | इस प्रतियोगिता में जिले के विभिन्न स्कूलों के पाँच सौ से अधिक प्रतिभावान छात्र-छात्राओं ने भाग लिया जिसमें स्थल-चित्रकारी, निबंध-लेखन एवं जी.के. सहित तीन विधाओं की परीक्षाएं ली गई |

सुशांत स्मृति के सचिव डॉ.आलोक कुमार ने मधेपुरा अबतक को बताया कि लगातर 29 वर्षों से छात्रों के बीच ये प्रतियोगिताएं आयोजित की जा रही हैं | उन्होंने यह भी कहा कि राष्ट्रपति द्वारा पुरस्कृत तबला वादक प्रो.योगेन्द्र ना.यादव इसके अध्यक्ष हैं |

इस बार की प्रतियोगिता परीक्षा में सामान्य ज्ञान में लगभग 450, चित्रकला में 61 और निबंध में 33 छात्रों ने भाग लिया | चित्रकारी का विषय पर्यावरण संरक्षण तथा निबंध के लिए विषय- आपदा प्रबंधन और युवा रखा गया था | मौके पर डॉ.विनय कुमार चौधरी, डॉ.जगदीश नारायण प्रसाद, डॉ.आलोक कुमार, दशरथ प्र.सिंह कुलिश, आनन्द कुमार मुन्ना, राहुल कुमार यादव, हर्षवर्धन सिंह राठौर, अमित कुमार अंशु, प्रो.योगेन्द्र नारायण यादव, बी.पी.साह, प्रो.रूद्रनारायण यादव आदि को सक्रिय देखे गये |

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नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की 119वीं जयंती पर सौ फाइलों की श्रद्धांजलि

नेताजी सुभाष चन्द्र बोस की आज 119वीं जयंती है। महात्मा गांधी ने उन्हें देशभक्तों का देशभक्त कहा था। ये भारत का दुर्भाग्य है कि अपने इस सपूत को उसने असमय ‘खो’ दिया और ये उस दुर्भाग्य की पराकाष्ठा है कि अब तक उस ‘खोने’ की पुष्टि ना हो सकी। कहा जाता है कि 18 अगस्त 1945 को ताइपेई के एक विमान हादसे में उनकी मृत्यु हो गई। पर इस तथाकथित ‘मृत्यु’ के कुछ दिनों बाद से ही यह बात जोर पकड़ने लगी कि असल में नेताजी मरे नहीं थे।

Subhash Chandra Bose with Family
Subhash Chandra Bose with Family

तब से लेकर आज तक जितनी चर्चा नेताजी के अवदानों की हुई है उतनी ही उनकी तथाकथित ‘मृत्यु’ से जुड़े रहस्य की भी। कभी विमान हादसे में उनकी मृत्यु की बात होती तो कभी कहा जाता कि नेताजी चीन के रास्ते रूस पहुँचे थे और वहीं उनकी हत्या कर दी गई। बहुत से लोगों का मानना है कि नेताजी भारत लौट आए थे और 1985-86 तक फैजाबाद में गुमनामी बाबा के रूप में रहे। इसी क्रम में कुछ लोगों ने दावा किया कि उन्होंने गांधीजी की शवयात्रा में नेताजी को देखा तो कुछ लोगों ने नेहरूजी की मृत्यु के बाद साधूवेश में नेताजी को उनके दर्शन करते देखने की बात कही। यहाँ तक कि उस अवसर की तस्वीर भी ‘सबूत’ के तौर पर पेश की गई।

Subhas Chandra Bose with Mahatma Gandhi & Sardar Patel at the Haripura Session of INC in 1938
Subhas Chandra Bose with Mahatma Gandhi & Sardar Patel at the Haripura Session of INC in 1938

नेताजी का व्यक्तित्व देश और काल में समाने वाला नहीं है। भारत समेत दुनिया भर में उनको जानने और मानने वाले लोगों की ये मांग रही है कि उनकी मृत्यु से जुड़े रहस्य को सुलझाने की आधिकारिक और ठोस पहल हो। कुछ समय पहले पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस दिशा में एक बड़ा कदम उठाते हुए नेताजी से जुड़ी 64 फाइलों को सार्वजनिक किया। इसके बाद से केन्द्र सरकार के पास रखी नेताजी से जुड़ी फाइलों को भी सार्वजनिक करने की मांग तेज हो गई थी। इसी पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नेताजी के रिश्तेदारों से वादा किया था कि 23 जनवरी को नेताजी की जयंती के अवसर पर उनसे जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक किया जाएगा।

Subhash Chandra Bose and Members of the Azad Hind Fauz in 1940
Subhash Chandra Bose and Members of the Azad Hind Fauz in 1940

अपने वादे को निभाते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने आज नेताजी के कई रिश्तेदारों की मौजूदगी में उनसे जुड़ी सौ गोपनीय फाइलों को सार्वजनिक कर दिया। इन सभी फाइलों की डिजिटल कॉपी को राष्ट्रीय संग्रहालय में रखा जाएगा। पहली किस्त में सौ फाइलों को सार्वजनिक किया गया है। इसके बाद हर महीने 25-25 फाइलों को सार्वजनिक किया जाएगा। प्रधानमंत्री ने इस मौके पर नेताजी को समर्पित पोर्टल netajipapers.gov.in का भी लोकार्पण किया जिस पर ये सारे दस्तावेज देखे जा सकते हैं।

नेताजी से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक कर केन्द्र सरकार ने उन्हें सचमुच एक बड़ी श्रद्धांजलि दी है। अब उम्मीद की जा सकती है कि उनकी ‘मृत्यु’ के रहस्य से पर्दा उठ जाएगा। नेताजी सुभाष चन्द्र बोस उन बिरले लोगों में हैं जो मर कर भी नहीं मरते। उनके जीवन का कोई भी कालखंड क्यों ना उठा लें वो अपने आप में सम्पूर्ण होगा। वैसे ही जैसे हीरे के हजार टुकड़े कर देने पर भी वो हीरा ही कहलाएगा। फिर भी उस ‘इतिहासपुरुष’ के जीवन का अन्तिम अध्याय क्या था और क्यों था ये जानना बेहद जरूरी है क्योंकि ये ना केवल भारत बल्कि उन तमाम देशों के मौजूदा इतिहास के पन्नों में नई खिड़कियां खोल सकता है जिनसे अपने देश की आज़ादी के निमित्त नेताजी संवादरत थे। यही नहीं, अगर आज़ाद भारत का इतिहास नए सिरे से भी लिखना पड़ जाय, तो भी कोई आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बिहार में महिलाओं को 35% आरक्षण और सरकारी नौकरी का गणित

पंचायत व नगर निकायों में 50 प्रतिशत आरक्षण देने के बाद शिक्षक बहाली में 50 प्रतिशत आरक्षण, फिर सिपाही बहाली में 35 प्रतिशत आरक्षण और अब अन्य सभी सेवाओं या संवर्गों में 35 प्रतिशत आरक्षण। बिहार सरकारी नौकरी में महिलाओं को इतने बड़े पैमाने पर आरक्षण देने वाला पहला राज्य बन गया है। बिहार सरकार के फैसले के मुताबिक सभी नौकरियों के सभी पदों पर सीधी भर्ती में महिलाओं को 35 प्रतिशत का आरक्षण दिया जाएगा। सरकार ने आरक्षित और गैर आरक्षित श्रेणी में भी महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण देने का निर्णय लिया है।

यह स्पष्ट कर देना उचित होगा कि बिहार की सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग की महिलाओं को 3 प्रतिशत आरक्षण पहले से ही मिल रहा है। सरकार की इस नई घोषणा के बाद भी वह यथावत रहेगा। अर्थात् अभी जिस 35 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की गई है वह आरक्षित एवं गैर आरक्षित कोटे की शेष 97 प्रतिशत नौकरियों पर लागू होगा।

बता दें कि बिहार में वर्तमान में अनुसूचित जाति के लिए 16 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए 1 प्रतिशत, अत्यन्त पिछड़ा वर्ग के लिए 18 प्रतिशत, पिछड़ा वर्ग के लिए 12 प्रतिशत और सामान्य वर्ग के लिए 50 प्रतिशत आरक्षण की व्यवस्था है। महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण दिए जाने के बाद यह गणित कुछ इस तरह होगा। अब अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित 16 प्रतिशत में से महिलाओं के लिए 5.6 प्रतिशत, अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित 1 प्रतिशत में से .35 प्रतिशत, अत्यन्त पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित 18 प्रतिशत में से 6.3 प्रतिशत, पिछड़ा वर्ग के लिए आरक्षित 12 प्रतिशत में से 4.2 प्रतिशत और सामान्य वर्ग के लिए आरक्षित 50 प्रतिशत में से 17.5 प्रतिशत स्थान सुरक्षित रहेगा। कहने का अर्थ यह है कि महिलाओं को आरक्षण का लाभ जातिगत आधार पर ही मिलेगा। याद दिला दें कि केन्द्र में महिला आरक्षण बिल के लंबित होने का यह बड़ा कारण रहा है। कई विपक्षी दल जातिगत आधार पर ही महिलाओं को आरक्षण दिए जाने की मांग करते रहे हैं।

महिलाओं को 35 प्रतिशत आरक्षण देते हुए यह भी स्पष्ट कर दिया गया है कि महिलाओं के लिए आरक्षित स्थानों के लिए योग्य उम्मीदवार ना मिल पाने की स्थिति में रिक्त स्थानों को उसी भर्ती व्रर्ष में संबंधित वर्ग के पुरुष उम्मीदवारों से भरा जाएगा।

विधानसभा चुनाव के दौरान नीतीश कुमार ने जो सात वादे (निश्चय) किए थे उनमें महिलाओं को सरकारी नौकरियों में 35 प्रतिशत आरक्षण एक बड़ा वादा था। उनकी सरकार ने दृढ़ इच्छाशक्ति दिखाते हुए उस वादे को पूरा भी कर दिया। लेकिन यह बात सरकार भी जानती है, हम भी जानते हैं और जिन महिलाओं को आरक्षण मिला है वो भी जानती हैं कि इस आरक्षण का वास्तविक लाभ तभी मिल पाएगा जब महिलाएं सही मायने में पुरुषों के साथ कदमताल कर रही होंगी। उदाहरण के तौर पर पंचायत या नगर निकायों को ही लें। होने को वहाँ महिलाएं 50 प्रतिशत हैं लेकिन हम ह्रदय पर हाथ रख कर क्या ये कह पाने की स्थिति में हैं कि उनकी भागीदारी व्यवहार में भी 50 प्रतिशत है..?

सच तो यह है कि ‘आरक्षण’ की शुरुआत घर से होनी चाहिए। बेटे और बेटी के लिए 50-50 प्रतिशत का आरक्षण। अधिकार में भी और कर्तव्य में भी। स्नेह में भी और सम्मान में भी। जिस दिन ऐसा होगा उस दिन किसी ‘महिला आरक्षण’ की जरूरत ही नहीं होगी। और हाँ, यही फार्मूला जातियों के आरक्षण पर भी लागू हो सकता है। अगर हम समाज को परिवार मानें और सभी जातियों को उसकी संतानें।

कोई भी आरक्षण ‘वंचितों’ को समानता का अवसर प्रदान करने के लिए होना चाहिए। आरक्षण अगर हमें अपनी कमजोरी से लड़ने की ताकत दे तो ठीक है। अगर वो कमजोरी को ही हथियार बनाना सिखाए तो वो सत्ता में आने और बने रहने की राजनीति के सिवाय कुछ भी नहीं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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