हिन्दी के लिए कोई पागल ना बने, परन्तु अंग्रेजी को बनाये रखने की कोशिश भारतीय जनतंत्र के साथ विश्वासघात है

यहाँ के सामाजिक, शैक्षिक, एवं राजनीतिक क्षेत्र के आदि पुरुष रहे हैं- बाबू रासबिहारी लाल मंडल जिन्हें लोग हिन्दी, अंग्रेजी, उर्दू, फारसी, बंगला, नेपाली आदि भाषाओं के अच्छे व गहरे जानकार मानते रहे हैं | वहीं आजाद भारत के प्रथम विधि मंत्री रह चुके शिवनंदन प्रसाद मंडल हिन्दी, अंग्रेजी व संस्कृत के तथा प्रथम एम.एल.सी. मो.कुदरतुल्लाह काजमी इस धरती के हिन्दी, उर्दू एवं मैथिली के विद्वान माने जाते रहे | तभी तो मो.काजमी साहब 12 वर्षों तक बिहार राज्य हिन्दी प्रगति समिति के सक्रिय सदस्य रहे तथा वर्षों रहे थे- बिहार मैथिली महासंघ के उपाध्यक्ष भी |

समाजवादी चिन्तक एवं हिन्दी-अंग्रेजी के मर्मज्ञ भूपेन्द्र नारायण मंडल की विद्वता तो भारतीय संसद में अंग्रेजी के सम्बन्ध में हो रही चर्चा के दरमियान दिए गये वक्तव्य से आंकी जा सकती है- अध्यक्ष महोदय ! मैं हिन्दी के लिए पागल नहीं हूँ, परन्तु भारत में ‘अंग्रेजी’ को बनाये रखने की कोशिश भारतीय जनतंत्र के साथ विश्वासघात है |

Sanrakshak Dr. Madhepuri inspecting Spelling Bee Championship Exam at Parvati College Madhepura.
Sanrakshak Dr. Madhepuri inspecting Spelling Bee Championship Exam at Parvati College Madhepura.

उसी हिन्दी को प्रतिस्थापित करने के लिए ‘हिन्दी शब्द स्पर्धा’ का आयोजन क्यों किया जा रहा है- यह भी जानिये | गत वर्ष ‘स्पेलिंग बी.एसोसिएशन’  मधेपुरा द्वारा अंग्रेजी में चैंपियनशिप के पारितोषिक वितरण समारोह में आये एस.पी. आशीष कुमार ने संरक्षक डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी व अध्यक्ष डॉ.विश्वनाथ विवेका से हिन्दी में इसे आयोजित करने हेतु जिज्ञासा व्यक्त की थी | फलस्वरूप संरक्षक की सहमति से सचिव ने 20 दिसम्बर को एक दर्जन स्कूल के वर्ग 1 से 10 तक के लगभग 450 छात्र-छात्राओं की ‘हिन्दी शब्द प्रतिस्पर्धा परीक्षा’ पार्वती कॉलेज में आयोजित की जिसकी फाइनल परीक्षा 27 दिसम्बर को इसी कॉलेज में होगी |

इस ‘हिन्दी शब्द प्रतिस्पर्धा’ चैंपियनशिप में शहर के शिखर के स्कूल- हाली क्रास, किरण पब्लिक, जितेन्द्र पब्लिक, साउथ पॉइंट, डी.एस.एकेडेमी सहित अन्य विद्यालयों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया और इसे संपन्न कराने में संरक्षक डॉ.मधेपुरी, सचिव सावंत रवि सहित सोनीराज, मो.शंहशाह, अमित, रजाउल, रवि कुमार, मनीष, राहुल, ऋतुराज, दीपक, मो.कैशर, मो.आतिफ आदि सक्रिय देखे गये |

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हमें पता है हाफिज सईद और शाहरुख खान में फर्क, फिर ‘दिलवाले’ पर मुर्दाबाद क्यों..?

भारत की सफलतम फिल्मों में शुमार ‘दिलवाले दुल्हनिया ले जाएंगे’ में राज (शाहरुख) और सिमरन (काजोल) की प्रेम कहानी ने पर्दे पर जैसे जादू-सा रच डाला था। उम्मीद की जा रही थी कि 20 साल बाद ‘दिलवाले’ में ये जोड़ी एक बार फिर कुछ वैसा ही कमाल दिखाएगी। उनके चाहनेवाले बेसब्री से इंतजार कर रहे थे शुक्रवार 18 दिसम्बर का। फिल्म तय दिन पर रिलीज भी हुई लेकिन ‘शाहरुख मुर्दाबाद’ के नारे के साथ। बिहार समेत भारत के कई राज्यों में इस फिल्म का विरोध किया जा रहा है। कहीं फिल्म के पोस्टर फाड़े जा रहे हैं तो कहीं शाहरुख का पुतला जल रहा है। लोगों से फिल्म नहीं देखने की अपील की जा रही है। कुछ जगहों पर विरोध-प्रदर्शन इतना उग्र हो गया कि पुलिस को लाठीचार्ज तक करना पड़ा।

सबसे पहले तो ये जान लें कि देश के कई सिनेमाघरों में जिस ‘दिलवाले’ के शो स्थगित किये जा रहे हैं उसके कंटेंट से प्रदर्शनकारियों का कोई लेना-देना नहीं। फिल्म आज के हिट डायरेक्टर रोहित शेट्टी के निर्देशन में बनी है और शाहरुख-काजोल के अलावे वरुण धवन और कीर्ति सेनन ने भी इसमें अभिनय किया है। फिल्म का विरोध वास्तव में इसके नायक शाहरुख खान को लेकर है। अभिनय के अलावे शाहरुख इस फिल्म के निर्माण से भी जुड़े हैं और इसकी सफलता-असफलता पर बहुत कुछ टिका है उनका। सवाल उठता है कि आखिर ऐसा क्या कर दिया शाहरुख ने..? ‘दिलवाले’ का विरोध कर किस जुर्म की सजा दी जा रही है उन्हें..?

आज एक ओर विश्व हिन्दू परिषद, बजरंग दल, हिन्दू सेना, शिवराष्ट्र सेना जैसे हिन्दूवादी संगठन और दूसरी ओर भारतीय जनता पार्टी और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कार्यकर्ता जिस वजह से शाहरुख की फिल्म का बहिष्कार कर रहे हैं उसके मूल में है पिछले कुछ महीने से भारतीय समाज और राजनीति के पटल पर धब्बे की तरह उभरा असहिष्णुता (Intolerance) का मुद्दा। पहले कन्नड़ लेखक कलबुर्गी और कुछ समय बाद यूपी के दादरी में गोमांस रखने के शक में अखलाक नामक शख्स की हत्या के बाद ये मुद्दा भड़का और पूरे देश में फैल गया। कई लेखकों, फिल्मकारों और वैज्ञानिकों ने देश में बढ़ रहे तथाकथित इन्टॉलरेंस के विरोध में अपने पुरस्कार लौटा दिए। इसी दौरान आमिर खान का देश छोड़ने वाला बयान सामने आया और शाहरुख उनके समर्थन में दिखे। 2 नवम्बर को अपने 50वें जन्मदिन पर एक चैनल से उन्होंने कहा कि “देश में इन्टॉलरेंस बढ़ रहा है। अगर मुझसे कहा जाता है तो एक सिम्बॉलिक जेस्चर के तहत मैं भी अवार्ड लौटा सकता हूँ। देश में तेजी से कट्टरता बढ़ी है।“

हालांकि ‘दिलवाले’ के रिलीज से पहले 16 दिसम्बर को शाहरुख ने कहा कि उनके बयान का गलत मतलब निकाला गया। देश में कोई इन्टॉलरेंस नहीं है। अगर उन्होंने किसी की भावनाओं को ठेस पहुँचाई है तो वह माफी मांगते हैं। पर उन्हें ‘माफी’ नहीं मिली। खासकर उन राज्यों से जहाँ सत्ता में बीजेपी है। मसलन गुजरात, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान और झारखंड। वैसे विरोध-प्रदर्शन राजधानी दिल्ली और बिहार, यूपी जैसे राज्यों में भी हुए जहाँ बीजेपी का शासन नहीं है। पर विरोध करने वाले लोग हर जगह ‘समान विचार’ वाले  हैं।

हजारों साल का इतिहास गवाह है कि इन्टॉलरेंस यानि असिष्णुता इस देश के संस्कार में ही नहीं है। अगर ये देश असहिष्णु होता तो तीनों खान (शाहरुख-आमिर-सलमान) हिन्दी सिनेमा पर राज नहीं कर रहे होते। इस देश में इन्हें पलकों पर बिठाने वाले करोड़ों लोग हैं और ऐसे में आमिर और शाहरुख के बयानों से कुछ लोगों के ‘आहत’ होने को भी गलत नहीं कहा जा सकता। पर भावनाओं को ठेस पहुँचना एक बात है और उसे राजनीति का रंग देना दूसरी। अगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नकारकर मान भी लें कि शाहरुख ने गलत कहा था तो भी क्या बीजेपी के महासचिव कैलाश विजयवर्गीय का शाहरुख को देशद्रोही कहना या फिर बीजेपी के ही सांसद योगी आदित्यनाथ का शाहरुख की तुलना आतंकी हाफिज सईद से करना और साध्वी प्राची का ये कहना कि वे पाकिस्तान के एजेंट हैं कहीं से भी सही नहीं ठहराया जा सकता। इस तरह की प्रतिक्रिया ही अपने आप में ‘असहिष्णुता’ है।

ना जाने कितने ‘हाफिज सईद’ हर पल इस ताक में रहते हैं कि कब इस तरह का मौका आए और वे हमारे किसी ‘शाहरुख’ को ट्वीट कर पाकिस्तान आने का ‘निमंत्रण’ दे। शाहरुख के मामले में हाफिज सईद ने ठीक यही किया भी। जब तक हम अपने-अपने स्वार्थ में असहिष्णुता (Intolerance) जैसे मुद्दों को हवा देते रहेंगे तब तक हाफिज सईद जैसे लोगों को भारतीय मुसलमानों से ‘छद्म’ सहानुभूति दिखाने का मौका मिलता रहेगा। हमें पूरी दृढ़ता से ये बताना होगा कि भारत सदियों से ‘शरण’ देता आया है। यहाँ से किसी को कहीं जाकर ‘शरण’ लेने की नौबत ना तो कभी आई है, ना आएगी।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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पर्यावरण जागरूकता के लिए आयोजित निबंध प्रतियोगिता में शामिल छात्र हुए पुरस्कृत

पर्यावरण शब्द तो है पुराना,फिर भी नये बच्चों को इसे जान लेना जरुरी है | पर्यावरण को “ परि + आवरण ” द्वारा समझा जा सकता है यानी ‘परि’ का अर्थ ‘चारो ओर’ तथा ‘आवरण’ का अर्थ ‘परिवेश’ |

इस तरह ‘पर्यावरण’ – “धरती सहित मानव, जीव-जन्तु, हवा-पानी, पेड़-पौधा आदि सम्पूर्ण परिवेश की विविध गतिविधियों के परिणाम आदि का समावेश ही तो है |” इसके साथ ही, आधुनिकता की दौड़ में, वैज्ञानिक उपलब्धियों को हासिल करने की होड़ में हम प्राकृतिक संतुलन को तेजी से बिगाड़ने में जो लग गये हैं – वही तो (पर्यावरण का) प्रदूषण है|

पर्यावरण जागरूकता के लिए जिला स्तरीय निबंध प्रतियोगिता का आयोजन मनोहर उच्च वि.सिंहेश्वर में किया गया जिसमें जिले के विभिन्न विद्यालयों के तीन दर्जन छात्र-छात्राओं ने भाग लिया | निबंध का विषय रखा गया – ‘पर्यावरण संरक्षण बनाम प्लास्टिक युग’|

सफल प्रतियोगियों में प्रथम स्थान पर रही – केशव कन्या उच्च विद्यालय,  मधेपुरा की छात्रा ‘ कृतिका ’, द्वितीय स्थान पर रहे – शिवनंदन प्र.मंडल उ.मा.वि. के छात्र मंदीप कुमार एवं तीसरे स्थान पर रासबिहारी उ.मा.वि. का छात्र सुशांत कुमार |

इन तीनों सफल प्रतिभागियों को वन प्रमंडल पदाधिकारी श्री सुनील कुमार सिन्हा द्वारा पुरस्कार में – एक-एक प्रशस्ति-पत्र के साथ-साथ क्रमशः दो हजार, डेढ़ हजार एवं एक हजार नगद राशि देकर पुरस्कृत किया गया |

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रामदरश मिश्र, मनमोहन झा, शमीम तारिक और साइरस मिस्त्री को साहित्य अकादमी पुरस्कार

‘असहिष्णुता’ को लेकर पुरस्कारवापसी का शोर अभी थमा ही था कि साहित्य अकादमी ने साल 2015 के लिए पुरस्कारों की घोषणा कर दी। हिन्दी में रामदरश मिश्र, मैथिली में मनमोहन झा, उर्दू में शमीम तारिक और अंग्रेजी में साइरस मिस्त्री को इस प्रतिष्ठित पुरस्कार के लिए चुना गया है। अकादमी के अध्यक्ष विश्वनाथ प्रसाद तिवारी की अध्यक्षता में कल हुई कार्यकारी मंडल की बैठक में 23 भारतीय भाषाओं के लिए पुरस्कार घोषित किए गए। बांग्ला भाषा के लिए पुरस्कार की घोषणा बाद में की जाएगी। पिछले दिनों 39 साहित्यकारों ने देश में कथित तौर पर बढ़ती ‘असहिष्णुता’ और साहित्य अकादमी के बोर्ड मेंबर एम. एम. कलबुर्गी की हत्या के विरोध में अपने पुरस्कार वापस कर दिए थे। अकादमी ने इस बाबत बड़ा निर्णय लेते हुए कहा कि लौटाए गए पुरस्कार वापस नहीं लिए जाएंगे। अकादमी की ओर से श्रीकांत बाहुलकर को भाषा सम्मान दिए जाने की घोषणा भी की गई।

अकादमी के सचिव के. श्रीनिवासन राव के द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार इस साल पुरस्कार के लिए छह कविता-संग्रह, छह कहानी-संग्रह, चार उपन्यास, दो निबंध-संग्रह, दो नाटक, दो समालोचना और एक संस्मरण का चयन किया गया है। रामदरश मिश्र को उनके कविता-संग्रह ‘आग की हंसी’, मनमोहन झा को कहानी-संग्रह ‘खिस्सा’, शमीम तारिक को समालोचना ‘तसव्वुफ और भक्ति’ और साइरस मिस्त्री को उनके उपन्यास ‘क्रॉनिकल ऑफ द कॉर्प्स बियरर’ के लिए पुरस्कार से नवाजा जाएगा। संस्कृत में इस वर्ष रामशंकर अवस्थी को उनके कविता-संग्रह ‘वनदेवी’ के लिए पुरस्कृत किया जाएगा।

भारतीय मानचित्र में सबसे ऊपर बैठे जम्मू-कश्मीर को देखें तो कश्मीरी में बशीर भद्रवाही को ‘जमिस त कशीरी मंज कशीर नातिया अदबुक’ (समालोचना) और डोगरी में ध्यान सिंह को ‘परछामें दी लो’ (कविता) के लिए सम्मानित किया जाएगा। ‘जन-गण-मन’ के ‘पंजाब-सिंध-गुजरात-मराठा’ की ओर चलें तो पंजाबी में जसविन्दर सिंह को उपन्यास ‘मात लोक’, सिंधी में माया राही को कहानी-संग्रह ‘महंगी मुर्क’, गुजराती में रसिक शाह को निबंध-संग्रह ‘अंते आरंभ’ (खंड एक और दो) और मराठी में अरुण खोपकर को संस्मरण ‘चलत-चित्रव्यूह’ के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से नवाजा जाएगा। राजस्थानी में यह सम्मान मधु आचार्य ‘आशावादी’ को उनके उपन्यास ‘गवाड़’ और कोंकणी में उदय भेंब्रे को उनके नाटक ‘कर्ण पर्व’ के लिए दिया जाएगा।

‘द्रविड़’ यानि दक्षिण भारतीय भाषाओं की बात करें तो तमिल में ए. माधवन को ‘इक्किया सुवडुकल’ (निबंध), तेलुगु में वोल्गा को ‘विमुक्त’ (कहानी), कन्नड़ में के. वी. तिरूमलेश को ‘अक्षय काव्य’ (कविता) और मलयालम में के. आर. मीरा को ‘आराचार’ (उपन्यास) के लिए अकादमी पुरस्कार दिया जा रहा है। ‘उत्कल’ की ओर रुख करें तो ओड़िया में विभूति पटनायक को ‘महिषासुर मुहन’ (कहानी) के लिए चुना गया है।

उत्तर-पूर्व की ओर बढ़ने पर असमिया में कुल सेइकिया को ‘आकाशेर छबि आर अनन्न गल्प’ (कहानी) के लिए, मणिपुरी में क्षेत्री राजन को ‘अहिड़ना येकशिल्लिबरा मड़’ (कविता)  के लिए, बोडो में ब्रजेन्द्र कुमार ब्रह्मा को ‘बायदी देंखे बायदी गाब’ (कविता) के लिए, संथाली में रबिलाल टुडू को ‘पारसी खातिर’ (नाटक) के लिए और नेपाली में गुप्त प्रधान को ‘समयका प्रतिविम्बहरू’ (कहानी) के लिए  पुरस्कार से नवाजा जा रहा है।

सभी घोषित पुरस्कार 16 फरवरी 2016 को दिल्ली के फिक्की सभागार में दिए जाएंगे। बता दें कि पुरस्कार के तौर पर विजेताओं को ताम्रपट्टिका, शॉल और एक लाख रुपये प्रदान किए जाते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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भारतीय जन लेखक संघ, मधेपुरा इकाई द्वारा विरह-मिलन के प्रखर गीतकार सुबोध कुमार सुधाकर का किया गया सम्मान

भारतीय जन लेखक संघ द्वारा सुकवि ‘सुधाकर’ के लिए आयोजित सम्मान समारोह का उद्घाटन किया प्रो.दयानन्द और अध्यक्षता की भू.ना.मंडल वि.वि. के हिन्दी विभागाध्यक्ष प्रो.इन्द्र ना.यादव ने |

संघ के महासचिव महेन्द्र ना.पंकज, सचिव सुरेन्द्र भारती, पश्चिम बंगाल के आलोक सुन्दर सरकार, प्रो.सीताराम शर्मा, प्रो.नारायण कुमार, ई.हरिश्चन्द्र मंडल, प्रमोद कुमार सूरज, डॉ.विनय कुमार चौधरी आदि की सहभागिता से- “साहित्य में दलित एवं पिछड़ो के अस्तित्व” विषयक परिचर्चा पर गहराई से विमर्श हुआ |

Dr.Madhepuri felicitating Geetkaar Sudhakar Jee .
Dr.Madhepuri felicitating Geetkaar Sudhakar Jee .

साहित्यकार डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी ने कौशिकी के अद्यक्ष व सुधाकर जी के काव्य-गुरु हरिशंकर श्रीवास्तव शलभ की चर्चा करते हुए सुकवि ‘सुधाकर’ को पुष्प गुच्छ अर्पित कर सम्मानित किया और परिचर्चा के विषयानुरूप स्वरचित ग्रन्थ- ‘इतिहास पुरुष शिवनंदन प्रसाद मंडल’ भेंट करते हुए परिचर्चा को सर्वाधिक गंभीर भी बना दिया | अन्त में डॉ.मधेपुरी ने कहा कि जब भी वे उत्तर दिशा की ओर नजर उठाते हैं तो हिमालय की तरह अडिग और स्थितप्रज्ञ होकर साहित्य सृजन करते हुए नजर आते हैं- तारानन्दन तरुण और सुबोध कुमार सुधाकर एवं हिमालय की सबसे ऊँची चोटी एवेरेस्ट पर भारतीय तिरंगा को फहराती हुई नजर आती है- देश की बेटी संतोष यादव |

 Audience attending the meeting of Bhartiya Jan Lekhak Sangh at Madhepura .
Audience attending the meeting of Bhartiya Jan Lekhak Sangh at Madhepura .

दूसरे सत्र में प्रखर गीतकार एवं क्षणदा के संपादक ‘सुधाकर’जी, जिन्होंने साहित्यिक सम्मान के रूप में राष्ट्रभाषा रत्न, साहित्य रत्न, काव्य प्रवीण तथा संपादकश्री आदि अर्जित किया है, के सम्मान में काव्य गोष्ठी का आयोजन किया गया जिसमें फर्जी हास्य कवि डॉ.अरुण कुमार, राकेश कुमार द्विजराज, धर्मेन्द्र कुमार आनन्द, प्रतिभा कुमारी, मो.अबरार आलम, उल्लास मुखर्जी, डॉ.नारायण, शम्भुनाथ अरुणाभ, संतोष सिन्हा, भूपेन्द्र यादव, डॉ.विनय कुमार चौधरी, डॉ.मधेपुरी आदि ने अपनी रचनाओं से ऐसा समां बंधा कि कार्यक्रम के दोनों सत्रों में सात घंटे कैसे निकल गये, किसी को पता भी नहीं चला |

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अगले गैंगरेप पर अगली कविता लिखने तक

[निर्भया कांड केवल एक दुर्घटना नहीं, अमानवीयता की पराकाष्ठा थी। 16 दिसम्बर 2012 को देश की राजधानी दिल्ली में छह नरपशुओं ने चलती बस में 23 वर्षीया निर्भया का गैंगरेप किया। बर्बरता की सारी हदें पार कर दी थीं उन दरिंदों ने। उन सबने असंख्य जख्म दिए निर्भया को। फिर भी जीना चाहती थी वो। तेरह दिनों तक मौत से लड़ती रही वो जब तक कि एक-एक कर उसके सारे अंगों ने काम करना बंद नहीं कर दिया। 29 दिसंबर 2012 को हमेशा के लिए सो गई निर्भया। लेकिन सोने से पहले सारे देश को झकझोर दिया था उसने। ऐसी कोई आँख ना थी जिसमें आँसू और आक्रोश ना हो।

आज उस नृशंस घटना के तीन साल हो गए। लेकिन क्या बदला..? कुछ भी तो नहीं। 2012 बीतने को था जब निर्भया कांड हुआ। उसके बाद के तीन सालों में क्या हुआ ये जानना चाहिए आपको। राष्ट्रीय अपराध ब्यूरो के मुताबिक राजधानी दिल्ली में 2013 में दुष्कर्म के 1441, 2014 में 1813 और इस साल यानि 2015 में 31 अक्टबूर तक 1856 मामले दर्ज हुए। बात यहीं खत्म नहीं होती। इन मामलों में 46 प्रतिशत दुष्कर्म पीड़ित नाबालिग हैं। कहाँ चली गई हमारी इंसानियत..? क्या कर रहा है हमारे देश का कानून..? क्यों इस कदर मर गया हमारी आँखों का पानी..? एक तरफ बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ का नारा और दूसरी तरफ हर रोज एक नई निर्भया..? क्या शर्म नहीं आनी चाहिए हमें..

जहाँ भी होगी निर्भया, आज भी बेचैन होगी। पेश है उस निर्भया को समर्पित उन्हीं दिनों लिखी गई डॉ. ए. दीप की बहुचर्चित कविता जिसका शीर्षक है अगले गैंगरेप पर अगली कविता लिखने तक]

कविता

अगले गैंगरेप पर अगली कविता लिखने तक

किसी ने तुम्हें वेदना कहा
किसी को तुम दामिनी दिखी
किसी ने निर्भया कहकर पुकारा
और तकनीकी शब्दावली में
गैंगरेप-पीड़िता थीं तुम…
जो भी नाम हो तुम्हारा
नमन करता हूँ तुम्हें
कि तुम जागी रहीं तब तक
जब तक बारी-बारी से
सो नहीं गए
तमाम अंग तुम्हारे।

आत्मा का आवरण ही नहीं
आत्मा भी लहूलुहान थी तुम्हारी
फिर भी
पूरे तेरह दिनों तक
तुम जीवित बैठी रहीं चिता पर
सोई नहीं
हमारे जागने से पहले।

मलाला का मलाल
अभी साल ही रहा था
कि जाना
छह-छह पशुओं ने मिलकर
बनाया तुम्हें शिकार
अपनी हवस का…
आज मैं लज्जित हूँ
अपने पुरुष होने पर
कि वे सारे पशु
पुरुष जाति के थे।

तुम निढ़ाल
नंगी पड़ी रहीं
सड़क के किनारे
पर कृष्ण के इस देश ने
देर कर दी
दो गज कपड़ा तक जुटाने में…
बस में उन पशुओं ने
जो तुम्हारे शरीर के साथ किया
वही दुष्कर्म करते रहे
तुम्हारे अस्तित्व के साथ
वहाँ से गुजरने वाले
न जाने कितने पिता, पुत्र, पति और भाई…
लज्जित हूँ
कि उन पशुओं के साथ-साथ
ये भी पुरुष जाति के थे।

यकीन मानो
उस दिन से आज तक
नजरें चुरा रहा हूँ
अपनी दो साल की बेटी से
और हो जाता हूँ कुंठित
जाकर पास पत्नी के
कि मैं
पुरुष जाति का हूँ।

तुम्हीं बताओ
अब कैसे करूँ पाठ
दुर्गा सप्तशती का
कैसे चढ़ाऊँ जल
पवित्र तुलसी को
कैसे दूँ बहन को
रक्षा का वचन
और कैसे दबाऊँ पैर
अपनी माँ के
कि मैं पुरुष जाति का हूँ।

लज्जित हूँ
कि पकड़े गए केवल वही छह
और बाहर हैं उनकी जाति के
बाकी हम सारे पशु।

लज्जित हूँ
कि हमारी सभ्यता के
हजारों साल होने को आए
पर हम अदद पशुता को भी
जीत नहीं पाए।

लज्जित हूँ
कि अब भी वीर्य बहता है
हमारे भीतर
और आदम की भूमिका
अब भी निभाएगा
आदमी ही।

लज्जित हूँ
कि तुम्हारे जगाने के बाद
जागकर ये कविता तो लिख दी…
अब शायद बैठ जाऊँगा
अगले गैंगरेप पर
अगली कविता लिखने तक।

डॉ. ए. दीप की कविता

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डॉ.मधेपुरी ने की प्रो.चन्द्रशेखर से मो.कुदरतुल्लाह के नाम पर सड़क के नामकरण की माँग

अमर स्वतंत्रता सेनानी, पूर्व एम.एल.सी. एवं प्रखर समाजसेवी मो.कुदरतुल्लाह काजमी की 48वीं पुण्यतिथि समारोह स्थानीय कुदरतुल्लाह यूनानी दवाखाना के प्रांगण में सम्मानपूर्वक आयोजित किया गया जिसके प्रेरक रहे हैं- डॉ.भूपेन्द्र मधेपुरी एवं आयोजक मो.शौकत अली |

समारोह के उद्घाटन सत्र का श्री गणेश दीप प्रज्ज्वलित कर बिहार सरकार के आपदा प्रबंधन मंत्री प्रो.चन्द्रशेखर व डॉ.मधेपुरी सहित राजद जिलाध्यक्ष मो.खालिद, वरीय नेता विजेन्द्र प्र.यादव, जिलापरिषद अद्यक्षा मंजू देवी ने किया |

Minister Prof.Chandrashekhar addressing the people in the campus of Kudratullah Unani Dawakhana, Madhepura .
Minister Prof.Chandrashekhar addressing the people in the campus of Kudratullah Unani Dawakhana, Madhepura .

माननीय मंत्री प्रो.चन्द्रशेखर ने उस अजिम शख्सियत मो.कुदरतुल्लाह के सामाजिक योगदानों को रेखांकित करते हुए कहा कि आगे भी डॉ.मधेपुरी एवं शौकत अली जैसे समाजसेवी लोग उन्हें याद रखेंगे | मंत्री ने कहा कि समाज के वंचितों एवं बच्चों के लिए मधेपुरा में यूनानी दवाखाना तथा काजमी कन्या विद्यालय की स्थापना हेतु उन्होंने न केवल जमीन दान दी बल्कि आजादी खातिर यातनाएँ भी सही और जेल भी गये |

Chief Guest Dr.Madhepuri comparing Kudratullah with 1st Law Minister .
Chief Guest Dr.Madhepuri comparing Kudratullah with 1st Law Minister .

मुख्यअतिथि डॉ.मधेपुरी ने मधेपुरा के मंडल-त्रय गांधीवादी शिवनन्दन प्र.मंडल, समाजवादी भूपेन्द्र नारायण मंडल एवं सामाजिक न्याय के पुरोधा बी.पी.मंडल की चर्चा करते हुए कहा कि मो.कुदरतुल्लाह गांधीवादी शिवनन्दन प्र.मंडल के हमसफर थे | दोनों एक साथ पढ़े और आजादी की लड़ाई में संग-साथ रहकर जेल यात्रा पर भी गये | दोनों दो-दो टर्म एम.एल.ए. एवं एम.एल.सी. रहे | दोनों देश के लिए जीते रहे | देश की खातिर जीने वाला कभी मरता नहीं है |

डॉ.मधेपुरी ने सर्वप्रथम मंत्री महोदय को यह जानकारी दी कि बापू द्वारा ‘नशाबन्दी’ की घोषणा किये जाने पर कुदरतुल्लाह ने इसी सड़क पर अपने पिता की ताड़ी दूकान बंद करने हेतु धरना-प्रदर्शन किया था | फिर डॉ.मधेपुरी ने इसी रोड का नामकरण कुदरतुल्लाह मार्ग करने की माँग बिहार सरकार के मंत्री प्रो.चन्द्रशेखर से की |

जहाँ विशिष्ट अतिथि के रूप में जिला परिषद् अध्यक्षा मंजू देवी ने कुदरतुल्लाह के जीवन से बहुत कुछ सीखने की बातें कहीं वहीँ राजद जिलाध्यक मो.खालिद, वरीय नेता विजेन्द्र प्र.यादव ने उद्गार व्यक्त करते हुए काजमी साहब को प्रखर राष्ट्रवादी विचारक बताया | वैसे शिक्षा प्रेमी की पुण्य तिथि पर दस शिक्षकों को सम्मानित किये जाने की सराहना भी की |

People at Kudratullah Shraddhanjali Sabha .
People at Kudratullah Shraddhanjali Sabha .

अपने अध्यक्षीय भाषण में मो.शौकत अली ने उस यूनानी दवाखाने के सारे कचरे को हटाकर वहाँ आयुष चिकित्सालय की स्थापना की माँग की | मौके पर विद्वान डॉ.सैयाद परवेज आलम, मो.खतीबुर रहमान, मुर्तुजा अली, हाजी मनीरुद्दीन, अनवर जी आदि ने श्रधांजलि अर्पित की |

अंत में सेल-टैक्स एवं इनकम-टैक्स के वरीय अधिवक्ता जयनन्दन प्रसाद ने धन्यवाद् ज्ञापित किया |

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दिलीप कुमार अब ‘पद्म विभूषण’… ‘भारतरत्न’ क्यों नहीं..?

भारतीय सिनेमा के प्रति मोहम्मद युसुफ खान उर्फ दिलीप कुमार के योगदान को रेखांकित करते हुए अमिताब बच्चन ने कहा है कि “जब भारतीय सिनेमा का इतिहास लिखा जाएगा तो वह दिलीप साहब से पहले और दिलीप साहब के बाद के काल में बंटेगा”। ये एक महानायक के दूसरे महानायक की महज प्रशंसा में कहे हुए शब्द नहीं हैं। ये सच है, सोलह आने सच। अपने अभिनय की गंगा बहाकर भारतीय सिनेमा के पर्दे को रंगमंच से अलग अस्तित्व दिलाने वाले ‘भगीरथ’ हैं दिलीप कुमार।

‘ट्रैजेडी किंग’ दिलीप कुमार को इस वर्ष ‘बिग बी’ अमिताब बच्चन, पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल, जानेमाने वकील केके वेणुगोपाल जैसी अन्य आठ हस्तियों के साथ देश के दूसरे सबसे बड़े नागरिक पुरस्कार ‘पद्म विभूषण’ के लिए चुना गया था। इसकी घोषणा गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या पर हुई थी और पुरस्कार समारोह का आयोजन अप्रैल में राष्ट्रपति भवन में किया गया था। 93 वर्षीय दिलीप कुमार अस्वस्थ होने के कारण पुरस्कार ग्रहण करने नहीं जा सके थे। कल यानि रविवार 13 दिसम्बर 2015 को भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने महाराष्ट्र के राज्यपाल सी. विद्यासागर राव और मुख्यमंत्री देवेन्द्र फडनवीस के साथ उनके बांद्रा स्थित आवास पर जाकर उन्हें यह पुरस्कार दिया।

दिलीप साहब को ‘पद्म विभूषण’ मिला ये प्रसन्नता की बात है। ये प्रसन्नता और बढ़ गई जब देश के गृहमंत्री ने स्वयं जाकर उन्हें ये सम्मान दिया और जानने को मिला कि उन्हें ऐसा करने को प्रधानमंत्री ने कहा था। पर ये प्रसन्नता ‘पूर्ण’ तब होती जब दिलीप कुमार को ‘भारतरत्न’ दिया जाता क्योंकि कुछ महीने पहले सत्ता के गलियारों में इस बात की जबरदस्त चर्चा थी कि केन्द्र सरकार दिलीप साहब को ‘भारतरत्न’ देने की तैयारी में है। ना जाने ऐसा क्यों नहीं हो पाया..? काश ऐसा हुआ होता..!

‘पद्म विभूषण’ कोई छोटा सम्मान नहीं। पर यहाँ ये प्रश्न उठना भी लाजिमी है कि आखिर ‘भारतरत्न’ का पैमाना क्या है..? ‘भारतरत्न’ पुरस्कार की शुरुआत 1954 में हुई थी और अब तक कुल 45 लोगों को इससे नवाजा जा चुका है। कहने की जरूरत नहीं कि अपने-अपने क्षेत्र में ये सभी सचमुच के ‘रत्न’ थे। कला के क्षेत्र की बात करें तो अब तक कुल छह लोगों को ये सम्मान मिला है। वे हैं सत्यजीत रे, फिल्म निर्माता-निर्देशक (1992), एम.एस. सुब्बालक्ष्मी, शास्त्रीय गायिका (1998), पं. रविशंकर, सितारवादक (1999), लता मंगेशकर, पार्श्वगायिका (2001), उस्ताद बिस्मिल्ला खां, शहनाईवादक (2001) और पं. भीमसेन जोशी, शास्त्रीय गायक (2008)। वैसे 1988 में दक्षिण के बड़े अभिनेता एम. जी. रामचंद्रन को भी भारतरत्न (मरणोपरांत) दिया गया था लेकिन ये नहीं कहा जा सकता कि उन्हें केवल उनके अभिनय के लिए यह सम्मान मिला था क्योंकि उनका उत्तरार्द्ध राजनीतिज्ञ का था और वे तमिलनाडु के अत्यंत लोकप्रिय मुख्यमंत्री भी रह चुके थे।

कला के क्षेत्र में जिन लोगों को ये सम्मान मिला वे सभी नि:संदेह इसके योग्य थे। किसी दो राय का यहाँ कोई प्रश्न ही नहीं। लेकिन ये प्रश्न तो होना ही चाहिए कि पार्श्वगायन में जो स्थान लता मंगेशकर का है, क्या अभिनय में वही मुकाम दिलीप कुमार का नहीं..?  पं. रविशंकर अगर सितारवादन के, उस्ताद बिस्मिल्ला खां शहनाईवादन के और एम. एस. सुब्बालक्ष्मी या पं. भीमसेन जोशी शास्त्रीय गायन के पर्याय हैं तो क्या दिलीप कुमार अभिनय के पर्याय कहलाने योग्य नहीं.. ? दिलीप कुमार इनमें से किसी से भी कमतर नहीं। तो फिर उन्हें इस सम्मान से क्यों वंचित किया गया.. ?

सच तो ये है कि दिलीप कुमार अपने आप में अभिनय के ‘स्कूल’ हैं और 1944 में आई उनकी पहली फिल्म ‘ज्वार भाटा’ के समय मौजूद रही पीढ़ियों से लेकर अब तक की पीढियों को जोड़ें तो ऐसा मानने वाली पीढ़ियों की गिनती आधा दर्जन से अधिक ठहरेगी।  दाग (1952), देवदास (1955), नया दौर (1957), मधुमती (1958), मुगले आज़म (1960), गंगा जमुना (1961), लीडर (1964), राम और श्याम (1967), शक्ति (1982), मशाल (1984) और कर्मा (1986) जैसी फिल्में उन्हें जीवित किंवदंती बनाती हैं। अभिनय के द्वारा की गई देश की अविस्मरणीय सेवा को देखते हुए उन्हें 1991 में ही ‘पद्मभूषण’  मिल चुका था। ‘पद्म विभूषण’ देने में 24 साल का वक्त लगना समझ के परे है। और अगर वक्त लगा ही तो उसकी भरपाई ‘भारतरत्न’ देकर की जा सकती थी।

ये भी बता दें कि 24 साल के इस अन्तराल में दिलीप साहब को दो और बड़े पुरस्कार मिले। 1995 में फिल्म का सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान ‘दादा साहब फालके अवार्ड’ और 1997 में पाकिस्तान का सर्वोच्च नागरिक सम्मान ‘निशान-ए-इम्तियाज’। यानि हर तरह से अब बारी ‘भारतरत्न’ की थी। उन्हें ‘भारतरत्न’ मिलने पर केवल एक बेमिसाल कलाकार का ही नहीं बल्कि समूची अभिनय कला का सम्मान होता। काश केन्द्र सरकार उम्र के 93वें पड़ाव पर दिलीप साहब को पूरे देश की ओर से ये तोहफा दे पाती..! संयोग से दो दिन पहले 11 दिसम्बर को उनका जन्मदिन भी था।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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मोदी के ‘मैजिक’ से चीन हुआ हलकान, काशी में एक हुए भारत-जापान

काशी के दशाश्वमेघ घाट पर देव दीपावली की तरह हुई भव्य गंगा आरती में भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे एक साथ शामिल हुए और इन दो देशों के रिश्तों के अनगिनत दीप नई रोशनी से जगमगा उठे। इन दीपों की ‘जगमग’ कुछ ऐसी थी कि चीन की आँखें ‘चुंधिया’ गईं। आबे की भारत-यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच हुए ऐतिहासिक समझौतों को चीन अपने खिलाफ ‘गोलबंदी’ बता रहा है। वहाँ के सरकारी अखबार ‘ग्लोबल टाइम्स’ ने चेतावनी के लहजे में लिखा कि भारत जापान के साथ मिलकर चीन के खिलाफ कोई ‘गोलबंदी’ ना करे। आखिर भारत-जापान की करीबी से क्यों तिलमिला उठा है चीन..?

चीन की ‘चिन्ता’ पर चर्चा से पहले भारत और जापान के बीच हुए अहम समझौतों को जानना जरूरी है जिनमें बुलेट ट्रेन से लेकर परमाणु समझौता तक शामिल है। सबसे पहले बात करते हैं बुलेट ट्रेन समझौते की। भारत में बुलेट ट्रेन प्रोजेक्ट के लिए जापान 90 हजार करोड़ रुपए की फंडिग करेगा। जापान की मदद से 503 किलोमीटर लम्बे मुंबई-अहमदाबाद रूट पर बुलेट ट्रेन दौड़ेगी जिसकी रफ्तार 300 किमी प्रति घंटे होगी। दूसरा महत्वपूर्ण समझौता भारत में जापानी लोगों के लिए ‘वीजा ऑन अराइवल’ का है जो भारत 1 मार्च 2016 से शुरू करेगा। अब जापान से आनेवाले पर्यटक एवं अन्य लोग भारत आकर वीजा ले पाएंगे। तीसरा समझौता असैन्य परमाणु सहयोग और चौथा रक्षा उपकरण और टेक्नोलॉजी के आदान-प्रदान को लेकर है। यही नहीं, भारत और अमेरिका के संयुक्त युद्धाभ्यास में अब जापान स्थायी रूप से शामिल रहेगा।

वैसे तो ये सारे समझौते चीन को खटक रहे हैं लेकिन पाँचवां समझौता उसे कुछ ज्यादा ही अखरा है। ये समझौता पूर्वोत्तर में सड़क निर्माण को लेकर है जो कि सामरिक दृष्टि से बहुत अहम है। इस समझौते के तहत जापान भारत के साथ मिलकर पूर्वोत्तर में चीन से सटी सीमा पर सड़क का निर्माण करेगा। इससे इस इलाके में भारत की ताकत बढ़ जाएगी।

भारत और जापान के बीच दोस्ती की इस नई और बड़ी कहानी की ईबारत पिछले साल लिखी गई थी जब प्रधानमंत्री मोदी जापान गए थे। चीन पाकिस्तान के साथ मिलकर लम्बे अरसे से भारत को घेरने की कोशिश करता रहा है। अब भारत ने जापान के साथ व्यापारिक, सामरिक और कूटनीतिक रिश्तों का नया अध्याय लिखकर चीन को सीधे जवाब देने की तैयारी कर ली है।

भारत, चीन और जापान के बीच रिश्तों के तानेबाने को समझने के लिए हमें इतिहास में भी झाँकना होगा। 1962 के युद्ध में चीन ने हमारी पीठ में छुरा घोंपा था और दूसरे विश्वयुद्ध में जापान ने चीन को रौंदा था। इतिहास की इस गाँठ को भूल पाना इन तीनों ही देशों के लिए संभव नहीं। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी ने कूटनीतिक तौर पर चीन के साथ भी आहार-व्यवहार में कोई कमी नहीं रखी है। लेकिन साथ ही बड़ी सूझबूझ से “तू डाल-डाल, मैं पात-पात” की नीति पर भी अमल किया है।

अंत में एक बात और। शिंजो आबे ने प्रधानमंत्री मोदी को ‘बुलेट’ की रफ्तार से काम करनेवाला बताया है। उनके इस कथन में ये जोड़ना जरूरी है कि ‘कूटनीति’ के ईंधन से इस ‘बुलेट’ की रफ्तार और तेज हो गई है। साथ में मजे की बात ये कि मोदी कम-से-कम इस मामले में कोई ‘शोर’ नहीं मचाते और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग हों या जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे, ‘जैकेट’ सबको पहनाते हैं।

मधेपुरा अबतक के लिए डॉ. ए. दीप

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बी.पी.मंडल सेतु (डुमरी पुल) का रुका हुआ निर्माण कार्य शुरू……

Madhepura होकर गुजरनेवाली एन.एच.-107 (महेशखूंट-पूर्णिया) के 16वें कि.मी. पर अवस्थित ‘बी.पी.मंडल सेतु’ पर 2010 के अगस्त-सितम्बर माह से ही तीन-चार पाये के नीचे की मिट्टी खिसक जाने के कारण वाहनों का आवागमन बन्द कर दिया गया और आज तक परिचालन बन्द ही है- जिसके कारण कोसी अंचल के मधेपुरा-सहरसा-सुपौल वासियों को जितने प्रकार की परेशानियाँ उठानी पड़ीं हैं उससे कहीं अधिक तो निकट के ‘बेलदौर प्रखंड का विकास’ अवरुद्ध हुआ है | इसी बी.पी.मंडल सेतु को अधिकांश लोग अब भी डुमरी पुल ही कहते हैं |

ज्ञातव्य हो कि ठीक एक साल के बाद ही 10 जून 2011 को 17 करोड़ की लागत से बी.पी.मंडल सेतु के बगल में एक स्टील ब्रिज का निर्माण राज्य सरकार द्वारा करके उस पर परिचालन आरम्भ कर दिया जाता है | परन्तु, बी.पी.मंडल सेतु की तरह ही स्टील ब्रिज के पाये के नीचे की मिट्टी खिसक जाती है और 8 जुलाई 2011 से इस ब्रिज पर भी परिचालन बन्द कर दिया जाता है | कोसी अंचल के लोगों का दुर्भाग्य है कि 17 करोड़ के इस ब्रिज को कोसी 27 दिनों में ही बहा ले जाती है | कोसी के तीनों जिले के लोगों की समस्याएँ जस की तस मुँह बाये खड़ी की खड़ी रह जाती हैं |

फिलहाल एक किलोमीटर लम्बा बी.पी.मंडल सेतु का रुका हुआ जीर्णोद्धार कार्य 50 करोड़ की राशि से केबुल स्टे ब्रिज की तर्ज पर शुरू हो चुका है जिसके जीर्णोद्धार का कार्य एस.पी.सिंगला कम्पनी को दिया गया है |

कम्पनी के प्रोजेक्ट मैनेजर के.के.रंजन ने  Madhepura Abtak को बताया कि दोनों किनारों पर 75-75 मीटर की दूरी पर एक-एक पाये का अतिरिक्त निर्माण होगा जिसके लिए रास्ते बनाये जाने का कार्यारम्भ भी हो गया है | उन्होंने यह भी कहा कि 290 मीटर के बीच के आठ पायों को तोड़ा जा चुका है और इस बार नदी के मध्य 140 मीटर में जल-प्रवाह को पूर्ण रूपेण मुक्त रखा जायेगा और यह भी कि इस कार्य को संपन्न होने में दो वर्ष लगेगा |

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